गृहशोभा विशेष

पहली नजर में वह मुझे कोई खास आकर्षक नहीं लगी थी. एक तरह से इतने दिनों का इंतजार खत्म हुआ था.

2 महीने से हमारे ऊपर वाला फ्लैट खाली पड़ा था. उस में किराए पर रहने के लिए नया परिवार आ रहा है, इस की खबर हमें काफी पहले मिल चुकी थी. उस परिवार में एक लड़की भी है, यह जान कर मुझे बड़ी खुशी हुई थी, पर जब देखा तो उस में कोई विशेष रुचि नहीं जागी थी मेरी.

उन्हें रहते हुए 1 महीना हो गया था, पर मेरी उस से कभी कोई बात नहीं हुई थी, न ही मैं ने कभी ऐसी कोशिश की थी.

एक दिन अप्रत्याशित रूप से उस से बातचीत करने का मौका मिला था. मेरे एक दोस्त की शादी में वे लोग भी आमंत्रित थे. उस ने गुलाबी रंग का सलवारकुरता पहन रखा था. माथे पर साधारण सी बिंदी थी और बाल कंधों पर झूल रहे थे. चेहरे पर कोई खास मेकअप नहीं था. न जाने क्यों उस का नाम जानने की इच्छा हुई तो मैं ने पूछा, ‘‘मैं आप के नीचे वाले फ्लैट में रहता हूं. क्या आप का नाम जान सकता हूं?’’

‘‘अनु. और आप का?’’ उस ने मुसकराते हुए पूछा.

‘‘अंकित,’’ मैं ने धीरे से कहा.

‘‘अंकित? मेरे चाचा के लड़के का भी यही नाम है, मुझे बहुत पसंद है यह नाम,’’ उस ने हंसते हुए कहा.

उस के खुले व्यवहार को देख कर उस से बातें करने की इच्छा हुई, पर तभी उस की सहेलियों का बुलावा आ गया और वह दूसरी ओर चली गई.

पहली मुलाकात के बाद ऐसा नहीं लगा कि मैं उसे पसंद कर सकता हूं.

दूसरे दिन जब मैं दफ्तर जाने के लिए घर से बाहर आया तो देखा कि वह सीढि़यां उतर रही है. वह मुसकराई, ‘‘हैलो.’’

‘‘हैलो,’’ मैं ने भी उस के अभिवादन का संक्षिप्त सा उत्तर दिया. बस, इस से अधिक कोई बात नहीं हुई थी.

इस के बाद बहुत दिनों तक हमारा आमनासामना ही नहीं हुआ. इस बीच मैं ने उस के बारे में सोचा भी नहीं. मैं सुबह 9 बजे ही दफ्तर चला जाता और शाम को 7 बजे तक घर आता था.

एक ही इमारत में रहने के कारण धीरेधीरे मेरे और उस के परिवार वालों का एकदूसरे के यहां आनाजाना शुरू हो गया. खानेपीने की चीजों का आदानप्रदान भी होने लगा, पर मैं ने किसी बहाने से कभी भी उस के घर जाने की कोशिश नहीं की थी.

एक दिन मां को तेज बुखार था. पिताजी दौरे पर गए हुए थे. मेरे दफ्तर में एक जरूरी मीटिंग थी इसलिए छुट्टी लेना असंभव था. मैं परेशान हो गया कि क्या करूं, मां को किस के हवाले छोड़ कर जाऊं? तभी मुझे अनु की मां का ध्यान आया. शायद वे मेरी कुछ मदद कर सकें. यह सोच कर मैं उन के घर पहुंचा.

दरवाजा अनु ने ही खोला. वह शायद कालेज के लिए निकलने ही वाली थी. उस के चेहरे पर खुशी व आश्चर्य के भाव दिखाई दिए, ‘‘आप, आइएआइए. आज सूरज पश्चिम से कैसे निकल आया है? बैठिए न.’’

‘‘नहीं, अभी बैठूंगा नहीं, जल्दी में हूं, चाचीजी कहां हैं?’’

‘‘मां? वे तो दफ्तर चली गईं.’’

‘‘ओह, तो वे नौकरी करती हैं?’’

‘‘हां, आप को कुछ काम था?’’

