त्योहार धर्म के नहीं समाज के हैं

By Prachi Bhardwaj | 8 September 2017
त्योहार धर्म के नहीं समाज के हैं

रोजमर्रा के आम जीवन में त्योहार सुखद परिवर्तन लाते हैं. आने वाले त्योहार को सोच कर ही मन में हर्षोल्लास तथा स्फूर्ति का संचार होने लगता है. परंपराओं व संस्कारों से घिरा हर त्योहार समाज और राष्ट्र के लिए कोई न कोई संदेश देता है, जैसे विजयदशमी असत्य पर सत्य की विजय का संदेश देता है, रक्षाबंधन का पावन पर्व भाईबहन के प्रेम और भाई का बहन की आजीवन रक्षा करने के संकल्प को याद करता है, ईद भाईचारे का संदेश देती है, रंगों का त्योहार होली हमें संदेश देता है कि हम आपसी कटुता व वैमनस्य को भूल कर अपने शत्रुओं से भी प्रेम करें और क्रिसमस संसार से अपराधों के अंधकार को दूर करने का संदेश देता है.  त्योहार का विचार मन में आते ही उत्सव का सा माहौल छा जाता है. किसी धर्म विशेष से जोड़ कर नहीं, बल्कि त्योहार को एक खुशी के रूप में मनाए जाने से सामाजिक एकता बढ़ती है. क्यों न ऐसे प्रयास किए जाएं जिन से त्योहारों का पर्याय केवल धूमधाम और प्रसन्नता हो, न कि धर्म की परिछाया.

सामुदायिक त्योहारों से रंगा विश्व : विश्व में कई जगह त्योहारों को धर्म से अलग कर, सामुदायिक तरीके से मनाने का रिवाज है. ब्राजील का कार्निवल जहां अनगिनत सजेधजे लोग सड़कों पर नाचतेगाते चलते हुए परेड निकालते हैं. स्पेन के ला टोमाटीना फैस्टिवल में सैकड़ों की आबादी में लोग एकदूसरे पर टमाटरों से वार कर खेलते हैं. कनाडा का हैलोवीन जिस में बच्चे आड़ेटेढ़े रूप धर कर घरघर जा कर ट्रिक या ट्रीट कहते हैं तो घर वाले उन्हें कुछ खाने के पकवान, चौकलेट आदि दे देते हैं वरना बच्चे दरवाजे पर खड़े हो, कुछ करतब दिखाते रहते हैं. आजकल तो बड़े भी भूतभूतनीचुड़ैल आदि बन हैलोवीन पार्टियां करते हैं. दक्षिण कोरिया में आयोजित मड फैस्टिवल में भाग लेने वाले सभी लोग कीचड़ में खेलते हैं. अमेरिका की थैंक्सगिविंग जहां सभी पारिवारिक सदस्य व मित्र किसी एक के घर पर एकत्रित होते हैं और साथ मिल कर भोजन करते हैं खासतौर पर अमेरिकी चिडि़या ‘टर्की’ का पकवान. लंदन में नौटिंगहिल कार्निवल, जो कि ब्राजील के कार्निवल की तरह का होता है, जहां सजेधजे लोग सड़कों पर नाचतेगाते हुए परेड निकालते हैं. थाईलैंड में सोंगक्रान के दौरान लोग पानी के गुब्बारों और फौआरों से खेलते हैं इत्यादि.

