रिश्ता: क्या हुआ था शमा के साथ

लेखक- कुंवर गुलाब सिंह

शमा के लिए रफीक का रिश्ता आया. वह उसे पहले से जानती थी. वह ‘रेशमा आटो सर्विस’ में मेकैनिक था और अच्छी तनख्वाह पाता था.

शमा की मां सईदा अपनी बेटी का रिश्ता लेने को तैयार थीं.

शमा बेहद हसीन और दिलकश लड़की थी. अपनी खूबसूरती के मुकाबले वह रफीक को बहुत मामूली इनसान समझती थी. इसलिए रफीक उसे दिल से नापसंद था.

दूसरी ओर शमा की सहेली नाजिमा हमेशा उस की तारीफ करते हुए उकसाया करती थी कि वह मौडलिंग करे, तो उस का रुतबा बढ़ेगा. साथ ही, अच्छी कमाई भी होगी.

एक दिन शमा ख्वाबों में खोई सड़क पर चली जा रही थी.

‘‘अरी ओ ड्रीमगर्ल…’’ पीछे से पुकारते हुए नाजिमा ने जब शमा के कंधे पर हाथ रखा, तो वह चौंक पड़ी.

‘‘किस के खयालों में चली जा रही हो तुम? तुझे रोका न होता, तो वह स्कूटर वाला जानबूझ कर तुझ पर स्कूटर चढ़ा देता. वह तेरा पीछा कर रहा था,’’ नाजिमा ने कहा.

शमा ने नाजिमा के होंठों पर चुप रहने के लिए उंगली रख दी. वह जानती थी कि ऐसा न करने पर नाजिमा बेकार की बातें करने लगेगी.

अपने होंठों पर से उंगली हटाते हुए नाजिमा बोली, ‘‘मालूम पड़ता है कि तेरा दिमाग सातवें आसमान में उड़ने लगा है. तेरी चमड़ी में जरा सफेदी आ गई, तो इतराने लगी.’’

‘‘बसबस, आते ही ऐसी बातें शुरू कर दीं. जबान पर लगाम रख. थोड़ा सुस्ता ले…’’

थोड़ा रुक कर शमा ने कहा, ‘‘चल, मेरे साथ चल.’’

‘‘अभी तो मैं तेरे साथ नहीं चल सकूंगी. थोड़ा रहम कर…’’

‘‘आज तुझे होटल में कौफी पिलाऊंगी और खाना भी खिलाऊंगी.’’

‘‘मेरी मां ने मेरे लिए जो पकवान बनाया होगा, उसे कौन खाएगा?’’

‘‘मैं हूं न,’’ शमा नाजिमा को जबरदस्ती घसीटते हुए पास के एक होटल में ले गई.

‘‘आज तू बड़ी खुश है? क्या तेरे चाहने वाले नौशाद की चिट्ठी आई है?’’ शमा ने पूछा.

यह सुन कर नाजिमा झेंप गई और बोली, ‘‘नहीं, साहिबा का फोटो और चिट्ठी आई है.’’

‘‘साहिबा…’’ शमा के मुंह से निकला.

साहिबा और शमा की कहानी एक ही थी. उस के भी ऊंचे खयालात थे. वह फिल्मी दुनिया की बुलंदियों पर पहुंचना चाहती थी.

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साहिबा का रिश्ता उस की मरजी के खिलाफ एक आम शख्स से तय हो गया था, जो किसी दफ्तर में बड़ा बाबू था. उसे वह शख्स पसंद नहीं था.

कुछ महीने पहले साहिबा हीरोइन बनने की लालसा लिए मुंबई भाग गई थी, फिर उस की कोई खबर नहीं मिली थी. आज उस की एक चिट्ठी आई थी.

चिट्ठी की खबर सुनने के बाद शमा ने नाजिमा के सामने साहिबा के तमाम फोटो टेबिल पर रख दिए, जिन्हें वह बड़े ध्यान से देखने लगी. सोचने लगी, ‘फिल्म लाइन में एक औरत पर कितना सितम ढाया जाता है, उसे कितना नीचे गिरना पड़ता है.’

नाजिमा से रहा नहीं गया. वह गुस्से में बोल पड़ी, ‘‘इस बेहया लड़की को देखो… कैसेकैसे अलफाजों में अपनी बेइज्जती का डंका पीटा है. शर्म मानो माने ही नहीं रखती है. क्या यही फिल्म स्टार बनने का सही तरीका है? मैं तो समझती हूं कि उस ने ही तुम्हें झूठी बातों से भड़काया होगा.

