सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर के चंगुल में इंडियन पौलिटिक्स

सबकुछ सोशल मीडिया हो चला है, राजनीति के धुरंधर नेता भी रील और शौर्ट वीडियोज बना रहे हैं. नेताओं की चलते हुए स्लो मोशन क्लिप वायरल हो रही हैं. हों भी क्यों न, रील वीडियोज में स्लो मोशन का गजब का खेल जो है. नेतामहानेता होने जैसा फील ले पा रहा है, जैसे ‘जवान’ फिल्म का शाहरुख खान 7 बार जनता का मसीहा बनने के लिए परदे पर स्लो मोशन एंट्री लेता है.

नेता समझ गए हैं, उन के लंबे उबाऊ भाषण युवा नहीं सुनना चाहते. अब तो महामानवों के भाषण भी झूठे, नीरस और बोझिल लग रहे हैं. सोसाइटी, इकौनोमी के लिए क्या अच्छा है, किस पार्टी के क्या मुद्दे हैं, युवा इस में इंट्रैस्टेड नहीं हैं. उन्हें20-25 सैकेंड का मजा चाहिए. वह तो नेताओं की वीडियो भी शोर्ट क्लिप में देख रहे हैं, उसी से अपनी समझ बना रहे हैं. वे 20-25 सैकंड लायक ही बच गए हैं, अपनी पर्सनल लाइफ में इस से आगे का वे न तो सोच पा रहे हैं न किसी चीज का मजा ले पा रहे हैं.

राजनीति में चुनाव के समय जनता ही सर्वोपरि है, लेकिन जनता तो रील्स में डूबी है. सुबह उठने के साथ रील, संडास जाते रील, दातून करते रील, खाना बनाते रील्स, खाना खाते रील, रील बनाते रील्स, काम करते रील, यहां तक कि सोने से पहले रील ही रील. अगर तर्जनी उंगली और अंगूठे की जांच की जाए तो हाथों की आधी रेखाएं मिटी दिखेंगी. अब जाहिर है युवा रील पर हैं तो नेता क्यों न हों? जहां जनता वहां नेता.

अब यही देख लो, राहुल गांधी शौर्ट वीडियो और स्लो मोशन क्लिप्स से सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे तो जमीनी नेता कहे जाने वाले यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करने की अपील करने लगे और फिर हरियाणा के इंफ्लुएंसर अंकित बेथनपुरिया के साथ स्वच्छता दिवस के मौके पर कौलेब करते दिखाई दिए.

तालमेल वाले इंफ्लुएंसर

राजनीति में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की मांग बढ़ने लगी है. कुछ दिन पहले गुरुग्राम में बिग बौस विनर रहे और खुद को कट्टर हिंदू बताने वाले एलविश यादव को मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने खुद आ कर स्टेज पर बधाई दी, स्पैशल प्रोग्राम रखा गया और उन्हें युवाओं का आइकन बताया गया.

इस से किसी और को रश्क हुआ हो या न हुआ हो, हरियाणा के उन मैडलधारी रेसलर्स को जरूर हुआ होगा जो महीनों जंतरमंतर पर धरना देते बैठे रहे. वे यही सोच रहे होंगे कि देश के लिए मैडल जीतने से अच्छा शौर्ट रील बना ली होती, लटके?ाटके दिखा दिए होते तो कोई उन की सुनने वाला भी होता.

जिस एल्विश यादव, फायर ब्रैंड हिंदू इंफ्लूएंसर को भाजपा व उस के नेता सरआंखों पर बैठा कर रखते हैं, उस पर रेव पार्टी करने व उन पार्टियों में विदेशी लड़कियों के साथ सांपों की तस्करी करने का आरोप लगा है. यूपी पुलिस ने उस के 6 साथियों को गिरफ्तार किया है.

सोचने वाली बात है कि यह ऐसा अपराध है, जिस में यदि कोई अपराधी साबित होता है तो 7 साल की सजा व भारी जुर्माना तय है.

ऐसे सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर का नाम कभी भोगी तो कभी खट्टर जपते रहते हैं और राजनीतिक राह देते हैं.

आजकल राजनीतिक पार्टियां पेड प्रमोशनल वीडियो बनवा रही हैं. उन के पीआर यूट्यूब इन्फ्लुएंसर को पकड़ रहे हैं. दोनों कोलेबोरेशन कर रहे हैं, पोडकास्ट हो रहे हैं, घंटेडेढ़घंटे इंटरव्यू हो रहे हैं. लंबी इंटरव्यू वीडियोज में आधे से ज्यादा इज्जत खातिरदारी वाले सवाल किए जा रहे हैं, इमेज बिल्ंिडग की जा रही है, हां,20-30 सैकंड का तड़कताभड़कता सवाल बीच में किया जा रहा है, जिसे शौर्ट बना कर सोशल मीडिया पर ठेला जा रहा है.

बीर बायसैप्स के नाम से मशहूर इंफ्लुएंसर रनवीर अलाहबादिया और राज शमामी ऐसे पौलिटिकल इंटरव्यू करते नजर आ रहे हैं, जहां वाहवाही के अलावा और कुछ नहीं है.

युवाओं को साधने की कोशिश

चीजें बदल गई हैं. बौलीवुड सितारों से ले कर राजनीतिक सितारों तक, सभी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के दरबार में हाजिरी लगा रहे हैं. किसी को अपनी पिक्चर हिट करानी है तो किसी को अपना शो. किसी को अपना राजनीतिक कैरियर बनाना है तो किसी को बचाना है.

एक समय पार्टी और नेता यही काम बौलीवुड के सितारों से लेते रहे. अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, गोविंदा, हेमा मालिनी, राज बब्बर, सनी देओल, परेश रावल ये सब राजनीति में हैं या आए गए. फेहरिस्त लंबी है. रीजनल कलाकारों को भी इस्तेमाल किया जाता रहा, रवि किशन, मनोज तिवारी, निरहुआ, संजय यादव जैसे तमाम नाम सामने हैं.

भले ये सितारे कभी अपने लोकसभाई क्षेत्र नहीं गए, अधिकतर समय अपने एक्ंिटग प्रोफैशन से जुड़े रहे, जिन मुद्दों से सरोकार नहीं रहा, पब्लिक ने भले ही इन के पोस्टर ‘फलां नेता गायब है’ इलाके में चिपका दिए हों, लेकिन चुनाव के समय बस मंच पर डांस कर कमर मटका दी तो जनता ने भी इन की गलतियों को दूधभात समझ माफ करने में भी देर नहीं लगाई.

लेकिन वह दिन अब दूर नहीं जब इन्फ्लुएंसर को लोकसभा और विधानसभा की सीटें पकड़ाई जाएंगी. विधायिका में वैसे भी 33 प्रतिशत वीमेन रिजर्वेशन पास करवा दिया गया है. बेशक कुछ ममता, मायावती जयललिता, शीला जैसी निकलेंगी पर अधिकतर मर्द नेताओं की बहु, पत्नियों, बेटियों, देवरानियां ही होंगी. इस के बाद बची सीटें इन्फ्लुएंसर उड़ा ले जाएं तो हैरानी नहीं होनी चाहिए. सोशल मीडिया पर वैसे भी रील बालाओं का जलवा है.

पार्टियों के लिए अच्छी बात कि यहां अलगअलग जातियों और धर्मों की रील बालाएं हैं. यहां मैडम भी हैं तो नौकरानी भी. दोनों ही अपनेअपने जोन में फेमस हैं. यानी सारा मसला सोर्टआउट है. राजनीतिक पार्टियों के लिए ज्यादा मुश्किल नहीं होने वाली. करना क्या है, बस फौलोअर्स ही तो देखने हैं, अपनी पार्टी हित देखते कैंडिडेट चुनने हैं. जो जितना पौपुलर, जिस के लचक में जितना दम, उस के उतने चांस.

