रामदुलारे गए अयोध्या

By Dr. vishnu virat | 13 September 2017
रामदुलारे गए अयोध्या

रामदुलारे के मन में बड़ी साध थी कि जिंदगी में एक बार ‘गंगा स्नान’ कर आता. कहते हैं कि गंगा स्नान से अगलेपिछले सारे ‘पाप’ धुल जाते हैं. रामदुलारे भी अपने पापों को धोना चाहता था.  तभी उस ने सुना कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर की कारसेवा के लिए जो लोग जाएंगे, उन के टिकट की व्यवस्था एक ट्रस्ट करेगा. रामभक्त कारसेवा में जाने के लिए पहले से नाम लिखवा दें.

रामदुलारे को यह खबर मोहन ने दी. उस ने बतलाया, ‘‘रामदुलारे, हो आ लखनऊ, बनारस...रेले में निकल जाएगा. ‘‘फोकट में तीर्थयात्रा का आनंद ले. वहां का खर्चा तो तू निकाल ही लेगा. बड़ा जमघट होगा. थोड़ी हाथ की सफाई दिखाएगा तो पौबारह हो जाएगी. अपना कल्लू तो पार्टी के साथ गया है. वहां महाराष्ट्र के 55 छोकरों की पार्टी है. सब के सब प्रशिक्षित हैं. वहां लखनऊ में दूसरी शाखा के छोकरे मिल कर काम करेंगे.’’

रामदुलारे बोला, ‘‘उन की बात छोड़, उन की पूरी सरकार है, मंत्री हैं, अध्यक्ष है, मंत्रिपरिषद है, प्रशिक्षक है, गुंडे- बदमाश हैं. फिर उन का संविधान है, कायदाकानून है, अनुशासन है. अपना मिजाज उन से नहीं मिलता. 100 कमाओ और 80 सरकार को दो. अपने को यह मगजमारी पसंद नहीं. मोहन, मैं वहां धर्म के नाम पर पाप कम करने जा रहा हूं, रामभक्तों की जेब काट कर पाप बढ़ाने नहीं जा रहा. मेहनतमजदूरी कर लूंगा. गंगाजी में पुराने पापों का बंडल छोड़ दूंगा. फिर कोई अच्छा सा व्यापार करूंगा.’’

मोहन अपनी बात कह कर चला गया. रामदुलारे इस समय ‘पुण्य’ कमाने के चक्कर में था. गांधीजी, गौतमबुद्ध, विवेकानंद की तसवीरें खरीद कर कमरे में टांग चुका था. अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी, जैकी श्रौफ, जयश्री टी. की तसवीरों का अग्निदाह कर चुका था. 6 दिन हो गए थे, ठर्रे को हाथ भी नहीं लगाया, न रज्जोबाई के घुंघरू सुनने गया. बहुत दिन से ‘धंधे’ पर भी नहीं निकला था. पुलिस का दीवान आया तो उसे आखिरी ‘हफ्ता’ दे दिया और कह दिया, ‘‘अपन अब रिटायर हुआ दीवानजी, अपना हफ्ता बंद, अब आगे से अपन धंधे पर नहीं निकलेगा.’’  दीवान ने हाथ का डंडा हवा में हिलाते हुए कहा, ‘‘ठीक है, लेकिन बाद में धंधे पर मिला तो ‘फार्मूला फोर’ फिट कर दूंगा. तू समझता है न...अपना नाम यशवंत भाई हनुमंत भाई मोछड़ है. अपने से ज्यादा होशियारी नहीं दिखाने का.’’

आगापीछा सोच कर आखिर रामदुलारे पार्टी के दफ्तर में जा कर कारसेवकों के पहले जत्थे में ही नाम लिखा आया.  तीसरे दिन स्टेशन पर वह अपना थैला ले कर पहुंच गया. दूसरे कारसेवकों के साथ उसे एक तरफ खड़ा किया गया. फिर शहर के लोगों ने सब को मालाएं पहनाईं, बढि़या गुलाब और सूर्यमुखी की मालाएं. रामदुलारे के गले में माला डालने का यह दूसरा अवसर था. पहले कभी शादी के समय उस की पत्नी ने कनेर के फूलों की माला डाली थी उस के गले में, और फिर उसी के गले से जोंक की तरह चिपट गई.

