Holi Special: फिर क्यों- क्या था दीपिका का फैसला

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जब पत्नी हो कमाऊ

आजकल के विवाह विज्ञापनों से पता चलता है कि नौजवान कमाऊ पत्नी ही चाहते हैं. ऐसे लोग पतिपत्नी की कमाई से शादी के बाद जल्दी साधनसंपन्न होना चाहते हैं. अगर कमाऊ लड़की को शादी करने के बाद अपने पति के परिवार के सदस्यों के साथ रहना पड़े तो संयुक्त परिवार के सभी सदस्यों के विचार और धारणाएं अलगअलग होने की वजह से उस को नए माहौल में ढलना पड़ता है. वह स्वावलंबी होने के साथसाथ अगर स्वतंत्रतापसंद होगी, तो उसे जीवन में नई समस्याओं का सामना करना पड़ेगा. कुछ परिवारों में सभी कमाऊ सदस्य अपनीअपनी कमाई घर के मुखिया को सौंपते हैं. मुखिया घरेलू खर्च को वहन करता है. ऐसी स्थिति में कमाऊ नववधू को भी अपनी पूरी कमाई घर के मुखिया को सौंपनी पड़ेगी. लेकिन स्वतंत्र स्वभाव वाली युवती ऐसा नहीं करना चाहेगी. उस अवस्था में नववधू और परिवार के सदस्यों के बीच मनमुटाव पैदा होगा. पति और पत्नी के बीच मनमुटाव भी हो सकता है, जो उन के जीवन में जहर घोल देगा. ऐसे जहर को विवाहविच्छेद में परिवर्तित होते देखा गया है.

क्या करे पति

अगर परिवार वाले अपनी कमाऊ बहू से उस की कमाई नहीं लेते तो कमाऊ नववधू खुश रहती है और स्वतंत्ररूप से अपने दोस्तों के साथ घूमती है. अगर पतिपत्नी के विचारों में समन्वय होता है तब तक जीवन की गाड़ी ठीक चलती है, लेकिन अगर कहीं पति अपनी पत्नी को शक की निगाह से देखने लगे तो समस्या गंभीर बन जाती है. शादी के पहले कोई लड़का अपनी होने वाली कमाऊ पत्नी से नहीं पूछता कि वह अपनी कमाई उसे देगी या नहीं. अगर पूछ ले तो शादी के बाद कोई समस्या खड़ी न हो. एक प्राचार्य ने एक लैक्चरर से शादी की. प्राचार्य की इतनी कमाई थी कि घर का खर्च आराम से चलता था. ऐसी स्थिति में लैक्चरर पत्नी ने अपनी कमाई अपने पति को नहीं दी और कहा कि घर का खर्च तो आराम से चल ही रहा है. धीरेधीरे प्राचार्य को शक होने लगा कि उस की पत्नी अपने साथियों को खिलानेपिलाने में खर्च कर रही है और उसे एक नया पैसा नहीं दे रही है. अत: धीरेधीरे मनमुटाव ने विकराल रूप धारण कर लिया और उन दोनों में विवाहविच्छेद हो गया.

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ऐसा भी होता है

कुछ गुलछर्रे उड़ाने के लिए ही कमाऊ पत्नी चाहते हैं. ऐसे लड़के अपनी कमाई और अपनी बीवी की कमाई को मिला कर ऐशोआराम की जिंदगी जीना चाहते हैं. शादी के पहले ऐसे लड़कों का पता नहीं चलता. लेकिन शादी के बाद वे गुल खिलाने लगते हैं. कई बार तो अपनी बीवी की कमाई भी उन के लिए कम पड़ने लगती है. पतिपत्नी के बीच पैसों के लिए झगड़ा होने लगता है. कुछ अधिक संपन्न लड़कियां स्त्रीशासित परिवार बनाने के लिए अपने से कमाई में कमजोर पर प्रसिद्ध पुरुषों को उन की पत्नी से तलाक दिला कर शादियां करती हैं ताकि ऐसा पुरुष उन का जीवन भर कहना मानता रहे. ऐसी लड़कियां दकियानूसी परिवार के सदस्यों के साथ समझौता नहीं कर सकतीं.

