जिंदगी जीना क्या होता है? जीने का अर्थ क्या होता है? क्या हम सचमुच अपनी इच्छानुसार जीते हैं या जिंदगी ही हमें अपनी इच्छानुसार जीने के लिए बाध्य करती है? कई बार सवाल बहुत ही जटिल होते हैं और इस की वजह से हम उन के जवाब भी बहुत ही कठिन और पेचीदा कर देते हैं. लेकिन सवाल चाहे कितने भी कठिन हों उन के जवाबों को आसान करना हमारे ही हाथ में होता है. कई लोगों को यह बात ध्यान में ही नहीं आती या यों कहें कि कठिन सवालों के बीच छिपी आसानी किसी की समझ नहीं आती और फिर शुरू होती है खुद की पहचान ढूंढ़ने वाली और कभी खत्म न होने वाली खोज.

हम सभी की जीने की एक अलग ही चाह होती है, अलग कल्पना और महत्त्वाकांक्षा होती है. जब किसी चीज को पाने की चाह होती है तब जीना एक संघर्ष बन जाता है और फिर इस संघर्ष में 2 ही विकल्प बचते हैं- जीतना या फिर खत्म हो जाना. कई बार तो अपनी विवेकबुद्धि परे रख कर किसी भी राह को अपनाते हुए सफलता के पीछे दौड़ लगाई जाती है और कई बार ऐसा रास्ता चुनने की हमें कीमत भी चुकानी पड़ती है. इस सब में सब से ज्यादा ठेस लगती है हमारे मन को और यहीं से शुरू होती है मन:शांति की खोज.

हमारी मन:शांति क्यों कहीं खो जाती है? ऐसा क्या होता है कि जिस चीज को पाने के लिए इतनी जिद की जाती है, उसे अचानक छोड़ देने की हमारी इच्छा होती है? ऐसा क्यों होता है कि सभी चीजों का त्याग कर हमारे कदम यकायक अध्यात्म की राह में चलने लगते हैं?

सोफिया का मामला

हाल ही का एक उदाहरण लें. ब्रिटेन की ग्लैमरस हीरोइन और मौडल सोफिया हयात भी अचानक अध्यात्म की राह पर चल पड़ी हैं. उन्होंने नन बन कर संन्यासी जीवन जीने का फैसला किया है.

ब्रिटेन से ज्यादा भारत में मशहूर सोफिया ने ‘बिग बौस 7’ में अपनी नग्न अदाओं से सभी को आकर्षित किया था. एक समय सोफिया का न्यूड फोटोशूट भी बहुत मशहूर हुआ था. क्रिकेटर रोहित शर्मा के साथ भी उन का नाम जोड़ा गया था. बिकिनी पहन कर रंगों से खेलते हुए उन की तसवीरों ने भी काफी धूम मचाई थी.

पिछले साल जब पोर्न साइट्स पर रोक लगाने का मामला काफी चर्चा में था, तब सोफिया ने अपनी नग्न तसवीरें ट्विटर में डाल कर खलबली मचा दी थी. सितंबर, 2013 में सोफिया पूरी दुनिया की 81वीं मादक ललना थीं.

मुसलमान परिवार में जन्मी सोफिया बचपन से ही अपने पिता की मार खाते हुए बड़ी हुई हैं. बचपन में जब वे स्कूल से घर वापस आती थीं तब उन के अब्बा उन्हें उन की मां और उन की छोटी बहन को बैल्ट से लहूलुहान होने तक पीटते रहते थे. इस सब से परेशान हो कर सोफिया ने क्रिश्चियन धर्म स्वीकार किया और फिर अपनी मादकता, खुला व्यवहार, बिंदास बातें, लैंगिक स्वतंत्रता आदि बातों से अपनी अलग पहचान बनाई.

मगर फिर अचानक सब कुछ बदल गया. यह बिंदास और बोल्ड जिंदगी उन्हें विरक्त लगने लगी और उन्होंने नन बनने का फैसला कर लिया.

सोफिया बताती हैं कि उन्होंने पूरे मन से अपनी जिंदगी जी ली है. कई दोस्तों के साथ लैंगिक सुख का भी अनुभव कर लिया है. कई बार उन के साथ धोखा भी हुआ. आज सोफिया को मौडल सोफिया के बजाय मदर सोफिया पुकारना ज्यादा खुशी देता है.

अध्यात्म का रास्ता चुनने के बावजूद सोफिया आज भी अपनी शोहरत का मोह नहीं छोड़ पा रही हैं. आज भी वे अपने संन्यासी जीवन की हर खबर ट्विटर, फेसबुक और अन्य प्रसार माध्यमों द्वारा दुनिया तक पहुंचा रही हैं.

हाल ही में उन्होंने एक प्रैस कौन्फ्रैंसिंग का आयोजन कर अपनी कथा और व्यथा पत्रकारों के सामने रखी. सोफिया बताती हैं कि नन होने का निर्णय यों ही नहीं लिया गया. अपने प्रेमप्रकरण में उन के साथ कई बार धोखा हुआ है. इस सब से छुटकारा पाने के लिए ही उन्होंने यह फैसला किया है. अब लैंगिक संबंध, दोस्त, शादी, बच्चे इस सब के लिए उन के मन में कोई उत्साह बाकी नहीं रहा है.

