Stand Up Comedy : सब से ज्यादा जो रिपोर्टिंग करते हैं वे अकसर पुरुष होते हैं. वे एक सीमा के बाद आगे नहीं जाते और महिलाओं को जाने भी नहीं देते. जब मैं ने शुरू किया तो रात को 1-1, 2-2 बजे तक पुलिस स्टेशन में डटी रहती थी. अकसर पुलिस वाले कहते थे कि आप अपने कैमरामैन को भेज दिया कीजिए. आप खुद मत आया करो…
जब माइक पर एक औरत हंसती है तो अकसर लोग चौंकते हैं पर जब वही औरत हंसातेहंसाते सवाल पूछ ले तो पूरा सिस्टम हिल जाता है. मिलिए गुजरात की पहली महिला स्टैंडअप कौमेडियन प्रीति दास से जिन की जिंदगी खुद एक दमदार स्क्रिप्ट है. तमिल मां और बंगाली पिता की बेटी प्रीति ने करीब 15 साल तक कई बड़े न्यूज चैनल्स और न्यूज पेपर्स में क्राइम और हैल्थ बीट कवर की. गैंगरेप सर्वाइवर्स पर लिखी उन की खोजी सीरीज के लिए उन्हें 2015-16 में ‘लाडली मीडिया अवार्ड’ मिला. पहले वेस्टर्न जोन, फिर साउथ एशिया लैवल पर. पर न्यूजरूम की भागदौड़ के बीच उन्हें लगा कि सच सिर्फ छापा नहीं जाता, बोला भी जाता है. बस फिर क्या था कलम थामने वाले हाथों ने माइक पकड़ लिया. आज वे अहमदाबाद की कर्णावती यूनिवर्सिटी में डीन हैं, ञ्जश्वष्ठ× स्टेज पर बोलती हैं और ‘महिला मंच’ की कोफाउंडर के तौर पर गुजरात की औरतों को स्टैंडअप का मंच भी देती हैं.
प्रीति दास का ह्यूमर मीठा नहीं, चटपटा है. ‘मांबहन शो’ में वे गालियों को ही पंचलाइन बना देती हैं और पूछती हैं कि मांबहन के नाम पर गाली क्यों? ‘द पीरियड शो’ में हर महीने रुत्रक्चञ्जक्त, बौडी शेमिंग और फीमेल सैक्सुअलिटी पर खुल कर बात होती है, हंसी के साथ. उन की कौमेडी में पौलिटिक्स है, सैक्स है, रिऐलिटी है और वह सब है जो हमें असहज करता है.
सीइपीटी (ष्टश्वक्कञ्ज) यूनिवर्सिटी के प्रोफैसर जय ठक्कर की पत्नी और 13 साल के बेटे कबीर की मां प्रीति मानती हैं कि घर के काम का कोई जैंडर नहीं होता. क्राई के मंच से वे कहती हैं, ‘‘काश, हमें हीमोग्लोबिन से जज किया जाता, स्किन कलर से नहीं.’’
जो औरत नर्सरी राइम्स में भी जैंडर वौयस ढूंढ़ ले वह स्टेज पर चुप कैसे बैठे? प्रीति दास आज की उस आवाज का नाम है जो बीरबल की तरह हंसी में लपेट कर सवाल पूछती है और जवाब में समाज को सोचने पर मजबूर कर देती है.
अपने बारे में बताते हुए प्रीति दास कहती हैं, ‘‘मैं अहमदाबाद, गुजरात में रहती हूं. अकसर जब मु झ से लोग पूछते हैं कि आप बिलोंग कहां से करती हैं तो मैं बहुत कन्फ्यूज हो जाती हूं. दरअसल, मैं आधी तमिल और आधी बंगाली हूं. मेरी मम्मी तमिलियन हैं और मेरे पापा बंगाली जबकि मेरी शादी गुजराती परिवार में हुई है. गुजरात के स्कूल और कालेज में पढ़ाई के बाद मणिपाल से मास्टर्स किया और करीब 20 साल इन्वैस्टिगेटिव जर्नलिस्ट का काम किया. मैं कुल 7 भाषाएं बोल लेती हूं. हिंदी, इंग्लिश, गुजराती, तमिल, बंगला, कन्नडा और मलयालम. इस की वजह है एक तो मैं घूमती बहुत हूं साथ ही इस का श्रेय मैं अपने मातापिता को भी देती हूं क्योंकि वे डिफरैंट कम्युनिटीज और डिफरैंट प्रांत के हैं फिर क्योंकि मैं कर्नाटका में पढ़ी थी और पत्रकारिता की तो हमें लोकल भाषा सीखनी पड़ी.
