फ्रांस का बीच टाउन नीस, फ्रैंच रिवेरिया की राजधानी है, जहां रोचक संग्रहालय हैं, खूबसूरत चर्च हैं, रशियन और्थोडौक्स कैथिड्रल है, वहीं पास स्थित होटल नीग्रेस्को के कैफेटेरिया में बैठे इवा और जावेद कौफी पी रहे थे. इवा ने चिंतित स्वर में कहा, ‘‘जावेद, तुम मुझ से प्रौमिस करो कि तुम कोई भी गलत कदम नहीं उठाओगे.’’

‘‘इवा, मैं बहुत परेशान हो गया हूं… मेरे अंदर एक आग सी लगी रहती है. मैं ने अपना बहुत अपमान सहा है. ये लोग मुझे ऐसी नजरों से देखते हैं जैसे मैं बहुत छोटी चीज हूं. मैं अब बहुत आगे बढ़ चुका हूं… मेरे कदम अब पीछे नहीं लौट सकते.’’

‘‘नहीं जावेद, तुम जानते हो न… मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती… तुम अगर कभी पकड़े गए तो पता है न क्या हश्र होगा तुम्हारा? तुम्हें उसी पल भून दिया जाएगा.’’

‘‘हां, ठीक है… मुझे मंजूर है. क्यों ये लोग मुझे मेरी शक्लसूरत के कारण नीचे नजरों से देखते हैं?’’

इवा ने जावेद को समझाने की बहुत कोशिश की, अपने प्यार का, अपने साथ भविष्य में देखे गए सुनहरे सपनों का वास्ता दिया पर जावेद आतंक की राह पर बहुत आगे निकल चुका था.

जावेद ने घड़ी देखते हुए कहा, ‘‘इवा, मुझे जाना है, एक जरूरी मीटिंग है, मुझे पहली बार कोई काम दिया गया है जिसे मुझे हर हाल में पूरा करना है… शाम को मौका मिला तो मिलूंगा,’’ औरवोर (बाय), कह कर जावेद उस के गाल पर किस कर के निकल गया.

इवा ने ठंडी सांस लेते हुए जाते हुए जावेद को भीगी आंखों से देखा. उस की सुंदर आंखें आंसुओं की नमी से धुंधली हो गई थीं.

इवा होटल नीग्रेस्को में ही हौस्पिटैलिटी इंचार्ज थी. जावेद की बातों से उदास हो कर उस का मन फिर अपनी ड्यूटी में नहीं लग रहा था. वह अपनी दोस्त केरा को बता कर थोड़ी देर के लिए बाहर आ गई. उसे घुटन सी हो रही थी. फार्मूला वन का एक बहुत अच्छा सर्र्किट नीस है, जो होटल के बिलकुल पीछे से जाता है. उस रास्ते से वह बीच पर पहुंच गई. क्वैदे एतादयूनिस बीच पर एक किनारे बैठ कर वह वहां खेलते बच्चों को देखने लगी. बच्चे अपनी दुनिया में मस्त थे. कभी गुब्बारों के पीछे दौड़ रहे थे, तो कभी रेत में लेट रहे थे.

इवा जावेद के बारे में सोच रही थी. उसे जावेद से अपनी पहली मुलाकात याद आई…

2 साल पहले वह एलियांज रिवेरिया स्टेडियम में फुटबौल का मैच देखते हुए जावेद से मिली थी. दोनों पासपास बैठे थे. दोनों ही लिवरपूल टीम के फैन थे. दोनों ही अपनी टीम को चीयर कर रहे थे. हर गोल पर दोनों जम कर खुश हो रहे थे. जब भी दोनों की आंखें मिलतीं, दोनों मुसकरा देते थे और जब उन की टीम जीत गई तो दोनों खुशी और उत्साह से एकदूसरे के गले लग गए. दोनों को अपनी इस हरकत पर हंसी आ गई. पल भर में ही दोस्ती हो गई. फिर प्यार हो गया. दोनों जैसे एकदूसरे के लिए बने थे.

जावेद बंगलादेश से एमबीए करने आया था. जावेद को फुटबौल मैच देखने का नशा था. वह कई बार हंस कर इवा से कहता था, ‘‘मैं यहां पढ़ने थोड़े ही आया हूं, मैं तो मैच देखने आया हूं.’’

अपने स्कूल और फिर कालेज की टीम का कैप्टन रहा था जावेद. पढ़ने में होशियार, सभ्य, आकर्षक व्यक्तित्व वाले जावेद को इवा दिलोजान से चाहने लगी थी. जावेद की पढ़ाई के बाद नौकरी मिलने पर वे दोनों विवाह का मन भी बना चुके थे.

जावेद ने बताया था, ‘‘मेरे परिवार वाले बहुत कट्टर हैं… एक फ्रैंच लड़की को कभी बहू नहीं बनाएंगे, पर मैं तुम्हारे प्यार के लिए उन की नाराजगी सहन कर लूंगा.’’

