अर्ली डिटेक्शन है ब्रैस्ट कैंसर का इलाज, जानें कैसे

नार्थ बंगाल की कूचबिहार में रहने वाली 40 साल की सुनीता को कभी पता नहीं चला कि उसे ब्रैस्ट कैंसर है, क्योंकि उन्हें किसी प्रकार की कोई असुविधा नहीं थी,लेकिन अचानक उनके बाई ब्रैस्ट में एक फोड़ी हुई. डॉक्टर ने भी फोड़ी समझ कर दवा दी, लेकिन वह ठीक नहीं हुई. कुछ दिनों बाद डॉक्टर ने कैंसर सेंटर जाने की सलाह दी, क्योंकि वह अब कमजोरी भी महसूस करने लगी थी. डॉक्टर ने ब्लड टेस्ट किया, तो पता चला कि उसकी हीमोग्लोबिन कम है. डॉक्टर ने उन्हें एडवांस टेस्ट किया और फिर पता चला कि उसे ब्रैस्ट कैंसर है. एक साल की इलाज के बाद उनकी मृत्यु हो गई, क्योंकि डॉक्टर के अनुसार उनके कैंसर की थर्ड स्टेज थी.पहले पता चलने पर शायद उन्हें बचाया जा सकता था, लेकिन सुनीता और उनके परिवार को कैसे भी पता नहीं चल पाया, कि उन्हें कैंसर है.

जागरूकता की कमी

यही वजह है कि हर साल पूरी दुनिया में अक्टूबर माह के दौरान विश्व ब्रैस्ट कैंसर जागरूकता माह मनाया जाता है. इस दौरान ब्रैस्ट कैंसर को लेकर जागरूकता पर काम किया जाता है, ताकि इस बीमारी का समय रहते पता चलने के साथ साथ उपचार के जरिए इससे छुटकारा भी मिल सके, दुनिया के विकसित और विकासशील दोनों ही देशों की महिलाओं में ब्रैस्ट कैंसर सबसे अधिक है.

गलत लाइफस्टाइल

दिल्ली के इन्द्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल के सर्जिकल ओंकोलोजिस्ट डॉ रमेश सरीन कहती है कि ब्रैस्ट कैंसर को लेकर अगर निम्न और मध्यम आय वर्गीय देशों की बात करें, तो यहां बीते कुछ सालों से लगातार इसके मामले बढ़ते जा रहे है, क्योंकि अब लाइफस्टाइलऔर शहरीकरण में वृद्धि के साथ साथ लोग सुस्त जीवन शैली अपना रहे हैं. हालांकि साल 2020 में आई कोरोना महामारी की वजह से ब्रैस्ट कैंसर की स्क्रीनिंग काफी पिछड़ी है, साथ ही अस्पताल तक पहुंचने में भी मरीजों को देर हुई.

अर्ली डिटेक्शन

डॉ, सरीन का आगे कहना है कि समय पर पहचान होने से ब्रैस्ट कैंसर की रोकथाम हो सकती है.साथ ही इसके ठीक होने की संभावना भी होती है. देर से इस बीमारी का पता चलने पर मरीज और उसका परिवार न सिर्फ पीड़ा का सामना करता है, बल्कि इससे उपचार पर भी प्रभाव पड़ता है. अब तो ब्रैस्ट कैंसर के उपचार को लेकर गाइडलाइन में भी बदलाव हो चुका है. इस कैंसर की बढ़ोतरी रोकने के लिए दवाओं के अलावा कीमोथेरेपी दी जाती है या फिर ऑपरेशन के जरिए इसे रोका जा सकता है.

जांच में न करे देर

डॉक्टर रमेशकहती है कि कोरोना महामारी या फिर किसी अन्य बीमारी और भ्रांतियों के डर से मरीज को जांच से दूरी नहीं बनानी चाहिए. लक्षणों पर ध्यान देने या फिर स्क्रीनिंग की मदद से  खुद को बचाया जा सकता है. अगर किसी भी तरह का संदेह रहता है, तो तत्काल एक्सपर्ट डॉक्टर से मिलकर चर्चा करनी चाहिए. ब्रैस्ट कैंसर के उपचार को लेकर किसी भी तरह का इंतजार करना जोखिम भरा हो सकता है.डॉक्टर्सआज सभी कोब्रैस्ट कैंसर के लक्षणों को नजरअंदाज न करने की सलाह दे रहे है, जो निम्न है,

लक्षणों पर रखें नजर

महिलाओं में ब्रैस्ट कैंसर के लक्षण एक जैसा होना जरूरी नहीं. ये अलग अलग भी हो सकते हैं. हालांकि अधिकांश मामलों में ब्रैस्ट या फिर निप्पल (ब्रैस्ट का अगला भाग) के रंग रूप में बदलाव होता है, ब्रैस्ट कैंसर के पांच सबसे आम चेतावनी के संकेत निम्न है,

  • ब्रैस्ट में गांठ, सूजन, या फिर उसके आकार में परिवर्तन,
  • ब्रैस्ट की त्वचा में डिंपल होना या मोटा होना,
  • निप्पल पर लाल चकत्ते या उसका धस जाना,
  • दूध के अलावा निप्पल से अन्य तरह का कोई तरल पदार्थ रिसाव होना, आदि है.

ये लक्षण ब्रैस्ट कैंसर के अलावा अन्य स्थितियों के कारण भी हो सकते हैं. ब्रैस्ट टिश्यू स्वाभाविक रूप से ढेले की तरह होते हैं, ऐसे में इनकी बनावट को लेकर कोई बदलाव एक संकेत हो सकता है. एक गांठ या फिर कुछ द्रव्य जो अन्य ब्रैस्ट ऊतक से अलग महसूस कराता है, तो वह ब्रैस्ट कैंसर का लक्षण हो सकता है. यह जानने के लिए निश्चित रूप से एकमात्र तरीका जल्द से जल्द निदान और तत्काल चिकित्सक द्वारा मूल्यांकन कराना है.

ब्रैस्ट कैंसर के जोखिम भरे कारण

ब्रैस्ट कैंसर की आशंका कोबढाने वाले ऐसे कई रिस्क फैक्टर है, जिसके बारें में जान लेना जरुरी है. कुछ निम्न है,

परिवार में किसी को ब्रैस्ट कैंसर का होना

अगर परिवार में किसी को मसलन माँ, दादी, बहन आदि को ब्रैस्ट कैंसर हुआ है, तो आगे आने वाले परिवारजन को भी ब्रैस्ट कैंसर का खतरा रहता है,

आयु

जैसे-जैसे आपकी उम्र बढ़ती है ब्रैस्ट कैंसर होने का खतरा भी बढ़ता है. अधिकांश मामले आमतौर पर 50 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं में पाया गया है,

शराब पीना

अधिक मात्रा में शराब पीने से भी इसका खतरा बढ़ जाता है,

घने ब्रैस्ट ऊतक होना

डेंस ब्रैस्ट टिश्यू न केवल मैमोग्राम को कठिन बनाते हैं, बल्कि यह एक जोखिम कारक भी माना जाता है,

