senior citizen care : बुजुर्ग हमारे समाज की नींव हैं, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी देश और परिवार को बनाने में दे दी। लेकिन जीवन के अंतिम पड़ाव में जब उन्हें सब से ज्यादा सुरक्षा और सम्मान की जरूरत होती है, तब वृद्धाश्रमों का ढीलाढाला और पारंपरिक सिस्टम उन के आड़े आ जाता है।

वृद्धाश्रमों के संचालन की बागडोर 35 वर्ष तक के युवाओं को सौंपना और निश्चित कार्यकाल तय करना एक ऐसा व्यावहारिक समाधान है, जो भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म कर सकता है। यह व्यवस्था वृद्धाश्रमों को केवल एक ‘चैरिटी’ नहीं, बल्कि तकनीक, सुरक्षा और आत्मीयता से भरपूर एक सशक्त संस्थान बना सकती है।

जब 25 की उम्र में आ कर 35 में जाने का एक पारदर्शी नियम होगा, तो न कोई निजी संपत्ति बनाने का लालच रहेगा और न ही भ्रष्टाचार की गुंजाइश। युवाओं की तेजी और तकनीक, बुजुर्गों की सुरक्षा और गरिमा की सब से बड़ी गारंटी बन सकती है।

निश्चित कार्यकाल से करप्शन पर  लगेगी लगाम

जगह चाहे कोई भी हो भ्रष्टाचार हर जगह अपने पैर पसार चुका है. बड़े पद पर बैठा व्यक्ति यह समझता है कि यह उस की पर्सनल प्रौपर्टी है और वह यहां कुछ भी कर सकता है. इसलिए वह व्यक्ति बुजुर्गो के लिए काम करने के बजाय अपनी जेबें भरने का काम करता है क्योंकि उसे पता है कि यहां से निकालने वाला कोई नहीं है और उन्हें रिटायर ही यहां से होना है.

इसलिए कई बार कुछ गलत लोग वहां अपनी खूब मनमानी करते हैं. इसलिए प्रबंधन समिति में किसी भी सदस्य या प्रशासक का कार्यकाल 5 से 10 साल (जैसे 25 से 35 वर्ष की आयु) तय हो।

लंबे समय तक एक ही पद पर न रहने से निजी एकाधिकार और फंड की हेराफेरी पर रोक लगती है। 10 साल (25 से 35 वर्ष) का निश्चित कार्यकाल देने से संस्थागत भ्रष्टाचार और मोनोपोली की गुंजाइश खत्म हो जाएगी।

स्मार्ट हैल्थ मौनिटरिंग

युवा प्रबंधक स्मार्ट वियरेबल्स (जैसे फिटनैस बैंड या इमरजैंसी एसओएस बटन) लागू कर सकते हैं, जिस से बुजुर्गों की हार्ट रेट, ब्लड प्रेशर या अचानक गिरने (Fall Detection) की जानकारी तुरंत डाक्टर और स्टाफ तक पहुंच जाए।

डिजिटल रिकौर्ड्स व मेडिसिन ट्रैकिंग युवा आसानी से कर सकते हैं

आज के युवा डिजिटल वर्ल्ड में बहुत आगे हैं. वे नए जमाने के हिसाब से चलते हैं और उसी के अनुसार अपना काम करते हैं जबकि बड़ी उम्र के लोग यह सब सीखने में पीछे रह जाते हैं. लेकिन युवा कागजी काररवाई खत्म कर के बुजुर्गों का पूरा मैडिकल इतिहास, दवाइयों का समय और डाक्टरों के अपौइंटमेंट ऐपबेस्ड सिस्टम पर मैनेज कर सकते हैं, जिस से दवा छूटने या गलत खुराक की गुंजाइश खत्म हो जाती है। साथ ही बुजुर्गों को बारबार अस्पताल ले जाने के बजाय वृद्धाश्रम में ही हाईस्पीड इंटरनेट के जरिए वीडियो कंसल्टेशन और ऑनलाइन चेकअप की व्यवस्था की जा सकती है।