‘‘मेरे सफर की शुरुआत हुई थी आजतक से. सब से पहले मेरी पोस्टिंग चैन्नई में इसलिए हुई थी क्योंकि वे लोग एक तमिल और हिंदी स्पीकिंग जर्नलिस्ट ढूंढ़ रहे थे. तब चैनल का नाम हैडलाइंस टुडे भी था पर अब वह नाम नहीं रहा. आजतक में मैं ने बहुत इंटरैस्टिंग स्टोरीज की थी जिन में 2008 की सुनामी की कवरेज भी थी. मैं सुनामी देखने वाली पहली रिपोर्टर थी क्योंकि सवेरे वहां पर मौर्निंग वाक के लिए गई हुई थी. मरीन बीच मेरे घर के नजदीक है. मैं ने पूरे बीच के पानी को पीछे जाता देखा. तब मु झे वह शब्द सुनामी याद नहीं रहा लेकिन मु झे याद आया था कि हम ने यह सब कहीं पढ़ा हुआ है. उस के बाद लगातार रिपोर्टिंग की. मु झे तो शायद याद भी नहीं कि कितनी संख्या में लोग मरे पड़े थे. मेरा पहला ऐनकाउंटर मौत के साथ और वह भी इतने बड़े स्केल पर था. तब एहसास हुआ कि एज न्यूज चैनल्स जर्नलिस्ट हम लोग एक बौडी काउंट का रेस करते हैं.
गुजरात की पहली महिला कौमेडियन
प्रीति कहती हैं, ‘‘स्टैंडअप कौमेडी करते हुए मु झे लगभग 20 साल हो गए हैं. स्टैंडअप कौमेडी की शुरुआत मैं ने गुजरात से की. मु झे अभी भी गुजरात की पहली महिला कौमेडियन कहा जाता है. शायद फिलहाल कोई महिला स्टैंडअप कौमेडियन यहां पर है भी नहीं. स्टैंडप कौमेडी की जो स्थिति इस देश में है वह यही है कि पहले से ही महिलाओं पर खूब सारे जोक्स मारे जाते हैं, बीवी वाले जोक्स होते हैं. बहुत ही सैक्सिस्ट और पैट्रियार्की नोशंस जो होते हैं उन पर मैं ने वाया ह्यूमर बहुत काम किया है. अर्बन कैफे से ले कर छोटेछोटे गांवों में तक इस बात को ले कर जाती थी. मु झे लगता है हास्य रस बहुत पावरफुल रस है और उस रस में आप यदि लगातार महिलाओं का ही मजाक उड़ाएं तो उस के डैंजर्स कितने सारे हैं. मेरे कई सारे छोटेमोटे थिएटर प्रोडक्शंस और ग्रुप हैं उन के साथ हम ने स्टैंडअप को बहुत ही अलग तरीके से पेश किया. हम ने वूमन अगेंस्ट वायलैंस पे काम किया है. देश के गांवगांव में घूमे हैं. छोटी जगहों पर महिलाओं से शोज कराए. मैं आप को एक उदाहरण देती हूं.

‘‘यह यूपी की बात है. यूपी में एक दीदी ने कहा कि कभीकभी अगर घरवाला एकाध चांटा मार ले तो वह तो प्यार दिखाने का तरीका है. इस पर 60 साल की एक महिला ने कहा कि बेटे का अगर चांटा मारना प्यार दिखाना है तो एक काम करना, तू भी कभी ऐसे अपने घर वाले को प्यार दिखा दे. एकाध लपट्ट तू भी मार दे. इस बात पर वह हंसने लगी. मैं ने कहा कि यार कितना इंटरैस्टिंग है, प्यारमुहब्बत दिखाने का तरीका मर्द के लिए एक तरह का होता है और औरत के लिए वही ऐक्सैप्टेबल नहीं होता है. उस प्रिमाइजेज पर हम ने कई सारे जोक्स उन्हीं के साथ बनाए. आप सोचिए गांव की ये औरतें जो बात नहीं कर पातीं उन्हें हम एक शाम देते हैं. हम एक शाम और्गेनाइज करते हैं जहां पर ये महिलाएं चुटकुले सुनाएंगी, अपनी कहानी बताएंगी और वह भी हास्य रस के साथ. होता यह है कि ये औरतें जो घूंघट में होती हैं अपने बुजुर्गों से बात नहीं कर पातीं. वे जब इस तरह हंसा कर अपना दर्द या अपना पौइंट रखती हैं तो वह ज्यादा पावरफुल होता है. महिलाओं के लिए यह काफी रैवोल्यूशनरी रहा है और बहुत से पुरुषों के लिए भी जो यह सुन रहे होते हैं.’’