‘‘देखो शमा, फिल्म लाइन में जो लड़की जाएगी, उसे पहले कीमत तो अदा करनी ही पड़ेगी.’’

‘‘फिल्मों में आजकल विदेशी रस्म के मुताबिक खुला बदन, किसिंग सीन वगैरह मामूली बात हो गई है.

‘‘कोई फिल्म गंदे सीन दिखाने पर ही आगे बढ़ेगी, वरना…’’ शमा बोली.

‘‘सच पूछो, तो साहिबा के फिल्मस्टार बनने से मुझे खुशी नहीं हुई, बल्कि मेरे दिल को सदमा पहुंचा है. ख्वाबों की दुनिया में उस ने अपनेआप को बेच कर जो इज्जत कमाई, वह तारीफ की बात नहीं है,’’ नाजिमा ने कहा.

बातोंबातों में उन दोनों ने 3-3 कप कौफी पी डाली, फिर टेबिल पर उन के लिए वेटर खाना सजाने लगा.

‘‘शमा, ऐसे फोटो ले जा कर तुम भी फिल्म वालों से मिलोगी, तो तुझे फौरन कबूल कर लेंगे. तू तो यों भी इतनी हसीन है…’’ हंस कर नाजिमा बोली.

‘‘आजकल मैं इसलिए ज्यादा परेशान हूं कि मां ने मेरी शादी रफीक से करने के लिए जीना मुश्किल कर दिया है. उन्हें डर है कि मैं भी मुंबई न भाग जाऊं.’’

‘‘अगर तुझे रफीक पसंद नहीं है, तो मना कर दे.’’

‘‘वही तो समस्या है. मां समझती हैं कि ऐसे कमाऊ लड़के जल्दी नहीं मिलते.’’

‘‘उस में कमी क्या है? मेहनत की कमाई करता है. तुझे प्यारदुलार और आराम मुहैया कराएगा. और क्या चाहिए तुझे?’’

‘‘तू भी मां की तरह बतियाने लगी कि मैं उस मेकैनिक रफीक से शादी कर लूं और अपने सारे अरमानों में आग लगा दूं.

‘‘रफीक जब घर में घुसे, तो उस के कपड़ों से पैट्रोल, मोबिल औयल और मिट्टी के तेल की महक सूंघने को मिले, जिस की गंध नाक में पहुंचते ही मेरा सिर फटने लगे. न बाबा न. मैं तो एक हसीन जिंदगी गुजारना चाहती हूं.’’

‘‘सच तो यह है कि तू टैलीविजन पर फिल्में देखदेख कर और फिल्मी मसाले पढ़पढ़ कर महलों के ख्वाब देखने लगी है, इसलिए तेरा दिमाग खराब होने लगा है. उन ख्वाबों से हट कर सोच. तेरी उम्र 24 से ऊपर जा रही है. हमारी बिरादरी में यह उम्र ज्यादा मानी जाती है. आगे पूछने वाला न मिलेगा, तो फिर…’’

इसी तरह की बातें होती रहीं. इस के बाद वे दोनों अपनेअपने घर चली गईं.

उस दिन शमा रात को ठीक से सो न सकी. वह बारबार रफीक, नाजिमा और साहिबा के बारे में सोचती रही.

रात के 3 बज रहे थे. शमा ने उठ कर आईने के सामने अपने शरीर को कई बार घुमाफिरा कर देखा, फिर कपड़े उतार कर अपने जिस्म पर निगाहें गड़ाईं और मुसकरा दी. फिर वह खुद से ही बोली, ‘मुझे साहिबा नहीं बनना पड़ेगा. मेरे इस खूबसूरत जिस्म और हुस्न को देखते ही फिल्म वाले खुश हो कर मुझे हीरोइन बना देंगे.’’

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जब कोई गलत रास्ते पर जाने का इरादा बना लेता है, तो उस का दिमाग भी वैसा ही हो जाता है. उसे आगेपीछे कुछ सूझता ही नहीं है.

शमा ने सोचा कि अगर वह साहिबा से मिलने गई, तो वह उस की मदद जरूर करेगी. क्योंकि साहिबा भी उस की सहेली थी, जो आज नाम व पैसा कमा रही है.

लोग कहते हैं कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं. वे सच कहते हैं, लेकिन जब मुसीबत आती है, तो वही ढोल कानफाड़ू बन कर परेशान कर देते हैं.