कारण भी है इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर बिग बौस विजेता के लिए वोट मांगे जा रहे हैं और इन वीडियोज को देख कर खलिहर लाखों युवा में वोट डाल रहे हैं, अपने कैंडिडेट को जिताने के लिए सड़कों के ट्रैफिक जाम कर रहे हैं, जैसे किसी बाहुबली नेता के लिए गुर्गे निकल पड़ते हैं, घर से पिता की जेब से चुराए पैसों से गाडि़यों में पैट्रोल भर कर सड़कों पर हुडदंग कर रहे हैं और टीवी पर आ कर पागलों की तरह चिल्ला रहे हैं तो ऐसे ही इंस्टाग्राम पर रील्स देख कर ये अपने कैंडिडेट भी चुन ही लेंगे. लगता है भारत का भविष्य इन्हीं के भरोसे हो चला है.

राजनीति भी व्यवसाय

विरासत की राजनीति भारतीय जनता पार्टी का एक लुभावना नारा है जिस में कम पढ़ेलिखों को तो छोडि़ए, अच्छे पढ़ेलिखे भी फंस जाते हैं. राजाओं के जमाने में राजा का बेटा ही राजा बने का सिद्धांत था. लोकतंत्र में यह गलत है पर जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी की राजनीति को विरासत की राजनीति ठहराने के साथ इसे लोकतंत्र पर धब्बा बता कर वोट बटोरे जा रहे हैं.

अगर भारतीय जनता पार्टी की रगों में कहीं भी लोकतंत्र के प्रति आस्था होती तो इस आरोप में दम होता. भारतीय जनता पार्टी ने अपनी राजनीति न लोकतंत्र की भावनाओं पर खड़ी की है, न बराबरी के सिद्धांत पर और न ही स्वतंत्र विचारों की रक्षा पर. उस ने अपनी राजनीति पूरी तरह राममंदिर के नाम पर खड़ी की है. राम जन्म स्थल का नाम ले कर एक आंधी उड़ाई है जिस में जनता को पूरी तरह से सफलता से बहकाया गया है.

अगर राम जन्म स्थल ही भाजपा का मुख्य उद्देश्य व लक्ष्य है तो भाजपा कैसे विरासत की राजनीति के विरोध की बात कह सकती है? राम का जन्म अगर अयोध्या के बड़े राजा दशरथ के महल में हुआ था और राजा दशरथ के पुत्र होने के बाद उन्हें राजसिंहासन मिलना तय था तो इसे लोकतंत्र के लिए कैसे आदर्श कहा जा सकता है? जब राजमहल की राजनीति (आश्चर्य है कि सतयुग में इस तरह की राजनीति थी) के कारण राम को गद्दी पर अधिकार छोड़ना पड़ा तो वह छोटे भाई भरत को मिला, किसी अन्य जनता के चुने प्रतिनिधि को नहीं.

ठीक है, उस काल में संविधान जैसी कोईर् चीज नहीं थी, वोटिंग नाम की बात नहीं थी, लेकिन बात आज की हो रही है कि उसी जबान से विरासत को कोसा जाता है और फिर राज्य के वारिस दशरथ पुत्र राम का गुणगान ही नहीं किया जाता, बल्कि उन के लिए मरनामारना भी ठीक माना जाता है. अयोध्या के मंदिर के नाम पर तो हजारों जानें गईं, अब हर साल रामनवमी पर कुछ जानें चली जाती हैं, क्यों, एक वारिस की महत्ता को आज भी कायम रखने के लिए?

कांग्रेस की यह बड़ी गलती है कि उस ने किसी और नेता को पनपने नहीं दिया. मोरारजी देसाई, कामराज, नारायण दत्त तिवारी, शरद पवार, ममता बनर्जी, जगन रेड्डी आदि सैकड़ों उभरते नेताओं को अपनी पार्टियां बनानी पड़ीं जिन में से कुछ तो नष्ट हो गईं, कुछ भारतीय जनता पार्टी में चली गईं तो कुछ बाहर रह कर गुलाम नबी आजाद की तरह कांग्रेस की जड़ों में तेजाब डालती रहती हैं.

विरासत की राजनीति को चुनावी हथकंडा बनाना भारतीय जनता पार्टी के लिए दोमुखी बात करना है. यह बात कांग्रेस छोड़े नेता कह सकते हैं लेकिन राम और कृष्ण के भक्त नहीं कह सकते क्योंकि इन के भगवानों को नाम का स्तर पारिवारिक विरासत के विवाद के कारण मिला. कृष्ण भी विरासत में मिले. राज के बंटवारे में मुख्य पात्र थे वे.

राजनीति में विरासत की कोई जगह नहीं है पर यह सही है कि राजनीति जिन घरों में रोज चर्चा का हिस्सा होती है वहां के बच्चे स्वाभाविक तौर पर इस में कूद पड़ते हैं. हर देश में यह हो रहा है. राजनीति भी दूसरे व्यवसायों की तरह है जिस में बचपन की ट्रेनिंग बहुत काम आती है.

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार “अभिनेता” और राजनीति

यह शायद अब होने लगा है की राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में भी राजनीति की चौपड़ बिछाई जा रही है. अगरचे आप अजय देवगन को, जिन्हें सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया है के सम्मान को महाराष्ट्र की सत्ता, राजनीति को जोड़ कर देखेंगे तो आपके सामने सब कुछ दूध का दूध और पानी का पानी , साफ साफ होगा.

महाराष्ट्र की राजनीति और षड्यंत्र अभी अभी देश ने देखा है कि किस तरह वहां भाजपा के इशारे पर शिवसेना के एक प्यादे एकनाथ शिंदे ने शिवसेना को तोड़ा है और मुख्यमंत्री बन गए हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि एकनाथ शिंदे जिनके पास न तो शिवसेना पार्टी है और ना ही शिवसेना आलाकमान का आशीर्वाद या सभी विधायकों का समर्थन इसके बावजूद भाजपा की अनैतिक राजनीति और सत्ता की धमक के कारण एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री पद पर विराजमान हो गए हैं.

अब हम बात करें महाराष्ट्र की राजनीति एकनाथ शिंदे अजय देवगन की बीच के तारों की तो यह आपको समझना होगा कि जो कुछ महाराष्ट्र में भाजपा के शीर्ष नेताओं ने खेल खेला है उसमें मराठा, हिंदुत्व और महाराष्ट्र अस्मिता का घोल है, यहां भविष्य की राजनीति के साथ वोट बैंक जुड़ा हुआ है. अजय देवगन की फिल्म जनवरी 2020 में आई उनकी यह सौवीं फिल्म थी जो हिंदू मराठा भावना को जागृत करती है. और भाजपा को यही चाहिए. जहां हिंदुत्व है वहां भाजपा की सील तैयार है. अजय देवगन की यह फिल्म तानाजी मराठा पराक्रम को रेखांकित करती है.

अभिनय की दृष्टि से और बाजार की दृष्टि से यह फिल्म अपना कोई मुकाम हासिल नहीं कर पाई थी फिल्म समीक्षकों ने भी तानाजी को कोई विशेष तवज्जो नहीं दी इसके बावजूद राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जब घोषित होते हैं तो अजय देवगन को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता घोषित किया जाता है. इसकी बिसात शायद पहले ही बिछ चुकी थी यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने फिल्म को टैक्स फ्री कर दिया था. भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने फिल्म की प्रदर्शन के समय ही भूरी भूरी प्रशंसा कर दी थी. बाद में यह महाराष्ट्र में टैक्स फ्री हुई और लगभग 150 करोड़ की लागत से बनी इस फिल्म ने सिर्फ 400 करोड़ की कमाई की है.

यहां यह देखना समीचीन होगा कि अजय देवगन सर्वश्रेष्ठ अभिनेता घोषित हुए हैं, यह फिल्म सर्वश्रेष्ठ नहीं है! बल्कि सूर्या को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार दिया गया है. इस सब को अगर आप देखें तो फिल्म पुरस्कारों में राजनीति का जो खेल खेला गया है वह आपके सामने होगा.

