हमसफर: पूजा का राहुल से शादी करने का फैसला क्या सही था

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हमसफर: भाग 3- पूजा का राहुल से शादी करने का फैसला क्या सही था

शादी के 5 माह बाद अचानक ही राहुल की सेहत तेजी से गिरनी शुरू हो गई. राहुल का वजन कम हो रहा था. उस के चेहरे की जर्दी बढ़ रही थी और यह देख कर घर के लोग परेशान थे.

‘‘राहुल की सेहत लगातार खराब हो रही है बहू, पता नहीं क्या बात है. वह काफी लापरवाह किस्म का इनसान है. तुम ही उसे किसी अच्छे डाक्टर को दिखलाओ,’’ आखिर एक दिन सास शकुंतला ने पूजा को कह ही दिया. उस के कहने के अंदाज से पता चलता था कि वह बेटे की गिरती सेहत को स्त्रीपुरुष के सेक्स संबंधों से जोड़ कर देख रही थीं.

पूजा को इस से हैरानी नहीं हुई थी. वह जानती थी कि राहुल की गिरती सेहत को देख कर लोग ऐसा ही सोच सकते थे. अब किसी को क्या मालूम अधिक सेक्स तो एक तरफ, उन में तो सेक्स संबंध बना भी नहीं था.

अपने सारे मनोभावों को छिपाते हुए पूजा ने सास से कहा, ‘‘आप ठीक कह रही हैं मांजी, मैं कल ही इन्हें किसी अच्छे डाक्टर को दिखलाने ले जाऊंगी.’’

अगले दिन राहुल को साथ ले कर किसी डाक्टर के पास जाने का दिखावा करती हुई पूजा घर से बाहर निकली. किंतु किसी डाक्टर के यहां जाने के बजाय उन्होंने 2-3 घंटे एक मौल में बिताए.

थकावट होने पर उन दोनों ने मौल के रेस्तरां में बैठ कर कोल्ड डिं्रक पी और साथ में हलका सा फास्ट फूड भी लिया.

रेस्तरां में बैठे थकीथकी आंखों से पूजा को देखते हुए राहुल ने कहा, ‘‘हम जो कर रहे हैं क्या वह अपनों के साथ धोखा नहीं?’’

‘‘नहीं, मैं नहीं मानती कि हम किसी को कोई धोखा दे रहे हैं,’’ पूजा ने जवाब दिया.

‘‘एड्स से रोजाना दुनिया में सैकड़ों लोग मरते हैं. अगर मैं भी मर जाऊंगा तो कौन सी अनोखी बात होगी? मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि तुम मेरी बीमारी को छिपा कर क्यों रखना चाहती हो? एकदम से मेरी मौत के सदमे को झेलने से बेहतर होगा कि हकीकत को जान कर मां, बाबूजी, रश्मि और दूसरे लोग मेरी मौत के सदमे को झेलने के लिए खुद को पहले से ही तैयार कर लें.’’ राहुल ने भारी आवाज में कहा.

‘‘मैं भी ऐसा ही चाहूंगी. मगर तुम को एड्स है, मैं ऐसा कभी जाहिर नहीं होने दूंगी. ऐसी दूसरी लाइलाज बीमारियां भी तो हैं जिन से इनसान की मौत यकीनी होती है, जैसे कैंसर. किंतु कैंसर की मौत एड्स से होने वाली मौत से कहीं अधिक सम्मानजनक है. कैंसर डरावना है और एड्स बदनाम. एड्स के बारे में लोगों में अनेक गलतफहमियां हैं. इसलिए कैंसर से तो केवल इनसान मरता है लेकिन एड्स से मरने वाले इनसान के परिवार की उस के साथ ही सामाजिक मौत हो जाती है.

एड्स से मरने वाले इनसान के परिवार को लोग शक और घृणा की नजरों से देखते हुए एक तरह से उस का सामाजिक बहिष्कार कर देते हैं. मैं नहीं चाहती कि तुम्हारे बाद तुम्हारे अपनों के साथ कुछ ऐसा हो. एक एड्स संक्रामक व्यक्ति की पत्नी होने के कारण समाज में मेरी क्या स्थिति होगी इस की शायद तुम ठीक से कल्पना भी नहीं कर सकते. हमारे विवाहित जीवन के अंदरूनी सच को दुनिया तो नहीं जानती. मैं एक शापित जीवन बिताऊं, ऐसा तो तुम भी नहीं चाहोगे,’’ राहुल का हाथ अपने हाथ में लेते हुए पूजा ने कहा.

राहुल की समझ में आने लगा था कि पूजा उस की बीमारी को किन कारणों से छिपा कर रखना चाहती थी. उस की सोच में केवल आज नहीं, आने वाला कल भी था.

जैसेजैसे वक्त करीब आ रहा था राहुल अंदर से टूट रहा था. अपने प्यार से पूजा टूट रहे राहुल को सहारा देने की कोशिश करती.

डाक्टर को दिखलाने की बात कह कर पूजा राहुल को साथ ले कर घर से बाहर जाती. किसी पार्क या रेस्तरां में 2-3 घंटे बिता कर दोनों वापस आ जाते. राहुल एड्स की दवाएं ले रहा था, मगर वे बेअसर हो रही थीं.

ऐसी स्थिति बन रही थी कि पूजा को लग रहा था कि उस को राहुल की बीमारी को ले कर एक और झूठ बोलना ही होगा.

एक रोज मांजी ने पूजा को हाथ से पकड़ अपने पास बिठा लिया और बोलीं, ‘‘राहुल की यह कैसी बीमारी है बहू जो ठीक होने का नाम ही नहीं ले रही? तुम जरूर मुझ से कुछ छिपा रही हो. मुझ को किसी धोखे में मत रखो. मैं राहुल की बीमारी का सच जानना चाहती हूं.’’

‘‘मैं आप से कुछ भी छिपाना नहीं चाहती, मांजी, लेकिन सच बड़ा ही निर्मम और कठोर है. आप सुन नहीं सकेंगी. आप के बेटे को कैंसर है,’’ हिम्मत कर के पूजा को जो कहना था उस ने कह दिया.

उस के शब्द जैसे बम बन कर मांजी के सिर पर फूटे. सदमे में अपना माथा पकड़ते हुए वह सोफे पर लुढ़क सी गईं.

उधर सच को छिपाने के लिए पूजा ने जो झूठ बोला उस का चेहरा छिपाए गए सच से कम डरावना नहीं था.

पूजा के द्वारा राहुल की बीमारी को कैंसर बतलाने के बाद घर का सारा माहौल ही गमगीन और मातमी हो गया था.

मांजी, बाबूजी और रश्मि की आंखों में से बहने वाले आंसू जैसे थम नहीं रहे थे. कोई ठीक से खा नहीं रहा था. कैंसर का भी दूसरा नाम मौत ही तो था. जब मौत का पहरा बैठ गया हो तो किसी को चैन कैसे आ सकता था?

अंत शायद बहुत करीब था. राहुल का शरीर इतना कमजोर हो गया था कि कई बार बाथरूम तक जाने के लिए उसे पूजा के सहारे की जरूरत पड़ती.

पूजा किसी तरह भी कमजोर नहीं पड़ना चाहती थी. हालांकि राहुल की बातें कभीकभी उस को कमजोर करने की कोशिश जरूर करती थीं.

मांजी और बाबूजी बेटे की हालत देख उस को किसी अस्पताल में दाखिल कराने की बातें करते.

लेकिन पूजा इस से मना कर देती.

‘‘इस से कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि कैंसर अपने अंतिम स्टेज में है. अस्पताल में रेडियो थेरैपी से इन की जिंदगी और ज्यादा कष्टपूर्ण हो जाएगी. मैं ऐसा नहीं चाहती,’’ पूजा उन से कहती.

राहुल की अंदर को धंसती निस्तेज आंखें और पीला चेहरा खामोश जबान में बतलाने लगे थे कि उस के जीवन की टिमटिमाती लौ किसी भी घड़ी बुझ सकती थी.

एक रात अचानक राहुल ने पूजा के हाथों को अपने हाथों में लेते हुए वे शब्द कहे तो पूजा को लगा वह घड़ी कुछ फासले पर ही है.

‘‘शायद मेरा वक्त आ गया है मेरे हमसफर. मेरी जिंदगी के उदास सफर में हमसफर बनने के लिए शुक्रिया. दुनिया और समाज कुछ भी समझे, मगर हम दोनों जानते हैं कि हमारे बीच में पतिपत्नी नहीं, दो इनसानों का रिश्ता है. इसलिए मेरे मरने के बाद कभी अपनेआप को विधवा मत मानना. अपने लिए जो भी विकल्प ठीक लगे उसी को चुनना.’’

राहुल के उक्त शब्द पूजा के मर्म को चीर गए.

बड़ी मुश्किल से उस ने खुद को संभाला था.

राहुल ने पूजा से कमरे की खिड़की खोलने का अनुरोध किया और यह भी कहा कि वह उस के पास बैठी रहे.

खिड़की के बाहर चांद चमक रहा था. रात ढल रही थी.

राहुल की बेचैनी भी लगातार बढ़ रही थी.

पूजा हौसला देने वाले अंदाज से बीचबीच में उस के ललाट पर अपना हाथ फेर देती थी. डाक्टर के बताए अनुसार उस ने राहुल को दवा दी तो उस ने आंखें बंद कर लीं.

बैठेबैठे ही न जाने कब पूजा को कुछ मिनटों के लिए नींद की झपकी आ गई.

झपकी जब टूटी तो सब खत्म हो चुका था. राहुल की खुली आंखें पथरा चुकी थीं.

हमसफर: भाग 2- पूजा का राहुल से शादी करने का फैसला क्या सही था

शादी में बस चंद दिन ही बचे थे तब राहुल ने पूजा को बताया कि वह एच.आई.वी. पोजिटिव है. एड्स से ग्रसित वह धीरेधीरे मौत के करीब जा रहा है. 2 वर्ष पहले एक एक्सीडेंट के बाद इलाज के दौरान डाक्टरों की लापरवाही से उसे संक्रमित खून चढ़ा दिया गया था. पूजा राहुल को आश्वासन देती है कि वह सब असलियत जान कर भी शादी कर उस की हमसफर जरूर बनेगी और साथ ही राहुल से वचन लेती है कि अपनी बीमारी को घरवालों से राज रखेगा. राहुल के यह कहने पर कि बीमारी को लोगों से छिपाना आसान नहीं होगा, तो पूजा का जवाब था कि ‘शादी के बाद वह सब देखना मेरा काम होगा. लोगों को क्या जवाब देना है, यह भी मैं ही देखूंगी.’

एक सप्ताह बाद दोनों की शादी हो जाती है. इस शादी के पीछे का भयानक सच उन दोनों के अलावा शादी में शामिल कोई भी तीसरा नहीं जानता था. अग्नि के फेरे लेते हुए दोनों के मस्तिष्क में बहुत कुछ चल रहा था लेकिन वे चेहरे से एकदम सामान्य दिख रहे थे. अब आगे…

पूजा की डोली ससुराल आई.