शमा अच्छी तरह जानती थी कि उस की मां उसे मुंबई जाने की इजाजत नहीं देंगी, तो क्या उस के सपने केवल सपने बन कर रह जाएंगे? वह मुंबई जरूर जाएगी, चाहे इस के लिए उसे मां को छोड़ना पड़े.

शमा ने अपने बैंक खाते से रुपए निकाले, ट्रेन का रिजर्वेशन कराया और मां से बहाना कर के एक दिन मुंबई के लिए चली गई.

शमा ने साहिबा को फोन कर दिया था. साहिबा ने उसे दादर रेलवे स्टेशन पर मिलने को कहा और अपने घर ले चलने का भरोसा दिलाया.

जब ट्रेन मुंबई में दादर रेलवे स्टेशन पर पहुंची, उस समय मूसलाधार बारिश हो रही थी. बहुत से लोग स्टेशन पर बारिश के थमने का इंतजार कर रहे थे. प्लेटफार्म पर बैठने की थोड़ी सी जगह मिल गई.

शमा सोचने लगी, ‘घनघोर बारिश के चलते साहिबा कहीं रुक गई होगी.’

उसी बैंच पर एक औरत बैठी थी. शायद, उसे भी किसी के आने का इंतजार था.

शमा उस औरत को गौर से देखने लगी, जो उम्र में 40 साल से ज्यादा की लग रही थी. रंग गोरा, चेहरे पर दिलकशी थी. अच्छी सेहत और उस का सुडौल बदन बड़ा कशिश वाला लग रहा था.

शमा ने सोचा कि वह औरत जब इस उम्र में इतनी खूबसूरत लग रही है, तो जवानी की उम्र में उस पर बहुत से नौजवान फिदा होते रहे होंगे.

उस औरत ने मुड़ कर शमा को देखा और कहा, ‘‘बारिश अभी रुकने वाली नहीं है. कहां जाना है तुम्हें?’’

शमा ने जवाब दिया, ‘‘गोविंदनगर जाना था. कोई मुझे लेने आने वाली थी. शायद बारिश की वजह से वह रुक गई होगी.’’

‘‘जानती हो, गोविंदनगर इलाका इस दादर रेलवे स्टेशन से कितनी दूर है? वह मलाड़ इलाके में पड़ता है. यहां पहली बार आई हो क्या?’’

‘‘जी हां.’’

‘‘किस के यहां जाना है?’’

‘‘मेरी एक सहेली है साहिबा. हम दोनों एक ही कालेज में पढ़ती थीं. 2-3 साल पहले वह यहां आ कर बस गई. उस ने मुझे भी शहर देखने के लिए बुलाया था.’’

उस औरत ने शमा की ओर एक खास तरह की मुसकराहट से देखते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारे पास सामान तो बहुत कम है. क्या 1-2 दिन के लिए ही आई हो?’’

‘‘अभी कुछ नहीं कह सकती. साहिबा के आने पर ही बता सकूंगी.’’

‘‘कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम अपने घर से बिना किसी को बताए यहां भाग कर आई हो? अकसर तुम्हारी उम्र की लड़कियों को मुंबई देखने का बड़ा शौक रहता है, इसलिए वे बिना इजाजत लिए इस नगरी की ओर दौड़ पड़ती हैं और यहां पहुंच कर गुमराह हो जाती हैं.’’

शमा के चेहरे की हकीकत उस औरत से छिप न सकी.

‘‘मुझे लगता है कि तुम भी भाग कर आई हो. मुमकिन है कि तुम्हें भी हीरोइन बनने का चसका लगा होगा, क्योंकि तुम्हारी जैसी हसीन लड़कियां बिना सोचे ही गलत रास्ते पर चल पड़ती हैं.’’

‘‘आप ने मुझे एक नजर में ताड़ लिया. लगता है कि आप लड़कियों को पहचानने में माहिर हैं,’’ कह कर शमा हंस दी.

‘‘ठीक कहा तुम ने…’’ कह कर वह औरत भी हंस दी, ‘‘मैं भी किसी जमाने में तुम्हारी उम्र की एक हसीन लड़की गिनी जाती थी. मैं भी मुंबई में उसी इरादे से आई थी, फिर वापस न लौट सकी.