स्टीरियोटाइप ब्रेक करने की आदत
प्रीति कहती हैं, ‘‘सब से ज्यादा क्राइम अगर आप भारत में देखिए तो यह महिलाओं और बच्चों पर होता है और क्राइम पर सब से ज्यादा जो रिपोर्टिंग करते हैं वे अकसर पुरुष होते हैं. वे एक सीमा के बाद आगे नहीं जाते और महिलाओं को जाने भी नहीं देते. जब मैं ने शुरू किया तो रात को 1-1, 2-2 बजे तक पुलिस स्टेशन में डटी रहती थी. अकसर पुलिस वाले कहते थे कि आप अपने कैमरामैन को भेज दिया कीजिए. आप खुद मत आया करो. खुद आने की क्या जरूरत है? इन सारी अप्प्रैहैंशंस को तोड़ना आसान नहीं रहा. मैं घंटों तक बैठी रहती थी.
‘‘यह सिर्फ तमिलनाडु में नहीं था. गुजरात में भी जब मैं पत्रकार के तौर पर काम कर रही थी या फिर यूपीबिहार में जब कई सारे इलैक्शन की कवरेज की तो मेरी आदत थी कि मैं रात को जा कर बैठ जाती थी. जब तक मु झे एफआईआर नहीं दी जाती थी या जब तक मेरे से उसी इक्वैलिटी पर बात नहीं की जाती थी मैं नहीं हटती थी. पुलिस वाले भी परेशान होते थे लेकिन फाइनली वे कहते थे कि बहन चलो यार अब तुम आ जाओ. हम तुम्हें बता देते हैं. मैं ने सिस्टम से बहुत सारा सीखा और यह भी सीखा कि स्टीरियोटाइप ब्रेक करने के लिए अपना निश्चय नहीं तोड़ना चाहिए.
मां से मिला है महिलाओं के लिए काम करने का पैशन
प्रीति बताती हैं, ‘‘काम के साथ मैं खूब सारा थिएटर भी करती थी. मु झे हमेशा से आर्ट बहुत लुभाता रहा है. शायद इसलिए क्योंकि मेरे पिताजी भी बहुत सारा स्ट्रीट थिएटर करते थे. थिएटर और आर्ट का नशा काफी हद तक पापा से आया है. मगर यह जो पागलपंती है, पैशन है, काम करने का नशा खास कर के महिलाओं के लिए, उन की कहानियों को आगे ले कर आना, चाहे आर्ट के जरीए, चाहे स्टैंडअप कौमेडी या फिर चाहे थिएटर के जरीए, मैं उस का पूरापूरा क्रैडिट अपनी मां को देती हूं.’’
सफर आसान नहीं था
प्रीति आगे कहती हैं, ‘‘ऐक्चुअली देश में बहुत कम पत्रकार हैं जो वाकई में अच्छी पत्रकारिता करते हैं. पत्रकारिता के कुछ उसूल होते हैं पर उन उसूलों को कोई फौलो करता नहीं है. तो मु झे लगा कि स्टेज के अपने नियम तो मैं खुद बना सकती हूं. इसलिए यह सफर कठिन रहा. अकसर लोग मु झ से कहते थे कि आप का स्टैंडअप कंटैंट पत्रकारिता जैसा है. ऐक्चुअली मेरे लिए ये दोनों एक ही पहलू के अलगअलग पासे रहे हैं. जब स्टैंडअप कौमेडी की बात आती है तो आप जानते हैं कि मर्द अकसर अपने परिवार खासकर पत्नियों के बारे में चुटकुले सुना कर आगे जाते हैं. कहीं पार्टीवार्टी होती है तो उस में जैंट्स ग्रुप के जोक्स अकसर वाइफ के बारे में ही होते हैं कि वाइफ ने ऐसा किया, वैसा किया.
