Valentine’s Day: नया सवेरा- भाग 3

ये भी पढ़ें- Valentine’s Special: नया सवेरा (भाग-2)

‘‘तुम्हारे पिता ने हमारी आर्थिक रूप से बहुत मदद की. इस खातिर, मैं चुप हो गई. उस के बाद मेरे पापा को तो मौका मिल गया. तुम्हारे पिता दारू पीने के लिए उन्हें खूब पैसे देते. कितना स्वार्थी होता है न इंसान, प्रीति? अपने बच्चे का दर्द देख कर भी अनजान बन जाता है और सिर्फ अपने बारे में सोचता है.

‘‘खैर, धीरेधीरे यहां आ कर कुछ समय के पश्चात मैं ने सबकुछ भूल कर तुम्हारे पिता को दिल से अपनाना चाहा. परंतु उन्हें तो सिर्फ मेरी खूबसूरती से प्यार था. मात्र खिलौना भर थी मैं उन के लिए. बहुत कोशिश की प्रीति, पर निराशा ही हाथ लगी. जब उन का मन करता, वे मु झ से मिलते अन्यथा महीनों वे मु झ से बात तक नहीं करते. यदि मैं कुछ कहती तो वे मु झे अपनी औकात में रहने को कहते. मु झ से कहते कि मु झे तो उन का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने मु झ से शादी की, मु झे इस बंगले में आश्रय दिया. चूंकि उन्होंने दीदी के इलाज के लिए पैसे दिए थे. मैं चुप हो जाती. उस के बाद मैं ने चुप रहना सीख लिया. तुम्हारे पिताजी जो चाहते थे, वह हो गया. सबकुछ उन के हिसाब से हो रहा था और यही तो वह चाहते थे.’’

वे आगे बोलीं, ‘‘फिर तुम भी मु झ से बात नहीं करना चाहती थीं और तब तक मैं इस कदर टूट चुकी थी कि तुम्हारे करीब जाने, तुम्हें सम झने की मैं ने कोशिश भी नहीं की. मु झे लगा कि न मेरे पिता अपने हुए, न मेरे पति अपने हुए तो तुम तो किसी और का खून हो, तुम कैसे मेरी अपनी हो सकती हो. फिर क्यों मैं यह बेकार की कोशिश करूं. क्यों हर बार अपना हमदर्द तलाशने की कोशिश करूं. मैं ने तुम में अपनी खुशी तलाशने के बजाय खुद को एक गहरे अंधकार में धकेल दिया. मु झे माफ कर देना, प्रीति.

‘‘तुम्हारे प्रति मेरी जिम्मेदारी थी जिसे मैं ने कभी पूरा नहीं किया. कभीकभी लगता है पापा की तरह मैं भी तो स्वार्थी ही थी जो अपने गमों में इस कदर खो गई कि तुम्हारे गमों को देख कर भी हमेशा मैं ने अनदेखा किया है. लेकिन देखो न, इतना कुछ होने के बावजूद जब पापा की मौत की खबर सुनी, मु झे बहुत रोना आया. मैं फूटफूट कर रोई. ऐसे क्यों होता है प्रीति? कहां से हम औरतों में इतना स्नेह आता है? और क्यों आता है? क्यों हम लोग बेरहम नहीं हो सकते?’’

यह कह कर छोटी मां रोने लगीं. मेरा भी गला भर आया. मैं वहीं बालकनी में फर्श पर बैठ गई. मैं ने छोटी मां का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, ‘‘मां, आप चिंता मत करिए. अब सब ठीक होने वाला है. हमारे जीवन में खुशियां लौटेंगी. कितना कीमती समय हम ने ऐसे ही जाया कर दिया, जबकि आप और मैं, हम दोनों उसी दर्द से गुजर रहे थे. फिर भी हम एकदूसरे के हमदर्द नहीं बन पाए. गलती सिर्फ आप की नहीं थी मां, गलती तो मेरी भी थी.

‘‘मैं ने भी तय कर लिया था कि कभी आप को मां के रूप में नहीं स्वीकारूंगी. मां, हमारा जीवन के प्रति दृष्टिकोण ही नकारात्मक था. यदि हम कोशिश करते तो एकदूसरे के दोस्त बन सकते थे. हम अपना दर्द बांट सकते थे. लेकिन हम ने ऐसा नहीं किया.’’

मां ने मु झ से सहमति जताई. मैं ने किचन से एक गिलास ठंडा पानी ले कर मां को दिया. आज हम एक अनोखे दोस्ती के रिश्ते से बंध रहे थे. सबकुछ कितना अच्छा और नया लग रहा था. मैं वहीं मां के पास नीचे बैठी. घड़ी ने सुबह के 4:30 बजा दिए. तभी मेरे मोबाइल पर रोहित का मैसेज आया. उस ने लिखा था, ‘कब तक इंतजार करवाओगी प्रीति? कब तक मेरे प्यार की परीक्षा लोगी? 2 साल से हम एकदूसरे को जानते हैं. अब वक्त आ गया है कि हम पतिपत्नी के बंधन में बंध कर सदा के लिए एक हो जाएं. तुम्हारी हां के इंतजार में, तुम्हारा और सदा तुम्हारा, रोहित.’ मेरे चेहरे की प्रसन्नता से मां सम झ गईं कि कुछ न कुछ बात जरूर है. मैं ने रोहित को मैसेज किया, ‘रोहित, तुम ने मेरा बहुत इंतजार किया है. एक दिन और कर लो. आज मु झे मां को ले कर उन के पिता के दाहसंस्कार में जाना है. मैं तुम से कल मिलती हूं.’