यह बात सुन कर इवा ने उसे चूम लिया था. दोनों शारीरिक रूप से भी एकदूसरे के बहुत करीब आ चुके थे. जावेद फ्रैंच क्लास में अच्छी तरह फ्रैंच सीख चुका था. इवा ने जावेद से हिंदी में कुछ बातें करना सीख लिया था. प्यार वैसे भी कोई देश, भाषा, जाति, रंग नहीं जानता. हो गया तो बस प्यार ही रहता है और कुछ नहीं. एकदूसरे की भाषा, सभ्यता अपना कर दोनों प्यार में आगे बढ़ते जा रहे थे पर अब जावेद के अंदर आया परिवर्तन इवा को चिंतित किए जा रहा था. वह बहुत परेशान थी. किसी को अपनी चिंता बता भी नहीं सकती थी. वह वैसे ही दुनिया में अकेली थी. जो उस की दोस्त थीं, यह परेशानी वह उन्हें भी नहीं बता सकती थी.

कालेज में कई बार रेसिज्म का शिकार होने पर जावेद के अंदर एक विद्रोह की भावना पनपने लगी थी, जो इवा के समझाने पर भी समय के साथ कम न हो कर बढ़ती ही जा रही थी. आज इवा को जावेद की 1-1 बात याद आ रही थी. जावेद सीधासादा, शांतिप्रिय, अपने काम से काम रखने वाला लड़का था. वह यहां कुछ बनने ही आया था. अच्छा भविष्य और फुटबौल, बस इन्हीं 2 चीजों में रुचि थी उस की, पर जातिवाद की 1-2 घटनाओं ने उस के अंदर दुख सा भर दिया था. कालेज में कोच मार्टिन ने हमेशा उस के खेलने की बहुत तारीफ की थी, पर जब कालेज टीम के चुनाव का समय आया तो जावेद का कहीं नाम ही नहीं था. उस ने कारण पूछा तो जवाब वहां उपस्थित लड़कों ने दिया, ‘‘तुम हमारी टीम में खेलने का सपना भी कैसे देख सकते हो?’’

इस बात पर सब की समवेत हंसी उस का दिल तोड़ती चली गई थी. उस के बाद कई बार कालेज में किसी भी गतिविधि में अपने विचार देने पर उस का मजाक उड़ाया जाने लगा था कि अब बंगलादेश से आए स्टूडैंट्स हमें अपने विचार बताएंगे.

वह धीरेधीरे रेसिज्म का शिकार होता जा रहा था. अब वह फेसबुक पर सीरियस स्टेटस डालने लगा था. जैसे लाइफ इज नौट ईजी या यहां आप की पहचान आप के गुणों से नहीं, आप की जाति से होती है या मैं थकने लगा हूं. इसी तरह के कई स्टेटस जिन्हें पढ़ कर साफसाफ समझ आ जाता था कि उस के अंदर दुख भरे विद्रोह की भावना पनपने लगी है.

ऐसे ही कभी इस तरह का स्टेटस पढ़ कर कुछ लोगों ने उस से संपर्क स्थापित कर लिया और वह धीरेधीरे आतंक की उस दुनिया में घुसता चला गया जहां से निकलना असंभव था.

इवा उस की हर बात जानती थी, उसे डर लगने लगा था. उस ने एक दिन जावेद से कहा था, ‘‘जावेद, मुझे बस तुम्हारे साथ रहना है. अगर तुम यहां कंफर्टेबल नहीं हो तो हम तुम्हारे गांव चलेंगे. मैं वहां तुम्हारे परिवार के साथ रहने के लिए तैयार हूं. मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती.’’

‘‘नहीं इवा, मेरा परिवार तुम्हें नहीं अपनाएगा. मैं तुम्हें दुखी नहीं देख पाऊंगा… मुझे अब यहीं अच्छा लगता है.’’

‘‘पर जावेद, तुम्हें गलत रास्ते पर जाते देख दुखी तो मैं यहां भी हूं?’’

‘‘यह गलत रास्ता नहीं है… ये लोग मेरी जाति के लिए मुझे नीचा नहीं दिखाते, इन के लिए कुछ करूंगा तो इज्जत मिलेगी.’’

‘‘इस रास्ते पर चल कर तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा जावेद. हम खत्म हो जाएंगे. अभी तो हमारा जीवन शुरू भी नहीं हुआ… अभी तो हमें बहुत प्यार करना है… घर बसाना है, कितने मैच एकसाथ देखने हैं, जीवन जीना है, अभी तो हम ने कुछ भी नहीं किया.’’

पर इवा की सारी बातों को नजरअंदाज कर पूरी तरह से जावेद का ब्रेनवाश हो चुका दिलोदिमाग अब एक ही बात समझता था- आतंक और बरबादी की बात. वह बात जिस से न कभी किसी का भला हुआ है, न होगा. वह अब ऐसी दुनिया का इनसान था जहां सिर्फ चीखें थीं, खून था, लाशें थीं.