ससुराल में आते ही पूजा औरतों

में घिर गई थी. शादी के बाद की रस्में जो पूरी की जानी थीं.

शादी के बाद राहुल और पूजा के पहले इम्तिहान की घड़ी सुहागरात थी.

रस्मों के पूरा होने के बाद हंसी- ठिठोली करती पूजा की ननद रेखा और उस की कुछ सहेलियों ने उन दोनों को सुहागरात वाले कमरे के अंदर धकेल दिया था.

अकेले पड़ते ही दोनों ने एकदूसरे को देखा.

सुहागरात का अर्थ दोनों ही समझते थे मगर उन दोनों को इस बात का भी एहसास था कि वह आम पतिपत्नियों जैसे नहीं थे.

सुहाग सेज पर गुलाब के फूलों की पंखडि़यां बिखरी हुई थीं. इन पंखडि़यों को सुबह तक वैसा ही रहना था, क्योंकि जिस उद्देश्य से उन को सेज पर बिखेरा गया था उस उद्देश्य की पूर्ति उन के लिए वर्जित थी.

‘‘तुम ने मेरे साथ शादी कर के अपने साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है,’’ अपनी कशमकश के बीच खालीखाली उदास नजरों से पूजा को देखते हुए राहुल ने कहा.

‘‘लेकिन मुझ को अपने फैसले पर कोई अफसोस नहीं,’’ पूजा ने कहा.

‘‘क्या इस सुहागरात का हमारे लिए कोई मतलब है?’’

‘‘क्यों नहीं है? क्या एक दंपती के संपूर्ण जीवन का आधार केवल सेक्स ही है? क्या सेक्स के बगैर स्त्रीपुरुष के विवाहित संबंधों का कोई अर्थ नहीं रह जाता? मैं इस को नहीं मानती. सेक्स पतिपत्नी के रिश्ते का एक हिस्सा है. इस के बिना भी रिश्ते को निभाया जा सकता है, क्योंकि सेक्स से ही संपूर्ण रिश्ता नहीं बनता. जैसे शरीर के किसी एक अंग को अलग कर देने से इनसान मर नहीं जाता, उसी तरह पतिपत्नी के रिश्ते में से सेक्स को अलग करने से रिश्ते की मौत भी नहीं होती.

हम दोनों तो सच को जानते हुए ही इस रिश्ते में बंधे हैं. सेक्स संपर्क के बगैर भी हम इस रात को आनंदमय बनाएंगे. यह हम दोनों के लिए ही पहली परीक्षा है और हमें बिना किसी भय और निराशा के इस परीक्षा की अग्नि में से तप कर बाहर निकलना ही होगा.’’

यह कहते हुए शादी के लाल जोड़े में लिपटी हुई पूजा ने एड्स से पीडि़त अपने पति का सिर अपने सीने पर रख लिया. ऐसा करते हुए उस के चेहरे पर जरा सा भी डर और घबराहट न थी. मन को जिस आनंद की अनुभूति हो रही थी वह शरीर के आनंद से कम नहीं थी.

सुहागरात उन दोनों ने एकदूसरे से बहुत सी बातें करते हुए बिता दी. पतिपत्नी के बजाय एक दोस्त की तरह उन को एकदूसरे को अधिक जानने का मौका मिला.

पूजा राहुल के मस्तिष्क को मृत्युभय से मुक्त कर के उस के भीतर एक नया विश्वास जगाने में सफल रही.

सुबह की किरण फूटने से कुछ देर पहले ही दोनों की आंख लग गई.

पूजा की आंख खुली तो सुबह के 8 बज रहे थे. रोशनी काफी फैल चुकी थी. राहुल अभी भी सो रहा था.

पूजा दर्पण के सामने खड़ी हो खुद को निहारने लगी. उस का दुलहन वाला मेकअप वैसे का वैसा ही था. वस्त्रों पर सलवटें भी नहीं आई थीं. कलाइयों में पड़ी कांच की चूडि़यां भी वैसी की वैसी ही थीं.

कमरे के अंदर क्या हुआ था वह उन दोनों के बीच का राज था. मगर सब को ऐसा लगना तो चाहिए कि उन्होंने सुहागरात मनाई थी.

यह सोच कर पूजा ने पहले अपने बंधे हुए जूड़े को खोला और फिर उस को बेतरतीब से दोबारा बांधा. होंठों की लिपस्टिक की गाढ़ी लाल रंगत को फीका करने के लिए इस तरह से उस को साफ किया कि वह थोड़ी सी होंठों के इर्दगिर्द बिखर जाए. अपनी दोनों कलाइयों में पड़ी कांच की कुछ चूडि़यों को अपनी उंगलियों के दबाव से चटख कर तोड़ डाला. ऐसा करते वक्त एक चूड़ी का तीखा कांच उस की कलाई में चुभ भी गया.

पूजा ने टूटी कांच की चूडि़यों के टुकड़ों को बिस्तर पर बिखेर दिया, इतना ही नहीं, बिस्तर पर बिखरी फूलों की पत्तियों को भी उस ने हथेली से मसल डाला.

सब तरह से संतुष्ट होने के बाद पूजा कमरे का बंद दरवाजा खोल कर बाहर निकल आई.

कमरे से बाहर पूजा का सब से पहले सामना अपनी ननद रश्मि से हुआ. रश्मि की आंखों में अर्थभरी शरारत थी जोकि रिश्ते के हिसाब से स्वाभाविक थी.

‘‘गुडमार्निंग, भाभी,’’ रश्मि ने कहा, ‘‘आप की आंखें गुलाबी हो रही हैं, लगता है भैया ने काफी परेशान किया है रात को?’’

ननद रश्मि के ऐसा कहने पर पूजा ने पहले तो लजाने का नाटक किया फिर प्यार से उस के गाल पर हलकी सी चपत लगाती हुई बोली, ‘‘चुप, बच्चे इस तरह के सवाल नहीं पूछते.’’

ननद रश्मि के साथ ही पूजा अपने सासससुर के कमरे में पहुंची और अपने सिर को साड़ी के पल्लू से ढकते हुए बारीबारी से उन दोनों के पांव छुए.

पांव छूने पर आशीर्वाद देती हुई पूजा की सास शकुंतला ने उस को अपने सीने से लगा लिया और बोलीं, ‘‘सुहागवती रहो, बहू. जल्दी ही तुम्हारी गोद भरे और मैं पोते की खुशी देखूं.’’

शादी के बाद दिन आगे को सरकने लगे. बीतने वाला हर लम्हा जैसे कीमती था.

राहुल के जीवन की डोर हर बीतते हुए लम्हे के साथ छोटी हो रही थी.

पूजा बीतते हर लम्हे को इतने सुख और खुशियों से भर देना चाहती थी कि आने वाली मौत की आहट राहुल को सुनाई न दे.

शारीरिक सुख के अलावा एक अच्छी पत्नी के रूप में जीवन के सारे सुख पूजा राहुल को देना चाहती थी. वह उस की इतनी सेवा करना चाहती थी कि बाद में किसी बात पर पछताना न पड़े.

पूजा की सेवा और समर्पण के भाव को राहुल खामोशी से देखता और कहता, ‘‘मेरी जिंदगी का सफर ज्यादा लंबा नहीं. इस में हमसफर बनते हुए गलती से भी मुझ से मोह मत कर बैठना, वरना बाद में बड़ी तकलीफ होगी.’’

‘‘मैं जानती हूं कि मैं क्या कर रही हूं और आगे क्या होने वाला है. किंतु इस तरह की बातें कर के मुझ को कमजोर मत बनाओ, राहुल.’’

हमसफर: भाग 1- पूजा का राहुल से शादी करने का फैसला क्या सही था

शादी में बस चंद दिन ही रह गए थे. पिछली बार जब पूजा अपने मंगेतर राहुल से मिली थी तो दोनों में यह तय हुआ था कि शादी के करीब होने से उन को अब मुलाकातों का सिलसिला रोक देना चाहिए. यह दुनियादारी के लिहाज से ठीक भी था.

इस आपसी फैसले को अभी कुछ ही दिन बीते थे कि पूजा के पास राहुल का फोन आ गया. उस ने कहा, ‘‘पूजा, मैं आप से मिलना चाहता हं. कल शाम को 5 बजे मैं लाबेला कौफी हाउस में आप का इंतजार करूंगा. कुछ ऐसी बातें हैं जो शादी से पहले मेरे लिए आप को बतलाना बहुत जरूरी है.’’

‘‘क्या इन बातों को कहने के लिए शादी तक इंतजार नहीं हो सकता?’’

‘‘नहीं, ऐसी बातें शादी से पहले बतला देना जरूरी होता है.’’

मंगेतर के फोन से बेचैन पूजा को अगले दिन के इंतजार में रात भर नींद नहीं आई. आखिर क्या बतलाना चाहता था वह शादी से पहले उस को? अपने किसी अफेयर के बारे में तो नहीं? अगर इस तरह की कोई बात थी तो पहले की इतनी मुलाकातों में राहुल ने उस को क्यों नहीं बतलाई? अब जबकि शादी की तारीख बिलकुल सिर पर आ गई तो इस तरह की बात उस को बतलाने का क्या तुक और मकसद हो सकता था?

पूजा खुद से ही तरहतरह के सवाल लगातार पूछती रही.

दूसरे दिन शाम को राहुल से मिलने के लिए घर से निकलते वक्त पूजा ने सुषमा भाभी को ही इस बारे में बतलाया. ‘लाबेला’ कौफी हाउस में पूजा पहले भी 2-3 बार राहुल के साथ बैठ चुकी थी. अत: उम्मीद के अनुसार राहुल कौफी हाउस में बाईं तरफ वाले कोने की एक मेज पर बैठा उस के आने का इंतजार कर रहा था.

टेबल की तरफ बढ़ती हुई पूजा तनाव और अनिश्चितता से घिर गई. बैठते ही बोली, ‘‘मैं सारी रात सो नहीं सकी. ऐसी क्या बात थी जो आप फोन पर नहीं कह सकते थे? मेरे मन में कई तरह के विचार आते रहे.’’

‘‘किस तरह के विचार?’’ राहुल ने पूछा. वह काफी थकाथका नजर आ रहा था.

‘‘मैं सोचती रही, शायद आप शादी से पहले अपने किसी अफेयर के बारे में मुझ से कुछ कहना चाहते हैं,’’ पूजा ने अपने मन की बात कह दी.

‘‘एक लड़की होने के नाते आप इस से ज्यादा शायद सोच भी नहीं सकतीं.’’

‘‘फिर आप ही बतलाएं वह ऐसी कौन सी बात है जिसे कहने के लिए आप शादी तक इंतजार नहीं कर सकते थे?’’

‘‘इंतजार में शायद बहुत देर हो जाती.’’

‘‘राहुल, आप की बातें पहेली जैसी क्यों हैं? जो भी आप कहना चाहते हैं खुल कर क्यों नहीं कहते?’’

‘‘अगर इस समय मैं आप से यह कहूं कि मैं आप से शादी नहीं कर सकता तो आप को कैसा लगेगा?’’ राहुल ने कहा.

‘‘मैं समझूंगी कि आप अच्छा मजाक कर लेते हैं.’’

