Taniksha Khatri : कोई लड़की किसी भी गेम या प्रोफैशन में आगे बढ़ना चाहती है तो उसे वह काम करना चाहिए बिना यह सोचे कि लोग क्या सोचेंगे या लोग सपोर्ट करेंगे या नहीं. इस गेम में सब से पहली चीज तो माइंडसैट ही होती है. अगर लड़की अपनेआप को मैंटली पूरा प्रिपेयर कर के यह सोचे कि हां मेरे को करना है तो वह जरूर आगे बढ़ जाएगी…

हरियाणा की मिट्टी से निकली तनिक्शा खत्री आज भारत की सब से होनहार एपी फेंसर यानी तलवारबाज हैं. कम उम्र में ही फेंसिंग को अपनाना और फिर अपने निर्भीक अंदाज और काबिलीयत से कितने ही गोल्ड और सिल्वर मैडल जीते. नैशनल चैंपियन से ले कर जूनियर कौमनवैल्थ और एशियन चैंपियनशिप तक मैडल जीतना उन के सफर की पहचान है. हांग?ाऊ एशियन गेम्स में क्वार्टर फाइनल तक पहुंच कर इतिहास रचने वाली पहली भारतीय महिला एपी फेंसर बन कर उन्होंने यह साबित कर दिया कि भारतीय तलवारबाजी अब विश्व मंच पर दस्तक दे रही है.

अपने डिसिप्लिन, शांत स्वभाव और अथक मेहनत के लिए जानी जाने वाली तनिक्शा आज टारगेट ओलिंपिक पोडियम स्कीम के तहत यूरोप में ट्रेनिंग ले रही हैं, जिन की नजर अब सीधी लास ऐंजिल्स 2028 ओलिंपिक पर है. वे भारतीय नौसेना में भी हैं. ऐक्चुअली वे सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं बल्कि देश की हजारों बेटियों के लिए एक प्रेरणा भी हैं जो फेंसिंग को भारत का भविष्य बना रही हैं.

तनिक्शा खत्री का जन्म 2003 में करनाल में एक मिडल क्लास फैमिली में हुआ था. उन के एक बड़े भाई हैं जो कनाडा में रहते हैं. उन के पापा पुलिसमैन हैं और मम्मी हाउसवाइफ हैं. वे बताती हैं, ‘‘बचपन से ही मेरे भाई का पढ़ाई में काफी ज्यादा इंटरैस्ट था और मैं गेम्स में बहुत ज्यादा ऐक्टिव थी. स्टार्टिंग से ही ऐथलैटिक्स खासकर रनिंग वगैरह बहुत पसंद थीं. इसलिए पापा ने डिसाइड किया कि वे मुझ खिलाड़ी बनाएंगे. वे मेरी फिटनैस पर ध्यान देते थे और वर्कआउट के लिए ट्रैक पर ले कर जाते थे. उन्होंने मुझ आलमोस्ट 3-4 साल अपने पास अच्छे से ट्रेनिंग करवाई.’’

फेंसिंग में आने का डिसीजन

तनिक्शा कहती हैं, ‘‘मुझे एक टाइम पर गेम चूज करना था कि मैं प्रोफैशनली कौन सा गेम खेलना चाहती हूं. मैं ने फर्स्ट टाइम करनाल में एक स्टेडियम में फेंसिंग देखी थी तो वह मुझ काफी इंटरैस्टिंग और बाकी गेम से काफी अलग लगा था. हरियाणा में सभी गेम्स को काफी सपोर्ट किया जाता है. बौक्सिंग, ऐथलैटिक्स, रैसलिंग इन गेम्स को तो हर कोई जानता है लेकिन जब मैं ने फेंसिंग पहली बार देखी थी तो मुझ ऐसा लगा कि मुझ कुछ अलग ट्राई करना है. मेरे माइंड में पहली चीज यही आई थी कि यह सब तो मैं ने टीवी और मूवीज में देखा है तो मुझे भी यही खेलना है. पहले मैं ने फाइल्स से स्टार्ट किया था अब एपी खेल रही हूं.

