जब  से देश में 2014 के बाद नरेंद्र मोदी की सरकार आई है, एक बात साफ दिख रही है- जनता पर हर तरह का हर रोज नयानया दबाव और जनता का हर नए जुल्म को चुपचाप सहना.

1947 में जब आजादी मिली थी तो वह सिर्फ गोरों से नहीं थी, वह अपने ही राजाओं, जमीदारों, सेठों, पुजारियों, पंडों, समाज के ठेकेदारों और सब से बड़ी पुलिस से थी. हालांकि जहां ब्रिटिश शासन था वहां पुलिस पर अंकुश लगाने वाले कानून थे पर उन्हें लागू गोरे सुपरिंटैंडैंट और मजिस्ट्रेट ही करते थे. उन्हें भारतीयों की आजादी से कोई मतलब नहीं था. हालांकि अंगरेजों के अपने देश इंगलैंड में तब तक खासा कानून का राज आ चुका था.

उस के बाद जो संविधान बना वह बहुत उदार था पर कभी भी वह उस भावना से लागू नहीं हुआ जिस से लिखा गया था. उधरउधर की छूटें मिलीं और पुलिस और राजा का आतंक कुछ कम हुआ पर धीरेधीरे हम पुराने ढर्रे पर लौटने लगे. 1975 के बाद 18 महीने इस बात को जताते हैं कि  देश पर तानाशाही थोपना कितना आसान है.

अब यही काम कानूनों में हेरफेर कर के किया जा रहा है. अब पुलिस की जगह अलगअलग बौडीज ने ले ली है. व्यापार करना है तो बीसियों तरह के लगभग आतंकी मंसूबों के ढेरों से गुजरो और कूदफलांग कर निकल सकते हो पर हर चीज की फीस देनी होगी. नोटबंदी और जीएसटी इसी तरह की सरकारी आतंकवाद की मारें हैं. फिर कोविड-19 में मार पड़ी. किसानों पर कानूनों की मार पड़ी और उन्होंने जम कर विरोध किया तो कुछ निकल पाए.

आम जनता इस से नहीं बची. टैक्नोलौजी का एक फायदा मिलता है तो सरकार दूसरा गोला मार देती है. संदेश लेनेदेने पर मोबाइल आया तो उस पर कंट्रोल करने के बीसियों कानून बन गए हैं. आप को सिम कार्ड भी आसानी से नहीं मिलेगा जबकि टैक्नीक आसान है. बैंक अकाउंट में आप को आधार और पैन कार्ड के बमों से गुजरना होगा. कैश नहीं है तो औनलाइन पेमैंट का सहारा लो पर उस के लिए स्मार्ट फोन खरीदो, महंगे ऐप डाउनलोड करो. सब ऐसे बम हैं जिन्हें सरकार जनता पर फोड़ रही है.

यह आतंकवाद अब टैक्नोलौजी की नई देन मोबाइल पेमैंट पर आ गया है. लुभावने नाम वाला मर्चैंट डिस्काउंट रेट के नाम से जनता पर अतिरिक्त बो?ा डाला गया है. जनता 4 दिन हल्ला मचाएगी और फिर राम मंदिर की राह पकड़ लेगी या गंगा आरती को चल देगी.

यह आतंक सरकार इसलिए फैला पा रही है क्योंकि उसे एहसास है कि देश की जनता मूर्ख, तर्कशक्ति बिना और अंधविश्वासी गायबकरी की तरह जिसे जब चाहो दूह लो और फिर भटकने दो. क्या जनता में साहस है कि वह तकनीक का फायदा अपना हक समझे सरकार की कृपा नहीं?

उस चक्कर में देश की युवा लड़कियां सब से ज्यादा पिस रही हैं. उन में करेज है. उन में नई स्कीमें हैं, वे रिस्क लेना जानती हैं, वे फैमिली और  सोसायटी से झगड़ सकती हैं पर टैक्नोलौजी की मिसाइलों से लैस रिश्वतखोर ब्यूरोक्रैसी से निबटना उन के लिए भी आसान नहीं है.

लड़कों के बराबर रैंक लाने वाली लड़कियां जब अपनी जौब या स्टार्टअप शुरू करती हैं तो उन्हें इस टैररिस्ट गवर्नमैंट की भूलभुलैया से निकलना पड़ता है, जिस में हर कदम पर एक पोर्टल है, हर जगह एक नए डौक्यूमैंट की जरूरत है, हर जगह पासवर्ड और ओटीपी की जरूरत है.

लड़कियां लौजिकल काम समझ सकती हैं पर टैरर आंखों में लौजिक नहीं होता. डिक्टेटरशिप लौजिक पर नहीं चलती. लड़कियों को बचा कर रखने की चिंता में फैमिलीज उन्हें किसी लड़के से बांध देना चाहती हैं. वैसे भी इसे देश में हरेक को मैंटल स्लेव बना देना आसान है और मास्टर्स में टैक्नोलौजी का इस्तेमाल इसी के लिए करना शुरू कर दिया है.

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