होना क्या चाहिए

कमाऊ बहू या तो परिवार के सदस्यों की भावनाओं से समझौता करे या शांति से पतिपत्नी अपने परिवार से अलग रहें. इतना ही नहीं पुरुषशासित समाज में जहां पुरुषों की चलती है वहां कमाऊ बहू नाराज रहेगी इसलिए समाज के बदलते आयाम में कमाऊ बहू को घर के सभी आर्थिक खर्चों में राय देने का अधिकार होना चाहिए. आजकल पति और पत्नी को समान अधिकार है, इसलिए दोनों को अपने परिवार के माहौल में मिलजुल कर रहना चाहिए अन्यथा पारिवारिक परिवेश में अशांति रहेगी. 

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खाने से जुड़े मिथक और सचाई

95 फीसदी से ज्यादा बीमारियां पोषक तत्त्वों की कमी और शारीरिक श्रम में कमी होने के चलते होती हैं. आइए, भोजन से जुड़े कुछ मिथकों की सचाई के बारे में जानते हैं.

1. मिथक: चीनी की जगह शहद से अपने खाने को मनचाहे तरीके से मीठा कर सकत हैं.

सचाई: रासायनिक लिहाज से शहद और चीनी बिलकुल बराबर हैं. यहां तक कि नियमित चीनी के सेवन के मुकाबले शहद में ज्यादा कैलोरी हो सकती है. इसलिए बिलकुल चीनी की ही तरह शहद का भी कम मात्रा में ही इस्तेमाल करें.

2. मिथक: किसी वक्त का भोजन न करने पर अगले भोजन में उस की कमी पूरी हो जाती है.

सचाई: किसी भी समय का भोजन मिस करना ठीक नहीं माना जाता है और इस की कमी अगले वक्त का भोजन करने से पूरी नहीं होती. 1 दिन में 3 बार संतुलित भोजन लेना जरूरी होता है.

3. मिथक: यदि खाने के पैकेट पर ‘सब प्राकृतिक’ लिखा हो तो वह खाने में सेहतमंद होता है.

सचाई: अगर किसी चीज पर ‘सब प्राकृतिक’ का लेबल चस्पा हो तो भी उस में चीनी, असीमित वसा या फिर दूसरी चीजें शामिल होती हैं, जो सेहत के लिए खतरनाक हो सकती हैं. ‘सब प्राकृतिक’ लेबल वाले कुछ स्नैक्स में उतनी ही वसा शामिल होती है जितनी कैंडी बार में. पैकेट के पिछले हिस्से पर लिखी हिदायतों को पढ़ना जरूरी होता है जो आप से सब कुछ बयां कर देती है.

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4. मिथक: जब तक हम प्रत्येक दिन विटामिन का सेवन कर रहे हों, हम क्या खा रहे हैं उस के बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं है.

सचाई: कुछ पोषण विशेषज्ञों का कहना है कि विटामिन की गोलियां लेना अच्छी बात है, लेकिन ये गोलियां हर उस चीज को पूरा कर देंगी जिस की लंबे समय से आप को जरूरत है, जरूरी नहीं. सेहतमंद खाना आप को रेशे, प्रोटीन, ऊर्जा और बहुत सारी ऐसी जरूरी चीजें मुहैया कराता है जो विटामिन की गोलियां नहीं करा सकतीं. इसलिए विटामिन और चिप्स का 1 बैग अभी भी एक खतरनाक लंच है. इस की बजाय आप को संतुलित और पोषक तत्त्वों वाले भोजन की जरूरत है.

5. मिथक: अगर वजन जरूरत से ज्यादा नहीं है तो अपने खाने के बारे में परवाह करने की जरूरत नहीं है.

सचाई: अगर आप को अपने वजन से समस्या नहीं है तो भी हर दिन सेहतमंद भोजन का चुनाव करना जरूरी होता है. अगर आप अपने शरीर को एक मशीन की तरह से देखते हैं तो यह भी जानते होंगे कि मशीन को पूरी मजबूती के साथ चलाने के लिए अच्छे ईंधन का इस्तेमाल करना होता है. जंक फूड से दूर रहने का भी यही मकसद है. अगर आप खराब खाने की आदतें विकसित कर लेंगे तो आप को भविष्य में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है.

6. मिथक: विटामिन और खनिज की जरूरत को पूरा करने के लिहाज से ऐनर्जी बार सब से बेहतर रास्ता हैं.

सचाई: ऐनर्जी बार कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा के बेहतर स्रोत हो सकते हैं. लेकिन दूसरे खाने की तरह उन का भी बेजा इस्तेमाल हो सकता है. उन्हें ज्यादा खाने का मतलब है आप अपने शरीर को उतना ही नुकसान पहुंचा रहे हैं जितना कैंडी, केक और कूकी के खाने से होता है.

