Self Defence : पुरुष का कहना है कि महिलाओं का पर्स किसी रहस्यमय से कम नहीं. कभी तो डर लगता है कि पता नहीं उन के पर्स में क्याक्या होगा. लेकिन महिलाओं के पर्स से क्या डरना? आखिर क्या ही हो सकता उस में लिपस्टिक, डियो, परफ्यूम, आइलाइनर, मैफटाल स्पैज्म, सैनेटरी पैड, पैसा, क्रैडिट कार्ड, एटीएम कार्ड, दवाई की पर्ची, टेलर की रसीद, घर के सामानों की लिस्ट आदि.

लेकिन इन तमाम चीजों के अलावा महिलाओं के पर्स में एक और चीज है और वह है हमलावरों पुरुषों के खौफ से बचने के लिए-आईओएफ, 32 रिवाल्वर. जी हां, 41 साल की नलिनी जो दिल्ली में अपना एक ऐजुकेशन इंस्टिट्यूट चलाती है वह अपने पर्स में रिवाल्वर भी रखती हैं ताकि कहीं सुनसान जगहों पर वह हमलावरों की शिकार न हो जाए. नलिनी कहती है कि वह दिल्ली में अकेली रहती है और रातबेरात उन्हें घर से बाहर निकलना पड़ता है इसलिए अपनी सेफ्टी के लिए रिवाल्वर जरूरी है.

लेकिन नलिनी अकेली गन लेडी नहीं है बल्कि और भी कई लड़कियां और महिलाएं हैं जो अपनी सेफ्टी के लिए अपने पर्स में पिस्टल रखती हैं. दिल्ली के बहुचर्चित निर्भया कांड के बाद गन प्वाइंट मांगने वाली महिलाओं की संख्या बड़ी है.

डर का एहसास

कोलकाता गैंग रेप के बाद से बहुत से मातापिता लड़कियों और कामकाजी महिलाओं में डर का एहसास गहरा हो गया है. वे अपनी सेफ्टी को ले कर डरने लगी हैं. भोपाल की रहने वाली 29 साल की शिवांगी का कहना है कि एक रात जब वह अपने औफिस से घर आ रही थी तब कुछ लोगों ने शराब के नशे में उस का पीछा किया. उस ने अपनी गाड़ी की स्पीड और तेज कर दी, तो वे लोग भाग गए.

शिवांगी का कहना है कि उस दिन तो कुछ नहीं हुआ और वे बच गई लेकिन उस के भीतर एक डर बैठ गया और इस डर से निबटने का अब एक ही तरीका है कि अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने हाथों में ली जाए.

शिवांगी ने आर्म लाइसेंस के लिए भागदौड़ शुरू कर दी और कुछ महीनों की मशक्कत के बाद आखिरकार एके, 22 रिवाल्वर उन्हें मिल गया और जिसे ले कर वे अपने पर्स में चलती हैं.

मनोविश्लेषक और ‘द इंडिनियंस’ किताब के लेखक सुधीर कक्कड़ हथियार ले कर चलने वाली नई हिंदुस्तानी लड़कियों के बारे में सुन कर आश्चर्य से भर जाते हैं. लेकिन आंकड़े और तथ्य सुनने के बाद उन का विश्लेषण कहता है कि ये ग्लोबलाइजेशन और नई आर्थिक नीतियों की देन है. आज की महिलाएं बाहर बैठे पुरुषों के हमलों के डर से वापस घर में नहीं दुबकेगी, बल्कि उन का सामना करेगी.

वहीं, महिलाओं के हथियार रखने को ले कर आईजी के. पद्मकुमार कहते हैं कि सब से पहले यहां हथियार रखने के नियम बहुत सख्त हैं खासकर आतंकवादी हमलों के बाद, जहां मौजूद हथियार लाइसैंस की भी दोबारा जांच की जा रही है. भारत में जब तक आप संबंधित अधिकारियों को यह विश्वास नहीं दिला पाते कि आप की जान को खतरा है तब तक आप लाइसैंस नहीं ले सकते और छेड़छाड़ की संभावना जैसे सामान्य खतरे को वैध कारण नहीं माना जा सकता. वे कहते हैं कि लाइसैंस चाहे जो भी हो, वे खतरे के समाधान के रूप में घातक हथियार की सलाह नहीं देंगे.

गन रखने के नुकसान

जो लोग कहते हैं कि लड़कियों को अपने पर्स में पिस्टल रख कर चलना चाहिए तो उन्हें

यह बात पता होनी चाहिए कि यह कोई आसान बात नहीं है क्योंकि गन को एक प्रभावी आत्मरक्षा के उपकरण के रूप में इस्तेमाल करने के लिए आप को बहुत अधिक ट्रेनिंग की आवश्यकता होती है.

आप को यह सीखने की जरूरत है कि कैसे गोली चालानी है, कैसे अच्छा निशाना लगाना है, कैसे सुरक्षा को रखना और छोड़ना है, गन को कैसे स्टोर करना है, कैसे इसे पकड़ना है, घटना के समय कैसे गन को तेजी से निकालना है और ये भी तो हो सकता है कि सामने वाले ने आप के साथ छेड़छाड़ की और गुस्से में आ कर, बिना कुछ सोचेसम झे आप ने उस पर गोली चला दी और वे मर गया, तो क्या होगा. आप तो सलाखों के पीछे होगी न?

