पिछला भाग- Valentine’s Day: नया सवेरा (भाग-1)

छोटी मां को कभी मैं ने पापा की कमाई पर ऐशोआराम करते नहीं देखा. वे तो घर से बाहर भी नहीं जाती थीं. चुपचाप अपने कमरे में रहतीं. धीरेधीरे मेरी उन के प्रति नफरत कम होती गई, लेकिन अभी भी मैं उन को मां मानने को तैयार नहीं थी. कभीकभी दिल जरूर करता कि मैं उन से पूछूं कि क्यों उन्होंने मेरे उम्रदराज पापा से शादी की जबकि उन्हें तो कोई भी मिल सकता था. आखिर इतनी खूबसूरत थीं और इतनी जवान. लेकिन हमारे बीच बहुत दूरी बन गई थी जिसे न मैं ने कभी दूर करना चाहा, न उन्होंने. ऐसा लगता था मानो घर के अलगअलग 2 कमरों में 2 जिंदा लाशें हों.

घड़ी की घंटी ने सुबह के 3 बजाए. मैं कमरे से बाहर गई और फ्रिज से पानी निकाल कर पिया. तभी मेरी नजर छोटी मां पर पड़ी जो बाहर बालकनी में बैठी थीं और बाहर की तरफ एकटक देख कर कुछ सोच रही थीं.

मु झे अनायास ही हंसी आ गई. मु झे दया आ रही थी इस बंगले पर जहां की महंगी दीवारों और महंगे कालीनों ने महंगे आंसुओं का मोल नहीं सम झा. मैं अपने कमरे में रो रही थी और छोटी मां इसी अवस्था में सुबह के 3 बजे बालकनी में बैठी हैं. खैर, मैं अपने कमरे में जाने के लिए जैसे ही मुड़ी, आज मेरे दिल ने मु झे रोक लिया.

दिमाग ने फिर उसे जकड़ा, कहा कि तु झे क्या मतलब है. यहां सब अपनी जिंदगियां जी रहे हैं. तू भी जी. क्या तु झे तेरी छोटी मां ने कभी कुछ कहा? जब तू उदास थी तब कभी तु झ से उदासी का कारण पूछा? जब कभी तू परेशान थी, कभी तेरे पास आ कर बैठीं वो? यह तो छोड़, कभी तु झ से कुछ बात भी करने की कोशिश की इन्होंने? तेरी जिंदगी में कभी कोई दिलचस्पी दिखाई इन्होंने? नहीं न, फिर तू किस बात की सहानुभूति दिखाना चाहती है? तो सब जैसा सब चल रहा है सदियों से इस घर में, वैसा ही चलने दे. अब और कुछ नए रिश्ते न बना. लेकिन पता नहीं क्या हुआ, आज तो मेरा मन मेरे दिमाग से हारने वाला नहीं था.

कदम वापस अपने कमरे की तरफ बढ़ ही नहीं रहे थे. मैं ने एक नजर फिर छोटी मां पर डाली. उन के गालों से आंसुओं का सैलाब बह रहा था. न जाने मु झे उस वक्त क्या हुआ, मेरे कदम उन की तरफ बढ़ने लगे. मैं उन के पास जा कर खड़ी हो गई.

मैं ने उन से पूछा, ‘‘आप ठीक तो हैं न? इस वक्त अकेले में यहां?’’ छोटी मां ने आंसुओं को पोंछते हुए कहा, ‘‘मैं तो अकसर यहां बैठ कर खुद से बात कर लेती हूं

प्रीति, और अकेले रहना तो इस घर की नियति ही है. तुम भी तो अकेली ही रहती हो. हां, आज बात कुछ और है. प्रीति, कल रात 11 बजे मेरे पिता चल बसे.’’ यह कह कर छोटी मां चुप हो गईं. मु झे सम झ में नहीं आ रहा था मैं क्या कहूं. मैं ने पहली बार ठीक से उन से बात की थी. मैं तो शायद दूसरों से बात करना, उन्हें सांत्वना देना भी भूल गई थी.