ये सभी त्योहार सामुदायिक ढंग से मनाए जाते हैं जहां पूरा ध्यान त्योहार की मस्ती पर होता है. मानने वाला किस धर्म को मानता है, या ईश्वर में विश्वास रखता है या नहीं, इन बातों से त्योहार के उल्लास पर कोई असर नहीं होता. बस, हर कोई हंसता है, नाचतागाता है, धूम मचाता है. लोग तैयार हो कर घरों से बाहर निकलते हैं, आपस में एकदूसरे को बधाइयां देते हैं, खातेपीते हैं, सड़कों पर नाचतेगाते हैं और त्योहार का भरपूर मजा लेते हैं.  विदेशों में सामुदायिक त्योहार आयोजित करने हेतु शहरविशेष की सरकारी संस्थाएं, गैरसरकारी संस्थाएं तथा महल्ला समितियां आपस में साझेदारी करती हैं. पूरे समाज में एकता की भावना प्रगाढ़ रहती है, अपने महल्ले, अपने शहर, अपने देश के प्रति गर्व और राष्ट्रभक्ति पनपती है. एक और बड़ा फायदा यह होता है कि वहां के पर्यटन में वृद्धि होती है जिस से आर्थिक लाभ होता है. सैलानी स्पेन जा कर ला टोमाटीना फैस्टिवल या बुलफाइट देखना चाहते हैं. दक्षिण कोरिया में मड फैस्टिवल और थाईलैंड में सोंगक्रान के कारण सैलानियों की भीड़ इन उत्सवों के दैरान काफी बढ़ जाती है.

त्योहारों को धर्म की जकड़ से मुक्त करना : क्रिसमस व अन्य ईसाई त्योहारों के अलावा लंदन में फरवरी माह में चीन का नववर्ष, मार्च में भारत की होली, जुलाई में ईद उल फितर पूरे हर्षोल्लास से मनाए जाते हैं. और इन्हें केवल धर्मविशेष के लोग ही नहीं, बल्कि पूरा शहर वहां हो रही मस्ती, मुफ्त प्रदर्शन, सड़कों पर नाचगाना आदि का लुत्फ उठाता है. ऐसे ही चीनी त्योहारों के साथसाथ चीन में भी हैलोवीन, वैलेंटाइन डे, थैंक्सगिविंग और क्रिसमस जैसे पश्चिमी त्योहार एकता के साथ मनाए जाते हैं. जापान में भी क्रिसमस पूरे जोशोखरोश से मनाया जाता है जबकि वहां ईसाइयों की संख्या बेहद कम है.  भारत के रोशनीभरे त्योहार दीवाली की भांति कई देशों में अलगअलग मौकों पर आतिशबाजी की जाती है. किंतु जहां हमारे समाज में यह आतिशबाजी हर परिवार अलग रूप से करता है जिस का नतीजा अधिक गंदगी, अधिक प्रदूषण और आपसी होड़ बन कर रह जाता है, वहीं दूसरे देशों में यह आतिशबाजी सामुदायिक तौर पर की जाती है जिस का सभी वर्ग के लोग साथ में आनंद उठाते हैं.

भारत में भी हैं सामुदायिक त्योहारों के उदाहरण : हमारे समाज में भी कई ऐसे उदाहरण हैं जिन्हें हम छोटेमोटे त्योहारों के रूप में देख सकते हैं- ओलिंपिक खेल, क्रिकेट या फुटबाल का मैच, कुश्ती, दंगल, दिल्ली में हाल ही में शुरू हुई नई संकल्पना ‘राहगीरी’ जिस में बहुत सुबह लोग सड़कों पर पहुंच कर भिन्न प्रकार के खेल खेलते हैं, नाटक देखते हैं, धुनों पर नाचते हैं. हमारे राष्ट्रीय पर्व जैसे स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गांधी जयंती, शिक्षक दिवस, बाल दिवस आदि को सभी धर्मों, जातियों व संप्रदायों के लोग मिलजुल कर खुशी के साथ मनाते हैं.  त्योहारों को समाज के सभी वर्गों के साथ मनाने से सामाजिक एकता में प्रगाढ़ता आती है. जिन त्योहारों में किसी धर्म का हस्तक्षेप नहीं होता उन्हें मनाने में सभी भारतीयों में कितनी राष्ट्रप्रेम की भावना का संचार होता है. लगभग हर कोई अपने फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सऐप पर राष्ट्रीय ध्वज की तसवीर लगा देता है और अपने अंदर भारतीय होने पर गर्व अनुभव करता है. ऐसे उत्सवों में पंडा, मुल्ला, पादरी का कोई हस्तक्षेप नहीं होता, इसलिए ये धर्म की दृष्टि से समाज को विभाजित करने में अक्षम हैं.