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7. मिथक: चीनी आप को ऊर्जा देती है. अगर आप को दोपहर या फिर खेल खेलने से पहले ऊर्जा बढ़ाने की जरूरत है तो एक कैंडी बार खाइए.

सचाई: चौकलेट, कूकी, कैंडी और केक जैसी खाद्य सामग्री में चीनी की सामान्य मात्रा पाई जाती है जो यकीनन आप के खून में शर्करा बढ़ा ला देगी और फिर इस के जरीए आप के शरीर की प्रणाली में जल्द ही ऊर्जा के संचार का एहसास होगा. लेकिन बाद में ब्लड शुगर में बहुत तेजी से गिरावट आती है और फिर आप को ऐसा महसूस होगा कि शुरू के ऊर्जा के स्तर में भी कमी आ गई है.

8. मिथक: कार्बोहाइड्रेट आप को मोटा करता है.

सचाई: अगर आप औसत और संतुलित मात्रा में इस का सेवन करते हैं तो आप के शरीर के लिए ये सब से बेहतर ऊर्जा के स्रोत साबित हो सकता है.                    

– डा. नीलम मोहन
पीडिएट्रिक गैस्ट्रोऐंटरोलौजिस्ट और यकृत प्रत्यारोपण विशेषज्ञ, मेदांता मैडिसिटी

शहरीकरण और औरतें

भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने एक नेशनल लैंड मोनेटाइजेशन कौरपोरेशन बनाई है जिस काम होगा देश भर में फैली केंद्र सरकार की जमीनों का हिसाब रखना और उन्हें बेच देना सरकार आजकल जनता से पैसे इकट्ठे करने में लगी है और पिछले कानूनों के बल पर कौढिय़ां में पिछली सरकारों की खरीदी जमीन को अब मंहगे दाम पर बेचना चाह रही है. यह पक्का है कि अब जो जमीनें बिकेंगी उन में घने कंक्रीट के जंगल उगेंगे और इन में से ज्यादातर शहरों, कस्बों में होंगे.

सरकारी जमीन फालतू पड़ी रहे, यह सोचना वाजिब है पर उस की जगह कंक्रीट के ऊंचे मकान, दफ्तर या फैक्ट्रियां आ जाएं, यह गलत होगा. आज सभी शहर भीड़भाड़ व प्रदूषण से कराह रहे हैं और सरकार इस में धूएं देने वाली मशीनें लगाने की योजना बना रही है. जो लोग शहरों कस्बों में रहते हैं उन्हें राहत देने की जगह, ये कदम आफत देंगे.

अच्छा तो यह रहेगा कि इन सब जमीनों पर पेड उगा कर इन्हें छोटेबड़े जंगलों में बदल दिया जाए. सरकार जंगलों का रखरखाव नहीं कर पा रही है और न ही खेती की जमीन आज के भाव से मुआवजा देकर वहां जंगल मार्ग उगा पा रही है. इसलिए जो जमीन उस के पास है चाहे 100-200 मीटर हो या लाख दो लाख मीटर, वहां बने बाग बेहद सुकून देंगे.

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अब शहरीकरण तो देश का होना ही है और कंक्रीट और जमीन का बढ़ता भाव देख कर लोगों को दड़बों में रहना पड़ेगा. उन्हें वहीं सांस लेने की जगह मिल जाए तो यह सुकून वाली बात होगी. इन छोटे बड़े जंगलों से पोल्यूशन निकलेगा नहीं, खत्म होगा.

यह भाव देश की औरतों पर निर्भर है कि वे इस मुद्दे को कितना समझें और कितना लैंड मोनेटाइजेशन का अर्थ समझें. आज तो यह समझ लें कि सरकारी दफ्तर के आगे पीछे खाली जगह उन्हें सांस देती है, बिक जाने के बाद गलाघोंट जहर उगलेगी. आदमियों को अब फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उन्हें बच्चे नहीं पालने होते, उन के खेलने की जगह नहीं ढूंढ़ती होती. सरकार लैंड मोनेटाइजेशन नहीं कर रही, लैंडपाइजनेशन कर रही है जिस का सीधा शिकार औरतें और बच्चे होंगे.