यह फिल्म बाक्स आफिस पर सामान्य रही. केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने सभी विजेताओं को बधाई दी.और उन्होंने कड़ी मेहनत और पारदर्शिता के लिए निर्णायक मंडल की भी प्रशंसा की. मंत्री जी का इस अनावश्यक बात को कहना चर्चा का विषय बन गया कि आखिर मंत्री जी ने ऐसा क्यों कहा है क्या पहले निष्पक्ष और पारदर्शी रूप से सम्मान फिल्म और कलाकारों को नहीं मिलते थे?
आपने अगर अभिनेता सूर्या की ‘सोरारई पोटरु’नहीं देखी है तो एक बार अवश्य देखें और तुलना करें अजय देवगन और सूर्या में. आपके सामने दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा. फिल्म एअर डेक्कन के संस्थापक कैप्टन जी आर गोपीनाथ के जीवन से प्रेरित है. इसी फिल्म के लिए अपर्णा बालामुरली ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीता. सूर्या की फिल्म ‘सोरारई पोटरु’ साल 2020 में आई थी.

जहां तक बात अजय देवगन की फिल्म का सवाल है तो अजय देवगन ने‌ मराठा साम्राज्य को फिर से हासिल करने के लिए क्रूर मुगल सरदार उदयभान सिंह राठौर के खिलाफ लड़ी गई लड़ाई को जीवंत किया था.

कब जागरूक होगी जनता

महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन जिस में शिव सेना के महाअगाड़ी विकास गठबंधन के उद्धव ठाकरे को डिफैक्शनों के जरिए जटा दिया गया और अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का फैसला कि उन के संविधान में औरतों का कोई गर्भपात का संवैधानिक अधिकार नहीं है, आम भारतीय घरों पर क्या कोई असर डालता है.

ये मामले कानूनी, राजनीतिक या पार्टीबाजी के हैं और एक आम घर, घरवाली, उस के बच्चों, रिश्तेदारों को इन 2 घटनाओं के बारे में ङ्क्षचता तो दूर इन के बारे मं जानने या सोचने की भी जरूरत नहीं है. काश यह सही होता. इन दोनों मामलों का भारत के भी हर घर पर असर पड़ेगा, अमेरिका के हर घर पर भी.

महाराष्ट्र का सत्ता परिवर्तन एक बार फिर याद दिलाता है कि आप किसी पर भी भरोसा नहीं कर सकते. वह यह भी साफ करता है कि जो अपने नेता, मालिक, मुखिया की पीठ में छुरा भौंकता है जरूरी नहीं अपराधी हो, वह महान हो सकता है, सुग्रीव की तरह भाई बाली को दगा देने वाला या विभीषण की तरह रावण से बेइमानी करने वाला. इस सत्ता बदलाव पर बहुत से चैनलों ने तालियां बजाईं, बहुत से नेताओं ने बधाई दी, जिस ने अपने नेता उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत की उसे लड्डू खिलाए.

अगर बगावत सही है. अपने नेता के खिलाफ साजिश करना ठीक है तो माझी का ननद के खिलाफ साजिश करने मंं क्या हर्ज है, छोटे भाई का बड़े भाई को धोखा देकर पिता की सारी संपत्ति हड़प लेने में क्या बुराई है, युवा पत्नी को प्रैफ्रेंस देकर मांबाप को घर से निकाल देने में क्या गलत है. जब नेता किसी को धोखा दे सकते हैं भाई, बहन, रिश्तेदार, बेटे, बेटी क्यों नहीं दे सकते. उद्देश्य तो अपना फायदा ढूंढऩा है जो एकनाथ ङ्क्षशदे को मिल गया जो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन गए.

यथा राजा तथा प्रजा पुरानी फिसलती है. जो हमारे महान नेताओं ने कर्नाटक, मध्य प्रदेश, गोवा, अरुणाचल प्रदेश में किया तो हम अपने घरों में क्यों नहीं कर सकते. राजाओं के पदचिह्नïों पर ही तो प्रजा चलेगी.

ऐसा ही अमेरिका में किया गया है. एक औरत के वहा गया है कि उस का अपने बदन पर कोई अधिकार नहीं क्योंकि संविधान में, जो तब लिखा गया जब गर्भपात की तकनीक नहीं थी, नया है तो गलत ही होगा. कल को औरतों को पीटना भी अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट सही ठहरा सकती है क्योंकि धर्म कहता है कि पतिपत्नी को पीट सकता है और संविधान में पत्नी को स्पष्ट नहीं दिया गया कि नहीं पीट सकते. सुप्रीम कोर्ट कह सकती है  कि बाइबल के हिसाब से चलो तो जो फादर ने कहा वही अकेला सच है और चर्च का फादर पिटने वाली को यही कहता है कि पीटने वालों को ईश्वर दंड देगा, तुम भुगतते रहो. सुप्रीम कोर्ट यह भी कह सकता है कि अमेरिकी संविधान में रेप के खिलाफ कुछ नहीं है और इसलिए रेप भी हो सकते हैं.

इस तरह की बेतुकी बातें अदालतें नहीं करतीं, ऐसा नहीं है. अदालतों के निर्णय बेतुकी बातों से भरे पड़े हैं. राम मंदिर पर हमारी सुप्रीम कोर्ट अपने आदेश में साफ  कहती है कि अयोध्या की मसजिद गिराना गैरकानूनी है पर साथ ही कहती है कि यह जमीन हिंदू मंदिर के लिए दे दी जाएं.

दुनिया भर की अदालतें एकदूसरे के फैसलों को पढ़तीसमझती रहती और कल को भारत में जो गर्भपात की आधीअधूरी छूट मिली हुई है, छिन जाए तो बड़ी बात नहीं आजादी के 30 सालों तक भारत में भी गर्भपात गैरकानूनी ही था. भारतीय अदालतें ने कभी उसे संवैधानिक हक नहीं माना था. कोर्ई सिरफिरा अब बने कानूनों को गलत कहता हुआ अदालत चला जाए तो आज के जज क्या कहेेंगे पता नहीं. वे भी अमेरिकी उदाहरण को फौलों कर सकते हैं.

जनता अगर खुद जागरूक न हो तो इस तरह की उठापटक कब उस पर हावी हो जाए कहां नहीं जा सकता.

कृषि कानूनों की तरह न हो जाएं अग्निवीर

अग्निपथ स्कीम की चर्चा के दौरान भारतीय सेनाओं के अफसरों की चर्चा न के बराबर हो रही है. जहां लाखों युवा आम्र्ड फोसर्स में नौकरी पाने के अवसर खोने पर पूरे देश में ट्रेनें, बसें, भाजपा कार्यालय, सरकारी संपत्ति जला रहे हैं, करीब 1 लाख अफसरों वाली सेना योग्य व कर्मठ अफसरों की कमी से जूझ रही है.

छठे व 7वें सैंट्रल पे कमीशन में अफसरों के वेतन काफी बढ़ गए हैं और बहुत ही सुविधाएं भी आम्र्स फोर्र्सेस के अफसरों की मिल जाती है जो वेतन में नहीं गिनी जातीं, अफसरों में कमी सरकार के लिए एक चिंता बनी है.

अफसरों को लगता है कि वे जो जोखिम लेते हैं, जिस तरह उन के बच्चों को तबदिलों की वजह से भटकना पड़ता है, सेना को औफिस लाइफ क्लालिटी युवा सेवा में नौकरी पाने को बेचैन नहीं दिखते. जहां आम रोजमर्रा के लिए लाखों युवा कस कर मेहनत करते दिखते हैं, पढ़ेलिखे परिवारों के बच्चे आईआईटी, नीट, क्लैट, एमबीए आदि की तैयारी में लगे रहते हैं. भारतीय जनता पार्टी अपनी सोच पर बहुत गरूर करती है पर उस के नेताओं में अपने बच्चों को सेना में भेजने की रूचि न के बराबर है.