उस समय रामदुलारे उड़ान पर था. गांव में ‘शहरी बाबू’ कहा जाता था. टैरीकौट की पैंट और नाइलौन की कमीज पहन कर हाथ में ट्रांजिस्टर ले कर घूमता था. कल्लू उस्ताद के स्कूल में प्रशिक्षित हो चुका था. धंधे में लग गया था. बांद्रा में एक झोंपड़पट्टी भी ले ली थी. एक पुरानी साइकिल भी खरीद ली थी. हाथ में घड़ी, जेब में पैन, होंठों पर सिगरेट, देव आनंद की तरह सजीसंवरी जुल्फें, बड़े ठाट थे उन दिनों रामदुलारे के. अपनी गाढ़ी कमाई में से 100-50 रुपए घर भी भेज देता था.  खैर, इस बार माला पहनने वालों को वह जानता था कि ये लोग लीडर हैं. चुनाव जीते हुए नेता हैं. उन्होंने माला पहनाई और हाथ जोड़े. बजरंग दल का एक नेता कह रहा था, ‘‘आप लोगों के खानेपीने का प्रबंध कर दिया है, बड़ौदा स्टेशन पर आप को खाने के पैकेट मिल जाएंगे. मानव बिंदु चैरीटेबल ट्रस्ट, मुंबई के अध्यक्ष गिरधरलाल ने सब कारसेवकों को हाथ-खर्चे के लिए 100-100 रुपए दिए हैं. आप को ये रुपए सूरत में मिल जाएंगे.

‘‘आप शाम को बड़ौदा पहुंचेंगे. वहां के दल वाले आप का स्वागत करेंगे और रात में चलने वाली साबरमती ऐक्सप्रैस में आप को आरक्षित सीट दिलवा देंगे. आप तीसरे दिन लखनऊ पहुंच जाएंगे. फिर वहां की व्यवस्था गुजरात दल करेगा. अच्छा भाइयो, बोलो प्रेम से राजा रामचंद्र की जय.’’

सब ने जयघोष किया. प्लेटफौर्म जयघोष से गूंज उठा. पत्रकार खड़े संवाद लिख रहे थे. फोटोग्राफर फोटो खींच रहे थे. एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति से पूछा, ‘‘काहे का लफड़ा है? हज करने जाता है क्या?’’

‘‘नहीं भाई, ये हिंदू लोग हैं...जैसे दूसरे गांव से गाय, भैंस, बकरा इधर मुंबई में कटने के वास्ते आता है न, ऐसे ही मरने के वास्ते इन को अयोध्या भेजते हैं अपने नेता लोग. ये सब वहां पुलिस और फौज की बंदूकों से अपने प्राण देंगे. इसी वास्ते इन की इतनी खातिर होती है.’’

तभी पास खड़े एक दूसरे सज्जन बीच में ही बोल पड़े, ‘‘काहे को गलत बात बोलता है, ये सब रामभक्त हैं. ‘भगवान’ की सेवा में जाते हैं. तुम वी.पी. सिंह का आदमी मालूम पड़ता है...’’ और अचानक उस ने उस व्यक्ति का गरीबान पकड़ लिया और जोरजोर से चीखने लगा, ‘‘वी.पी. सिंह का मानस है, मारो इस को.’’  एकाएक भीड़ के तेवर बदल गए. सब लोग उस आदमी पर टूट पड़े. प्लेटफौर्म पर होहल्ला मच गया. फिर अचानक भागमभाग मच गई. किसी ने रामपुरी चाकू उस आदमी की पसली में उतार दिया था. उस के पास ही खड़े, उस से बात करने वाले दूसरे आदमी की गरदन पर भी चाकू के 3 वार हो चुके थे. तभी पुलिस के जवान आ गए. प्लेटफौर्म पर सीटियां बजने लगीं. लाठीचार्ज हो गया. रामदुलारे अन्य रामभक्तों के साथ सामने खड़ी रेल में घुस गया. स्वागतसत्कार करने वाले स्वयंसेवकों तथा भाषण देने वाले नेताओं का कहीं पता न था. प्लेटफौर्म पर ढेर सारी मालाएं टूटी पड़ी थीं.