प्रारंभिक मासिक धर्म या देर से रजोनिवृत्ति

यदि आपकी पहली माहवारी 12 वर्ष की आयु से पहले और 55 वर्ष की आयु के बाद रजोनिवृत्ति हुई है, तो यह माना जा सकता है कि ब्रैस्ट कैंसर का खतरा बढ़ता है. ऐसी ‌स्थिति में चिकित्सीय परामर्श लेनी चाहिए,

अधिक उम्र में बच्चे को जन्म देना 

जिन महिलाओं का 35 वर्ष की आयु के बाद तक पहला बच्चा नहीं होता है, वे महिलाएं जो कभी गर्भवती नहीं हुईं या फिर कभी भी पूर्ण अवधि तक गर्भधारण नहीं किया हो, तो उनमें ब्रैस्ट कैंसर होने की आशंका अधिक होती है,

हार्मोन थेरेपी

जो महिलाएं मेनोपॉज के लक्षणों को कम करने के लिए पोस्टमेनोपॉज़ल एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसी दवाओं का सेवन कर रही हैं या फिर कर चुकी हैं. उनमें ब्रैस्ट कैंसर होने का खतरा अधिक होता है,

तनाव या स्ट्रेस लेना

शरीर में कैंसरकारक कोशिकाएं और जीन्स सुसुप्तावस्था में पड़े रहते हैं. कई बार कोई कैंसर कोशिका विभाजित होना शुरू होती है, तो हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली/इम्युनिटी उसे नष्ट कर देती है. स्ट्रेस और डिप्रेशन से इम्युनिटी कम होती है और हर तरह की बीमारियां सिर उठाने लगती हैं.

पिछला ब्रैस्ट कैंसर

यदि एक ब्रैस्ट में ब्रैस्ट कैंसर की शिकायत हुई है तो दूसरे ब्रैस्ट में भी इसके होने का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए वार्षिक जांच आपके लिए बहुत जरूरी है.

करें खुद से जांच

डॉक्टर सरीन नेब्रैस्ट की खुद से जांच करने का तरीका बताया है, ताकि हर महीने यह जांच खुद महिलाएं कर सकें,इसे याद रखने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप या तो अपने जन्मदिन की तारीख याद रखें या फिर मासिक धर्म के आखिरी दिन की तारीख को याद रखना है. अगर आपको इस दौरान कोई बदलाव मिलता है, तो आप तुरंत डॉक्टर के पास जाएँ. स्व-परीक्षा से भीअलग वार्षिक ब्रैस्ट परीक्षा होनी चाहिए.50 साल की उम्र के बाद सालाना मैमोग्राफी की जांच बहुत जरूरी है. इससे ब्रैस्ट कैंसर का जल्दी इलाजकिया जा सकता है और इसे फैलने से रोका जा सकता है.

घर पर खुद से जांच करने के नियम इस प्रकार है,

स्टेप 1:लेटना

  • सबसे पहले आप अपने दाहिने कंधे के नीचे एक तकिया रखें और उसके सहारे अपनी पीठ के बल लेट जाएं,
  • अपने दाहिने ब्रैस्ट की जांच के लिए अपने बाएं हाथ की तीन मध्यमा उंगलियों की युक्तियों यानी टिप्स का उपयोग करें,
  • त्वचा से अपनी अंगुलियों को हटाए बिना हल्के, मध्यम और थोड़ा दृढ़ दबाव का उपयोग करके गोलाकार गति में दबाएं
  • अब ऊपर और नीचे करते हुए गति का पालन करें
  • अपने कॉलर की हड्डियों के बीच और अपने स्तनों के नीचे और छाती की हड्डी की मध्य रेखा से अपनी बांह एवं उसके नीचे तक बदलावों को महसूस करें
  • अब इसे अपने दाहिने हाथ से अपने बाएं ब्रैस्ट पर दोहराएं
  • यह प्रक्रिया आप साबुन के हाथों से नहाते समय भी कर सकती हैं.

स्टेप 2: आईने के सामने

इन स्टेप्स के जरिए आप अपने ब्रैस्ट की जांच कर सकती हैं. हालांकि इस दौरान आपको अपना पूरा ध्यान लगाना होगा, ताकि सामान्य से किसी भी बदलाव के बारे में पता चल सके,

  • आईने के सामने खड़ी हो जाएँ,
  • पूरा कपडा उतार लें,
  • दोनों हाथों को पीछे ले जाकर हिप्स पर रखे, ब्रैस्ट में किसी प्रकार के बदलाव को नोटिस करें,
  • हाथों को अपने सिर के ऊपर रखकर ब्रैस्ट और बगल में किसी प्रकार के बदलाव को भी गौर करें,जरुरी नहीं कि ये कैंसर ही हो, लेकिन सावधान रहने की जरुरत है,
  • हाथोंसे कूल्हों को दबाएं और अपनी छाती की मांसपेशियों को कस लें
  • इस दौरान किसी ब्रैस्ट का छोटा लगना, रंग में फर्क दिखना आदि होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.

युवा महिलाओं में बढ़ता ब्रैस्ट कैंसर

मुंबई की 27 वर्षीय चंद्रिका राव के पैरों तले की जमीन तब खिसक गई जब उसे पता चला कि उस के दोनों स्तनों में कैंसर की गांठें हैं. वह एक बड़ी कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत है. पहले तो उसे इसका पता नहीं चला क्योंकि उस का नियमित मासिकधर्म बंद हो चुका था. वह अपने फैमिली डाक्टर के पास गई. उन्होंने दवा दी और मासिकधर्म नियमित हो गया. लेकिन धीरेधीरे उस की खानपान में रुचि कम होने लगी.

एक दिन नहाते वक्त चंद्रिका को अपने स्तन के दाहिने भाग में गांठ का अनुभव हुआ. वह तुरंत डाक्टर के पास गई. उन्होंने फिर मसल्स की गांठ समझ कर दवा दे कर भेज दिया. इस तरह कई महीने बीते.

जब कुछ फर्क नहीं पड़ा तो कैंसर की जांच और मैमोग्राफ्री की गई जिस में दोनों स्तनों में कैंसर की गांठें पाई गईं. फिर चंद्रिका अपनी मां माधुरी के साथ राहेला हौस्पिटल गई जहां उस का सफल इलाज हुआ. आज वह खुश है कि उसे नई जिंदगी मिली है.

जानें क्या है स्तन कैंसर

स्तन कैंसर असामान्य कोशिकाओं की एक प्रकार की अनियमित वृद्धि है जो स्तन के किसी भी हिस्से में पनप सकता है. यह निपल में दूध ले जाने वाली नलियों में दूध उत्पन्न करने वाले छोटे कोशों और ग्रंथिहीन टिशुओं में भी हो सकता है. स्तन कैंसर का प्रकोप महिलाओं में अधिक है खासकर शहरी महिलाओं में स्तन कैंसर के मरीज अधिक हैं जबकि गांव की महिलाओं में कम.

