C-Section Myths : जब बात डिलीवरी की आती है तो सिजेरियन का नाम सुनते ही कई लोग भौंहें चढ़ा लेते हैं. कोई कहता है यह आसान रास्ता है, कोई इसे बनावटी मान लेता है कोई डॉक्टरों के लालच का अंजाम बताता है. पर हकीकत में सिजेरियन अक्सर मजबूरी होती है, शौक नहीं. आइए जानते हैं समाज ने सिजेरियन को बदनाम क्यों किया है और किन पुरानी सोचों की वजह से ऐसे में मां पर उंगली उठती है जबकि वह सच में सुरक्षित रास्ता चुन रही होती है.

सीजेरियन प्रसव को बदनाम होने के कई कारण हैं. ये कारण पुरानी सोच, अधूरी जानकारी और समाज के रवैये से जुड़े हैं.

दर्द न सहने का ताना

सामान्य डिलीवरी में  डिलीवरी के दर्द को औरत की सहनशक्ति का पैमाना माना जाता रहा है. जब कोई औरत ऑपरेशन से बच्चा पैदा करती है तो लोग कह देते हैं कि उसने दर्द नहीं सहा. उन्हें लगता है कि पेट काटना आसान रास्ता है. सी सेक्शन वाली माँ को सुनने को मिलता है: ‘ अभी तो तुमने कुछ किया ही नहीं हम तो 20 घंटे प्रसव पीड़ा में रहे. ‘ या फिर ‘अब तुम्हें उठने-बैठने में दिक्कत होगी, हम तो दूसरे दिन रोटी बेलने लगे थे.’

ये कम्पैरिजन गलत है. सच यह है कि ऑपरेशन के बाद घाव भरने में हफ्तों लगते हैं. उठना बैठना, खांसना, बच्चे को उठाना सब कठिन हो जाता है. पेट की 7 परतें काटना, एनेस्थीसिया लेना, 6 हफ्ते की रिकवरी – ये भी एक बड़ी सर्जरी है. पर “दर्द दिखता नहीं” तो लोग कम मानते हैं.

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शरीर और शर्म की बात

सी सेक्शन के बाद पेट पर निशान रहता है, 6 हफ्ते उठना-बैठना मुश्किल होता है. कुछ महिलाएं इसे “अपना शरीर खराब हो गया” जैसा फील करती हैं. ऊपर से लोग पूछते हैं “टांके कैसे हैं?”, “कब तक बेड पर रहोगी ऐसे में औरत गिल्ट में आ जाती है.

पैसा और लालच का शक

प्राइवेट हॉस्पिटल्स में ऑपरेशन से  डिलीवरी का खर्च नार्मल डिलीवरी से दोगुना होता है. साथ ही डॉक्टर समय तय कर सकता है, रात में जगना नहीं पड़ता और हॉस्पिटल का कमरा जल्दी खाली हो जाता है. इसलिए लोगों को लगता है कि डॉक्टर पैसों के लिए अनावश्यक रूप से ऑपरेशन कर देते हैं. वैसे भी भारत में सी सेक्शन रेट बहुत ज्यादा बढ़ गया है. जब आंकड़े दिखाते हैं कि सरकारी अस्पताल में 14 प्रतिशत और प्राइवेट में 47 प्रतिशत  डिलीवरी ऑपरेशन से होते हैं तो यह शक और गहरा हो जाता है. इस वजह से सीजेरियन करवाने वाली हर औरत पर उंगली उठ जाती है चाहे उसे सचमुच जरूरत हो.

आंकड़ों ने शक पैदा किया

2000 के बाद से भारत में सी सेक्शन रेट 2x से 3x हो गया.
* WHO कहता है: 10-15% C-section ठीक है.
* NFHS-5 2021 के हिसाब से: प्राइवेट हॉस्पिटल में 48% डिलीवरी सी सेक्शन से होती है. सरकारी में 15%.
* तमिलनाडु, तेलंगाना जैसे राज्यों में कुछ जिलों में 60%+ rate है.

