Relationship Tips : 32 साल की अनुजा को जब पता चला कि उसे गले का कैंसर है तो उस के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई. डाक्टर ने जब उसे यह सूचना दी, उस के गालों पर आंसू बहते चले गए. आज औफिस से वह सीधे डाक्टर के पास अकेले ही आई थी. बहुत दिनों से अनुजा को लग रहा था कि उसे कोई तकलीफ है ही. आज अनुजा यही चाह रही थी कि उस का पति शाश्वत भी उस के साथ डाक्टर के पास चले पर शाश्वत ने फोन पर ही कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो, सब ठीक ही होगा, तुम बहुत पैनिक कर रही हो, आराम से जाओ, मैं तुम्हें शाम को घर ही मिलता हूं.’’

अनुजा ने कुछ तलख स्वर में पूछ लिया, ‘‘शाम को या रात को?’’

डाक्टर ने अनुजा के साथ पूरी बात डिटेल्स में की और तसल्ली दी, ‘‘इलाज शुरू कर देते हैं, कीमो थेरैपी से सबकुछ सामान्य होने की उम्मीद है, टाइम तो लगना है पर शुरू में ही पता चल गया है तो अच्छा है.’’

कैंसर जैसी बीमारी का नाम आते ही हर इंसान का घबराना बहुत स्वाभाविक है. अनुजा भी जब डाक्टर के क्लीनिक से आंसू पोंछती निकली तो उस के दिल में एक तरफ अपनी बीमारी का दुख, दूसरी तरफ शाश्वत की संवेदनहीनता उस का मनोबल तोड़ रही थी. उस ने चुपचाप कैब बुक की और बहुत कुछ सोचती रही. कैब में बैठ कर वह अपने पति के बारे में जितना सोचने लगी, उतना ही उस का मन उदास होता गया.

रिश्तों पर भारी लापरवाही

अनुजा और शाश्वत का विवाह 2 साल पहले हुआ था. दोनों अच्छी नौकरी करते थे. मुंबई में अभी किराए के फ्लैट में ही रहते. धीरेधीरे अनुजा को सम झ आया था कि शाश्वत कुछ लापरवाह है, उसे हर समय दोस्तों के साथ गप्पें मारने और दोस्तों की सिगरेटशराब की महफिलों में आनंद आता है. औफिस से आ कर वह अपने 3 दोस्तों रवि, सुजौय और नितिन के साथ कभी बिल्डिंग के पार्किंग एरिया में ही, कभी सोसाइटी के गार्डन में बैठ कर पीता रहता, 10 बज जाते. सब की पत्नियों के फोन आने लगते तो सब उठते. यह लगभग रोज का नियम था.

अनुजा के पेरैंट्स देहरादून में और शाश्वत के दिल्ली में रहते थे. यहां मुंबई में अनुजा और शाश्वत के वन बैडरूम के फ्लैट में उन के आने पर सब को दिक्कत होती थी, इसलिए जो भी आता 2-4 दिन में मिलमिला कर चला जाता. अकसर किसी लौंग वीकैंड में अनुजा और शाश्वत ही मिलने चले जाते पर अब तो अनुजा की तबीयत कई दिनों से ढीली ही थी. तबीयत एक तरफ, शाश्वत का लापरवाह स्वभाव अनुजा को ज्यादा परेशान कर रहा था. इतनी बड़ी बीमारी वह शाश्वत के साथ के बिना कैसे  झेलेगी, यह सोचते हुए उस की आंखें बारबार भीग रही थीं. घर पहुंच कर उस ने शाश्वत की कार खड़ी देखी, उस ने इधरउधर देखा, शाश्वत दिखा नहीं तो उस ने उसे फोन मिलाया, ‘‘कहां हो?’’

‘‘गार्डन के टैरेस पर इन तीनों के साथ.’’

‘‘घर आ जाओ, मैं थोड़ी परेशान हूं.’’