भारत लौटने से पहले ही उन्होंने अपने अंदर के झूठे सत्य का चोला उतार फेंका था. सिलिकौन के कृत्रिम वक्ष भी उन्होंने निकाल दिए और सभी पत्रकारों को उन्हें दिखाते हुए कहा कि अब इन का उन के लिए कोई उपयोग नहीं है. अब किसी को भी उन के उन्नत वक्ष का आकर्षण नहीं रहेगा.

मामला अकेली का नहीं

80 के दशक के मशहूर अभिनेता विनोद खन्ना ने भी इस प्रकार अध्यात्मकता की राह पकड़ी थी. उस समय वे काफी मशहूर थे. उन की तुलना अमिताभ बच्चन से होती थी, लेकिन अपनी शोहरत के ऊंचे शिखर पर पहुंचने के बाद उन्होंने ओशो का अध्यात्मिक मार्ग स्वीकारा.

1980 में विनोद खन्ना अमेरिका के ओशो आश्रम में स्वामी विनोद भारती के नाम से रहने लगे थे. वहां के आश्रम में वे सभी प्रकार के काम करते थे. माली का काम, आश्रम में जूठे बरतन धोना आदि. लेकिन 1980 में वह सब छोड़ कर वापस आ गए और उन्होंने दूसरी शादी कर ली.

1994 की मिस इंडिया बरखा मदान भी बौद्ध धर्म स्वीकार कर के भिक्षुक बनी थीं.

1990 की ‘आशिकी’ फिल्म की नायिका अनु अग्रवाल भी अचानक अध्यात्म की राह पर चल पड़ी थीं. कई राजकीय लोग, क्रिकेटर्स सीधेसीधे विरक्त जीवन भले ही न जीते हों, पर उन का अध्यात्मिकता का खिंचाव किसी से छिपा नहीं है.

सचिन तेंदुलकर की सत्य साईंबाबा की श्रद्धा भी किसी से छिपी नहीं है. दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव भी सत्य साईंबाबा के परम भक्त थे.

महानायक अमिताभ बच्चन के हाथों की विविध ग्रहों की अंगूठियां भी उन की आध्यात्मिक मानसिकता का परिचय कराती हैं.

ये सारे चरित्र अपनेअपने क्षेत्र में काफी सफल रहे हैं. सोफिया हयात की तुलना इन में से किसी के साथ नहीं हो सकती. सोफिया हयात का अध्यात्मिकता की राह पर जाने का कारण साफ है कि उन में अच्छेबुरे की पहचान की समझ नहीं.

परिपक्वता पाने के लिए बुद्धि और समझ का मिलाप होना जरूरी है. अच्छेबुरे का अंतर समझने की समझ होनी चाहिए. इन सभी बातों का अभाव होने पर ही इस तरह के रास्ते अपनाए जाते हैं. ऐसे भगवान के नाम पर दुकानें खोले बैठे लोगों का अच्छाखासा फायदा होता है. नन, साध्वी, संन्यास आदि मार्ग समाज पर लादने की क्या जरूरत है?

संतुलित विचार, सच्ची राह और अपने पसंदीदा क्षेत्र में कठोर मेहनत कर के भी हम सफलता पा सकते हैं. किसी के धोखा देने की वजह से संन्यास ले कर आत्मक्लेश का रास्ता अपनाना कोई उपाय नहीं है और होना भी नहीं चाहिए. नन, साध्वी आदि किसी न किसी धर्म द्वारा तैयार की गई संकल्पना है, और जो मनुष्य द्वारा ही तैयार की गई है. इस में आत्मउन्नति की राह कहीं पर भी दिखाई नहीं देती.

अप्राकृतिक तरीके से जीना, अपनी सारी इच्छाआकांक्षाएं मार कर अपनी जिंदगी और भी भयानक बनाना, जीवन की सारी खुशियां खत्म करना ही अगर धर्म है तो ऐसे धर्म या उस की संकल्पना के रास्ते न जाना ही बेहतर होगा. खुद को विद्रूप बना कर, अच्छा खानापीना छोड़ देना यदि अध्यात्म के मार्ग पर चलना है तो ऐसे अध्यात्म से दूर रहना ही उचित है. इस से कुछ हासिल नहीं होगा. ऐसे में मन:शांति के बजाय मानसिक पीड़ा ही ज्यादा हो सकती है.

कुदरत ने हमें बहुत ही सुंदर जीवन दिया है. उस का खुल कर आनंद लें. अच्छा, योग्य, संतुलित आहार, भरपूर व्यायाम, भरपूर काम और खुद को भी खुशी देने वाली बातें करें. भरपूर पठन करें. इस से विचारों में परिपक्वता आती है. सुंदर रहें, सुंदर जीएं, सुंदर दिखें, जरूरतमंदों की मदद करें. आप खुद ही पाएंगे कि आप को मन:शांति की खोज में कहीं जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. वह खुद आप को ढूंढ़ते हुए आप के पास आएगी.