जब इतना बड़ा फर्क दिखे तो लोग सोचते हैं कि डॉक्टर जानबूझकर ऑपरेशन कर रहे हैं क्योंकि उसमें 40-60 हजार ज्यादा मिलते हैं. सच ये है कि कुछ जगह ओवर यूज़ हो रहा है. पर इसका खामियाजा उन माओं को भुगतना पड़ रहा है जिन्हें सच में सी सेक्शन चाहिए था.

शुभ समय और डर का दबाव

कई परिवार शुभ मुहूर्त देखकर डिलीवरी की डेट तय करवाते हैं. इसमें ऑपरेशन आसान लगता है. जब लोग यह जानते हैं तो सिजेरियन को प्राकृतिक न मानकर बनावटी मान लेते हैं. साथ ही यह डर भी है कि पेट कटने से आने वाले समय में औरत कमजोर रहेगी या दोबारा बच्चा पैदा करने में दिक्कत होगी. यह डर भी बदनामी को बढ़ाता है.

माँ और बच्चे की “ताकत” को लेकर मिथ्स

माना जाता है कि सी सेक्शन बच्चे कमजोर होते हैं, इम्यूनिटी कम होती है. इसी तरह सी सेक्शन वाली माँ जल्दी काम नहीं कर सकती, दूध कम आता है और एक बार यह सर्जरी हो गई तो दूसरी डिलीवरी भी सर्जरी से ही होगी.

जानकारी की कमी

लोग यह नहीं जानते कि कब ऑपरेशन से डिलीवरी जरूरी हो जाती है. जैसे बच्चा उल्टा हो, नाल गले में फंस जाए, माँ का रक्तचाप बहुत बढ़ जाए या  डिलीवरी के समय बच्चा फंस जाए. ऐसी स्थिति में ऑपरेशन न करने पर माँ या बच्चे की जान जा सकती है. यह सुरक्षा के लिहाज से जरूरी है. पर समाज को केवल इतना दिखता है कि पेट कटा है. इसलिए वह भलाई को भी बदनामी में बदल देता है.

इस तरह दर्द न सहने का आरोप, असली माँ न होने का ताना, पैसों का शक, शुभ समय का दबाव और जानकारी की कमी मिलकर सिजेरियन डिलीवरी को बदनाम करते हैं. जबकि जरूरत पड़ने पर यह ऑपरेशन माँ और बच्चे दोनों की जान बचाने वाला तरीका है.

लाभ

सिजेरियन से प्लांड डिलीवरी करवाने से औरतों को कई लाभ मिलते हैं. जब डॉक्टर पहले से तय करते हैं कि ऑपरेशन से बच्चा पैदा करवाना है तो माँ और बच्चे दोनों के लिए सुरक्षा बढ़ जाती है.

समय पर तैयारी होती है

प्लांड डिलीवरी में डॉक्टर पहले से जांच कर लेते हैं. माँ का खून, शुगर, रक्तचाप सब देखा जाता है. अगर कोई दिक्कत हो तो पहले ही दवा या इलाज शुरू हो जाता है. अचानक होने वाली परेशानी का खतरा कम हो जाता है.

अचानक होने वाले खतरे टलते हैं

कई बार डिलीवरी के समय बच्चा उल्टा होता है या नाल गले में फंस जाती है या माँ का रक्तचाप बहुत बढ़ जाता है. नियोजित सिजेरियन में यह सब पहले पता चल जाता है. इसलिए बच्चे को ऑक्सीजन की कमी होने या माँ को बहुत खून बहने जैसी गंभीर दिक्कत होने का डर कम रहता है.

माँ को मेन्टल रिलीफ मिलता है

जब डिलीवरी का दिन और समय पहले पता हो तो माँ और परिवार की घबराहट कम होती है. रात भर अस्पताल में भागदौड़ की जरुरत नहीं पड़ती. माँ मेंटली तैयार रहती है.  पहले से हॉस्पिटल बैग तैयार रहता है. अचानक इमरजेंसी की स्थिति नहीं होती.  ऑपरेशन के बाद जल्दी संभलने में मदद मिलती है.

दर्द की पीड़ा कम होती है

नार्मल डिलीवरी में कई घंटों तक तेज दर्द होता है. जबकि सिजेरियन में बेहोशी की दवा देने के बाद माँ को डिलीवरी पीड़ा सहनी नहीं पड़ती. इससे बहुत कमजोर माँ या दिल की बीमारी वाली माँ को राहत मिलती है.

