सवाल
मेरी शादी को 6 साल हो चुके हैं. मुझे हस्तमैथुन करने की आदत है. दिन में 2 बार हस्तमैथुन करता हूं, इस वजह से मेरा अंग पतला, छोटा और टेढ़ा हो गया है. सेक्स के दौरान मैं फौरन पस्त हो जाता हूं. लिहाजा, बीवी मुझे नामर्द कहती है. मैं क्या करूं?

जवाब
जब आप की शादी हो चुकी है, तो हस्तमैथुन करने की क्या जरूरत है? वैसे, हस्तमैथुन करने से अंग के आकारप्रकार में कोई फर्क नहीं पड़ता. आप हस्तमैथुन करना बंद कर दें और अच्छी तरह फोरप्ले कर के हमबिस्तरी करें. ऐसा करने से आप जरूर कामयाब होंगे.

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कहानी : मुल्लाजी की उलफत

‘‘सुनो भाई, मैं तुम्हारी बेटी को तालीम तो दे सकता हूं, पर एक बात है कि समय मुझे शाम की नमाज के बाद ही मिल सकेगा, चूंकि मदरसे में मुझे दूसरे बच्चों को तालीम देनी पड़ती है.’’

‘‘हांहां, ठीक बात है मुल्लाजी. दरअसल, मेरी बच्ची बड़ी हो गई है. बाहर भेजना मेरी शान के खिलाफ है. लड़कियां बाहर जाने से बेपरदा हो जाती हैं…

‘‘घर पर उस की अम्मी रहती हैं. मेरी एक ही बेटी है. कौन सा मुझे उस से नौकरी करानी है,’’ मियां जावेद अली ने कहा.

‘‘ठीक है, मैं कल शाम को आ रहा हूं,’’ मुल्ला नसरूल ने कहा.

शाम को सजधज कर कपड़ों में इत्र लगा कर मुल्लाजी मियां जावेद अली के घर जा पहुंचे.

‘‘क्या नाम है आप का मोहतरमा?’’ मुल्ला नसरूल ने पूछा.

‘‘जी, उलफत.’’

‘‘बड़ा प्यारा नाम है. चलो, सबक सीखें.’’

उलफत की उम्र 15 बरस रही होगी. मुल्ला नसरूल उसे रोज पढ़ाने आते. वह धीरेधीरे पढ़ने में दिलचस्पी लेने लगी.

मुल्ला नसरूल अब उस के लिए घर जैसे बन गए. वे पूरी ईमानदारी से जावेद अली की बेटी को तालीम दे रहे थे. इसी में एक साल पूरा हो गया.

मुल्ला नसरूल की शादी हो चुकी थी. उन के 2 बच्चे थे. बीवी सुसराल में रह कर ससुर व देवर के साथ खेतीबारी का काम देखती. मुल्लाजी भी महीने में 1-2 दिन के लिए बच्चों से मिल आते.

धीरेधीरे उलफत को तालीम देने का तीसरा साल शुरू हो गया. मुल्ला नसरूल को उलफत से उलफत हो गई थी, लेकिन डर की वजह से वे अपने दिल की बात नहीं कर पा रहे थे.

जवानी की यही शुरुआत लड़कियों के लिए संभलने की होती है. बाहर के मर्दों से उलफत का सामना नहीं होता था, पर इस साल उस के अब्बू ने घर पर टैलीविजन लगवा दिया था, जिस में सिर्फ मजहबी चैनल था.

पर कुछ दिनों से उलफत ने अपना रवैया बदल लिया था. मां घर में रहती, तो भी वह मौका देख कर दूसरे चैनल देखती थी.

एक दिन मुल्ला नसरूल ने प्यार की आग को परखना चाहा कि कहीं उन का एकतरफा प्यार तो नहीं. उन्होंने सबक सिखाने के बहाने उस का हाथ पकड़ कर दबा दिया. उलफत शर्म से लाल हो गई. उस के चेहरे पर मुसकान तैर गई.

एक दिन शाम को जब मुल्लाजी उलफत को तालीम दे रहे थे, तब मियां जावेद अली वहां आ गए. उन्होंने पूछा, ‘‘मुल्लाजी, कैसी चल रही है हमारी बेटी की तालीम?’’

‘‘बहुत होशियार है आप की बेटी. जितना सबक मैं देता हूं, उतना याद कर के मुझे जबानी सुनाती है.’’

‘‘ठीक है, सबक सिखाना जारी रखें,’’ कह कर जावेद अली दुकान पर लौट गए.

रमजान शुरू हो गए. मुल्ला नसरूल उलफत को कम वक्त देने लगे. तालीम पा रहे बच्चों के इम्तिहान का समय आ गया.

कम वक्त गुजारने पर उलफत ने रूठ कर मुल्ला नसरूल से कहा, ‘‘मेरे लिए आप के पास वक्त नहीं है. मैं आप से नहीं बोलती.’’

