आत्महत्या समस्या का समाधान नहीं

मार्च 2020 में कर्ज न चुका पाने के कारण हैदराबाद के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने अपनी पत्नी और 2 बच्चों की हत्या करने के बाद खुद भी आत्महत्या कर ली. मरने से पहले अपने पित को संबोधित कर लिखे गए सुसाइड नोट में इंजीनियर ने अपनी आत्महत्या की वजह बढ़ रहे कर्ज के बोझ को बताया है. उस ने एक हाउसिंग फाइनेंस कंपनी से 22 लाख का होम लोन लिया था. इस के अलावा घर बनाने और बिजनेस शुरू करने के लिए भी बहुत सारे लोन ले रखे थे. उस के शब्दों में, ‘मैं ने कभी नहीं सोचा था कि मैं इस तरह कर्ज के जाल में फंस जाऊंगा. एक कर्जदार तो बारबार मुझे फोन करने लगा है. जब कि मैं घर को बेच नहीं सकता क्यों कि घर के साथ मेरी मां की यादें जुड़ी हुई है. मैं अपनी पत्नी और बच्चों को आप के ऊपर भार बना कर भी नहीं छोड़ सकता. इसलिए मैं ने उन्हें अपने साथ ले जाने का फैसला लिया है. यह मेरा आप के लिए अंतिम संदेश है.”

इस घटना की जानकारी परिवार वालों को तब लगी जब मृतक की पत्नी का भाई जो खुद एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, ने कई दफा दरवाजा खटखटाया मगर वह नहीं खुला. तब उस ने पुलिस को सूचना दी और घर के अंदर से चारों लाशों को बरामद किया गया.

उसी दिन मुंबई में भी ऐसी ही एक घटना सामने आई जब पतिपत्नी के साथ उन की 3 साल की छोटी सी बिटिया को मृत अवस्था में उन के ही घर से निकाला गया. पुलिस के मुताबिक यह हत्या के बाद आत्महत्या का मामला है. लाश के पास एक सुसाइड नोट मिला है  बात का उल्लेख है कि परिवार में मौजूद 13 लोगों की वजह से उन्हें यह कदम उठाना पड़ा है. सुसाइड नोट के मुताबिक़ परिवार के कुछ सदस्य उन्हें प्रॉपर्टी के मसलों पर परेशां करते थे. नोट में मृतक ने अपनी पत्नी की जूलरी दान करने को कहा है. पुलिस का मानना है कि दंपत्ति ने आत्महत्या करने से पहले बेटी का मर्डर किया और फिर मरने से पहले महिला ने भी सोशल मीडिया के जरीये अपने परिवार के साथ इस सुसाइड नोट को शेयर किया.

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दुनिया में हर साल 8 लाख यानी हर घंटे 92 लोग खुदकुशी करते हैं. यह खुलासा विश्व स्वास्थ्य संगठन और मेंटल हेल्थ कमीशन ऑफ कनाडा की रिपोर्ट में हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में दुनिया में 15-29 साल की उम्र के जितने लोगों की मौत हुई, उन में अधिकांश ने खुदकुशी की थी.

नैशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक़ भारत में पिछले 10 वर्षों में देश भर में आत्महत्या के मामले 17.3 % तक बढ़े हैं.

नेशनल हेल्थ प्रोफाइल-2018 की रिपोर्ट के अनुसार इस दौरान भारत में 1.35 लाख लोगों ने खुदकुशी की. रिपोर्ट के मुताबिक खुदकुशी करने वालों में 80 फीसदी यानी 6.4 लाख लोग कम और मध्यम आय वाले देशों के थे. दुनिया के करीब 38 देशों ने खुदकुशी जैसे अपराध रोकने की रणनीति बनाई है.

अचरज तो तब होता है जब मरने से पहले लोग अपने ही हाथों अपनी संतान की जीवनलीला समाप्त कर डालते हैं. आखिर किसी मासूम की जिंदगी का फैसला लेने का हक़  उन्हें किस ने दे दिया.

आत्महत्या की कोशिश करने वालो के दिमाग में क्या चलता है

ऐसे लोगों को लगता है जैसे कि तमाम दुख, तकलीफें, खुशियां, असंतुष्टि, नेम, फेम या बदनामी का अस्तित्व तभी तक है, जब तक सांसें चल रही हों. एक बार दम निकला नहीं कि सब कुछ ख़त्म हो जाता है.