‘‘असल में मां को तेज बुखार है और मैं छुट्टी ले नहीं सकता क्योंकि आज मेरी बहुत जरूरी मीटिंग है. मैं सोच रहा था कि अगर चाचीजी होतीं तो मैं उन से थोड़ी देर मां के पास बैठने के लिए निवेदन करता, फिर मैं दफ्तर से जल्दी आता. खैर, मैं चलता हूं.’’

अनु कुछ सोच कर बोली, ‘‘ऐसा है तो मैं बैठती हूं चाचीजी के पास, आप दफ्तर चले जाइए.’’

‘‘पर, आप को तो कालेज जाना होगा?’’

‘‘कोई बात नहीं, एक दिन नहीं जाऊंगी तो कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा.’’

‘‘लेकिन…’’

‘‘आप निश्चिंत हो कर जाइए. मैं 2 मिनट में ताला लगा कर आती हूं.’’

मैं आश्वस्त हो कर दफ्तर चला गया. 3 बजे मैं घर आ गया. अनु मां के पास बैठी एक पत्रिका में डूबी हुई थी. मां उस समय सो रही थीं.

‘‘मां कैसी हैं अब?’’ मैं ने धीरे से पूछा.

‘‘ठीक हैं, बुखार नहीं है, उन से पूछ कर मैं ने दवा दे दी थी.’’

‘‘मैं आप का शुक्रिया किन शब्दों में अदा करूं,’’ मैं ने औपचारिकता निभाते हुए कहा.

‘‘अब वे शब्द भी मैं ही आप को बताऊं?’’ वह हंसते हुए बोली, ‘‘देखिए, मुझे कोई फिल्मी संवाद सुनाने की जरूरत नहीं है. कोई बहुत बड़ा काम नहीं किया है मैं ने,’’ कह कर वह खड़ी हो गई.

लेकिन मैं ने उसे जबरदस्ती बैठा दिया, ‘‘नहीं, ऐसे नहीं, चाय पी कर जाइएगा.’’

मैं चाय बनाने रसोई में चला गया. तब तक मां भी जाग गई थीं. हम तीनों ने एकसाथ चाय पी.

उस दिन अनु मुझे बहुत अच्छी लगी थी. अनु के जाने के बाद मैं देर तक उसी के बारे में सोचता रहा.

हमारा आनाजाना अब बढ़ गया था. वह भी कभीकभी आती. मैं भी उस के घर जाने लगा था.

फिर यह कभीकभी का आनाजाना रोज में तबदील होने लगा. जिस दिन वह नहीं मिलती थी, कुछ अधूरा सा लगता था.

धीरेधीरे मेरे मन में अनु के प्रति आकर्षण बढ़ता जा रहा था. क्या मैं वास्तव में उसे चाहने लगा था? इस का निश्चय मैं स्वयं नहीं कर पा रहा था. उस का आना, उसे देखना, उस से बातें करना आदि अच्छा लगता था. पर एक बात जो मेरे मन में शुरू से ही बैठ गई थी कि वह बहुत सुंदर नहीं है, हमेशा मेरा निश्चय डगमगा देती.

अपनी कल्पना में शादी के लिए जैसी लड़की मैं ने सोच रखी थी, वह बहुत ही सुंदर होनी चाहिए थी. लंबा कद, दुबलीपतली, गोरी, तीखे नैननक्श. मेरे खींचे गए काल्पनिक खाके में अनु फिट नहीं बैठती थी. केवल यही बात उस से मुझे कुछ भी कहने से रोक लेती थी.

अनु ने भी कभी कुछ नहीं कहा मुझ से पर उसे भी मेरी मौजूदगी पसंद थी, इस का एहसास मुझे कभीकभी होता था. पर मैं ने कभी आजमाना नहीं चाहा. मैं स्वयं ही इस संबंध में कोई निर्णय नहीं ले पा रहा था और न ही मैं कुछ कह पाया था.

एक दिन अनु पिकनिक से लौट कर मुझे वहां के किस्से सुनाने लगी. बातों ही बातों में उस ने बताया, ‘‘आज हम लोग पिकनिक पर गए थे. वहां एक ज्योतिषी बाबा थे. सब लड़कियां उन्हें हाथ दिखा रही थीं. मैं ने भी अपना हाथ दिखा दिया. वैसे मुझे इन बातों पर कोई विश्वास नहीं है, फिर भी न जाने क्यों दिखा ही दिया. जानते हैं उस ने क्या कहा?’’

