मेधा ने ऐसा कदम क्यूं उठाया होगा…सोच-सोच उसकी माँ मंजरी के पसीने नहीं थम रहे थे. वो तो अच्छा हो सोशल नेटवर्किंग साइट का जिसके जरिये मंजरी को इस बात का पता चल गया. मेधा की एक लड़के के साथ फोटो पर उसकी एक सहेली का कमेन्ट था – ‘आखिर तेरी तमन्ना पूरी हो ही गयी लिव-इन में रहने की.’ इसके आगे कुछ भी पढ़ नहीं पायी थी मंजरी, उसकी आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा था.

मेधा का शुरू से ही मन था कि वो दूसरे शहर जाकर कॉलेज में पढे, “मुझे हॉस्टल लाइफ देखनी है, मम्मा”. अपनी माँ से कभी कोई बात छुपाने की मेधा को आवश्यकता नहीं पड़ी थी. बारहवीं करने के बाद, अच्छे नंबर लाने पर उसका दाखिला बंगलुरु के प्रसिद्ध क्राइस्ट कॉलेज में हो गया था. सारी रिश्तेदारी ने कितनी बधाई दी थी. हांलाकी कुछ ने टोका था, “दिल्ली में कॉलेजों की कमी है क्या जो लड़की को इतनी दूर भेज रहे हो?” किन्तु मंजरी ने सदैव अपनी बेटी का साथ दिया था. पर अब मंजरी का मन मेधा की बात मान लेने पर बार-बार पछता रहा था. उसके अंतर में वर्षों से बोए संस्कार-नामी प्रश्न फन उठा रहे थे – क्या होगा जब उसके पिता को पता चलेगा?

सारी रिश्तेदारी में वो क्या मुँह दिखाएंगे? कैसे सामना कर पाएँगे समाज का? उफ! इतने सवाल उसके मन को छलनी किए जा रहे थे. रात को बिस्तर पर मंजरी का शरीर लेटा था पर नींद आँखों से परे थी. मन था कि अपनी बच्ची मेधा के जन्म से लेकर बारहवीं तक की यादों के गलियारों में घूम रहा था … मेधा एक साधारण छात्रा थी किन्तु परिश्रमी होने के कारण वो हमेशा अच्छे नंबर ले आती थी. उसका ध्यान अर्जुन की भाँति अपने लक्ष्य से कभी नहीं डिगता था. तो अब क्या हो गया था उसे, जब अपना कैरियर बनाने का सही समय है तब वो इतनी बड़ी गलती कैसे कर बैठी?
अगले दिन पति के दफ्तर जाते ही मंजरी ने फौरन मेधा को फोन लगाया. क्या कहेगी इस बात पर दिमाग शून्य था किन्तु बात साफ करनी भी आवश्यक थी. “मेधा, ये तेरी डी.पी. में कौन लड़का है तेरे साथ?” उसने सीधा प्रश्न दागा.

“मम्मा, मुझे लगा था कि आप मेरी डी.पी. देखते ही फौरन यहाँ आ जाओगी. एक्चुअली मैंने आपको दिखाने के लिए ही ये डी.पी. लगाई”, मेधा की बेबाकी पर मंजरी विस्मित रह गयी. वो कुछ आगे बोलती इससे पहले मेधा ने कहा, “मम्मा, हम सब जानते हैं कि दीदी के लिए वर खोजने में आपको और पापा को क्या नहीं करना पड़ा, दान-दहेज की समस्या अलग. उसके बाद भी जीजाजी ने दीदी को किस हाल में रखा, ये बात भी मुझसे छुपी नहीं है. कुछ ऐसी स्त्रीयोचित भावनाएँ भी हैं जो दीदी ने केवल मुझसे सांझा की हैं. मैंने तभी सोच लिया था कि अपने लिए लड़का मैं स्वयं ढूंढूंगी, ऐसा लड़का जिससे मेरी मानसिकता और मेरे आदर्श मेल खाते हों. मम्मा, मुझपर विश्वास रखो. मैं अपनी ज़िंदगी को दांव पर नहीं लगाऊँगी. आप बिलकुल चिंता मत करो. मेरा हर कदम मेरे जीवन को खुशहाल बनाने की दिशा में ही होगा. और मैं अपने परिवार की इज्ज़त पर भी कोई आंच नहीं आने दूँगी.”

मेधा के आत्मविश्वास ने मंजरी के मन से सारे काले बादल साफ कर दिये. अपनी बेटी को उसका जीवन जीने की आज़ादी देने में उसे कोई आपत्ति न थी. बस एक डर था कि कहीं उसकी बेटी बहक तो नहीं गयी. ये डर मेधा की बातों ने आज दूर कर दिया था. उसका कहा आखिरी वाक्य मंजरी के कानों में अभी भी गुंजायमान था – मम्मा, याद है आपने मेरे सत्रहवें जन्मदिन पर एक पोस्टर दिया था जिसपर लिखा था कि आपने मुझे स्वतन्त्रता के पंखों के साथ ज़िम्मेदारी की जड़ें भी दी हैं. मेरे पंख और जड़ें आज भी मजबूत हैं, मम्मा!