महाराष्ट्र के मुंबई में हर 1 लाख महिलाओं से 27 स्तन कैंसर से ग्रस्त पाई जाती हैं, जबकि गांव में 1 लाख महिलाओं में केवल 8 महिलाए इस रोग की शिकार हैं. आजकल इस की आयु सीमा भी कम हो रही है. पहले अधिकतर महिलाएं 40 वर्ष के बाद इस का शिकार होती थीं, जबकि आज 30 वर्ष या इस से भी कम उम्र में भी. इस रोग की शिकार हो रही हैं. इस की वजह यह है कि महिलाएं आजकल अधिकतर रोजगार के लिए घर से बाहर जाती हैं, जिस से कई रिस्क फैक्टर उन के लिए तैयार रहते हैं.

करीब 5% ब्रैस्ट कैसर की मरीज ऐसी होती है, जिन्हें वंश से यह बीमारी मिलती है क्योंकि इस से माता या पिता के जीन्स उन में आते हैं. चौंकाने वाली बात यह भी है कि कम उम्र में स्तन कैसर की शिकार हुई महिलाओं के दोनों स्तनों में इस का प्रकोप पाया गया है.

कम उम्र में कैसर की सब से बड़ी वजह आज की हमारी जीवनशैली है, जो पश्चिमी सभ्यता पर आधारित हो चुकी है. सैचुरेटेड औयल अधिक खाते हैं. व्यायाम नहीं करते, तनाव अधिक लेते हैं. शादियां देरी से होती हैं और अगर बच्चा हुआ तो उसे स्तनपान नहीं करातीं. ये सभी कारक स्तन कैंसर को तेजी से बढ़ा रहे हैं. जो चिंता का विषय है. ऐसे में अगर समय रहते मरीज डाक्टर के पास पहुंचते हैं तो इस रोग पर काबू पाया जा सकता है.

सचेत रहें

स्तन कैंसर को समझने में समय लगता है. युवा महिलाएं कई बार सचेत नहीं होतीं. फलस्वरूप वे प्रारंभिक लक्षण को गंभीरता से नहीं लेती. साथ ही समाज और परिवार भी इसे स्वीकारता नहीं है और बीमारी बढ़ती जाती है, जो आगे चल कर खतरा बन जाती है.

मैमोग्राफ्री स्तन कैंसर के प्रारंभिक अवस्था का पता लगाने का सब से अच्छा उपाय है. इस के द्वारा कम मात्रा में रैडिएशन का प्रयोग कर स्तन का ऐक्सरे किया जाता है, जिस के द्वारा कैंसर की गांठ का आकार कितना बड़ा है यह समझा जाता है. इस की सुविधा हर छोटेबड़े शहर में उपलब्ध है. अगर आत्म परीक्षण के आद किसी महिला को स्तन में गांठ महसूस हो तो तुरंत मैमोग्राफ्री करवाना जरूरी होता है. 40 वर्ष के बाद महिला को हर 2 साल बाद मैमोग्राफ्री करानी चाहिए. 50 वर्ष के बाद हर वर्ष मैमोग्राफ्री आवश्यक है. अगर गांठ हो तो मैमोग्राफी के बाद सोनोग्राफी करवानी चाहिए ताकि कैंसर के आकार और स्वरूप का पता चले.

इलाज है न

स्तन कैंसर का इलाज आमतौर पर सर्जरी के द्वारा किया जाता है. पूरा स्तन निकलवाने या केवल कैंसर युक्त गांठ के आसपास के कुछ स्वस्थ टिशुओं की कुछ मात्रा निकलवाने के 2 विकल्प हैं- सर्जरी के बाद डाक्टर रैडिएशन थेरैपी, कीमोथेरैपी, हारमोनल थेरैपी या इन सभी थेरैपीज के मिलेजुले उपचार करते हैं.

अधिकतर सर्जरी में गांठ निकालने के बाद एक खास मशीन से सिंकाई की जाती है जिस की सुविधा गांवों और छोटे कसबों में नहीं है. मरीज को बड़े शहर में आ कर सर्जरी के बाद 5-6 हफ्ते इसे करवाना पड़ता है. इस का खर्चा काफी आता है. इस दिशा में एक नई पद्धति आ चुकी है, जिसे इंट्राऔपरेटिव रैडिएशन थेरैपी कहते हैं. इस में सर्जरी के तुरंत बाद औपरेशन टेबल पर रैडिएशन की उचित मात्रा उस क्षेत्र में दे दी जाती है. इस से 5-6 सप्ताह में 25 से 30 सेशन लगते है. इस से गांठ में कमी आती है. खर्चा भी काफी कम होता है. इस का साइड इफैक्ट कम है.

आत्मविश्वास बनाए रखें

स्तन की सर्जरी के बाद स्तन को फिर से पुनर्स्थापित करना भी आसान नहीं. लेकिन आजकल की महिलाएं भी इसे करवाने से हिचकिचाती नहीं क्योंकि अगर शरीर का कोई भाग काट कर अलग कर दिया जाता है तो महिला के आत्मविश्वास में कमी आती है. वह तनाव की शिकार होती है. स्तन के बिना वे अपनेआप को पूरा नहीं समझ सकतीं. इसलिए ब्रैस्ट रिकंस्ट्रक्शन करवाना उचित होता है. इसे हमेशा कौस्मैटिक सर्जन ही करते हैं.

रिकंस्ट्रक्शन मास्टेक्टोमी (पूरा स्तन निकालना) के तुरंत बाद करवाई जा सकती है. लेकिन सर्जरी कैसे हुई है यह रिकंस्ट्रक्शन के समय ध्यान रखना पड़ता है.

द्य मास्टेक्टोमी में पूरी ब्रैस्ट स्किन और निपल सहित निकाल देते हैं. इस में शरीर के अन्य भाग से त्वचा, वसा, मांस (मसल्स) ब्लडवैसेज निकाल कर पुनर्स्थापित किया जाता है. यह मांस अधिकतर टमी, जांघ, और कमर के ऊपरी भाग से लिया जाता है.

Breast Cancer: स्थिति, लक्षण और उपचार जानकर इस तरह रहें सुरक्षित

ब्रेस्ट कैंसर (स्तन कैंसर) हॉर्मोन, व्यवहार और पर्यावरण संबंधी अलग-अलग तरह के घटकों से जुड़ा रहा है. ब्रेस्ट कैंसर होने का सबसे संभावित कारण है व्यक्ति के जेनेटिक कोड और उनके आस-पास के परिवेश के बीच जटिल अंतःक्रिया. ब्रेस्ट कैंसर भारतीय महिलाओं को प्रभावित करने वाले सबसे प्रमुख कैंसर में से एक है. भारतीय महिलाओं को होने वाले सभी प्रकार के कैंसर में ब्रेस्ट कैंसर का अनुपात 14% है. भारत में ब्रेस्ट कैंसर के मरीजों में से 60% कैंसर के बाद जीवित रहते हैं.

डॉ. मंजू गुप्ता, सीनियर कंसलटेंट और प्रसूति विशेषज्ञ बता रहीं है ब्रेस्ट कैंसर के लक्षण और उपचार.

