Commitment issues in relationships :  पिछले कुछ महीनों से एक ही ऑफिस में काम करने वाले नीलम के साथ राजेश की दोस्ती हुई, दोनों एक साथ कही घूमने – फिरने से लेकर ऑफिस में खाना भी साथ – साथ खाने लगे. दोनों की दोस्ती इतनी अधिक गहरी हो गई कि अब दोनों को एक दूसरे के बिना कुछ भी करना नागवार गुजरने लगा. दोनों ने आसपास किराये के कमरे भी ले लिए, लेकिन एक दिन जब नीलम ने दोस्ती को शादी का रूप देने की बात कही, तो राजेश सिरे से नकार दिया. उसके हिसाब से ये रिश्ता उसके लिए सिर्फ एक दोस्ती के अलावा कुछ भी नहीं है. नीलम समझ रही थी कि राजेश झूठ बोल रहा है और शादी के कॉमिटमेंट से घबरा रहा है, लेकिन इसे प्रूव करना उसके वश में नहीं था.
नीलम ये भी समझ नहीं पा रही थी कि इतने दिनों तक साथ – साथ रहने के बावजूद राजेश ऐसा क्यों कह रहा है. नीलम उसे समझाने की बहुत कोशिश करती रही, लेकिन राजेश सिर्फ दोस्ती कहकर उससे दूर हटने लगा. उसके इस व्यवहार से नीलम दुःखी होकर तनाव में आ गई, क्योंकि उसे राजेश के साथ रहना और उसकी हर बात अच्छी लगने लगी थी, जिस वजह से उसने उसे शादी का प्रस्ताव दिया था. राजेश की इस नकारात्मक रवैये को सुनकर नीलम परेशान हो उठी और अपने मानसिक समस्या से निजात पाने के लिए काउंसलर के पास गई, जहां उसे काउंसलर ने बताया कि राजेश का ये वार्ताव उसकी ‘कमिटमेंट इश्यूज’ की वजह से है, जिससे वह शादी को स्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि वह लॉंग लाइफ कॉमिटमेंट से डरता है. हालांकि कई महीने की कॉउन्सलिंग के बाद नीलम इस परिवेश से निकली और फिर से अपने जॉब को इन्जॉय करने लगी है, लेकिन राजेश का ये व्यवहार आज भी उसे सोचने पर मजबूर करता है.
कॉमिटमेंट से भागते यूथ
असल में आज के यूथ में ‘कमिटमेंट इश्यूज’ काफी देखने को मिल रहा है. आज उन्हे आर्थिक और मानसिक दबावों से जूझना होता है, जिसमें सोशल मीडिया एक बड़ी भूमिका अदा करती है, जो सच का सामना नहीं करवाती, जिसे आज के यूथ अधिक पसंद करती है. इस बारें में मुंबई की कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल की कंसलटेंट साइकियाट्री डॉ अपर्णा रामकृष्णन कहती है कि आज के यूथ ने किताबों की कहानियों को पढ़ना बंद कर दिया है, सोशल मीडिया के रील्स को वे लगातार देखते रहते है, जिससे उनकी सोचने समझने की शक्ति कम होती जाती है, इसका सीधा असर उनके व्यक्तित्व और रिश्ते पर पड़ने लगा है, केवल रिश्तों में ही नहीं, वे जॉब में भी किसी प्रोजेक्ट को सही समय पर पूरा करने की कॉमिटमेंट से घबराते है.
सोशल मीडिया है जिम्मेदार
सोशल मीडिया पर आजकल डेटिंग ऐप्स के इतने विकल्प हैं कि सही विकल्प चुनना मुश्किल हो जाता है और सब कुछ ट्राइ करने के बावजूद यूथ के हाथ खाली ही रहते है. आज किसी एक के साथ सेटल होना, एक जोखिम जैसा लगने लगा है. व्यक्ति समझने लगता है कि जो पास में है, उससे उन्हे कुछ अधिक अच्छा मिल सकता है, जो वास्तव में होता नहीं है और सोशल मीडिया इसमें उन्हे उलझाए रखती है.
अवॉयडेंस अटैचमेंट के शिकार
सोशल मीडिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता आज के यूथ है, जहाँ हर कोई अपने और अपने रिश्तों का एक ‘परफेक्ट’ या आदर्श रूप पेश करता है. दूसरों की ये चमक-धमक वाली ज़िंदगी उनके भीतर पार्टनर और चुनाव को लेकर असुरक्षा पैदा करती है. ये उन्हे ईमोशनल चीजों से भागना सिखाता है और रिश्तों में गहराई के बजाय ‘अवॉयडेंस अटैचमेंट’ को बढ़ावा देता है, जिसमें कैजुअल रिलेशनशिप, सिचुएशनशिप, घोस्टिंग और पल भर में ‘अनमैच’ करके आगे बढ़ जाना, अब सभी के लिए सामान्य बात लगने लगी है. आज लोग मौजूदा रिश्ते की गहराई को समझने के बजाय अगले विकल्प की तलाश करने लगते है.
