इंसानी फितरत है कि उसे दूसरों का दुख, दूसरों का दर्द, दूसरों के संघर्ष को देखने में आनंद मिलता है. इसी इंसानी फितरत को ध्यान में रखकर विक्रमादित्य मोटवाणे रोमांचक फिल्म ‘‘ट्रैप्ड’’ लेकर आए हैं. मगर फिल्म देखकर कहीं भी फ्लैट के अंदर कैद इंसान का दर्द या दुख उभरकर नहीं आता है, बल्कि फिल्म का नायक शौर्य जिस तरह के कदम उठाता है, उसे देखकर लगता है कि वह सिरे दर्जे का बेवकूफ या विवेक शून्य इंसान है.

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