भाजपा ने योगी आदित्यनाथ को जब उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया तो उन्होंने सरकारी आवास में प्रवेश से पहले वहां का शुद्घीकरण कराया. इस के लिए बाकायदा गोरखपुर के मंदिर से पुजारी बुलाए गए. मुख्यमंत्री आवास के प्रवेशद्वार से ले कर सड़क तक को गंगाजल से शुद्घ किया गया.

मुख्यमंत्री के दौरे के समय भी इस बात का ध्यान रखा जाने लगा कि उन को कहीं परेशानी न हो. गौतमबुद्घ की निर्वाणनगरी कुशीनगर में आदित्यनाथ के कार्यक्रम में अधिकारियों ने वहां के दलित परिवारों को शैंपू, मंजन और साबुन दिया. उन से कहा गया कि सभी लोग नहाधो कर, साफसुथरा हो कर आएं. इन सभी को मुख्यमंत्री के टीकाकरण कार्यक्रम में बुलाया गया था. यह बात सामने आते ही पूरे देश में भाजपा सरकार की मुखालाफत होने लगी. गुजरात के दलित संगठनों ने तो साबुन से तैयार महात्मा बुद्घ की 125 किलो की मूर्ति आदित्यनाथ को, लखनऊ आ कर, सौंपने का कार्यक्रम बनाया लेकिन उन को झांसी स्टेशन पर रोक कर वापस भेज दिया गया. लखनऊ में दलित अत्याचार और निदान विषय पर संगोष्ठी करने का प्रयास किया गया तो उस कार्यक्रम को भी होने नहीं दिया गया.

इन घटनाओं से साफ है कि समाज में दलितों के हालात बहुत खराब हैं. आज भी सामान्य वर्ग उन से मिलना पसंद नहीं करता. यह घटना छुआछूत और जातिप्र्रथा की पोल को खोलने के लिए पर्याप्त है.  दलित चिंतक एस आर दारापुरी कहते हैं, ‘‘कुशीनगर में जिस तरह से सरकारी संरक्षण में छुआछूत की भावना को बढ़ावा मिला, उस से पूरे दलित समाज में क्षोभ है. दलित अत्याचार और निदान विषय पर आयोजित संगोष्ठी में दलितों के वर्तमान हालात पर चर्चा होनी थी पर सरकारी लोगों ने इसे होने नहीं दिया. दलित संगठनों की सोच है कि सरकार दलितों को गंदा मानती है. इसलिए मुख्यमंत्री से मिलने से पहले दलितों से नहा कर आने के लिए कहा गया. यह बाबा भीमराव अंबेडकर की 125वीं जयंती चल रही है. इसलिए गौतमबुद्घ की 125 किलो की साबुन की मूर्ति बनाने का काम शुरू हुआ. सरकार को पता था कि विचार गोष्ठी में जो तथ्य सामने आएंगे उन का जवाब देना सरकार के लिए मुश्किल होगा. ऐसे में विचारगोष्ठी को होने से ही रोक दिया गया.’’

सहारनपुर में भले ही दलितसवर्ण साथ खड़े हो गए हों पर जाति और छुआछूत के नाम पर अभी दोनों बिरादरियों में दूरी बनी हुई है. सहारनपुर की घटना पर राजनीति शुरू हुई तो वहां पर भीमसेना सक्रिय नजर आने लगी. भीमसेना को पूरा लाभ न मिल जाए, इसलिए बहुजन समाज पार्टी ने भी अपना दखल बढ़ाया. जब बसपा नेता मायावती को लगा कि कोई लाभ नहीं मिल रहा और दलितों में उन की पैठ घट गई है तो उन्होंने दलितों के मुद्दे को ले कर राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने का नाटक रचा.

बसपा से नाउम्मीदी

दलितों के बिगड़ते हालात के लिए मायावती कम जिम्मेदार नहीं हैं. दलितों के वोट पर मायावती उत्तर प्रदेश में  4 बार मुख्यमंत्री बनीं पर उन्होंने दलितों के हालात को सुधारने का काम नहीं किया. मायावती ने अपने कार्यकाल में मूर्तिपूजा और व्यक्तिपूजा को बढ़ावा दिया. जिस से दलित आंदोलन और उस में सुधार के काम पूरी तरह से बंद हो गए. बसपा के बनने से पहले डीएसफोर और दूसरे संगठन दलितों में सामाजिक चेतना जगाने का काम करते थे. मायावती ने सत्ता में आते ही इस पर रोक लगा दी.