आर्थिक अनिश्चितता भी है एक वजह
आज के युवा गंभीर वित्तीय अस्थिरता, नौकरी की असुरक्षा और एक स्थिर कैरियर बनाने में देरी का सामना कर रहे हैं, क्योंकि वे स्टडी से लेकर कैरियर किसी में भी ठहर नहीं पाते, क्योंकि कॉमिटमेंट का अभाव होता है. ऐसे में वे एक स्थायी पार्टनर या रिश्ते की तलाश से हटकर खुद की व्यक्तिगत सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता हासिल करने में लगे रहते है, पहले ये अधिकतर लड़कियां करती थी, लेकिन आज इसमें लड़कों की संख्या बढ़ी है. जब तक उनमें स्थिरता नहीं मिलती, तब तक किसी भी कमिटमेंट में बंधना उन्हें समय से पहले लिया गया फैसला या असुरक्षित कदम लगता है.
जुड़ाव या लगाव के तरीके
इसके आगे डॉक्टर कहती है कि बचपन में परिवार में देखी हुई अप्रत्याशित घटनाए भी ‘कमिटमेंट इश्यूज’ को प्रभावित करती हैं, जैसे यदि किसी व्यक्ति का बचपन अवॉयडेंट, फियरफुल, डिस्ऑर्गनाइज़्ड या एम्बिग्यूअस अटैचमेंट स्टाइल वाला रहा है, तो उनके भीतर कई गहरे डर घर कर जाते हैं. ये अनकहे डर व्यक्ति को भावनात्मक रूप से असुरक्षित होने और जोखिम उठाने से रोकते हैं. जब तक व्यक्ति इन मनोवैज्ञानिक बाधाओं को पार नहीं कर लेता, उसके लिए किसी गहरे रिश्ते में कमिटमेंट करना उनके लिए बहुत मुश्किल हो जाता है.
35 साल की सलोनी इसलिए शादी नहीं करना चाहती, क्योंकि उसने अपने घर पर पेरेंट्स को हमेशा लड़ते हुए देखा है, उन्हे लगता है कि कोई भी लड़का ऐसा ही डिमान्डिंग होगा, जैसा उनके पिता है. अभी वह आत्मनिर्भर है और खुद आजाद है, कुछ भी करने के लिए उसे किसी से कुछ कहने सुनने की जरूरत नहीं. असल में आज की युवा पीढ़ी आजादी और व्यक्तिगत विकास को सबसे ऊपर रखती है. उनके लिए कमिटमेंट का मतलब अक्सर आजादी छिनना, समझौता करना या अपनी पहचान खो देना मानते है.
क्या कहते हैं आंकड़ें 
कमिटमेंट न कर पाने की प्रवृत्ति किसी एक लिंग में अधिक नहीं होती, बल्कि यह पुरुषों और महिलाओं दोनों में अलग-अलग वजहों से होती है, जिसमें सोशल नॉर्मस, आर्थिक दबाव और व्यक्तिगत अनुभव भूमिका निभाते हैं. कुछ शोध बताते हैं कि डेटिंग में पुरुष अक्सर ‘लेवल लगाने’ से बचते हैं, जबकि महिलाएं गंभीर रिश्ते चाहती हैं और यह हमेशा ‘कमिटमेंट न कर पाना’ नहीं होता, बल्कि जरूरतों का अंतर भी हो सकता है.
कमिटमेंट से भागने वालों के संकेत
कमिटमेंट की समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए इसके मुख्य संकेत को समझ लेना जरूरी है, ताकि समय रहते इसमे से खुद को निकालने में व्यक्ति समर्थ हो.
अपनी दुनिया से रखता है दूर
अगर आपका पार्टनर सच में आपके साथ भविष्य की सोचता है, तो वह आपको अपने करीबी दोस्तों और परिवार से जरूर मिलवाएगा, लेकिन जो लोग केवल टाइमपास करते हैं, वे आपको सीक्रेट रखना पसंद करते हैं. जब भी आप उनके दोस्तों या परिवार से मिलने की बात करते हैं, तो वे कोई न कोई बहाना बनाकर टाल देते हैं.