धर्म और त्योहार का संबंध : प्रकृति है तो इंसान, पशु, पक्षी, जलप्राणी सभी उसी की देन हैं. तो कोई जानवर त्योहार क्यों नहीं मनाता, पंछी उत्सव क्यों नहीं मनाते? त्योहार मनाने का सिद्धांत केवल मनुष्य में ही क्यों है? त्योहार खुशी और उल्लास के लिए हमारे जीवन में आते हैं. यदि हम ये मानते हैं कि त्योहार इंसान ने स्वयं बनाए हैं तो त्योहार में खुशी, उल्लास, जोश से अधिक धर्म की भावना क्यों? आखिर त्योहारों का धर्म से इतना गहरा नाता क्यों है?

 इस का सीधा सा उत्तर है कि धर्म के ठेकेदारों ने अपनी दुकान चलाए रखने हेतु पूरे वर्ष कोई न कोई त्योहार बना दिए? एक न एक त्योहार आते रहें जिन्हें मनाने के लिए आम आदमी को पंडेपुजारी, पादरीमौलवी की जरूरत पड़ती रहे. हर त्योहार में उल्लास से अधिक जोर उसे मनाने की जटिल प्रक्रिया पर हो ताकिआम आदमी स्वयं ही आसानी से त्योहार न मना पाए, बल्कि उस के रीतिरिवाजों में उलझ कर पंडे, मुल्ला व पादरी का रास्ता देखता रहे. त्योहार हमारे लिए खुशियां लाता है, आने वाले समय में हमें उन से लाभ मिले, ऐसे प्रलोभन दे कर पंडे, पुजारी, पादरी व मौलवी भिन्न प्रकार के पूजापाठ करवा कर अपनी जेबें भरते रहते हैं.

हर धर्म ने अंधविश्वास फैला कर टोनेटोटकों के सहारे प्राइवेट जिंदगी में घुसपैठ कर रखी है. मुसलमानों में गंडातावीज में विश्वास, हिंदुओं में नजर से बचने के लिए काला टीका लगाना, ईसाइयों में होली वाटर में विश्वास आदि रोजमर्रा की कुछ बातों से अंधविश्वास का हमारे जीवन में कितना असर है, यह आसानी से पता चलता है. मुसलमानों में बीमारी में झाड़फूंक करवाना, हिंदुओं में कालसर्प योग की लंबीचौड़ी पूजा इत्यादि से धर्म के पुरोहितों का धंधा चलता रहता है.  धर्म से जुड़ाव के कारण सामाजिक एकता को खतरा : त्योहारों के साथ किसी न किसी धर्म के जुड़े होने से भारत में कितनी बार सांप्रदायिक दंगे भड़क उठते हैं. फिर चाहे मार्च 2015 में मथुरा-वृंदावन-बरसाना की गलियों में होली के त्योहार के दौरान दंगे और झड़पें हों या गोरखपुर के रसूलपुर में जुमे की नमाज और होली का त्योहार एक ही समय पर मनाए जाने पर हिंदूमुसलमानों में टकराव हो, या फिर जून 2016 में हिंदूमुसलमान दंगे भड़काने की नीयत से रमजान के पावन महीने में हैदराबाद की चारमीनार के बगल में स्थित भाग्यलक्ष्मी मंदिर में गोमांस रखने की साजिश.

हमारे भारतीय त्योहार जैसे रक्षाबंधन जिस की शुरुआत हिंदूमुसलमान भाईबहन की एकता से हुई, या फिर दीवाली के मेले, या होली का रंगभरा त्योहार सामुदायिक तरीके से मनाए जा सकते हैं. ईद की खीर साथ मिल कर खानी हो या क्रिसमस का केक, सामुदायिक तरीके से किसी भी त्योहार को देखने में जो आनंद है वह धर्म के चश्मे के पीछे से देखने में नहीं. त्योहारों के पीछे की मूल भावना को जो समझ सकेगा, वो यही कहेगा कि त्योहार समाज के हैं, धर्म के नहीं.