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‘‘मैं भी अपने घर से भाग कर आई थी. मुझ से पहले मेरी सहेली भी यहां आ कर बस चुकी थी और उसी के बुलावे पर मैं यहां आई थी, पर जो पेशा उस ने अपना रखा था, सुन कर मेरा दिल कांप उठा…

‘‘वह बड़ी बेगैरत जिंदगी जी रही थी. उस ने मुझे भी शामिल करना चाहा, तो मैं उस के दड़बे से भाग कर अपने घर जाना चाहती थी, लेकिन यहां के दलालों ने मुझे ऐसा वश में किया कि मैं यहीं की हो कर रह गई.

‘‘मुझे कालगर्ल बनना पड़ा. फिर कोठे तक पहुंचाया गया. मैं बेची गई, लेकिन वहां से भाग निकली. अब स्टेशनों पर बैठते ऐसे शख्स को ढूंढ़ती फिरती हूं, जो मेरी कद्र कर सके, लेकिन इस उम्र तक कोई ऐसा नहीं मिला, जिस का दामन पकड़ कर बाकी जिंदगी गुजार दूं,’’ बताते हुए उस औरत की आंखें नम हो गईं.

‘‘कहीं तुम्हारा भी वास्ता साहिबा से पड़ गया, तो जिंदगी नरक बन जाएगी. तुम ने यह नहीं बताया कि तुम्हारी सहेली करती क्या है?’’ उस औरत ने पूछा.

शमा चुप्पी साध गई.

‘‘नहीं बताना चाहती, तो ठीक है?’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है. वह हीरोइन बनने आई थी. अभी उस को किसी फिल्म में काम करने को नहीं मिला, पर आगे उम्मीद है.’’

‘‘फिर तो बड़ा लंबा सफर समझो. मुझे भी लोगों ने लालच दे कर बरगलाया था,’’ कह कर औरत अजीब तरह से हंसी, ‘‘तुम जिस का इंतजार कर रही हो, शायद वह तुम्हें लेने नहीं आएगी, क्योंकि जब अभी वह अपना पैर नहीं जमा सकी, तो तुम्हारी खूबसूरती के आगे लोग उसे पीछे छोड़ देंगे, जो वह बरदाश्त नहीं कर पाएगी.’’

दोनों को बातें करतेकरते 3 घंटे बीत गए. न तो बारिश रुकी, न शाम तक साहिबा उसे लेने आई. वे दोनों उठ कर एक रैस्टोरैंट में खाना खाने चली गईं.

शमा ने वहां खुल कर बताया कि उस की मां उस की शादी जिस से करना चाहती थीं, वह उसे पसंद नहीं करती. वह बहुत दूर के सपने देखने लगी और अपनी तकदीर आजमाने मुंबई चली आई.

‘‘शमा, बेहतर होगा कि तुम अपने घर लौट जाओ. तुम्हें वह आदमी पसंद नहीं, तो तुम किसी दूसरे से शादी कर के इज्जत की जिंदगी बिताओ, इसी में तुम्हारी भलाई है, वरना तुम्हारी इस खूबसूरत जवानी को मुंबई के गुंडे लूट कर दोजख में तुम्हें लावारिस फेंक देंगे, जहां तुम्हारी आवाज सुनने वाला कोई न होगा.’’

शमा उस औरत से प्रभावित हो कर उस के पैरों पर गिर पड़ी और वापस जाने की मंसा जाहिर की.

‘‘अगर तुम इस ग्लैमर की दुनिया में कदम न रखने का फैसला कर घर वापस जाने को राजी हो गई हो, तो मैं यही समझूंगी कि तुम एक जहीन लड़की थी, जो पाप के दलदल में उतरने से बच गई. मैं तुम्हारे वापसी टिकट का इंतजाम करा दूंगी,’’ उस औरत ने कहा.

शमा घर लौट कर अपनी बूढ़ी मां सईदा की बांहों में लिपट कर खूब रोई.

आखिरकार शमा रफीक से शादी करने को राजी हो गई.

मां ने भी शमा की शादी बड़े ही धूमधाम से करा दी.

अब रफीक और शमा खुशहाल जिंदगी के सपने बुन रहे हैं. शमा भी पिछली बातें भूलने की कोशिश कर रही है.

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रिश्ता

‘‘मां ये देखो गोवा के टिकट, अगले हफ्ते हम सब गोवा जा रहे हैं,’’ सूरज मेरे कमरे में आते ही खुशी से बोला. उस के पीछेपीछे मेरी बहू रीता और पोता मयंक भी मेरे कमरे में आ गए.

