सेहत है तो सब कुछ है. सनकेयर के उत्पाद आप की अच्छी सेहत सुनिश्चित करते हैं. जहां एक तरफ हेमोकाल शरीर में आयरन का संतुलन बनाए रखता है वहीं स्टोमाफिट अपच, गैस और ऐसिडिटि से छुटकारा दिला कर स्टमक को हैल्दी रखता है. आइए जानें शरीर में आयरन की सही मात्रा और फिट स्टमक के फायदों के बारे में…

स्टमक फिट तो आप फिट

पेट में गैस अथवा ऐसिडिटी की समस्या पूरा रूटीन अस्तव्यस्त कर देती है. जानिए, इन से निबटने के कारगर उपाय…

हमारा पेट नाजुक ऊतकों से बना है. खानपान में थोड़ी सी गड़बड़ी सेहत से जुड़ी कई समस्याएं खड़ी कर देती है. पेट में दर्द, जलन व सूजन का एहसास, सीने में जलन व उल्टी की शिकायत, यह सुनने में भले ही बहुत गंभीर बीमारी न लगे, पर ऐसे लक्षण उस वक्त भी दिखते हैं जब पेट में अल्सर की शिकायत होती है. जीवनशैली और खान-पान में बदलाव का नतीजा है कि किशोर और युवाओं में पेट के अल्सर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. सामान्य भाषा में कहें तो पेट में छाले व घाव हो जाने को पेप्टिक अल्सर कहा जाता है.

क्यों होता है पेप्टिक अल्सर

पेट में म्यूकस की एक चिकनी परत होती है, जो पेट की भीतरी परत को पेप्सिन और हाइड्रोक्लोरिक ऐसिड के तीखेपन से बचाती है. इस ऐसिड की खासियत यह है कि जहां यह ऐसिड पाचन के लिए जरूरी होता है, वहीं शरीर के ऊतकों के सीधे संपर्क में आने पर उनको नुकसान भी पहुंचाता है. इस ऐसिड और म्यूकस परतों के बीच तालमेल होता है. इस संतुलन के बिगड़ने पर ही अल्सर होता है. व्यक्ति में शारीरिक या भावनात्मक तनाव पहले से उपस्थित हो तो यह पेप्टिक अल्सर को बढ़ा सकता है. अल्सर कुछ दवाओं के निरंतर प्रयोग, जैसे दर्द निवारक दवाओं के कारण भी हो सकता है. आमतौर पर यह अल्सर नली, पेट और छोटी आंत के ऊपरी भाग की भीतरी झिल्ली में होता है.

कारण है एच. पायलोरी बैक्टीरिया

पेप्टिक अल्सर का सबसे प्रमुख कारण एच. पायलोरी बैक्टीरिया है. वर्ष 1980 में एक ऑस्ट्रेलियाई डाक्टर बेरी जे. मार्शल ने एच. पायलोरी (हेलिकोबेक्टर पायलोरी) नामक बैक्टीरिया का पता लगाया था. इस बैक्टीरिया  को बिस्मथ के जरिए जड़ से मिटाने में सफल होने की वजह से 2005 का नोबल पुरस्कार भी उन्हें मिला. उन्होंने माना था कि सिर्फ खानपान और पेट में ऐसिड बनने से पेप्टिक अल्सर नहीं होता, बल्कि इसके लिए एक बैक्टीरिया भी दोषी है. इसका नाम एच. पायलोरी रखा गया. एच. पायलोरी का संक्रमण मल और गंदे पानी से फैलता है. बरसात के मौसम में गंदगी की समस्या दूसरे मौसमों के मुकाबले अधिक होती है. शारीरिक सक्रियता कम होने और रोग प्रतिरोधक तंत्र में होने वाले बदलाव भी इस बैक्टीरिया को बनाने में सहायक होते हैं. अधिक तला-भुना, मसालेदार भोजन और चाय-कौफी लेना पेट में ऐसिड के स्तर को बढ़ाता है, जिससे अल्सर का खतरा बढ़ जाता है. एच. पायलोरी बैक्टीरिया के संक्रमण से बचने का सबसे आसान तरीका साफ-सफाई का खास ध्यान रखना है.

अल्सर के लक्षण

अल्सर के लक्षणों में ऐसिडिटी होना, पेट फूलना, गैस बनना, बदहजमी, डायरिया, कब्ज, उल्टी, आंव, मितली व हिचकी आना प्रमुख हैं.

तला-भुना और मसालेदार खाना पेट में एच. पायलोरी बैक्टीरिया को फलनेफूलने का वातावरण देता है. इस के कारण धीरे-धीरे अल्सर की समस्या पैदा हो जाती है.

पेप्टिक अल्सर होने पर सांस लेने में भी दिक्कत होती है. बदहजमी की वजह से कभी-कभी ऐसिड ऊपर की ओर आहार नली में चला जाता है, इससे सीने में तेज जलन और दर्द महसूस होता है और ऐसा लगता है जैसे दिल संबंधी कोई रोग हो गया हो. इसका असर गले, दांत, सांस आदि पर पड़ने लगता है. आवाज भारी हो जाती है और मुंह में छाले पड़ जाते हैं. इस तरह की स्थितियों को ऐसिड रिफ्लक्स डिजीज भी कहा जाता है. यदि पेप्टिक अल्सर का जल्द उपचार न किया जाए और यह लंबे समय तक शरीर में बना रहे तो यह स्टमक कैंसर का कारण भी बन जाता है.

गंभीर लक्षण

खून की उल्टी हो या घंटों या दिनों पहले खाया भोजन उल्टी में निकले अथवा हमेशा मतली जैसी महसूस होती हो, तो यह अल्सर के गंभीर लक्षण हैं. असामान्य रूप से कमजोरी या चक्कर महसूस हो, मल में रक्त आता हो, अचानक तेज दर्द उठे जो दवाई लेने पर भी दूर न होता हो और दर्द पीठ तक पहुंचे, वजन लगातार घटने लगे, तो ये लक्षण गंभीर पेप्टिक अल्सर का संकेत हैं.

समय रहते उपचार है जरूरी

पेप्टिक अल्सर के कारण एनीमिया, मल के साथ अत्यधिक रक्तस्राव और लंबे समय तक बने रहने पर स्टमक कैंसर की आशंका बढ़ जाती है. आंतरिक रक्तस्राव होने के कारण शरीर में खून की कमी हो जाती है. पेट या छोटी आंत की दीवार में छेद हो जाते हैं, जिससे आंतों में गंभीर संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है. पेप्टिक अल्सर पेट के ऊतकों को भी क्षतिग्रस्त कर सकता है, जो पाचन मार्ग में भोजन के प्रवाह में बाधा पहुंचाता है. इस कारण पेट जल्दी भर जाना, उल्टी होना और वजन कम होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

क्या न करें

  • पेप्टिक अल्सर से बचना है तो धूम्रपान न करें. तम्बाकू युक्त पदार्थों से दूर रहें.
  • मांसाहार, कैफीन तथा शराब का सेवन न करें.
  • मसालेदार भोजन से बचें यदि वे आपके पेट में जलन पैदा करते हैं.

क्या करें

  • पेट की समस्याओं से बचने और पाचनतंत्र को सही रखने के लिए इन टिप्स पर गौर करें:
  • पुदीना पेट को ठंडा रखता है. इसे पानी में उबाल कर या मिंट टी के रूप लिया जा सकता है.
  • अजवाइन पेट को हलका रखती है और दर्द से भी राहत दिलाती है.
  • बेलाडोना मरोड़ और ऐठन से राहत दिलाता है.
  • स्टोमाफिट लिक्विड और टैबलेट का सेवन पेट को फिट रखने के लिए काफी लाभकारी है. इस में मौजूद बिस्मथ पेट के विकार को  बढ़ने से रोकने के साथसाथ पाचन क्रिया को भी दुरुस्त रखता है. डाक्टर की सलाह से इस का सेवन किया जा सकता है.

न होने दें आयरन की कमी

बच्चे को जन्म देने के बाद अकसर महिलाओं को कुपोषण की समस्या से गुजरना पड़ता है. बच्चे के जन्म के तुरंत बाद कुपोषण का बुरा असर मां और बच्चे दोनों पर पड़ता है. गर्भावस्था के दौरान और उस के बाद होने वाला कुपोषण बच्चे के लिए घातक हो सकता है.

गर्भावस्था के बाद कुपोषण के कारण

स्तनपान इस का सब से पहला और मुख्य कारण है. बच्चे को दूध पिलाने वाली मां को रोजाना कम से कम 1000 कैलोरी ऊर्जा की जरूरत होती है. ज्यादातर महिलाएं या तो सही डाइट चार्ट के बारे में नहीं जानती हैं या फिर इस की अनदेखी करती हैं, जिस के कारण वे डिहाइड्रेशन, विटामिन या मिनरल्स की कमी और कभीकभी खून की कमी की भी शिकार हो जाती हैं. इसे पोस्टनेटल मालन्यूट्रिशन (बच्चे के जन्म के बाद होने वाला कुपोषण) कहा जा सकता है.

स्तनपान कराने से मां को ज्यादा भूख लगती है और अकसर वह ऐसे खाद्यपदार्थ खाती है, जो पोषक एवं सेहतमंद नहीं होते. स्वाद में अच्छे लगने वाले खाद्यपदार्थों में विटामिंस और मिनरल्स की कमी होती है, जिस कारण मां कुपोषण से ग्रस्त हो जाती है.

बच्चे के जन्म से पहले और बाद में प्रीनेटल विटामिन का सेवन करना बहुत जरूरी है. प्रीनेटल विटामिन जैसे फौलिक ऐसिड पानी में घुल कर शरीर से बाहर निकलता रहता है, जिस के चलते अकसर बच्चे के जन्म के बाद महिलाएं फौलिक ऐसिड की कमी के कारण ऐनीमिया से ग्रस्त हो जाती हैं.

