फिल्म बनाना फुलटाइम जौब है : आनंद एल राय

By Shantiswaroop Tripathi | 13 September 2017

‘तनु वेड्स मनु’, ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न’, ‘रांझणा’ जैसी फिल्मों के निर्देशक आनंद एल राय की अपनी एक अलग पहचान बन चुकी है. उन्होंने साबित कर दिखाया कि कलाकार से अभिनय करवाने की क्षमता निर्देशक में होनी चाहिए. पर अब वह रचनात्मक काम करने वालों को आगे बढ़ाने के मकसद से अब ऐसी फिल्मों का भी निर्माण कर रहे हैं, जिन्हें अन्य निर्देशक निर्देशित कर रहे हैं. फिर चाहे गत वर्ष प्रदर्शित फिल्म ‘निल बटे सन्नाता’ और ‘हैप्पी भाग जाएगी’ हो या हालिया प्रदर्शित फिल्म ‘शुभ मंगल सावधान’ ही क्यों न हो. प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के अंश.

एक फिल्म बनाना फुलटाइम जौब है. ऐसे में आप एक साथ कई फिल्मों के निर्माण करते हुए किस तरह से आप रचनात्मकता पर ध्यान दे पाते हैं?

मैं इस बात से पूरी तरह से सहमत हूं कि निर्देशक के तौर पर एक फिल्म बनाना फुलटाइम काम है. सच कह रहा हूं, मेरे दिमाग में एक समय में सिर्फ एक ही कहानी चलती है. यदि आप मुझसे पूछें कि मैं दूसरी कौन सी फिल्म बनाने जा रहा हूं तो मैं जवाब नहीं दे पाउंगा. हो सकता है कि दूसरी फिल्म को लेकर मेरे दिमाग में कहीं कोई बात हो लेकिन इस वक्त बतौर निर्देशक मेरे दिमाग में सिर्फ शाहरुख खान के साथ वाली मेरी फिल्म की कहानी घूम रही है. सच यही है कि मैं एक समय में एक ही कहानी जी सकता हूं. लेकिन पिछले कुछ वर्षो में काम करते हुए मैंने यह सीखा कि हम समान विचार धारा के निर्देशक को लेकर अपने प्रोडक्शन में फिल्में बना सकते हैं.

देखिए, मैंने अपने करियर की शुरुआत बहुत बेसिक से की थी. इसलिए मुझे अर्थशास्त्र की अच्छी समझ है. तो मुझे लगा कि मैं अपनी प्रोडक्शन कंपनी खोलकर अपनी फिल्म को एक सीमित बजट के अंदर बना सकता हूं. जब अपना प्रोडक्शन हाउस होगा, तो सारी चीजें अपने कंट्रोल में होंगी. जब मेरी प्रोडक्शन कंपनी में कुछ चीजें सही तरीके से हो गयीं, तो मुझे लगा कि अब एक सिस्टम बन गया है. तो क्यों ना मैं इसका इस्तेमाल दूसरे निर्देशकों को अपनी प्रतिभा आगे लाने के लिए करने के लिए दूं. इसलिए अब मैं इस सोच के साथ दूसरे निर्देशकों को अपने बैनर में काम करने का अवसर दे रहा हूं, जिनकी सोच मेरी सोच के अनुरूप है. मैं चाहता हूं कि जो काम वह दो साल में कर सकते थे, वह डेढ़ साल में कर लें.

आप एक फिल्म ‘‘मनमर्जियां’’ का निर्माण कर रहे थे. पर अचानक इसकी शूटिंग रोकनी पड़ी. क्या इसके निर्देशक समीर शर्मा के साथ मतभेद हो गए?

