जानें क्या है बच्चों में होने वाला हाइपरएक्टिविटी डिसआर्डर

By Grihshobha team | 13 September 2017

ध्यानाभाव एवं अतिसक्रियता विकार (अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसआर्डर) एक मानसिक विकार और दीर्घकालिक स्थिति है जो लाखों बच्चों को प्रभावित करती है और अक्सर यह स्थिति व्यक्ति के वयस्क होने तक बनी रह सकती है. एडीएचडी के साथ जुड़ी प्रमुख समस्याओं मे ध्यानाभाव (ध्यान की कमी), आवेगी व्यवहार, असावधानी और अतिसक्रियता शामिल हैं. अक्सर इससे पीड़ित बच्चे हीन भावना, अपने बिगड़े संबंधों और विद्यालय में खराब प्रदर्शन जैसी समस्याओं से जूझते रहते हैं. माना जाता है कि ध्यानाभाव एवं अतिसक्रियता विकार अनुवांशिक रूप से व्यक्ति मे आता है. जिस घर-परिवार में तनाव का माहौल रहता है और जहां पढ़ाई पर अधिक जोर देने की प्रवृत्ति रहती है वहां यह समस्या अधिक होती है. रिसर्च के अनुसार, भारत में लगभग 1.6% से 12.2% तक बच्चों में एडीएचडी की समस्या पाई जाती है.

आईएमए के अध्यक्ष डा. के.के. अग्रवाल ने कहा कि एडीएचडी वाले बच्चे बेहद सक्रिय होते हैं और इस रोग से पीड़ित ज्यादातर बच्चों में व्यवहार की समस्या (बिहेवियरल प्राब्लम्स) देखने को मिलती है. इसलिए उनकी देखभाल करना और उन्हें कुछ सिखाना बेहद मुश्किल हो जाता है. यदि इस कंडीशन को शुरू में ही काबू न किया जाए तो यह बाद में समस्याएं पैदा कर सकती हैं.

एडीएचडी की समस्या ज्यादातर प्री-स्कूल या केजी तक के बच्चों में होती है. कुछ बच्चों में किशोरावस्था की शुरुआत में भी स्थिति खराब हो सकती है. यह व्यस्कों में भी हो सकता है. हालांकि एडीएचडी का स्थायी उपचार नहीं है, फिर भी उपचार से इसके लक्षणों को काफी हद तक कम किया जा सकता है. एडीएचडी का उपचार मनोवैज्ञानिक परामर्श, दवायें, एजुकेशन या ट्रेनिंग से भी किया जा सकता है.

एडीएचडी के लक्षणों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है- ध्यान न देना, जरूरत से अधिक सक्रियता और असंतोष.

एडीएचडी वाले बच्चों को इस तरह संभालें

यदि ऐसा दिखे कि बच्चा आपा खो रहा है, तो उस पर ध्यान दें और उसे किसी अन्य एक्टिविटी में बिजी कर दें.

दोस्तों को घर बुलाएं. इससे बच्चे को लोगों से मिलने-जुलने में आसानी होगी, लेकिन यह सुनिश्चित करें कि बच्चा स्वयं पर से नियंत्रण न खोएं.

अपने बच्चे को अच्छी नींद लेने दें.

शिक्षा, सपोर्ट और क्रिएटिविटी (रचनात्मकता) से एडीएचडी से पीड़ि‍त बच्चों को संभालने में मदद मिलती है. एडीएचडी से पीड़ि‍त बच्चों की बुद्धि या क्षमता का सही से पता नहीं चल पाता, ऐसे में बच्चे की शक्तियों का पता लगाना चाहिए और बेहतर परिणामों के लिए उनकी क्षमताओं पर ध्यान देंना भी आवश्यक है.

आप उन्हे समय देकर और उनकी हर चीज टाइम टेबल के हिसाब से करके सम्हलने में उनकी मदद कर सकती है.

अच्छे काम पर तारीफ करने से या इनाम देने से भी बच्चे के व्यवहार को पाजिटिव किया जा सकता है.