‘‘क्या?’’ मैं ने उत्सुकतावश पूछा.

अनु ज्योतिषी की नकल करते हुए बोली, ‘‘बेटी, तुम्हारे भाग्य में 2 शादियां लिखी हैं. पहली शादी के 2 महीने बाद तुम्हारा पति मर जाएगा लेकिन दूसरी शादी के बाद तुम्हारा जीवन सुखी हो जाएगा.’’

कह कर अनु खिलखिला कर हंस पड़ी लेकिन मैं सन्न रह गया. इस बात को कोई तूल न देते हुए वह आगे भी कई बातें बताती गई, पर मैं कुछ न सुन सका.

बचपन से ही दादादादी, मां और पिताजी को ज्योतिषियों पर विश्वास करते देखा था. हमारे घर सुखेश्वर स्वामी हर महीने आया करते थे. वे ग्रहों व नक्षत्रों की स्थिति देख कर जैसा करने को कहते थे, हम वैसा ही करते. ज्योतिष पर मेरा दृढ़ विश्वास था.

अनु की कही बात इतनी गहराई से मेरे मन में उतर गई कि उस रात मैं सो नहीं सका. करवटें बदलते हुए सोचता रहा कि मैं तो अनु के साथ जीना चाहता हूं, मरना नहीं. फिर क्या उस की दूसरी शादी मुझ से होगी? मगर मैं तो शादी ही नहीं करना चाहता था. फिर कैसा तनाव हो गया था, मेरे मस्तिष्क में.

गृहशोभा विशेष

मैं अगले कई दिनों तक अनु का सामना नहीं कर सका. किसी न किसी बहाने उस से दूर रहने की कोशिश करने लगा. मगर 2-3 दिनों में ही वह सबकुछ समझ गई.

एक शाम मैं अपनी बालकनी में बैठा था कि तभी अनु आई और मेरे पास ही चुपचाप खड़ी हो गई. मैं कुछ नहीं बोल पाया. वह काफी देर तक खड़ी रही. फिर पलट कर वापस जाने लगी तो मैं ने पुकारा, ‘‘अनु.’’

‘‘हूं,’’ वह मेरी ओर मुड़ी. उस की भीगी पलकें देख कर मैं भावविह्वल हो उठा, ‘‘अनु, क्या हुआ? तुम…?’’

‘‘मुझ से ऐसी क्या गलती हो गई जो आप मुझ से नाराज हो गए. ये 3 दिन बरसों के समान भारी थे मुझ पर. यों तो एक पल भी आप के बिना…’’ वाक्य पूरा करने से पहले ही उस की आवाज रुंध गई और वह भाग कर बाहर चली गई.

मैं अवाक् सा कुरसी पर बैठा रह गया. मेरे हाथपैरों में इतनी हिम्मत नहीं रह गई थी कि उठ कर उसे रोकता और उस से कह देता, ‘हां अनु, मैं भी तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.’

अनु चली गई थी. उस की बातें सुन कर मैं बेचैन हो उठा. वह वास्तव में मुझे चाहती थी, इस बात का मुझे यकीन नहीं हो रहा था.

मैं खानापीना, सोना सब भूल गया. निर्णय लेने की शक्ति जैसे समाप्त हो चुकी थी. अनु के इजहार के बाद मैं भी उस से मिलने का साहस नहीं कर पा रहा था.

इस के बाद अनु मुझे बहुत दिनों तक दिखाई नहीं दी. एक दिन अचानक पता चला कि उसे कुछ लोग देखने आ रहे हैं. एकाएक मैं बहुत परेशान हो गया. इस बारे में तो मैं ने सोचा ही नहीं था. लड़का खुद भी अनु को देखने आ रहा था. अनु बहुत गंभीर थी. मेरा उस से सामना हुआ, पर वह कुछ नहीं बोली.

दूसरे दिन पता चला कि उन्होंने अनु को पसंद कर लिया है. अब सगाई की तारीख पक्की करने फिर आएंगे.

