जंतर मंतर हुए Gen Z के प्रोटेस्ट के बाद वे अचानक से लाइमलाइट में आ गएँ है. Gen Z को लेकर सोशल  मीडिया पर एक बहस सी छिड़ गयी है. कोई नीट पेपर मामले में उनके मूव की तारीफ़ कर रहा है तो कोई उनके गैरजिम्मेवार रवैये और गालियों को लेकर उन्हें मग भर भर के कोस रहें है.

हालाँकि इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि एक तरफ जहां इस पीढ़ी के पास डिजिटल दुनिया की समझ, अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता और निडरता है, वहीं दूसरी तरफ व्यावहारिक जीवन की छोटी-छोटी चुनौतियां भी इनके सामने पहाड़ बनकर खड़ी हो जाती हैं। ऐसा इसलिए भी है क्यूंकि ये लोग उस दौर में जी रहें है जिन्होंने कोई कमी नहीं देखी। ये अपने माँ बाप के पैसों के दम पर पलने वाली पीढ़ी है. जिन्हें अपने चारों तरफ एक प्रोटेक्टिव माहौल मिला हुआ है. लेकिन यह  तो सही है लेकिन अगर व्यवहारिक तौर पर देखें तो Gen Z को इसका नुक्सान ज्यादा उठाना पढ़ रहा है.

आइए इसे कुछ प्रमुख बिंदुओं के जरिए समझते हैं कि कैसे अति-सुरक्षात्मक माहौल आगे चलकर व्यावहारिक जीवन में बाधा बनता है:

1. ‘हेलिकॉप्टर पेरेंटिंग’ और डिसीजन लेने में हिचकिचाहट

आज के पेरेंट्स वे है जिन्हें 4 -5 नहीं बल्कि 1 -2 बच्चे ही पालने है. यही वजह है कि वे उन्हें हर सुख सुविधा देना चाहते है. वे बच्चों को लेकर इतने प्रोटेक्टिव है कि उनकी हर एक चीज खुद करते है.  हर  बचाना चाहते है. इसलिए जब भी  मुश्किल आ कड़ी होती है तो वे तुरंत बच्चों की ढाल बन जाते है. स्कूल के प्रोजेक्ट से लेकर करियर के चुनाव तक, माता-पिता ही सारे फैसले लेते रहे हैं इसलिए Gen Z को खुद से कोई फैसला लेने की आदत ही नहीं होती। उन्हें दूसरे की बैसाखी के सहारे की आदत हो जाती है.

परिणाम-  जब Gen Z कार्यस्थल या असल जिंदगी में अकेला खड़ा होता है, तो वह छोटे-छोटे फैसले लेने में घबराने लगता है। उन्हें हमेशा किसी के गाइडेंस या अनुमोदन की आदत हो जाती है।

2. ‘रिजिलिएंस’ (सहनशक्ति) और ‘इमोशनल स्ट्रेंथ’ की कमी

बचपन से ही ‘ना’ न सुनने के कारण जब दफ्तर में बॉस से डांट पड़ती है या कोई प्रोजेक्ट रिजेक्ट होता है, तो ये युवा बहुत जल्दी निराश हो जाते हैं। इन्हें ना सुनने की आदत ही नहीं होती है इस वजह से ये परेशां रहते है और किसी की ना को अपनी ईगो पर ले लेते है. सामने वाले की सही बात भी इसलिए इन्हें गलत ही लगती है और वे थोड़ा भी बर्दाश्त नहीं कर पाते है.