तभी पीछे से 50-60 आदमियों ने नारे लगाए, ‘‘हम सब हिंदू एक हैं...जिंदाबाद, जिंदाबाद. बजरंग दल जिंदाबाद. जिंदाबाद, जिंदाबाद, भवानी दल जिंदाबाद...जिंदाबाद, जिंदाबाद, शिवसेना जिंदाबाद, हिंदू परिषद जिंदाबाद...लाठीगोली खाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे, बच्चाबच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का.’’  एक बार तो रामदुलारे के मन में आया कि रेल के डब्बे से उतर कर भाग जाए. फिर मन मजबूत किया. तभी कुछ बाहरी लोगों ने उन के डब्बे पर पथराव कर दिया. सटासट खिड़कियां बंद हो गईं. लोग दरवाजों से सट गए. तभी गाड़ी चल पड़ी.

रामदुलारे का दूसरे साथियों से परिचय हुआ. सभी भक्त और सेवक थे. रामदुलारे की बिरादरी का कोई भी नहीं था. अच्छे परिवारों के खातेपीते लोग थे. जब से गाड़ी चली थी, भजनकीर्तन प्रारंभ हो गया था. सभी भक्तिरस में डूबे हुए थे. हर स्टेशन पर मालाओं से स्वागत हो रहा था. भोजन के पैकेट मिल रहे थे. हाथखर्च भी ईमानदारी से मिल गया था. इतना स्वागत तो रामदुलारे की सात पुश्तों में किसी का नहीं हुआ था. धीरेधीरे वह ‘रामभक्त’ होता जा रहा था.   रतलाम स्टेशन पर उतर कर वह टहलने लगा. तभी सामने से पूरन और लल्लन साथ आते दिखाई दिए. पुराने साथी थे रामदुलारे के. वे सब बड़े जोश में मिले. कोटा, रतलाम डिवीजन का इलाका पूरन और लल्लन का था. अच्छे कलाकार थे. इन के दल में लल्लन तो राष्ट्रीय स्तर का कलाकार था. जब हिंदुस्तान में टीवी आया भी नहीं था तभी इस की तसवीरें दुनिया के टीवी पर आ गई थीं. जब इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई, तब कामराज भारतीय राजनीति के क्षितिज पर सूर्य की तरह चमक रहे थे. वे इंदिरा गांधी के साथ थे. कुछ देर तक वे पत्रकारों से घिरे उन के प्रश्नों के जवाब देते रहे. फिर राष्ट्रपति भवन चले गए. इसी अवधि में लल्लन ने उन की जेब साफ कर दी. अच्छाखासा चमड़े का बटुआ था. लेकिन एकांत में जब लल्लन ने उसे खोला तो अपना माथा ठोक लिया. उस में कागज ही  कागज थे. कुछ अंगरेजी में टाइप किए हुए और कुछ हस्तलिखित. खोदा पहाड़, निकली चुहिया. लल्लन ने वह बटुआ चढ़ती यमुना को अर्पित कर दिया.

उधर, कामराज के बटुए को ले कर बड़ी हायतौबा मची. दिल्ली पुलिस कमिश्नर को बरखास्त कर दिया गया. पुलिस महानिदेशक को सरेआम फटकार खानी पड़ी. कामराज पसीनापसीना हो रहे थे. उस बटुए में बड़े महत्त्वपूर्ण गुप्त कागजात थे. विरोधी पार्टी के हाथों पड़ जाते तो लेने के देने पड़ जाते. संभावित मंत्रियों के विषय में कुछ पूर्व निर्धारित संकेत थे, सलाहमशवरा करने के कुछ मुद्दे थे.

गुप्तचर विभाग सक्रिय हो गया. सारा कार्यक्रम विदेशी पत्रकारों ने कैमरे में कैद किया था. हजारों फोटो उस समय के देखे गए. तभी अचानक रूस के एक फोटो- पत्रकार ने एक फोटो प्रस्तुत कर तहलका मचा दिया. जिस समय कामराज इंदिरा गांधी को बधाई दे रहे थे, उसी समय गले में कैमरा डाले एक आदमी कामराज की जेब में हाथ डाल रहा था.

