Kids screen time : पिछले कुछ सालों में सरकार ने भारत में डिजिटल क्रांति लाने का दावा किया है, मतलब एक समय ऐसा आ जाएगा जब कागज का उपयोग ना के बराबर होगा ,सभी कुछ डिजिटल हो जाएगा ऐसे युग में जबकि बच्चों के पैदा होने से पहले पैदा होने की रिपोर्ट से लेकर पैदा होने के बाद उसकी शिक्षा , नौकरी, स्वास्थ्य संबंधी रिपोर्ट , आर्थिक तौर पर पैसों की डीलिंग , नेट बैंकिंग , आदि सिर्फ और सिर्फ मोबाइल और नेटवर्किंग के जरिए ही संभव होने की प्रक्रिया के बाद क्या यह संभव है की बच्चों के हाथ में मोबाइल ना हो , बच्चे मोबाइल से दूर हो ,क्योंकि ऐसा कहा जा रहा है मोबाइल की स्क्रीनिंग लाइट की वजह से बच्चों को बीमारी हो जाती है , बच्चों को पैनिक अटैक आने लगे हैं , शरीर में एलर्जी हो जाती है , मोबाइल इस्तेमाल के दौरान जब बच्चे मोबाइल पर ही गेम खेल रहे होते हैं ,तो मोबाइल से निकली रेंज का बच्चों पर गलत प्रभाव होता है . कई माएं बच्चों से कुछ समय के लिए जान छुड़ाने के लिए जब बच्चों के हाथ में गेम खेलने के लिए मोबाइल दे देती है तो उस वक्त गेम के बीच में विज्ञापन के तौर पर अचानक ही आने वाली अश्लील सामग्री देखने की वजह से बच्चों पर गलत प्रभाव पड़ रहा है , बावजूद इसके कई कारणों की वजह से मां-बाप बच्चों को मोबाइल देने के लिए मजबूर है . ऐसे में कई लोगों का सार्वजनिक तौर पर यह कहना कि वह अपने बच्चों को मोबाइल नहीं देते , क्या यह संभव है? आज के समय में जबकि बच्चों से लेकर बूढ़े तक मोबाइल को अपनी छाती से लगाए रहते हैं, 1 मिनट के लिए भी अपने से दूर नहीं करते ऐसे युग में क्या बच्चों को मोबाइल से दूर रखना संभव है ? पेश है इसी सिलसिले पर एक नजर...
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