Kahaniyan : रजत और अक्षरा को रुई की तरह नर्ममुलायम सफेद बर्फ की चादर पर अक्षरा को अठखेलियां करते देख रजत को शरारत सूझी. उस ने बर्फ का एक बड़ा गोला बना कर अक्षरा के ऊपर फेंक दिया. अचानक अपने ऊपर बर्फ का गोला पड़ते देख अक्षरा अचकचा कर इधरउधर देखने लगी.
देखा तो रजत शरारती अंदाज में खड़ा मुसकरा रहा था.
‘‘अच्छा, तो यह शरारत इन जनाब की है. अभी बताती हूं,’’ कह गुस्से से नाक फुलाती हुई अक्षरा ने भी बर्फ का बड़ा सा गोला बनाया और रजत के ऊपर फेंकने के लिए भागी. मगर वह कहां उस की पकड़ में आने वाला था.
‘‘ओ मां,’’ अक्षरा चीखी तो रजत ने पीछे मुड़ कर देखा. अक्षरा का पैर बर्फ के अंदर घंस गया था जिस से वह गिर पड़ी.
‘‘अरे, अक्षरा,’’ रजत दौड़ा आया और उसे उठाने लगा. मगर अक्षरा ने बर्फ का गोला रजत के ऊपर दे मारा और बच्चे की तरह ताली बजाते हुए खिलखिला कर हंस पड़ी.
‘‘अच्छा, तो तुम ने गिरने का नाटक किया न ताकि मुझ पर बर्फ फेंक सको.’’
‘‘हां जी, तो आप को क्या लगा मैं सचमुच में गिर पड़ी,’’ बोल कर अक्षरा खुद ही हाथ झाड़ कर उठ खड़ी हुई और इशारे से उस ने रजत से कहा कि चलो, वहां चल कर भुट्टा खाते हैं.
‘‘ओके, लेकिन कहवा भी पीनी पड़ेगी. है मंजूर तो बोलो हां.’’
‘‘हां,’’ रजत पर आंखों से प्यार बरसाती हुई अक्षरा बोली. तभी आसमान से फिर बर्फ गिरने लगी तो अक्षरा ने अपने दोनों हाथ फैला दिए और उस की दोनों हथेलियां ताजा बर्फ से भर गईं. बर्फबारी जरा और तेज हुई तो दोनों एकदूसरे का हाथ पकड़ कर उस झोपड़ीनुमा दुकान के अंदर घुस गए. रजत ने जब देखा कि अक्षरा ठंड से सिकुड़ी जा रही है तो उस ने अपनी गरम जैकेट उतार कर अक्षरा को पहना दी और अक्षरा उस के सीने से लग इतरा उठी.
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