ब्रेस्ट कैंसर के लक्षण

1. लिंग के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं, पुरुषों की तुलना में महिलाओं को ब्रेस्ट कैंसर की आशंका अधिक रहती है.

2. हमारी आयु की अवस्था से हमारे शरीर में ब्रेस्ट कैंसर के जोखिम का काफी कुछ पता चलता है.

3. परिवार में ब्रेस्ट कैंसर होने का इतिहास या कोई वंशानुगत जीन जिससे कैंसर का खतरा बढ़ता है.

4. बहुत ज्यादा विकिरण (रेडिएशन) के संपर्क में रहने से ब्रेस्ट कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है.

5. अपनी सेहत का ध्यान नहीं रखना और मोटा होने से ब्रेस्ट कैंसर का आपका खतरा बढ़ जाता है.

6. अधिक उम्र में रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज़) से ब्रेस्ट कैंसर का आपका जोखिम बढ़ जाता है.

7. रजोनिवृत्ति पश्चात हॉर्मोन थेरेपी. रजोनिवृत्ति के संकेतों और लक्षणों के उपचार के लिए एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन के संयोजन के साथ हॉर्मोन थेरेपी चिकित्सा कराने वाली महिलाओं को ब्रेस्ट कैंसर होने का जोखिम अधिक रहता है.

ब्रेस्ट कैंसर के अनेक रूप होते हैं, लेकिन डक्टल कार्सिनोमा सबसे अधिक बार-बार होने वाला कैंसर है. ब्रेस्ट के निकट मिल्क डक्ट्स में उत्पन्न होने वाले ट्यूमर (गाँठ) को डक्टल कार्सिनोमा कहा जाता है. वे इनवेसिव या नॉन-इन्वासिव हो सकते हैं और उनमें शरीर के दूसरे हिस्सों में फ़ैल जाने की शक्ति होती है. कोई गाँठ, स्तन के आकार में बदलाव, या निप्पल के स्वरूप में बदलाव, ये सभी ब्रेस्ट कैंसर के प्रथम चरण के संकेत हैं, जो सबसे अधिक होता है. ट्यूमर निकालने की सर्जरी के बाद कैंसर की बची-खुची कोशिकाओं को मारने के लिए आम तौर पर रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) की जाती है.

दूसरे चरण में ब्रेस्ट कैंसर इतना बढ़ गया होता है कि यह शरीर के अन्य हिस्सों में फ़ैल जाता है. इस स्थिति में ट्यूमर को जितना संभव हो उतना काट कर निकालने के लिए सर्जरी, कैंसर के बची-खुची कोशिकाओं को मारने के लिए कीमोथेरेपी, और कैंसरग्रस्त उतकों को मारने के लिए रेडिएशन थेरेपी, ये सभी उपचार योजना के हिस्से हैं.

तीसरे चरण का ब्रेस्ट कैंसर प्राथमिक ट्यूमर के स्थान से बाहर जा चुका होता है और परम्परागत उपचार से इसके ठीक होने की संभावना कम होती है.

आस-पास के कुछ उतकों को निकालने के लिए सर्जरी, किसी बचे-खुचे कैंसर कोशिकाओं को समाप्त करने के लिए रेडिएशन थेरेपी, और कोई अन्य विकल्प न होने पर कीमोथेरेपी, ये सभी संभावित उपचार हो सकते हैं.

उपचार

ब्रेस्ट कैंसर के हर मामले के लिए एक समान उपचार काम नहीं आता है, क्योंकि यह रोग की अवस्था, रोगी की उम्र, स्वास्थ्य का इतिहास, और अन्य घटकों के आधार पर अलग-अलग होता है. ब्रेस्ट कैंसर का पता चलने पर सम्बंधित रोगी के उपचार के लिए सर्जरी एक विकल्प है. उपचार के आधार पर अनेक प्रकार के ऑपरेशन उपलब्ध हैं. कुछ प्रकार की सर्जिकल प्रक्रिया में ब्रेस्ट को काट कर हटा दिया जाया है.

रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) – ट्यूमर की कोशिकाओं को रेडिएशन से मार दिया जाता है.

कैंसर की कोशिकाओं के लिए कीमोथेरेपी एक औषधीय उपचार है जो उन्हें मार देता है. हालांकि, यह उपचार आम तौर पर अन्य उपचारों के साथ-साथ किया जाता है.

हॉर्मोन थेरेपी – हॉर्मोन थेरेपी की अनुशंसा उन लोगों के लिए की जाती है जिन्हें हॉर्मोन को लेकर संवेदनशील ब्रेस्ट कैंसर है. यह उपचार ख़ास हॉर्मोनों के संश्लेषण को रोक कर क्रिया करता है, जो कैंसर की वृद्धि को धीमा कर देता है.

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सवाल-

स्तन कैंसर के क्या कारण हैं?

जवाब-

स्तन कैंसर एक घातक ट्यूमर है, जिस की शुरुआत स्तन कोशिकाओं में होती है. दुनिया भर में महिलाओं को होने वाले कैंसर में यह सब से आम है. महिलाओं को होने वाले सभी कैंसरों में स्तन कैंसर का हिस्सा 25 से 32% है. महिलाओं में बाहरी कारणों से होने वाले कैंसर में यह 22.9% है. स्तन कैंसर के मुख्य कारणों में महिला होना, आयु, स्तन कैंसर का पारिवारिक इतिहास, मोटापा, व्यायाम न करना, शराब पीना, रैडिएशन के संपर्क में रहना आदि हैं. बहुत सारी महिलाएं अपने बच्चे को शुरू के समय में स्तनपान नहीं कराती हैं. ऐसा कर के वे न सिर्फ खुद को, बल्कि अपने बच्चे के स्वास्थ्य को भी जोखिम में डालती हैं. अध्ययन से पता चला है कि अपने बच्चों को स्तनपान न कराने वाली महिलाएं स्तन कैंसर के लिहाज से ज्यादा जोखिम में रहती हैं. स्तन कैंसर होने का जोखिम महिलाओं की उम्र के साथ बढ़ता जाता है. उम्र बढ़ना और किसी करीबी रक्त संबंधी के कैंसर वाले जीन से जेनेटिकली प्रभावित होना भी स्तन कैंसर के संभावित कारणों में है. सच तो यह भी है कि एक स्तन में कैंसर वाली महिलाओं के दूसरे स्तन में भी कैंसर होने की आशंका बढ़ जाती है.

सवाल-

स्तनपान कराने से स्तन कैंसर की आशंका कम कैसे होती है?

जवाब-

वर्ल्ड कैंसर रिसर्च फंड इंटरनैशनल ने अपने अध्ययन में कहा है कि जो महिलाएं कम से कम 1 साल स्तनपान कराती हैं, ऐसा नहीं है कि उन्हें स्तन कैंसर होने की संभावना 5% कम होती है. स्तनपान कराने की किसी महिला की अवधि जितनी ज्यादा होगी उस का हारमोन स्तर उतना ज्यादा होगा. इस की आवश्यकता दूध बनाने के लिए होती है. इस से सैल का विकास प्रभावित होता है और स्तन को उन बदलावों से सुरक्षा मिलती है जो ऐसा नहीं होने पर संबंधित महिला को स्तन कैंसर के जोखिम में डाल देते. स्तनपान कराने के दौरान महिला की डिंबग्रंथि काम नहीं करती है. इस से भी स्तन या डिंबग्रंथि के कैंसर से बचाव होता है.