बच्चे की सुरक्षा बढ़ती है

प्लांड सिजेरियन में बच्चा पूरा समय पेट में रहता है. डॉक्टर समय देखकर ऑपरेशन करते हैं जिससे बच्चा समय से पहले पैदा होने के खतरे से बच जाता है. डिलीवरी के समय फंसने या चोट लगने का डर भी कम हो जाता है.

इस तरह प्लांड सिजेरियन से माँ को शारीरिक और मानसिक आराम मिलता है और माँ और बच्चे दोनों की सुरक्षा बढ़ जाती है.

सिजेरियन में कुछ जोखिम भी होते हैं जो ध्यान देने लायक है,

* सिजेरियन के बाद घाव भरने में 6 से 8 हफ्ते लगते हैं.

* अगले प्रसव में गर्भाशय फटने का खतरा 0.5 से 1 प्रतिशत रहता है.
* सीजेरियन से पैदा बच्चे में सांस की दिक्कत थोड़ी ज्यादा देखी जाती है, इसलिए डॉक्टर 39 हफ्ते के बाद ही नियोजित ऑपरेशन करने की सलाह देते हैं.

इसलिए डॉक्टर तभी सी सेक्शन की बात करते हैं जब मां या बच्चे की सुरक्षा के लिए जरूरी हो.

महिला के पेट में चीरा लगने की बात पर जिस समाज में इतनी बातें उठती हैं वे ज़रा बताएँ कि नसबंदी के दौरान महिला के ऑपरेशन को इतनी सहजता से क्यों लिया जाता है?

भारत में नसबंदी का बोझ ज्यादातर महिलाओं पर है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं:

* करीब 38 प्रतिशत महिलाएं नसबंदी करवा चुकी हैं.
* पुरुषों में यह संख्या 1 प्रतिशत से भी कम, करीब 0.3 प्रतिशत है.
* मतलब 100 में से 99 मामलों में नसबंदी महिलाएं करवाती हैं.

ऐसा क्यों होता है

सोच का फर्क

कई परिवार और पुरुष मानते हैं कि परिवार नियोजन की जिम्मेदारी महिला की है. हर तीन पुरुषों में से एक यही सोचता है. इसलिए महिला को ही नसबंदी के लिए कहा जाता है.

डर और भ्रम

पुरुष नसबंदी यानी वैसेक्टोमी छोटा और आसान ऑपरेशन है, 15 मिनट में हो जाता है. पर कमजोरी आ जाएगी, मर्दानगी चली जाएगी, जैसे डर की वजह से पुरुष करवाने से बचते हैं.

सिस्टम का झुकाव

पहले 1966 से 1970 के बीच 80 प्रतिशत नसबंदी पुरुष करवाते थे. बाद में सरकारी कार्यक्रमों और स्वास्थ्य केंद्रों का जोर महिला नसबंदी पर बढ़ गया. अब अस्पतालों में महिला नसबंदी के लिए प्रोत्साहन और सुविधा ज्यादा मिलती है.  महिला नसबंदी बच्चे के जन्म के तुरंत बाद कर दी जाती है इसलिए उसे एक बार में निपटाने वाला काम मान लिया जाता है. पुरुष नसबंदी के लिए अलग से जाना पड़ता है इसलिए टाल दिया जाता है.

नतीजा

महिला नसबंदी पेट चीर कर किए जाने वाला बड़ा ऑपरेशन है फिर भी वही करवाती है. जबकि पुरुष नसबंदी आसान होने के बावजूद बहुत कम होती है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति ने 2017 में लक्ष्य रखा था कि 30 प्रतिशत नसबंदी पुरुष करवाएं पर आज भी यह 1 प्रतिशत के आसपास ही है.

इस तरह नसबंदी के मामले में जिम्मेदारी बराबर बंटी नहीं है और पूरा भार महिलाओं पर आ जाता है. यह समाज की विकृत सोच और आवश्यकता के हिसाब से मापदंड तय करने का अच्छा एक्साम्पल है. औरतों को हमेशा ही समाज की दोहरी सोच का सामना करना पड़ता रहा है और इस मामले में भी यही होता है.

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