मरने वाला आदमी जीने की जद्दोजहद में लगी दुनिया को मूर्ख समझने लगता है. उसे लगता है कि ये लोग कितने बेवक़ूफ़ हैं जो ज़िंदगी जैसी फ़ालतू चीज़ के मोह में पड़े हैं. उसे खुद के फैसले पर गर्व होता है कि उस ने बेवक़ूफ़ होना कबूल नहीं किया.

उसे लगता है कि मर जाना ही उस के लिए इकलौता और बेहतरीन हल है. इस से वह एक झटके में अपनी साड़ी परेशानियों से निजात पा जाएगा.

वह पहले ख़ुदकुशी कर चुके लोगों के बारे में जानकारियां जुटाता है. उन के फैसले के साथ खुद को रिलेट करता है. सुसाइड को बहादुरी का तमगा देने लगता है.

लोगों से बहस भी करता है कि कैसे जान देना कायरता नहीं बल्कि बहादुरी है. बहुत हौसले का काम है.

एक बार मरने का फैसला कर लेने के बाद वह तरीकों की खोज शुरू करता है. ज़हरखाना, फांसी पर लटकना, बिल्डिंग से कूदना, रेल की पटरी से कटना, आग लगा लेना जैसे तमाम विकल्पों के बारे में संजीदगी से सोचता है. वह मरने के बाद बदसूरत नहीं दिखना चाहता. साथ ही यह भी चाहता है कि मौत दर्दरहित हो. जो भी होना है बस जल्दी से हो जाए.

उस के लिए सब से दिलचस्प हिस्सा होता है उन संभावित प्रतिक्रियाओं के बारे में सोचना जो उस की मौत की ख़बर सुन कर आएंगी. करीबी दोस्तों और परिजनों के बारे में सोचता है कि फलां दोस्त या फलां रिश्तेदार क्या सोचेगा और क्या कहेगा. किसे कितना शॉक लगेगा!

उस के दिमाग में जो सब से बड़ा सवाल होता है वह उन जिम्मेदारियों का होता है जो उस के कंधों पर होती हैं. उस के मरने के बाद उस के परिवार और खासकर बच्चों का क्या होगा यह ख़याल उसे सब से ज़्यादा विचलित करता है.

वह अपने सुसाइड नोट को दिलचस्प बनाना चाहता है. इस के लिए तरहतरह के शब्दों और वाक्यों का प्रयोग खोजता है जिन का प्रयोग वह अपने सुसाइड नोट में कर सके.

वह अपने फैसले को जायज़ ठहरा कर जाना चाहता है. इस के लिए अपना जीवन निरर्थक साबित करने की ढेर सारी दलीलें इकट्ठी करता है.

सीजोफ्रेनिया भी है एक महत्वपूर्ण वजह

आधुनिक व्यस्त जीवनशैली और दौड़भाग भरी जिंदगी के कारण बढ़ता तनाव, पारिवारिक उलझनें, धोखेबाजी, अकेलापन आदि वजहों से लोग सीजोफ्रेनिया की चपेट में तेजी से आ रहे हैं.

आंकड़ों पर गौर करें तो देशभर में करीब 30 करोड़ लोग मानसिक रोग से ग्रसित हैं. उपचार के बाद मनोरोग को पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है लेकिन जागरूकता का अभाव सब से बड़ी परेशानी बन गई है. कान में अजीबोगरीब आवाजें आना, एकांत ढूंढना, गुस्सा अधिक आना और बेवजह का शक करना, ये कुछ ऐसे लक्षण हैं जो सिजोफ्रेनिया बीमारी का संकेत देते हैं. 15 से 25 साल में होने वाली यह बीमारी आम मानसिक बीमारियों से काफी अलग है. खास बात यह है कि इस बीमारी में मरीज को पता ही नहीं होता है कि वह सिजोफ्रेनिया ग्रसित है. इस में मरीज को ऐसी चीजें दिखाई व सुनाई देने लगती हैं जो वास्तविकता में है ही नहीं. जिस की वजह से वो बेतुकी बात करता है और समाज से कटने का प्रयास करता है. ऐसे में मरीज का सामाजिक व्यक्तित्व पूरी तरह से खत्म हो जाता है. कुछ मामलों में मरीजों में आत्महत्या की भावना भी पैदा हो जाती है.