अग्निवीर योजना का एक लाभ जरूर है कि जो युवा 21 से 25 साल तक रिटायर होंगे उन की शादी हुई ही नहीं होगी और सैनिक विडोज तो कम दिखेंगे. जो सेना में रह जाएंगे उन की औरतें विधवा होने का पूरा रिस्क लेती है क्योंकि सेना जिंदगी भर की पेंशन देने का वादा करती हैं.

अफसरों के लिए आज भारी क्वालिकेशन की जरूरत है क्योंकि सेना भी अब आधुनिक होती जा रही है और जो समान विदेशों से खरीदा जहा रहा है, चाहे हवाई जहाज हो, सब मेरीम हो, टैंक हों, उन में कंप्यूटरों की जरूरत होती है. आज की लड़ाई में चाहे अफसर पीछे रहें, जोखिम बराबर का बना रहता है और पढ़ेलिखे कमीशंड औफिसर बच्चे की कोई रूचि नहीं दिखा रहे.

भारत का लैंड बौर्डर 15,000 किलोमीटर कम है और 7,500 किलोमीटर सी बौर्डर है और हर जगह फैसले लेने के लिए अफसर स्पौट पर चाहिए होते है पर सरकार की सुविधाओं की घोषणाओं, बड़ेबड़े विज्ञापनों के बावजूद ‘देशभक्त’ युवा इस नौकरी में ज्यादा आगे नहीं आ रहे. अफसरों में दलित व मुसलिम न के बराबर लिए जाते हैं और ये वर्ग पढ़लिख कर भी कोई रूचि नहीं दिखाते क्योंकि समाज की छूआछूत की भावना को आर्मी की खास ट्रेनिंग भी पूरी तरह गला नहीं पाती. अच्छे घरों के मांबाप अपने इललौते से बच्चों को इस जोखिम की नौकरी में भेजना ही नहीं चाहते. यह स्थिति अग्निवीरों से बिलकुल उलट है जहां लाखों सैनिक बच्चे के लिए टैस्ट की तैयारी में खुद को महिनों तक बुरी तरह थका रहे हैं. ऐसा अफसर बनने में न के बराबर हो रहा है. देश के अखबारों में सैनिक अफसर बनने की परिक्षाओं की कोिचग के विज्ञापन लगभग नहीं दिखते क्योंकि इस में बहुत कम का इंट्रस्ट है.

शौर्ट सर्विस कमीशन के अफसर आर्मी की ट्रेनिंग के बाद अक्सर रिटायर हो कर निजी सैक्टर में नौकरी पाने का मौका ढूंढऩे लगते हैं क्योंकि अब वे शहरों की जिंदगी का मजा लेना चाहते हैं और रेगिस्तान, पहाड़ी, दुर्गम या कोस्टल विरान इलाकों में खुश नहीं रहते. निजी सैक्टर बिना जोखिम वाली अच्छी नौकरियां शौर्ट सॢवस कमीशंड अफसरों को देना हैं और रिटायरमैंट लेना अक्लमंदी लगती है जबकि अग्निवीरों के लिए उल्टी रिटायरमैंट एक सूसाइड की तरह है.

ये भी पढ़ें- कथाओं और मान्यताओं पर प्रहार

कथनी को मानें या करनी को

भारतीय जनता पार्टी आजकल जोरशोर से परिवारवादी पािटयों पर मोर्चा खोले हुए हैं. जहां उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के कई राज्यों में भाजपा का असर बना हुआ है, कई राज्यों में दूसरी तीसरी पीढ़ी के नेता जो पािटयां चला रहे हैं वे भाजपा की आंखों में किरकिरी बने हुए हैं.

भारतीय जनता पार्टी परिवार के विरुद्ध है या परिवारवादी पार्टियों के, पता नहीं चलता. अगर राजनीति में परिवार के लोगों का दखल खराब है. जनहित में नहीं तो फिर उद्योगों, व्यापारों में भी नहीं होगा. अगर परिवार का सदस्य होना किसी तरह की डिस्क्वालिफिकेशन है तो यह दूसरी पीढ़ी के टीचर, वकील, जज, आॢटस्ट, फिल्म स्टार, वक्ता, लेखक, संपादक प्रकाशक, महंताई, वैधवी, अफसरी सब पर लागू होना चाहिए.

यह भी समय नहीं आ रहा कि यदि पारिवार  का नाम लेना गलत है तो रामायण में दशरथ के पुत्रों को क्यों राज मिला, महाभारत में कुरूवंश क्यों कई पीढिय़ों से राज करता दिखाया गया था और क्यों भारतीय जनता पार्टी समर्थक उन्हीं को आदर्श क्यों मानती है?

भाजपा में कई पीढिय़ों के नेता हैं. यह भी सब को मालूम है. अब संशय है कि हम भाजपा के नेताओं की कथनी को मानें या करनी को. उन के भाषण सुनें या पुराणों की कहानियां, संयुक्त परिवार की महत्ता पर दादानाना का प्रवचन सुनें या राजनीति की बयानबाजी.

अगर राजनीति की तरह घरों में भी परिवारवाद न हो तो नई बहूओं को तो मजा ही आ जाएगा. इस का अर्थ होगा कि न सास की सेवा करना जरूरी है न ससुर की जी हजूरी. अगर हो सके तो अलग गृहस्थी बनाओ, अपने सुखदुख में रहो और भाजपा के मार्गदर्शकों को आदर्श मान कर परिवार को भूल जाओ क्योंकि उन के अनुसार तो परिवारवाद कोई कोरोना है जो देश के तंत्र को खा रहा है. भाईबहन को कहीं साथ काम नहीं करना चाहिए, यह मंचों पर खड़े हो कर जो कह रहे हैं वे उन बहनों को भरोसा दिला रहे हैं कि भाई से अपने हकों के लिए लड़ों, सरकार आप के साथ है.

इस ज्ञान के लिए धन्यवाद.

ये भी पढ़ें- जाति और धर्म

महिला नेता: नाम बड़े और दर्शन छोटे

राजस्थान की सत्ता वसुंधरा राजे के हाथों से फिसल चुकी है और इसलिए फिलहाल सिर्फ पश्चिम बंगाल ऐसा राज्य है जहां एक महिला मुख्यमंत्री हैं और वे हैं ममता बनर्जी. कुछ साल पहले तक यानी 2011 और 2014 में भारत के 4 राज्यों की जिम्मेदारी महिला मुख्यमंत्रियों के हाथों में थी.

जम्मूकश्मीर में महबूबा मुफ्ती, गुजरात में आनंदीबेन पटेल, राजस्थान में वसुंधरा राजे और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी. इस से पहले तमिलनाडु में जयललिता भी थीं. आजादी के बाद से अब तक भारत में कुल 16 महिला मुख्यमंत्री हुई हैं जिन में उमा भारती, राबड़ी देवी और शीला दीक्षित, मायावती, जैसे नाम शामिल हैं.

भले ही भारत में महिला मुख्यमंत्रियों की संख्या गिनीचुनी हो, मगर हम इस से इनकार नहीं कर सकते कि ममता बनर्जी, जयललिता और मायावती जैसी महिलाएं सब से ताकतवर मुख्यमंत्रियों में से एक रही हैं. इन का कार्यकाल काफी प्रभावी रहा है. फिर चाहे वह तमिलनाडु में जयललिता की जनवादी योजनाएं हों या उत्तर प्रदेश में मायावती का कानूनव्यवस्था को काबू में करना और ममता का हर दिल पर राज करना.

मगर जब बात उन के द्वारा महिलाओं के हित में किए जाने वाले कामों की होती है तो हमें काफी सोचना पड़ता है. दरअसल, इस क्षेत्र में उन्होंने कुछ याद रखने लायक किया ही नहीं. यह बात सिर्फ मुख्यमंत्रियों या प्रधानमंत्री के ओहदे पर पहुंची महिला शख्सियतों की ही नहीं है बल्कि हर उस महिला नेता की है जो सत्ता पर आसीन होने के बावजूद महिला हित की बातें नहीं उठाती.