‘‘मैं मजाक कभी नहीं करता,’’ राहुल ने कहा.

उस के शब्दों में छिपी संजीदगी से पूजा जैसे ठिठक सी गई. उसे सारी उम्मीदें और सपने बिखरते हुए लगे.

‘‘शादी से इनकार तो आप पहले दिन भी कर सकते थे, अब जब शादी की सारी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. इस इनकार का मतलब?’’ सदमे की हालत में पूजा ने पूछा.

‘‘शायद अपनी झूठी और खोखली खुशियों की खातिर मैं आप की जिंदगी बरबाद नहीं कर सकता,’’ शून्य में देखते हुए राहुल ने कहा.

‘‘बहुत खूब, आप को लगता है कि शादी के टूटने से मैं आबाद हो जाऊंगी,’’ पूजा ने कहा.

‘‘इनकार के पीछे की सचाई को जानने के बाद शायद आप को ऐसा ही लगे.’’

‘‘कैसी सचाई?’’

‘‘एक ऐसी सचाई जो पिछले 2 महीनों से मेरी अंतरात्मा को कचोट रही है. मैं आप को किसी धोखे में नहीं रखना चाहता. मुझे इस बात की भी परवा नहीं कि सच को जानने के बाद आप मुझ से नफरत करेंगी या हमदर्दी. असलियत यह है पूजा कि मैं एच.आई.वी. पोजिटिव हूं, मुझ को एड्स है. मौत मेरे काफी करीब है,’’ वीरान आंखों से पूजा को देखते हुए राहुल ने शांत स्वर में कहा.

पूजा को ऐसा लगा जैसे उस के सिर पर कोई बम फटा हो. गहरे सदमे की हालत में हक्कीबक्की सी वह राहुल के चेहरे को देखती रह गई. एक खौफ का सर्द एहसास पूजा को अपनी रगों में उतरता महसूस हुआ.

यह देख राहुल के अधरों पर एक फीकी मुसकराहट की रेखा खिंच गई. वह बोला, ‘‘अब मैं ने जब इस बदनाम और जानलेवा बीमारी का जिक्र आप से कर ही दिया है तो इस को ले कर जरूर आप के दिमाग में कुछ सवाल उठ रहे होंगे. सब से बड़ा सवाल तो यही होगा कि मुझ में ऐसी लाइलाज बीमारी आई कहां से? शायद आप को ऐसा लग रहा होगा कि मैं ने गंदी बाजारू औरतों से सेक्स संपर्क कर के इस बीमारी को अपने खून में दाखिल किया है. मगर ऐसा नहीं है. मैं ने कभी भी किसी औरत से सेक्स संपर्क नहीं किया. यह बीमारी तो उस संक्रामक खून का नतीजा है जो 2 वर्ष पहले एक एक्सीडेंट के बाद डाक्टरों की लापरवाही से मुझ को चढ़ा दिया गया था. मौत चुपके से मेरी धमनियों में उतर गई और मुझ को इस का पता भी नहीं चला.

‘‘मैं लगातार मौत के करीब जा रहा हूं, मगर मेरे घर के लोगों को मेरी बीमारी की कोई जानकारी नहीं. इसलिए जो हुआ उस में उन का जरा भी कुसूर नहीं. मैं भी असलियत को भूल कर कुछ समय के लिए स्वार्थी हो गया था मगर मेरी अंतरात्मा लगातार मुझ को कचोटती रही. यह शादी एक धोखे और पाप से ज्यादा कुछ नहीं होगी जो मैं नहीं करूंगा. इस के साथ ही उस एक बात को स्वीकार करने में मुझ को जरा भी हिचक नहीं कि आप को देखने और शादी की बात पक्की होने के बाद अपनी कल्पनाआें में मैं ने संपूर्ण जीवन जी लिया. मरने का शायद मुझे अब बहुत गम नहीं होगा.’’

जैसे ही राहुल ने अपनी बात खत्म की, खामोशी से सब सुन रही पूजा ने कहा, ‘‘आप ने अपनी बात तो कह दी, अपना फैसला भी सुना दिया लेकिन यह कैसे सोच लिया कि आप ने जो फैसला किया है वही मेरा फैसला भी होगा?’’

पूजा के शब्दों से हैरान राहुल खालीखाली नजरों से उस को देखने लगा.

पूजा ने उस का हाथ अपने हाथों में ले लिया और बोली, ‘‘अगर आप में सच को कहने की हिम्मत है तो मुझ में भी सच का साथ देने की ताकत है. आप की जिंदगी का बाकी जितना भी सफर है उस में मैं आप को अकेला नहीं छोड़ूंगी. यह शादी हर हालत में होगी.’’

‘‘आप भावुकता में ऐसा कह रही हैं. आप को शायद ठीक से मालूम नहीं कि एड्स क्या है? लोग तो एड्स के शिकार व्यक्ति के पास भी नहीं फटकते और आप एक ऐसे व्यक्ति के साथ शादी करना चाहती हैं.’’

‘‘मैं लोगों की तरह गलतफहमियों में नहीं जीती. एड्स किसी इनसान के साथ उठनेबैठने या उस के साथ खानेपीने से तो नहीं होता. शादी के बाद अगर हम पतिपत्नी के बजाय 2 दोस्तों की तरह रहेंगे और उन खास पलों से परहेज करेंगे जिन से इस बीमारी का दूसरे में जाने का अंदेशा होता है तो शादी के बंधन से हमें कोई भी समस्या नहीं होगी.

‘‘जिंदगी कितनी बाकी है? मौत कब आएगी, मेडिकल साइंस और डाक्टर इस की भविष्यवाणी नहीं कर सकते जो मौत कल आनी है उस के लिए आज की जिंदगी की कुर्बानी क्यों करें हम? जितना भी वक्त बचा है उसी में पूरी जिंदगी जीनी होगी अब आप को. मैं उस जिंदगी में आप की हमसफर रहूंगी, यह मेरा फैसला है,’’ राहुल के हाथ को अपने हाथों से दबाते पूजा ने दृढ़ स्वर में कहा.

पूजा के शब्दों से राहुल की उदास और बुझी आंखों में जिंदगी जीने की चमक आ गई.

पूजा ने राहुल के अंदर के विश्वास को बढ़ाने के लिए उस के हाथ को सहलाया ओर बोली, ‘‘जब मैं ने जिंदगी के सफर में आप का हमसफर बनने का फैसला कर लिया है तो एक वचन आप को भी मुझे देना होगा.’’

‘‘कैसा वचन?’’ राहुल ने पूछा.

‘‘जैसे आप ने अब तक अपनी बीमारी को राज रखा है, शादी के बाद भी आप इस को ऐसे ही राज रखेंगे. इस के बारे में कभी भी अपनी जबान पर एक शब्द न लाएंगे.’’

‘‘इस से क्या होगा? मौत जैसेजैसे करीब होगी, बीमारी को लोगों से छिपाना आसान नहीं होगा. उन को कुछ तो जवाब देना ही होगा,’’ राहुल की आवाज में उदासी थी.

‘‘शादी के बाद वह सब देखना मेरा काम होगा. लोगों को क्या जवाब देना है, यह भी मैं ही देखूंगी. मगर आप किसी से कुछ नहीं कहेंगे.’’

‘‘अगर आप की ऐसी जिद है तो मैं वादा करता हूं कि मैं अपनी जबान पर कभी अपनी बीमारी का जिक्र नहीं लाऊंगा. मेरी कोशिश रहेगी कि मेरी बीमारी का राज मेरे साथ ही इस दुनिया से जाए,’’ राहुल ने कहा.

एक सप्ताह बाद दोनों की शादी हो गई. शादी पूरी धूमधाम के साथ हुई. इस शादी के पीछे का भयानक सच उन दोनों के अलावा शादी में शामिल कोई भी तीसरा नहीं जानता था.

अग्नि के इर्दगिर्द शादी के फेरे लेते हुए दोनों के मस्तिष्क में कुछकुछ चल रहा था, मगर उन के चेहरों पर कोई शिकन नहीं थी.

 

हमसफर: रोहित ने ऐसा क्या किया की वह मानसी को फिरसे प्यारा लगने लगा?

दिन के 10 बजे थे. उत्तराखंड आपदा राहत केंद्र की संचालिका अम्माजी अपने कार्यालय में बैठी आपदा राहत केंद्र के कार्यों एवं गतिविधियों का लेखाजोखा देख रही थीं. कार्यालय क्या था, टीन की छत वाला एक छोटा सा कमरा था जिस में एक तरफ की दीवार पर कुछ गुमशुदा लोगों की तसवीरें लगी थीं. दूसरी तरफ की दीवार पर कुछ नामपते लिखे हुए थे उन व्यक्तियों के जिन के या तो फोटो उपलब्ध नहीं थे या जो इस केंद्र में इस आशा के साथ रह रहे थे कि शायद कभी कोई अपना आ कर उन्हें ले जाएगा.

दरवाजे के ठीक सामने कमरे के बीचोंबीच एक टेबल रखी थी जिस के उस तरफ अम्माजी बैठ कर अपना काम करती थीं. उन का चेहरा दरवाजे की तरफ रहता था ताकि आगंतुक को ठीक से देख सकें. कमरे के बाहर रखी कुरसी पर जमुनिया बैठती थी, आने वाले लोगों का नामपता लिख कर अम्माजी को बताने के लिए. फिर उन के हां कहने पर वही आगंतुक को अंदर ले भी जाती थी उन से मिलवाने. जमुनिया की बगल में जमीन पर बैठा एक आंख वाला और एक टांग से लंगड़ा मरियल सा कुत्ता भूरा  झपकी लेता रहता था.

उत्तराखंड में मईजून का महीना टूरिस्ट सीजन होता है. तपती गरमी से जान बचा कर लाखों की संख्या में पर्यटक पहाड़ों की ठंडक का मजा लेने आए हुए थे. ऐसे में जून 2013 में अचानक आई प्राकृतिक विपदा ने उत्तराखंड के जनजीवन को  झक झोर कर रख दिया था. भारी संख्या में पर्यटकों के साथसाथ स्थानीय लोग भी हताहत हुए थे.

यह राहत केंद्र जून 2013 में आए प्राकृतिक विपदा से प्रभावित स्थानीय लोगों की सहायता के लिए काम करता था. सब से महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि इस के सभी सदस्य किसी न किसी रूप में इस आपदा से पीडि़त और ग्रसित थे. किसी ने धन खोया था तो किसी ने जन. अगर किसी का कोई अपना आ जाता, तो सारे सदस्य खुशीखुशी उस सदस्य को गले लगा कर उस के परिवार को सौंप देते.

झपकी लेता हुआ भूरा अचानक भूंकने लगा. उस के भूंकने की आवाज सुन कर अम्माजी समझ गईं कि जरूर कोई दुखियारा आया होगा. कई वर्ष बीत जाने के बाद भी प्रतिदिन कोई न कोई आ जाता है सहायता मांगने. कभी कोई रोजीरोटी की तलाश में तो कोई अपनों की. जमुनिया ने उस व्यक्ति का नामपता लिख कर कागज अंदर ला कर टेबल पर रख दिया.