रोजमर्रा के आम जीवन में त्योहार सुखद परिवर्तन लाते हैं. आने वाले त्योहार को सोच कर ही मन में हर्षोल्लास तथा स्फूर्ति का संचार होने लगता है. परंपराओं व संस्कारों से घिरा हर त्योहार समाज और राष्ट्र के लिए कोई न कोई संदेश देता है, जैसे विजयदशमी असत्य पर सत्य की विजय का संदेश देता है, रक्षाबंधन का पावन पर्व भाईबहन के प्रेम और भाई का बहन की आजीवन रक्षा करने के संकल्प को याद करता है, ईद भाईचारे का संदेश देती है, रंगों का त्योहार होली हमें संदेश देता है कि हम आपसी कटुता व वैमनस्य को भूल कर अपने शत्रुओं से भी प्रेम करें और क्रिसमस संसार से अपराधों के अंधकार को दूर करने का संदेश देता है.  त्योहार का विचार मन में आते ही उत्सव का सा माहौल छा जाता है. किसी धर्म विशेष से जोड़ कर नहीं, बल्कि त्योहार को एक खुशी के रूप में मनाए जाने से सामाजिक एकता बढ़ती है. क्यों न ऐसे प्रयास किए जाएं जिन से त्योहारों का पर्याय केवल धूमधाम और प्रसन्नता हो, न कि धर्म की परिछाया.

सामुदायिक त्योहारों से रंगा विश्व : विश्व में कई जगह त्योहारों को धर्म से अलग कर, सामुदायिक तरीके से मनाने का रिवाज है. ब्राजील का कार्निवल जहां अनगिनत सजेधजे लोग सड़कों पर नाचतेगाते चलते हुए परेड निकालते हैं. स्पेन के ला टोमाटीना फैस्टिवल में सैकड़ों की आबादी में लोग एकदूसरे पर टमाटरों से वार कर खेलते हैं. कनाडा का हैलोवीन जिस में बच्चे आड़ेटेढ़े रूप धर कर घरघर जा कर ट्रिक या ट्रीट कहते हैं तो घर वाले उन्हें कुछ खाने के पकवान, चौकलेट आदि दे देते हैं वरना बच्चे दरवाजे पर खड़े हो, कुछ करतब दिखाते रहते हैं. आजकल तो बड़े भी भूतभूतनीचुड़ैल आदि बन हैलोवीन पार्टियां करते हैं. दक्षिण कोरिया में आयोजित मड फैस्टिवल में भाग लेने वाले सभी लोग कीचड़ में खेलते हैं. अमेरिका की थैंक्सगिविंग जहां सभी पारिवारिक सदस्य व मित्र किसी एक के घर पर एकत्रित होते हैं और साथ मिल कर भोजन करते हैं खासतौर पर अमेरिकी चिडि़या ‘टर्की’ का पकवान. लंदन में नौटिंगहिल कार्निवल, जो कि ब्राजील के कार्निवल की तरह का होता है, जहां सजेधजे लोग सड़कों पर नाचतेगाते हुए परेड निकालते हैं. थाईलैंड में सोंगक्रान के दौरान लोग पानी के गुब्बारों और फौआरों से खेलते हैं इत्यादि.