प्रभावी और बराबरी का हक

एक सामान्य सोच यह है कि यदि महिलाएं शीर्ष पदों पर होंगी तो महिलाओं के हित में फैसले लेंगी. लेकिन ऐसा हो नहीं पाता. इंदिरा गांधी जब देश की प्रधानमंत्री थीं तब कोई क्रांति नहीं आ गई या जिन राज्यों में महिलाएं मुख्यमंत्री थीं वहां महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी हो गई ऐसा भी नहीं है. हम यह भी नहीं कह सकते कि पुरुष राजनेता महिलाओं के हक में फैसले ले ही नहीं सकते. मगर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि महिलाओं से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को महिला नेताओं द्वारा उठाया जाना ज्यादा प्रभावी और बराबरी का हक देने वाला हो सकता है.

महिला और पुरुष जिन समस्याओं का सामना करते हैं, वे बिलकुल अलग होती हैं. हाल ही में लोकसभा में सैरोगेसी बिल पास किया गया. संसद में 90% सांसद पुरुष थे जो चाह कर भी गर्भधारण नहीं कर सकते. फिर भी इन पुरुषों ने यह बिल पास किया. हमारी नीतियां देश की 50% आबादी यानी महिलाओं की जरूरतों से मेल नहीं खातीं. इसलिए हमें ऐसी महिला नेताओं की ज्यादा जरूरत है जो महिलाओं के मुद्दों को उठा सकें.

उदाहारण के लिए राजस्थान में गांवों की महिलाएं पीढि़यों से पानी की कमी का सामना कर रही हैं. लेकिन इन महिलाओं को राहत देने के लिए वहां की सरकार द्वारा कभी कोई महत्त्वपूर्ण कदम नहीं उठाया गया क्योंकि सरकार में कोई महिला मंत्री नहीं है. सच यह है कि महिला मंत्री ही महिलाओं की स्थिति में कुछ बदलाव ला सकती हैं क्योंकि वे औरतों की समस्याओं को सम झ पाती हैं.

गंभीर मुद्दों पर ध्यान नहीं

महिलाओं को लगता कि महिला प्रतिनिधि को इसलिए चुनना चाहिए क्योंकि वह महिला मुद्दों को प्रमुखता देगी या कम भ्रष्ट होगी या ज्यादा नैतिक होगी, मगर ऐसा होता नहीं.

हाल ही में जब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने महिलाओं की रिप्पड जींस को ले कर एक विवादित बयान दिया तो महिला नेताओं ने उन की जम कर क्लास लगाई. सपा सांसद जया बच्चन से ले कर तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा, शिवसेना सांसद प्रियंका चतुर्वेदी, कांग्रेस प्रवक्ता गरिमा दसौनी ने तीरथ सिंह रावत पर निशाना साधा. किसी ने सोच बदलने की नसीहत दी तो किसी ने उन के बयान को अमर्यादित बताया.

मगर सवाल उठता है कि क्या केवल इस तरह के छोटेमोटे मुद्दों पर बयानबाजी कर के ही महिला नेताओं के कर्तव्यों की इतिश्री हो जाती है? क्या महिलाओं से जुड़े गंभीर मुद्दों पर उन्हें ध्यान नहीं देना चाहिए?

महिलाओं में विश्वास पैदा करना जरूरी

महिला नेताओं द्वारा महिला सुरक्षा या सम्मान पर तो काफी बातें की जाती हैं और यह जरूरी भी है लेकिन इस के साथ ही महिलाओं के कई अहम मुद्दे होते हैं जिन्हें अकसर नजरअंदाज कर दिया जाता है. ऐसे में जरूरी है कि उन के अधिकारों की बात को शामिल किया जाए ताकि महिलाओं को लगे कि अब कोई आ गई है जो उन के लिए सोचेगी, उन की तकलीफ महसूस कर सकेगी. इस से वोट देने में भी उन की दिलचस्पी बढ़ेगी. उन्हें इस बात का एहसास होगा कि सरकार बनाने में उन का योगदान भी जरूरी है और वे अपनी पसंद की प्रतियोगी को आगे ला सकती हैं.

क्यों नहीं लेतीं फैसले

दरअसल, जब कोई महिला नेता बनने के मार्ग में आने वाली तमाम अड़चनें पार कर के राजनीति में ऊंचे पद पर पहुंचती है तो उस की प्रतियोगिता उन तमाम पुरुषों से होती है जो पहले से सत्ता में काबिज हैं और हर तरह के हथकंडे अपना कर अपना नाम बनाए रखने में सक्षम हैं. ऐसे में महिला नेताएं भी चुनाव जीतने के लिए वही हथकंडे अपनाने लगती हैं जो पुरुष अपनाते हैं. ऐसे में इस पूरी प्रक्रिया में महिलाओं के मुद्दे कहीं पीछे चले जाते हैं.

असली फर्क तब आएगा जब महिलाओं की संख्या में बड़ा अंतर आए. पुरुष अपनी बात मनवाने में इसलिए कामयाब होते हैं क्योंकि वे राजनीति में बहुसंख्यक और महिलाएं अल्पसंख्यक हैं. जब अधिक महिलाएं सत्ता पर आसीन होंगी तो वे अपने मकसद को सही दिशा दे पाएंगी. उन्हें सत्ता खोने का उतना डर नहीं रह जाएगा.

राजनीति में महिलाएं कम क्यों हैं

स्वतंत्रता आंदोलनों के समय से ले कर आजाद भारत में सरकार चलाने तक में महिलाओं की राजनीतिक भूमिका अहम रही है. इस के बावजूद जब राजनीति में महिला भागीदारी की बात आती है तो आंकड़े बेहद निराशाजनक तसवीर पेश करते हैं. बात ऐक्टिव पालिटिक्स की हो या वोटर्स के रूप में भागीदारी की, दोनों ही स्तर पर महिलाओं की हिस्सेदारी बहुत कम है. वैसे महिला वोटरों की स्थिति पहले से थोड़ी बेहतर हुई है. मगर विश्व स्तर पर भारत की पौलिटिक्स में सक्रिय महिलाओं की दृष्टि से भारत 193 देशों में 141वें स्थान पर ही है.

भारत में आजादी के बाद पहली केंद्र सरकार की 20 कैबिनेट मिनिस्टरी में सिर्फ 1 महिला राजकुमारी अमृत कौर थीं जिन्हें स्वास्थ्य मंत्री का कार्यभार सौंपा गया था. लाल बहादुर शास्त्री की सरकार में एक भी महिला को जगह नहीं दी गई. यहां तक कि इंदिरा गांधी के कैबिनेट में भी एक भी महिला यूनियन मिनिस्टर नहीं थी. राजीव गांधी की कैबिनेट में सिर्फ 1 महिला मोहसिना किदवई को शामिल किया गया. मोदी सरकार में महिलाओं की स्थिति पहले से बेहतर हुई है. लेकिन अभी भी स्थिति को पूरी तरह से बेहतर नहीं माना जा सकता है. महिला वोटरों की बात करें या महिला नेताओं की, कहीं न कहीं अभी भी घर के पुरुष उन के फैसलों को प्रभावित करते हैं.

अगर भारतीय राजनीति में सक्रिय महिलाओं को देखें तो उन में से ज्यादातर सशक्त राजनीतिक परिवारों से आती हैं. फिर चाहे वे इंदिरा गांधी हों या वसुंधरा राजे. ऐसी कई वजहें हैं जो महिलाओं को राजनीति में आने से रोकती हैं. मसलन, इस क्षेत्र में सफल होने के लिए जेब में काफी पैसे होने चाहिए और जरूरत पड़ने पर हिंसा का रास्ता भी इख्तियार करने की हिम्मत होनी चाहिए.

वैसे भी राजनीति एक मुश्किल पेशा है. इस में काफी अनिश्चिंतताएं होती हैं. जब तक आप के पास कमाई का कोई ठोस और अतिरिक्त विकल्प न हो आप सक्रिय राजनीति में ज्यादा समय तक नहीं टिक सकते. अगर हम मायावती और जयललिता का उदाहरण लें तो उन के पास कांशीराम और एमजीआर जैसे राजनीतिक गुरु थे जिन्होंने उन की आगे बढ़ने में मदद की थी.