सवाल-

स्तनपान न कराने से कैसे स्तन कैंसर की आशंका बढ़ती है?

जवाब-

कई अध्ययनों से पता चला है कि स्तनपान कराने से स्तन कैंसर का जोखिम कम हो जाता है. खासकर स्तनपान अगर डेढ़दो साल चले. यानी स्तनपान से महिला को कैंसर से सुरक्षा मिलती है. एक अध्ययन के नतीजे से तो यह पता चला है कि महिला के जितने ज्यादा बच्चे हों और वह उन्हें जितनी लंबी अवधि तक स्तनपान कराती हो, उसे स्तन कैंसर होने का जोखिम उतना ही कम रहता है. अध्ययनों से यह स्पष्ट हो चुका है कि शिशु जन्म के बाद जिन माताओं ने अपने शिशु को स्तनपान कराया, वे स्तनपान नहीं कराने वाली महिलाओं से स्तन कैंसर के मामले में ज्यादा सुरक्षित रहीं.

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सवाल-

मां और बच्चे को स्तनपान कराने के क्या लाभ हैं?

जवाब-

स्तनपान कराने के लाभ बहुत हैं. प्रसव के बाद का पहला दूध बच्चे का पहला टीका कहा जाता है. मां का दूध बच्चे में ऐंटीबौडीज और रोगाणुओं से लड़ने वाली कोशिकाओं के स्थानांतरण के लिए पैसेज का भी काम करता है. यह हर तरह के संक्रमण और ऐलर्जी से सुरक्षा देता है. मां को स्तनपान के जरीए गर्भावस्था के दौरान बढ़ा अपना वजन कम करने में भी सहायता मिलती है. इस के अलावा इस प्रक्रिया के दौरान औक्सीटोसिन हारमोन निकलता है, जो गर्भावस्था से पहले का स्वास्थ्य और स्थितियां हासिल करने में मदद करता है.

सवाल-

1 दिन में कितनी बार या कितने समय तक बच्चे को स्तनपान कराना चाहिए?

जवाब-

नवजात को 3 घंटे के अंतराल पर स्तनपान कराया जा सकता है. वैसे जब तक वह बड़ा हो रहा हो और मां को दिक्कत नहीं हो, तो बच्चे को दूध पिलाने का समय निश्चित करने की जरूरत नहीं है. हालांकि ऐसा भी देखा गया है कि कुछ सप्ताह बाद बच्चे खुद ही स्तनपान का अपना समय तय कर लेते हैं. रात में स्तनपान कराना महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि रात में दूध बनाने वाले हारमोन ज्यादा बनते हैं और इस से ज्यादा दूध बनता है.

सवाल-

क्या भारतीय महिलाओं के बीच स्तनपान को बढ़ावा देने की आवश्यकता है?

जवाब-

स्तनपान बच्चे के जन्म की तरह ही स्वाभाविक या प्राकृतिक है. इस के जानेमाने लाभ के बावजूद बहुत कम महिलाएं ज्यादा समय तक स्तनपान कराती हैं. कामकाजी महिलाएं अकसर स्तनपान की जगह दूसरे विकल्प आजमाती हैं ताकि अपना कामकाज और मां होने की जिम्मेदारी दोनों संभाल सकें. स्तनपान कम कराने के कारणों में खास कारण एक यह है कि मां के दूध के प्रचारित विकल्पों की भरमार है, जबकि विशेषज्ञों ने बारबार कहा है कि मां के दूध का कोई विकल्प नहीं है. मौजूदा स्थितियों के मद्देनजर इस बात की आवश्यकता है कि स्तनपान की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए और इस के लिए कामकाजी महिलाओं को भी ऐसी सुविधाएं दी जानी चाहिए, जिन से वे अपनी इस जिम्मेदारी का निर्वाह अपनी कामकाजी जिम्मेदारियों के साथ सहजता से कर सकें.

– डा. सच्ची बावेजा बी.एल. कपूर सुपर स्पैश्यलिटी हौस्पिटल, दिल्ली

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Breast feeding से संभव Cancer की रोकथाम

यह तो सभी को पता है कि नवजात के लिए स्तनपान जरूरी है. खासकर शुरू के 6 महीनों तक. लेकिन यह कम ही लोग जानते होंगे कि स्तनपान करने वाले शिशुओं की मौत की आशंका स्तनपान न करने वाले शिशुओं के मुकाबले 14 गुना कम होती है. मां के दूध में मौजूद कोलोस्ट्रम बच्चे का प्रतिरक्षण बेहतर करता है, जबकि दूध में मौजूद पोषक तत्त्व उसे बीमारियों से बचाते हैं. यह भी देखा गया है कि इस प्रक्रिया से मां में अल्जाइमर्स विकसित होने की आशंका कम होती है और बच्चे के विकसित होते फेफड़े मजबूत होते हैं. इस से बच्चे को दमा होने का खतरा भी कम होता है. इस के अलावा इस से बच्चे डायरिया और निमोनिया के भी कम शिकार होते हैं. हाल ही में वैज्ञानिक स्तनपान और स्तन कैंसर में सीधा संबंध जानने में सफल हुए हैं. स्तनपान कराना न सिर्फ बच्चे के लिए फायदेमंद है, बल्कि मां के लिए भी, क्योंकि इस से अंडाशय को कैंसर और स्तन कैंसर होने का जोखिम भी काफी कम हो जाता है. खासतौर से युवा महिलाओं के मामले में.

जीवनशैली में बदलाव

कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मेलमैन स्कूल औफ पब्लिक हैल्थ में किए गए एक अध्ययन के अनुसार स्तनपान कराने से ऐस्ट्रोजन रिसैप्टर नैगेटिव और प्रोजेस्टेरौन रिसैप्टर नैगेटिव ब्रैस्ट कैंसर का खतरा न्यूनतम होता है.
वैसे तो भारत में पहले स्तन कैंसर के मामले अपेक्षाकृत कम रहे हैं पर अब ऐसा नहीं है. भारतीय महिलाएं खासतौर से शहरी महिलाएं अपनी जीवनशैली के कारण बेहद प्रभावित हैं. देर से मां बनने की प्रवृत्ति और स्तनपान कराने से बचने के लिए सामाजिक और पेशेवर तनाव का शिकार होना इन कारणों में शामिल है.
महिलाओं में कैंसर के जितने मामले होते हैं उन में 25 से 32% स्तन कैंसर के होते हैं और मुख्यरूप से 50 साल से कम उम्र की महिलाएं प्रभावित होती हैं. इस का मतलब यह हुआ कि 20 से 50 साल के बीच की 48% महिलाएं इस का शिकार हो सकती हैं. पश्चिमी देशों में देखा गया है कि 100 में से 89 महिलाएं इस से बच जाती हैं. अत: भारत में भी स्तनपान कराने के महत्त्व के बारे में महिलाओं को जागरूक करने की आवश्यकता है. इस के लिए अभियान चलाए जाने की जरूरत है ताकि संदेश ज्यादा से ज्यादा महिलाओं तक पहुंचे. वर्ल्ड कैंसर रिसर्च फंड द्वारा किए गए कैंसर के आंकड़ों के अध्ययन के मुताबिक जो महिलाएं कम से कम 1 साल तक स्तनपान कराती हैं उन्हें स्तन कैंसर होने की आशंका 5% कम होती है. जो महिलाएं जितने लंबे समय तक स्तनपान कराती हैं उन्हें कैंसर होने की आशंका उतनी ही कम हो जाती है.