‘‘मैं जब 12-13 साल की थी तभी से फेंसिंग शुरू कर दी थी. विकास सर फेंसिंग में मेरे पहले कोच थे जिन्होंने मुझे यह गेम खेलना सिखाया. उन के पास ट्रेनिंग करने के एक साल बाद 2014-15 में मैं ने अंडर 14 में फर्स्ट नैशनल मैडल जीता था. फिर जब मेरे कोच का करनाल से ट्रांसफर हो गया तो मुझे पटियाला आना पड़ा क्योंकि मुझे फेंसिंग कंटिन्यू करना था और अच्छे कोच की जरूरत थी. तब से मैं इधर ही ट्रेनिंग कर रही हूं. यहां पर मेरे सैकंड कोच मोहित सर मिले जिन्होंने मेरा इवेंट चेंज किया. उन्होंने कहा कि तुम्हारी स्किल्स दूसरे इवेंट यानी एपी के हिसाब से ज्यादा अच्छी हैं. तब से मैं एपी इवेंट में कंटिन्यू कर रही हूं. अभी तक फेंसिंग की फील्ड में आए हुए मुझे आलमोस्ट 12-13 साल हो गए हैं. यहां मुझ फैमिली से दूर होस्टल में रहना पड़ रहा है जबकि मैं कभी फैमिली से दूर नहीं रही थी जो शुरू में बहुत मुश्किल था.

‘‘शुरू से मेरे पापा का बहुत ज्यादा सपोर्ट रहा है. उन्होंने मुझ 2019 में अपने पैसों से ट्रेनिंग के लिए पैरिस भेजा था और वहां से आने के बाद मैं सीनियर नैशनल में फर्स्ट गोल्ड मैडल ले कर आई. उस के बाद मैं नैशनल में कंटिन्यू थ्री टाइम्स चैंपियन रही. वहां से ट्रेनिंग के बाद मैं ने पैरिस में ही अब तक अपनी ट्रेनिंग कंटिन्यू की है. वहां पर मेरे कोच हैं मास्टर डेनियल. मैं उन के पास प्रैक्टिस करती हूं. वहां की ट्रेनिंग से मेरा गेम काफी इंप्रूव हुआ है. बीचबीच में मैं जब इंडिया में होती हूं तो पटियाला ट्रेनिंग के लिए आती हूं.

‘‘अपने कैरियर में मैं ने बहुत से गोल्ड मैडल जीते हैं. हाल में ही कौमनवैल्थ चैंपियनशिप में मेरे 2 गोल्ड मैडल्स आए हैं. एक सीनियर एपी वूमंस टीम में और एक इंडिविजुअल में. मैं नैशनल गेम्स की भी थ्री टाइम चैंपियन हूं. तीनों साल मेरा गोल्ड आया. जूनियर एशियन चैंपियनशिप में मेरा सिल्वर मैडल है. जूनियर कौमनवैल्थ चैंपियनशिप जो 2022 में हुई थी उस में मेरा सिल्वर मैडल है. एशियन गेम्स में मैं फर्स्ट इंडियन फेंसर हूं जिस ने क्वार्टर फाइनल तक क्वालीफाई किया था. उस के बाद मैं एशियाई ओलिंपिक में फाइनलिस्ट हूं. वहां पर मेरा सिल्वर मैडल है.’’

फेंसिंग गेम क्या है

तनिक्शा कहती हैं, ‘‘फेंसिंग में 3 तरह के इवेंट्स होते है- फाइल, एपी और सेबर. इन तीनों के टैक्नीक काफी ज्यादा डिफरैंट होती है. दरअसल तीनों वैपंस का वेट अलगअलग होता है और हमारा टारगेट भी अलगअलग होता है. जैसे एपी इवेंट जिस में मैं अभी खेल रही हूं उस में फुल बौडी टारगेट होता है और जो फाइल होता है उस में सिर्फ टोरसो एरिया को टारगेट किया जाता है. आर्म्स, लैग्स, हैड वगैरह नहीं होता. यानी केवल हमारा चैस्ट और स्टमक वाला पूरा एरिया. सेबर में सिर्फ अपर बौडी टारगेट होती है. उस में लोअर बौडी टारगेट नहीं होती. जब मैं इस एरिया पर ओपोनैंट को हिट मारूंगी इवेंट्स और टैक्नीक के हिसाब से तो मुझ पौइंट मिलेगा. तीनों वैपन भी अलगअलग होते हैं. फेंसिंग का पूरी किट होती है, जिस में फेंसिंग सूट होता है, स्टाकिंग्स होती हैं, मास्क होता है, अंडर प्लास्ट्रौन, चैस्ट गार्ड ,ग्लव्स, बौडी वायर आदि सबकुछ होता है. मुझ काफी प्राउड फील होता है कि हम जो मास्क पहनते हैं उस पर हमारा फ्लैग होता है. हम अपनी कंट्री को रिप्रेजैंट करते हैं, फ्लैग को कैरी कर के जाते हैं तो काफी प्राउड मोमैंट लगता है.’’

tanishka

पापा की सपोर्ट

तनिक्शा बताती हैं, ‘‘मेरे लिए शुरू से मेरे पापा बहुत ज्यादा सपोर्टिव रहे हैं. अगर आसपास में किसी ने बोला भी कि बेटी को गेम में नहीं डालना तो पापा कहते थे कि हमारी बेटी है. अगर वह कुछ करना चाहती है तो हम जरूर करवाएंगे. पापा ने अपने पैसे पर ट्रेनिंग भी करवाई है, मेरा इक्विपमैंट भी खरीदा है. हमारे गेम का इक्विपमैंट बहुत महंगा आता है जबकि हम मिडल क्लास फैमिली से बिलौंग करते हैं लेकिन उस टाइम पर डेढ़ दो लाख की किट अपने पैसों से खरीदना बहुत बड़ी चीज थी. मेरे पापा ने कभी मुझ किसी भी चीज की कमी नहीं महसूस होने दी. कभी नहीं कहा कि अभी हम यह नहीं ले सकते या अभी तू ट्रेनिंग नहीं कर सकती. उन का शुरू से ऐसा रहा कि तू बस गेम कर बाकी मैं देख लूंगा. अगर मेरा ढाई घंटे का या 3 घंटे का भी ट्रेनिंग सैशन होता था तो वे उधर ही खड़े रहते थे. उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया कि मुझ उधर छोड़ कर वापस आ गए. स्टार्टिंग से डिस्ट्रिक्ट लैवल या स्टेट लैवल या नैशनल लैवल पर पूरे इंडिया में कहीं भी कंपीटिशन है तो वे हमेशा मेरे साथ जाते थे. मुझ हरेक कंपीटिशन में ऐसा फील होता था कि मेरा एक पिलर है मेरे साथ. मुझ गिरने नहीं देगा यह इंसान.

‘‘पापा की हैल्थ प्रौब्लम के बाद मैं थोड़ा अकेली पड़ गई थी क्योंकि स्टार्टिंग से वे हरेक कंपीटिशन में मेरे साथ रहे थे और फिर एकदम से मुझ अकेले कंपीटिशन में जाना होता था या अकेले ट्रैवल करना होता था तो मेरे लिए बहुत मुश्किल होती थी चीजें. मुझ थोड़ा अजीब लगता था. फिर धीरेधीरे उन्हीं चीजों से मुझ काफी मोटिवेशन मिला और अभी मैं अपनेआप को इतना स्ट्रौंग मानती हूं कि मैं इंडिया से बाहर भी अपनेआप ट्रैवल कर सकती हूं, कंपीटिशन के लिए भी जा सकती हूं और ट्रेनिंग के लिए भी.’’

यूरोप में ट्रेनिंग का अनुभव

‘‘मुझ वहां विदेशी खिलाडि़यों के साथ ट्रेनिंग कर के काफी ज्यादा अच्छा लगा क्योंकि वहां पर ओलिंपिक मैडलिस्ट और वर्ल्ड चैंपियंस भी ट्रेनिंग करते हैं. वर्ल्ड के जो टौप रैंक ऐथलीट्स हैं वे भी वहां प्रैक्टिस करते हैं. तो मुझ उन से बहुत कुछ सीखने को मिला कि कहां पर किस टाइम पर फेंसिंग में क्या चेंज करना है या फेंसिंग से अलग भी हमारी जो लाइफ होती है वह कितनी ज्यादा मैटर करती है. किसी भी सिचुएशन को कैसे हैंडल करना है ऐसी चीजें मैं ने उन से सीखी हैं.

‘‘ऐक्चुअली वहां के एथलीट और हमारे ऐथलीट में कोई खास डिफरैंस नहीं है. नौर्मली हमारे ऐथलीट उन से ज्यादा मेहनत करते हैं. हमारे इंडियन ऐथलीट बहुत ज्यादा हार्ड वर्किंग हैं. बस वे कहीं न कहीं मैडल लाने से पहले किसी को सपोर्ट नहीं मिल पाता इस वजह से कई बार मात खा जाते हैं. मैडल लाने के बाद हर ऐथलीट के पास स्पौंसर भी होते हैं, फाइनैंशियली सपोर्ट भी होती है. मगर इंडिया में पहले कोई सपोर्ट नहीं करता. जब मैडल आ जाता है तब सपोर्ट मिलती है. अगर पहले से सपोर्ट मिले तो ऐथलीट खुद से मेहनत भी कर सकते हैं. मुझ मेरी फैमिली से सपोर्ट मिल गई थी. मिडल क्लास फैमिली होने के बाद भी पापा ने सब मैनेज किया लेकिन काफी फैमिलीज ऐसी हैं जो अपने बच्चों को सपोर्ट करना चाहती हैं लेकिन कर नहीं पातीं.