अम्माजी रजिस्टर में कुछ लिख रही थीं, बिना देखे ही जमुनिया को आगंतुक को अंदर भेजने का इशारा कर दिया. पता नहीं क्यों, आज आगंतुक के साथ भूरा भी अंदर चला आया अपनी दुम हिलाते हुए, वरना अम्माजी के आवाज दिए बिना कभी भी वह अंदर नहीं आता था.

अपने काम में मगन अम्माजी ने टेबल पर रखा कागज उठाया और पढ़ने लगीं. नाम-हरीश रावत, उम्र-65 साल, गांव-बिसुनपुरा, जिला-चमोली, उद्देश्य-गुमशुदा धर्मपत्नी की तलाश, पत्नी का नाम-लाजवंती रावत, उम्र-61 साल, पहचान-रंग गोरा, भारी बदन और चेहरे पर सिंदूर की बड़ी सी बिंदी. उन्होंने नाम व पता एक बार और पढ़ा और सन्न रह गईं. सिर का पल्लू आगे सरका, आंख उठा कर सामने देखा, फटेपुराने कपड़ों में भूख और लाचारी में डूबा एक व्यक्ति, जो अपनी उम्र से कम से कम 10 वर्ष ज्यादा का लग रहा था, आंखें नीची किए और अपने हाथों को जोड़े खड़ा था, याचनाभरा भाव लिए हुए.

15 जून, 2013 की आधी रात का एकएक लमहा क्या वे भूल सकती हैं? बाहर के कमरे में लाजवंती और उन के पति सो रहे थे. कमरे में प्रकाश के लिए एक ढिबरी रातभर जलती रहती थी. पति की उम्र 62-63 वर्ष की थी. दुबलेपतले और फुरतीले होने के कारण वे अपनी उम्र से 5 वर्ष कम ही प्रतीत होते थे, जबकि वह भारी बदन की थीं, घुटनों में दर्द रहने के कारण चलनेफिरने में उन्हें दिक्कत होती थी.

रात में दर्द की दवा लेने पर ही नींद आती थी उन्हें. सर्दी में दर्द ज्यादा बढ़ जाता तब छोटीछोटी जरूरतों के लिए पति और बहुओं पर निर्भर रहना पड़ता था. अंदर के 2 कमरों में उन के 2 बेटे, बहुएं, पोतेपोतियां सो रहे थे. भरापूरा परिवार था उन का. थोड़ीबहुत खेतीबाड़ी और दरवाजे पर खड़ी गाएं उन के परिवार की दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त थीं.

तभी वह भयानक जलजला आया. पहले तो किसी को कुछ पता ही नहीं चला. पता चलते ही चारों तरफ ‘भागो, भागो पहाड़ हिल रहा है’ की चीखपुकार मच गई. बगल में पति गहरी नींद में सो रहे थे, उन्हें जोर से हिलाया तो वे उठे, अंदर जा कर बच्चों को आवाज लगाई. बेटेबहुएं अपनेअपने बच्चों को ले कर किसी तरह बाहर भाग रहे थे किसी सुरक्षित स्थान की तलाश में.

चारों तरफ अफरातफरी मची हुई थी. जान के खतरे का आभास होते ही आननफानन भाग खड़े हुए फुरतीले हरीश रावत भी. एक बार पलट कर देखा भी नहीं घुटनों से लाचार अपनी बेबस पत्नी को, जिस ने पिछले 35 सालों से उन के हर सुखदुख में साथ दिया था.

बहुत आहत हुई थीं लाजवंती पति के इस रवैए से. कहां सात फेरे ले कर सात जन्मों तक साथ निभाने की कसमें खाई थीं दोनों ने, पर सैकंडभर में ही सबकुछ साफ हो गया. एक न एक दिन मरना तो सब को है, पर जीतेजी अपनों का साथ छूटने का दुख मरने से भी भयंकर होता है, ऐसा महसूस हुआ था उस पल.

उस रात अम्माजी बिलकुल असहाय और संवेदनशून्य पड़ी थीं अपने बिस्तर पर. तभी भूरा एक आवारा कुत्ता, जो घर के बाहर वाले बरामदे में पड़ा रहता था, न जाने किधर से अंदर आया और उन्हें देख कर भूंकने लगा मानो कह रहा हो जल्दी चलो, वरना अनर्थ हो जाएगा. वे चाहतीं तो धीरेधीरे निकलने की कोशिश कर सकती थीं. पर जीने की इच्छा तो खत्म हो चुकी थी, अब जीना भी किस के लिए?

उन्होंने भूरा से कहा, ‘तू भी क्यों नहीं भाग जाता नालायक, मुझे छोड़ कर?’ पर भूरा जाता तो कैसे, कुत्ता जो था. एक बार जिस के हाथ की रोटी खा ली, जिंदगीभर उस का गुलाम बन गया. तभी ऐसा लगा कि भूचाल आ गया हो, सबकुछ उलटपुलट…उस के बाद जब आंखें खुलीं तो देखा ऊपर से रोशनी आ रही है, दिन निकल चुका था, ध्यान से देखने पर अनुमान लगाया, शायद चट्टान के टुकड़े छत पर गिरने से छत टूट गई थी और कमरे में चारों तरफ रोड़े पड़े थे. वे नीचे पड़ी थीं और उन की खाट उन के ऊपर.

फिर जब दोबारा होश आया तो खुद को अस्पताल में पाया. लोगों ने बताया कि एक घायल कुत्ते ने किस तरह लोगों को भूंकभूंक कर बताया कि कोई इस मलबे में दबा पड़ा है. तब से वह कुत्ता भूरा और लाजवंती साथसाथ ही रहते हैं. उपचार के बाद धीरेधीरे वे थोड़ी ठीक हुईं तो लोगों के दुखदर्द देख कर अपना गम भूल गईं तथा दिनरात जरूरतमंद लोगों की सेवा में लीन हो गईं. शारीरिक और मानसिक परिश्रम करने से इस दौरान शरीर गल चुका था, अब वे सफेद वस्त्र पहनतीं और मस्तक पर बिंदी नहीं लगाती थीं. उन के सेवाभाव के कारण उन्हें आपदा राहत केंद्र की संचालिका बना दिया गया. किसी को उन का असली नाम नहीं मालूम था. सब उन्हें सम्मान से अम्माजी कहते थे.

तभी जमुनिया अंदर आई यह सोच कर कि अम्माजी क्या आदेश देती हैं. अम्माजी ने इशारे से दीवार पर लगे फोटो और नामपता दिखाने को कहा. आगंतुक ने बड़े ध्यान से उन्हें देखा और निराश हो कर वहीं धम्म से बैठ गया जमीन पर. सारे के सारे अनजान थे उस के लिए. कुछ देर तक सन्नाटा छाया रहा. फिर जमुनिया उस व्यक्ति को ले कर बाहर चली गई और क्षमा मांगते हुए कहा कि यह केंद्र उन की सहायता करने में असमर्थ है. फिर हमेशा की तरह सांत्वना दी और कहा, ‘‘अंकल, हौसला रखिए, आप को आप की पत्नी अवश्य मिल जाएंगी.’’

जमुनिया के साथ ही भूरा भी चल पड़ा उस आगंतुक के पीछेपीछे, जैसे पुराना दोस्त हो. पता नहीं कुत्ते में क्या बात थी कि आगंतुक को अपने बरामदे में पड़े उस आवारा कुत्ते की याद आ गई, जिसे मना करने के बावजूद भी लाजवंती सुबहशाम कुछ न कुछ खाने को दे देती थीं और अकस्मात ही उस के मुंह से निकल पड़ा, ‘भूरा’. नाम सुनते ही कुत्ता अपनी दुम हिलाने लगा.

रात के करीब 10 बजे भूरा के भूंकने से अम्माजी की नींद खुली, लगा किसी ने हौले से दरवाजा खटखटाया हो, ठीक उसी तरह जिस तरह शादी के बाद उन के नएनवेले पति सब के सोने के बाद खटखटा कर कमरे में घुसते थे. उन्हें लगा, मन का वहम है, पर थोड़ी देर बाद जब दोबारा दरवाजा खटखटाया गया तो उन्होंने दरवाजा खोल दिया. देखा, हरीश खड़े थे, आंखें नीची किए और अपने हाथों को जोड़े, कहा, ‘‘लाजो, मुझे माफ कर दो, मुझसे बड़ी गलती हो गई.’’

धक से कलेजा हो गया एकदम उन का. ‘यह भूरा भी न,’ अम्माजी ने सोचा.

दिल कड़ा कर के कहा, ‘‘कौन सी लाजो? कैसी लाजो?’’

हरीश बोले, ‘‘मेरी धर्मपत्नी, मेरी हमसफर.’’

‘‘वह तो मर चुकी, 15 जून, 2013 की आधी रात को ही जब किसी अपने ने उस का साथ छोड़ दिया था बीच सफर में,’’ कह कर उन्होंने दरवाजा कस कर बंद कर लिया.

 

हमसफर: लालाजी की परेशानी वजह क्या थी ?

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हमसफर: भाग 4- लालाजी की परेशानी वजह क्या थी ?

लेखक-रमाकांत मिश्र एवं रेखा मिश्र

‘‘इतना कुछ सोचते हैं, फिर भी आप ने शादी नहीं की?’’

‘‘कहां सोचता हूं इतना कुछ. यह तो, बस, आप के सामने न जाने कैसे एक गुबार सा निकल पड़ा. वरना सोचता तो मैं भी वही हूं जो आप सोचती हैं. पर अब इतना कह कर, इसे मैं प्रतिक्रिया कहूं, अनुभव कहूं या समय का असर कहूं, समझ नहीं पा रहा क्या कहूं, दरअसल, मैं आप से तर्क नहीं कर रहा था, बोल कर सोच रहा था इतना सोच कर अब यों लगता है जैसे हम लोग जरूरत से ज्यादा भावना के अधीन हो गए हैं. ऐसी भावना जो कभी ठोस नहीं हो सकती.’’

‘‘भावना न हो तो पशु और मानव में अंतर क्या रहा?’’

‘‘पशुओं में भावना नहीं होती, यह आप से किस ने कहा?’’

‘‘क्या शादी जन्मजन्मांतर का बंधन नहीं?’’ ममता कुछ नाराज सी हो गई थी.

‘‘मैं भी यही मानता रहा हूं कि शादी जन्मजन्मांतर का बंधन है, लेकिन यह सच नहीं हो सकता. शादी शरीर की होती है और शरीर तो नष्ट हो जाता है.’’

‘‘तो एक मनुष्य, जो नहीं रह जाता, उस से कोई संबंध भी शेष नहीं रह जाता?’’

‘‘सारे संबंध शरीर से होते हैं. शरीर नष्ट हो जाने पर संबंध भी नष्ट हो जाते हैं. मैं अब सुरुचि का पति नहीं हूं. तुम भी बुरा मत मानना, तुम गोपालजी की पत्नी नहीं हो. मैं सुरुचि का विधुर हूं, तुम गोपालजी की विधवा हो. पतिपत्नी का रिश्ता तो तब तक ही है जब तक शरीर है. समाज तो इतना भी नहीं मानता. अगर पतिपत्नी शरीर के जीवित रहते भी एकदूसरे को त्याग दें तो संबंध समाप्त हो जाता है.’’

