बौलीवुड के कलाकार सालों से खुद को हर क्षेत्र में आजमाते आ रहे हैं. दर्शकों ने उन के इस हुनर को स्वीकार भी किया है. 1950 के बाद से पार्श्वगायन को अधिक महत्त्व दिया गया, जिस में अभिनेता या अभिनेत्री गाना न गा कर केवल होंठ हिलाते थे. दरअसल, पार्श्वगायक बढि़या गाना तो गा सकते थे, पर अभिनय नहीं कर पाते थे और फिर न ही वे देखने में सुंदर होते थे. फिल्म निर्माता, निर्देशकों ने इस विधि से काफी फिल्में बनाईं, जो जबरदस्त हिट रहीं.

उस समय के कुछ खास कलाकारों जैसे किशोर कुमार, के.एल. सहगल, सुरैया और नूरजहां आदि ने गायकी के साथसाथ अभिनय में भी नाम कमाया.

इस के बाद एक दौर ऐसा आया जब गाने पूरे न गा कर केवल कुछ शब्दों को हीरो या हीरोइनें गाया करती थीं. इन में वैजयंती माला की फिल्म ‘संगम’ का गाना ‘बोल राधा बोल संगम...’ और श्रीदेवी की फिल्म और ‘चांदनी’ का गाना ‘ओ मेरी चांदनी...’ आदि शामिल थे.

इस तरह हर समय सितारों ने नएनए प्रयोग किए और अपनी आवाज में गाने गाए. इन में अभय देओल, अजय देवगन, अमिताभ बच्चन, आमिर खान, अभिषेक बच्चन, अमरीशपुरी, फरहान अख्तर, रितिक रोशन, प्रियंका चोपड़ा, शाहरुख खान, सलमान खान आदि हैं.

क्रैडिट तकनीक को

ऐसा माना जाता है कि अगर कलाकार फिल्म में अपनी आवाज में गाना गाता है तो दर्शकों को उस का मजा अधिक आता है, क्योंकि फिल्म में उस के डायलौग और गाना दोनों ही एकजैसे होते हैं. इस बारे में संगीत निर्देशक विवेक प्रकाश कहते हैं, ‘‘पहले के और अब के गानों में अंतर आ चुका है. पहले गाना सिचुएशन के हिसाब से लिखा जाता था और फिर ट्यून दी जाती थी. फिर गाना प्लेबैक सिंगर गाता था. अब पहले सुर दे दिया जाता है. फिर गीतकार अपनी पंक्तियां सुर को ध्यान में रख कर लिखता है. बाद में उसे सिचुएशन के हिसाब से फिट कर दिया जाता है.

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