Childhood Trauma : ‘‘जो बचपन में सीखा वही जीवन भर साथ निभाता है’’ – यह कहावत हमने कई बार सुनी है. पर कभी सोचा है अगर बचपन में सीख ही गलत हो तो क्या होगा? दिल्ली के 24 साल के एक युवक की कहानी रूह कंपा देने वाली है. बचपन में उसने कहीं सुन लिया- ‘‘बालों में प्रौटीन होता है.’’ भोलेपन में उस ने बाल खाने शुरू कर दिए. घरवालों को लगा ये तो छोटी आदत है अपने आप छूट जाएगी. पर सालों बाद यही आदत उसके पेट में 9 सेंटीमीटर लंबा, सख्त बालों का गुच्छा बन गई. नतीजा असहनीय पेट दर्द, उल्टी, खाना न पचना और आखिर में ऑपरेशन टेबल. डाक्टर इसे मेडिकल भाषा में ‘‘ट्राइकोबेजोआर’’ कहते हैं. जब कोई व्यक्ति बारबार बाल निगलता है तो शरीर न तो उन्हें पचा पाता है, न ही बाहर निकाल पाता है. बाल पेट में जमा होकर धीरेधीरे एक ठोस, उलझी हुई गांठ बना लेते हैं.
ये गांठ आंतों को ब्लाक कर देती है. लक्षण शुरू में हल्के लगते हैं – पेट फूलना, भूख कम लगना, मतली. पर समय पर ध्यान न दें तो सर्जरी ही एकमात्र रास्ता बचता है.
ये आदत कहां से आती है
तनाव और गलत सीख का खे अक्सर ये ‘‘ट्राइकोटिलोमेनिया’’ नाम की मानसिक स्थिति से जुड़ी होती है जिसमें व्यक्ति तनाव, बोरियत या चिंता में अपने बाल खींचकर खाने लगता है. बाल खाना अकेली आदत नहीं है. कई बार नाखून चबाना, पेन का ढक्कन चबाना भी इसी श्रेणी में आता है. और सब से खतरनाक बच्चों को दी गई अधूरी या गलत जानकारी. ‘‘बालों में प्रोटीन होता है’’- ये वाक्य वैज्ञानिक रूप से सही है पर इसका मतलब ये तो नहीं कि बाल खाए जाएं.
घर वालों के लिए चेतावनी
1. बच्चों को पूरी बात बताएं : आधीअधूरी जानकारी सब से खतरनाक होती है. अगर पोषण की बात करनी है तो अंडा, दाल, दूध का उदाहरण दें बालों का नहीं.
2. छोटे संकेतों को नजरअंदाज न करें : अगर आपका बच्चा बारबार बाल खींचकर मुंह में ले जाए, नाखून चबाए या पेट दर्द, उल्टी, भूख न लगने की शिकायत करे तो इसे ‘‘शरारत’’ कहकर टालें नहीं. ये मनोवैज्ञानिक तनाव या पाचन की गड़बड़ी का संकेत हो सकता है.
3. समय पर डाक्टर से मिलें : शुरुआती स्टेज में काउंसलिंग और दवा से इस आदत को छुड़ाया जा सकता है. देर हो जाए तो एंडोस्कोपी या सर्जरी करानी पड़ती है.