सुन कर मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी कोई बहुत प्रिय चीज मुझ से छीनी जा रही हो, लेकिन उस वक्त मैं बिलकुल बेजान सा हो गया था, जैसे कुछ सोचने और करने की हिम्मत ही न रह गई हो. सारा दिन अकेले बैठ कर सोचता कि अगर अनु सचमुच मुझे पसंद करती है तो उस ने किसी और से शादी के लिए हां क्यों कर दी. फिर वह इतनी सुंदर भी नहीं जितनी कि मैं चाहता हूं. उस से ज्यादा खूबसूरत लड़की भी मुझे मिल सकती है. फिर अनु ही क्यों? और वह ज्योतिषी वाली बात… 2 शादियां… विधवा…यह सब सोचसोच कर मैं पागल सा हो जाता.

एक हफ्ता यों ही बीत गया. इस बीच अनु जब भी दिखती मैं उस से नजरें चुरा लेता. 7-8 दिन बाद लड़के वाले फिर आए और आगामी माह को सगाई की कोई तारीख पक्की कर के चले गए.

मैं खोयाखोया सा रहने लगा. सगाई की तारीख पक्की होने के बाद अनु फिर मेरे घर आनेजाने लगी. जब भी आती, मुझ से पहले की तरह बातें करती, पर मैं असामान्य हो चला था. शादी के विषय में न मैं ने उस से कोई बात की थी और न ही बधाई दी थी.

अनु के घर सगाई की तैयारियां शुरू हो गई थीं. सगाई व शादी में

10 दिनों का अंतर था. मैं अपना मानसिक तनाव कम करने के लिए दूसरे शहर अपनी बूआ के घर चला गया था. वहीं पर 20-25 दिनों तक रुका रहा क्योंकि अनु की शादी देख पाना असह्य था मेरे लिए.

जब मैं वापस आया, अनु ससुराल जा चुकी थी. मैं अपना मन काम में लगाने लगा. मगर मेरे दिलोदिमाग पर अनु का खयाल इस कदर हावी था कि उस के अलावा मैं कुछ सोच ही नहीं पाता था.

कुछ दिनों के बाद मेरे घर में भी मेरी शादी की बात छिड़ गई. मां ने कहा, ‘‘अब तेरे लिए लड़की देखनी शुरू कर दी है मैं ने.’’

‘‘नहींनहीं, अभी रुक जाइए. 2-3 महीने…’’ मैं ने मां से कहा.

‘‘क्यों? 27 वर्ष का तो हो गया है. अधेड़ हो कर शादी करेगा क्या? फिर यह 2-3 महीने का क्या चक्कर है? मैं यह सब नहीं जानती. यह देख 3 फोटो हैं. इन में से कोई पसंद हो तो बता दे.’’

मां का मन रखने के लिए मैं ने तीनों फोटो देखी थीं.

‘‘देख, इस के नैननक्श काफी आकर्षक लग रहे हैं. रंग भी गोरा है. कद 5 फुट 4 इंच है.’’

पर मुझे उस में कोई सुंदरता नजर नहीं आ रही थी. फोटो में मुझे अनु ही दिखाई दे रही थी. मैं ने मां से कहा, ‘‘नहीं मां, अभी थोड़ा रुक जाओ.’’

‘‘क्यों? क्या तू ने कोई लड़की पसंद कर रखी है? देर करने का कोई कारण भी तो होना चाहिए?’’

मैं चुप रह गया. क्या जवाब देता, पर मैं सचमुच इंतजार कर रहा था कि कब अनु विधवा हो और कब मैं अपने मन की बात उस से कहूं.

शादी के 2 महीने बाद अनु पहली बार मायके आई तो हमारे घर भी आई. शादी के बाद वह बहुत बदल गई थी. साड़ी में उसे देख कर मन में हूक सी उठी कि अनु तो मेरी थी, मैं ने इसे किसी और की कैसे हो जाने दिया.

‘‘कैसी हो, अनु?’’ मैं ने पूछा था.

‘‘अच्छी हूं.’’

‘‘खुश हो?’’

‘‘हां, बहुत खुश हूं. आप कैसे हैं?’’

‘‘ठीक हूं. तुम्हारे पति का स्वास्थ्य कैसा है?’’ अचानक ही मैं यह अटपटा सा प्रश्न कर बैठा था.

वह आश्चर्य से मेरी ओर देखते

हुए बोली, ‘‘क्यों, क्या हुआ है,

उन्हें?’’

