Digital Detox : अकसर किसी भी रिश्ते में यह सुना जा सकता है कि देखो अब जरूरत पड़ी तो फोन लगा लिया या आ गए, इतने दिनों से याद नहीं आई अब मिलने की फुरसत मिल गई या अब याद आ गई न, अब फुरसत मिली है बात करने की आदि यानी मिलते ही शिकायतें करना. इन सब से बचने के लिए हम आजकल मशीनों की ओर आकर्षित हो रहे हैं क्योंकि ये कभी बुरा नहीं मानतीं न ही कभी शिकायत करती हैं क्योंकि आजकल जब हम दिनभर की भागदौड़ के बाद घर लौटते हैं तो थोड़ा सुकून चाहते हैं, यदि कोई शिकायत करे तो हमें बिलकुल अच्छा नहीं लगता. तब हम अपनों से दूरी बनाना पसंद करते हैं और मशीन को अपना दोस्त बना लेते हैं.
एआई के युग में हम इंसानों से ज्यादा मशीनों से बातचीत करना पसंद कर रहे हैं क्योंकि ये हमारी बातें बिना टोके पूरी तरह सुनती हैं, हम जितनी भी देर चाहें उतनी देर बातचीत कर सकते हैं और वे भी बिना थके हमारी बातें सुनती हैं और जवाब देती हैं. कभी गुस्सा नहीं होतीं, बुरा नहीं मानतीं, पलट कर जवाब नहीं देतीं. आप की किसी भी बात का विरोध नहीं करतीं, हमारी हर समस्या, उल?ान का समाधान उन के पास होता है और हम जब चाहें तब उन से बातचीत करना बंद कर सकते हैं, इसलिए हम उन से बातचीत करना ज्यादा पसंद कर रहे हैं.
बातचीत बेहतर विकल्प
आज का युग तकनीक का युग है. हमारे दिन की शुरुआत मोबाइल की स्क्रीन से होती है और अंत भी उसी पर होता है इंटरनैट, सोशल मीडिया और एआई (आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस) इन सब ने मिल कर हमारे जीवन को आसान तो बना दिया हैं लेकिन कहीं न कहीं इंसानों के बीच संवादों की गरमाहट कम कर दी है. ऐसे समय में अवसाद और अकेलेपन से दूर रहने के लिए मशीनों से नहीं. इंसानों से बातचीत करना एक बेहतर विकल्प है.
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‘स्टंबलिंग औन हैप्पीनैस’ के लेखक डैनियल गिल्बर्ट ‘के अनुसार, कृत्रिम प्लैजर वह है जो हम अपने लिए बनाते हैं कुछ भी करने के बाद या कोई पसंद की चीज मिलने पर या पसंद का खाना खा लेने के बाद, परिवार या दोस्तों संग कुछ हसीं के पल बिताने पर जिस आनंद को हम महसूस करते हैं असल में यही प्लैजर या आनंद है. यह हमारे भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए महत्त्वपूर्ण है लेकिन आजकल हम यह आनंद अपने आसपास नहीं मैटीरियलस्टिक चीजों में ढूंढ़ रहे हैं और यही हमें मशीनों को ओर आकर्षित कर रहा है और हम मैटीरियलस्टिक संसाधनों की ओर आकर्षित हो रहे हैं क्योंकि हमारी खुशियां बाहर की चीजों और दूर के लोगों से आ रही हैं या जुड़ रही हैं.
मगर याद रहे मशीनें हमारी सुविधा के लिए बनी हैं, वे जानकारी दे सकती हैं, हमारे काम को आसान बना सकती है, गणना कर सकती हैं, आदेश का पालन कर सकती हैं लेकिन वे इंसानों की तरह भावनाओं को महसूस नहीं कर सकतीं. जब हम किसी अपने से बात करते हैं तो शब्दों के साथसाथ अपने भाव, हाथों का स्पर्श, मुसकान और आंखों की भाषा भी जुड़ी होती है यही मानवीय संवाद की सब से बड़ी विशेषता है जो मशीनें नहीं दे सकतीं.
आजकल भागमभाग वाले लाइफस्टाइल या जीवनशैली में रिश्तों के लिए समय निकालना थोड़ा मुश्किल होता जा रहा है. आज परिवार के सदस्य एक ही घर में रहते हुए भी अलगअलग कमरों में बैठ कर मोबाइल पर व्यस्त रहते हैं आपस में बातचीत नहीं करते. आजकल मित्र साथ तो बैठते हैं पर बातचीत कम और स्क्रीन पर नजरें ज्यादा होती हैं. इस से रिश्तों में दूरी बढ़ती है. मन की बात कहने के लिए हमें किसी ऐप रोबोट की नहीं, एक संवेदनशील इंसान की जरूरत होती है जो हमारी बात सुने, सम?ो और सहानुभूति दे.
सोशल फिटनैस पर इस का असर
इंटरनैट की दुनिया में सोशल मीडिया की मदद से हम आसपास के अपने लोगों जैसे रिश्तेदार, दोस्तों से दूर हो रहे हैं लेकिन अनजान एवं दूर के लोगों से जुड़ रहे हैं जो हमारी सोशल फिटनैस को खराब कर रहा है. यदि कभी बातचीत भी होती है तो वह सोशल मीडिया पर हो रही है. वह घर के आंगन में चाय पीते हुए आपस में बैठ कर बातचीत करना, गप्पें मारना, हसींमजाक का दौर खत्म हो गया है.