जावेद जब शाम को इवा से मिलने आया तो इवा घबरा कर जावेद की बांहों में सिमट कर जोरजोर से रोने लगी. इवा का मन अनिष्ट की आशंका से कांप रहा था.

जावेद ने कहा, ‘‘इवा, मुझे गुडलक बोलो, आज पहले काम पर जा रहा हूं.’’

‘‘कौन सा काम? कहां?’’

‘‘आज बेस्टिल डे की परेड में एक ट्रक ले कर जाना है.’’

‘‘क्यों? क्या करना है?’’

‘‘कुछ नहीं, बस भीड़ में चलते चले जाना है.’’

रो पड़ी इवा, ‘‘जावेद, पागल हो गए हो क्या? किसी की जान चली गई तो? नहीं, तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे.’’

वैसे इवा को विश्वास नहीं था कि जावेद ऐसा कुछ करेगा. वह पहले भी कई बार मरने की धमकी दे चुका था. कभी कहता कि वह आत्मघाती बन जाएगा. कभी कि गोली से खुद को मार लेगा. पर अगले दिन सामान्य हो जाता.

‘‘सौरी इवा, जिंदा रहा तो जरूर मिलेंगे.’’

‘‘नहीं जावेद, मत जाओ. ज्यादा नाटक मत करो.’’

इवा के होंठों पर किस कर के जावेद ने उसे गले लगाया. साथ बिताए कितने ही पल

दोनों की आंखों के आगे घूम गए. फिर एक झटके में इवा को अलग कर जावेद तेज कदमों से चला गया.

इवा आवाज देती रह गई, ‘‘जावेद, रुक जाओ, जावेद, रात को कमरे में इंतजार करूंगी.’’

जावेद चला गया.

इवा का इस बार बुरा हाल था. वह रो रही थी. फिर अगले ही पल अपने को संभाल सोचने लगी कि जावेद को रोकना होगा. क्या वह मेरे प्यार के आगे किसी की जान ले सकता है? नहीं मैं ऐसे नहीं बैठ सकती. कुछ करना होगा. मेरा प्यार इतना कमजोर नहीं कि जावेद को बरबादी के रास्ते से वापस न ला सके… वह मुझे मार कर आगे नहीं बढ़ पाएगा… वह वहां से भागी. जावेद का कहना था कि वह एक ट्रक भीड़ में ले कर घुस जाएगा.

अगले दिन 14 जुलाई को बैस्टिल डे, फ्रैंच नैशनल डे मनाया जाता है. इस दिन यूरोप में सब से बड़ी मिलिटरी परेड होती है. सड़कें भीड़ से भरी थीं, जवान, बूढ़े, बच्चे सब आतिशबाजी देख रहे थे.

रात को जावेद इवा के पास नहीं आया था. इवा की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह

पुलिस को बताए. यह पक्का था कि बताने पर उसे खुद भी महीनों जेल में रहना पड़ेगा. शायद जावेद डरा रहा है. करेगा कुछ नहीं. फिर भी इवा जावेद की बताई जगह पहुंच गई. जावेद का फोन बंद था. इवा को उम्मीद थी कि शायद वह भीड़ में मिल जाए.

तभी भीड़ की तरफ बढ़ते ट्रक को देख कर एक बाइक सवार ने जावेद को रोकने की कोशिश की, लेकिन ट्रक नहीं रुका. इवा ने देख लिया कि ट्रक को जावेद चला रहा है. उसे और कुछ नहीं सूझा तो स्वयं ट्रक के आगे खड़ी हो गई.

जावेद के हाथ तब एक बार कांप गए जब उस ने इवा को ट्रक के आगे हाथ फैलाए खड़ी देखा. इवा रो रही थी. उस की टांगें कांप रही थीं, पर जावेद पर इतना जनून सवार था कि उस ने ट्रक की स्पीड कम न की. ट्रक इवा को कुचलता हुआ, साथ ही अनगिनत लोगों को भी कुचलता हुआ आगे बढ़ रहा था. पल भर में ही पुलिस की गोलियों ने जावेद को भून डाला. चारों तरफ चीखपुकार, सड़क पर पड़ी खून में डूबी लाशें, छोटे बच्चों को गोद में उठा कर इधरउधर भागते मातापिता, गिरतेपड़ते लोग, हर तरफ अफरातफरी का माहौल था.

इवा और जावेद दोनों इस दुनिया से जा चुके थे. एक बार फिर प्यार हार गया था, आतंक के खूनी खेल में. हर तरफ बिखरे सपने, टूटती सांसें, तड़पती जिंदगियां थीं, मातम था, खौफ था. अपने प्यार पर टूटा भरोसा लिए इवा जा चुकी थी और आतंक के रास्ते पर चलने के अंजाम के रूप में जावेद का रक्तरंजित शव पड़ा था.