परिणाम-  थोड़ी सी भी विपरीत परिस्थिति आते ही नौकरी छोड़ देना या पीछे हट जाना इस बात का संकेत है कि इनमें भावनात्मक रूप से मुश्किलों का सामना करने की क्षमता कम विकसित हुई है।

3. लाइफ स्किल्स इन्हें आती ही नहीं

सब्जी खरीदना, इलेक्ट्रीशियन/प्लंबर से काम करवाना, बैंक के काम निपटाना या खुद खाना बनाना, इन सभी कामों से इस पीढ़ी को दूर रखा गया ताकि वे “बस अपनी पढ़ाई पर ध्यान दें”।

परिणाम- जब ये युवा नौकरी या पढ़ाई के सिलसिले में घर से दूर या विदेश जाते हैं, तो उन्हें काम का दबाव उतना परेशान नहीं करता जितना कि घर और रोजमर्रा की जिंदगी को संभालने का तनाव करता है। यही वजह है कि जब कहीं दूर शहर में  एडमिशन हो जाता है तो इन्हें वहां कुछ भी मैनेज करना नहीं आता. सिर्फ यही नहीं बल्कि ये युवा शादी के बाद भी घर नहीं संभाल पाते। इस वजह से इनके रिश्तों पर भी फर्क पड़ता है.

4. हर चीज एक क्लिक पर चाहिए

सोशल मीडिया और तकनीक के दौर में पले-बढ़े होने के कारण इन्हें हर चीज एक क्लिक पर तुरंत इंस्टेंट मिलने की आदत है. इसलिए इनमें सब्र नहीं है.

परिणाम- करियर बनाना, पैसे बचाना या रिश्तों को मजबूत करना। ये सब लंबे समय और धैर्य की मांग करते हैं। जब वास्तविक जीवन में तुरंत परिणाम नहीं मिलते, तो Gen Z में एंग्जायटी और चिड़चिड़ापन बढ़ने लगता है।

5. ‘प्रिविलेज’ बनाम ‘हकीकत’ का फर्क

इस जनरेशन को पेरेंट्स का सपोर्ट इतना ज्यादा मिला है कि इन्हें किसी बात की कोई चिंता ही नहीं है. माता-पिता की आर्थिक मजबूती की वजह से युवाओं के पास हमेशा एक ‘सेफ्टी नेट’ (सुरक्षा कवच) रहता है। इन्हें खाने कमाने की भी कोई चिंता नहीं है. इन्हें पता है सर पर  बनाई छत है और जेब  दी हुई पॉकेट मनी है, तो फिर गम किस बात का.

परिणाम- यह प्रिविलेज उन्हें अवसर ठुकराने या बिना सोचे-समझे फैसले लेने की हिम्मत तो देता है, लेकिन जब कभी पारिवारिक परिस्थितियां बदलती हैं (जैसे माता-पिता की सेवानिवृत्ति, आर्थिक तंगी आदि), तो ये युवा अचानक आई जिम्मेदारी को संभालने में असमर्थ महसूस करते हैं।

समाधान क्या हो सकता है?

पेरेंट्स Gen Z को ‘प्रोटेक्ट’ करने के बजाय ‘प्रिपेयर’ करें –

पेरेंट्स को चाहिए कि वे बच्चों को भी घर के हर काम में शामिल करें।

उनसे किचन का काम बराबर का कराएं, खाना बनाने की ट्रेनिंग दें. एक दिन हफ्ते में नाश्ता खाना Gen Z बनायें।

उन्हें पैसों का हिसाब  सिखाएं, उन्हें बैंक के काम आदि करने को कहें और जो पॉकेट मोरे आप उन्हें दे रहें है उसे जोड़ने के लिए भी कहें।

उन्हें अपनी समस्याओं को खुद सुलझाने का मौका दें।

Gen Z को असफलता का स्वाद चखने दें। असफलता ही इंसान को मानसिक रूप से मजबूत बनाती है।

खुद Gen Z की पहल: युवाओं को खुद यह समझना होगा कि आत्म-निर्भरता (Self-reliance) केवल आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने का नाम नहीं है, बल्कि मानसिक और व्यावहारिक रूप से भी मजबूत होने का नाम है।

खुद Gen Z की पहल-

अगर Gen Z सच में एक मजबूत, आत्मनिर्भर और व्यावहारिक पीढ़ी बनना चाहती है, तो उन्हें खुद आगे बढ़कर कुछ कड़े कदम उठाने होंगे। माता-पिता या समाज को कोसने के बजाय खुद में बदलाव लाना ही असली परिपक्वता (Maturity) है।