ज्यादा गर्भपात भी जिम्मेदार

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा हाल ही में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक शहरी कामकाजी महिलाएं ज्यादा गर्भपात कराती हैं, बच्चे देर से पैदा करती हैं और उन की स्तनपान कराने की अवधि भी कम होती है, जबकि गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन ज्यादा मात्रा में करती हैं. ऐसी महिलाओं को स्तन और अंडाशय के कैंसर की आशंका ज्यादा रहती है. भारतीय महिलाएं जो गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन करती हैं उन में कैंसर का यह जोखिम 9.5 गुना बढ़ गया है.
स्तन कैंसर का उपचार कराने वाली कोई महिला अगर प्रजनन के लिहाज से स्वस्थ है और उस की आयु भी सीमा के अंदर है तो उसे मां बनने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए. एक अध्ययन से यह खुलासा हुआ है कि गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान बनने वाले हारमोन स्तन कैंसर की शुरुआत या उन्हें पुनर्जीवित करने का काम नहीं करते हैं.

– डा. शची बावेजा   कंसल्टैंट, बीएलके सुपरस्पैश्ययलिटी हौस्पिटल, दिल्ली

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मेरे बाद क्या बेटी को भी ब्रैस्ट कैंसर होने का खतरा है?

सवाल-

3 वर्ष पूर्व मेरे बाएं स्तन में कैंसर का पता चला था. चूंकि मुझ में बीआरसीए जीन पाया गया, इसलिए उस समय मेरे दोनों स्तनों को रिमूव कर दिया गया. मेरी 13 वर्ष की बेटी है. मुझे इस बात की चिंता है कि कहीं वह भी स्तन कैंसर के खतरे के दायरे में न आ जाए. हालांकि उस में इस का कोई लक्षण प्रकट नहीं हुआ है, लेकिन मैं इस को ले कर आश्वस्त होना चाहती हूं. बताएं इस के लिए मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब-

प्राय: बच्चों में जो गांठें पाई जाती हैं वे सुसाध्य (बेनाइन) होती हैं और उन के कैंसर के रूप में विकसित होने की संभावना बहुत दुर्लभ होती है. स्तन कैंसर 15 से 39 वर्ष की महिलाओं में काफी कौमन एवं आक्रामक होता है. अपने इतिहास को जानने के बाद आप की चिंता स्वाभाविक है. लेकिन जब तक आप को बेटी में कोई लक्षण न दिखाई दे तब तक भयभीत होने की जरूरत नहीं है. इस के लक्षणों में कांख अथवा स्तनक्षेत्र में गांठ, स्तन के आकारप्रकार में परिवर्तन, स्तन से रक्त का डिस्चार्ज इत्यादि शामिल हैं. हालांकि ये लक्षण अन्य बीमारियों के भी हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में चिकित्सक से संपर्क करें. दोनों स्तनों का अल्ट्रासाउंड कराएं. यदि किसी तरह का संदेह नजर आए, तो इस की पुष्टि के लिए एमआरआई कराएं.ट

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ब्रैस्ट कैंसर तब होता है जब  कोशिका बढ़ती है और दो संतति कोशिकाओं का निर्माण करने के लिए विभाजित होकर स्तन में शुरू होता है. भारत में महिलाओं के बीच यह  एक प्रमुख कैंसर है, यह सर्वाइकल कैंसर के बाद दूसरे स्थान पर आता  है, लेकिन आश्वस्त रूप से, यदि शुरू के ही  स्टेज  (स्टेज I-II) में पता चलता है तो यह सभी प्रकार के कैंसर में से सबसे अधिक इलाज योग्य भी है. मेनोपॉज़  के बाद की महिलाएं (55 वर्ष से अधिक आयु) अधिक कमजोर होती हैं. हालांकि, कम उम्र की महिलाओं में भी इसका प्रचलन बढ़ रहा है. हर 2 साल में प्रिवेंटिव जांच अनिवार्य है, खासकर अगर तत्काल परिवार की महिला रिश्तेदार (दादी, मां, चाची या बहन) को कभी  कैंसर हुआ हो.लाइफलाइन लेबोरेटरी की एमडी (पैथ) एचओडी हेमेटोलॉजी, साइटोपैथोलॉजी और क्लिनिकल (पैथ) डॉक्‍टर मीनू बेरी के मुताबिक हालांकि यह रेयर है किन्तु  पुरुषों को भी स्तन कैंसर हो सकता है – डक्टल कार्सिनोमा और लोब्युलर कार्सिनोमा सबसे संभावित प्रकार हैं. महिला पुरुष दोनों में लक्षण कमोबेश समान होते हैं.

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जानें क्या है ब्रैस्ट कैंसर और इसका इलाज

ब्रैस्ट कैंसर तब होता है जब  कोशिका बढ़ती है और दो संतति कोशिकाओं का निर्माण करने के लिए विभाजित होकर स्तन में शुरू होता है. भारत में महिलाओं के बीच यह  एक प्रमुख कैंसर है, यह सर्वाइकल कैंसर के बाद दूसरे स्थान पर आता  है, लेकिन आश्वस्त रूप से, यदि शुरू के ही  स्टेज  (स्टेज I-II) में पता चलता है तो यह सभी प्रकार के कैंसर में से सबसे अधिक इलाज योग्य भी है. मेनोपॉज़  के बाद की महिलाएं (55 वर्ष से अधिक आयु) अधिक कमजोर होती हैं. हालांकि, कम उम्र की महिलाओं में भी इसका प्रचलन बढ़ रहा है. हर 2 साल में प्रिवेंटिव जांच अनिवार्य है, खासकर अगर तत्काल परिवार की महिला रिश्तेदार (दादी, मां, चाची या बहन) को कभी  कैंसर हुआ हो.लाइफलाइन लेबोरेटरी की एमडी (पैथ) एचओडी हेमेटोलॉजी, साइटोपैथोलॉजी और क्लिनिकल (पैथ) डॉक्‍टर मीनू बेरी के मुताबिक हालांकि यह रेयर है किन्तु  पुरुषों को भी स्तन कैंसर हो सकता है – डक्टल कार्सिनोमा और लोब्युलर कार्सिनोमा सबसे संभावित प्रकार हैं. महिला पुरुष दोनों में लक्षण कमोबेश समान होते हैं.

