long distance relationship : रिश्तों की बुनावट जीजासाली और देवरभाभी के रिश्तों की बुनावट और उन की रंगत दुनिया के हर कोने में अलगअलग होती है, ठीक वैसे ही जैसे हर मिट्टी की अपनी सौंधी महक होती है. जब हम भारतीय परिवेश में जीजासाली या देवरभाभी के रिश्तों की बात करते हैं तो मन में स्वत: ही एक शरारतभरी मुसकान, लोकगीतों की तान और पारिवारिक उत्सवों का कोलाहल गूंजने लगता है.
हमारे यहां इन रिश्तों की मधुरता केवल संबंधों की औपचारिकता नहीं बल्कि एक स्वीकृत ‘लिबर्टी’ है, जहां हंसीठिठोली और नोक झोंक को सामाजिक मान्यता प्राप्त है. लेकिन जब हम अपनी नजर 7 समंदर पार पाश्चात्य जगत की ओर ले जाते हैं तो वहां की तसवीर कुछ जुदा नजर आती है.
पश्चिम में रिश्तों का व्याकरण काफी सीधा और स्पष्ट है. हमारे यहां जहां जीजा, साला, देवर, ननदोई जैसे रिश्तों की एक पूरी वर्णमाला है, वहां सबकुछ सिमट कर ‘ब्रदर इन ला’ या ‘सिस्टर इन ला’ के एक ही घेरे में आ जाता है.
इस भाषाई सरलीकरण का सीधा असर व्यवहार पर भी पड़ता है. वहां जीजासाली के बीच वह ‘नटखटपन’ या देवरभाभी के बीच वह ‘अधिकार’ स्वत: ही पैदा नहीं होता जो भारतीय लोकजीवन की रगों में दौड़ता है.
बुनियादी अंतर
पाश्चात्य संस्कृति में मधुरता का आधार ‘सामाजिक भूमिका’ नहीं बल्कि व्यक्तिगत ‘मैत्री’ है. वहां अगर किसी की अपनी सिस्टर इन ला से अच्छी पटती है तो वह इसलिए है क्योंकि वे अच्छे दोस्त हैं न कि इसलिए कि उन के बीच कोई पारंपरिक छेड़छाड़ का रिश्ता पहले से तय है.
एक बड़ा बुनियादी अंतर निजता यानी प्राइवेसी के बोध का भी स्पष्ट दिखता है.
भारतीय परिवारों में विशेष कर संयुक्त परिवारों
में देवरभाभी या जीजासाली का साथ रहना, सुखदुख सा झा करना और एकदूसरे के जीवन में हस्तक्षेप करना स्वाभाविक माना जाता रहा है.
यहां मधुरता का पैमाना अकसर एकदूसरे पर निर्भरता और खुल कर मजाक करने की आजादी है. इस के विपरीत पाश्चात्य जगत में पर्सनल स्पेस की दीवारें काफी ऊंची और स्पष्ट हैं. वहां रिश्ते मधुर तो होते हैं लेकिन उन में एक सभ्य दूरी बनी रहती है.
वहां थैंक्सगिविंग या क्रिसमस जैसे मौकों पर मिलनाजुलना एक उत्सव की तरह होता है, जिस में सौहार्द तो भरपूर होता है लेकिन वह भारतीय ‘लोकगीतीय छेड़छाड़’ गायब रहती है जो हमारे यहां विवाह मंडपों की जान होती है.
मनुष्य की संवेदनाएं
देखा जाए तो भारत में ये रिश्ते एक तरह के ‘इमोशनल सेफ्टी वाल्व’ का काम करते हैं जो गंभीर पारिवारिक ढांचे के भीतर हंसी और हलकेपन की जगह बनाए रखते हैं. पश्चिम में यही मधुरता समान हितों पर टिकी होती है जैसे साथ में गोल्फ खेलना या किसी खास विषय पर चर्चा करना. अंत: मनुष्य की संवेदनाएं हर जगह एकजैसी हैं, बस उन्हें व्यक्त करने के तरीके भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं से बंधे हैं.
जहां हमारे यहां रिश्तों में रस और लज्जा का एक अनूठा सम्मिश्रण है, वहीं पाश्चात्य जगत में ये पारस्परिकता और व्यक्तिगत सम्मान के धरातल पर टिके हैं. मधुरता दोनों जगह है, बस उस का स्वाद कहीं गुड़ जैसा देशी है तो कहीं चौकलेट जैसा विदेशी.