गुप्तचर विभाग ने अपने ढंग से कार्यवाही कर के दूसरे ही दिन लल्लन को रात में सोते हुए धरदबोचा. फिर तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लल्लन चर्चा का विषय बन गया.  पूरन, लल्लन का पूरा गिरोह चल रहा   था. पूछने पर रामदुलारे ने बात एकदम साफ कर दी कि इस समय तो वह कारसेवा में ही जा रहा है, धंधे पर नहीं है.  खैर, तीनों ने एक स्टाल से चाय पी. रामदुलारे ने पैसा देने की जिद की तो पूरन, लल्लन चुप हो गए, लेकिन यह क्या? रामदुलारे के कुरते की जेब कटी हुई थी. 125 रुपए साफ हो चुके थे. उस ने जेब से हाथ नहीं निकाला, कुछ देर सोचता रहा. फिर बोला, ‘‘शायद बटुआ अंदर ट्रेन में है, तुम्हीं दे दो पैसे.’’  लल्लन ने पैसे चुका दिए. कुछ देर बाद गाड़ी में सब सवार हो लिए और कारसेवकों ने एतराज किया कि कोई गैरआदमी अंदर नहीं आ सकता किंतु रामदुलारे के समझाने पर वे मान गए.

लगभग 1 घंटे बाद एक आदमी एक पेटी ले कर आया. उस पर विश्व हिंदू परिषद का नाम अंकित था. वह मंदिर निर्माण के लिए दान ले रहा था. जब वह दूसरे लोगों के पास से हो कर रामदुलारे के पास आया तो रामदुलारे ने अपने कुरते की जेब से नोटों का बंडल निकाला और 1,133 रुपए दान में लिखवा कर दे दिए. बाकी रकम उस ने पूरन, लल्लन के सामने ही गिनी. अब उस के पास 125 रुपए थे.  ‘‘क्यों, तुम कुछ दान नहीं करोगे?’’ उस ने लल्लन उस्ताद से पूछा.

लल्लन ने अपनी जेब में हाथ नहीं डाला और बोला, ‘‘अब तुम ने दिया तो हम ने दिया, तुम्हारा रुपया भी तो हमारा ही है.’’

दोनों ने एकदूसरे की बात समझी और चुप हो गए. झांसी स्टेशन पर पूरन, लल्लन उतर कर दूसरे डब्बे में चले गए.  रामदुलारे झांसी स्टेशन पर उतरा तो उस ने घोषणा सुनी, ‘‘सभी रामभक्त कारसेवकों को सूचित किया जाता है कि विश्व हिंदू परिषद की ओर से किसी भी प्रकार का आर्थिक सहयोग नहीं लिया जा रहा है. कुछ धोखेबाज लोग इस तरह से पैसा एकत्र कर रहे हैं. यदि ऐसे किसी भी व्यक्ति को देखें तो पुलिस के सिपुर्द कर दें.’’

रामदुलारे समझ गया कि लल्लनपूरन के ही आदमी रहे होंगे. सोचा कि चलो ठीक है, उन की रकम उन तक पहुंच गई.  रामदुलारे शांति से डब्बे में जा कर बैठ गया. किसी रामभक्त ने उसे एक हनुमान चालीसा और तुलसी की माला दे दी. माला उस ने गले में डाल ली और हनुमान चालीसा का पाठ करने लगा. धीरेधीरे उस के मन में भक्ति सवार हो रही थी.  गाड़ी चलने ही वाली थी कि 5-7 पुलिस के जवान गाड़ी में चढ़ आए. उन्होंने कारसेवकों से प्लेटफौर्म पर उतर जाने को कहा. सभी नीचे उतर आए. गाड़ी फिर रुक गई. कुछ गुप्तचर विभाग वाले कारसेवकों की तलाशी लेने लगे. जैसे ही रामदुलारे का नंबर आया कि एक अफसर बोला, ‘‘अरे, यह तो दसनंबरी रामदुलारे है. गिरफ्तार कर लो इसे. साला पाकेटमार, अयोध्या में धंधा करने जा रहा है.’’

अफसर के संकेत पर रामदुलारे को पकड़ लिया गया. वह गिड़गिड़ाया, ‘‘कसम ले लो साहब, इस समय तो मैं सच्चे दिल से कारसेवा में जा रहा हूं. भगवान की कसम खाता हूं...’’