‘‘मैं यही सम झती थी कि मर्द जिस तरह के स्टैंडअप कर रहे हैं वे मैं क्यों करूं? मैं क्यों वापस उसी ढंग से औरत को देखूं? चाहे वे मेरी सास हों, चाहे मेरी फ्रैंड हो? मैं औरत को व्यंग्य का पात्र क्यों बनाऊं? मैं ने क्या किया? एक वूमन क्राइम रिपोर्टर होने की वजह से जो महसूस करती थी
उसे ही जोक्स के लिए ट्राई करती थी फिर डार्क ह्यूमर के रूप में स्टेज पर पेश करती थी. यह काफी कठिन रहता है. उदाहरण के लिए जब
आप बलात्कार की एफआईआर लिखाने पहुंचती हैं तो उस में क्याक्या तकलीफें होती हैं, किस तरह की समस्याएं आती हैं, एफआईआर दर्ज करने के 7 चरण क्या है जैसे पहलुओं को डार्क ह्यूमर की तरह सामने लाना आसान नहीं.’’
लाइव ऐक्सपीरियंस से मिलती है स्क्रिप्ट
प्रीति कहती हैं, ‘‘ऐक्चुअली मैं हमेशा लिख रही होती हूं और हर तरफ से इंस्पिरेशन ले लेती हूं. मैं खूब ट्रैवल करती हूं, लोगों से मिलती हूं, फैस्टिवल्स में पार्टिसिपेट करती हूं. मु झे कहानी ढूंढ़ना पसंद है, मु झे रिसर्च पसंद है और चूंकि मैं इतनी घूमती हूं तो मैं अपनी कहानियों को डौक्यूमैंट करती हूं. मेरे अंदर की पत्रकार अभी भी जिंदा है. कहीं भी जाती हूं आंखकान खुले रखती हूं. चीजों को औब्जर्व करती हूं और स्क्रिप्ट तैयार कर लेती हूं.
‘‘उदाहरण के लिए एक इवेंट के बाद हम कुछ यंग दोस्त बैठे थे और खाना खा रहे थे. तभी वहां एक लड़की ने जोर से किसी लड़के को तमाचा मारा. हम वहां मदद के लिए गए तो पता लगा वह लड़का उस लड़की का पीछा कर रहा था. पुलिस को बुलाया गया. पुलिस ने एक घंटा लिया केवल यह डिसाइड करने में कि यह जो हुआ यानी जो छेड़छाड़ की घटना हुई वह किस की ज्यूरिसडिक्शन में.
‘‘उस घटना पर मैं ने पूरा व्यंग्य लिखा कि एक तो बेचारी छेड़ी जा चुकी है उस पर 1 घंटा लगेगा यह पता लगाने में कि यह किस एरिया में आता है. इस एरिया में आता है कि उस एरिया में? मु झे लिखना पसंद है. मैं महिला सैंट्रिक बहुत काम करती हूं. मैं महिलाओं की कहानी भी सैलिब्रेट करती हूं. मैं ने एक पायलट की कहानी परफौर्म की जो भारत की शायद इनिशियल फर्स्ट टू महिला पायलट्स में से एक थी. वह साड़ी पहन के कौकपिट में जाती थी.’’
बोल्ड भी और बेबाक भी
प्रीति बताती हैं, ‘‘मेरा 13 साल का बेटा है कबीर दास ठक्कर. जब मेरा बच्चा हुआ तो उस के 8वें महीने में भी मैं उस को पीछे के ग्रीनरूम में ब्रैस्ट फीड कराती थी और परफौर्म करती थी. तब मैं महिलाओं की खासकर जो ब्रैस्टफीडिंग मदर्स होती हैं उन पर बात करती थी. एक मां ने एक जीवन को जन्म दिया है और वह जो कर रही है वह बहुत ही नेक काम है. उस के शरीर में बच्चे के लिए भोजन उत्पन्न हो रहा है. वह उस की भूख मिटा रही है.
‘‘एक पूरा स्टैंडअप शो इस विषय पर था कि आप होटल्स और हर जगह स्मोकिंग जोन देंगे पर ब्रैस्ट फीडिंग रूम टौयलेट के पास रखा जाएगा. इस पर हम ने बहुत सारा फन भी किया था और यह सब करना इजी नहीं होता क्योंकि जब आप एक महिला हो कर बहुत बोल्ड चीजों पर बात करती हैं न तो लोग अकसर आप को कहते हैं कि क्या आप अश्लील हो. जब मर्द वूमन पर जोक्स करते हैं तो हमारे शरीर के अंगों को नाम दे कर पेश करते हैं जैसे तू तंदूरी चिकन की पीस है. तब सब ऐक्सैप्ट करते हैं
पर हम जब अपनी बौडी की ओनर लेती हैं तो तब बहुत से लोगों के लिए यह बहुत अनकंफर्टेबल हो जाता है. मु झे ये लोग कहते थे बहुत बोल्ड है भाई क्याक्या स्टेज पर कहती है. जबकि मैं तो अपनी बात करती हूं. मैं ब्रैस्टफीडिंग की बात कर रही हूं. समाज ब्रैस्टफीड करा रही महिलाओं को स्पेस नहीं दे रहा तो इस पर बात होनी जरूरी है.