यही नहीं महिलाओं को राजनीति में ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र में दोहरा काम करना पड़ता है. महिलाओं को पुरुषों के साथ कंपीटिशन के लिए खुद को उन से बेहतर साबित करना पड़ता है.

ऐक्टिव पौलिटिक्स में महिलाओं की स्थिति

वैसे ऐक्टिव पौलिटिक्स में महिलाओं का टिकना भी आसान नहीं होता. उन की बुरी स्थिति के लिए जिम्मेदार सिर्फ राजनीतिक पार्टियों ही नहीं बल्कि हमारा समाज भी है जो महिलाओं को राजनीति में स्वीकारने को तैयार नहीं होता है. महिला नेताओं के प्रति लोगों की सोच आज भी संकीर्ण है. हमारे देश में महिलाएं अपने काम से ज्यादा वेशभूषा और लुक के लिए जानी जाती हैं. पुरुष सहयोगी समयसमय पर टीकाटिप्पणियां करने से बाज नहीं आते. प्रियंका गांधी अगर राजनीति में आती हैं तो उन के कपड़ों से ले कर उन के नैननक्श पर टिप्पणियां की जाती हैं. प्रियंका को ले कर ये बातें भी खूब कही गईं कि खूबसूरत महिला राजनीति में क्या कर पाएगी.

शरद यादव ने वसुंधरा राजे के मोटापे पर कमैंट करते हुए कहा था कि वसुंधरा राजे मोटी हो गई हैं, उन्हें आराम की जरूरत है. इस तरह की टिप्पणियों का क्या औचित्य? इसी तरह ममता बनर्जी, मायावती, सुषमा स्वराज से ले कर तमाम उन महिला राजनीतिज्ञ को इस तरह के कमैंट्स  झेलने पड़ते हैं. उन की किसी भी विफलता पर उन के महिला होने के ऐंगल को सामने ला दिया जाता है जबकि विफलता एक पुरुष राजनीतिज्ञ को भी  झेलनी पड़ती है.

निराधार बातें क्यों

लोगों को लगता है कि महिला कैंडिडेट के जीतने की उम्मीद बहुत कम होती है. उन के मुताबिक महिलाएं अपने घरेलू कामों के बीच राजनीति में एक पुरुष के मुकाबले कम समय दे पाती हैं. लोगों को ऐसा भी लगता है कि महिलाओं को राजनीतिक सम झ कम होती है, इसलिए अगर वे जीत कर भी आती हैं तो महिला विभाग, शिशु विभाग जैसे क्षेत्रों तक सीमित रखा जाता है. मगर हम निर्मला सीतारमण, शीला दीक्षित, ममता बनर्जी जैसी महिला नेताओं की तरफ देखें तो ये बातें निराधार महसूस होंगी.

एक महिला कैंडिडेट को अपने क्षेत्र में

एक पुरुष कैंडिडेट के मुकाबले ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. शायद यही सारी वजहें हैं कि वे अपना वजूद बचाए रखने के लिए महिला मुद्दों

के बजाय दूसरे अधिक प्रचारित मुद्दों पर नजर बनाए रख कर खुद को सुरक्षित रखने का प्रयास करती हैं. महिला नेताओं को वैसे भी अपनी सुरक्षा के मामले में खासतौर पर सतर्क रहना पड़ता है.

चुनाव इतने निरर्थक क्यों हैं

हालांकि 5 विधानसभा चुनावों के बाद सरकारें बन गई है पर क्या इन चुनाव परिणामों के बाद औसत आदमी और विशेषतौर पर औसत औरतों की जिंदगी पर कोई असर पडऩे वाला है. आजकल हर 5 साल में 3 चुनाव होते हैं. केंद्र का, राज्य विधानसभा का, म्यूनिसिप्लैटी का जिला अध्यक्ष का पर हर चुनाव के बाद वादों और नारों के जीवन उसी पुराने ढर्रे पर चलता रहता है.

चुनाव भारत में ही नहीं, लगभग सारी दुनिया में न उत्साह जगाते है, न नई आशा लाते हैं. लगभग सभी देशों में चुनाव अखबारों की सुर्खियों में कुछ माह बने रहते हैं. पर जनता पर कोई असर पडऩा हो, यह नहीं दिखता. शायद ही किसी देश में चुनावों से ऐसी सरकार निकली जिस ने पूरी जनता की कायापलट कर दी हो. भारत में 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी पर 2004 तक लोग खिन्न हो चुके थे कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार आ गई. यानी लोगों को चुनी सरकार का काम पसंद नहीं आया.

2009 में कांग्रेस एक बार फिर आई पर 2014 में उसे रिजैक्ट कर दिया गया. 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार आई और आज भी मजबूती से बैठी है पर फिर क्या? क्या कहीं कुछ ऐसा हो रहा है जो पहले नहीं हुआ. कहीं नई सरकार का असर दिख रहा है?

ये भी पढ़ें- पति-पत्नी और कानून

चुनावों से सरकारें आती जाती रहती हैं या बनी भी रहती हैं पर जनता को कोई लंबाचौड़ा अंतर नहीं दिखता. आखिर क्यों? वह लोकतंत्र किस काम का, वह वोिटग किस काम की, वह हल्लागुल्ला किस काम का जब अंत में वही या उसी तरह के लोग उसी तरह से देश चलाने रहें.

भारत में सब कुछ अच्छा हो रहा है. यह दावा तो बहुत थोड़े से ही कर सकेंगे. चुनाव देश की कार्यप्रणाली को बदलने में पूरी तरह असफल होते जा रहे हैं. घर में एक बच्चा होता है, घर की शक्ल बदल जाती है. शादी हो जाती है, घर व रवैया बदल जाता है. किसी की अकाल मृत्यु होती है, झटका लगता है. कुछ भी पहले की तरह नहीं होता रहता. फिर चुनाव देश की जिंदगी में ऐसा बदलाव क्यों नहीं करते जैसे एक व्यक्ति जिंदगी में बच्चे होना उन की पढ़ाई में सफलता मिलना, नौकरी मिलना, दोस्ती बनने से होती है. चुनाव इतने निरर्थक से क्यों हैं.

लोग लेट देने जा रहे हैं. पिछले चुनावों में 4 विधानसभाओं ने उसी पार्टी को चुना जो पहले थी. तो अब वहां क्या नया होगा? पंजाब में कुछ दिन नई पार्टी का नयापन दिखेगा पर फिर सब कुछ दर्रे पर आ जाएगा. तो क्या चुनाव निरर्थक हो गए हैं?

ये भी पढ़ें- हिजाब घूंघट, धर्म की धौंस

हिजाब घूंघट, धर्म की धौंस

कर्नाटक की बुरका बनाम भगवा की लड़ाई ने देश में सांप्रदायिक बवाल पैदा कर दिया है. वहां कालेज में बुरका पहन कर आने वाली मुसलिम लड़कियां भगवाधारियों के निशाने पर हैं. वे उन का अपमान कर रहे हैं, उन को धर्मसूचक गालियां दे रहे हैं और इस तरह सांप्रदायिक भावना भड़का कर धु्रवीकरण के जरीए एक राजनितिक पार्टी को चुनाव में मदद की कोशिश हो रही है.

ये भगवाधारी कभी लड़कियों के जींसटौप पहनने पर आसमान सिर पर उठा लेते हैं, तो कभी हिजाब पहनने पर. लड़कियां आसान टारगेट हैं. उन पर हमला कर के पूरी कौम को उद्वेलित किया जा सकता है. संदेश दूर तक जाएगा और पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव में भाजपा को इस से कुछ फायदा पहुंचेगा.

