Traditional Weaving : जब हाथ काम में होते हैं, तब मन सब से ज्यादा मुक्त होता है. तेज रफ्तार जिंदगी, डिजिटल स्क्रीन और अनवरत तनाव के दौर में कुछ कलाएं ऐसी हैं जो हमें धीमा होना सिखाती हैं. बुनाई उन्हीं में से एक है. कभी सर्दियों की आवश्यकता मानी जाने वाली यह कला आज सुकून, अभिव्यक्ति और आत्मनिर्भरता का पर्याय बन चुकी है. ऊन और सलाइयों के संग जन्म लेती यह प्रक्रिया आज आधुनिक समाज में नई पहचान गढ़ रही है.
परंपरा से वर्तमान तक
बुनाई का इतिहास मानव सभ्यता जितना ही पुराना है. जब कपड़े मशीनों से नहीं बनते थे, तब हाथों से बुने वस्त्र ही जीवन की आधारशिला थे. भारत में कश्मीर की पश्मीना शाल, हिमालयी क्षेत्रों के ऊनी वस्त्र और राजस्थान की पारंपरिक बुनाई आज भी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में जीवित है. दादीनानी द्वारा बुने स्वैटर आज भी भावनात्मक स्मृतियों में सुरक्षित हैं. वे केवल वस्त्र नहीं, प्रेम की गरमाहट होते थे.
बुनाई: एक रचनात्मक संवाद
बुनाई केवल तकनीक नहीं, एक संवाद है. अपनेआप से हर फंदा एक विचार है, हर डिजाइन एक भावना. रंगों का चयन, पैटर्न की योजना और सलाइयों की लय व्यक्ति को एकाग्रता की अवस्था में ले जाती है. यही कारण है कि बुनाई करने वाला व्यक्ति समय का बोध खो देता है और रचनात्मकता के प्रवाह में बहने लगता है.
तनाव से मुक्ति की थेरैपी
आज विश्वभर में बुनाई को मानसिक स्वास्थ्य से जोड़ कर देखा जा रहा है. निटिंग थेरैपी शब्द अब केवल किताबों तक सीमित नहीं है. नियमित बुनाई करने से चिंता कम होती है, अवसाद में राहत मिलती है और मन स्थिर होता है. स्क्रीन आधारित जीवन से थकी आंखों और मन के लिए यह एक सुकून भरा विराम है.
महिलाओं के हाथों में आत्मनिर्भरता
बुनाई ने भारत में महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में भी बड़ी भूमिका निभाई है. स्वयं सहायता समूहों से ले कर व्यक्तिगत उद्यम तक, हजारों महिलाएं घर बैठे अपनी कला को आजीविका में बदल रही हैं. बेबी स्वैटर, मोजे, शाल, टोपी और होम डैकोर आइटम्स आज औनलाइन प्लेटफौर्म पर लोकप्रिय उत्पाद बन चुके हैं. यह कला महिलाओं को आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और निर्णय क्षमता प्रदान करती है.
फैशन इंडस्ट्री में हस्तनिर्मित आकर्षण
मशीनी उत्पादन से ऊब चुकी फैशन इंडस्ट्री अब फिर से हस्तनिर्मित वस्त्रों की ओर लौट रही है. हैंड, निटेड कार्डिगन, क्रोशिया ड्रैसेज, डिजाइनर शौल और एक्सैसरीज लग्जरी फैशन का हिस्सा बन चुकी हैं.
पीढि़यों को जोड़ने वाला धागा
बुनाई केवल एक कला नहीं, पीढि़यों को जोड़ने वाला भावनात्मक धागा भी है. जब एक मां अपनी बेटी को पहला फंदा डालना सिखाती हैं तो वे केवल तकनीक नहीं सिखा रही होतीं. वे धैर्य, निरंतरता और सृजन का संस्कार दे रही होती हैं. यह संवाद शब्दों से परे होता है.
सीखना आसान, अपनाना सुखद
बुनाई की सब से सुंदर बात यह है कि इसे सीखना सरल है. आज डिजिटल युग में यूट्यूब, औनलाइन कोर्स और वर्कशौप्स ने इसे हर उम्र के व्यक्ति के लिए सुलभ बना दिया है. थोड़े अभ्यास से यह कला जीवन का हिस्सा बन जाती है.
पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार कला
हैंडमेड बुनाई पर्यावरण के अनुकूल है. कम ऊर्जा, सीमित संसाधन और प्राकृतिक ऊन का उपयोग इसे टिकाऊ बनाता है. जब हम हाथ से बुना वस्त्र पहनते हैं तो हम प्रकृति के प्रति भी एक जिम्मेदार कदम उठाते हैं.
निष्कर्ष
बुनाई आज केवल ऊन और सलाइयों की कहानी नहीं है. यह सुकून की तलाश, आत्मनिर्भरता की राह और रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बन चुकी है. बदलते समय में भी इस की प्रासंगिकता बनी हुई है. इसीलिए क्योंकि इंसान को आज भी कुछ ऐसा चाहिए जो उसे खुद से जोड़ सके.
-संगीता सेठी