ध्यानाभाव एवं अतिसक्रियता विकार (अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसआर्डर) एक मानसिक विकार और दीर्घकालिक स्थिति है जो लाखों बच्चों को प्रभावित करती है और अक्सर यह स्थिति व्यक्ति के वयस्क होने तक बनी रह सकती है. एडीएचडी के साथ जुड़ी प्रमुख समस्याओं मे ध्यानाभाव (ध्यान की कमी), आवेगी व्यवहार, असावधानी और अतिसक्रियता शामिल हैं. अक्सर इससे पीड़ित बच्चे हीन भावना, अपने बिगड़े संबंधों और विद्यालय में खराब प्रदर्शन जैसी समस्याओं से जूझते रहते हैं. माना जाता है कि ध्यानाभाव एवं अतिसक्रियता विकार अनुवांशिक रूप से व्यक्ति मे आता है. जिस घर-परिवार में तनाव का माहौल रहता है और जहां पढ़ाई पर अधिक जोर देने की प्रवृत्ति रहती है वहां यह समस्या अधिक होती है. रिसर्च के अनुसार, भारत में लगभग 1.6% से 12.2% तक बच्चों में एडीएचडी की समस्या पाई जाती है.

आईएमए के अध्यक्ष डा. के.के. अग्रवाल ने कहा कि एडीएचडी वाले बच्चे बेहद सक्रिय होते हैं और इस रोग से पीड़ित ज्यादातर बच्चों में व्यवहार की समस्या (बिहेवियरल प्राब्लम्स) देखने को मिलती है. इसलिए उनकी देखभाल करना और उन्हें कुछ सिखाना बेहद मुश्किल हो जाता है. यदि इस कंडीशन को शुरू में ही काबू न किया जाए तो यह बाद में समस्याएं पैदा कर सकती हैं.

एडीएचडी की समस्या ज्यादातर प्री-स्कूल या केजी तक के बच्चों में होती है. कुछ बच्चों में किशोरावस्था की शुरुआत में भी स्थिति खराब हो सकती है. यह व्यस्कों में भी हो सकता है. हालांकि एडीएचडी का स्थायी उपचार नहीं है, फिर भी उपचार से इसके लक्षणों को काफी हद तक कम किया जा सकता है. एडीएचडी का उपचार मनोवैज्ञानिक परामर्श, दवायें, एजुकेशन या ट्रेनिंग से भी किया जा सकता है.

एडीएचडी के लक्षणों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है- ध्यान न देना, जरूरत से अधिक सक्रियता और असंतोष.

एडीएचडी वाले बच्चों को इस तरह संभालें

यदि ऐसा दिखे कि बच्चा आपा खो रहा है, तो उस पर ध्यान दें और उसे किसी अन्य एक्टिविटी में बिजी कर दें.

दोस्तों को घर बुलाएं. इससे बच्चे को लोगों से मिलने-जुलने में आसानी होगी, लेकिन यह सुनिश्चित करें कि बच्चा स्वयं पर से नियंत्रण न खोएं.

अपने बच्चे को अच्छी नींद लेने दें.

शिक्षा, सपोर्ट और क्रिएटिविटी (रचनात्मकता) से एडीएचडी से पीड़ि‍त बच्चों को संभालने में मदद मिलती है. एडीएचडी से पीड़ि‍त बच्चों की बुद्धि या क्षमता का सही से पता नहीं चल पाता, ऐसे में बच्चे की शक्तियों का पता लगाना चाहिए और बेहतर परिणामों के लिए उनकी क्षमताओं पर ध्यान देंना भी आवश्यक है.

आप उन्हे समय देकर और उनकी हर चीज टाइम टेबल के हिसाब से करके सम्हलने में उनकी मदद कर सकती है.

अच्छे काम पर तारीफ करने से या इनाम देने से भी बच्चे के व्यवहार को पाजिटिव किया जा सकता है.

आप इस लेख को सोशल मीडिया पर भी शेयर कर सकते हैं
INSIDE GRIHSHOBHA
READER'S COMMENTS / अपने विचार पाठकों तक पहुचाएं

Comments

Add new comment