दलित संगठनों के साथ विरोध का बरताव होने लगा. जिस से दलित आंदोलन और सामाजिक चेतना जगाने का काम बंद हो गया. इस का असर यह हुआ कि दलित अपनी लड़ाई भूल कर धर्म के आडंबर में फंसने लगे. वे नव हिंदुत्व का शिकार हो गए. भाजपा ने दलितों की इस मनोदशा को समझते हुए उन को धर्म के सहारे पार्टी से जोड़ने का काम शुरू किया. उस के नेता दलित घरों में जा कर खाना खाने लगे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ले कर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह तक दलितों के घर जा कर खाना खाने लगे. मध्य प्रदेश में दलितों को कुंभ के दौरान उन के पाप धोने का ढोंग नदी में नहला कर किया गया. इस की अगुआई वहां के भाजपाई  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने की.

भाजपा पूरे देश में यह प्रचारित करने में लग गई कि उस ने दलितों को बराबरी का दरजा दे कर समाज से छुआछूत और जाति व्यवस्था को खत्म कर दिया है. असल में, यह एक छलावा मात्र था. दिक्कत यह है कि विरोधी दल इस बात का विरोध करने के लायक नहीं रह गए हैं.

असमंजस में दलित

उत्तर प्रदेश में लगातार दलित समुदाय के खराब होते हालात के बाद भी बसपा नेता मायावती या कोई दूसरा नेता सच बात को कहने के लिए सड़क पर नहीं उतर सका. ऐसे में भाजपा जो बात कहती रही, लोग भरोसा करते रहे. कुशीनगर और सहारनपुर की घटनाओं ने समाज की पोल को खोल दिया.  दलित चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘सब से अधिक आबादी वाले उत्तर प्रदेश में दलित 20 फीसदी के करीब हैं. दलित परिवारों में 80 फीसदी लोग गांवों या शहरों में झोंपडि़यों या छोटेछोटे घरों में रहते हैं. ये लोग अभी भी भूख और गरीबी के दौर से गुजर रहे हैं. थोड़ाबहुत पैसा कमाते भी हैं तो वह नशे की आदत में उड़ जाता है. दलितों में आगे बढ़ चुके लोग पूजापाठ और नव हिंदुत्व के सहारे सवर्र्ण बनने की होड़ में लगे हैं. वे खुद भले ही छुआछूत और जातिप्रथा का शिकार हों, पर गरीब दलितों के साथ इन का व्यवहार ऊंची जातियों सरीखा होता जा रहा है.’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘दलितों को शैंपूसाबुन की जरूरत नहीं हैं. इन लोगों को रोजगार की जरूरत है. जिन लोगों को रोजगार मिल गया है वे किसी अगड़े से कम नहीं हैं. जिन दलितों के पास खाने के लिए पैसे नहीं हैं, जो भूख और गरीबी के दौर से गुजर रहे हैं, उन्हें शैंपूसाबुन से क्या मिलेगा. अगर दलितों की हालत को सुधारने का काम किया गया होता तो इस तरह का दिखावा करने की जरूरत नहीं पड़ती. दलितों की शिक्षा और रोजगार दोनों की दशा को ठीक करने की जरूरत है. गांव की किसी भी दलित बस्ती या शहर किनारे रह रहे दलितों के हालात को देखते हुए हकीकत को समझा जा सकता है.’’

बिहार में दलितों की दशा बुरी है. वहां उन का कोई माईबाप नहीं है. दलितों के बड़े नेता रामविलास पासवान ‘राम’ वालों की पार्टी के सहयोगी बन गए तो पिछड़े मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ‘राम’ वालों की पार्टी से मिल साझा सरकार बना ली है. गरीबी, भुखमरी, बेकारी और पिछड़े सामंतों की वजह से बिहार के दलितों, महादलितों का पलायन दूसरे राज्यों की ओर बढ़ रहा है. वहां भी वे हिंसा, भेदभाव की चपेट में हैं.