आत्महत्या की प्रवृत्ति वाले सीजोफ्रेनियाग्रस्त मरीजों को अकेले नहीं छोड़ना चाहिए. इस बीमारी में एंटी सायकेट्रिक दवाएं एवं इलेक्ट्रिक शॉक ट्रीटमेंट बहुत फायदेमंद साबित होता है. उपचार में देरी या अनियमितता से बीमारी उग्र एवं लंबी अवधि की हो जाती है. तीन से छह माह के निरंतर उपचार के बाद ही इसका फायदा दिखता है. एक अनुमान के मुताबिक भारत की करीब 1.2 प्रतिशत आबादी सीजोफ्रेनिया से ग्रस्त है. हर एक हजार वयस्क लोगों में से करीब 12 लोग इस बीमारी से पीड़ित होते हैं. देशभर में जितनी आत्महत्याएं हो रही हैं, उनमें 90 प्रतिशत के पीछे मुख्य कारण इसे ही माना गया है.

सबसे अधिक जहर खाकर मरते हैं लोग

मरने वालों में सब से अधिक 20 फीसदी लोग जहर खाकर खुदकुशी करते हैं. ऐसा करने वालों में सब से अधिक कम और मध्यम वाले देशों में ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग और किसान होते हैं. इसके अलावा मौत को गले लगाने के लिए लोग फांसी और आग भी लगा लेते हैं.

लोग आत्महत्या क्यों करते हैं

अपना जीवन समाप्त कर लेने का ख़्याल आने के कई कारण हो सकते हैं. जैसे-

* उस इंसान को लगता है कि ज़िंदा रहने का कोई मतलब नहीं है. उस के मन में नकारात्मक विचार हावी होने लगते हैं और अपना जीवन बहुत दुख भरा लगने लगता है.

* धीरेधीरे उन्हें लगने लगता है कि उन के आसपास के लोग उन्हें पसंद नहीं करते. कोई उन से प्यार नहीं करता.

* आत्महत्या ही उन्हें अपने दर्द से मुक्ति का एकमात्र उपाय नजर आता है. ऐसे लोग अक्सर अवसाद ग्रस्त होते हैं.

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* पैनिक अटैक और दूसरों पर ख़ुद को बोझ समझने की भावना भी यह क़दम उठाने को उकसाती है.

* भारत में अभी भी प्रेम संबंध आत्महत्या करने का एक बड़ा कारण हैं. आधुनिकता का दम भरनेवाला समाज अभी भी प्रेम संबंधों के मामले में बहुत रूढ़िवादी है.

* कभीकभी लोग क्रोध, निराशा और शर्मिंदगी से भर कर भी ऐसा क़दम उठाते हैं.

* जो लोग असल ज़िंदगी में लोगों से मिलनेजुलने के बजाय वर्चुअल वर्ल्ड में अधिक समय बिताते हैं वे भी इस मानसिकता का शिकार बन सकते हैं.

* समाज द्वारा ठुकराए लोगों में भी ऐसी प्रवृति विकसित होने लगती है.

* अकेलेपन और अवसाद का सामना कर रहे लोग भी इस के आसान शिकार हो जाते हैं.

* जिन लोगों को कोई असाध्य बीमारी हो जाती है, वे भी निराशा के दौर में यह क़दम उठा लेते हैं.

* शराब और ड्रग्स जैसे नशे के आदी लोग भी अक्सर आत्महत्या की तरफ प्रवृत होते हैं.

* कभीकभी आर्थिक और भावनात्मक चोट के बाद भी लोग आत्महत्या के बारे में सोचने लगते हैं.

जिन लोगों के मन में लगातार इस तरह के नकारात्मक विचार चलते रहते हैं उन्हें ठीक से नींद नहीं आती.

उन का आत्मविश्वास कम हो जाता है.

आमतौर वे लोग अपने फ़िज़िकल अपियरेंस को लेकर उदासीन हो जाते हैं. उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वे कैसे दिख रहे हैं.

वे लोगों से कटने लगते हैं.

कई बार वे ख़ुद को छोटामोटा नुक़सान भी पहुंचाते हैं.

क्या करें यदि आप के मन में ऐसे विचार आते हों

* सब से पहले आप एक लंबा ब्रेक लें और अपनी ज़िंदगी को खुल कर जीने का प्रयास करें.

हमारी ज़्यादातर समस्याएं अस्तव्यस्त ज़िंदगी और ग़लत जीवनशैली के चलते पैदा होती हैं. अपनी जीवनशैली में बदलाव लाएं. ख़ुद पर ध्यान देना शुरू करें. खानपान को संतुलित करें. व्यायाम, स्विमिंग ,जॉगिंग जैसी गतिविधियों के लिए समय निकालें.

