मांबनने की खुशी, लेकिन न्यू बौर्न के लिए सिंगल मौम होना, कभी खुशी कभी गम जैसा एहसास देने का काम करता है. वैसे तो बच्चे की हर स्टेज में पेरैंटिंग यूनीक चैलेंज होता है, लेकिन ये चैलेंजेज तब और मुश्किल व बोझिल हो जाते हैं जब सिंगल मौम हो क्योंकि इस समय दोनों मां व बेबी खुद को असहाय महसूस जो करते हैं.
सिंगल मां जहां शारीरिक बदलाव से गुजर रही होती है वहीं मानसिक चुनौतियां भी कम नहीं होती हैं. उस के दिमाग में तरहतरह के खयाल आते हैं कि सोसायटी उस के बच्चे को आम बच्चों की तरह ट्रीट करेगी, कहीं उस का फैसला उस के बच्चे के लिए तो नुकसानदायक साबित नहीं होगा. कब, कैसे, क्या करे समझ ही नहीं आता.
वह इसी सोच में इतनी उलझ रहती है कि अपने बच्चे का खूबसूरत लमहा ऐंजौय नहीं कर पाती, जबकि यह पल दोबारा लौट कर नहीं आता. ऐसे में कुछ टिप्स जो सिंगल मौम को न्यू बौर्न की केयर में देंगे मदद और उन्हें मोटिवेट भी करने का काम करेंगे:
पुरानी यादों की नो ऐंट्री
कई बार परिस्थिति ऐसी हो जाती है, जिस में हम पेरैंट्स बनने के सपने तो साथ संजोते हैं, लेकिन आखिर में मौम को ही न्यू बौर्न की सारी जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, जिस के कारण इस लमहे को ऐंजौय करने के बजाय वह हर समय पुरानी यादों के भीतर खुद को समाए रखने पर विवश हो जाती है.
