मैट्रो मेरी जान

By Kunwar amod | 12 October 2017
मैट्रो मेरी जान

मैट्रो का दरवाजा खुला. भीड़ के साथ बासू भी अंदर हो गया. वह सवा 9 बजे से मैट्रो स्टेशन पर खड़ा था. स्टेशन पर आने के बाद बासू ने 4 टे्रनें इसलिए निकाल दीं क्योंकि उन में भीड़ अधिक थी. उस ने इस ट्रेन में हर हालत में घुसने का इरादा कर लिया. इतने बड़े रेले के एकसाथ घुसने से लोगों को परेशानी हुई. एक यात्री ने आने वाली भीड़ से परेशान होते हुए कहा, ‘‘अरे, कहां आ रहे हो भाईसाहब? यहां जगह नहीं है.’’

दरअसल दरवाजे से दूर खड़े लोगों को धक्का लग रहा था. ‘‘भाईसाहब, थोड़ाथोड़ा अंदर हो जाइए. अंदर काफी जगह है,’’ कोच में सब से बाद में चढ़ने वाले एक व्यक्ति ने कहा. वह दरवाजे पर लटका हुआ था.

‘‘हां हां, यहां तो प्लाट कट रहे हैं. तू भी ले ले भाई,’’ अंदर से कोई बोल पड़ा. यह व्यंग्य उस व्यक्ति की समझ में नहीं आया. उस ने कहने वाले का चेहरा देखने का प्रयास किया पर भीड़ में पता न चला.

‘‘क्या मतलब है आप का? मैं समझा नहीं,’’ उस ने भी हवा में मतलब समझने का प्रयास किया.

‘‘जब समझ में नहीं आता तो समझने की तकलीफ क्यों करता है?’’ फिर कहीं से आवाज आई.

पहले वाले ने फिर सिर उठा कर जवाब देने वाले को देखने का प्रयास किया पर मैट्रो की भीड़ ने उस का दूसरा प्रयास भी विफल कर दिया. उसे थोड़ा गुस्सा आ गया.

‘‘कौन हैं आप? कैसे बोल रहे हैं?’’ उस ने गुस्से से कहा.

‘‘क्यों भाई, आई कार्ड दिखाऊं के?’’ जवाब भी उतने ही जोश में दिया गया.

‘‘ला दिखा,’’ उस ने भी कह दिया.

‘‘तू कोई लाट साहब है जो मेरा आई कार्ड देखेगा?’’ वह भी बड़ा ढीठ था.

इस के साथ ही वाक्युद्ध शुरू हो गया. कोई किसी को देख नहीं पा रहा था. गालीगलौज का दौर पूरे शबाब पर आ कर मारपीट में तब्दील होने वाला था कि लोगों ने दोनों अदृश्य लड़कों के बीच में पड़ कर युद्ध विराम करवा दिया. इतने में पहले वाले का स्टेशन आ गया. वह बड़बड़ाता हुआ स्टेशन पर उतर गया. इस के साथ ही सारा मामला खत्म हो गया. अभी टे्रन थोड़ी दूर ही चली होगी कि एकाएक धीमी हुई और रुक गई. इस के साथ ही घोषणा होने लगी :

‘इस यात्रा में थोड़ा विलंब होगा. आप को हुई असुविधा के लिए खेद है.’ इस पर यात्रियों के चेहरे बिगड़ने लगे.

‘‘ओ...फ्...फो....या...र...व्हाट नानसेंस.’’

‘‘यार...यह तो रोजरोज की बात हो गई.’’

‘‘हर स्टेशन पर खड़ी हो जाती है.’’

‘‘आजकल रोज औफिस देर से पहुंचता हूं. बौस बहुत नाराज रहता है. उस को क्या पता कि मैट्रो की हालत क्या हो रही है,’’ एक ने अपनी परेशानी बताई.

‘‘एक दिन बौस को मैट्रो में ले आओ. उस को भी पता चल जाएगा,’’ इस मुफ्त की सलाह के साथ ही एक जोर का ठहाका लगा. किसी ने हंसतेहंसते कहा, ‘‘श्रीधरन को भी ले आओ. उसे भी इस रूट की हालत पता चल जाएगी.’’ और इसी के साथ सुझावों की झड़ी लग गई.

‘‘भाई साहब, जब तक कोच नहीं बढ़ेंगे तब तक समस्या नहीं सुलझेगी,’’ एक ने कहा.

‘‘मेरे खयाल में फ्रीक्वेंसी बढ़ानी चाहिए,’’ एक महिला ने बहुमूल्य सुझाव दिया.

‘‘फ्रीक्वेंसी बढ़ाने से कुछ नहीं होगा. कोच ही बढ़ाने चाहिए.’’

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