‘‘मजे की बात देखिए, मरने वाले का सामाजिक संबंध तो वैसे ही शेष रहता है, जैसे मरने से पहले था. मां, पिता, पुत्र, ननद, भाभी, देवर, जेठ कोई भी संबंध अपना नाम नहीं बदलता. केवल पतिपत्नी का ही विधुरविधवा में परिवर्तन हो जाता है. इस से भी यही सिद्ध होता है कि विवाह जन्मजन्मांतर का बंधन नहीं है.

ममता गहरी सोच में डूब गई. सड़क काफी खराब थी. भीड़ भी बढ़ रही थी. मैं चुपचाप कार चलाता रहा. बरेली में मारवाड़ी भोजनालय में हम ने लंच किया. फिर छिटपुट बातें चल पड़ीं. मामाजी के बारे में काफी समय तक बातें होती रहीं. लखनऊ आने पर मैं ने ममता को उस के घर के सामने उतार दिया.

‘‘अंदर नहीं आओगे?’’ ममता ने अजीब से स्वर में कहा.

‘‘अभी नहीं. कभी मेरे घर आना’’, मैं ने यों ही कह दिया.

‘‘जरूर आऊंगी’’, ममता ने कहा तो मैं चौंक पड़ा.

‘‘सुबह ही मिलता हूं मैं’’, मैं ने कहा.

वह हंस दी. मैं ने सलाम की मुद्रा में हाथ उठाया और कार आगे बढ़ा दी.

सुबह घंटी की आवाज से मेरी नींद खुली. रात को मैं काफी देर से

घर लौटा था. अभी मेरी नींद पूरी नहीं हुई थी. एक बार फिर घंटी बजी.

‘कौन हो सकता है इतनी सुबह’, मैं बड़बड़ाया. मेरी नजर घड़ी की ओर उठ गई. साढ़े 8 बजे थे. घंटी फिर बजी. मैं गाउन की डोरियां कसते हुए स्लीपर में पांव फंसाने लगा. तब तक 3 बार घंटी बज चुकी थी.

मैं ने दरवाजा खोला. सामने ममता को खड़ी देख मेरी नींद गायब हो गई. मैं ने आंखें मलीं, सोचा, सपना तो नहीं देख रहा. जरूर सपना था.

मैं हड़बड़ा कर एक ओर हट गया. ममता अंदर आ गई और ठिठक कर घर का मुआयना करने लगी. अब मुझे अपने ड्राइंगरूम के फूहड़पन का एहसास हुआ. लेकिन जहां कभी कोई आता ही न हो, उस का और कैसा हाल होगा, मैं ने खुद को आश्वस्त किया. लेकिन आश्वस्त न हो सका. सो, शरमाता हुआ बोला, ‘‘बैठो, वो क्या है कि मैं अभी सो रहा था. आज रविवार है न. अभी राजू आएगा, ठीक करेगा सब.’’

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ममता कुछ न बोली. एक सोफे पर बैठ गई. मैं कुछ देर यों ही खड़ा रहा. फिर बोला, ‘‘मैं चाय बनाता हूं’’, मन ही मन सोच रहा था कि रसोई में

कुछ होगा भी या सिर्फ चाय पर गुजर करनी पड़ेगी.

‘‘तुम फ्रैश हो लो, मैं चाय बनाती हूं’’, ममता उठते हुए बोली.

‘‘नहींनहीं’’, मैं सकपका गया. रसोई की हालत तो और बुरी थी. मैं खुद ही रसोई की ओर लपकते हुए बोला, ‘‘तुम मेहमान हो. तुम बैठो, मैं चाय बनाता हूं.’’

लेकिन ममता मेरे पीछेपीछे ही जब किचन की ओर चल पड़ी, तो मुझे कुछ न सूझा. एक क्षण को सोचा, मैं भी साथ जाऊं, पर हिम्मत न पड़ी. मन ही मन मैं यह सोचते हुए, ‘अब जरूर पिएगी यह चाय’, मैं ऊपर को लपक लिया.

टौयलेट से निबट कर जब मैं नीचे आया, तो डायनिंग टेबल पर टीसैट के साथ हौटकेस देख कर चौंका.

‘‘कितनी चीनी लोगे?’’

‘‘दो.’’

ममता ने हौटकेस खोल कर मेरी ओर बढ़ा दिया. वह चाय बनाने लगी. मैं ने चुपचाप 2 टोस्ट प्लेट में रख लिए और हौटकेस ममता की ओर बढ़ा दिया.

‘‘यह तो घर में नहीं था’’, मैं टोस्ट कुतरते हुए बोला.

‘‘मोड़ पर ही तो दुकान है’’, ममता ने सहज स्वर में कहा.

एकाएक मेरे गले में टोस्ट फंस गए. मैं ने खुद को संभाला, पर मेरी आंखें डबडबा आईं.

‘‘क्या हुआ?’’ मेरे चेहरे के भाव ममता से छिपे न रह सके. पानी का गिलास बढ़ाते हुए उस ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं’’, परेशानी दिखाते हुए मैं ने कहा.

फिर हम चुपचाप चाय पीते रहे. चाय के बाद ममता चाय का सामान समेटने लगी, तो मैं हड़बड़ा कर बोल पड़ा, ‘‘न…न…क्या करती हो? मैं करता हूं.’’

‘‘रहने दो’’, ममता ने मुसकरा कर कहा और अपना काम करती रही. मैं कुछ न कर पाया.

किचन से वह लौटी तो बोली, ‘‘घर नहीं दिखाओगे अपना?’’

‘‘घर?…हां. वो…क्यों नहीं’’, मैं ने उठते हुए कुछ हकलाते हुए कहा.

मैं ने उसे नीचे का बैडरूम दिखाया. फिर पिछले बरामदे से पीछे उसे झाड़झंखाड़ की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘किचन गार्डन.’’

‘‘सामने का आलीशान लौन तो तुम देख ही चुकी हो’’, मैं ने व्यंग्य से कहा, ‘‘यह उसी परंपरा का विस्तार है.’’

‘‘लेकिन इस बैडरूम से तो ऐसा नहीं लगता कि तुम इस में रहते हो?’’ बैडरूम से बाहर निकलती हुई ममता बोली.

‘‘मैं ऊपर रहता हूं.’’

‘‘वह नहीं दिखाओगे?’’

‘‘वो…वहां कुछ नहीं है, वहां.’’

‘‘वहां कोई दूसरी औरत नहीं जा सकती न?’’

‘‘नहीं…नहीं…ऐसा कुछ नहीं. तुम से किस ने कहा. तुम चलो’’, मैं ने हड़बड़ा कर कहा.

‘‘रहने दो’’, ममता बोली.

‘‘नहीं, चलो, देख लो. वरना मेरे मन में कचोट रह जाएगी’’, मैं ने मनुहार की.

मैं ममता को ऊपर ले आया. ममता कमरे को देखती रही, फिर वह सुरुचि की तसवीर के सामने जा खड़ी हुई.

‘‘इस कमरे में घुसने के कारण ही तुम ने उस लड़की को निकाल दिया था न?’’

‘‘तुम्हें कैसे मालूम?’’ मैं ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘वह लड़की अब मेरे पास काम करती है. उसी ने मुझे बताया कि तुम कितने अकेले हो. तुम ने उसे गलत समझा था. वह तुम्हारी देखभाल जरूर करना चाहती थी, लेकिन सुरुचिजी का स्थान लेने के लिए नहीं. तुम से प्रभावित हो कर, सुहानुभूतिवश. उस दिन जब तुम मुझे उतार कर गए तो उस ने तुम्हें देखा था. बाद में वह मुझ से पूछने लगी कि मुझे तुम ने कार में कैसे बैठा लिया. वह कहती है कि तुम कार में किसी औरत को भी कभी नहीं बैठाते. सच?’’

‘‘मैं ने मुसकरा कर टालने की मुद्रा में सिर हिला दिया.’’

‘‘उसी ने मुझे बताया कि तुम बहुत अच्छे आदमी हो. वह तुम्हारी बहुत इज्जत करती है. कहती है कि तुम अकेले आदमी मिले हो जिस ने उसे कभी मैली नजर से नहीं देखा.’’

‘‘तब तो मैं ने उस के साथ बड़ी नाइंसाफी की. उस से कह देना कि मैं शर्मिंदा हूं.’’

‘‘कोई बात नहीं.’’

‘‘कैसी अजीब दुनिया है. उस बेचारी ने किसी से कुछ भी नहीं कहा. लोगों ने खुद ही गढ़ लिया कि मैं उस पर बुरी नीयत रखता था. ओह…तभी’’, मेरे मुंह से निकला.

‘‘क्या हुआ?’’

‘‘काम वह बहुत अच्छा करती थी. दीवाली के पहले का समय था, उस ने घर की सफाई में बड़ी मेहनत की. मैं खुश हो कर उसे 100 रुपए देने लगा, तो एकदम से दूर हट गई और कहने लगी, यह तो मेरी ड्यूटी है, मुझे पैसा नहीं चाहिए. मैं ने कहा भी कि मैं खुश हो कर दे रहा हूं तो भी उस ने लिए नहीं. बस, हाथ जोड़ दिए. हालांकि मुझे बुरा भी लगा, लेकिन फिर उस पर मैं ने अधिक गौर नहीं किया. आज समझ में आया कि वह क्या समझी होगी’’, मैं हंसने लगा.

ममता भी हंस पड़ी.

‘‘यहां तो बैठने को भी कुछ नहीं. आओ, नीचे चलते हैं.’’

‘‘अभी मैं इस कमरे को और देखना चाहती हूं. इस पलंग पर बैठ जाऊं?’’

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मजबूर हो कर मुझे भी उस के साथ पलंग पर बैठना पड़ा. ममता बड़े आराम से घुटने मोड़ कर बैठ गई थी. काफी समय तक बातचीत के बाद मैं ने लंच के लिए कहा, तो वह बोली, ‘‘घर में बने तो जरूर.’’

उस के बाद उस ने मुझे जरूरी सामान की सूची बना कर दी. मैं बाजार से सामान लाया. खाना उस ने ही बनाया. राजू की आज बड़ी मशक्कत हुई, लेकिन वह खुश नजर आ रहा था. ‘दीदी, दीदी’, मुसकराते हुए वह जीजान से जुटा रहा और उस ने ड्राइंगरूम, बाथरूम, रसोईघर सब चमका डाले. मैं नहाने चला गया. कपड़े धोने के बाद राजू न जाने कहां से एक तलवार और फावड़ा ले आया था. सामने का लौन बिलकुल दुरुस्त कर के वह पीछे के किचन गार्डन में जुट गया.

मौन और भरेदिल से मैं ने खाना खाया. खाना बहुत अच्छा बना था, लेकिन जाने क्यों मेरे गले में नहीं उतर रहा था. राजू को खाना खिला कर ममता ने 50 रुपए दिए. राजू लेने में आनाकानी करने लगा, तो उस ने उस की कमीज की जेब में डाल कर उस के सिर पर एक चपत लगा दी.