उलफत की नाराजगी दूर करते हुए मुल्ला नसरूल ने कहा, ‘‘मैं ईद पर घर गया था. मां की तबीयत खराब थी, सो रुक गया. घर में मांबाप के अलावा कोई भी तो नहीं है. मैं अकेला क्याक्या करूं.’’

उलफत ने मुल्लाजी के मुंह पर हाथ रख कर कहा, ‘‘मुझे माफ कर दो. मैं ने बेवजह आप पर शक किया.’’

मौका देख कर मुल्लाजी ने उलफत को अपने सीने से लगा लिया.

अब तो इश्क का खेल बिना डर के चलने लगा. मौका देख कर एकदूसरे से लिपट कर प्यार का इजहार करते.

वक्त का पहिया बहुत तेजी से घूम रहा था. एक दिन जावेद अली रास्ते मेें मुल्ला नसरूल से टकरा गए.

‘‘सुनिए मुल्लाजी,’’ जावेद अली ने कहा.

‘‘जी,’’ कह कर वे रुक गए.

‘‘कल मेरी बेटी उलफत की शादी की तारीख के लिए मेहमान आ रहे हैं. आप भी आइए. पर कल तालीम देने नहीं आना है, मेहमानों के स्वागत के लिए आना है.’’

‘‘जी,’’ कह कर मुल्ला नसरूल आगे बढ़ गए.

यह बात सुन कर मुल्ला नसरूल का दिल कहीं नहीं लग रहा था. वे ज्योंज्यों उलफत को भुलाने की कोशिश करते, उस का चेहरा सामने आ जाता.

आखिर जब मुल्लाजी से रहा नहीं गया, तो वे शाम के वक्त उलफत के घर जा पहुंचे.

‘‘आइए, अंदर आइए. उलफत आप को 3-4 दिनों से याद कर रही है. कहीं आप बाहर तो नहीं चले गए थे?’’ उलफत की अम्मी ने पूछा.

‘‘तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए मैं आ नहीं सका,’’ कह कर वे सोफे पर बैठ गए.

‘‘ठीक है, मैं उलफत को भेज देती हूं,’’ कह कर अम्मी अंदर चली गईं.

कुछ देर बाद उलफत सीधे आ कर सबक सीखने वाले कमरे में बैठ गई. इतने में मुल्ला नसरूल भी उसी कमरे में आ गए. वे दोनों एकदूसरे के गले मिल कर आंसू बहा रहे थे.

‘‘कल मेहमान आए थे. क्या हुआ?’’ मुल्ला नसरूल ने पूछा.

उलफत ने कहा, ‘‘आप की उलफत एक हफ्ते बाद निकाह करा कर दुबई चली जाएगी. अब्बू की लड़के के अब्बा के साथ बातचीत हो गई है. वे वीजा करा कर ले आए हैं,’’ इतना कह कर उलफत रो पड़ी.

उलफत रोते हुए आगे बोली, ‘‘शायद 2 दिन बाद मेरी पढ़ाई बंद हो जाएगी. फिर आप का आना भी नहीं होगा. मेहमान आने लगेंगे. कल तक का समय है. आप को जो भी करना है, कल सोच कर बताना.

‘‘मैं जहर खा कर मर जाऊंगी, पर आप के बगैर नहीं रह सकती.’’

 

‘‘ठीक है,’’ मुल्ला नसरूल ने कहा. थोड़ी देर की बातचीत के बाद मुल्ला नसरूल बाहर आ गए. सोचतेविचारते रात बीत गई.

अगले दिन मुल्ला नसरूल शाम के होने का इंतजार करने लगे. उन्होंने इरादा कर लिया था, सिर्फ उलफत का हां कहना बाकी था.

शाम को वक्त से पहले ही मुल्ला नसरूल उलफत के यहां पहुंच गए. उन्होंने अपने दिल की सारी बात उलफत के सामने रख  कर  कहा, ‘‘कम से कम 2-3 महीने तक लुकछिप कर गुजारने पड़ेंगे. पैसे का इंतजाम कर के चलना  होगा. मेरे पास तो…’’

‘‘ठीक है. मुझे मंजूर है. कल अम्मी मेरे लिए कपड़े लेने मौसी के साथ बाजार जाएंगी. मैं घर पर अकेली रहूंगी. आप बाहर आटोरिकशा ले कर खड़े हो जाना. मैं तैयारी कर के रखूंगी.’’

अगली शाम को मुल्ला नसरूल उलफत के घर के सामने आटोरिकशा ले कर खड़े हो गए. एक बैग में कपड़े और एक बैग में शादी के लिए खरीदे गए जेवर व नकदी भर कर उलफत मुल्ला नसरूल के साथ आटोरिकशा में आ कर बैठ गई.

इस तरह नकाब डाले उलफत चल पड़ी मुल्ला नसरूल के साथ जिंदगी का सबक सीखने.