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सुषमा: भाग 3- क्या हुआ अचला के साथ

लेखिका- लीला रूपायन

हर्ष की मां की तबीयत खराब रहने लग गई थी. मैं तो अपनी बीमारी का कंबल ओढ़े पड़ी रहती थी. किसी को क्या तकलीफ है, मुझे इस से कोई मतलब नहीं था. घर में एक औरत रखी गई, जो माताजी की दिनरात सेवा करती थी. उस का नाम था सुषमा. मैं देखती, कुढ़ती, मां के लिए हर्ष कितना चिंतित हैं, मेरी कोई परवा नहीं, लेकिन मैं यह देख कर भी हैरान होती कि यह सुषमा किस माटी की बनी है. सुबह से ले कर देर रात तक यह कितनी फुरती से काम करती है. थकती तक नहीं. मुंह पर शिकन तक नहीं आती. हमेशा  हंसती रहती.

एक दिन मैं लौन में बैठी थी तो सुषमा भी मेरे पास आ कर बैठ गई. बड़े प्यार और हमदर्दी से बोली थी, ‘आप को क्या तकलीफ है, मैडम?’

‘कुछ समझ में नहीं आता,’ मैं ने थके स्वर में कहा था.

‘डाक्टर क्या बताते हैं?’

‘किसी की समझ में कुछ आए तो कोई बताए. किसी काम में मन नहीं लगता, किसी से बात करना अच्छा नहीं लगता. हर समय घबराहट घेरे रहती है.’

‘मेरी बात का बुरा मत मानना, मैडम, एक बात कहूं?’ सुषमा ने डरतेडरते पूछा था.

‘कहो.’

‘आप अपने को व्यस्त रखा करिए. कई बार इंसान के सामने कोई काम नहीं होता तो वह इसी तरह अनमना सा बना रहता है. बच्चों को भी आप ने होस्टल में भेज दिया, वरना तो उन्हीं का कितना काम हो जाता. आप अपने घर की देखभाल खुद क्यों नहीं करतीं?’

‘एक बात बता, सुषमा, तू रोज दोपहर को 2-3 घंटे के लिए कहां जाती है?’ मैं ने उत्सुकता से पूछा था.

‘कहीं भी चली जाती हूं, मालकिन. कमला को बच्चा हुआ, उस की मालिश करनी होती है. 28 नंबर वाले जगदीशजी की मां बीमार है, उस की मदद करने चली जाती हूं. निम्मी भाभी हैं न…’

‘यह निम्मी भाभी कौन हैं?’

‘जहां मैं पहले काम करती थी. उन के पास नौकरानी है तो सही, लेकिन उन्हें मुझ से बड़ा प्रेम है. उन के छोटेछोटे बालबच्चे हैं. शाम को स्कूल से आते हैं तो निम्मी भाभी की जा कर मदद कर देती हूं. वे खुद भी पढ़ाने जाती हैं, थकीहारी आती हैं.’

‘फिर ये रुपए किस के लिए ले जाती है तू?’ मैं हैरान थी.

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‘कितने ही जरूरतमंद ऐसे हैं जिन्हें सेवा और पैसे की जरूरत होती है. मेरे पीछे कौन खाने वाला है जिस के लिए इकट्ठा करूं? सोचती हूं, चार पैसे किसी जरूरतमंद के काम आ जाएं तो अच्छा ही है.’

‘तुम्हें पता रहता है किसे पैसे की या सेवा की जरूरत है?’

‘दुनिया बहुत बड़ी है, मैडम. बाहर निकल कर आप देखेंगी तो जान पाएंगी कि किस को क्या चाहिए. कौन दुख का मारा रास्ता देख रहा है कि कोई आए और उस के दुख बांट ले,’ सुषमा कितने उत्साह से बोल रही थी, ‘मैडम, बड़ा फायदा है दूसरों का दुख बांटने में. मन को कितना संतोष मिलता है, सुख मिलता है. जब हम बाहर निकल कर दूसरों की तकलीफों को देखते हैं तो सच मानिए, अपनी तकलीफ अपनेआप ठीक हो जाती है.’

‘तू थकती नहीं, सुषमा?’

‘नहीं, मैम. यह काम ही तो है जिस ने मुझे इस उम्र में भी तंदुरुस्त रखा हुआ है. फिर इस शरीर को इतना भी क्या संभाल कर रखें, यह हमारे किस काम आएगा? जानवरों का तो चाम भी काम आ जाता है. अपनी चमड़ी तो उस काम भी नहीं आती. फिर क्यों न इस से जीभर के मेहनत की जाए? संभाल कर रखने से तो इसे जंग खा जाएगा, जैसे मशीन बंद पड़ी रहे तो उस में जंग लग जाता है.’

‘सच, सुषमा?’ जैसे मैं सपने से जगी थी.