यदि Gen Z अपनी इस ‘बेफिक्री’ और ‘निडरता’ के साथ व्यावहारिक समझ को जोड़ ले, तो यह पीढ़ी इतिहास की सबसे ताकतवर जनरेशन बन सकती है। इसके लिए उन्हें खुद ये पहल करनी होगी:

1. घर के ‘सुरक्षा कवच’ से बाहर निकलना

अपने कम्फर्ट जोन से बहार आएं. अगर घर के पास मनमुताबिक काम नहीं मिल रहा, तो 1-2 घंटे का ट्रैवल करने या दूसरे शहर जाने से न डरें। शुरुआत में थोड़ी तकलीफ होगी, लेकिन यही स्ट्रगल आपको अंदर से मजबूत बनाएगा।

अगर कोई जॉब ठुकरानी है या अपना कुछ शुरू करना है, तो यह सोचकर करें कि ‘इसे मैं खुद संभालूंगा’, न कि यह सोचकर कि ‘पीछे पापा का पैसा तो है ही’।

2. बेसिक ‘लाइफ स्किल्स’ सीखें

सब्जी मंडी जाकर भाव-ताव करना, बिजली/प्लंबर के काम खड़े होकर करवाना, बैंक के फॉर्म भरना या हफ्ते में 2-3 दिन खुद खाना बनाना सीखें।

जब आप खुद अपने कपड़े धोना या कमरा साफ करना सीखेंगे, तो आपको समझ आएगा कि एक घर को चलाने में कितनी मेहनत लगती है। इससे आप जब बाहर या विदेश जाएंगे, तो कभी असहाय महसूस नहीं करेंगे।

3. पैसों का हिसाब और ‘फाइनेंशियल डिसिप्लिन’

महीने की शुरुआत में मिलने वाले पैसों या अपनी पहली सैलरी का हिसाब रखना शुरू करें।

‘चाहत’ और ‘जरूरत’ में फर्क समझें: सिर्फ ट्रेंड या सोशल मीडिया पर दिखाने के लिए ब्रांडेड कपड़े, महंगे फोन या रोज बाहर खाने पर खर्च करने के बजाय बचत और निवेश की आदत डालें। जब खुद का कमाया हुआ पैसा जेब से निकलता है, तब असली कीमत समझ आती है।

4. ‘फीडबैक’ को पॉज़ीटिव लेना सीखें

इगो को साइड रखें। ऑफिस में बॉस की डांट या सीनियर का फीडबैक आपकी पर्सनल दुश्मनी नहीं है। इसलिए अगर बॉस या कुलीग किसी बात के लिए मन कर रहें है तो दिल पर ना लें. जिंदगी हमेशा आपके हिसाब से नहीं चलेगी। जब चीजें आपके अनुकूल न हों, तब भी टिके रहना और उस परिस्थिति का सामना करना सीखें।

5. जिंदगी 2 मिनट में नूडल्स बनाने जैसा नहीं है

सोशल मीडिया पर दूसरों की चमक-धमक देखकर अपनी तुलना न करें। करियर, पैसा और इज्जत बनने में सालों का समय लगता है, यह कोई ‘2 मिनट नूडल्स’ नहीं है।

6 डिजिटल डिटॉक्स भी करें

रील्स और काल्पनिक दुनिया से बाहर निकलकर जमीन पर लोगों से बात करें, रिश्ते निभाएं और असल जिंदगी के अनुभवों से सीखें।

सच्ची आजादी क्या है?

माता-पिता के पैसों पर बेफिक्र होकर जीना ‘आजादी’ नहीं है। असली आजादी तब मिलती है जब आप अपने फैसले खुद लेते हैं, अपनी असफलताओं की जिम्मेदारी खुद उठाते हैं और बिना किसी सहारा के अपने पैरों पर खड़े होने का दम रखते हैं।

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