‘‘दादी पता है वह बहुत बड़ा समंदर है. हमारी टीचर ने बताया था… कितना मजा आएगा न?’’ कहते हुए मयंक ने मुझे खुशी से गले लगा लिया. मेरी बहू ने हंसते हुए कहा, ‘‘मां, इस बार मैं आप की एक नहीं सुनूंगी. आप को भी गोवा में जींस पहननी होगी.’’

‘‘चल पगली, मैं और जींस… दुनिया देखेगी तो हंसेगी मुझ पर,’’ मैं ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहा.

‘‘मां इस बार आप को रीता की बात माननी ही होगी,’’ सूरज ने मेरी गोद में सिर रख कर कहा.

‘‘अच्छाअच्छा सोचूंगी, अभी चलो सब सो जाओ बहुत रात हो गई है.’’ सब के अपने कमरों में जाने के बाद मैं खुशी के मारे सो ही नहीं पाई. मैं ने कभी समंदर नहीं देखा था. अगले हफ्ते समंदर के किनारे बैठी होऊंगी, सोचसोच कर मन नाच रहा था. फिर यह भी सोचा कि कल सत्संग में जा कर सब को बताऊंगी कि मैं गोवा जा रही हूं. सुबह रीता मयंक के स्कूल जाने के बाद मुझे सत्संग के लिए छोड़ कर औफिस चली गई. मुझे अपनी सहेलियों को गोवा जाने की बात बताने की बहुत जल्दी थी. सत्संग का तो बहाना होता है. यहां आने वाली सब औरतें आमतौर पर घर की बातचीत कर के ही वक्त बिताती हैं. मयंक ने जब से स्कूल जाना शुरू किया है मैं भी वक्त गुजारने के लिए कभीकभी यहां आ जाती हूं. सत्संग शुरू हो चुका था. मैं ने धीरे से अपने पास बैठी शीला से कहा, ‘‘सुन, अगले हफ्ते सत्संग में नहीं आ पाऊंगी. मैं अपने बेटेबहू के साथ गोवा जा रही हूं.’’

‘‘क्या गोवा? पिछले साल तू शिमला गई थी इस बार गोवा, तेरे तो मजे हैं,’’ शीला ने कहा.

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‘‘गोवा… अरे वाह, सूरज की मां सुना है कि समंदर के किनारे शाम का मजा ही कुछ और होता है. मेरे भाई के बेटाबहू गए थे, उन्होंने बताया,’’ आगे बैठी नीरजा ने अपनी गरदन पीछे घुमा ली. धीरेधीरे सत्संग छोड़ कर मेरे आसपास की औरतों ने एक छोटा सा घेरा बना लिया. मैं गर्व से फूली नहीं समा रही थी.

‘‘तू इतना लंबा सफर कर पाएगी? गोवा बहुत दूर है, पूरे एक दिन का सफर है,’’ इस बार शीला के साथ बैठी राजरानी ने कहा.

‘‘तू बुरा न मानना, मैं ने तेरे से ज्यादा दुनिया देखी है. तेरे बेटाबहू बहुत सयाने हैं,’’ साथ बैठी दीदी ने कहा. वे मेरी जानपहचान की औरतों में सब से बड़ी थीं, इसलिए सब उन्हें दीदी ही कहते थे. कोई उन का नाम जानता ही नहीं था. मैं ने उन से कहा, ‘‘क्यों क्या हुआ दीदी, आप ऐसा क्यों कह रही हो?’’

‘‘तू तो बस बच्चों की तरह घूमनाफिरना सुन कर खुश हुए जा रही है. जरा सोच तेरी उम्र में तुझे तीर्थ करवाने की जगह शिमला, गोवा क्यों घुमा रहे हैं तेरे बेटाबहू? कुछ नहीं, बस उन को एक आया चाहिए अपना बच्चा संभालने के लिए.’’

‘‘क्या बात कर रही हो दीदी, मेरा बेटा मेरी बहुत इज्जत करता है. मुझे आया क्यों समझेगा?’’ मैं ने थोड़ी नाराजगी दिखाते हुए कहा. ‘‘अरे बेटा तो तेरा है पर अब बहू के चक्कर में उस को भी कहां कुछ समझ आ रहा है. दरअसल, बच्चा संभालने के लिए आया पर होने वाला खर्च बचा रहे हैं दोनों.’’ इतने में सत्संग खत्म हो गया और कीर्तन शुरू हो गया. दीदी उठ कर आगे चली गईं. उन के जाने के बाद नीरजा बोली, ‘‘वैसे दीदी गलत नहीं कह रही थीं. तू ने ही बताया था न कि शिमला में सूरज और रीता देर रात तक माल रोड पर घूमते थे और तू और मयंक उन के आने से पहले ही सो जाते थे. तू ही बता, अगर तू नहीं जाएगी तो मयंक को वहां कौन संभालेगा?’’