‘‘आप रोज आओगी दीदी?’’

‘‘क्यों?’’

‘‘आप आई हो न, तो बड़ा अच्छा लग रहा है.’’

‘‘आऊंगी.’’

राजू बरतन साफ कर के रसोई घर को व्यवस्थित कर के चला गया. राजू के जाने के बाद हम बात न कर सके. कुछ देर बैठी रहने के बाद ममता रसोई में चली गई. वह थोड़ी देर बाद लौटी तो उस के हाथों में 2 कप थे. कौफी की सुगंध दूर से ही मेरी नाक में समा गई. मैं खुद को रोक न पाया और फफक कर रो पड़ा.

ममता ने कुछ नहीं कहा. जब मैं खुद को रोक न सका, तो बाथरूम जा कर हाथमुंह धो आया. वापस आ कर नजरें नीची किए मैं कौफी पीता रहा. माहौल में एक अजीब सा खालीपन, बोझिलता फैल गई. चुप्पी छाई रही.

‘‘आज का दिन बहुत अच्छा गुजरा.’’ ममता कौफी के कप रसोई में रख आई थी. एकाएक बोली, ‘‘अब इजाजत दो, चलूंगी. शाम ढल रही है.’’

मैं ने सिर उठा कर ममता की ओर देखा. जो कहना चाहता था उसे जबान पर लाने की हिम्मत न हुई. वह मुसकराई.

‘‘अच्छा’’, वह उठ खड़ी हुई.

मैं भी थकाथका सा उठ खड़ा हुआ. दरवाजे से बाहर आ कर मुझे लगा कि ममता अपनी गाड़ी नहीं लाई है.

‘‘तुम जाओगी कैसे?’’

‘‘टैक्सी मिल जाएगी.’’

‘‘नहीं, ठहरो, मैं तुम्हें छोड़ कर

आता हूं.’’

‘‘क्यों तकल्लुफ करते हो.’’

‘‘2 मिनट रुको, मैं चाबी उठा लूं.’’ उस की बात अनसुनी करते हुए मैं ने कहा और अंदर चला गया. 3 मिनट में मै ने कपड़े बदले और बाहर आ गया. वह बरामदे में मोढ़े पर बैठी थी. मैं ने देखा कि पड़ोस की एकदो औरतें उसे बड़े गौर से देख रही थीं.’’

‘‘चलें’’, मैं ने कहा.

वह उठ खड़ी हुई. रास्ते में हम दोनों चुप ही रहे. मैं ने कार ममता के घर के गेट के सामने रोकी. ममता ने कार का दरवाजा खोलने को हाथ बढ़ाया.

‘‘ममता’’, मैं ने उसे पहली बार नाम से पुकारा.

उस ने पलट कर मेरी ओर देखा.

‘‘मत जाओ, ममता’’, मैं ने उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा.

एकाएक वह पत्ते सी कांप उठी. मैं ने पास सरक कर उस का कंधा थपथपाया. वह अपने को रोक न सकी. मेरे कंधे पर सिर रख कर थरथर कांपती फूटफूट कर रो पड़ी.

अपने आंसुओं को रोकने की कोशिश में थरथराता मैं यह नहीं देख पाया कि कब निर्मला बाहर निकली और हमें यों एकदूसरे की बांहों में देख कर अंदर गई और शरारत से मुसकराती हुई लालाजी को बाहर बुला लाई. लालाजी ने उस के सिर पर एक चपत लगाई और मुसकराते हुए खुद अंदर चले गए और उसे हमें बुलाने को कह गए.

भीतर जा कर मैं ने लालाजी के पांव छूने चाहे तो वे पीछे हट गए. ‘‘न…न भई, क्यों नरक में ढकेलते हो. तुम ब्राह्मण

हो, मैं कायस्थ हूं, मुझे तुम्हारे पैर

छूने चाहिए.’’

‘‘बेटा तो पिता के पैर छुएगा न?’’ मैं ने कहा.

‘‘बेटा?’’ लालाजी असमंजस में बोले.

‘‘ममता आप की बहू है. उस का हाथ तो मैं तभी थाम सकता हूं जब आप मुझे अपना बेटा बना लें.’’

लालाजी की आंखों में आंसू आ गए. मैं ने झुक कर उन के पैर छुए तो अनायास ही वे मेरे सिर को सहलाने लगे. फिर उन्होंने झुक कर मेरे कंधे पकड़े और मुझे अपने सीने से लगा लिया. बहुत देर तक वे मुझे यों ही सीने से लगाए रहे. उन के आंसू मेरे कंधे को भिगोते रहे. मुझे यों लग रहा था जैसे तपती धूप से निकल कर किसी ठंडी हवा वाली जगह पर आ गया हूं. मन की वर्षों की सिसिजाहट जाने कहां गायब हो गई. विश्वास से मन भीग उठा.

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हमसफर: भाग 3- लालाजी की परेशानी वजह क्या थी ?

लेखक-रमाकांत मिश्र एवं रेखा मिश्र

फिर हम काफी समय तक चुप रहे. कार में भर उठी उदासी को दूर करने के मकसद से मैं ने पूछ लिया, ‘‘आप कुछ कर रही हैं क्या?’’

‘‘हां, टाइम काटने के लिए एक बुटीक खोला है.’’

‘‘सचमुच? कहां पर?’’ मैं ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘हजरतगंज में.’’

‘‘अप्सरा तो नहीं?’’ मैं ने ममता की ओर देखा.

‘‘जी’’, उस ने सिर हिला कर कहा.

अप्सरा 2 वर्ष पहले ही शुरू हुआ था और आज की तारीख में लखनऊ में फैशनपसंदों की पहली पसंद है.

‘‘अप्सरा तो लखनऊ की शान है.’’

‘‘लोगों की मेहरबानी है?’’

‘‘लालाजी कैसे हैं?’’

‘‘ठीक ही हैं’’, ममता के स्वर में गहरी निराशा थी.

‘‘क्या बात है?’’ मैं पूछे बिना न रह सका.

ममता मौन रही. जैसे सोच रही हो कि इस बारे में कुछ बात करे या नहीं. आखिरकार, उस ने मौन तोड़ा, ‘‘आप तो जानते ही हैं कि पापाजी मुझ से क्या चाहते हैं. अब कहते तो कुछ नहीं लेकिन मैं जानती हूं कि दिनोंदिन मेरी चिंता में घुलते जा रहे हैं,’’ उस की आवाज नम हो गई.

मुझे समझ में नहीं आया कि क्या कहूं.

‘‘कभीकभी तो लगता है कि उन का कहना न मान कर मैं गलती कर रही हूं,’’ थोड़ी देर के बाद ममता ने कहा.

मैं बहुत कुछ कहना चाहता था, लेकिन सही मौका नहीं मिल पा रहा था. मैं एक द्वंद्व में फंस गया था. एक ओर मेरी भावनाएं थीं, तो दूसरी ओर मेरे अनुभव. शायद ममता के मन में भी ऐसा ही कुछ चल रहा था. हम कुछ कह नहीं पा रहे थे. मैं खामोशी से कार चलाता जा रहा था.

नजीबाबाद आ गया था. यहां की चाय मशहूर है. मैं ने एक घूंट गले में उतार कर बात शुरू की.

‘‘तुम कह रही थीं कि कभीकभी लगता है कि गलत कर रही हो.’’

ममता ने आश्चर्य से मुझे देखा. मैं कब और कैसे आप से तुम पर आ गया था, पता नहीं चला.

‘‘मुझे तो लगता है,’’ मैं ने अपनी बात जारी रखी, ‘‘बल्कि यह कहना चाहिए कि विश्वास होता जा रहा है कि हम गलत कर रहे हैं. मैं अपनी बात बताता हूं, आज भी सुरुचि मेरे मन में वैसे ही बसी हुई है. उस की यादें मुझे जीने नहीं देतीं. मैं सामान्य नहीं रह पाता. कहने को घर जरूर है, लेकिन मैं कभीकभी 2 बजे रात से पहले घर नहीं लौटता, कभी घर के किचन में खाना नहीं बनता. जानबूझ कर आधी रात तक काम करता रहता हूं.

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‘‘थक कर चूर हो कर घर लौटता हूं, लेकिन घर आने को दिल नहीं करता. घर जैसे काटने को दौड़ता है. बिस्तर पर लेटता हूं तो नींद नहीं आती. उठ कर बैठता हूं तो सूनापन जैसे रोमरोम में सुईयां चुभोने लगता है. दोस्तों ने कहा कि शादी नहीं करते न करो, यों ही इधरउधर कुछ कर लो. तुम से… क्या बताऊं… एक बार एक दोस्त ऐसी भी जगह ले गया. चला तो गया, लेकिन वहां जा कर ऐसा अफसोस हुआ कि क्या बताऊं.

‘‘मैं वापस लौट आया. मुझ से उस गंदगी में…’’ मैं थोड़ी देर चुप रहा. फिर बोलने लगा, ‘‘उस दिन घर आ कर बहुत रोया. बस, एक ही संतोष था कि गिरतेगिरते बच गया था. दोस्तों ने सलाह दी, शराब पियो, सब भूल जाओगे. लेकिन संस्कार कुछ ऐसे हैं कि कभी पी नहीं सकता,’’ फिर एक पल को चुप हुआ. चाय के कुछ घूंट भरे.

‘‘होटलों में खाता हूं, क्योंकि खाना बनाना नहीं आता. पहले एक नौकर रखा तो वह घर में उलटेसीधे लोगों को ले आता था. उसे निकाला तो एक लड़की रखी. उसे घर से ज्यादा मेरी देखभाल की फिक्र थी. निकाल दिया तो सुनता हूं कि पड़ोसियों से कह गई कि मैं उस पर बुरी नजर रखता था. विश्वास करोगी, लेकिन यह सच है कि मैं ने आज तक किसी को बुरी नजर से नहीं देखा.’’

ममता कुछ न बोली.

‘‘अब नौकर रखते हुए डरता हूं. अड़ोसपड़ोस में शायद ही कोई मुझे शरीफ आदमी समझता हो. कोई न मुझे अपने यहां बुलाता, न कोई मेरे यहां आता है. मैं खुद भी न तो किसी के यहां जाना चाहता हूं न किसी को बुलाना चाहता हूं.’’

ममता ध्यान से मेरी बातें सुन रही थी.

‘‘मैं क्या करूं? शादी मैं करना नहीं चाहता और दूसरा कोई रास्ता बचता नहीं जिस से मेरा सूनापन, जो मुझे दिनोंदिन खाए जा रहा है, खत्म हो सके. तुम अगर लालाजी की बात मान लो तो उस का अच्छा परिणाम होगा.’’

ममता मेरे इस सीधे हस्तक्षेप पर चुप न रह सकी. वह बोली, ‘‘लेकिन हमें अपना ही सुख तो नहीं सोचना चाहिए. हमारे बच्चे भी तो हैं. उन पर क्या असर पड़ेगा? क्या वे इसे स्वीकार कर पाएंगे? आप खुद तैयार नहीं हैं और मुझे कह रहे हैं, जबकि आप के लिए तो यह सब आसान है. सामाजिक तौर पर एक आम बात है.