ये सभी त्योहार सामुदायिक ढंग से मनाए जाते हैं जहां पूरा ध्यान त्योहार की मस्ती पर होता है. मानने वाला किस धर्म को मानता है, या ईश्वर में विश्वास रखता है या नहीं, इन बातों से त्योहार के उल्लास पर कोई असर नहीं होता. बस, हर कोई हंसता है, नाचतागाता है, धूम मचाता है. लोग तैयार हो कर घरों से बाहर निकलते हैं, आपस में एकदूसरे को बधाइयां देते हैं, खातेपीते हैं, सड़कों पर नाचतेगाते हैं और त्योहार का भरपूर मजा लेते हैं.  विदेशों में सामुदायिक त्योहार आयोजित करने हेतु शहरविशेष की सरकारी संस्थाएं, गैरसरकारी संस्थाएं तथा महल्ला समितियां आपस में साझेदारी करती हैं. पूरे समाज में एकता की भावना प्रगाढ़ रहती है, अपने महल्ले, अपने शहर, अपने देश के प्रति गर्व और राष्ट्रभक्ति पनपती है. एक और बड़ा फायदा यह होता है कि वहां के पर्यटन में वृद्धि होती है जिस से आर्थिक लाभ होता है. सैलानी स्पेन जा कर ला टोमाटीना फैस्टिवल या बुलफाइट देखना चाहते हैं. दक्षिण कोरिया में मड फैस्टिवल और थाईलैंड में सोंगक्रान के कारण सैलानियों की भीड़ इन उत्सवों के दैरान काफी बढ़ जाती है.

त्योहारों को धर्म की जकड़ से मुक्त करना : क्रिसमस व अन्य ईसाई त्योहारों के अलावा लंदन में फरवरी माह में चीन का नववर्ष, मार्च में भारत की होली, जुलाई में ईद उल फितर पूरे हर्षोल्लास से मनाए जाते हैं. और इन्हें केवल धर्मविशेष के लोग ही नहीं, बल्कि पूरा शहर वहां हो रही मस्ती, मुफ्त प्रदर्शन, सड़कों पर नाचगाना आदि का लुत्फ उठाता है. ऐसे ही चीनी त्योहारों के साथसाथ चीन में भी हैलोवीन, वैलेंटाइन डे, थैंक्सगिविंग और क्रिसमस जैसे पश्चिमी त्योहार एकता के साथ मनाए जाते हैं. जापान में भी क्रिसमस पूरे जोशोखरोश से मनाया जाता है जबकि वहां ईसाइयों की संख्या बेहद कम है.  भारत के रोशनीभरे त्योहार दीवाली की भांति कई देशों में अलगअलग मौकों पर आतिशबाजी की जाती है. किंतु जहां हमारे समाज में यह आतिशबाजी हर परिवार अलग रूप से करता है जिस का नतीजा अधिक गंदगी, अधिक प्रदूषण और आपसी होड़ बन कर रह जाता है, वहीं दूसरे देशों में यह आतिशबाजी सामुदायिक तौर पर की जाती है जिस का सभी वर्ग के लोग साथ में आनंद उठाते हैं.

भारत में भी हैं सामुदायिक त्योहारों के उदाहरण : हमारे समाज में भी कई ऐसे उदाहरण हैं जिन्हें हम छोटेमोटे त्योहारों के रूप में देख सकते हैं- ओलिंपिक खेल, क्रिकेट या फुटबाल का मैच, कुश्ती, दंगल, दिल्ली में हाल ही में शुरू हुई नई संकल्पना ‘राहगीरी’ जिस में बहुत सुबह लोग सड़कों पर पहुंच कर भिन्न प्रकार के खेल खेलते हैं, नाटक देखते हैं, धुनों पर नाचते हैं. हमारे राष्ट्रीय पर्व जैसे स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गांधी जयंती, शिक्षक दिवस, बाल दिवस आदि को सभी धर्मों, जातियों व संप्रदायों के लोग मिलजुल कर खुशी के साथ मनाते हैं.  त्योहारों को समाज के सभी वर्गों के साथ मनाने से सामाजिक एकता में प्रगाढ़ता आती है. जिन त्योहारों में किसी धर्म का हस्तक्षेप नहीं होता उन्हें मनाने में सभी भारतीयों में कितनी राष्ट्रप्रेम की भावना का संचार होता है. लगभग हर कोई अपने फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सऐप पर राष्ट्रीय ध्वज की तसवीर लगा देता है और अपने अंदर भारतीय होने पर गर्व अनुभव करता है. ऐसे उत्सवों में पंडा, मुल्ला, पादरी का कोई हस्तक्षेप नहीं होता, इसलिए ये धर्म की दृष्टि से समाज को विभाजित करने में अक्षम हैं.