तभी एक डंडा उस के पृष्ठभाग पर पड़ा, ‘‘हर बार कसम खाता है, कसम खाने के अलावा और है क्या तेरे पास? नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज करने जा रही है.’’  रामदुलारे वहीं महारानी लक्ष्मीबाई की वीरभूमि में वीरतापूर्वक गिरफ्तार कर लिया गया. एक बात अच्छी रही, उस समय गिरफ्तार व्यक्तियों की पिटाई नहीं हो रही थी. इज्जत से बंद किया जा रहा था. एक पुराने से किलेनुमा विद्यालय में उन्हें नजरबंद कर दिया गया. खानापानी समय पर मिलता रहा. शायद जल्दी में या व्यस्तता के कारण रामदुलारे का अलग से ‘विशेष’ प्रबंध नहीं किया गया था.

वहीं बाबा सत्यनाम दास मिले. उन्होंने 3 दिन के लिए उपवास किया. कई सद्गृहस्थ भक्तों ने उपवास में साथ दिया. रामदुलारे भी उपवास पर उतर गया. जेल के कानून के तहत कोई भी कैदी 24 घंटे से ज्यादा भूखा रहता है तो वह दंडनीय अपराध है. उसे जोरजबरदस्ती से खिलाने का प्रबंध किया जाता है.  उपवास के दूसरे ही दिन पुलिस अधिकारी आ धमके. उपवास करने वालों की सूची बनी. कहासुनी हुई. तभी वह अफसर भी आ गया जिस ने रामदुलारे को गिरफ्तार किया था. वह रामदुलारे को देख कर ही आपा खो बैठा. रामदुलारे की समझ में नहीं आ रहा था कि उस ने कौन उस की भैंस चुरा ली है या उस के बच्चे का अपहरण कर लिया है.  खैर, रामदुलारे को सब से अलग कर दिया गया. कुछ देर बाद उसे कोतवाली ले जाया गया. वहां कुछ सिपाही माथे और हाथों पर पट्टी बांधे बैठे थे. शहर में दंगा हो गया था, वहीं इन लोगों की मरम्मत हुई थी. शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया था. रामदुलारे जेबकतरा है, यह जान कर वे चारों सिपाही उठ खड़े हुए और अंदर का सीखचों वाला कक्ष खोल कर उस में बंद रामदुलारे को बाहर खींच लाए. फिर अपनेअपने लट्ठों से चारों ने मिल कर रामदुलारे की धुनाई की. उन्होंने शहर के दंगाइयों का पूरा बदला रामदुलारे से लिया.

वैसे तो रामदुलारे वीर था. ऐसे अनेक प्रहार वह अनेक बार सह चुका था, पर अब देह थक रही थी. पुराने जख्म भी दर्द करते थे. उन्हीं पर नए जख्म ज्यादा पीड़ा देने लगे, किंतु भीष्मपितामह की तरह वह सारी पीड़ा अंदर ही अंदर पी गया. उफ तक नहीं की बंदे ने. उसे मारमार कर सिपाही थक गए. रामदुलारे की पोरपोर से दर्द उठ रहा था. हड्डीहड्डी हिल गई थी.

रामदुलारे जमीन पर लेट गया और आंखें मूंद लीं. मरणासन्न सा हो गया. रुकरुक कर हिचकी लेने लगा. किसी ने शायद भीतर थानेदार से कहा होगा. थानेदार अभी आया था शहर से हायतौबा करता. उस ने रामदुलारे का यह हाल देखा तो बौखला गया. सिपाहियों पर बुरी तरह गरजा. लाइनहाजिर होने का हुक्म दे दिया गया.  रामदुलारे को सरकारी अस्पताल में दाखिल करवा कर छोड़ देने का हुक्म हुआ. 4 जवान रामदुलारे को अस्पताल ले आए. वहां उसे भरती करवा कर पुलिस वाले चले गए. डाक्टरों से कहा कि शहर के दंगे में चोट खा गया है. तुरंत इलाज चालू हो गया.