सोशल फिटनैस का सीधा संबंध स्वस्थ रिश्तों से है और इस की पहचान या शुरुआत आपसी सम्मान, समर्थन, तालमेल और आपस में बातचीत या संवाद से होती है. हमारी सोशल फिटनैस हमारी शारीरिक फिटनैस ?के समान ही महत्त्वपूर्ण है वरना यह हमें तनाव देती है और बीमार बना देती है और धीरेधीरे अवसाद की ओर ले जाती है, इसलिए अपनी सोशल फिटनैस को बनाए रखने के लिए अपनी व्यस्त लाइफ में से कुछ समय अवश्य निकालें और अपनों से मिलेंजुलें.
हैप्पी हारमोंस में कमी आती है
जब हमारे साथ कुछ अच्छा होता है तो हैप्पी हारमोंस दिमाग को मैसेज देते हैं, जिस के बाद व्यक्ति को अंदर से खुशी मिलती है. यह हारमोन हमें अच्छा महसूस कराता है. इस का उत्पादन शरीर में तब बढ़ता है जब हम कुछ सुखद अनुभव करते हैं. इस के लिए आपस में संवाद करें और अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त करे.
डिजिटल स्क्रीन एवं मशीनों से दूरी बनाएं. आपस में मिलेंजुलें, आपस में बातचीत के लिए सोशल मीडिया जैसे व्हाट्सऐप और फेसबुक का सहारा न लें. अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए इमोजी और शौर्ट में शब्दों के बजाय सही शब्दों का उपयोग करें. इस के लिए कोशिश करें कि रात का खाना एकसाथ टेबल पर बैठ कर खाएं ताकि एकदूसरे से संवाद कर सकें, अपने मन की बातें एकदूसरे से शेयर कर सकें. यदि किसी को कोई समस्या है तो उसे सुल?ाने में एकदूसरे की मदद करें. तभी हम खुद को चिंता और अवसाद से दूर रख पाएंगे और अपनेआप को खुशी और ऊर्जा से भरा हुआ.
आपस में बातचीत या संवाद केवल शब्दों का आदानप्रदान नहीं है, यह विश्वास को बनाता है. जब हम आमनेसामने बैठ कर बात करते हैं तो गलतफहमियां कम एवं दूर होती हैं, जिस से रिश्ते मजबूत बनते हैं. मशीनों से भावनात्मक रिश्ता बना पाना असंभव है.
सोशल फिटनैस खराब होने के नुकसान
तनाव बढ़ता है.
कार्य करने की क्षमता कम होती है.
अकेलापन महसूस होता है जिस कारण हम अवसाद की ओर बढ़ते हैं.
आत्मविश्वास कम होता है.
माइंड फुलनैस
जब आप अपने सारे काम माइंडफुल हो कर करते हैं तो सारे काम में सफलता पाते हैं, जिस से आत्मविश्वास बढ़ता है, तनाव कम होता है और आप आनंद का अनुभव कर पाते हैं.
विकल्पों से रहें दूर
विकल्प हमारी खुशी पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं. जब हमारे पास विकल्प होते हैं तो हम अवसर खो जाने की चिंता करते हैं और हमें जो मिला है उस की वैल्यू न करते हुए जो नहीं मिला उस के लिए दुखी होते हैं. इस के विपरीत जब हमारे पास विकल्प नहीं होते तो तब हमें जो मिला है वह हमें पसंद आने लगता है.
भावनाओं पर नियंत्रण
हमारी भावनाएं ही प्लैजर या आनंद को प्रभावित करती हैं. यही हमें दुखी और खुश बनाती है, इसलिए अपनी भावनाओं को बदलने के लिए हमा?रे लिए अपने विचारों, अपने शब्दों और अपने कार्यों को बदलना जरूरी हो जाता है क्योंकिहमारे विचार, शब्द और कार्य हमारी भावनाओं को प्रभावित करते हैं क्योंकि जब हम अपनी लाइफ में प्लैजर या आनंद का अनुभव करते हैं तब नकारात्मक भावनाओं की तुलना में अधिक सकारात्मक अनुभव करते हैं जिस के कारण हमें खुशी का अनुभव होता है.
तकनीक का उपयोग करें पर उस के गुलाम न बनें. दिन में कुछ समय अपने परिवार, मित्रों और सहकर्मियों के लिए निकालें. उन के साथ बैठें, उन की बातें सुनें, अपने अनुभव सा?ा करें. एक सच्ची हंसी, एक दिलासा भरा स्पर्श, एक प्रेरणादायक शब्द ये सब मशीनें नहीं दे सकतीं.
यह समझना जरूरी है कि मशीनें हमारी सहायक हो सकती हैं लेकिन वे हमारे रिश्तों की जगह नहीं ले सकतीं, इसलिए स्क्रीन से नजरें हटा कर एकदूसरे की आंखों में देखें और सच्चे संवाद की शुरुआत करें व रिश्तों को बेहतर बनाएं.
मशीनों से बातचीत का इंसानों पर नकारात्मक असर देखने को मिलता है:
सोशल डिस्टैंस बढ़ता है, संवाद के कौशल में कमी आती है क्योंकि जब हम इंसानों के बजाय मशीनों से ज्यादा बात करते हैं तो उससे वास्तविक सामाजिक संबंध कमजोर हो सकते हैं.
कुछ लोग एआई पर भावनात्मक रूप से निर्भर हो सकते हैं, जिस से वास्तविक रिश्तों में दूरी आ सकती है.
यदि एआई से मिली जानकारी की जांच न की जाए तो गलतफहमियां हो सकती हैं.
मशीनों से बातचीत के दौरान साझा की गई जानकारी डेटा के रूप में संग्रहीत हो सकती है, जिस से आप की गोपनीयता भंग हो सकती है.
मशीनों से बातचीत उपयोगी है लेकिन इंसानी रिश्तों और संवाद की जगह नहीं ले सकती. यदि हम एआई को एक सहायक उपकरण की तरह इस्तेमाल करें न कि विकल्प की तरह तो इस का प्रभाव अधिक सकारात्मक होगा.