टीवी एंकर पर्ल मेनि ने गन के गलत हाथों में जाने की संभावना की ओर इशारा किया और कहा कि पुरुषों के पास भी गन तो होगी न? यहां तक की हमलावर महिला से हथियार छीन कर उस पर भी गोली चला दें. फिर क्या होगा?

बहस का विषय

अधिवक्ता और साइबर क्राइम स्पेशलिस्ट का भी यही कहना है कि पिस्टल का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने के लिए आप को प्रशिक्षण और अभ्यास की आवश्यकता होती है और लगता कि मध्यम आयु वर्ग और बड़ी उम्र की महिलाएं इस के लिए पर्याप्त रूप से फिट नहीं हैं. वे कहते हैं कि इस तरह की न्यूज का एकमात्र लाभ यह है कि पर खबर फैलती है तो यह हमलावरों में डर की भावना पैदा कर सकती है.

आप पर अगर हमलावर द्वारा चलाई की गन की गोली से मर जाता है तो क्या होगा? आप शुरू में तो जेल जाएंगी न? कोई भी अदालत आसानी से पुलिस को पूरी इनवैस्टिगेशन ने बिना बेल नहीं देगी कि गन बिना किसी पूर्व रंजिश के सेल्फ डिफैंस में चलाई गई थी.

वैसे भी गन, हर कोई नहीं रख सकता क्योंकि इस की कीमत लाखों में होती है जो सब के वश की बात नहीं है और इसे प्राप्त करने के लिए भी काफी मशक्कत करनी पड़ती है.

अधिकांश महिलाओं का यह मानना है कि यह बहस का विषय है कि इमरजैंसी में कितनी महिलाएं वास्तव में गन का इस्तेमाल कर पाएगी, भले ही वो आम लाइसैंस प्राप्त करने में कामयाब हो जाएं.

गन रखने के जोखिम ही जोखिम

गन रखने में कई उच्च रिस्क होते हैं जैसे ऐक्सीडैंटल चोट लगने का रिस्क, चोरी होने का रिस्क, बढ़ी हुई चिंता तथा अन्य मनोवैज्ञानिक प्रभाव जैसे आघात या अपराधबोध. यदि गलती से किस को मार देते हैं जबकि आप का उद्देश्य केवल हमलावर को अक्षम करना था.

लिमिटेड यूज

यदि आप नजदीकी सीमा वाली स्थिति में हैं या जहां आप के पास अपनी गन निकालने का समय नहीं है तो आप क्या करेगी? चूंकि महिलाओं द्वारा सामना की जाने वाली अधिकांश हिंसा नजदीकी सीमा वाली होती है, (घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न, यात्रा के दौरान, सड़कों पर आदि. इसलिए महिलाओं के लिए बंदूक को एक प्रभावी आत्मरक्षा उपकरण के रूप में नहीं देखा जा सकता है या कम देखा जा सकता है.

आत्मरक्षा के लिए

देशभर में अपराध साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है. खासकर महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध बेतहाशा बढ़ रहे हैं. एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली महिलाओं के लिए सब से असुरक्षित जगह है. जहां रोजाना 3 से

4 रेप के मामले दर्ज होते हैं.

अपराधों पर एकदम से लगाम लगाना संभव नहीं है. लेकिन यहां कर लड़की को अपने लिए कैपेबल होना चाहिए यानी अपनी रक्षा खुद करना आना चाहिए.

अपनी सेफ्टी के लिए और भी कई हथियार रख सकते हैं आप, जैस की, पैपर स्प्रे, पेन कटर, रिंग कटर वगैरह. इस के अलावा, मोबाइल ऐप बहुत मददगार है. लेकिन यह केवल शिक्षित और तकनीकीअनुकूल महिलाएं ही इस्तेमाल कर सकती हैं. इस के लिए बेहतर विकल्प यह होगा कि सभी महिलाओं को अपनी सेल्फडिफैंस टैक्नीक अनिवार्य कर दिया जाए. सरकार को इसे अनिवार्य और मुफ्त कर देना चाहिए.

महिलाओं के लिए सर्वश्रेष्ठ कौन्फिडैंस तो उन का अपना कौन्फिडैंस है. कभी आप सामने वाले को यह न दिखाएं कि आप उसे देख कर डर गई. हमलावर आमतौर पर ऐसी महिलाओं की तलाश में होते है जो कमजोर दिखती हों क्योंकि उन की नजर में वे कायर होती हैं. हमलावर कभी ऐसी महिलाओं से भिड़ना नहीं चाहता जो ताकतवर हो.

तो इसके लिए सब से पहले आप के चेहरे पर आत्मविश्वास दिखनी चाहिए. पूरे आत्मविश्वास के साथ चलें, बात करें, अपना सिर ऊपर रखें,  झुका कर न चलें, चारों को देखें और आंख में आंख मिलाएं. इस से उन्हें पता चलेगा कि आप कमजोर नहीं हैं. अगर वो फिर भी आप का पीछा करे या कुछ गलत हरकतें करने की कोशिश करें तो आप डट कर उस का सामना करें. आप कितना भी प्रशिक्षण ले लें, लेकिन जब तक आप में कड़ा आत्मविश्वास नहीं होगा, कुछ नहीं हो सकता.

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