आज  के तकनीकी युग में तकनीक के बिना जीना बेहद मुश्किल है. भागदौड़ वाली जिंदगी में हर व्यक्ति अपने तकनीकी दौर से गुजर रहा है जहां मोबाइल और तकनीक ने रिश्तों की परिभाषा में बदलाव ला दिया है. बड़ेबुजुर्ग, मातापिता या अभिभावक. सभी ने अपनी सुविधा के अनुसार बच्चों के लालनपालन का तरीका बदल दिया है, जिस में अपनी व्यस्तता व सुविधा के अनुसार बच्चों को चुप कराने के लिए हाथों में मोबाइल दे दिया. वे बच्चों को चुप कराने के लिए उन्हें व्यस्त रखने के लिए उन की जिज्ञासाओं को शांत करने से बचने के लिए मोबाइल को हथियार बनाते चले गए और जेन जी की यही सब से बड़ी शिकायत बन गई है.

आज के समय में मोबाइल बुनियादी जरूरत है. यह सिर्फ संवाद का ही नहीं अपितु मनोरंजन और त्वरित जानकारी देने का साधन भी है. लेकिन जब यही साधन बिना सोचेसम?ो बच्चों के हाथों में थमा दिया जाता है तो उस के दुष्परिणाम सामने आने लगते हैं और यही दुष्परिणाम आज हमारी जेन जी पीढ़ी फेस कर रही है.

तकनीकी साधन ने उन के बचपन की सब से सुंदर पूंजी जिस में सामाजिकता कल्पनाशक्ति और सहज आनंद शामिल था उस की जड़ों को खत्म कर दिया है. बच्चे प्रश्न पूछें या खेल खेल कर शोर करें उन्हें शांत करने का सब से आसान उत्तर बड़ी पीढ़ी को मोबाइल ही लगा. उन्होंने अपनी सुविधानुसार बच्चों को मोबाइल के संग उन की दुनिया में छोड़ दिया. इस से बच्चों की जिज्ञासा शांत होने के बजाय सीमित ज्ञान तक केंद्रित होने लगी. जहां रिश्तों में आपसी सम?ा, गरमाहट और प्यार की जरूरत है उसे भला मोबाइल कैसे दे सकता है?

मातापिता अपनेअपने मोबाइल में मग्न हैं. वे अपनी नौकरी, अपनी किट्टी पार्टियों में अपना जीवन जी रहे हैं. भागते हुए समय में उन्होंने अपनी बौडिंग को बच्चों के साथ नहीं बढ़ाया. उन्होंने बच्चों को मोबाइल और आया के भरोसे छोड़ दिया है, जिस के दुष्परिणाम आज सामने हैं. परेशानियां आने पर ये युवा अडिग नहीं रहते हैं अपितु बिखर जाते हैं. न रिश्तों की सोंधी महक उन के पास होती है न ही सही मार्ग दिखाने वाले दोस्त. इस के कई दुष्प्रभाव और परिणाम सामने आए हैं

जेन जी की शिकायत बड़ों से

राजीव अपनी मम्मी से बहुत गुस्से में बात कर रहा था कि आप ने हमारे लिए किया किया है? आप के कारण ही हमारा स्वास्थ्य खराब हुआ है. आप ने बचपन में ही हमें मोबाइल दे दिया, हमें खेलने के लिए बाहर नहीं जाने दिया. हमारी पूरी दुनिया मोबाइल में बीत गई. क्या आप ने कभी सोचा है कि मोबाइल ने हमारी आंखों की रोशनी खराब की है? हमारे सपनों की उड़ान को कम कर दिया? आज अकेलापन हमारे पास है. आप ने तो हमें कभी समय नहीं दिया. आप अपनी ही दुनिया में मग्न थीं. आप को नौकरी करनी थी जो आप ने अपनी सुविधानुसार की. अब आप हम से बड़े होने के बाद उम्मीद क्या रखना चाहते हैं?

वहीं निशा ने कहा कि मेरे मातापिता दोनों ही नौकरी करते थे. पिता के कहने पर मां ने नौकरी छोड़ दी लेकिन हमें वक्त नहीं दिया. उन का समय उन की किट्टी पार्टियों, उन की मौजमस्ती में व्यतीत होने लगा. जब हमें दोस्तों की जरूरत थी हम घर में कैद थे. बचपन में हंसीठिठोली, मिट्टी में खेलना, दोस्तों के साथ भागना दौड़ना, कभी किया ही नहीं. मेरे दोस्त के दादा दादी कहानी सुनाते थे, मेरा भी मन होता था लेकिन मेरे पास दादादादी नहीं थे. वे गांव में रहते थे और मां को भी उन का साथ पसंद नहीं था.

कहानी सुनने का बहुत मन होता था लेकिन मम्मी को कभी समय ही नहीं मिला. जब भी कुछ प्रश्न पूछो तो कहती थी चलो टीवी देख लो, मोबाइल में उत्तर मिल जाएगा. हमारा बचपन आया के साथ व्यतीत हुआ.

आया घर के काम करती थी और टीवी देखती रहती थी. मां ने भी कभी हमारी जिज्ञासाओं को शांत करने की कोशिश नहीं की. जब हम रोते थे तो हमें महंगे से महंगा गिफ्ट और मोबाइल हाथ में दे दिया. मोबाइल के कारण बचपन में ही शारीरिक कमजोरी आ गई. मानसिक तनाव

होने लगा, रील देखदेख कर चिड़चिड़ापन आ गया. आज हम बहुत सी चीजों में पिछड़ रहे हैं. इस का कारण हमारे मांबाप हैं. उन्हें तो हमें पैदा ही नहीं करना चाहिए था. आज हमारे जीवनको खराब करने के लिए हमारी बड़ी पीढ़ी जिम्मेदार है.

आशीष की अपने मातापिता से शिकायत है. उस का कहना है कि जब मुझे प्यार, सहारे और परिवार की जरूरत थी तब मेरा परिवार मेरे पास नहीं था. उन्होंने मुझे होस्टल भेज दिया. बस बड़ीबड़ी चीजें दिलाना, पैसे देना यही वे अपनी जिम्मेदारी समझते थे. मुझे तो याद है पापा जब घर में आते थे तो हमारे साथ खेलते भी नहीं थे. वे हमें डांटती रहते थे. मम्मी डाक्टर थीं तो उन्हें समय ही नहीं मिलता था. उलटा वे तो अपने काम भी हम से करा लेती थीं कि घर पर हो कपड़े उठा कर रखो, मोबाइल से चलो शौपिंग कर लो, बोलो क्या खाना है और्डर कर देते हैं. इस के अलावा तो कुछ नहीं किया.

मोबाइल देखदेख कर मेरी नजर खराब हो गई. मैं अकेला था. मेरी परेशानी समझने और बांटने वाला कोई नहीं था और मुझे दोस्त भी ऐसे नहीं मिले. जब मैं परेशान हो कर परिवार में अपनी समस्या बताना चाहता था तब सुनने वाला कोई नहीं था. यह तो सभी मातापिता करते हैं कि अपने बच्चों को सुविधा दें. इस में उन्होंने नया क्या कर दिया? आज मुझे बाहर जाने से डर लगता है. मेरे एक दोस्त ने अकेलेपन से परेशान हो कर आत्महत्या कर ली. जब मातापिता को हमारी जरूरत नहीं थी तो हमें पैदा ही क्यों किया? शायद हम उन की गलती से पैदा हो गए. उन्हें हमारी जरूरत ही नहीं थी.

मैं जब मोबाइल में लोगों की रेस देखता हूं तो मुझे फ्रस्ट्रेशन होती है. मैं बाहर जा कर बहुत कुछ करना चाहता हूं पर मैं क्या करूं मुझे डर लगता है.

स्वास्थ्य पर असर

मोबाइल का ज्यादा उपयोग करने से स्वास्थ्य पर घातक असर होता है जो धीरेधीरे शरीर को खोखला करता है. व्यवहार में बदलाव मोबाइल मित्रता का दुष्परिणाम है. चिड़चिड़ापन, अकेलापन और संवादहीनता के कारण बच्चों की दुनिया काफी हद तक सिमट गई.

नजर कमजोर होना, नींद पूरी न होना और शारीरिक निष्क्रियता से शारीरिक विकास पूर्ण नहीं होता और इस का स्वास्थ्य पर असर पड़ता है.

सीखने की क्षति

जब बटन की एक क्लिक से हमें अनगिनत सामग्री और हमारे सवालों के उत्तर मिलते हैं तो विकास कैसे होगा? मोबाइल का एक बटन हमारी जिज्ञासा को शांत तो करता है पर उस से हमारे विचारों की उड़ान और कल्पनाशक्ति को बेहद क्षति पहुंचती है.

मगर जब हम किताबें पढ़ते हैं और किताबों से सीखते हैं तो विकास की प्रक्रिया कुछ अलग होती है वहां कल्पनाशीलता बहुत ज्यादा होती है. जिज्ञासा बढ़ती है और सब से बड़ी बात आंखों को तकलीफ नहीं होती है. वहीं मोबाइल का साथ विचारों को कुंद करता है. त्वरित उत्तर पाने की चाह में मानसिक विकास रुक जाता है और इसी के कारण यह पीढ़ी खेलकूद और नई क्रिएटिविटी से दूर होती जाती है. आज हमें बदलाव की जरूरत है.

आज हम जेन जी बच्चे यह जानना चाहते हैं कि हमारी क्या गलती थी? हम अपने जीवन को किस तरह सुचारु रूप से आगे बढ़ाएं? न हमारे पास अनुभव है, न रिश्तों की सोंधी महक, न हम स्वास्थ्य को समझ सके क्योंकि शारीरिक रूप से हमें जो ऊर्जा चाहिए थी वह नहीं मिली.

मोबाइल के ज्ञान ने हमें पैक्ड फूड की तरफ आकर्षित कर लिया जिस से हमारे स्वास्थ्य पर घातक असर पड़ा. हमें अपने मातापिता से वह जुड़ाव नहीं है जो पुरानी पीढ़ी को होता था. आज यदि हम देखें तो हम बेहद अकेले हैं. यही कारण है कि हमारी जैनरेशन पहाड़ों पर घूमने भाग रही है.पर कितना भागेंगे और कैसे भागेंगे यह पुरानी पीढ़ी को समझना चाहिए था. उन्होंने हमें गरमाहट वाला घरौंदा नहीं दिया तो हम उन्हें वह घरौंदा कैसे दे सकते हैं? आज हमारी समस्या समझने वाला कौन है?

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