लक्षण

लक्षण गुप्त या स्पष्ट दोनों ही हो सकते हैं, क्योंकि अलग-अलग महिलाओं में अलग-अलग प्रकार के लक्षण हो सकते हैं . वे कैंसर के विकसित होने के लंबे समय बाद प्रकट हो सकते हैं. हालांकि, ज्यादातर मामलों में निम्नलिखित लक्षण आम हैं:

  • स्तन, बगल और कॉलर बोन पर या उसके आस-पास किसी भी गांठ और सूजन या सूजी हुई लिम्फ नोड्स की बिना देर किए डॉक्टर की जांच की जानी चाहिए. जरूरी नहीं कि हर गांठ एक कैंसर हो – लेकिन यह एक सिस्ट, फोड़ा या फाइब्रो-एडेनोमा (वसा जमा की एक चिकनी, रबड़ जैसी और सौम्य गांठ जो छूने पर चलती है) हो सकती है.
  • ‘संतरे के छिलके’ के जैसा कुछ दिखना या स्तन का धुंधला दिखना.
  • स्तन की त्वचा का मोटा होना, फड़कना, स्केलिंग, मलिनकिरण या चोट लगना.
  • दाने या जलन.
  • निप्पल से पानी या खूनी निर्वहन.
  • स्तन के आकार में परिवर्तन.
  • निप्पल को खींचा हुआ, खींचा हुआ या उल्टा निप्पल.
  • स्तन क्षेत्र में या उसके आसपास दर्द और कोमलता.
  • बाएं स्तन में गांठें अधिक सामान्य रूप से विकसित होती हैं.

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 रिस्क फैक्टर :

  • कैंसर का पारिवारिक इतिहास, और यदि किसी प्रथम श्रेणी की महिला रिश्तेदार (दादी, मां, चाची, या बहन) को ब्रैस्ट कैंसर हो गया हो.
  • मेनोपॉज़ के बाद 55 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को उच्च जोखिम होता है.
  • प्रारंभिक शुरुआत मेनार्चे (11-12 साल से पहले मेंस्ट्रुएशन की शुरुआत) देर से शुरू होने वाली मीनोपॉज (55 साल के बाद मासिक धर्म की समाप्ति).
  • स्तनपान का कोई पिछला इतिहास नहीं है.
  • धूम्रपान और शराब का सेवन.
  • अधिक वजन या मोटापा भी जोखिम को बढ़ा सकता है.

मेटास्टेटिक ब्रैस्ट कैंसर के लक्षण (कैंसर जो शरीर के अन्य भागों में फैल गया है), जिसके बारे में किसी को पता नहीं हो सकता है, इसमें सामान्य कमजोरी, सिरदर्द और बिना किसी प्रशंसनीय कारण के मतली, सांस लेने में परेशानी, पीलिया, त्वचा का पीलापन, सूजन शामिल हो सकते हैं. पेट, वजन घटाने, आदि

प्रिवेंटिव केयर

याद रखने वाला सबसे महत्वपूर्ण  फैक्ट यह है कि उपरोक्त लक्षणों और जोखिम कारकों में से एक या अधिक की उपस्थिति में प्रिवेंटिव जांच का अत्यधिक महत्व है. पारिवारिक इतिहास जैसे कुछ अपरिवर्तनीय जोखिम कारक हैं, लेकिन कुछ जोखिम कारकों को स्वस्थ जीवन शैली अपनाने से नियंत्रित किया जा सकता है.

– साबुत अनाज (मल्टीग्रेन आटा और ब्रेड, दलिया, जई, मूसली जैसे जटिल कार्बोहाइड्रेट के लिए जाएं), पालक, सरसों के पत्ते, मेथी के पत्ते, सलाद पत्ता, गोभी, ब्रोकोली, केल, और हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे संतुलित आहार लें. फल जैसे केला, सेब, नाशपाती, पपीता, स्ट्रॉबेरी आदि. बादाम, अंजीर और अखरोट जैसे नट्स को आहार में शामिल करें.

– भरपूर शारीरिक गतिविधि आपको फिट रखेगी और मांसपेशियों और हड्डियों को ढीला होने से बचाएगी. फिट और एक्टिव रहने के लिए रोजाना 45 मिनट की ब्रिस्क वॉक करें और लाइट वेट ट्रेनिंग लें.

– धूम्रपान छोड़ें और अत्यधिक शराब के सेवन से बचें.

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ब्रैस्ट में गांठ का मतलब कैंसर ही नहीं

हमारे देश में ब्रैस्ट में होने वाली गांठ को ले कर 2 तरह की प्रतिक्रियाएं आम हैं. पहली या तो लोग उसे पूरी तरह से नजरअंदाज कर देते हैं और दूसरी या एकदम से दहशत में आ जाते हैं. दोनों ही स्थितियों में जागरूकता का अभाव है. भारत में महिलाओं की मौत के सब से बड़े कारणों में से ब्रैस्ट कैंसर एक है. हाल ही के एक अध्ययन से पता चलता है कि बीमारी के प्रसार का यह स्तर 1 लाख महिलाओं में से 25.8% में है और इस में मृत्यु दर प्रति 1 लाख पर 12.7% है, बावजूद इस के महिलाओं के बीच इस जानलेवा बीमारी के प्रति जागरूकता बेहद कम है.

जागरूकता की कमी

मेदांता द मैडिसिटी की रेडियोलौजी विभाग की ऐसोसिएट डाइरैक्टर, डा. ज्योति अरोड़ा कहती हैं, ‘‘जागरूकता की कमी की वजह से पीडि़त लाखों महिलाएं न तो वक्त पर जांच कराती हैं और न ही इलाज. ब्रैस्ट कैंसर के कुछ शुरुआती लक्षणों में से एक है गांठ बनना. लेकिन आज भी बहुत सी ऐसी महिलाएं हैं, जो पढ़ीलिखी और जागरूक वर्ग की नहीं हैं, इसलिए वे ब्रैस्ट में गांठ को नहीं पहचान पाती हैं. दूसरी तरफ जो महिलाएं इस बारे में जागरूक हैं उन में भी अधिकतर यह समझ नहीं पाती हैं कि ब्रैस्ट में गांठ के 10 में से 8 मामलों का संबंध कैंसर से नहीं होता है. उन के लिए तो ब्रैस्ट की गांठ कैंसर का ही दूसरा नाम है और अगर उन्हें अपनी ब्रैस्ट में कोई गांठ दिख जाए तो वे मान लेती हैं कि अब उन के जीवन का अंत करीब है. अब जांच करा के क्या फायदा.’’

डा. ज्योति अरोड़ा आगे कहती हैं, ‘‘कुछ महिलाएं ऐसी भी होती हैं, जो सिर्फ इसलिए डाक्टर के पास जांच के लिए नहीं जातीं, क्योंकि उन्हें गांठ में दर्द महसूस होता है. कैंसर वाली गांठों को महसूस कर पाना अकसर कठिन होता है और इन का संबंध दर्द से नहीं होता. नौनकैंसर गांठ सिस्ट बनने का परिणाम हो सकती है. जिसे हम फाइब्रोएडीनोमा कहते हैं और यह नौनकैंसर ग्रोथ होती है.