‘‘नहीं, यों ही पूछा था,’’ मैं ने हड़बड़ा कर बात को संभाला, ‘‘वे तुम्हारे साथ नहीं दिखे. इसलिए…’’

‘‘ओह, लेकिन वे तो मेरे साथ ही आए हैं. घर पर आराम कर रहे हैं.’’

‘‘अच्छा.’’

अनु चली गई. उसे खुश देख कर मेरा मन बुझ गया. मुझ से दूर जा कर जब उसे कुछ महसूस नहीं हुआ तो मैं ही क्यों पागलों के समान उस की राह देखता हूं. अनु के खयाल को मैं ने दिमाग से झटक देना चाहा.

इस बीच मां रोज ही किसी न किसी लड़की का जिक्र मेरे सामने छेड़ देतीं, लेकिन मैं टालता रहता क्योंकि मन में एक आशा बंधी थी कि शायद ज्योतिषी की बात सच हो जाए.

वक्त धीरेधीरे सरकता रहा. देखते ही देखते 4 साल बीत गए. मैं इंतजार करता रहा, पर ज्योतिषी की भविष्यवाणी सत्य सिद्ध नहीं हुई. अनु अपने पति के साथ हंसीखुशी जीवन व्यतीत कर रही थी.

मैं अपना सबकुछ खो चुका था. ये

4 साल मुझ पर एक सदी से भी भारी थे. एकएक पल मैं ने किसी मनचाही खबर के इंतजार में गुजारा था. लेकिन वह समाचार मुझ तक कभी नहीं पहुंचा. मैं बहुत स्थायी हो गया था. स्वार्थ इंसान को इस कदर नीचे गिरा देता है, आज सोचता हूं तो आत्मग्लानि से भर उठता हूं.

मां बहुत बीमार थीं. उस दिन वे मुझ से रोते हुए बोलीं, ‘‘अंकित, तू मुझे चैन से मरने भी देगा या नहीं?’’

एक दिन उन्होंने मुझे शादी के लिए मजबूर कर दिया. मैं मन से अनु का था, यह बात मैं उन्हें कैसे बताता. मां से तो क्या, यह बात मैं किसी से भी नहीं कह पाया था, अनु से भी नहीं. काश, मैं ने उस से इस संबंध में कुछ कह दिया होता.

मैं ने मां की बात मान ली. वक्त का महत्त्व मुझे अच्छी तरह समझ आ चुका था कि जो लोग वक्त के साथ नहीं चलते, वक्त भी उन का साथ छोड़ देता है.

अकसर मैं सोचता कि अनु की शादी तय होने के वक्त मैं कहां था. सड़क के किनारे धूनी रमाए किसी ज्योतिषी ने अनु से यों ही कुछ कह दिया और मैं ने आंखें मूंद कर उस पर विश्वास कर लिया, जबकि अनु ने खुद उस का विश्वास कभी नहीं किया.

न जाने क्यों उस वक्त मैं अपार सुंदरता को पाना चाहता था. आत्मविश्वास की कमी या निर्णय ले पाने की अक्षमता में मैं ने खुद ही वह सुनहरा अवसर खो दिया था. कुछ अनोखा पाने की चाह में जो कुछ सामने था, उसे स्वीकार नहीं कर सका और भटकता रहा. मगर मेरी तलाश कभी खत्म नहीं हुई क्योंकि मन का रिश्ता सुंदरता के सारे आयामों से ऊपर होता है और मन ने जो कुछ कहा मैं ने उसे कभी नहीं सुना. महज एक ज्योतिषी की बात मान कर अपनी जिंदगी की सब से अनमोल चीज खो दी थी.

मां की बात मान कर मैं ने उन्हें लड़की पसंद करने के लिए कहा क्योंकि पसंदनापसंद करने की और दोष निकालने की मेरी उम्र बीत चुकी थी.

पर मां बोलीं, ‘‘नहीं, ऐसे नहीं, तू खुद ही पहले लड़की देख ले. बाद का झंझट मुझे पसंद नहीं.’’

‘‘नहीं मां, मैं वादा करता हूं, ऐसा कभी नहीं होगा,’’ मैं ने धीरे से कहा.