धर्म और त्योहार का संबंध : प्रकृति है तो इंसान, पशु, पक्षी, जलप्राणी सभी उसी की देन हैं. तो कोई जानवर त्योहार क्यों नहीं मनाता, पंछी उत्सव क्यों नहीं मनाते? त्योहार मनाने का सिद्धांत केवल मनुष्य में ही क्यों है? त्योहार खुशी और उल्लास के लिए हमारे जीवन में आते हैं. यदि हम ये मानते हैं कि त्योहार इंसान ने स्वयं बनाए हैं तो त्योहार में खुशी, उल्लास, जोश से अधिक धर्म की भावना क्यों? आखिर त्योहारों का धर्म से इतना गहरा नाता क्यों है?

 इस का सीधा सा उत्तर है कि धर्म के ठेकेदारों ने अपनी दुकान चलाए रखने हेतु पूरे वर्ष कोई न कोई त्योहार बना दिए? एक न एक त्योहार आते रहें जिन्हें मनाने के लिए आम आदमी को पंडेपुजारी, पादरीमौलवी की जरूरत पड़ती रहे. हर त्योहार में उल्लास से अधिक जोर उसे मनाने की जटिल प्रक्रिया पर हो ताकिआम आदमी स्वयं ही आसानी से त्योहार न मना पाए, बल्कि उस के रीतिरिवाजों में उलझ कर पंडे, मुल्ला व पादरी का रास्ता देखता रहे. त्योहार हमारे लिए खुशियां लाता है, आने वाले समय में हमें उन से लाभ मिले, ऐसे प्रलोभन दे कर पंडे, पुजारी, पादरी व मौलवी भिन्न प्रकार के पूजापाठ करवा कर अपनी जेबें भरते रहते हैं.

हर धर्म ने अंधविश्वास फैला कर टोनेटोटकों के सहारे प्राइवेट जिंदगी में घुसपैठ कर रखी है. मुसलमानों में गंडातावीज में विश्वास, हिंदुओं में नजर से बचने के लिए काला टीका लगाना, ईसाइयों में होली वाटर में विश्वास आदि रोजमर्रा की कुछ बातों से अंधविश्वास का हमारे जीवन में कितना असर है, यह आसानी से पता चलता है. मुसलमानों में बीमारी में झाड़फूंक करवाना, हिंदुओं में कालसर्प योग की लंबीचौड़ी पूजा इत्यादि से धर्म के पुरोहितों का धंधा चलता रहता है.  धर्म से जुड़ाव के कारण सामाजिक एकता को खतरा : त्योहारों के साथ किसी न किसी धर्म के जुड़े होने से भारत में कितनी बार सांप्रदायिक दंगे भड़क उठते हैं. फिर चाहे मार्च 2015 में मथुरा-वृंदावन-बरसाना की गलियों में होली के त्योहार के दौरान दंगे और झड़पें हों या गोरखपुर के रसूलपुर में जुमे की नमाज और होली का त्योहार एक ही समय पर मनाए जाने पर हिंदूमुसलमानों में टकराव हो, या फिर जून 2016 में हिंदूमुसलमान दंगे भड़काने की नीयत से रमजान के पावन महीने में हैदराबाद की चारमीनार के बगल में स्थित भाग्यलक्ष्मी मंदिर में गोमांस रखने की साजिश.

हमारे भारतीय त्योहार जैसे रक्षाबंधन जिस की शुरुआत हिंदूमुसलमान भाईबहन की एकता से हुई, या फिर दीवाली के मेले, या होली का रंगभरा त्योहार सामुदायिक तरीके से मनाए जा सकते हैं. ईद की खीर साथ मिल कर खानी हो या क्रिसमस का केक, सामुदायिक तरीके से किसी भी त्योहार को देखने में जो आनंद है वह धर्म के चश्मे के पीछे से देखने में नहीं. त्योहारों के पीछे की मूल भावना को जो समझ सकेगा, वो यही कहेगा कि त्योहार समाज के हैं, धर्म के नहीं.

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