मेरे कुछ कहने से पहले ही शीला ने अपनी बात कह डाली, ‘‘देख, दीदी की बात कड़वी है पर सच है. तू इतने सालों से घर संभाल रही है. पहले सूरज को पाला और अब मयंक की सारी जिम्मेदारी तेरे सिर डाल कर तेरी बहू काम पर चली जाती है. अरे इस उम्र में बच्चे संभालना आसान नहीं. अब मुझे देख, मैं ने तो साफ कह दिया अपनी बहू से कि अपने बच्चों को खुद संभालो. मुझे तो अब अपने तरीके से जीने दो. भाई, तुझे उन की कोई जरूरत नहीं पर उन को तेरी जरूरत है. उन के औफिस जाने के बाद तू पूरे घर और बच्चे की रखवाली जो करती है, क्यों नीरजा बहन…?’’

‘‘और नहीं तो क्या. खुद को देख जरा, सत्संग खत्म होने से पहले ही घर भागना होता है तुझे, मयंक स्कूल से जो आ जाता है. तेरी बहू सुबह की निकली रात को घर आती है,’’ नीरजा बोली, ‘‘अब और क्या कहूं तू ही बता, सारा घर तो तेरी बहू ने अपने हाथ में ले रखा है. मैं ने तो अपने बेटे से कह दिया था तू जाने तेरी बीवी जाने. मुझे हर महीने खर्चा दे बस. पर तू तो सत्संग के दान के पैसे भी बहू से ले कर आती है.’’ मैं उन सब के बीच चुपचाप उन की बातें सुन रही थी. मेरी ही गलती थी कि मैं ने अपने बेटेबहू की तारीफ करतेकरते अपने घर की सारी बातें इन को बता रखी थीं. पर सब बातों का यह अर्थ भी निकल सकता था, कभी सोचा नहीं था. अब भी वक्त है अपने बारे में सोच जरा. तभी सत्संग खत्म होते ही जयजयकार से हौल गूंज उठा और मैं बातोंबातों में भूल गई कि मयंक घर आ गया होगा. जल्दी से घर के लिए औटो किया पर सारे रास्ते दिमाग में नीरजा और शीला की बातें ही घूमती रहीं. घर पहुंची तो मयंक बाहर ही बैठा था.

‘‘क्या हुआ दादी, कहां रह गई थीं आप?’’ उस ने पूछा पर मैं ने कुछ नहीं कहा, बस घर का ताला खोल दिया.

शाम को रीता ने आते ही मुझ से पूछा, ‘‘क्या हुआ मां, आज आप सत्संग से देर में आईं? सब ठीक है न, औटो नहीं मिला था क्या?’’ रीता का इस तरह के सवाल करना मुझे अच्छा नहीं लगा. मन में आया कि कह दूं कि मैं नौकरानी हूं क्या, जो अपने 1-1 पल का हिसाब दूं? पर मैं चुप रही.

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रीता फिर बोली, ‘‘क्या बात है मां, आप की तबीयत ठीक नहीं क्या या कोई और बात है?’’

‘‘नहीं, बस थोड़ा सिरदर्द है,’’ इस से ज्यादा मेरा कुछ कहने का मन ही नहीं हुआ. रात को सूरज भी कमरे में आया पर मैं जानबूझ कर आंखें बंद किए रही ताकि उसे लगे कि मैं सो रही हूं. सारी रात अजीब कशमकश. मेरी सहेलियां जो कह रही थीं वह मुझे सच सा लग रहा था. सही तो कह रही थीं. अगर मैं मयंक का ध्यान न रखूं तो क्या रीता काम पर जा पाएगी? घर की ओर से बेफिक्री सिर्फ मेरी वजह से ही तो है. सच में रीता ने मुझे घर का चौकीदार बना दिया है. कल मैं कह दूंगी सूरज से कि अपने बेटे की जिम्मेदारी खुद उठाओ. अब मुझे मेरे हिसाब से जीने दो. सच ही तो है, कहीं भी जाना हो रीता के हिसाब से जाना होता है. सूरज की और अपनी कमाई का हिसाब रीता ही रखती है. सूरज उसी से पैसे लेता है. मुझे भी सत्संग आनेजाने या दान के पैसे उस से ही मांगने पड़ते हैं. कल तक मेरी सास ने घर अपने हाथ में लिया हुआ था आज रीता ने… मैं तो कल भी नौकरानी थी और आज भी. मेरी आंखों से आंसू भी बहने लगे. यही सोचसोच कर मैं रात में न जाने कब सो गई पता ही नहीं चला. सुबह रसोई में खटरपटर की आवाज से नींद खुल गई. घड़ी पर नजर गई तो 8 बज चुके थे. हाय इतनी देर तक सोती रही. फिर पलंग से उठी तो ऐसा लगा जैसे सिर पर किसी ने सौ किलोग्राम का भार रख दिया हो. कल रात भर सोचती रही शायद इसीलिए झूठ का सिरदर्द सच हो गया. मयंक तो स्कूल चला गया होगा, सोचती मैं जल्दीजल्दी बाहर आई तो देखा रीता रसोई में थी. मुझे देख कर बोली, ‘‘मां आप जाग गईं, आप की तबीयत कैसी है? आप बैठिए, मैं आप के लिए अदरक वाली चाय बना कर लाती हूं,’’ कह कर रीता चाय बनाने लगी.