मां ने श्रद्धा को पसंद किया. एक साधारण सा सगाई समारोह हुआ. श्रद्धा को उसी दिन देखा था. एक उड़ती सी दृष्टि डाली थी मैं ने उस पर, पर उस ने मुझे कुछ ऐसे देखा था जैसे बरसों से जानती हो.

एक पल में अनु की तुलना मैं ने श्रद्धा से कर डाली. सगाई की अंगूठी पहनाते वक्त भी मैं अनु के बारे में ही सोच रहा था. श्रद्धा से मेरी कोई बात ही नहीं हो पाई.

फिर हमारी शादी हो गई. शादी में अनु भी अपने पति के साथ आई थी. उसे देख कर जख्म फिर ताजा हो गया. फेरों से पहले तक मन में एक उम्मीद बंधी थी.

मां से वादा किया था. फिर श्रद्धा अब मेरी पत्नी थी. अनु को अब मुझे भूलना ही होगा, यह सोच कर मैं ने श्रद्धा से कहा था, ‘‘आज हमारी शादी की पहली रात है. वादा करो कि हर कदम पर मेरा साथ दोगी. अगर कभी मैं कहीं कमजोर पड़ गया तो सहारा दे कर मुझे संभाल लोगी.’’

‘‘आप जैसा चाहेंगे मैं वैसे ही बन कर रहूंगी. अब तो मेरा जीवन ही आप का है. पर यह कमजोर पड़ने वाली बात आप ने क्यों कही?’’

‘‘ऐसे ही. कभीकभी जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं जब इंसान किसी गलत इच्छा या गलत भावना के वशीभूत हो कर कोई गलत काम कर बैठता है. बस, उस समय तुम मुझे संभाल लेना.’’

अनु के बारे में कुछ बताने की मैं ने आवश्यकता नहीं समझी. मैं नए सिरे से जिंदगी शुरू करना चाहता था.

श्रद्धा मेरे लिए बहुत ही अच्छी पत्नी साबित हुई. उस के आते ही मां के स्वास्थ्य में भी सुधार होने लगा. वह मेरा पूरा खयाल रखती थी. दूसरी ओर, मैं भी अपनी ओर से कोई कमी न रखता.

दीवाली नजदीक आ रही थी. अनु मायके आई हुई थी. उस के घर में पुताई हो रही थी. सारा सामान इधरउधर फैला हुआ था. श्रद्धा और मैं अनु से मिलने उस के घर गए. श्रद्धा काम में अनु की मदद कराने लगी, मैं भी मदद कराने के उद्देश्य से इधरउधर फैली हुई किताबें समेटने लगा. अचानक एक डायरी मेरे हाथों से गिर कर खुल गई.

अनु की लिखावट थी, ‘अंकित को…’ मैं अपना नाम पढ़ कर चौंक गया. मैं ने इधरउधर देखा. अनु की पीठ मेरी ओर थी.

मैं ने झुक कर डायरी उठा ली और पढ़ने लगा.

‘जितना मैं अंकित को चाहती हूं. काश, वह भी मुझे उतना ही चाहता. कल मेरी शादी है. मैं किसी और की हो जाऊंगी. काश, मैं अंकित की हो पाती…’

इस के आगे मैं नहीं पढ़ सका. मेरी आंखें नम हो उठीं. अचानक अनु मेरी ओर मुड़ी. फिर चौंक कर बोली, ‘‘अरे, यह तो मेरी डायरी है, आप ने पढ़ी तो नहीं?’’

‘‘नहीं अनु, मैं ने कुछ भी नहीं पढ़ा. यह लो अपनी डायरी.’’

अनु ने मेरे हाथों से डायरी खींच ली. वह पलट कर अंदर जाने लगी तो मैं ने उसे पुकारा, ‘‘अनु.’’

‘‘जी.’’

‘‘सुनो.’’

‘‘क्या बात है?’’

‘‘कुछ नहीं.’’

फिर न जाने क्यों उस के सिर पर हाथ रख कर बोला, ‘‘सदा सुखी रहो.’’

अनु मेरी ओर देखती रह गई. श्रद्धा भी बाहर आ गई थी. मैं उस से बोला, ‘‘चलो श्रद्धा, घर चलें. मां इंतजार कर रही होंगी.’’

फिर अनु की ओर देखे बिना मैं श्रद्धा को साथ ले कर अपने घर वापस आ गया.

– शिखा मिड्ढा

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