Dermal Fillers : हीरोइनें और मशहूर हस्तियां बोटॉक्स, फिलर्स और कॉस्मेटिक सर्जरी के अत्यधिक इस्तेमाल के कारण आजकल एक जैसी दिखने लगी हैं, क्योंकि ये ट्रीटमेंट चेहरे के नैचुरल भावों को खत्म करके एक फिक्स्ड और बनावटी ‘यूथफुल’ मानक जैसे तीखे गाल, फूला हुआ चेहरा और बिना झुर्रियों की त्वचा को बढ़ावा देते हैं. असल में इंडस्ट्री में हमेशा युवा और बेदाग दिखने का भारी दबाव अभिनेत्रियों को होता है. कई सेलिब्रिटी एक ही तरह के कॉस्मेटिक विशेषज्ञों और स्टैंडर्ड प्रक्रियाओं का सहारा लेती है, जिससे उनके ओरिजिनल चेहरे से बाद का चेहरा अलग हो जाता है, जिससे वे कई बार सोशल मीडिया पर ट्रोल भी हो जाती है, पर वे इसे करती रहती है. दरअसल बोटॉक्स चेहरे की मांसपेशियों को सुन्न कर देता है, जिससे चेहरे की ओरिजिनलिटी गायब हो जाती है.

सौंदर्य विशेषज्ञों की राय

सौंदर्य विशेषज्ञों का मानना है कि जब 80 के दशक की अभिनेत्रियां अपनी ढलती उम्र को रोकने के लिए हैवी मिड-फेस फिलर्स करवाती हैं, जिससे उनका चेहरा अपनी यूनिक हड्डियों की बनावट खो देता है. इसके बाद जब वे हंसती हैं, तो गालों का अत्यधिक उभार और आंखों का छोटा होना सभी चेहरों पर एक जैसा प्रभाव पैदा करता है, जिसे सोशल मीडिया पर कभी-कभी “राखीफिकेशन” यानि राखी सावंत जैसे आर्टिफिशियल लुक की तरह भी कह दिया जाता है. माधुरी दीक्षित, सुस्मिता सेन, ऐश्वर्या राय, शिल्पा शेट्टी आदि कई ऐसी हीरोइनों के लुक्स एक जैसे है और इनके ओरिजिनल चेहरे से आज ये काफी अलग दिखने लगी है. मेडिकल भाषा में इसे फेशियल ओवर फिल्ड सिंड्रोम कहा जाता है, और आम भाषा में इसे पिलो फैस यानि तकिये जैसा सूजा हुआ चेहरा या क्लोन फैस भी कहते हैं.

लोकप्रिय होते बोटॉक्स और डर्मल फिलर्स

इस बारें में मुंबई की ग्लेनीगल्स हॉस्पिटल की प्लास्टिक एवं कॉस्मेटिक सर्जन डॉ. वशिष्ठ दीक्षित कहते है कि आजकल बोटॉक्स और डर्मल फिलर्स उन लोगों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं, जो बिना सर्जरी के अपने चेहरे को ज्यादा फ्रेश और जवां दिखाना चाहते हैं, लेकिन नेचुरल रिजल्ट पाने के लिए सिर्फ ट्रीटमेंट करवाना ही काफी नहीं होता. सही ट्रीटमेंट चुनना, सही मात्रा में प्रोडक्ट का इस्तेमाल करना और सही समय पर उसे रिपिट करना भी उतना ही जरूरी है.

एक बार करवाया गया बोटॉक्स का असर करीब 3 से 4 महीने तक रहता है, जो व्यक्ति की मांसपेसियों की प्रतिक्रिया पर निर्भर करती है. जबकि फिलर्स का असर इससे काफी ज्यादा समय तक रह सकता है. यह फिलर के प्रकार, लगाने की जगह और व्यक्ति के शरीर के मेटाबॉलिज्म पर निर्भर करता है. कुछ बातें निम्न है, जिन्हे जानना जरूरी है,