तभी सूरज भी आ गया और बोला, ‘‘मां आप का सिरदर्द कैसा है?’’ मैं ने कुछ न कहा तो वह फिर बोला, ‘‘मां लगता है तबीयत ज्यादा खराब है. रीता, आज मां को डाक्टर को दिखा आना.’’

‘‘आप फिक्र मत करो मैं दिखा आऊंगी,’’ रीता ने मुझे चाय पकड़ाते हुए कहा.

‘‘क्यों तुम्हें आज औफिस नहीं जाना?’’ मैं ने रीता से पूछा.

‘‘नहीं मां, आप की तबीयत ठीक नहीं, इसलिए मैं ने आज छुट्टी ले ली,’’ रीता कहती हुई रसोई में चली गई. ‘हां अगर मैं बीमार हो गई तो घर की रखवाली कौन करेगा?’ मैं ने मन ही मन सोचा. थोड़ी देर बाद हम डाक्टर के पास थे. रीता परची कटवाने के लिए लाइन में लगी थी और मैं एक ओर रखी बैंच पर बैठ गई. तभी एक जानापहचाना चेहरा सामने वाली बैंच पर बैठा नजर आया. क्या यह शिखा है? नहींनहीं श्खि तो लखनऊ में रहती है. लग तो यह शिखा ही रही है, यह सोच कर मैं अपनी जगह से उठ कर उस के पास चली गई. और उस से बोली, ‘‘शिखा… तुम शिखा ही हो न? पहचाना मुझे, मैं शारदा…’’

‘‘अरे शारदा तू,’’ कहते ही वह मेरे गले से लग गई. कितने सालों बाद देखा तुझे. कैसी है तू और तेरा छोटू सूरज कैसा है?’’ शिखा खुशी से मानो उछल ही पड़ी.

‘‘सूरज ठीक है, अब तो उस का छोटू भी हो गया. मयंक नाम रखा है उस का.’’

‘‘अरे वाह, बड़ा प्यारा नाम है,’’ वह बोली.

‘‘हां वह तो है, मैं ने जो रखा है उस का नाम. तू सुना, तू यहां कैसे?’’ मैं ने उस ने पूछा.

‘‘मैं पिछले 2 सालों से यहां हूं और एक वृद्ध आश्रम चला रही हूं. चला क्या रही हूं समझो अपना टाइम पास कर रही हूं.’’

‘‘मतलब…?’’ मैं ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘तू तो जानती है मैं ने शादी नहीं की. सारी उम्र तो अच्छे से गुजर गई, खूब कमाया पर अब समझ में आया कि जो कमाया वह साथ तो ले कर जाना नहीं, तो थोड़ी सेवा ही की जाए. बस कुछ सालों से समाजसेवा कर रही हूं और पिछले 2 सालों से तेरी उम्र के लोगों की देखभाल कर रही हूं, जिन के बच्चे उन्हें अपने साथ नहीं रखते. कुछ तो ऐसे हैं जो अपने बच्चों के साथ नहीं रहना चाहते. बस उन्हीं में से कुछ को यहां ले कर आई थी,’’ बता कर उस ने साथ बैठे कुछ लोगों की ओर इशारा किया. बैंच पर बैठे उन लोगों की ओर देख कर मेरा मन बैठ सा गया. जरा देखो तो कैसे बच्चे हैं, अपने मांबाप को नहीं रख सकते. भला हो शिखा का जो इन की देखरेख कर रही है.