धर्म बना राजनीतिक हथियार

हालांकि कर्नाटक सरकार ने वहां स्कूलकालेज बंद कर दिए हैं और यह मामला भी कोर्ट में है कि बुरका पहन कर लड़कियों को स्कूलकालेज में आने दिया जाए या नहीं. मगर बीते 8 सालों में धर्म को जिस तरह राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है उस से बुरका, परदा, घूंघट, धार्मिक प्रोपोगंडा कर्मकांड, व्रतत्योहार की वर्जनाएं जिन से औरतें धीरेधीरे उबर रही थीं, फिर उसी अंधकूप में जा गिरी हैं. कौन नहीं जानता कि धर्म ने सब से ज्यादा नुकसान औरत का किया है.

धर्म ने सब से ज्यादा बेडि़यां औरत के पैरों में डाली हैं. यह बात औरत को खुद सम  झनी होगी और खुद इस से निकलने के तरीके ढूंढ़ने होंगे.

‘‘मुंह क्यों छिपाना? किस से छिपाना? बचपन से जिस पिता की गोद में खेलखेल कर बड़ी हुई, जिस भाई के साथ लाड़प्यार,   झगड़ालड़ाई करती रही, 15 बरस की उम्र पर आ कर उसी पिता और भाई से मुंह छिपाने लगूं? क्यों? क्या उन की नीयत मेरे शरीर पर खराब होगी? मैं अपने पिता और भाई की नीयत पर शक करूं? क्या ऐसा किसी सभ्य घर में होता है?’’ तबस्सुम आरा बुरके के औचित्य के सवाल पर तमक कर बोलीं.

तबस्सुम एक नर्सरी स्कूल टीचर हैं. बुरका नहीं ओढ़तीं. उन की मां ने भी कभी बुरका नहीं ओढ़ा. उन्हें कभी यह बात सम  झ में नहीं आयी कि मुंह छिपाने की जरूरत क्यों है?

वे कहती हैं कि छिपी हुई चीज के प्रति तो आकर्षण और तीव्र हो जाता है. सिद्धार्थ जिन्हें गौतम बुद्ध कहते हैं, वे जब छोटे बालक थे तो किसी पंडित ने उन के पिता से कहा था कि बच्चा बड़ा हो कर या तो राजा बनेगा या संन्यासी हो जाएगा. पिता ने सोचा संन्यासी क्यों हो, इसे तो राजा ही होना चाहिए, तो उन्होंने जवान होते पुत्र सिद्धार्थ का महल सुंदरसुंदर कन्याओं, मदिरा और ऐशोआराम की वस्तुओं से भर दिया.

छोटी उम्र में उस का विवाह भी कर दिया. इतना सब छोटी उम्र में ही देख कर सिद्धार्थ का दिल भर गया और 29 साल की अवस्था में वे सब त्याग कर बुद्ध हो गए. दुनिया को ज्ञान बांटने लगे.

ये भी पढ़ें- शहरीकरण और औरतें

मर्द की कमजोरी

इस कहानी से साफ है कि देख लो तो जिज्ञासा खत्म हो जाती है, मन स्थिर हो जाता है. अगर सिद्धार्थ के पिता ने सब औरतों के चेहरे ढक दिए होते तो औरतों के प्रति सिद्धार्थ की जिज्ञासा और आकर्षण जीवनभर बना रहता. एक स्त्री का चेहरा देखने के बाद दूसरी स्त्री में उन की जिज्ञासा उत्पन्न हो जाती. दूसरी के बाद तीसरी में और फिर चौथी में. मगर उन के सामने सब के चेहरे खुले हुए थे. लिहाजा जिज्ञासा ही नहीं हुई. अगर हिन्दू समाज और मुसलिम समाज इस छोटी सी बात को सम  झ ले और घूंघट और बुरके की प्रथा को समाप्त कर दे तो देश में महिलाओं के प्रति हो रहे अपराध 50% खुदबखुद कम हो जाएंगे.

औरत का मुंह देखने से अगर मर्द की नीयत खराब होती है तो यह मर्द की कमजोरी है, औरत की नहीं. अगर मर्द कमजोर है तो उसे मजबूत करने की कवायद होनी चाहिए. मर्द अगर अपराधी प्रवृत्ति का है तो उसे ठीक रास्ते पर लाने के उपक्रम होने चाहिए, लेकिन समाज ने उलटे नियम गढ़ रखे हैं. सारी पाबंदियां औरतों की आजादी पर लगा दी हैं और ये बातें उन्हें बचपन से घुट्टी की तरह पिलाई जाती हैं कि मर्द से सबकुछ छिपा कर रखना है.

औरत पर ही क्यों पाबंदियां

घूंघट या हिजाब से लड़कियों का शारीरिक और मानसिक विकास रुकता है. जवान होती हुई लड़की पर इस तरह की पाबंदियां उस को भविष्य में एक कमजोर औरत के रूप में विकसित करती हैं. 15-16 साल की उम्र से हिजाब या परदा करने वाली लड़की न तो कोई खेल खेलती है ना व्यायाम करके अपने शरीर को तंदुरुस्त और ताकतवर बनाती है जैसेकि इस उम्र के अधिकांश लड़के करते हैं. वहीं ऐसी लड़कियां वादविवाद प्रतियोगिताओं से भी दूर अपने में ही सिमटी रहती हैं. लिहाजा आवाज उठाने की ताकत खत्म हो जाती है.

ऐसी महिलाएं भविष्य में अपने साथ होने वाली आपराधिक घटनाओं के खिलाफ भी कभी आवाज नहीं उठा पातीं और हिंसा का शिकार बनती हैं. अपराध खबरों पर नजर डालें तो वही लड़कियां बलात्कार और हिंसा की शिकार ज्यादा होती हैं, जो परदानशीं रहती हैं. चाहे वे हिंदू हो या मुसलमान. औरत को परदे या घूंघट में कैद कर के दुनिया में कहीं भी उस का अपहरण, बलात्कार या हत्या नहीं रोकी जा सकती है. यदि पुरुष में चरित्र दोष है तो वह उस स्त्री पर पहले हमला करेगा जो दबीढकी, सकुचाई सी नजर आएगी. समाज में अपराध और बर्बरता न बढ़े इस के लिए पुरुषों पर पाबंदियां लगाए जाने की जरूरत है न कि स्त्री पर.

1935 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक पुरुष मुसलिम न्यायाधीश ने अपने एक फैसले में कहा था कि बुरका पहनना या न पहनना मुसलिम औरतों का अधिकार है और किसी भी पुरुष को कोई अधिकार नहीं है कि वह उसे धार्मिक कारणों से भी उस की मरजी के खिलाफ बुरका पहनने को बाध्य करे. लेकिन इस प्रगतिशील फैसले के 87 साल बाद भी इस आदिम प्रथा में कोई बदलाव नहीं आया है, उलटे अब यह प्रथा हिंदुत्व और भगवापन के उछाल के साथ क्रियाप्रतिक्रिया नियम के तहत और मजबूत हो रही है.

समर्थन और विरोध

कर्नाटक की घटना के बाद एक बार फिर हिजाब और परदे पर चर्चा गरम है और सोशल मीडिया पर परदे के समर्थन और विरोध में लाखों पोस्ट आ रही हैं.

इन प्रथाओं के विरुद्ध आवाज बुलंद करने वाली बंग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन लिखती हैं, ‘‘कोई एक हजार वर्ष पहले किसी एक आदमी द्वारा अपने निजी कारणों से यह निर्णय किया गया था कि औरतें परदा करें और तब से करोड़ों मुसलिम औरतें सारी दुनिया में इसे भुगत रही हैं. अनगिनत पुरानी परंपराएं समय के साथ खत्म हो गईं, लेकिन परदा जारी है. उलटा कुछ समय से इसे पुन: प्रतिष्ठित करने का एक पागलपन चला हुआ है.’’

अपनी किताब ‘औरत के हक में’ तस्लीमा नसरीन लिखती हैं, ‘‘नारी को स्वावलंबी होना चाहिए, मजबूत होना चाहिए, व्यक्तित्व प्रधान होना चाहिए. मैं स्त्री के मन मुग्धकारी शरीर के उत्तेजक प्रदर्शन कर के वाहवाही लेने के पक्ष में नहीं हूं. मैं चाहती हूं स्त्री अपने रूप से नहीं, गुण के बल पर प्रतिष्ठित हो. कट्टरपंथियों का नजरिया बिलकुल भिन्न है. वे स्त्री को उजाले में आने ही नहीं देते. वे स्त्री को मनुष्य के रूप में स्वीकृति ही नहीं देते.’’