‘‘मुझे याद है एक बार मजाक में किसी ने मेरे हस्बैंड से कहा था कि भाई तुम्हें पता है तुम्हारी घरवाली स्टेज पर जा कर क्याक्या कहती है? तो उन्होंने कहा कि वह छोड़ो. पता है वह घर पर क्याक्या कहती है? मेरे पति मु झे हमेशा एनकरेज करते हैं. मैं कभी टाइम पास नहीं करती. मेरा 15 मिनट का सैट हो या 1 घंटे का,
मैं उस में आप को थोड़ा सा डिस्कंफर्ट देना चाहती हूं. मैं आप को यह बताना चाहती हूं कि आप अगर अपनी मदर से बात करें तो तब सम झे कि मेनोपौज क्या है. इनफैक्ट मैं इतनी बार औडियंस से पूछती हूं बड़ेबड़े शोज में कि मेनोपौज कितने को पता है तो 300 के हाल में
10 लोग हाथ उठाएंगे.
‘‘अब बात चाहे हमारे शरीर को ले कर हो, हमारे हैल्थ इश्यू को ले कर हो, हमारी रिलेशनशिप को ले कर हो मु झे टैबू तोड़ना होता है. मैं बहुत डिसरप्टिव हूं. मैं आप को अपने शोज में अनकंफर्टेबल करना चाहती हूं. जब मैं ने स्टैंडअप शुरू किया था तो मु झे लगता था कि जितनी हंसी, जितनी तालियां उतना अच्छा. एक उम्र के बाद मु झे पता लग रहा है कि साइलैंस बहुत पावरफुल है. इस का मतलब है औडियंस आप को सुन रही हैं, आप को पूरा औब्जर्व कर रही है और आप के साथ है. वे जो तालियों की गूंज होती है न हंसी वाली तालियां नहीं होतीं बल्कि एक सलामी वाली होती हैं. ह्यूमर 9 रसों में से सब से दिलचस्प रस है. ह्यूमर का मतलब केवल हंसी नहीं है. चार्ली चैपलिन ने हमें सब से पेनफुल चीजों पर हंसना सिखाया है. ह्यूमर इमोशनल कनैक्ट है.’’
वर्क लाइफ बैलेंस
प्रीति का कहना है, ‘‘हमारी शादी को इस दिसंबर में 17 साल होंगे. मैं परिवार के लिए समय निकालती हूं. ऐक्चुअली मैं प्रायरिटाइज करती हूं. भले ही मैं 1 घंटा औफिस में काम कम करूं लेकिन 40 मिनट वाकिंग जरूर करती हूं. मैं अपने बेटे के साथ वक्त बिताने के लिए भी प्राथमिकताएं तय करती हूं. मैं अपने बिजी शैड्यूल में भी डैफिनेटली अपने बच्चे के साथ बिना मोबाइल के कुछ घंटे बिताती हूं. अब चाहे लेट के हम लोग स्टोरी बुक पढ़ रहे हैं या उस का होमवर्क कर रहे हैं. उस को कुछ सब्जैक्ट मेरे साथ पढ़ने में बड़ा मजा आता है क्योंकि मैं किसी भी विषय को कहानी की तरह परोस देती हूं, हम मस्ती करते हैं. मेरे पति फुटबाल के बारे में कुछ नहीं जानते.
‘‘मैं और मेरा बेटा घंटों तक फुटबाल डिस्कस करते हैं. बच्चे के लिए समय निकालने का मतलब मेरे लिए केवल उस की पसंद का खाना बनाना नहीं है. मैं उस की ओवरआल ग्रोथ का खयाल रखती हूं. मेरा बेटा तबला प्लेयर है वह बेहतरीन तबला बजाता है. किसी शो में अगर मैं अकेली परफौर्म कर रही होती हूं तो उसे भी साथ ले लेती हूं. मैं कोई सुपर हीरो नहीं हूं. मैं अगर कुछ रोल्स में नहीं हूं तो भी चलेगा. औफिस में कम समय भी हूं तो भी चलेगा लेकिन बच्चे के लिए मेरा होना बहुत जरूरी है.’’