* नकारात्मक सोच से दूर रहे. उन लोगों के साथ अधिक समय बिताएं जिन से मिल कर और बातें कर आप अच्छा महसूस करते हैं. नेगेटिव लोगों को अपनी ज़िंदगी से निकाल दें.

* कोई भी समस्या ऐसी नहीं होती जिस का समाधान नहीं है. कुदरत एक दरवाजा बंद करता है तो दूसरा खोल भी देता है. बस जरुरत है दूसरी तरफ आशा भरी नजरों से देखने की.

* जीवन में कितना भी घाटा क्यों न हो, जिंदगी में तकलीफें भी कितनी ही क्यों न हों, यदि हौसला कायम रखा जाए और धैर्यपूर्वक दिमाग का उपयोग किया जाए तो हर समस्या से उबरा जा सकता है.

* अपनी हॉबीज को जिन्दा कीजिये. मन खुश करने वाले काम कीजिये.

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* हॉरर और इमोशनल फ़िल्में न देखें. हलकीफुलकी कहानियां और नॉवेल पढ़ें. गाने सुन कर मूड को फ्रेश रखें.

* यदि आप दुख और अवसाद महसूस कर रहे हैं तो उन दोस्तों से बात करें जिन से बात कर आप को अच्छा लगता है. जिन के सामने आप अपने दिल की बातें बयां कर सकते हों. उन्हें बताएं कि आप को क्या महसूस हो रहा है. वे आप को चीज़ों को देखने की नई दृ‌ष्टि दे सकते हैं. कोई रास्ता बता सकते हैं.

* आत्महत्या की भावना मन में आ रही हो तो भूल कर भी अकेले न रहें. परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताएं. कहीं घूमने का प्लान बनाएं. नई जगह जाने से आप तरोताज़ा महसूस करेंगे.

* जरुरत लगे तो किसी मनोचिकित्सक से मिलने में संकोच न करें.

आखिर क्यों आत्महत्या कर रहे हैं हमारे स्टूडेंट्स

भारत में हर घंटे एक स्टूडेंट आत्महत्या कर रहा है. हम उन देशो में से एक हैं जिनमें 15 से 29 साल के लोगो के बीच आत्महत्या की दर अधिकतम हैं. मुख्यतः भारत में इन आत्महत्याओं की वजह शिक्षा से संबधित तनाव को पाया गया हैं.

हाल ही में आई आई टी हैदराबाद के एक स्टूडेंट मार्क एंड्रू चार्ल्स ने पढ़ाई में खराब प्रदर्शन और नौकरी न मिलने के डर से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. मार्क ने आत्महत्या से पहले एक आठ पन्नो का सुसाइड नोट छोड़ा है जिसमें उन्होंने अपनी आत्महत्या की वजह खराब नंबर और अच्छी नौकरी न मिलने के डर को बताया है. आई आई टी हैदराबाद में स्टूडेंट द्वारा आत्महत्या का यह इस साल का दूसरा मामला हैं .

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हमारे देश के लगभग हर राज्य से स्टूडेंट्स द्वारा आत्महत्या की घटनाएं सामने आ रही हैं. सन 2016 में सभी राज्यों और यूनियन प्रदेशों द्वारा होम मिनिस्ट्री को भेजे गए एक लेटेस्ट डाटा के मुताबिक 9474 बच्चो द्वारा आत्महत्या कि गयी. जिसमें महाराष्ट्र और बंगाल जैसे राज्यों में स्टूडेंट्स द्वारा आत्महत्या करने का आकड़ा अधिक पाया गया.

गौर से अगर आप हमारी शिक्षा व्यवस्था और आत्महत्याओं के इन आकड़ो को देखेंगे तो पाएंगे कि यह सुसाइड नोट्स जो हमे प्रति घंटे देश के लगभग हर राज्य से प्राप्त हो रहे है. यह सुसाइड नोट्स नहीं बल्कि स्टूडेंट्स द्वारा संपूर्ण समाज को शिक्षा के प्रति स्टूडेंट्स पर असहनीय दबाव और बिगड़ती शिक्षा व्यवस्था कि तरफ एक संकेत पत्र हैं.