ये भी पढ़ें- कभी गरीबों की भी सुनो

बंद हो महिलाओं का उत्पीड़न

स्वयंसेवी कार्यकर्ता नाइश हसन कहती हैं, ‘‘बुरका पुरुषों की बनाई चीज है जो अपनी सत्ता कायम रखने के लिए उस ने औरतों पर थोपी है. इस के जरीए वे औरतों की मोबैलिटी को कंट्रोल कर पाते हैं.’’

वहीं मशहूर अदाकारा शबाना आजमी का कहना है, ‘‘कुरान बुरका पहनने के बारे में कुछ नहीं कहती.’’

सोशल मीडिया पर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी कहा है, ‘‘यह फैसला करना महिलाओं का अधिकार है कि उन्हें क्या पहनना है और क्या नहीं. पहनावे को ले कर महिलाओं का उत्पीड़न बंद होना चाहिए. चाहे वह बिकिनी हो, घूंघट हो, जींस हो या हिजाब हो, यह फैसला करने का अधिकार महिलाओं का है कि उन्हें क्या पहनना है. इस अधिकार की गारंटी भारतीय संविधान ने दी है. महिलाओं का उत्पीड़न बंद करो.’’

परदे पर बहस सदियों से जारी है. जरूरत इस बात की है कि इसलाम में जिस परदे की बात कही गई है उसे ठीक से सम  झा जाए. इसलाम ‘नजर के परदे’ की बात कहता है और यह परदा मर्द एवं औरत दोनों पर लागू होता है.

समाजसेवी नाइश हसन कहती हैं, ‘‘परदा एक अलग चीज है और बुरका एक अलग. कुरान में कहीं ऐसा नहीं कहा गया है कि औरत अपने हाथ, पैर या चेहरा ढके. इसलाम ने औरत को आदमी से ज्यादा आजादी दी है. औरत किस तरह का लिबास पहने यह उस की अपनी मरजी पर निर्भर है. बुरका पुरुषों की बनाई चीज है जो अपनी सत्ता कायम रखने के लिए पुरुषों द्वारा औरतों पर थोपी गई है.

‘‘इस के जरीए वे औरतों की ‘मोबैलिटी’ को कंट्रोल कर पाते हैं. कुरान में जिस परदे की बात है वह है ‘नजर का परदा’ अर्थात हम एकदूसरे से व्यवहार करते समय किस तरह से पेश हों. इसलिए आप देखेंगे की बुरके का चलन सब मुसलिम मुल्कों में नहीं है. अगर सऊदी अरब की बात की जाए तो एक गरम रेतीला इलाका होने के कारण वहां मर्द और औरत दोनों ही पूरे शरीर को ढकने वाले लंबेचौड़े लिबास पहनते हैं. उन की नकल करने की जरूरत हमें नहीं है क्योंकि यहां का मौसम सऊदी अरब के मौसम से अलग है.’

स्पष्ट है कि बलात्कार या छेड़छाड़ से बचने का उपाय परदा या बुरका नहीं है. जरूरत इस बात की है कि औरत को बंधनमुक्त कर के संकट के समय अपना बचाव करने के तरीके सिखाए जाएं और औरत को निशाना बनाने वाले मर्दों, भगवाधारियों, बलात्कारियों के लिए कानून और सजा को सख्त किया जाए.

ये भी पढ़ें- यूक्रेनी औरतों का बलिदान

कभी गरीबों की भी सुनो

शहरों को सुंदर बनाने में भी अब राजनीतिक दलों की रुचि होने लगी है. लखनऊ में गोमती के किनारे रिवर फ्रंट को ले कर अखिलेश यादव अपनी पीठ थपथपाते हैं तो नरेंद्र मोदी अहमदाबाद में साबरमती के रिवर फ्रंट को ले कर. नरेंद्र मोदी आजकल अपना बहुत समय दिल्ली के राजपथ के दोनों ओर सैंट्रल विस्टा और नया संसद भवन बनवाने में बिता रहे हैं और उन की रुचि राममंदिर में फिलहाल न के बराबर है जिस पर वैसे भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कब्जा है.

शहरी आबादी निरंतर बढ़ रही है और आमतौर पर सिर्फ बहुत महंगे इलाकों को छोड़ कर शहरों में रहने वाले खुली हवा व हरियाली को तरस रहे हैं. ऐसे में यह जरूरी है कि राज्य सरकार व नगर निकाय अपने बजट का बड़ा हिस्सा आम जनता के लिए बड़ेबड़े बाग बनवाने व आसपास के खुले इलाकों को विकसित करने में खर्च करें. आजकल सरकारी 20-30 मंजिले सचिवालयों और कार्यालयों, अदालतों को बनवाने की जो होड़ लगी है वह असल में जनता पर शासकों का भय दर्शाने के लिए है.

जहां बाग और रिवर फ्रंट में आम आदमी और उस का परिवार राहत महसूस करता है, वहीं विशाल अदालत भवन, पुलिस मुख्यालय या दूसरी सरकारी इमारतें उस का दम घोंटती हैं. राजपथ के दोनों ओर पिछले 70 सालों से हराभरा मैदान एक राहत देने वाला स्थान रहा है, जहां दिल्ली की घनी बस्तियों वाले कभीकभार आ कर चैन महसूस करते थे. धीरेधीरे कर के इसे जनता से छीन कर सरकारी कब्जे में लिया जा रहा है. सी हैक्सागन पहले ही सैनिक स्मारक की तरह विकसित कर दिया गया है और उस में आम जनता नहीं जा सकती, केवल जनता के प्रधानसेवक नरेंद्र मोदी ही जा सकते हैं.

ये भी पढ़ें- यूक्रेनी औरतों का बलिदान

नरेंद्र मोदी अपने लिए विशाल मकान और संसद भवन बनवा रहे हैं. सैंट्रल विस्टा आम जनता के लिए खुला रहेगा, इस में संदेह है. इस के विपरीत दिल्ली सरकार, जिस के पास आधेअधूरे हक हैं, कई जगह सड़कों को सुंदर कर रही है और यमुना के किनारे को विकसित करना चाह रही है पर केंद्र सरकार की एजेंसी, दिल्ली विकास प्राधिकरण, उस जमीन पर कुंडली मारे बैठी है. इस का श्रेय अरविंद केजरीवाल को न चला जाए, केवल इसलिए वह वहां कुछ नहीं होने दे रही. ऐसा ही कुछ हर राज्य, हर शहर में हो रहा है.

बढ़ती शहरी आबादी को जो ठंडी हवा चाहिए वह मौलिक अधिकार होने के साथसाथ उस की आवश्यकता भी है. शहरी आबादी अपने अधिकांश घंटे बंद दफ्तरों, कारखानों या घरों में बिताती है और उसे सप्ताह में मुश्किल से 3-4 घंटे मिलते हैं जब कहीं राहत की सांस ले सके. साफ हवा और पार्क वगैरह को विकसित करने को अब शासन का अहम हिस्सा मानना चाहिए. पेड़, बाग, झरने, खेलकूद के लिए स्थान, साफसुंदर सड़कें, पटरियां आज हिंदूमुसलिम विवादों, चीनपाकिस्तान, राममंदिर, काशी कौरिडोर, चारधाम यात्रा से ज्यादा महत्त्व की हैं. समाजवादी पार्टी और मायावती का चुनावों में गोमती रिवर फ्रंट का मुद्दा उठाना एक अच्छा संकेत है. यह अयोध्या के घाटों से कहीं ज्यादा जरूरी है जहां पंडों की बरात जमा हो जाएगी और भिखारियों का जमावड़ा हो जाएगा.

ये भी पढ़ें- लोकतंत्र और धर्म गुरु

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें