गृहशोभा विशेष

अकसर कामकाजी महिलाएं अपराधबोध से ग्रस्त रहती हैं. यह अपराधबोध उन्हें इस बात को ले कर होता है कि पता नहीं वे अपने कैरियर की वजह से घर की जिम्मेदारियों का ठीक से निर्वाह कर पाएंगी या नहीं. उस पर यह अपराधबोध तब और बढ़ जाता है जब वे अपने दुधमुंहे बच्चे के हाथ से अपना आंचल छुड़ा कर काम पर जाती हैं. तब उन्हें हर पल अपने बच्चे की चिंता सताती है. एकल परिवारों में जहां पारिवारिक सहयोग की कतई गुंजाइश नहीं होती है, वहां तो नौबत यहां तक आ जाती है कि उन्हें अपने बच्चे या कैरियर में से किसी एक का चुनाव करना पड़ता है और फिर हमारे समाज में बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी मां पर ही होती है इसलिए मां चाहे कितने भी बड़े पद पर आसीन क्यों न हो, चाहे उस की तनख्वाह कितनी भी ज्यादा क्यों न हो समझौता उसे ही करना पड़ता है. ऐसे में होता यह है कि यदि वह अपने बच्चे की परवरिश के बारे में सोच कर अपने कैरियर पर विराम लगाती है, तो उसे अपराधबोध होता है कि उस ने अपने कैरियर के लिए कुछ नहीं किया. यदि वह बच्चे के पालनपोषण के लिए बेबीसिटर (दाई) पर भरोसा करती है, तो इस एहसास से उबरना मुश्किल होता है कि उस ने अपने कैरियर और भविष्य के लिए अपने बच्चे की परवरिश पर ध्यान नहीं दिया. ऐसे में एक कामकाजी महिला करे तो करे क्या?

इस का कोई तयशुदा जवाब नहीं हो सकता ह. इस मामले में हरेक की अपने हालात, इच्छाओं और प्राथमिकताओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है. यों भी मां बनना किसी भी लड़की की जिंदगी का बड़ा बदलाव होता है. कुछ लड़कियां ऐसी भी होती हैं जो किसी भी तरह मैनेज कर अपनी जौब करना चाहती हैं तो कुछ ऐसी भी होती हैं जो किसी भी कीमत पर अपने बच्चे पर ध्यान देना चाहती हैं. वनस्थली विद्यापीठ में ऐसोसिएट प्रोफैसर डा. सुधा मोरवाल कहती हैं, ‘‘मां बनने के बाद मैं ने अपना काम फिर से शुरू किया. चूंकि मुझे पारिवारिक सहयोग मिला था, इसलिए मेरे कैरियर ने फिर से गति पकड़ ली. हालांकि शुरुआती दौर में मुझे थोड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था और बच्चे को अपना पूरा समय न दे पाने का अपराधबोध होता था. पर हां, घर के कामकाज का बोझ मुझ पर कभी भी ज्यादा नहीं पड़ा.’’

डा. सुधा के उलट मीना मिलिंद को अपनी जौब छोड़नी पड़ी, क्योंकि उस के बच्चे को संभालने वाला कोई नहीं था और वह यह भी नहीं चाहती थी कि उसे बच्चे को ले कर कोई गिल्ट हो. मगर काम छोड़ने की कसक भी कम नहीं थी. बच्चे के छोटे होने की वजह से वे अभी तक जौब शुरू नहीं कर पाईं, क्योंकि वे एकल परिवार में रहती हैं. हर कामकाजी लड़की चाहती है कि वह अपनी जौब करती रहे, लेकिन हालात हमेशा उस के पक्ष में नहीं होते हैं, क्योंकि शहर में घर और औफिस की दूरी और एकल परिवार उन्हें यह सुविधा नहीं देते कि वे अपने बच्चे को घर में छोड़ कर काम करने जा सकें. फिर भी कुछ ऐसी चीजें हैं जिन के बारे में निश्चिंत हो कर वे अपना काम जारी रख सकती हैं: कंपनी का चुनाव: शुरू में ऐसी कंपनी में काम करें जहां काम के घंटे कम हों, दफ्तर का समय थोड़ा लचीला हो. एक रूटीन तैयार कर लें: बच्चा होने के बाद आप जब औफिस जौइन करें तो एक रूटीन तैयार कर लें. इस में ध्यान दें कि आप को किस समय से किस समय तक कितना काम निबटा लेना है. इस तरह टाइम मैनेजमैंट कर के आप अपनी काफी मुश्किलें खुद ही हल कर लेंगी.

व्यवस्थित रखें: छोटीछोटी चीजों के लिए अलगअलग बौक्स बना लें ताकि आप को हर चीज जल्दी से मिल जाए. बच्चे का सामान एक जगह रखें. बाकी सामान के भी बौक्स तैयार कर लें. ऐसा न हो कि एक कैंची ढूंढ़ने में ही आप को 2 घंटे लग जाएं.

पार्टनर से मदद लें: बच्चा छोटा है तो अपने पार्टनर से मदद लें. उन से छोटेमोटे काम करने को कहें, क्योंकि वे भी समझेंगे कि आप के लिए अकेले यह सब करना बहुत मुश्किल है.

नैनी रखें: बच्चे को डेकेयर में रखना नहीं चाहती हैं तो एक नैनी रख लें. उस से कहें कि वह बच्चे की मां की तरह देखभाल करे.

हमेशा टच में रहें: बच्चा किसी रिश्तेदार के पास हो तो दिन में कम से कम 2 बार अपने बच्चे का हालचाल जरूर लें. अगर दोपहर को मिलने आ सकती हों तो जरूर मिलें.

प्राथमिकताएं बदलें: बच्चे के पैदा होने के बाद प्राथमिकताओं में परिवर्तन लाएं. जो भी काम करें, उस का आप के बच्चे पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह ध्यान में रखें. सफाई रखें, बातचीत का लहजा अच्छा रखें, प्यार से रहें. इस तरह आप अपना कैरियर भी बना सकती हैं और साथ ही बच्चे को भी वक्त दे सकती हैं और तब आप अपराधबोध से ग्रस्त नहीं होंगी. ब्रिटेन में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि कामकाजी महिलाओं के बच्चे अधिक समझदार, अपनी समस्याओं को आसानी से हल करने में सक्षम और अपने हितों के प्रति अधिक जागरूक होते हैं. इंस्टिट्यूट फौर सोशल ऐंड इकौनोमिक रिसर्च द्वारा कराए गए इस सर्वेक्षण में शामिल कामकाजी मांओं में से ज्यादातर ने कहा कि बहुत छुटपन से ही बच्चों को कई घंटों के लिए अकेले छोड़ देना पड़ा, लेकिन इस का असर यह हुआ कि उन के बच्चे बहुत जल्दी आत्मनिर्भर और समझदार बन गए. अमेरिका में कामकाजी महिलाओं और पुरुषों के कार्यस्थल और उन के जीवन के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करने वाले ‘वर्कप्लेस इनसाइट’ द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण में शामिल 88% पुरुषों ने कहा कि वे कामकाजी मांओं के हरफनमौला हुनर को सलाम करते हैं.

आप इस लेख को सोशल मीडिया पर भी शेयर कर सकते हैं