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‘‘कई मामलों में यह महिला की माहवारी से संबंधित अस्थाई गांठ हो सकती है. ऐसे में अगर किसी महिला को गांठ महसूस हो रही है तो उसे तुरंत डाक्टर के पास जाना चाहिए जहां उस की मैमोग्राफी और अल्ट्रासाउंड किया जाएगा. इस में अगर कोई गांठ दिखती है तो यह पता लगाने के लिए कि इस का संबंध कैंसर से है या नहीं, बायोप्सी की जाती है. बायोप्सी के दौरान रेडियोलौजिस्ट प्रभावित जगह से टिशू निकालता है ताकि लैब में उस की जांच कर पता लगाया जा सके कि यह कैंसर है या नहीं.’’

‘‘ऐसे मामलों में कई तरह की बायोप्सी की जाती है. अधिकतर मामलों में ट्रूकट नीडल बायोप्सी की जाती है, लेकिन अगर असामान्यता बेहद मामूली और संवेदी होती है अथवा मैमोग्राम में यह सिर्फ कैल्सिफिकेशन जैसी दिखती है अथवा सिर्फ ब्रैस्ट की एमआरआई में दिखती है तभी हम बीएबीबी को प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि इस प्रक्रिया में प्रभावित जगह का ऐक्युरेट सैंपल हासिल करने की संभावना बढ़ जाती है. बीएबीबी के जरीए, ट्रूकट नीडल बायोप्सी की तुलना में अधिक टिशू निकाले जा सकते हैं और पैथोलौजिस्ट ज्यादा ऐक्युरेट रिपोर्ट तैयार कर सकता है.’’

महिलाएं रखें ध्यान

महिलाओं को अपनी ब्रैस्ट में आने वाले बदलावों पर भी गौर करना चाहिए. खासतौर से ब्रैस्ट की शेप और साइज पर. गांठ के अलावा यह भी देखना चाहिए कि उन की त्वचा के रंग में ज्यादा लाली या सूजन तो नहीं है, निप्पल अंदर की ओर धंसने तो नहीं लगी है और अगर दर्द है तो इरिटेशन, रंग में बदलाव और त्वचा से पपड़ी उतरने या निप्पल की त्वचा फटने जैसी समस्याएं तो नहीं हैं.

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ब्रैस्ट में नौनकैंसर गांठ होना आम बात है और इस से जीवन को कोई खतरा नहीं होता, लेकिन सब से अहम बात है वक्त पर इस की जांच और इलाज कराना.

एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रैस्ट कैंसर के मामलों में मृत्यु दर काफी अधिक है. मौजूदा समय की सब से बड़ी चिंता यह है कि ब्रैस्ट में होने वाली अधिकतर गांठें कैंसर न होने के बावजूद यह बीमारी महिलाओं की मौत की सब से बड़ी वजह बनी हुई है. ऐसे में जांच को कतई दरकिनार न करें.

जानें क्या है ब्रेस्ट कैंसर

‘कैंसर’ शब्द न तो आंखों को सुहाता है, न ही कानों को अच्छा लगता है. यह विचारों और दृश्यों को नकारात्मक बना देता है, वास्‍तव में ऐसा नहीं होना चाहिये और इसका सरलता से निदान होना चाहिये. वर्तमान में मामलों की संख्या और मृत्यु दर के आधार पर भारत में ब्रेस्ट कैंसर सबसे आम है. लेकिन अच्छी खबर यह है कि यह सभी प्रकार के कैंसरों में सबसे अधिक रोकथाम योग्य है.

एक पुरानी कहावत है, ‘‘रोकथाम उपचार से बेहतर होती है’’, लेकिन हमने इस पर ध्यान नहीं दिया और हम तभी जागते हैं, जब समस्या उन्नत अवस्था में पहुँच जाती है. ब्रेस्ट कैंसर के कारकों, लक्षणों, उपचार, प्रबंधन और भ्रांतियों समेत इस पर जागरूकता फैलाने की प्रासंगिकता वर्तमान परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण है, खासकर ऐसे समय में जब अधिक युवा महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर की पहचान हो रही है और इस समस्या का प्रभाव शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में एक समान है.

ब्रेस्ट कैंसर आनुवांशिक, हार्मोनल और लाइफस्‍टाइल घटकों के कारण स्‍नत में असामान्‍य कोशिकाओं की अनियंत्रित एवं अत्‍यधिक वृद्धि है. हमारे तथाकथित आधुनिक समाज में जो पानी हम पीते हैं, जो खाना हम खाते हैं और जिस हवा में सांस लेते हैं, वह हानिकारक रसायनों से प्रदूषित है और इस कारण से ब्रेस्ट कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं. कभी-कभी हमारी आदतों और जीवनशैली का भी इसमें योगदान होता है, जैसे मोटापा, अल्कोहल, व्यायाम नहीं करना, अत्यधिक तनाव, आदि.

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ब्रेस्ट कैंसर के जोखिम को कम करनाः

यह अनुशंसा की जाती है कि आप अपने शरीर के वजन को स्वस्थ सीमा में रखें, खूब सब्जियां और फल खायें (एक दिन में 5 कप से अधिक), और ऐसा आहार लें, जिसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड्स की प्रचुर मात्रा हो. प्रतिदिन की औसत कैलोरीज में आपका संतृप्त वसा सेवन 10 प्रतिशत से कम होना चाहिये और वसा का सेवन 30 ग्राम प्रतिदिन तक सीमित हो, ट्रांस फैट्स, प्रसंस्कृत मांस, भुने हुए भोजन से बचें. प्रमाण बताते हैं कि सप्ताह में 5 या अधिक दिन 45-60 मिनट व्यायाम करने से इसका जोखिम कम होता है.

ब्रेस्ट कैंसर का पता लगानाः

‘‘इसका जल्‍दी पता लगाएं, हमेशा के लिये मात दें’’

जल्‍दी पता चलने से प्रभावी उपचार की संभावना भी बढ़ती है और ब्रेस्ट खोने से बचा जा सकता है. शीघ्र पता लगाने के विभिन्न तरीके हैं, जैसे ब्रेस्ट की खुद जाँच करना, ब्रेस्ट की चिकित्सकीय जाँच, स्क्रीनिंग मैमोग्राम्स. यह देखकर अच्‍छा लगता है कि  कुछ रोगियों ने साहस दिखाते हुए खुद को बाहर की दुनिया के सामने लाये और ब्रेस्ट कैंसर पर विजय प्राप्त करने की अपनी कहानियों को सांझा कर दूसरे लोगों को प्रेरणा दी.

डॉ. आर. के. सग्गू, एमबीबीएस, एमएस, ब्रेस्ट एवं ऑन्को सर्जन, अपोलो स्पेक्ट्रा-करोल बाग से बातचीत पर आधारित

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