‘‘क्या हुआ?’’

‘‘डाक्टर के पास से आई हूं. शाश्वत, जल्दी आओ,’’ कहते हुए उस की आवाज भर्रा गई.

‘‘तुम घर पर हो या नीचे ही हो?’’

‘‘तुम्हारी कार के पास हूं.’’

‘‘आया.’’

शाश्वत आया तो अनुजा उस की कार की टेक लगाए बहुत उदास सी खड़ी थी. वह पास आया तो अनुजा ने कहा, ‘‘ऊपर चलो, बताती हूं.’’

‘‘यहीं बता दो, अनुजा, सब ठीक तो है न? वे लोग मेरा इंतजार कर रहे हैं.’’

‘‘नहीं, कुछ ठीक नहीं है.’’

‘‘बताओ तो?’’

‘‘बायोप्सी की रिपोर्ट अच्छी नहीं है, गले में कैंसर ही है,’’ कुछ आंसू अनुजा के गालों पर बहते चले गए. वह चाहती थी कि वह घर में बैठ कर शाश्वत को यह बताए पर उसे इस समय दोस्तों को जौइन करने की जल्दी थी.

‘‘उफ, यह तो बहुत बुरी खबर है. देखते हैं, किसी दूसरे डाक्टर को भी दिखाते हैं. तुम चल कर आराम करो, मैं अभी उन लोगों को बता कर आया.’’

‘‘फोन पर ही बता दो न.’’

‘‘बस आया,’’ और उस रात भी शाश्वत फिर जो गया, 10 बजे ही लौटा. जब आया, अनुजा लेट चुकी थी. आज तो वह मानसिक रूप से भी टूटी हुई थी. पत्नी की इतनी बड़ी बीमारी ने भी उस की आदतें नहीं बदलीं. अनुजा खुद ही अपनी बीमारी और इलाज से निबटती रही. धीरेधीरे कमजोरी इतनी बढ़ रही थी कि उसे जौब छोड़नी पड़ी. दोनों के पेरैंट्स सुनते ही चक्कर काटने, उस से मिलने, तसल्ली देने आ जाते. अभी बीमारी का शुरुआती दौर था, ठीक होने की पूरी उम्मीद भी थी, एक छोटी से सर्जरी भी हो चुकी थी. शाश्वत ने हौस्पिटल का समय फिर भी शान्ति से निकाल दिया था पर उस के घर आते ही फिर वही रात में दोस्तों के साथ देर रात तक बैठना चलता रहा.

अनुजा के खानेपीने के बहुत प्रीकौशंस थे, वह नमक नहीं खा पा रही थी. उसे बहुत हलका खाना खाना था. घर के कामों के लिए ऐक्स्ट्रा पैसे दे कर हाउस हैल्प से काम करवा लिया जाता पर अनुजा को जो इस समय भावनात्मक सहारा चाहिए था, वह उसे शाश्वत से तो नहीं, अपनी कुछ दोस्तों से मिलता रहा. कीमो के लिए कभी शाश्वत साथ जाता, कभी उस की दोस्त रेनू. कभी अनुजा के पेरैंट्स होते तो वे चले जाते.

एक दिन रात को गार्डन से घर आते हुए शाश्वत का बैलेंस बिगड़ा, वह रोड पर नीचे गिरा, बड़े दर्द से उठ कर खड़ा हुआ तो उसे लगा जैसे टूट गया है. वह बड़ी मुश्किल से घर पहुंचा. अनुजा पहले ही कमजोर और बीमार चल रही थी. वह शाश्वत को दर्द में देख कर भी कुछ ज्यादा नहीं कर पाई. शाश्वत ने सुजौय को फोन किया, दर्द के बारे में बताया और डाक्टर के पास साथ चलने के लिए कहा तो सुजौय ने संकोच से कहा, ‘‘यार, अभी तो लौटा हूं. अभी फिर निकला तो घर में क्लेश हो जाएगा, पर ठीक है, जल्दी से दिखा कर आता हूं.’’

सुजौय हड़बड़ी में आया. हौस्पिटल जा कर फौरन ऐक्सरे हुआ, हेयर लाइन फ्रैक्चर था. शाश्वत ने सिर पकड़ लिया. उस के बाद तो बहुत परेशानी का समय शुरू हो गया. अनुजा जितना कर सकती थी, उतना कर रही थी. शाश्वत के दोस्त 2-3 बार तो आए फिर बस फोन पर हालचाल पूछ लेते. अनुजा के पेरैंट्स को अब आना ही पड़ा. शाश्वत ने औफिस से छुट्टी ले ली थी पर एक अपराधबोध अब उसे खाने लगा था. वह अपनी लापरवाही पर शर्मिंदा था.

अनुजा की हालत देख कर वह मन ही मन शर्मिंदा होता. पत्नी बीमार थी, दोस्त गायब थे. एक दिन उस ने नितिन को फोन पर कहा भी, ‘‘तुम तो गायब ही हो गए यार. दोस्त की बीमारी में ऐसा कौन करता है.’’

जवाब मिला, ‘‘तू मु झे सम झा रहा है? यार, तु झे तो अपनी वाइफ की बीमारी का कोई फर्क नहीं पड़ा. अब हमें मत कह यार. ठीक हो जा, फिर पार्टी करेंगे.’’

शाश्वत ठगा सा रह गया. दोस्त की बात से शाश्वत को एक सबक मिला पर अपने पति से इस समय साथ न मिलना, उस से भावनात्मक रूप से कोई सहारा न मिलना, अनुजा को जीवनभर की एक कड़वी याद मिली थी.

शाश्वत जैसी गलती कई पति अनजाने में कर रहे होते हैं. पत्नी की किसी अस्वस्थता में आर्थिक रूप से जिम्मेदारी संभाल कर अपने कर्तव्य की इतिश्री सम झ लेते हैं पर पत्नी को इस समय पति का कोमल स्पर्श, उस का साथ चाहिए होता है, प्यार के दो बोल, ‘‘सब ठीक हो जाएगा,’’ यह सुनने की ख्वाहिश रहती है. न अनुजा को इस समय व्यंजन चाहिए थे, न गहने, न कपड़े, उसे इस समय बस अपने पति का प्यार और साथ चाहिए था.

सभी पति नहीं, कुछ पति पत्नी की बीमारी में उसे वह भावनात्मक सहारा देने में लापरवाही कर देते हैं जिस की उसे सब से ज्यादा जरूरत होती है.

एक कचोट दे जाती है

रेखा की यूटरस रिमूवल की सर्जरी हुई तो वह भी भयंकर पीड़ा के पलों में यही इंतजार करती रह गई कि कब उस के पति उस के पास आ कर कुछ देर बैठेंगे. वह बताती है कि हौस्पिटल में भी उस के पति उस के पास हो कर भी उस के साथ नहीं थे. वे लगातार फोन पर अपना टाइमपास कर रहे थे. उस समय की याद उसे एक कचोट दे जाती है.

थेरैपिस्ट एशली हडसन के अनुसार, यही एक स्वस्थ रिश्ते की कुंजी है. अपने साथी की भावनात्मक जरूरतों को सम झना और उन्हें सुरक्षित महसूस कराना. सुखदुख आते जातेरहते

हैं पर दुख और पीड़ा के पलों में पति का आसपास होना, उस का भावनात्मक रूप से साथ मिलना एक पत्नी को ताउम्र याद रहता है. दोनों एक गाड़ी के 2 पहिए हैं, यह बात यों ही नहीं कही गई है. दोनों दुखसुख में साथसाथ चलें,

तभी दांपत्य जीवन की गाड़ी सुचारु रूप से चलती रहती. इस गाड़ी का इंजन प्रेम और सहयोग ही है.

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