‘‘अरे तू तो बहुत नेकी का काम कर रही है,’’ मैं ने खुशी से कहा.

‘‘बिलकुल. मेरे पास पैसा था. मेरे रिश्तेदारों ने मुझे बहुत बहलाने की कोशिश की पर मैं ने बस अपने मन की सुनी और इस काम में लग गई. तू भी कभीकभी आया कर. उन लोगों से बात कर. इस से उन को भी अच्छा लगेगा और तुझे भी.’’

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‘‘मां परची कटवा ली. चलो नंबर आने ही वाला है,’’ रीता ने तभी आ कर कहा.

‘‘शिखा, ये मेरी बहू है रीता… रीता, ये मेरी बचपन की सहेली है, शिखा.’’ रीता ने पैर छू कर शिखा को प्रणाम किया, तो शिखा बोली, ‘‘अरे शारदा, तेरी बहू तो बहुत सुंदर है और संस्कारी भी वरना आजकल बच्चों के पास कहां टाइम है जो अपनी सास को ले कर अस्पताल तक आएं. चल अब तू जा. पर हां, ये मेरा नंबर ले ले. फोन करती रहना.’’ डाक्टर को दिखा कर हम घर आ गए. रीता ने कहा कि मां तुम थोड़ा आराम कर लो, तो मैं अपने कमरे में चली गई. आज शिखा से मिल कर मन बहुत खुश हुआ. कितना पुराना रिश्ता था. मेरी शादी में सब से आगे थी वह और जब सूरज के पापा मुझे छोड़ कर गए तो भी मेरे आंसू पोंछने में वह सब से आगे थी. पर फिर एक दिन नौकरी के लिए लखनऊ चली गई और मैं अपनी ससुराल में उलझ कर रह गई. अचानक मन बहुत सालों पीछे चला गया. सूरज सिर्फ 5 साल का था जब सूरज के पापा मुझे छोड़ कर इस दुनिया से चले गए थे. सूरज के दादादादी ने उपकार किया, जो अपने घर में जगह दी. पिताजी ने मुझे अपनी बेटी माना पर माताजी ने हमेशा मुझे पराई ही समझा. हर पल एहसास दिलाया कि मुझे उस घर में सिर्फ सूरज के कारण रहने दिया जा रहा है. बातबात पर माताजी, ‘यह मेरा घर है मेरे हिसाब से चल’ जैसे वाक्यों का प्रयोग कर के मेरे आत्मविश्वास को हिलाती आई थीं. सूरज भी उन की परवरिश में पलाबढ़ा. उस ने भी कभी किसी चीज में मेरी राय तो दूर उसे मुझे बताना भी जरूरी नहीं समझा. सासससुर मरने से पहले अपना सब कुछ सूरज के नाम कर गए. उस के बाद तो सूरज की जो मरजी हुई वह उस ने किया. जब उस ने रीता से शादी का फैसला किया तब भी मेरी नाराजगी को नजरअंदाज किया. पर रीता ने पहले दिन से मुझे सम्मान दिया. घर की छोटीछोटी बातों में मेरी राय ली और सूरज को भी मेरे करीब लाई. पहली बार मैं मौल भी तो उसी के साथ ही गई थी. फिल्म देखने का मुझे बहुत शौक था. जब उसे इस बात का पता चला तो महीने में 2-3 फिल्में दिखाने ले जाती. रीता एक तरह से मेरी बेटी जैसी बन गई. इतने सालों से सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था पर अचानक कल सत्संग में नीरजा और शीला की बातों से मैं क्याक्या सोचने लगी. कैसी पागल हूं मैं… मेरी नजरों के सामने शिखा के साथ आए वे लोग घूमने लगे जिन के बच्चों ने उन्हें आश्रम में रहने के लिए मजबूर किया था. मेरा मन कांप गया कि मैं मूर्ख बन कर रिश्तों की डोर को किसी की बातों में आ कर खींच रही थी. अच्छा हुआ कि समय रहते अक्ल आ गई.

मैं झट से उठी और रसोई में जा कर रीता से बोली, ‘‘रीता, अब मेरी तबीयत ठीक है. तू ने छुट्टी ली है तो चल शाम को बाजार से गोवा जाने के लिए थोड़ी खरीदारी ही कर आते हैं.’’ मेरी बात सुन कर रीता ने छोटे बच्चे की तरह मुझे गले लगा लिया.

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