समीर शर्मा के साथ कोई मतभेद नहीं है. फिल्म निर्माण एक इंसान का काम नहीं है. इसमें कई लोग जुडत़े हैं. पर शूटिंग के दौरान कुछ चीजें ऐसी हो जाती हैं कि अच्छी पटकथा वाली फिल्म भी गलत बन जाती है और हम उस बात को समझ नहीं पाते हैं कि कहां गड़बड़ी हुई. मैं अपने आपको खुशकिस्मत मानता हूं कि ‘मनमर्जियां’ के समय हमें अपनी गलती का अहसास हो गया. ‘मनमर्जियां’ के समय हमें लगा कि कहानी पटकथा और चरित्र सही बैठ गए हैं. कलाकारों का चयन भी सही हो गया है. पर जब निर्देशक समीर शर्मा ने सेट पर काम करना शुरु किया, तो उसने हर विभाग को एक साथ जोड़ा. पर फिल्म गलत दिशा में जाने लगी. जबकि समीर शर्मा सहित सभी अपनी अपनी जगह सही थे. पूरी फिल्म के रूप में गड़बड़ी हो रही थी. ऐसे में जरूरत थी कि उस गलती को सुधार दिया जाए. सच यह भी है कि कई बार फिल्म बनते समय हमें नहीं पता चलता कि फिल्म गलत दिशा में जा रही है. अतः समीर शर्मा इससे अलग हो गए. पर यह कहानी मेरे दिल के करीब है और जल्द बनेगी.

आप तो फिल्मों के रीमेक के विरोधी रहे हैं?

आपका इशारा हमारी हालिया प्रदर्शित फिल्म ‘‘शुभ मंगल सावधान’’ की तरफ है. मैं पहले ही स्पष्ट कर चुका हूं कि यह रीमेक नहीं, बल्कि तमिल फिल्म ‘‘कल्याण समयाल साधम’’ के प्लाट पर लिखी गयी नई कहानी पर बनी फिल्म है. इसलिए लोगों ने इसे स्वीकार भी किया है.

देखिए, मेरी सोच यह है कि एक फिल्म चाहे व तमिल में हो या फ्रेंच में हो, यदि वह आपको अच्छी लगी है, तो उसका रीमेक नहीं बनना चाहिए. भाई, एक फिल्म बहुत अच्छी लगी है, तो फिर उसे बहुत अच्छी लगने के लिए दुबारा मेहनत क्यों की जाए. देखिए, सिर्फ कहानी को दक्षिण भारत से उठा कर कानपुर में स्थापित करने से फिल्म नहीं बनती क्योंकि उत्तर भारत और दक्षिण भारत का माहौल अलग है. पुत्र का पिता से बात करने का लहजा अलग है. मेरा मानना है कि आप जब भी किसी कहानी पर काम करें, तो मन से काम करें. कहानी आपके मन में बैठनी चाहिए. मन को सही जगह लगाकर ही काम करना चाहिए.

आपने फिल्म ‘‘न्यूटन’’ का भी निर्माण किया है?

मैं इस फिल्म को सिर्फ प्रस्तुत कर रहा हूं.

‘‘न्यूटन’’ को प्रस्तुत करने की वजह क्या रही?

इस फिल्म में जो बात कही गयी है, उससे मैं प्रभावित हुआ. हम लोग कितनी आसानी से सिस्टम या सरकार को दोषी ठहरा देते हैं. पर हम अपने अंदर के न्यूटन को कभी नहीं तलाशते. हम हर चीज से अपने आपको यह कहकर अलग कर लेते हैं कि यह तो दुनियादारी है. पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश के लिए कौन क्या कर रहा है? हम तो सिर्फ एक ट्वीट करके खुश हो जाते हैं. हमारे यहां सबसे बड़ा लोकतंत्र है, पर हम उसकी कीमत नहीं समझते. हमारी फिल्म में दिखाया गया है कि एक न्यूटन 76 वोटों के लिए क्या क्या नहीं करता है. जबकि हम अपने घर से निकलकर वोट देने नहीं जाते. मैं उपदेश देने के लिए यह सब नहीं कह रहा हूं. पर मैं हृदय से मानता हूं कि अपने देश के लिए मेरा घर से निकलना जरूरी है, वोट देना जरूरी है. हमारे लिए यह जानना जरूरी है कि कोई न्यूटन है, जो लड़ रहा है.

आप धनुष के साथ एक फिल्म बनाने वाले थे?

मैं धनुष के साथ काम करना चाहता हूं. मेरे पास उनके लिए एक कहानी है. पर मैं एक समय में एक ही कहानी पर काम करता हूं. जब तक शाहरुख खान के साथ वाली फिल्म खत्म नहीं होगी, तब तक दूसरी फिल्म पर कुछ कर नहीं सकता. धनुष मेरे लिए सिर्फ कलाकार नहीं, बल्कि छोटे भाई की तरह हैं. हम दोनों हमेशा एक साथ रहेंगे.

‘तनु वेड्स मनु’, ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न’, ‘रांझणा’ जैसी फिल्मों के निर्देशक आनंद एल राय की अपनी एक अलग पहचान बन चुकी है. उन्होंने साबित कर दिखाया कि कलाकार से अभिनय करवाने की क्षमता निर्देशक में होनी चाहिए. पर अब वह रचनात्मक काम करने वालों को आगे बढ़ाने के मकसद से अब ऐसी फिल्मों का भी निर्माण कर रहे हैं, जिन्हें अन्य निर्देशक निर्देशित कर रहे हैं. फिर चाहे गत वर्ष प्रदर्शित फिल्म ‘निल बटे सन्नाता’ और ‘हैप्पी भाग जाएगी’ हो या हालिया प्रदर्शित फिल्म ‘शुभ मंगल सावधान’ ही क्यों न हो. प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के अंश.

एक फिल्म बनाना फुलटाइम जौब है. ऐसे में आप एक साथ कई फिल्मों के निर्माण करते हुए किस तरह से आप रचनात्मकता पर ध्यान दे पाते हैं?

मैं इस बात से पूरी तरह से सहमत हूं कि निर्देशक के तौर पर एक फिल्म बनाना फुलटाइम काम है. सच कह रहा हूं, मेरे दिमाग में एक समय में सिर्फ एक ही कहानी चलती है. यदि आप मुझसे पूछें कि मैं दूसरी कौन सी फिल्म बनाने जा रहा हूं तो मैं जवाब नहीं दे पाउंगा. हो सकता है कि दूसरी फिल्म को लेकर मेरे दिमाग में कहीं कोई बात हो लेकिन इस वक्त बतौर निर्देशक मेरे दिमाग में सिर्फ शाहरुख खान के साथ वाली मेरी फिल्म की कहानी घूम रही है. सच यही है कि मैं एक समय में एक ही कहानी जी सकता हूं. लेकिन पिछले कुछ वर्षो में काम करते हुए मैंने यह सीखा कि हम समान विचार धारा के निर्देशक को लेकर अपने प्रोडक्शन में फिल्में बना सकते हैं.

देखिए, मैंने अपने करियर की शुरुआत बहुत बेसिक से की थी. इसलिए मुझे अर्थशास्त्र की अच्छी समझ है. तो मुझे लगा कि मैं अपनी प्रोडक्शन कंपनी खोलकर अपनी फिल्म को एक सीमित बजट के अंदर बना सकता हूं. जब अपना प्रोडक्शन हाउस होगा, तो सारी चीजें अपने कंट्रोल में होंगी. जब मेरी प्रोडक्शन कंपनी में कुछ चीजें सही तरीके से हो गयीं, तो मुझे लगा कि अब एक सिस्टम बन गया है. तो क्यों ना मैं इसका इस्तेमाल दूसरे निर्देशकों को अपनी प्रतिभा आगे लाने के लिए करने के लिए दूं. इसलिए अब मैं इस सोच के साथ दूसरे निर्देशकों को अपने बैनर में काम करने का अवसर दे रहा हूं, जिनकी सोच मेरी सोच के अनुरूप है. मैं चाहता हूं कि जो काम वह दो साल में कर सकते थे, वह डेढ़ साल में कर लें.

आप एक फिल्म ‘‘मनमर्जियां’’ का निर्माण कर रहे थे. पर अचानक इसकी शूटिंग रोकनी पड़ी. क्या इसके निर्देशक समीर शर्मा के साथ मतभेद हो गए?

समीर शर्मा के साथ कोई मतभेद नहीं है. फिल्म निर्माण एक इंसान का काम नहीं है. इसमें कई लोग जुडत़े हैं. पर शूटिंग के दौरान कुछ चीजें ऐसी हो जाती हैं कि अच्छी पटकथा वाली फिल्म भी गलत बन जाती है और हम उस बात को समझ नहीं पाते हैं कि कहां गड़बड़ी हुई. मैं अपने आपको खुशकिस्मत मानता हूं कि ‘मनमर्जियां’ के समय हमें अपनी गलती का अहसास हो गया. ‘मनमर्जियां’ के समय हमें लगा कि कहानी पटकथा और चरित्र सही बैठ गए हैं. कलाकारों का चयन भी सही हो गया है. पर जब निर्देशक समीर शर्मा ने सेट पर काम करना शुरु किया, तो उसने हर विभाग को एक साथ जोड़ा. पर फिल्म गलत दिशा में जाने लगी. जबकि समीर शर्मा सहित सभी अपनी अपनी जगह सही थे. पूरी फिल्म के रूप में गड़बड़ी हो रही थी. ऐसे में जरूरत थी कि उस गलती को सुधार दिया जाए. सच यह भी है कि कई बार फिल्म बनते समय हमें नहीं पता चलता कि फिल्म गलत दिशा में जा रही है. अतः समीर शर्मा इससे अलग हो गए. पर यह कहानी मेरे दिल के करीब है और जल्द बनेगी.

आप तो फिल्मों के रीमेक के विरोधी रहे हैं?

आपका इशारा हमारी हालिया प्रदर्शित फिल्म ‘‘शुभ मंगल सावधान’’ की तरफ है. मैं पहले ही स्पष्ट कर चुका हूं कि यह रीमेक नहीं, बल्कि तमिल फिल्म ‘‘कल्याण समयाल साधम’’ के प्लाट पर लिखी गयी नई कहानी पर बनी फिल्म है. इसलिए लोगों ने इसे स्वीकार भी किया है.

देखिए, मेरी सोच यह है कि एक फिल्म चाहे व तमिल में हो या फ्रेंच में हो, यदि वह आपको अच्छी लगी है, तो उसका रीमेक नहीं बनना चाहिए. भाई, एक फिल्म बहुत अच्छी लगी है, तो फिर उसे बहुत अच्छी लगने के लिए दुबारा मेहनत क्यों की जाए. देखिए, सिर्फ कहानी को दक्षिण भारत से उठा कर कानपुर में स्थापित करने से फिल्म नहीं बनती क्योंकि उत्तर भारत और दक्षिण भारत का माहौल अलग है. पुत्र का पिता से बात करने का लहजा अलग है. मेरा मानना है कि आप जब भी किसी कहानी पर काम करें, तो मन से काम करें. कहानी आपके मन में बैठनी चाहिए. मन को सही जगह लगाकर ही काम करना चाहिए.

आपने फिल्म ‘‘न्यूटन’’ का भी निर्माण किया है?

मैं इस फिल्म को सिर्फ प्रस्तुत कर रहा हूं.

‘‘न्यूटन’’ को प्रस्तुत करने की वजह क्या रही?

इस फिल्म में जो बात कही गयी है, उससे मैं प्रभावित हुआ. हम लोग कितनी आसानी से सिस्टम या सरकार को दोषी ठहरा देते हैं. पर हम अपने अंदर के न्यूटन को कभी नहीं तलाशते. हम हर चीज से अपने आपको यह कहकर अलग कर लेते हैं कि यह तो दुनियादारी है. पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश के लिए कौन क्या कर रहा है? हम तो सिर्फ एक ट्वीट करके खुश हो जाते हैं. हमारे यहां सबसे बड़ा लोकतंत्र है, पर हम उसकी कीमत नहीं समझते. हमारी फिल्म में दिखाया गया है कि एक न्यूटन 76 वोटों के लिए क्या क्या नहीं करता है. जबकि हम अपने घर से निकलकर वोट देने नहीं जाते. मैं उपदेश देने के लिए यह सब नहीं कह रहा हूं. पर मैं हृदय से मानता हूं कि अपने देश के लिए मेरा घर से निकलना जरूरी है, वोट देना जरूरी है. हमारे लिए यह जानना जरूरी है कि कोई न्यूटन है, जो लड़ रहा है.

आप धनुष के साथ एक फिल्म बनाने वाले थे?

मैं धनुष के साथ काम करना चाहता हूं. मेरे पास उनके लिए एक कहानी है. पर मैं एक समय में एक ही कहानी पर काम करता हूं. जब तक शाहरुख खान के साथ वाली फिल्म खत्म नहीं होगी, तब तक दूसरी फिल्म पर कुछ कर नहीं सकता. धनुष मेरे लिए सिर्फ कलाकार नहीं, बल्कि छोटे भाई की तरह हैं. हम दोनों हमेशा एक साथ रहेंगे.

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