मां के पूछने पर मैं ने मां को रोहित के बारे में सबकुछ बता दिया कि हम लोग 2 साल से एक ही औफिस में काम करते हैं. एकदूसरे को पसंद भी करते हैं और रोहित चाहता है कि हम विवाह बंधन में बंध जाएं. मगर रिश्तों से डर लगने लगा है. तब मां ने मु झे प्यार से सम झाया, ‘‘मेरे हिसाब से यदि रोहित तुम से सच्चा प्यार नहीं करता तो तुम्हारा इंतजार भी नहीं करता. वह विवाह करना चाहता है तुम से. तुम्हें प्यार से अपनाना चाहता है. फिर भी मैं एक बार उस से मिलना चाहूंगी.’’ मां का यह कहना था कि मेरी खुशी की सीमा न रही. मैं ने मां से कहा, ‘‘मां, आप को पूरा अधिकार है और आप को यह अधिकार देते हुए मु झे अजीब सा सुकून महसूस हो रहा है. आज लग रहा है कि मेरी जिंदगी में भी अच्छेबुरे का निर्णय लेने वाला कोई है. कोई है जो अब मु झे गलत काम के लिए डांट सकता है,’’ कहतेकहते मेरा गला भर आया.

ये भी पढ़ें- Valentine’s Special: परिंदा (भाग-2)

आज हम मांबेटी खूब रोए. अब सूरज की पहली लालिमा निकल रही थी. ऐसा लग रहा था कि प्रकृति भी आज प्रसन्न है. नया दिन आज आशा का नया सवेरा ला कर हमारी जिंदगी में आया था. मैं ने मां से जल्दी तैयार हो जाने को कहा. मां ने प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरा. कुछ ही देर बाद हमारी गाड़ी मां के मायके में आ कर रुकी. मां ने अपने पिताजी को अंतिम बार प्रणाम किया. वहां उन की बहनें पहले ही पहुंच चुकी थीं. मैं उन सब से मिली. मैं अगले दिन घर आ गई और मां कुछ दिन वहीं रुक गईं. फिर मैं रोहित से मिलने गई. रोहित मु झे देख बहुत खुश हो गया. फिर हम कौफी हाउस गए. वहां कौफी का और्डर दिया.

मैं ने रोहित से कहा, ‘‘रोहित, मैं बहुत खुश हूं. अब मु झे मेरे परिवार के रूप में छोटी मां का प्यार मिला है. मैं ने तुम से अपने परिवार के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बताया था. लेकिन तुम्हें सबकुछ जानने का अधिकार है,’’ यह कह कर मैं ने रोहित को सारी बात बता दी. मैं ने रोहित से यह भी कहा कि शादी के बाद भी मां मेरे साथ ही रहेंगी. अब मैं उन को और अकेला नहीं छोड़ सकती. मैं ने एक मां का प्यार तो खो दिया, अब दूसरी मां का नहीं खोना चाहती. यह सब जान लेने के बाद ही वह मु झ से शादी करने का फैसला ले. कोई जल्दबाजी न करे.

‘‘मु झे तुम्हारे जवाब का इंतजार रहेगा, रोहित,’’ मैं यह कह कर उठने ही वाली थी कि रोहित ने मेरा हाथ थाम लिया. उस ने मु झ से कहा, ‘‘प्रीति, पहले मैं केवल तुम से प्यार करता था परंतु अब तुम्हारी इज्जत भी करता हूं. जहां तक मां का सवाल है, मां यदि अपने बच्चों के पास नहीं रहेंगी तो कहां रहेंगी? और यकीन मानो, हम लोग मां को ढेर सारी खुशियां देंगे, जिन की वे हकदार हैं.’’

रोहित का इतना कहना था कि मैं रोहित के गले लग गई. मां उम्र के हिसाब से मेरी बड़ी बहन जैसी थीं. अब हमें अपने साथ उन का भी भविष्य संवारना था. 2 दिनों बाद रोहित मां से मिला. मां को रोहित अच्छा लगा. उन की तरफ से हरी  झंडी मिलते ही हम नए जीवन की हसीन कल्पनाओं में खो गए.

‘‘अरे, अरे…अभी से सपनों में खो गए तुम दोनों, अभी बहुत काम है. मेरी बेटी की शादी है, मु झे बहुत सारी तैयारियां करनी हैं,’’ मां का यह कहना था कि हम सब खिलखिला कर हंस पड़े.

ये भी पढ़ें- सीख: भाग-2

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें