प्रतिभा श्रीवास्तव अंश

अम्मा,

मां, जिसे मैं अम्मा कहती हूं. आज जब उन पर लिखने बैठी तो समझ ही नहीं पा रही क्या लिखूं, कहां से शुरुआत करूं. मेरी मां ने स्कूली शिक्षा प्राप्त नहीं की, पर उनका ज्ञान व अनुभव कमाल का है. स्वभाव से अनुशासन-प्रिय व समाज सेवा के लिए तत्पर रहने वाली मेरी अम्मा बेटे-बेटियों में कभी भेद-भाव नही करती हैं. घरेलू कार्य हो या बाहर का वो हम भाई-बहन दोनों से करवाती हैं. घरेलू नुस्खें से लेकर गीता के उपदेश भी उन्हें कंठस्थ याद है. आज मुझे मेरे बचपन का एक वाक्या याद आ गया. जो मैं आपसे शेयर करने जा रही हूं.

ये भी पढ़ें- मदर्स डे स्पेशल: मां ही मेरी पूरी दुनिया हैं…

अम्मा ने दी जीवन की सीख...

उस समय मैं कक्षा पहली में थीं और मैनें एक पेंसिल चुराई थी. जब उनको मालूम पड़ा तो मेरी खूब धुलाई हुई थी और बाद में उस पेंसिल के साथ एक और पेंसिल मैं खुद लौटाने गई थी. अम्मा कहती है कि पहली गलती पर ही रोक लगा दो. अम्मा यह भी कहती हैं कि छोटी गलतियों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, अगर छोटी गलती पर ही रोक दें. तो बड़ी गलती होगी ही नही...

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...