कानून व्यवस्था की खराब हालत का असर भी सब से ज्यादा दलित जातियों पर पड़ता है. गांवदेहात तो दूर, राजधानी लखनऊ के हालात खराब हैं. विमला नाम की दलित महिला को न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. उस की आवाज को बंद करने के लिए विरोधियों ने उस के साथ गैंगरेप  से ले कर चेहरे पर तेजाब डालने तक का दुसाहस किया. पहले की अखिलेश सरकार ने 2, फिर योगी सरकार ने 1 लाख रुपए की सहायता जरूर दी पर उस को न्याय नहीं मिला. सहायता राशि मिलने के बाद भी उस पर एसिड अटैक किया गया. प्रशासन घटना को गलत मान रहा है. विमला अब न्याय के लिए हाईकोर्ट की शरण में है. विमला का सवाल है, ‘‘अगर मैं गलत बोल रही हूं तो मुझे सहायता क्यों दी गई?’’

दलितों को शिक्षित कर के ही उन की हालत में सुधार लाया जा सकता है. इस में सरकारी प्र्राथमिक स्कूलों की जिम्मेदारी सब से अहम हो जाती है. परेशानी की बात यह है कि लगातार सुधार के बाद भी सरकारी स्कूलों की शिक्षाव्यवस्था पूरी तरह से पंगु हो चुकी है.  उत्तर प्रदेश में इस समय करीब 1,200 से अधिक सरकारी स्कूलों की इमारतें खराब हालत में हैं. कुछ स्कूलों की बात छोड़ दें तो बाकी स्कूलों में बच्चों को जुलाई के अंत तक किताबें और यूनिफौर्म नहीं मिलीं. शिक्षामित्रों से ले कर शिक्षकों तक में किसी न किसी तरह का असंतोष है. सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षामित्रों को परमानैंट करना गैरकानूनी ठहरा दिया है. सरकारी स्कूलों के हालात को देखते हुए यहां पर समाज के अमीर घरों के बच्चे पढ़ने नहीं आते. यहां तक कि सरकारी स्कूलों के मास्टर तक अपने बच्चों को यहां नहीं पढ़ाते हैं.

हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी उत्तर प्रदेश की सरकार यह तय नहीं कर पाई कि सरकारी नौकरों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ें. मैगसेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडेय सब को समान शिक्षा के अधिकार को ले कर सालों से लड़ाई लड़ रहे हैं. वे कहते हैं, ‘‘अफसर सरकार को गलत जानकारी दे कर अपना मतलब हासिल कर लेते हैं. कोर्ट के आदेश के बाद भी सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया. सरकार प्राथमिक शिक्षा के स्तर को उठाने का दावा करती है पर असल में सरकार की मंशा ही नहीं है कि प्राइमरी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर सही हो. वह केवल दिखावा कर रही है. अगर सरकारी स्कूलों की हालत सुधर जाए तो गरीब परिवारों के बच्चे भी अच्छी शिक्षा हासिल कर सकते हैं.’’

शिक्षा से बनी दूरी

दलितों की हालत को सुधारने का एक जरिया है सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के स्तर को सुधारा जाए. प्राइमरी स्कूलों तक जो दलितों के बच्चे पढ़ने आते हैं, कक्षा 6 के बाद स्कूलों में उन की संख्या और भी कम हो जाती है. इस की वजह संदीप पांडेय बताते हैं, ‘‘दलित परिवारों में इतनी गरीबी है कि बच्चे कमाईर् लायक होते ही स्कूल छोड़ कर पेट भरने के इंतजाम में या तो मेहनतमजदूरी करने शहर की ओर भाग जाते हैं या फिर वहीं गांव में कुछ करने लगते हैं. आंकड़े देखें तो पता चलेगा कि कक्षा 5 के बाद स्कूल छोड़ने वाले बच्चों में सब से अधिक दलित जाति के बच्चे होते हैं. कुछ बच्चे सच में पढ़ना चाहते हैं पर उन के परिवार की हालत ऐसी नहीं होती कि वे पढ़ा सकें.’’

आंकड़े बताते हैं कि दलित लड़कियां सब से पहले स्कूल छोड़ती हैं. लड़कों को तो वहां घर के काम पर नहीं लगाया जाता पर लड़कियों को घर के काम में लगा दिया जाता है. वे खेतों में काम करने के लिए जाने लगती हैं, जिस के कारण कई बार उन का यौन शोषण भी होता है. शिक्षा की कमी का ही नतीजा है कि आज भी दलित लड़कियों की शादी सब से कम उम्र में हो जाती है. भले ही अब यह उम्र 10-12 से बढ़ कर 16-17 वर्ष हो गई हो पर अभी भी नाबालिग की शादी हो जाती है. दलितों में 2 वर्ग हो गए हैं. एक वर्ग ऐसा है जो थोड़ा आगे बढ़ गया है. दूसरा वर्ग अभी भी वहीं है. सोच के स्तर को देखें तो दोनों ही वर्ग एकजैसे ही हैं. दलितों को अब यह बात बारबार सिखाई और समझाई जा रही है कि वे धर्म का पाठ पढ़ कर ही आगे बढ़ सकते हैं. ऐसे में वे धर्म के अंधविश्वास में फंसते जा रहे हैं.