भारतीय शिक्षा व्यवस्था और समाज में अगर कोई बच्चा आई आई टी या एम्स जैसे बड़े संस्थानों में दाखिला नहीं ले पाता है तो उसे कमजोर या हारा हुआ माना जाता है . इस बात के चलते बच्चो पर पेरेंट्स द्वारा अच्छे नंबर लाने का दबाव प्राइमरी कक्षा से ही शुरू हो जाता हैं . अच्छे नम्बरो कि चाहत और आई आई टी, एम्स जैसे संस्थानों में दाखिला कराने के लिए पेरेंट्स अपने बच्चो को छोटी कक्षाओं से ही तैयार करने के लिए प्राइवेट कोचिंग भेजना शुरू कर देते हैं. जिस वजह से बच्चो को खेलने और ठीक से खाने तक का समय भी नहीं मिल पाता हैं .

महाराष्ट्र राज्य के मुंबई शहर में रहने वाले 9 वि कक्षा के स्टूडेंट सर्वेश मोघे बताते है कि कुछ बच्चो के घर से कोचिंग सेंटर्स बहुत दूर होने की वजह से वो अपने साथ स्कूल जाते समय ही तीन या चार टिफ़िन लेकर जाते है. क्यूंकि सुबह 7 बजे जब वो अपने घर से स्कूल  के लिए निकलते  है तो फिर रात 9 या 9: 30 तक घर पहुंचते है. आई  आई  टी जैसे कौलेज में भी अपने सहपाठियों से अव्वल आने के लिए और अंत में एक अच्छी जौब पाने कि होड़ में स्टूडेंट्स को १४ – १४ घंटे तक पढ़ना पड़ता  हैं . यह समय किसी कौर्पोरेट ऑफिस में कार्यरत व्यक्ति के काम करने के समय से भी ज्यादा है. इस तरह के शेड्यूल और वातावरण का स्टूडेंट के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर होता हैं .

पिछले कुछ सालो में सेंटर फौर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटी के एक सर्वे के मुताबिक भारत में 10 में से 4 स्टूडेंट अवसाद ग्रस्त हैं . पेरेंट्स कि इछाओ का दबाव, अपने सहपाठियों से कम्पटीशन और इस नम्बरो कि अंतहीन दौड़ में भागते हुए स्टूडेंट्स कई बार अपने तनाव और डर को किसी से भी नहीं बाँट पाते और आत्महत्या का रास्ता चुन लेते हैं .

हमारे शिक्षण संस्थानों और यहां तक कि समाज में भी मानसिक स्वस्थ्य को बहुत ही काम महत्व दिया जाता है . जिसकी वजह से बच्चे उनके सामाजिक जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना नहीं कर पाते है. लगभग हर घर में बच्चो पर अधिक से अधिक नंबर लाने और अच्छी से अच्छी नौकरी को पाने का दबाव बनाया जाता हैं . अगर कभी पेरेंट्स को बच्चे के मनोवैज्ञानिक रोग से ग्रस्त होने का पता चलता हैं तब भी वे समाज के डर से बहुत समय तक अपने बच्चे को मनोवैज्ञानिक उपचार नहीं देते और उसके मानसिक स्वास्थ्य को छुपाते रहते है . इस से भी स्टूडेंट्स का मानसिक स्वास्थ्य और बिगड़ता जाता हैं .

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प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था देश के विकास में रीढ़ कि हड्डी मानी जाती थी, जिसमे मानसिक, शारीरिक और बौद्धिक तीनो बातो पर ध्यान दिया जाता था . आज भी हमारे कौलेज एवं शिक्षण संस्थानों को इसके लिए उचित प्रयास करने चाहिए ताकि बच्चो को उनके शिक्षण संसथान में ही मनोवैज्ञानिक रूप से स्वस्थ वातावरण मिल पाए . बच्चो के पेरेंट्स और प्रशासन को भी स्टूडेंट के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो कर कदम उठाने होंगे .

जौब के विषय में प्लेसमेंट कंपनियों को अपने प्लेसमेंट क्राइटेरिया को सिर्फ अच्छे नम्बरो तक ही सिमित नहीं देखकर उनकी योग्यता को आधार बनाना चाहिए . यू एस के कई राज्यों में स्टूडेंट से उसकी पिछली सैलरी और ग्रेड्स पूछना क़ानूनी अपराध के अंतर्गत आता है . भारत में भी इसी तरह के कदम उठाये जा सकते है. जिस से स्टूडेंट्स में तनाव कम हो और वो निश्चिन्त होकर अपनी योग्यता के आधार पर जौ   ब पा सके.

आशा है कि भविष्य में सावधानी बरतते हुए ऐसे ही कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाकर, हम भारत के भविष्य को एक चिंतामुक्त और खुशहाल जीवन जीने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करेंगे.

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