डाइरैक्ट बेनिफिट ट्रांसफर

सरकार की तरफ से मिलने वाली वित्तीय सहायता या सब्सिडी सीधे वृद्धाश्रम के प्रमाणित बैंक खाते में जाए और उस का इस्तेमाल केवल बुजुर्गों की सुविधाओं (भोजन, स्वास्थ्य, बिजली) के लिए ही अनिवार्य किया जाए। युवाओं को पता है कि उन का कार्यकाल कम है इसलिए वे पूरी मेहनत से मन लगा कर काम करेंगे और करप्शन के बजाय नए योजनाओं पर काम करेंगे क्योंकि उन्हें पता है कि इसी से आगे उन के अच्छे भविष्ये और नौकरी की संभावनाएं बनेगी।

शिकायत निवारण प्रणाली

बुजुर्गों और उन के परिजनों के लिए एक सीधा हेल्पलाइन नंबर या फीडबैक सिस्टम हो, जिस की निगरानी सीधे जिला प्रशासन करे ताकि किसी भी गड़बड़ी पर तुरंत काररवाई हो सके। जब यह सब युवाओं के हाथ में होगा तो वे तुरंत समस्या का समाधान खोजेंगे क्योंकि वे टेक्नोलौजी फ्रैंडली है और जल्द ही किसी चीज को समझ कर आज के समय के हिसाब से निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं.

अपने परिवार से जुड़ सकते हैं बुजुर्ग

युवाओं की मदद से बुजुर्ग अपने परिवार और बच्चों से एचडी वीडियो कौल के जरीए आसानी से जुड़ सकते हैं। इस के अलावा, उन के मानसिक स्वास्थ्य के लिए डिजिटल लाइब्रेरी, औडियोबुक्स और वीआर जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

मानवीय गुण सीखने को मिलेंगे युवाओं को

आज जहां जंतरमंतर पर हुए प्रोटेस्ट के बाद जेन जी के द्वारा जो गालियां आदि दी गई  उस वजह से हम जेन जी को संस्कार विहीन बता कर मुंह भरभर कर कोस रहे हैं। इस से अच्छा है कि उन्हें कुछ अच्छा और संस्कार सीखने का मौका दें, जो उन्हें बुजुर्गों के साथ काम करने पर मिलेगा। दूसरे, आजकल न्यूक्लीयर फैमिली का चलन बढ़ गया है। ऐसे में युवाओं को बुजुर्गों का साथ और उन के अनुभव से बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।

कम उम्र में बुजुर्गों की सेवा और देखरेख करने से युवाओं में संवेदनशीलता बढ़ती है, जिस से वे अधिक जिम्मेदार, सहनशील और परिपक्व नागरिक बनते हैं। ये सब वे अपने घर में रह कर नहीं सीख सकते।

जैनरेशन गैप कम होगा

हमेशा से एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी के लिए जैनेरशन गैप जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती है।  इसी वजह से बच्चों और पेरैंट्स के बीच में एक अनकही दीवार कड़ी हो जाती है और वे चाह कर भी बच्चों के करीब नहीं आ पाते। लेकिन 2 अलगअलग पीढ़ियों के रोजाना संवाद से एकदूसरे के प्रति सम्मान और समझ बढ़ती है, जिस से समाज में बुजुर्गों के प्रति उपेक्षा का भाव कम होता है और बुजुर्ग भी उन से जुड़ जाएंगे।

दूसरे शब्दों में कहें तो युवा जहां बुजुर्गों को आज की डिजिटल दुनिया (स्मार्टफोन चलाना, औनलाइन बातें करना) से सहजता से जोड़ते हैं, वहीं बुजुर्ग युवाओं को हमारी समृद्ध परंपराओं, नैतिक मूल्यों और सामाजिक दायित्वों से अवगत कराते हैं।

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