आडंबर का कसता शिकंजा

धर्म का आडंबर कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है. सोशल मीडिया से ले कर गांवगांव में होने वाले कथा, भागवत, प्रवचन में यह बात बारबार दोहराईर् जा रही है कि धर्म की लाठी को पकड़ कर ही जीवन को पार किया जा सकता है, अगले जीवन को सुधारा जा सकता है, ताकि अगले जन्म में फिर दलित न बनना पड़े. असल बात यह है कि कोई भी दलितों को बराबरी का हक नहीं देना चाहता. सभी को लगता है कि अगर दलित आगे निकल गए तो उन की सेवा, घरों में नौकरी कौन करेगा? वोट देने के लिए लंबीलंबी  लाइनें लगाने से ले कर नारे लगाने तक में ऐसे ही लोग रहते हैं. नेता दलितों के लिए जोरशोर से भले बात करते हैं पर हकीकत में वे इन के लिए कुछ नहीं करना चाहते.

जड़ में जाति और धर्म

भाजपा ने दलित नेताओं की आपसी लड़ाई का लाभ उठा कर उन को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया है, जिस से दलित हितों की बात उठनी बंद हो गई है. बिहार में रामविलास पासवान, महाराष्ट्र में रामदास अठावले और दिल्ली में उदित राज इस की मिसाल हैं. इन नेताओं के पीछे दलित मजबूत हालत में खड़े थे. उन के ये नेता अब भाजपा में शामिल हो कर उस के हिंदुत्व को स्वीकार कर चुके हैं तो वे भी नव हिंदुत्व की विचारधारा के साथ खड़े हो रहे हैं. जिस जातिप्रथा और छुआछूत को ले कर दलित परेशान हैं उस की जड़ में जाति और धर्म ही है.

यह बात जब तक दलित समझ नहीं पाएगा तब तक उस का भला नहीं होगा. परेशानी की बात यह है कि राजनीतिक दलों से ले कर सामाजिक संगठनों तक सभी सत्ता के जरिए ही व्यवस्था में सुधार को महत्त्व देते हैं. वे भूल जाते हैं कि सत्ता का चेहरा हमेशा एक ही होता है, केवल कुरसी पर बैठा व्यक्ति बदल जाता है. यही वजह है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी दलितों के हालात नहीं बदले. दलितों के नाम पर वोट लेने वाले अपना उल्लू सीधा करते रहे पर दलितों के हालात जस के तस हैं.            

भाजपा को रास आ रहा नव हिंदुत्व

नव हिंदुत्व कट्टरवादी हिंदुत्व से अलग है. नव हिंदुत्व  में दलित और पिछड़े शामिल हैं, जो खुद को अगड़ी जाति में शामिल होने को दिखाने के लिए उन की तरह पूजापाठ करते हैं, सत्यनारायण और भागवत कथा सुनते हैं. वे इस बात को ले कर हिंदुत्व से नाराज नहीं हैं कि धर्मग्रंथों में उन के खिलाफ क्या लिखा है? ये लोग असल में कुछ पढ़ेलिखे हैं. इन में से ज्यादातर अपने गांव को छोड़ कर रोजीरोटी की तलाश में शहर आ गए हैं.

गांव में भी यह वर्ग कुछ पैसे वाला हो गया है. इस वर्ग के लिए दलित और पिछड़ा होना केवल आरक्षण के लाभ तक ही सीमित रह गया है. काफी हद तक यह वर्ग अपनी ही जाति से पूरी तरह कट गया है. नव हिंदुत्व में शामिल दलित और पिछड़ों का यह वर्ग दूसरे दलित और पिछड़ों से दूरी रखता है. यह वर्ग अपनी जाति के नेताओं को भी बहुत पसंद नहीं करता.