मैं कुछ देर चुप रही. फिर छोटी मां ने खुद कहा, ‘‘मेरे पापा बहुत शराब पीते थे. हम 3 बहनें ही थीं. उन्हें बेटा नहीं था. वे कुछ कमाते भी नहीं थे. हमारी मां थोड़ाबहुत जो कमातीं उसी से गुजर चलता था. मां ने उस हालत में भी मेरी बड़ी 2 बहनों को तो पढ़ाया. परंतु जब मेरा स्कूल में दाखिले का समय आया तो वे किसी अनजान बीमारी से ग्रसित हो गईं. हालांकि, मैं 6 वर्ष की थी, मां मु झे बस थोड़ीथोड़ी याद हैं. हां, एक बार पापा ने मां को बहुत मारा था. मैं उस वक्त बहुत डर गई थी.

‘‘मां की मृत्यु के बाद मेरी बड़ी बहनों ने घर की जिम्मेदारी ले ली. वे खुद भी पढ़तीं और मु झे भी पढ़ातीं. मैं स्कूल नहीं जाती थी. उतना पैसा नहीं था हमारे पास. मेरी बहनें मु झे घर पर ही पढ़ातीं. मैं ने पढ़ाई काफी देर से शुरू की थी, परिणामस्वरूप 20 वर्ष की आयु में मैं ने मैट्रिक की परीक्षा ओपन स्कूल से दी. मैं पास तो हो गई, लेकिन अच्छे अंक नहीं आए. फिर घर का खर्चा भी चलाना मुश्किल होता जा रहा था. दोनों बहनों की शादी हो चुकी थी. पापा तो पहले की तरह शराब के नशे में ही डूबे रहते.

‘‘कभीकभी सोचती हूं कि यदि दादाजी ने अपना घर नहीं बनाया होता, तब हमारा क्या होता. कम से कम सिर छिपाने की जगह तो थी. खैर, यही सब देखते हुए मैं ने अस्पताल में नौकरी करने की सोची. तनख्वाह बहुत कम थी, परंतु दालरोटी का खर्च निकल ही आता था. अस्पताल में मु झ पर बुरी नजर डालने वाले बहुत थे. कभीकभी खूबसूरती भी औरत की दुश्मन बन जाती है.

‘‘एक दिन तुम्हारे पिता किसी काम से अस्पताल आए. उन्होंने मु झे वहां देखा. मेरे बारे में पूछताछ की. मेरे घर का पता लिया और मेरे पापा से मिले. औरों की तरह उन्हें भी मेरी खूबसूरती भा गई और गरीब की खूबसूरती को खरीदना अमीरों के लिए शायद ही कभी मुश्किल रहा हो. उन्होंने मेरे पिता के सम्मुख शादी का प्रस्ताव रखा.

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‘‘मेरे पिता तो जैसे खुशी से फूले नहीं समाए. 20 साल की बेटी को 42 साल के उम्रदराज से ब्याहने में उन्हें जरा सी भी तकलीफ नहीं हुई, बल्कि उन की खुशी की तो कोई सीमा ही नहीं थी. उन्हें तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उन की बेटी शहर के जानेमाने रईसजादे के साथ ब्याही जाएगी. पैसों में बहुत बल होता है. बहुत बुरा लगा मु झे. मेरी राय तो कभी ली ही नहीं गई. पापा किस अधिकार से मेरी जिंदगी का निर्णय कर सकते थे? कभी बाप होने का कोई फर्ज निभाया था उन्होंने? मैं बहुत रोई, चिल्लाई लेकिन मेरी कौन सुनने वाला था. मैं ने अपनी बहनों को यह बात कही, परंतु वे भी अपनी घरगृहस्थी के  झमेलों में इस तरह लिप्त थीं कि ज्यादा कुछ कर न सकीं. वे खुद भी इस स्थिति में नहीं थीं कि मेरी कोई सहायता कर सकें.

‘‘परंतु मेरा मन नहीं माना. मैं ने सोच लिया कि कुछ भी हो जाए, मैं यह शादी नहीं करूंगी. लेकिन, तभी मेरी बड़ी बहन के साथ एक दुर्घटना हो गई. वे बस से कहीं जा रही थीं और वह बस खाई में गिर गई. वे बच तो गईं लेकिन इलाज में बहुत पैसा लगता. तब मैं ने ठंडे मन से सोचा. बहन को बचाना जरूरी था. आखिर उन्होंने मां की तरह पाला था मु झे. पैसों की ताकत को मैं ने उस वक्त पहचाना. मैं ने चुपचाप तुम्हारे पापा से शादी करने का मन बना लिया. मु झे पता चला कि उन की एक 12 वर्ष की बेटी भी है परंतु फिर भी मैं ने सिर्फ अपनी बड़ी बहन को बचाने की खातिर यह सब किया.

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