Relationship Conflicts : वैवाहिक  विवाद आजकल सिर्फ घरआंगन तक सीमित नहीं रहे. अब बात कोर्ट कचहरी से होते हुए पति के औफिस तक पहुंच रही है. सुप्रीम कोर्ट ने इस बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताई है. वैवाहिक विवाद के दौरान अगर पत्नीपति के औफिस/एंप्लायर को शिकायत भेजती है तो यह कदम भारी पड़ सकता है. इस से पति की नौकरी जा सकती है और इस का सीधा असर पत्नी के भरणपोषण यानी मेंटिनेंस पर भी पड़ेगा. जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा कि तलाक लेना अलग बात है लेकिन किसी की आजीविका छीनना ज्यादा गंभीर है. अगर नौकरी चली गई तो बाद में मेंटिनेंस किस आधार पर मांगा जाएगा?

मामला क्या था

एक महिला ने अपने पति जो भारतीय वायुसेना में अधिकारी हैं, के खिलाफ शिकायत की थी कि वह सेवा नियमों के खिलाफ निजी कारोबार कर रहे हैं. इसी के बाद पति ने मानहानि का केस कर दिया. महिला का कहना था कि शिकायत दुर्भावना से नहीं थी  बल्कि सच सामने लाने के लिए थी.

गुस्से में उठाया कदम, जिंदगीभर का असर

जब रिश्ते में खटास आती है तो दर्द, गुस्सा और बेबसी स्वाभाविक है. कई बार लगता है कि इसे सबक सिखाना जरूरी है. लेकिन याद रखिए गुस्से में लिया गया एक कदम आप के ही भविष्य पर असर डाल सकता है.

  1. आजीविका पर हमला यानी खुद के पैर पर कुल्हाड़ी. कानूनी लड़ाई में आर्थिक सुरक्षा सब से जरूरी है. बदले की भावना में अगर आप उस की नौकरी पर आंच लाती हैं तो कल को आप खुद आर्थिक रूप से कमजोर हो सकती हैं.
  2. शिकायत का तरीका सही होना चाहिए. वैवाहिक विवाद फैमिली कोर्ट, महिला आयोग या काउंसलिंग के जरिए सुल झाएं. सीधे एंप्लायर को शिकायत करना ‘‘दुर्भावनापूर्ण’’ साबित हो सकता है और आप पर ही मानहानि का केस हो सकता है.
  3. बच्चों और भविष्य के बारे में सोचें. भले ही तलाक का फैसला पतिपत्नी के बीच की बात है लेकिन उस से बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च, बुढ़ापे की सुरक्षा सब जुड़ा है. एक आवेश में लिया फैसला पूरी जिंदगी को प्रभावित करता है.

कानून में हर समस्या का समाधान है लेकिन तरीका सही होना चाहिए. पति की गलती है तो सुबूत के साथ कोर्ट जाएं. एंप्लायर को शिकायत आखिरी विकल्प होना चाहिए और वे भी तभी जब घरेलू हिंसा या गंभीर अपराध का मामला हो. याद रखें तोड़ना आसान है लेकिन बनाना मुश्किल.

क्या करें

गुस्से में कोई मेल/पत्र न लिखें. पहले डायरी में लिख कर मन हल्का करें.

भरोसेमंद वकील से मिलें: मुफ्त कानूनी सलाह के लिए नालसा हेल्पलाइन 15100 पर कौल करें.

पहले बातचीत और काउंसलिंग: कई बार तीसरे व्यक्ति की मदद से रास्ता निकल आता है.

कानूनी सलाह जरूर लें: कोई भी चिट्ठी या शिकायत भेजने से पहले वकील से पूछें.

आर्थिक सुरक्षा पहले: मेंटिनेंस, प्रौपर्टी, बच्चों की कस्टडी इन सब पर ठंडे दिमाग से सोचें.

आर्थिक प्लान बनाएं: मेंटिनेंस के साथसाथ अपने लिए जौब/स्किल पर भी काम करें.

सपोर्ट सिस्टम बनाएं: मातापिता, दोस्त या सपोर्ट गु्रप से बात करें. अकेले फैसला न लें. याद रखिए.

याद रखिए अदालत आप को न्याय देगी लेकिन जिंदगी आप को खुद जीनी है. सुकून आप को खुद चुनना पड़ेगा.

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