3 दिन में रामदुलारे ठीक हो गया. दर्द तो खैर था, लेकिन अब चलफिर सकता था. बाएं हाथ पर प्लास्टर चढ़ गया था. माथे, पैर और पीठ पर पट्टियां बंधी थीं. फिर भी रामदुलारे के लिए यह बहुत परेशानी की बात नहीं थी.  उस दिन वह अपने बिस्तर से उतर कर बाहर टहलने लगा. फिर मुख्यद्वार से हो कर बाहर सड़क तक आ गया. फिर एक रिकशा में बैठ कर सीधा स्टेशन आ गया. उस के पास रिकशा वाले को देने के लिए पैसे नहीं थे. वहां स्टेशन पर कहासुनी होने लगी. रामदुलारे के गले में चांदी की तुलसी के दानों की कंठी थी. उस ने कंठी रिकशा वाले को दे दी. फिर सामने प्लेटफौर्म पर पहुंचा तो बड़ौदा जाने वाली साबरमती ऐक्सप्रैस तैयार खड़ी मिली. यह संयोग की ही बात थी कि वह सकुशल दूसरे दिन सुबह 5 बजे बड़ौदा आ गया.  बड़ौदा स्टेशन पर उतरते ही एक आश्चर्य हुआ. लोगों में होहल्ला हुआ और धीरेधीरे भीड़ रामदुलारे के पास एकत्र हो गई. कुछ कार्यकर्ताओं ने उसे पहचान लिया.

‘‘अरे, रामदुलारे भाई हो न? कारसेवा में गए थे?’’

‘‘ये तो कारसेवक हैं, बेचारे को कितनी तकलीफ सहनी पड़ी.’’

फिर तो रामदुलारे लोगों की भीड़ का केंद्रबिंदु बन गया. रामदुलारे कुछ कहता इस से पहले ही लोगों ने उस की रामकहानी बना डाली. ‘गोलियां लगी हैं बेचारे को’, ‘सरयू नदी में फेंक दिया था अयोध्या में’, ‘यही चढ़ा था बाबरी मसजिद पर’, ‘बड़ी बेरहमी से पीटा है बेचारे को.’

देखते ही देखते रामदुलारे हीरो हो गया. आननफानन में ही एक जीप में रामदुलारे की सवारी तैयार हो गई. मालाओं से लद गया रामदुलारे. जुबली गार्डन में बजरंग दल वाले उपवास पर बैठे थे. वहीं ले गए रामदुलारे को. धीरेधीरे आसपास के लोग एकत्र होने लगे.

एक नेता बोला, ‘‘रामभक्त रामदुलारे भाई हमारे हिंदू भाइयों के माथे का मुकुट हैं. हम ने जान लिया है कि इन का सबकुछ छीन लिया गया है. इन के शरीर पर 27 घाव हैं.’’

दूसरा आदमी आगे आया और बोला, ‘‘रतन भाई की ओर से रामभक्त रामदुलारे भाई को 1,100 रुपए की मदद दी जाती है.’’

तभी तीसरा आदमी आया और बोला, ‘‘सद्भावना ट्रस्ट की तरफ से इस भाई को 5 हजार रुपए की मदद की जा रही है.’’

फिर धीरेधीरे 27 हजार की रकम वहीं मंच पर आ गई. कुछ स्वयंसेवक झोली फैला कर 2-2, 5-5 रुपए इकट्ठे कर रहे थे.  धीरेधीरे खबर शहर के दूसरे इलाकों में फैल गई कि मसजिद के ऊपर भगवा झंडा फहराने वाला भाई घायल हो कर आ गया है. उसे 8 गोलियां लगी थीं. पुलिस ने भी पीटा है. शायद कुछ और रुपए एकत्र होते, लेकिन तभी कर्फ्यू का अमल कराने सेना आ गई. अश्रु गैस के गोले छूटने लगे. लाठीचार्ज हो गया. रामदुलारे ने सारी रकम झोली में समेटी और भाग कर एक गली में घुस कर गायब हो गया.  शहर में कर्फ्यू का अमल कड़ाई से होने लगा था.  

रामदुलारे के मन में बड़ी साध थी कि जिंदगी में एक बार ‘गंगा स्नान’ कर आता. कहते हैं कि गंगा स्नान से अगलेपिछले सारे ‘पाप’ धुल जाते हैं. रामदुलारे भी अपने पापों को धोना चाहता था.  तभी उस ने सुना कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर की कारसेवा के लिए जो लोग जाएंगे, उन के टिकट की व्यवस्था एक ट्रस्ट करेगा. रामभक्त कारसेवा में जाने के लिए पहले से नाम लिखवा दें.