अचानक गायब हो जाना
अस्थिर रिश्तों का एक पैटर्न होता है, जिसमें शुरूआत में पार्टनर को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर देखना, फिर उसमें कमियाँ निकालना और फिर अचानक रिश्ते से बाहर निकल जाना. इसमें जैसे ही रिश्ते में गहराई आने लगती है या सामने वाला व्यक्ति प्यार और गंभीरता दिखाता है, वैसे ही उससे दिलचस्पी खो देना और दूरी बना लेना होता है, जैसा नीलम के साथ हुआ, राजेश शादी के बंधन में बंधने से मना कर दिया और रिश्ते को दोस्ती का नाम दे दिया.
सब कुछ अपने हिसाब से करना
रिश्ते में होने के बावजूद, वह व्यक्ति पूरी तरह से अकेला रहना पसंद करता है. वह हर काम, हर मीटिंग, और हर फैसला अपनी सहूलियत के हिसाब से करता है. आपके ज़रूरत या भावनाओं की उन्हें कम परवाह होती है यानि रिश्ता सिर्फ उनके नियमों पर चलता है.
कमिटमेंट की समस्याओं से निकलने के तरीके
• डर की पहचान और समाधान
कमिटमेंट से बचने के पीछे के असली डर को पहचानें, मसलन छोड़ दिए जाने का डर, रिश्ते में फँस जाने का डर, पुराने पैटर्न दोहराने का डर या अपनी आइडेंटिटी खोने का डर आदि इन पर खुलकर बात करें.
• अटैचमेंट स्टाइल पर दे ध्यान
व्यक्ति के अटैचमेंट स्टाइल मसलन अवॉयडैंट, एम्बिवेलेंट या डिसऑर्गनाइज्ड का मूल्यांकन करें. इसका उद्देश्य उन्हें एक सुरक्षित और भरोसेमंद अटैचमेंट स्टाइल विकसित करने में मदद करना है.
• दे नया नजरिया
व्यक्ति को यह समझने में मदद करें कि कमिटमेंट की समस्या असल में उनके दिमाग का एक सुरक्षा कवच है, जो उन्हें दुख, नुकसान या अस्थिरता से बचा रहा है. ऐसा करने से उनकी शर्म, अपराधबोध और बचाव की मुद्रा कम होती है.
• इमोशनल रेगुलेशन और कौशल सिखाएं
इस अवस्था में डायलेक्टिकल बिहेवियरल थिरेपी अधिक कारगर होती है, जिसके माध्यम से अपराधबोध, अनिश्चितता और चिंता से निपटने की तकनीक सिखाया जाता है. इसके अलावा अपनी सीमाएं तय करना, विवादों को सुलझाना, अपनी बात स्पष्टता से कहना और मनमुटाव के बाद रिश्ते को सुधारना आदि सिखना पड़ता है.
• सोच के भ्रम को दे चुनौती
कमिटमेंट से जुड़ी गलत धारणाओं को बदलना जरूरी होता है. कमिटमेंट कोई एक बार का फैसला नहीं, बल्कि रोज़ाना किया जाने वाला एक चुनाव है.
• व्यवहार संबंधी बचाव को करे दूर
धीरे-धीरे रिश्ते को नाम देने की आदत डालना सीखना पड़ता है. छोटे-मोटे झगड़ों के दौरान भागने के बजाय रुककर उन्हें सुलझाने का अभ्यास करें.
• पारिवारिक मान्यताओं का समाधान
बचपन के अनुभवों और परिवार से मिली उन मान्यताओं को पहचान कर उसे बदलना सीखें.
• मानसिक स्वास्थ्य को मैनेज करना जरूरी
चिंता, अवसाद या पुराने मानसिक आघात जैसे विकारों की जांच और उपचार करें, क्योंकि ये कमिटमेंट करने की क्षमता को काफी हद तक प्रभावित कर सकते हैं.
इस प्रकार युवाओं के लिए इतना कहना सही होगा कि एक साथ कई व्यक्ति को डेट न करें और सोशल मीडिया पर पोस्ट किये गए रील्स से खुद की तुलना करने से बचे. नएपन की तलाश के बजाय रिश्ते में भावनात्मक गहराई विकसित करने पर ध्यान दें, जो आपको एक सुकून भरी जिंदगी दे सकता है, क्योंकि कॉमिटमेंट का अभाव केवल रिश्ते में ही नहीं, कैरियर और आगे बढ़ने की दिशा में भी आपको समस्या पैदा कर सकता है, इसलिए समय रहते इसका निदान कर आप एक खुशनुमा जिंदगी जी सकते है. commitment issues in relationships

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