देश को महान बनाने का सपना कोई देख रहा है, ऐसा सोचना भूल जाएं. वह रामायण और महाभारत की परीकथाओं की बात कर सकता है, समुद्र पर पुल और लाक्षागृह बनाने का बखान कर सकता है पर असल में, कुछ बड़ा नहीं कर सकता. महान बनाने के लिए देश को इंजीनियर चाहिए जो नया सोच सकें, दूर की सोच सकें. यह गुण हमारे यहां है लेकिन कितनों में, यह इस बात से साफ है कि देश के इंजीनियरिंग कालेज फटाफट बंद हो रहे हैं. जिस देश के पगपग पर नए निर्माण की जरूरत है वहां हर दिन एक इंजीनियरिंग कालेज बंद हो रहा है. खरपतवार की तरह खुले कालेज अब लगातार कम हो रहे हैं और उन की विशाल बिल्डिंगें सायंसायं कर रही हैं. 4 वर्षों में 3 लाख सीटें कम हो गई हैं. इसी साल मेक इन इंडिया के नारों के बावजूद, 80,000 सीटें और 200 कालेज कम हो गए हैं. जो कालेज चल रहे हैं उन में कितने घिस रहे हैं, यह अंदाजा लगाना कठिन है.

एक समय देश में 20 लाख इंजीनियरिंग छात्रों की जगह थी, आज केवल 7.9 लाख छात्रों ने 2016-17 में प्रवेश लिया. इंजीनियरिंग से मोहभंग होने का कारण यह है कि हमारे यहां हाथ से काम करने की आदत ही नहीं. हमारे इंजीनियरों की दफ्तरों में बैठ कर काम करने की आदत है. वे कंप्यूटरों पर दक्ष तो हैं पर धूप, पानी, धुएं या अंधेरी खानों के नहीं. ये काम तो हमारे यहां हमेशा नीची जाति के लोग करते रहे हैं और वे इन 20 लाख सीटों के लायक फीस भर ही नहीं सकते. उन की पहले की शिक्षा ऐसी नहीं कि वे आज की कठिन तकनीक को समझ सकें. विदेशों में मिलने वाली नौकरियां भी कम होने लगी हैं क्योंकि चीन से इंजीनियर भारी संख्या में मिल रहे हैं. चीन हर साल 47 लाख छात्रों को साइंस, टैक्नोलौजी, इंजीनियरिंग और मैथमैटिक्स के विशेषज्ञ बना रहा है जो हमारे छात्रों से कहीं ज्यादा योग्य, तेज, दक्ष, मेहनती व दूरदर्शी हैं. हमारे छात्र तो ‘थ्री इडियट’ फिल्म की तरह पूजापाठी हैं, अंगूठियां पहनने वाले हैं, दानदक्षिणा के भरोसे पास होने वाले हैं.

इस तरह के इंजीनियर स्वाभाविक है कि काम पर आते ही निकम्मे साबित हो जाते हैं. कुछ हजार जरूर वर्ल्डक्लास होंगे पर बाकी बस किसी तरह कामचलाऊ हैं. यह किसी भी सड़क पर 4 मील चलने पर पता चल जाएगा, विदेशी गाड़ी में चलने पर भी, सड़क की खराब बनावट के चलते, खड़खड़ आवाज आएगी, 4 में से 3 ट्रैफिक लाइटें काम नहीं कर रही होंगी, बिजली के तार लटके या टूटें दिखेंगे, सड़क के किनारे खराब हालत में भारी भरकम क्रेन ट्रेलर दिख जाएंगे, गुजरते ट्रक आड़ेतिरछे चल रहे होंगे और सड़क की बत्तियां आमतौर पर गुल होंगी.

हालत तो यहां तक है कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के कार्यालयों के सामने का राजपथ भी इंजीनियरिंग की फेल्योर का महान नमूना है जहां हर कोने पर कुछ न कुछ बेतरतीब नजर आएगा. देश में इंजीनियरों की नहीं, पुजारियों की भरमार हो रही है. हम मेक इन इंडिया में केवल हवनकुंड बनाएंगे, ऐसा महसूस किया जा रहा है.