‘‘यही डिफरैंस है कि वहां पर ऐथलीट्स को शुरू से सपोर्ट किया जाता है. अगर हमारे ऐथलीट्स को भी पहले से सपोर्ट किया जाए तो उस से काफी डिफरैंस आएगा. बाकी अभी हमारी इंडियन गवर्नमैंट ने काफी स्कीम्स बनाई हुई हैं. पहले से काफी चेंज हुआ है. जो लोग टैलेंटेड हैं उन्हें गवर्नमैंट मदद करने लगी है. उन का रहने, खाने और ट्रेनिंग का सबकुछ गवर्नमैंट पे करती है.’’

डेली रूटीन

मैं सुबह 5:30 उठ के तैयार हो जाती हूं. सुबह 6:00 बजे से मेरी ट्रेनिंग होती है. मैं 6:00 बजे से 9:00 बजे तक अपनी ट्रेनिंग और प्रैक्टिस कर रही होती हूं. फिर 9:00 बजे ट्रेनिंग से आने के बाद ब्रेकफास्ट करती हूं. फिर लंच टाइम तक रैस्ट करती हूं. दोपहर 1:00 बजे से 1:30 बजे तक हमारा लंच हो जाता है. उस के बाद 2 से 3 बजे तक मैं अपनी फैमिली को टाइम देती हूं या मेरी जो हौबीज हैं जैसेकि मुझ कोई वैब सीरीज देखनी है, कोई बुक पढ़नी है या कुछ भी करना है मैं वह करती हूं. शाम को मेरी फिर से ट्रेनिंग शुरू होती है. शाम 4.00 बजे से 8.00 बजे तक की ट्रेनिंग के बाद सीधा डिनर करने जाती हूं. डिनर कर के अपने रूम में आती हूं. फिर आ कर थोड़ा सा फोन यूज कर के सो जाती हूं.’’

स्पौंसर मिलना कितना मुश्किल है

‘‘स्टार्टिंग में तो बहुत मुश्किल था क्योंकि मेरी खास परफौर्मैंस नहीं थी इसलिए मेरे पास कोई सपोर्ट या स्पौंसर नहीं था. लेकिन अभी मेरे पास स्पौंसर हैं. गो स्पोर्ट्स फाउंडेशन मुझ सपोर्ट करता है. वेल्स वन फाउंडेशन ऐंड स्पोर्ट्स अथौरिटी औफ इंडिया भी सपोर्ट करती है. ये मेरे सभी कंपीटिशन में या फौरेन ट्रेनिंग ऐक्सपोजर में सपोर्ट करते हैं. इसलिए अभी मुझ कोई स्ट्रैस नहीं है. मैं अपने गेम पर फोकस कर सकती हूं.’’

हार के बाद खुद को कैसे मोटिवेट करती हैं

‘‘अपना बैस्ट देने के बाद भी काफी कंपीटिशन हम नहीं जीत पाते लेकिन मेरे पापा ने मुझ सिखाया है कि मैं हमेशा नहीं जीत सकती. अगर मैं जीत रही हूं, भाग रही हूं तो मैं गिरूंगी भी और गिरने के बाद उठना जरूरी होता है. मुझ यही बात सब से ज्यादा मोटिवेट करती है. अगर मैं कोई मैच अच्छा नहीं भी खेली तो मैं सब से पहले अपने फादर को काल करती हूं और उन से डिस्कस करती हूं.’’

कैसे बनें एक अच्छी तलवारबाज

‘‘फेंसिंग एक ऐसा गेम है जिस में आप के पास जितना ऐक्सपीरियंस होगा उतना ज्यादा वह आप के लिए हैल्पफुल होगा. सिर्फ फेंसिंग ही नहीं मैं तो कहती हूं कि कोई लड़की किसी भी गेम या प्रोफैशन में आगे बढ़ना चाहती है तो उसे वह काम करना चाहिए बिना यह सोचे कि लोग क्या सोचेंगे या लोग सपोर्ट करेंगे या नहीं. इस गेम में सब से पहली चीज तो माइंडसैट ही होती है. अगर लड़की अपनेआप को मैंटली पूरा प्रिपेयर कर के यह सोचे कि हां मेरे को करना है तो वह जरूर आगे बढ़ जाएगी. दूसरा वही जो बेसिक चीजें होती हैं कि अच्छे कोच के पास जाओ और कंसिस्टैंसी होनी चाहिए. ट्रेनिंग को बीच में नहीं छोड़ना है. रोज अभ्यास करें भले ही किसी दिन मन न कर रहा हो लेकिन फिर भी जाओ. अभी पूरे इंडिया में आलमोस्ट हरेक सिटी में इस का ट्रेनिंग सैंटर है.’’