  • इसलिए बोटॉक्स या फिलर्स को किसी तय तारीख या कैलेंडर के हिसाब से करवाने के बजाय, चेहरे में होने वाले बदलाव और पुराने ट्रीटमेंट के असर को देखकर फैसला करना बेहतर होता है.
  • इसके शुरू करने की कोई तय उम्र नहीं है. व्यक्ति की जरूरत और त्वचा से जुड़ी समस्या देखकर इसे किया जाना चाहिए. कुछ लोगों के चेहरे पर उम्र से पहले ही बार-बार हंसने या चेहरे के भाव बनाने से लाइनें नजर आने लगती हैं, जबकि कुछ लोगों को काफी बाद तक इसकी जरूरत नहीं पड़ती.
  • बोटॉक्स का इस्तेमाल आमतौर पर उन झुर्रियों और लाइनों को कम करने के लिए किया जाता है, जो चेहरे की मांसपेशियों की बार-बार होने वाली हरकत से बनती हैं. फिलर्स का इस्तेमाल चेहरे पर कम हुए वॉल्यूम को वापस लाने या चेहरे के कुछ हिस्सों के आकार और कंटूर को बेहतर करने के लिए किया जाता है.
  • कई बार अच्छी स्किनकेयर, धूप से बचाव और स्वस्थ जीवनशैली ही त्वचा को बेहतर बनाए रखने के लिए पर्याप्त हो सकती है.
  • कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट का मकसद हमेशा चेहरे की खूबसूरती को निखारना होना चाहिए, व्यक्ति का चेहरा बदलना नहीं. ट्रीटमेंट के बाद भी व्यक्ति आईने में खुद को पहचान सके और चेहरे के भाव स्वाभाविक नजर आएं, यह जरूरी होता है.
  • इसमें प्रोडक्ट की मात्रा और उसे चेहरे पर किस जगह लगाया जा रहा है, इसकी बड़ी भूमिका होती है. ज्यादा प्रोडक्ट लगाने का मतलब हमेशा बेहतर रिजल्ट नहीं होता. एक अनुभवी और योग्य कॉस्मेटिक सर्जन चेहरे के आकार, उसके अनुपात, मांसपेशियों की हरकत और दोनों तरफ के संतुलन को समझकर जरूरत के अनुसार कम या उचित मात्रा में ट्रीटमेंट करता है.

इलाज के बाद देखभाल

डॉक्टर आगे कहते है कि ट्रीटमेंट के बाद की देखभाल भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. व्यक्ति को डॉक्टर द्वारा दी गई सलाह का पालन करना चाहिए. ट्रीटमेंट के प्रकार के अनुसार कुछ समय तक उस जगह को रगड़ने या उस पर ज्यादा दबाव डालने से बचने की सलाह दी जा सकती है.

बहुत ज्यादा धूप से बचना, नियमित स्किनकेयर करना, पर्याप्त पानी पीना और स्वस्थ जीवनशैली अपनाना भी त्वचा की सेहत को बनाए रखने में मदद करता है. हालांकि, सिर्फ ट्रीटमेंट का असर लंबे समय तक बनाए रखने के लिए बार-बार अतिरिक्त ट्रीटमेंट करवाते रहना सही तरीका नहीं है.

मेंटेनेंस इलाज कराना है जरूरी

बोटॉक्स के मामले में मरीज को लग सकता है कि पहले कम दिखाई देने वाली एक्सप्रेशन लाइन्स अब फिर से नजर आने लगी हैं या चेहरे की मांसपेशियों की हरकत धीरे-धीरे वापस आ रही है. फिलर्स के मामले में चेहरे पर पहले कम हुआ वॉल्यूम फिर से नजर आ सकता है या बनाया गया कंटूर धीरे-धीरे कम होने लग सकता है, ऐसे में ट्रीटमेंट का पूरा असर खत्म होने तक इंतजार न करें. सही समय पर हल्का मेंटेनेंस ट्रीटमेंट करवाने से नेचुरल रिजल्ट को बनाए रखना आसान हो सकता है.

इंजेक्शन वाले ट्रीटमेंट को आखिरी समय पर करवाने से बचना चाहिए. फिलर्स के बाद कुछ समय के लिए सूजन या नीले निशान हो सकते हैं, इसलिए किसी खास अवसर से काफी पहले डॉक्टर से ट्रीटमेंट की टाइमलाइन पर चर्चा करना बेहतर होता है. इससे ट्रीटमेंट को चेहरे पर ठीक से सेट होने का समय मिलता है.

सोशल मीडिया से न हो प्रभावित

कई बार लोग सोशल मीडिया पर किसी सेलिब्रिटी या दूसरे व्यक्ति का लुक देखकर वैसे चेहरे पर पाने की कोशिश करते हैं, जबकि हर व्यक्ति का चेहरा अलग होता है. किसी दूसरे व्यक्ति पर अच्छा दिखने वाला ट्रीटमेंट जरूरी नहीं कि आपके चेहरे पर भी उसी तरह अच्छा लगे. इसके अलावा लोग बार-बार अलग-अलग डॉक्टरों या क्लीनिक से ट्रीटमेंट करवाते हैं, जो ठीक नहीं होता. हमेशा किसी अनुभवी मेडिकल प्रोफेशनल के साथ नियमित रूप से ट्रीटमेंट करवाए और पुराने ट्रीटमेंट की जानकारी साझा करे.

इस प्रकार ‘ओवरडन’ लुक से बचने के लिए सही जांच, सही प्रोडक्ट का चुनाव, उसे सही जगह पर लगाना और ठीक मात्रा में संतुलन जरूरी है. बोटॉक्स से चेहरे की हर एक लाइन को पूरी तरह खत्म करना नहीं होना चाहिए और फिलर्स का मकसद चेहरे का पूरा आकार बदलना नहीं होना चाहिए, ताकि व्यक्ति अपनी ओरिजिनल चेहरे को भूल जाय.

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