रामदुलारे को यह खबर मोहन ने दी. उस ने बतलाया, ‘‘रामदुलारे, हो आ लखनऊ, बनारस...रेले में निकल जाएगा. ‘‘फोकट में तीर्थयात्रा का आनंद ले. वहां का खर्चा तो तू निकाल ही लेगा. बड़ा जमघट होगा. थोड़ी हाथ की सफाई दिखाएगा तो पौबारह हो जाएगी. अपना कल्लू तो पार्टी के साथ गया है. वहां महाराष्ट्र के 55 छोकरों की पार्टी है. सब के सब प्रशिक्षित हैं. वहां लखनऊ में दूसरी शाखा के छोकरे मिल कर काम करेंगे.’’

रामदुलारे बोला, ‘‘उन की बात छोड़, उन की पूरी सरकार है, मंत्री हैं, अध्यक्ष है, मंत्रिपरिषद है, प्रशिक्षक है, गुंडे- बदमाश हैं. फिर उन का संविधान है, कायदाकानून है, अनुशासन है. अपना मिजाज उन से नहीं मिलता. 100 कमाओ और 80 सरकार को दो. अपने को यह मगजमारी पसंद नहीं. मोहन, मैं वहां धर्म के नाम पर पाप कम करने जा रहा हूं, रामभक्तों की जेब काट कर पाप बढ़ाने नहीं जा रहा. मेहनतमजदूरी कर लूंगा. गंगाजी में पुराने पापों का बंडल छोड़ दूंगा. फिर कोई अच्छा सा व्यापार करूंगा.’’

मोहन अपनी बात कह कर चला गया. रामदुलारे इस समय ‘पुण्य’ कमाने के चक्कर में था. गांधीजी, गौतमबुद्ध, विवेकानंद की तसवीरें खरीद कर कमरे में टांग चुका था. अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी, जैकी श्रौफ, जयश्री टी. की तसवीरों का अग्निदाह कर चुका था. 6 दिन हो गए थे, ठर्रे को हाथ भी नहीं लगाया, न रज्जोबाई के घुंघरू सुनने गया. बहुत दिन से ‘धंधे’ पर भी नहीं निकला था. पुलिस का दीवान आया तो उसे आखिरी ‘हफ्ता’ दे दिया और कह दिया, ‘‘अपन अब रिटायर हुआ दीवानजी, अपना हफ्ता बंद, अब आगे से अपन धंधे पर नहीं निकलेगा.’’  दीवान ने हाथ का डंडा हवा में हिलाते हुए कहा, ‘‘ठीक है, लेकिन बाद में धंधे पर मिला तो ‘फार्मूला फोर’ फिट कर दूंगा. तू समझता है न...अपना नाम यशवंत भाई हनुमंत भाई मोछड़ है. अपने से ज्यादा होशियारी नहीं दिखाने का.’’

आगापीछा सोच कर आखिर रामदुलारे पार्टी के दफ्तर में जा कर कारसेवकों के पहले जत्थे में ही नाम लिखा आया.  तीसरे दिन स्टेशन पर वह अपना थैला ले कर पहुंच गया. दूसरे कारसेवकों के साथ उसे एक तरफ खड़ा किया गया. फिर शहर के लोगों ने सब को मालाएं पहनाईं, बढि़या गुलाब और सूर्यमुखी की मालाएं. रामदुलारे के गले में माला डालने का यह दूसरा अवसर था. पहले कभी शादी के समय उस की पत्नी ने कनेर के फूलों की माला डाली थी उस के गले में, और फिर उसी के गले से जोंक की तरह चिपट गई.