सेफ्टी

‘‘एक इंडियन फीमेल ऐथलीट के तौर पर देश विदेश में खुद को सेफ रखना शुरू में काफी मुश्किल लगता था. मगर अब मुझ आलमोस्ट 17-18 साल हो चुके हैं. अब चीजें बैटर मैनेज करना आ गया है. अगर कहीं पर अकेले जा रही हूं ऐसी जगह जो सेफ नहीं है तो सेफ्टी के लिए पूरा समय फैमिली के पास अपनी लोकेशन शेयर कर के रखती हूं. अपनी बैस्ट फ्रैंड है तो उसे बता देती हूं कि मैं इतने बजे जा रही हूं और लोकेशन उसे भी शेयर कर देती हूं. हमें हरेक कंट्री का इमरजैंसी कौंटैक्ट पता होना चाहिए कि अगर किसी भी तरह की इमरजैंसी है तो हम कैसे रीच आउट कर सकते हैं. नौर्मली लड़कियों की सिक्स सैंसेज होती हैं तो हमें पता चल जाता है कि हमारे आसपास अगर थोड़ा सा भी कुछ नैगेटिव या कुछ गलत होना स्टार्ट होता है तो वह चीज फील हो जाती है.’’

नेवी जौइन करने का फैसला

‘‘मेरी नेवी जौइन करने के पीछे वजह फैमिली को इकौनौमिक सपोर्ट करनी थी. दरअसल, मेरे पापा को 2022 में मेजर हार्ट अटैक आ गया था. वे हौस्पिटलाइज्ड थे इस वजह से औफिस वगैरह नहीं जा रहे थे जिस से सैलरी आनी बंद हो गई और काफी तरह की प्रौब्लम्स थी. उस समय मुझ मेरी ट्रेनिंग भी कंटिन्यू करनी थी और पैसे की कमी से सब मुश्किल हो रहा था. मैं अपनी फैमिली के ऊपर प्रैशर नहीं डालना चाहती थी इस रीजन से मैं ने नेवी जौइन किया था. मुझ आर्मी और नेवी दोनों ने औफर दिया था कि आप यहां पर जौइन करना चाहती हैं तो हम आप को सपोर्ट करेंगे.’’

फेंसिंग के लिए जरूरी क्वालिटीज

‘‘अगर आप ऐथलैटिक्स में हो तो आप की स्पीड अच्छी होनी चाहिए, शूटिंग में अच्छा फोकस चाहिए. मतलब हरेक गेम में एकएक चीज अच्छी होनी जरूरी होती है. मगर फेंसिंग में आप को हर चीज में अच्छा होना चाहिए. अगर नहीं हैं तो आप को उस चीज को इंप्रूव करना होगा. आप की स्ट्रैंथ, आप की स्पीड, कोऔर्डिनेशन, फोकस सब में आप को अच्छा होना चाहिए.’’

चैलेंज

‘‘सब से बड़ा चैलेंज है कि हम अपनी फैमिली के साथ नहीं रहते. कोई फैस्टिवल आया तो भी हमें सब इधर ही करना होता है. अगर हम कभी बीमार भी हो गए या कुछ हुआ तो हमारे पास मम्मी नहीं होतीं यह पूछने के लिए कि तुम ठीक हो या नहीं. फैमिली से दूर रहना सब से बड़ा चैलेंज होता है. अगर हम दुखी भी हैं तो फोन कर के हम बारबार उन को परेशान नहीं कर सकते. पर मुझ ऐसा भी लगता है कि इस से काफी चीजें सीखते हैं. अगर हम फैमिली के साथ ही पूरा टाइम रहेंगे तो हम काफी हद तक उन पर डिपैंड हो जाते हैं कि अगर मुझ कोई भी प्रौब्लम होगी मैं जा कर सीधा अपने घर पर बोलूंगी. लेकिन अभी मुझ इतना टाइम इधर हो गया है तो हमें चीजों को अपनेआप मैनेज करना है. यह इंसान को काफी बोल्ड और काफी स्ट्रौंग बना देता है.’’

सपना

‘‘मेरा सपना है कि मैं ओलिंपिक 2028 में इंडिया के लिए मैडल ले कर आऊं और सब को प्राउड फील करवाऊं.’’

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...