नव हिंदुत्व में शामिल यह वर्ग

80-90 के दशक की तरह कट्टर नहीं रह गया है. यह तिलक, तराजू और तलवार इन को मारो जूते चार’ और ‘ठाकुर बामन बनिया चोर’ जैसे नारे नहीं लगाता. पंडित और पुजारी को इस वर्ग के लोगों के घर जा कर कथा कराने में कोई एतराज नहीं रह गया है. यह वर्ग अब सुविधाभोगी हो गया है. वह अपनी सुविधा के हिसाब से जिंदगी को जीना पसंद करने लगा है. यह वर्ग राजनीतिक रूप से जागरूक है. मजेदार बात यह है कि राष्ट्रवाद की पहचान को ले कर यह वर्ग ज्यादा मुखर हो चला है. यही वजह है कि रोहित बेमुला की आत्महत्या और कन्हैया कुमार के देशद्रोही बयान जैसे मुद्दे भी इन को अपनी ओर खींच  पाने में सफल नहीं होते हैं. नव हिंदुत्व में शामिल नए वर्ग में सब से बड़ी संख्या गैर जाटव दलितों और गैर यादव पिछड़े वर्ग की है.

भाजपा की जीत का सब से बड़ा यही आधार है. अगड़ी जातियों का भाजपा पर सब से अधिक प्रभाव रहा है. जब कांग्रेस ने दलित, पिछड़ों और मुसलिमों को तवज्जुह देनी शुरू की थी तब ये जातियां धीरेधीरे कर  कांग्रेस से टूट कर भाजपा में शामिल होने लगी थीं.  भाजपा में मोदीयुग के उदय के बाद नव हिंदुत्व को बढ़ावा मिला और दलितपिछड़े पार्टी में अगली पंक्ति में खड़े हो गए. ऐसे में पार्टी के बेस वोट अगड़ी जातियों में उपेक्षा का भाव पैदा हो रहा है. मोदी सरकार की नोटबंदी और जीएसटी लागू करने के बाद यह वर्ग पार्टी से नाराज हो कर भी अलग नहीं हो पाया. इस का कारण यह है कि दूसरी कोई पार्टी इन को अपने करीब नहीं दिख रही. नाराज होने के बाद भी यह वर्ग भाजपा के साथ खड़ा होने को मजबूर है. इस बात को अब सपा, बसपा और कांग्रेस भी समझने लगी हैं.

आने वाले दिनों में सपा, बसपा और कांग्रेस भी नव हिंदुत्व के पक्ष में खड़े हो सकते हैं. सपा की अखिलेश सरकार ने धार्मिक यात्राओं और बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग के जरिए इस को समझने का प्रयास किया था पर अपनी धर्मविरोधी छवि के कारण वे सफल नहीं हो सकीं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपनी किसानयात्रा के समय मंदिरों में पूजापाठ करने का काम किया. पर वे भी नव हिंदुत्व की भावना को जमाने में असफल रहे. नव हिंदुत्व भाजपा को विजय दिलाने में सफल रहा है. असल में यही भाजपा के लिए चुनौती भी देगा. दलित और पिछड़ों के प्रभाव को अगड़ी जातियां कब तक सहन करती हैं, यह देखने वाली बात होगी.  अगड़ी जातियों को सब से अधिक मुश्किल आरक्षण को ले कर है. ऊंची जातियों को लगता है कि आरक्षण के चलते अगड़ी जातियों का हक मारा जा रहा है. वे भाजपा पर इस बात का दबाव बना सकती हैं कि आरक्षण के मुद्दे पर नई पहल हो. आरक्षण जातिगत न हो कर, आर्थिक आधार पर हो, जिस से गरीब वर्ग के अगड़ी जातियों को भी आरक्षण का लाभ मिल सके.

भाजपा में एक बड़ा वर्र्ग इस बात का पक्षधर है कि आरक्षण पर नई बहस हो. बिहार चुनाव में यह मुद्दा प्रमुखता से उठा था पर बैकफायर कर गया. इस के बाद भाजपा बारबार यह बात दोहरा रही है कि आरक्षण के वर्तमान स्वरूप में कोईर् बदलाव नहीं किया जाएगा. बिना आरक्षण और बिना राममंदिर भाजपा के लिए अपने अगड़ी जातियों के वोटबैंक को साधे रखना मुश्किल होगा.

डिजिटल मीडिया पर भी लागू एससी/एसटी ऐक्ट

दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि सोशल मीडिया पर अनुसूचित जाति और जनजाति यानी क्रमश: दलित और आदिवासी समुदायों के खिलाफ की गई किसी भी पोस्ट या जातिगत टिप्पणी पर सजा हो सकती है. ऐसी कोई भी टिप्पणी औनलाइन अब्यूज में शामिल की जाएगी.

कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि इस बात का सजा पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि पोस्टकर्ता ने अपनी प्राइवेसी सैटिंग को पब्लिक या प्राइवेट कर रखा है. अगर किसी की गैरमौजूदगी में भी किसी जाति विशेष का अपमान किया गया है तो इस पर भी एससी/एसटी ऐक्ट लागू होगा. किसी भी तरह की जातिगत टिप्पणी एससी/एसटी ऐक्ट 1989 के तहत आती है. हालांकि यह फैसला फेसबुक वाल के संदर्भ में दिया गया है लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह फैसला उन वैबसाइट्स पर भी लागू होता है जिन पर प्राइवेसी सैटिंग होती है. इतना ही नहीं, यह फैसला लोगों के औनलाइन ग्रुपों पर भी लागू होता है. यानी, व्हाट्सऐप पर भी यह फैसला प्रभावी होगा.

जाहिर है अब सोशल मीडिया पर दलित आदिवासियों का अपमान करना महंगा पड़ेगा. यह भी जाहिर है कि चूंकि सोशल मीडिया इन समुदायों की बेइज्जती का एक बड़ा अड्डा बन गया है, इसलिए न्यायालय को यह फैसला लेना पड़ा. एक वर्गविशेष के स्वाभिमान के मद्देनजर यह फैसला स्वागतयोग्य है, लेकिन विचारणीय बात यह है कि क्या इस से जातिगत मानसिकता या पूर्वाग्रह खत्म हो जाएंगे?

सोशल मीडिया का दुरुपयोग

कल तक जो बातें चाय की गुमठियों और चौराहों पर होती थीं, वे अब सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से होने लगी हैं. दलित आदिवासियों का अपमान उन में से एक है. समाज का ढांचा जरूर थोड़ा बदला है लेकिन उस की मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया है. व्हाट्सऐप  पर जातियों के ग्रुप बन गए हैं. जितनी जातियां देश में हैं, उन से लाखगुना ज्यादा उन के ग्रुप हैं. इन ग्रुपों में तुक या मुद्दे की बातें कम होती हैं, दूसरी जाति वालों को कोसने की शाश्वत परंपरा का निर्वाह ज्यादा होता है.

तकनीक का जातिगत दुरुपयोग हमारे महान देश में ही होना मुमकिन है जो दरअसल हमारी जातिगत मानसिकता का आईना है. इस का इलाज कोई अदालत नहीं कर सकी, न कर सकती है क्योंकि जातिगत या जातिवादी व्यवस्था धर्म की देन है.

अब भला किस की मजाल कि वह धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म को ही खत्म करने की बात करे या फिर उस के समाज पर पड़ते दुष्प्रभावों की व्याख्या करे. उलटे, सोशल मीडिया या डिजिटल समाज की सुबह ही विभिन्न देवीदेवताओं की तसवीरों व उन के पुण्य स्मरण से होती है. ऐसे जड़ और धर्मांध लोगों से क्यों उम्मीद की जाए कि वे जातिगत टिप्पणियां करने से खुद को रोक पाएंगे.

धार्मिक निर्देशों के अनुयायी मनुवादी और पौराणिकवादी जातिगत व्यवस्था व समाज को तोड़ने के हिमायती कभी नहीं रहे. ऐसे में अब दलित आदिवासी भी इसी को बनाए रखने में अपना भला देखने लगे हैं. उन का बड़ा और स्वाभाविक डर आरक्षण छिन जाने का है, जो एनडीए के सत्तानशीं होने के बाद से लगातार बढ़ ही रहा है.  हालात ज्यों के त्यों यानी 18वीं सदी जैसे हैं. जाहिर है जाति की जड़ किसी के उखाड़े से नहीं उखड़ रही, बल्कि और गहराती जा रही है. अदालतें अगर एससी/एसटी ऐक्ट सोशल मीडिया पर भी लागू कर दें, तो इस जड़ और जड़ता पर कोई फर्क पड़ेगा, ऐसा लग नहीं रहा.

लोगों की मानसिकता और जातिगत पूर्वाग्रह सिर्फ और सिर्फ जागरूकता से दूर हो सकते हैं, जिस के रास्ते में धर्म सब से बड़ा रोड़ा है. शायद, इसीलिए भीमराव अंबेडकर ने धर्मग्रंथों को जला देने की बात कही थी.