उस समय रामदुलारे उड़ान पर था. गांव में ‘शहरी बाबू’ कहा जाता था. टैरीकौट की पैंट और नाइलौन की कमीज पहन कर हाथ में ट्रांजिस्टर ले कर घूमता था. कल्लू उस्ताद के स्कूल में प्रशिक्षित हो चुका था. धंधे में लग गया था. बांद्रा में एक झोंपड़पट्टी भी ले ली थी. एक पुरानी साइकिल भी खरीद ली थी. हाथ में घड़ी, जेब में पैन, होंठों पर सिगरेट, देव आनंद की तरह सजीसंवरी जुल्फें, बड़े ठाट थे उन दिनों रामदुलारे के. अपनी गाढ़ी कमाई में से 100-50 रुपए घर भी भेज देता था.  खैर, इस बार माला पहनने वालों को वह जानता था कि ये लोग लीडर हैं. चुनाव जीते हुए नेता हैं. उन्होंने माला पहनाई और हाथ जोड़े. बजरंग दल का एक नेता कह रहा था, ‘‘आप लोगों के खानेपीने का प्रबंध कर दिया है, बड़ौदा स्टेशन पर आप को खाने के पैकेट मिल जाएंगे. मानव बिंदु चैरीटेबल ट्रस्ट, मुंबई के अध्यक्ष गिरधरलाल ने सब कारसेवकों को हाथ-खर्चे के लिए 100-100 रुपए दिए हैं. आप को ये रुपए सूरत में मिल जाएंगे.

‘‘आप शाम को बड़ौदा पहुंचेंगे. वहां के दल वाले आप का स्वागत करेंगे और रात में चलने वाली साबरमती ऐक्सप्रैस में आप को आरक्षित सीट दिलवा देंगे. आप तीसरे दिन लखनऊ पहुंच जाएंगे. फिर वहां की व्यवस्था गुजरात दल करेगा. अच्छा भाइयो, बोलो प्रेम से राजा रामचंद्र की जय.’’

सब ने जयघोष किया. प्लेटफौर्म जयघोष से गूंज उठा. पत्रकार खड़े संवाद लिख रहे थे. फोटोग्राफर फोटो खींच रहे थे. एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति से पूछा, ‘‘काहे का लफड़ा है? हज करने जाता है क्या?’’

‘‘नहीं भाई, ये हिंदू लोग हैं...जैसे दूसरे गांव से गाय, भैंस, बकरा इधर मुंबई में कटने के वास्ते आता है न, ऐसे ही मरने के वास्ते इन को अयोध्या भेजते हैं अपने नेता लोग. ये सब वहां पुलिस और फौज की बंदूकों से अपने प्राण देंगे. इसी वास्ते इन की इतनी खातिर होती है.’’

तभी पास खड़े एक दूसरे सज्जन बीच में ही बोल पड़े, ‘‘काहे को गलत बात बोलता है, ये सब रामभक्त हैं. ‘भगवान’ की सेवा में जाते हैं. तुम वी.पी. सिंह का आदमी मालूम पड़ता है...’’ और अचानक उस ने उस व्यक्ति का गरीबान पकड़ लिया और जोरजोर से चीखने लगा, ‘‘वी.पी. सिंह का मानस है, मारो इस को.’’  एकाएक भीड़ के तेवर बदल गए. सब लोग उस आदमी पर टूट पड़े. प्लेटफौर्म पर होहल्ला मच गया. फिर अचानक भागमभाग मच गई. किसी ने रामपुरी चाकू उस आदमी की पसली में उतार दिया था. उस के पास ही खड़े, उस से बात करने वाले दूसरे आदमी की गरदन पर भी चाकू के 3 वार हो चुके थे. तभी पुलिस के जवान आ गए. प्लेटफौर्म पर सीटियां बजने लगीं. लाठीचार्ज हो गया. रामदुलारे अन्य रामभक्तों के साथ सामने खड़ी रेल में घुस गया. स्वागतसत्कार करने वाले स्वयंसेवकों तथा भाषण देने वाले नेताओं का कहीं पता न था. प्लेटफौर्म पर ढेर सारी मालाएं टूटी पड़ी थीं.

तभी पीछे से 50-60 आदमियों ने नारे लगाए, ‘‘हम सब हिंदू एक हैं...जिंदाबाद, जिंदाबाद. बजरंग दल जिंदाबाद. जिंदाबाद, जिंदाबाद, भवानी दल जिंदाबाद...जिंदाबाद, जिंदाबाद, शिवसेना जिंदाबाद, हिंदू परिषद जिंदाबाद...लाठीगोली खाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे, बच्चाबच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का.’’  एक बार तो रामदुलारे के मन में आया कि रेल के डब्बे से उतर कर भाग जाए. फिर मन मजबूत किया. तभी कुछ बाहरी लोगों ने उन के डब्बे पर पथराव कर दिया. सटासट खिड़कियां बंद हो गईं. लोग दरवाजों से सट गए. तभी गाड़ी चल पड़ी.

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