‘‘नहीं…नहीं, मैं आप पर आक्षेप नहीं कर रही हूं. आप की तो मैं इज्जत करती हूं. आप तो महान हैं. मैं तो आम बात कर रही हूं. हमारे समाज में मर्द की दूसरी शादी आम बात है. लेकिन विधवा, वह भी बच्चे वाली विधवा और ऊपर से एक लड़की की मां, का विवाह तो असाधारण नहीं वरन घृणित माना जाता है. एक क्षण के लिए मान लीजिए मैं विवाह कर भी लूं तो मेरी तो जो दुर्गति होनी है होगी ही, कल मेरी बेटी की शादी किसी ठीक लड़के से होनी मुश्किल हो जाएगी.’’

ममता की बातों ने मुझे कहीं गहरे झकझोर दिया और मैं जो कुछ आज तक सोचता आया था, उस के विपरीत विचारों में उलझ गया.

‘‘चलिए, काफी समय हो गया,’’ मुझे विचारों में उलझा देख कर ममता ने कहा.नजीबाबाद की ऊबड़खाबड़ सड़कों से निकल कर जब हम थोड़ी अच्छी सड़क पर पहुंचे तो मैं ने फिर बात शुरू की.

‘‘मैं आप की बातों से पूरी तरह सहमत नहीं हूं. मैं मानता हूं कि समाज एक विधवा का विवाह आज भी सहजता से नहीं लेता, लेकिन समाज है क्या? आज इस समाज में एक भी भ्रष्टाचारी, दुराचारी आदमी का विरोध करने का दम है? आज सब जगह धन और बल की पूजा हो रही है. ऐसे समाज पर हम

अपना जीवन क्यों न्योछावर करें, जिसके न कोईर् सिद्धांत रह गए हैं न कोई जीवन मूल्य.

‘‘क्या है यह समाज? मुझे देखिए, सुरुचि के अलावा मैं ने शायद ही किसी औरत को ढंग से देखा हो. लेकिन ज्यादातर लोग मुझे चरित्रहीन समझते हैं. मुझे चरित्रहीन का फतवा सुनाने वालों में कई ऐसे हैं, जो अपनी बेटी या बहन का रिश्ता ले कर आए थे. अगर आज मैं उन के यहां शादी को हां कर दूं तो मैं ठीक हूं, उन्हें शादी से कोई एतराज नहीं. वरना मैं चरित्रहीन हूं. और…बुरा मत मानिएगा, आप को भी लोगों ने बख्शा नहीं होगा,’’ मैं उत्तेजित हो

गया था.

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‘‘आप ठीक कहते हैं. मुझ पर… तो पापाजी के साथ लांछन लगाया गया है,’’ ममता कंपकंपाते स्वर में बोली थी.

‘‘फिर भी आप समाज का रोना रो

रही हैं?’’

‘‘तभी तो और सोचना पड़ता है.’’

‘‘नहीं, ऐसा सोचना गलत है. हमें जीने के लिए एक ही जीवन मिला है. अगर हम इसे इस समाज के भय से बरबाद कर दें तो हम से बड़ा मूर्ख कोई नहीं. फिर इस समाज को लालाजी से अधिक तो हम समझ नहीं सकते. अगर वे गलत नहीं समझते तो समाज जाए भाड़ में.’’

ममता चुप रही. मुझे अपनी उत्तेजना पर काबू पाने में समय लगा. न जाने कब से यह सब घुमड़ रहा था. आज गुबार निकला तो कुछ सुकून मिला.

‘‘बच्चों की बात जरूर सोचने वाली है,’’ मैं फिर बोला, ‘‘बच्चों पर पड़ने वाले असर के बारे में हमें जरूर सोचना चाहिए लेकिन अगर हमारा आचरण गरिमामय हो, उन के प्रति स्नेहमय हो, उदार हो तो बच्चों पर कोई गलत प्रभाव नहीं पड़ेगा. अगर हमारा परिपक्व व्यवहार हो तो उलटा बच्चों के लिए फायदेमंद ही होगा. फिर कुछ सालों बाद वे निश्चय ही अपना संसार बसाएंगे. तब हम लोग और अधिक अकेले पड़ जाएंगे. मैं तो डरता हूं, कहीं मैं खुद ही अपने बेटे के सुखों से ईर्ष्या न करने लगूं. मैं ने ऐसा होते

देखा है.’’

मैं ने एक सिहरन महसूस की.

‘‘ज्योंज्यों बुढ़ापा आएगा हमें एक सच्चे साथी की उतनी ही अधिक दरकार होगी. मैं मानता हूं कि जरूरी नहीं कि विवाह से बुढ़ापे तक का साथ मिल ही जाए, लेकिन आमतौर पर तो ऐसा ही होता है. और फिर, अगर आदमी अपनी जवानी में संतुष्ट हो जाता है तो उसे बुढ़ापे में कोई मलाल नहीं रहता. अपनी संतानों का हंसनाबोलना उसे गुदगुदाता है, दुखी नहीं करता.’’

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हमसफर: भाग 2- लालाजी की परेशानी वजह क्या थी ?

लेखक-रमाकांत मिश्र एवं रेखा मिश्र

ममता चुप रही. जैसे मेरी बात को तौल रही हो. फिर बोली, ‘‘मुझे चाचाजी ने आप के बारे में बताया था. सच कहूं तो आप के बारे में जान कर मुझे बड़ा सहारा मिला. चाचाजी ने मुझे बताया कि आप ने दोबारा शादी करने से इनकार कर दिया है. आप के इस फैसले से मुझे कितना भरोसा मिला, मैं बता नहीं सकती,’’ कह कर ममता एक पल को रुकी, फिर बोली, ‘‘मुझे आप की बात से कोई विरोध नहीं, लेकिन मैं क्या करूं? उन को मैं भूल नहीं सकती. मेरे सुख तो वही थे. बच्ची के साथ रहती हूं तो हंस जरूर लेती हूं, लेकिन मन से नहीं. सच तो यह है कि हंसी आती ही नहीं और न ही ऐसी कोई इच्छा बची है.’’

‘‘मेरे साथ भी ऐसा ही है,’’ मैं ने स्वीकार किया.

मैं और ममता दोनों ही चुप हो गए. दोनों के एहसास एक से थे. आखिरकार, मैं ने तय किया कि ममता को धोखा देना ठीक न होगा. न मैं शादी कर सकता था और न ममता. इसलिए ठीक यही था कि ममता को सब बता दिया जाता.

तभी कमला चाय ले आई. ममता ने चाय का प्याला मुझे दिया. बिस्कुट लेने से मैं ने इनकार कर दिया तो ममता ने ज्यादा इसरार नहीं किया. चाय के घूंट भरने के बाद मैं ने अपनी बात शुरू की.

‘‘मैं, दरअसल यहां पर जबरदस्ती भेजा गया हूं, क्योंकि मामाजी और लालाजी दोनों ही इतने भले इनसान हैं कि मैं उन से इनकार नहीं कर पाया.’’

ममता ध्यान से सुन रही थी.

‘‘आप तो जानती ही हैं कि लालाजी आप की शादी कर देना चाहते हैं. उन्होंने मामाजी से अपनी इच्छा बताई तो मामाजी ने मुझ से कहा. हालांकि, मामाजी भी अच्छी तरह जानते हैं कि मैं दूसरी शादी की सोचता भी नहीं. अब न तो मैं राजी था, न आप राजी थीं, इसलिए दोनों ने मुझे यह जिम्मेदारी सौंपी थी कि मैं यहां आनाजाना शुरू करूं और आप से मेलजोल बढ़ाऊं. मुझे यह भी निर्देश है कि मैं यह सब आप को कतई न बताऊं. लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकता, मैं न आप को धोखा दे सकता हूं न खुद को. जिस तरह हम लोग अपनेअपने दिवंगत जीवनसाथियों से जुड़े हैं, ऐसा कुछ हो पाना नामुमकिन है. इन लोगों की बात रखने के लिए मैं 2-1 बार यहां आऊंगा और फिर इन से कहूंगा कि ऐसा हो पाना संभव नहीं है.’’

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मेरे चुप होते ही ममता का सिर इनकार में हिलने लगा. वह उठ कर खड़ी हो गई. मैं भी खड़ा हो गया.

‘‘आप ऐसा कुछ नहीं करेंगे. मैं आप की आभारी हूं कि आप ने सच बता कर मुझे इस घृणित प्रस्ताव से बचा लिया. मैं आप से गुजारिश करना चाहती हूं कि अब आप आइंदा कभी इस घर में मत आइएगा. न ही मुझ से, कहीं पर भी, मिलने की कोशिश कीजिएगा’’, ममता ने हाथ जोड़ दिए.

मैं ने हाथ जोड़ कर उसे नमस्कार किया और वापस कानपुर लौट आया.

मेरी खुद विवाह करने की कोई इच्छा नहीं थी. इसलिए मैं ने खुद को हलका महसूस किया. मामाजी से मैं ने सिर्फ इतना बताया कि ममता राजी नहीं है. मामा ने कुछ नहीं पूछा. मैं ने अनुमान लगाया कि मेरे स्वभाव से अच्छी तरह वाकिफ मामाजी ने यह अनुमान लगा लिया होगा कि मैं ने ममता को सच बता दिया है.

समय बीतता रहा. मेरा तबादला कानपुर से लखनऊ हो गया. लेकिन मेरी फिर कभी न तो लालाजी से और न ही ममता से मुलाकात हुई. वर्षों गुजर गए.

विपुल देहरादून के एक बोर्डिंग स्कूल में पढ़ रहा था. अक्तूबर में उस का वार्षिकोत्सव था. मैं अपनी व्यस्तता के कारण भूल चुका था कि मुझे वहां जाना है. उत्सव के 2 दिनों पहले विपुल का फोन आया तो मैं हक्काबक्का रह गया. मैं ने उस से कहा, ‘‘मैं आ रहा हूं.’’

स्टेशन फोन करने पर पता चला कि यहां से चलने वाली दोनों गाडि़यों में लंबी वेटिंग लिस्ट चल रही है. सो, रेल में धक्के खाने के बजाय मैं ने अपनी टू सीटर कार से ही देहरादून जाना तय किया.

मैं सही समय पर स्कूल पहुंच गया. मुझे कार से आया देख कर विपुल बहुत खुश था. 3 दिन यों ही गुजर गए. कार्यक्रम बहुत सफल रहा. रात में अभिभावकों का सामूहिक भोज था. वहां पर अनायास ही मेरी मुलाकात ममता से हो गई. ममता ने मुझे नमस्कार किया. मैं ने भी नमस्कार किया. ममता के बालों में सफेदी झकलने लगी थी. लेकिन अपने सादा लिबास में वह बहुत भली लग रही थी. हम लोग अधिक बात नहीं कर पाए. उस की बेटी नेहा भी उसी स्कूल में थी.

