रामदुलारे गए अयोध्या

By Dr. vishnu virat | 13 September 2017
रामदुलारे गए अयोध्या

रामदुलारे के मन में बड़ी साध थी कि जिंदगी में एक बार ‘गंगा स्नान’ कर आता. कहते हैं कि गंगा स्नान से अगलेपिछले सारे ‘पाप’ धुल जाते हैं. रामदुलारे भी अपने पापों को धोना चाहता था.  तभी उस ने सुना कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर की कारसेवा के लिए जो लोग जाएंगे, उन के टिकट की व्यवस्था एक ट्रस्ट करेगा. रामभक्त कारसेवा में जाने के लिए पहले से नाम लिखवा दें.

रामदुलारे को यह खबर मोहन ने दी. उस ने बतलाया, ‘‘रामदुलारे, हो आ लखनऊ, बनारस...रेले में निकल जाएगा. ‘‘फोकट में तीर्थयात्रा का आनंद ले. वहां का खर्चा तो तू निकाल ही लेगा. बड़ा जमघट होगा. थोड़ी हाथ की सफाई दिखाएगा तो पौबारह हो जाएगी. अपना कल्लू तो पार्टी के साथ गया है. वहां महाराष्ट्र के 55 छोकरों की पार्टी है. सब के सब प्रशिक्षित हैं. वहां लखनऊ में दूसरी शाखा के छोकरे मिल कर काम करेंगे.’’

रामदुलारे बोला, ‘‘उन की बात छोड़, उन की पूरी सरकार है, मंत्री हैं, अध्यक्ष है, मंत्रिपरिषद है, प्रशिक्षक है, गुंडे- बदमाश हैं. फिर उन का संविधान है, कायदाकानून है, अनुशासन है. अपना मिजाज उन से नहीं मिलता. 100 कमाओ और 80 सरकार को दो. अपने को यह मगजमारी पसंद नहीं. मोहन, मैं वहां धर्म के नाम पर पाप कम करने जा रहा हूं, रामभक्तों की जेब काट कर पाप बढ़ाने नहीं जा रहा. मेहनतमजदूरी कर लूंगा. गंगाजी में पुराने पापों का बंडल छोड़ दूंगा. फिर कोई अच्छा सा व्यापार करूंगा.’’

मोहन अपनी बात कह कर चला गया. रामदुलारे इस समय ‘पुण्य’ कमाने के चक्कर में था. गांधीजी, गौतमबुद्ध, विवेकानंद की तसवीरें खरीद कर कमरे में टांग चुका था. अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी, जैकी श्रौफ, जयश्री टी. की तसवीरों का अग्निदाह कर चुका था. 6 दिन हो गए थे, ठर्रे को हाथ भी नहीं लगाया, न रज्जोबाई के घुंघरू सुनने गया. बहुत दिन से ‘धंधे’ पर भी नहीं निकला था. पुलिस का दीवान आया तो उसे आखिरी ‘हफ्ता’ दे दिया और कह दिया, ‘‘अपन अब रिटायर हुआ दीवानजी, अपना हफ्ता बंद, अब आगे से अपन धंधे पर नहीं निकलेगा.’’  दीवान ने हाथ का डंडा हवा में हिलाते हुए कहा, ‘‘ठीक है, लेकिन बाद में धंधे पर मिला तो ‘फार्मूला फोर’ फिट कर दूंगा. तू समझता है न...अपना नाम यशवंत भाई हनुमंत भाई मोछड़ है. अपने से ज्यादा होशियारी नहीं दिखाने का.’’

आगापीछा सोच कर आखिर रामदुलारे पार्टी के दफ्तर में जा कर कारसेवकों के पहले जत्थे में ही नाम लिखा आया.  तीसरे दिन स्टेशन पर वह अपना थैला ले कर पहुंच गया. दूसरे कारसेवकों के साथ उसे एक तरफ खड़ा किया गया. फिर शहर के लोगों ने सब को मालाएं पहनाईं, बढि़या गुलाब और सूर्यमुखी की मालाएं. रामदुलारे के गले में माला डालने का यह दूसरा अवसर था. पहले कभी शादी के समय उस की पत्नी ने कनेर के फूलों की माला डाली थी उस के गले में, और फिर उसी के गले से जोंक की तरह चिपट गई.