नवजात के लिए जोखिम

गर्भवती महिला में कुपोषण का बुरा असर उस के पेट में पल रहे बच्चे पर पड़ता है. बच्चे का विकास ठीक से नहीं हो पाता और जन्म के समय उस का वजन सामान्य से कम रह जाता है. गर्भावस्था के दौरान मां में कुपोषण आईयूजीआर और जन्म के समय कम वजन का बुरा असर बच्चे पर पड़ता है, जिस के कई परिणाम हो सकते हैं.

बच्चे पर असर

अगर गर्भावस्था के दौरान मां में पोषण की कमी हो तो बच्चे को अपने जीवन में इन बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है:

औस्टियोपोरोसिस, क्रोनिक किडनी फेल्योर, दिल की बीमारी, टाइप 2 डायबिटीज, लंग्स डिजीज, खून में लिपिड्स की मात्रा असामान्य होना, ग्लूकोस इन्टौलरैंस (एक प्रीडायबिटिक कंडीशन, जिस में शरीर में ग्लूकोस का मैटाबोलिज्म असामान्य हो जाता है).

मां के लिए समस्याएं

अगर गर्भावस्था के दौरान मां में पोषण की कमी हो तो यह जानलेवा भी हो सकती है. इस के अलावा बच्चे का समय से पहले पैदा होना, गर्भपात जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं. महिलाओं में और भी कई समस्याएं हो सकती हैं जैसे संक्रमण, एनीमिया यानी खूनी की कमी, उत्पादकता में कमी, सुस्ती और कमजोरी, औस्टियोपोटोसिस.

कुपोषण को कैसे रोका जा सकता है

कुपोषण को संतुलित आहार के सेवन से रोका जा सकता है. महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त मात्रा में फल, सब्जियां, पानी, फाइबर, प्रोटीन, वसा एवं कार्बोहाइड्रेट का सेवन करना चाहिए.

पोषण संबंधी जरूरतें

आयरन: शरीर में हीमोग्लोबिन बनाने के लिए आयरन बहुत जरूरी है. हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाता है और पूरे शरीर में औक्सीजन पहुंचाता है. अगर शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की कमी हो जाए तो शरीर के सभी अंगों तक औक्सीजन पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पाती. अगर आप आयरन का सेवन ठीक से न करें तो धीरेधीरे हीमोग्लोबिन की कमी होने लगती है और आप एनीमिक हो जाती हैं. आप अपने शरीर में ऊर्जा की कमी महसूस करती हैं. आप के शरीर में बीमारियों से लड़ने की ताकत नहीं रहती.

बच्चे को जन्म देने के बाद अकसर महिलाएं थकान और कमजोरी महसूस करती हैं. ऐसे में उन्हें आयरन से युक्त आहार का सेवन करना चाहिए. बच्चे के जन्म के दौरान कई बार बहुत ज्यादा खून बह जाने के कारण भी खून की कमी हो जाती है. अत: अपने आहार में आयरन की पर्याप्त मात्रा रखें.

ग्लूकोज: शरीर में आयरन के सही अवशोषण के लिए ग्लूकोज भी बेहद महत्त्वपूर्ण है. इस से आयरन का तेजी से अवशोषण होने के साथसाथ शरीर को उर्जा भी मिलती है.

बच्चे के जन्म के बाद पोषण और वजन में कमी: बच्चे के जन्म के बाद अकसर महिलाएं एकदम से अपना वजन कम करना चाहती हैं, जिस के कारण उचित आहार का सेवन नहीं कर पातीं. यह हानिकारक हो सकता है. स्तनपान कराने से वजन खुद ही कम हो जाता है, जबकि स्तनपान कराने वाली मां को रोजाना 300 अतिरिक्त कैलोरी की जरूरत होती है. इसलिए संतुलित आहार के साथसाथ व्यायाम करें और अतिरिक्त कैलोरी के सेवन से बचें. अगर नौर्मल डिलिवरी हुई है, तो आप बच्चे को जन्म देने के कुछ सप्ताह बाद हलका व्यायाम शुरू कर सकती हैं. हालांकि सी सैक्शन के बाद 6 सप्ताह तक व्यायाम नहीं करना चाहिए.

बिस्मथ है कारगर

पेप्टिक अलसर, एच.पायलोरी या पेट से जुड़ी अन्य समस्याओं के लिए बाजार में मौजूद ऐंटीबायोटिक दवाएं और ऐंटासिड कुछ समय के लिए राहत तो देते हैं मगर समस्या जस की तस रहती है. ऐसे में स्टोमाफिट में मौजूद बिस्मथ विकार को बढ़ने से रोकने के साथसाथ उस का निदान भी करता है. इस के प्रयोग के बाद धीरे-धीरे पाचन क्रिया भी सुचारू रूप से काम करने लगती है.

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