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अगले दिन सुबह सभी विदा हो रहे थे, लेकिन इस इलाके में उत्तराखंड आंदोलन की वजह से चक्का जाम था. 3 दिन का बंद था. रेलें तक स्थगित हो गई थीं. मजबूरन सभी को रुकना पड़ा. दूसरे दिन प्राइवेट गाडि़यों को जाने की छूट मिली. जिन लोगों के पास अपनी गाडि़यां थीं, उन्होंने अपने रास्ते के लोगों से लिफ्ट की पेशकश की. मैं ने भी लखनऊ तक के लिए किसी एक आदमी को लिफ्ट देने की पेशकश की.

ममता यह जान कर कुछ असमंजस में पड़ी कि उसे मेरे साथ अकेले जाना पड़ेगा. लेकिन फिर वह तैयार हो गई.

ममता का रेल टिकट स्कूल स्टाफ को सौंप कर हम लोग सुबह पौ फटने से पहले ही निकल पड़े. इतनी सुबह चलने का कारण यह भी था कि हम आंदोलन वाले इलाके से सुबह जल्दी निकल जाएं. सुबह 6 बजे से पहले हम हरिद्वार में थे. एक रिसोर्ट में रुक कर फ्रैश हुए, फिर चल पड़े.

रेलवे स्टेशन से पहले एक बढि़या सा रैस्तरां देख कर मैं ने कार रोकी. नाश्ते के दौरान भी हम चुप ही रहे. 15-20 मिनट में नाश्ते से निबट कर हम फिर चल पड़े.

‘‘अब आप लखनऊ में रहते हैं?’’ ममता ने ही चुप्पी तोड़ते हुए पूछा.

‘‘हां, 9 साल हो गए. अब लखनऊ कुछ भाने लगा है. सोचता हूं, यहीं बस जाऊं.’’

‘‘कानपुर में तो शायद आप का अपना मकान था?’’

‘‘नहीं, किराए का था. यहां महानगर में जरूर एक डूप्लैक्स ले लिया है.’’

‘‘चलिए, अच्छा है. अपना घर तो होना ही चाहिए.’’

‘‘घर तो नहीं है, मकान जरूर है’’, मैं ने निराशाभरे स्वर में कहा.

‘‘आप ने अभी तक…?’’ ममता ने बात अधूरी छोड़ दी.

मैं फीकी हंसी हंसा, ‘‘और आप ने…?’’ कुछ देर बाद मैं ने पूछा.

उस ने भी एक फीकी सी हंसी हंस दी.

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हमसफर: भाग 1- लालाजी की परेशानी वजह क्या थी ?

लेखक-रमाकांत मिश्र एवं रेखा मिश्र

मैं ध्यान से मामाजी की बातें सुन रहा था. वे जो कुछ बता रहे थे, सचमुच लाजवाब था. कोई आदमी इतना महान हो सकता है, मैं ने कभी सोचा भी नहीं था. लाला हनुमान प्रसाद सचमुच बेजोड़ थे. मामाजी ने बताया था कि लालाजी कभी खोटी चवन्नी भी भीख में नहीं देते थे, लेकिन समाजसेवा में पैसा जरूर खर्च कर देते थे. कितने लोगों को इज्जत से रोजी कमाने लायक बना दिया था और पढ़ाईलिखाई को बढ़ावा देने के लिए कितना पैसा व समय वे खर्च करते थे. लालाजी इन सब बातों का न तो खुद ढिंढोरा पीटते थे और न ही किसी लाभ उठाने वाले को ये बातें बताने की इजाजत देते थे. हालांकि मामाजी लालाजी से उम्र में लगभग 15 साल छोटे थे, लेकिन लालाजी के साथ मामाजी की गहरी दोस्ती थी. पर जिस बात ने लालाजी को मेरी नजर में महान बना दिया था वह कुछ और ही थी.

लालाजी का एक ही बेटा था. 3 साल पहले उस का विवाह हुआ था. उस की एक नन्ही सी बेटी भी थी. पिछले साल आतंकवादियों द्वारा किए गए एक बम विस्फोट में अनायास ही वह मारा गया था. लालाजी इस घटना से टूट से गए थे. लेकिन वे अपने गम को सीने में कहीं गहरे दफन कर मामाजी से यह कहने आए थे कि कहीं लायक लड़का देखें, जिस से वे अपनी विधवा बहू की शादी कर सकें.

मामाजी बता रहे थे कि लालाजी की बहू किसी भी हाल में शादी को तैयार नहीं थी, लेकिन लालाजी का कहना था कि लायक लड़का मिल जाए तो वे बहू को मना लेंगे.

‘‘मैं तो कहूंगा कि राजेश, तुम्हीं ममता से विवाह कर लो’’, मामाजी ने मेरे सामने प्रस्ताव रखा.

मैं चौंक पड़ा, ‘‘नहीं मामा, आप तो जानते ही हैं…’’

‘‘मैं जानता हूं कि तुम सुरुचि के अलावा किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकते. तुम्हारी ही तरह ममता भी गोपाल की जगह किसी को अपनी जिंदगी में नहीं लाना चाहती. लेकिन मैं लालाजी की ही बात दोहराऊं तो जैसेजैसे तुम्हारी उम्र बढ़ेगी, तुम अकेले पड़ते जाओगे. फिर विपुल भी एक दिन अपना घर बसा लेगा. राजेश, तुम खुद को धोखा दे रहे हो.’’

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मैं चुप रहा. मैं जानता था कि हमारे प्यार को मामाजी भी महसूस करते थे. मामा यों तो मुझ से 12 साल बड़े थे, लेकिन हमारे बीच दोस्तों जैसा ही संबंध था. सुरुचि के जाने के बाद विपुल को मामाजी ने ही पाला था.

‘‘अगर मुझे ठीक न लगता तो मैं कभी न कहता, क्योंकि मैं ममता को भी जानता हूं और तुम को भी. तुम दोनों एकदूसरे का घाव भर सकोगे. साथ ही विपुल और नेहा को भी मांबाप का प्यार मिल सकेगा.’’

आज से पहले मामाजी ने कभी ऐसा प्रस्ताव नहीं रखा था. मेरे कई रिश्तेदार मेरी दोबारा शादी की असफल कोशिश कर नाराज हो चुके थे. लेकिन मामाजी ने कभी ऐसा जिक्र नहीं किया था. बल्कि मेरे साथ उन्हें भी बदनामी झेलनी पड़ रही थी कि वे मेरा अहित चाहते हैं. लेकिन मामाजी मेरे साथ बने रहे थे. आज मामाजी ने मुझे असमंजस में डाल दिया था. मैं ने इनकार तो किया, लेकिन लालाजी के व्यक्तित्व के प्रभाव से दबादबा सा महसूस कर रहा था.

आखिरकार, मामाजी ने मुझे तैयार कर ही लिया. फिर उन्होंने लालाजी से बात की. लालाजी ने मेरे बारे में पूरी जानकारी लेने के बाद अपनी सहमति दी. इस के बाद मामाजी और लालाजी ने बैठ कर एक योजना बनाई, क्योंकि ममता शादी के लिए तैयार नहीं थी, इसलिए योजना यह थी कि मैं लालाजी के घर में आनाजाना बढ़ाऊं और धीरेधीरे ममता का दिल जीतूं. हालांकि मुझे यह सब पसंद नहीं था, लेकिन मैं इन दोनों को मना न कर सका.

योजनानुसार अगले रविवार को मैं लखनऊ लालाजी की कोठी पर पहुंच गया. पहले से योजना थी, इसलिए लालाजी नदारद थे. नौकरानी ने मुझे एक बड़े से ड्राइंगरूम में बैठा दिया. मैं नर्वस हो रहा था. मेरे मन में एक अजीब सी कचोट थी. ऐसा लग रहा था जैसे मैं कोई बुरा काम करने जा रहा हूं. शर्म, खीझ, लाचारी और अनिच्छा की अजीब सी उथलपुथल मेरे मन को झकझोर रही थी.

‘‘नमस्कार,’’ मेरे कानों में एक मधुर स्त्रीस्वर पड़ा तो मैं ने सिर उठा कर देखा.

मेरे सामने एक 25-26 साल की सुंदर युवती खड़ी थी. उस के चेहरे पर वीरानी छाई हुई थी, लेकिन फिर भी एक सुंदरता थी. उस ने बहुत साधारण फीके से रंग की साड़ी पहनी हुई थी, लेकिन वह भी उस पर भली लग रही थी. मैं समझ गया कि यही ममता है.

मैं उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़ कर नमस्कार किया.

‘‘बैठिए’’, वह बोली, ‘‘मैं लालाजी की बहू हूं. वे तो अभी घर में नहीं हैं.’’

‘‘उन्होंने मुझे मिलने को कहा था. अगर आप को एतराज न हो तो मैं इंतजार कर लूं.’’

एक पल को ममता के चेहरे पर असमंजस का भाव झलका, लेकिन दूसरे ही क्षण वह सामान्य हो गई.

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‘‘आप का परिचय?’’

‘‘क्षमा कीजिएगा, मेरा नाम राजेश

है. मैं कानपुर में सैंडोज का एरिया

मैनेजर हूं.’’

‘‘लालाजी ने कभी आप का जिक्र नहीं किया.’’

‘‘दरअसल, लालाजी मेरे मामा के दोस्त हैं. उन का नाम राजेंद्र लाल है. शायद उन्हें आप जानती हों.’’

‘‘चाचाजी को अच्छी तरह जानती हूं’’, ममता एक क्षण को चुप हुई, फिर बोली, ‘‘आप विपुल के पिता तो नहीं?’’

‘‘जी…जी हां.’’

‘‘चाचाजी आप की बहुत तारीफ करते हैं.’’

‘‘वे मुझे बहुत प्यार करते हैं.’’

तभी एक सांवली सी लड़की एक ट्रे में कुछ मिठाई व पानी का गिलास और जग ले कर आई. ममता  ने मिठाई की प्लेट मेरी ओर बढ़ा दी. मैं ने चुपचाप एक टुकड़ा ले कर मुंह में डाल लिया.’’

‘‘और लीजिए.’’

‘‘बस’’, कह कर मैं ने पानी का गिलास उठा कर पानी पिया और गिलास मेज पर रख दिया.

‘‘कम्मो, चाय बना ले.’’

‘‘जी, बहूजी.’’

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मैं चाह कर भी चाय के लिए मना न कर सका. हमारे बीच चुप्पी बनी रही.

‘‘मैं आप को डिस्टर्ब नहीं करना चाहता. आप अपना काम करें. मैं अकेले ही इंतजार कर लूंगा,’’ मैं ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा.

‘‘मुझे ऐसा कोई खास काम नहीं करना है,’’ ममता सहजता से बोली.

मैं चुप हो गया. मुझे अचानक ममता के साथ धोखा करने का गहरा अफसोस हुआ.

‘‘मैं आप के साथ हुए हादसे से वाकिफ हूं. आप तो जानती हैं कि मैं भी कमोबेश ऐसी ही परिस्थिति का शिकार हूं. यद्यपि यह मेरा बेवजह दखल ही है, इसलिए मैं कहूंगा कि आप का इतना अधिक दुख में डूबे रहना कि दुख आप के चेहरे पर झलकने लगे, आप के और आप की बेटी दोनों के लिए अच्छा नहीं है,’’ मैं ने बातचीत शुरू कर दी.

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