उस समय रामदुलारे उड़ान पर था. गांव में ‘शहरी बाबू’ कहा जाता था. टैरीकौट की पैंट और नाइलौन की कमीज पहन कर हाथ में ट्रांजिस्टर ले कर घूमता था. कल्लू उस्ताद के स्कूल में प्रशिक्षित हो चुका था. धंधे में लग गया था. बांद्रा में एक झोंपड़पट्टी भी ले ली थी. एक पुरानी साइकिल भी खरीद ली थी. हाथ में घड़ी, जेब में पैन, होंठों पर सिगरेट, देव आनंद की तरह सजीसंवरी जुल्फें, बड़े ठाट थे उन दिनों रामदुलारे के. अपनी गाढ़ी कमाई में से 100-50 रुपए घर भी भेज देता था.  खैर, इस बार माला पहनने वालों को वह जानता था कि ये लोग लीडर हैं. चुनाव जीते हुए नेता हैं. उन्होंने माला पहनाई और हाथ जोड़े. बजरंग दल का एक नेता कह रहा था, ‘‘आप लोगों के खानेपीने का प्रबंध कर दिया है, बड़ौदा स्टेशन पर आप को खाने के पैकेट मिल जाएंगे. मानव बिंदु चैरीटेबल ट्रस्ट, मुंबई के अध्यक्ष गिरधरलाल ने सब कारसेवकों को हाथ-खर्चे के लिए 100-100 रुपए दिए हैं. आप को ये रुपए सूरत में मिल जाएंगे.

‘‘आप शाम को बड़ौदा पहुंचेंगे. वहां के दल वाले आप का स्वागत करेंगे और रात में चलने वाली साबरमती ऐक्सप्रैस में आप को आरक्षित सीट दिलवा देंगे. आप तीसरे दिन लखनऊ पहुंच जाएंगे. फिर वहां की व्यवस्था गुजरात दल करेगा. अच्छा भाइयो, बोलो प्रेम से राजा रामचंद्र की जय.’’

सब ने जयघोष किया. प्लेटफौर्म जयघोष से गूंज उठा. पत्रकार खड़े संवाद लिख रहे थे. फोटोग्राफर फोटो खींच रहे थे. एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति से पूछा, ‘‘काहे का लफड़ा है? हज करने जाता है क्या?’’

‘‘नहीं भाई, ये हिंदू लोग हैं...जैसे दूसरे गांव से गाय, भैंस, बकरा इधर मुंबई में कटने के वास्ते आता है न, ऐसे ही मरने के वास्ते इन को अयोध्या भेजते हैं अपने नेता लोग. ये सब वहां पुलिस और फौज की बंदूकों से अपने प्राण देंगे. इसी वास्ते इन की इतनी खातिर होती है.’’

तभी पास खड़े एक दूसरे सज्जन बीच में ही बोल पड़े, ‘‘काहे को गलत बात बोलता है, ये सब रामभक्त हैं. ‘भगवान’ की सेवा में जाते हैं. तुम वी.पी. सिंह का आदमी मालूम पड़ता है...’’ और अचानक उस ने उस व्यक्ति का गरीबान पकड़ लिया और जोरजोर से चीखने लगा, ‘‘वी.पी. सिंह का मानस है, मारो इस को.’’  एकाएक भीड़ के तेवर बदल गए. सब लोग उस आदमी पर टूट पड़े. प्लेटफौर्म पर होहल्ला मच गया. फिर अचानक भागमभाग मच गई. किसी ने रामपुरी चाकू उस आदमी की पसली में उतार दिया था. उस के पास ही खड़े, उस से बात करने वाले दूसरे आदमी की गरदन पर भी चाकू के 3 वार हो चुके थे. तभी पुलिस के जवान आ गए. प्लेटफौर्म पर सीटियां बजने लगीं. लाठीचार्ज हो गया. रामदुलारे अन्य रामभक्तों के साथ सामने खड़ी रेल में घुस गया. स्वागतसत्कार करने वाले स्वयंसेवकों तथा भाषण देने वाले नेताओं का कहीं पता न था. प्लेटफौर्म पर ढेर सारी मालाएं टूटी पड़ी थीं.

तभी पीछे से 50-60 आदमियों ने नारे लगाए, ‘‘हम सब हिंदू एक हैं...जिंदाबाद, जिंदाबाद. बजरंग दल जिंदाबाद. जिंदाबाद, जिंदाबाद, भवानी दल जिंदाबाद...जिंदाबाद, जिंदाबाद, शिवसेना जिंदाबाद, हिंदू परिषद जिंदाबाद...लाठीगोली खाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे, बच्चाबच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का.’’  एक बार तो रामदुलारे के मन में आया कि रेल के डब्बे से उतर कर भाग जाए. फिर मन मजबूत किया. तभी कुछ बाहरी लोगों ने उन के डब्बे पर पथराव कर दिया. सटासट खिड़कियां बंद हो गईं. लोग दरवाजों से सट गए. तभी गाड़ी चल पड़ी.

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