‘हां, मालकिन, दूसरों का दुख बांट लो तो अपना खुद ही कम हो जाएगा. फिर कैसी सुस्ती, कैसी उदासी और कैसी बीमारी? मैं तो अपने शरीर को हरामखोरी नहीं करने देती, मैडम,’ सुषमा कितने विश्वास से यह बात कह गई थी.

सुषमा उठ कर चली गई थी मेरे लिए प्रश्नचिह्न छोड़ कर. बिहार के उस लगभग अनपढ़ गांव की औरत ने कितने बड़े राज की बात कह दी थी. उस की बातें मुझे कहीं भीतर तक चीरती हुई निकल गई थीं. यह सुषमा, जिस के पास मुट्ठीभर पूंजी है, उसे बांट कर कितने सुखसंतोष का अनुभव करती है. दूसरों की सेवा में कितना इसे आनंद मिलता है, और मैं अपने शरीर को लिए ही चिंतित हूं. मैं क्या किसी के लिए कुछ नहीं कर सकती? अब मैं किसी निश्चय पर पहुंच चुकी थी.

हर्ष को सुबह उठते ही एक कप कौफी लेने की आदत थी. मेरी तबीयत खराब होने से यह काम नौकर करने लगा था, क्योंकि मैं तो देर तक बिस्तर पर पड़ी रहती थी. यह मेरा काम था जिसे मैं भूल गई थी. जब उस रोज सुबह में कौफी ले कर पहुंची तो हर्ष बड़ी हैरानी से मुझे देखते रह गए, ‘तुम, मनसुख कहां गया?’

‘यह मेरा काम था. मैं भूल गई थी,’ मैं ने निगाह नीची किए कहा था.

‘लेकिन तुम्हारी तबीयत?’ वे हैरान थे.

‘वह अब ठीक हो जाएगी. मुझे पता लग गया है, मुझे क्या बीमारी थी,’ मैं शरारत से मुसकरा दी थी.

‘क्या थी?’

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‘मेरी बीमारी का नाम हरामखोरी था. मेरे डाक्टर ने मुझे समझा दिया है.’

‘कौन सा डाक्टर?’ वे जानने को उत्सुक थे.

‘सुषमा…सच, मैं तो यह भूल ही गई थी कि दूसरों को भी मेरी जरूरत है. मैं इतनी स्वार्थी हो गई थी कि बस यही चाहती थी सब मेरी चिंता करें. सब का दुखदर्द समझती तो न खुद मैं परेशान रहती, न ही इतनी बोरियत सताती. सुषमा ने मुझे सोते से जगा दिया है.

‘इस के बाद वह मेरी आदर्श बन गई, मेरी गुरु, जिस ने मुझे जीने की राह बताई है, मेरी झोली में खुशियां भर दी हैं, मुझे मेरा परिवार लौटा दिया है,’ मेरी आंखों में कितनी ही खुशी के आंसू आ गए थे. मेरे बच्चे मेरे पास वापस आ गए. कहने लगे होस्टल में मन नहीं लगता. हर्ष और मां खुश हैं. मैं कितनी खुश हूं सुषमा को पा कर जिस ने मेरा इतना काम बढ़ा दिया है. लगता है, दिन खत्म हो गया पर काम तो पूरा हुआ नहीं. वह भी तो जुटी रहती है सब के दुख बांटने में. मैं ने सोच लिया है कि अब सुषमा को अपने से दूर नहीं करूंगी. कहीं मैं फिर न भटक जाऊं. उसे देख कर हमेशा यही खयाल आता है कि जो सुख दूसरों के दुख मिटाने में है वह अपने को सहेज कर रखने में कहां है. हम दूसरों का दुख कम करेंगे तो हमारा दुख अपनेआप कम हो जाएगा.

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सुषमा: भाग 2- क्या हुआ अचला के साथ

लेखिका- लीला रूपायन

हर्ष ने कभी ऐसी कोई हरकत नहीं की थी जिस से मेरे मन को ठेस लगे, कोई मर्यादा भंग हो या हम किसी के उपहास का पात्र बनें.

एक दिन मेरी तबीयत बहुत खराब थी. दफ्तर का काम निबटाना जरूरी था, इसीलिए मैं चली गई थी. मैं कुछ पत्र टाइप कर रही थी और मुझे महसूस हो रहा था कि हर्ष की निगाहें बराबर मेरा पीछा कर रही हैं. मैं घबराहट से सुन्न होती जा रही थी. तभी उन्होंने पुकारा था, ‘अचला, लगता है आज तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं. तुम्हें नहीं आना चाहिए था. जाओ, घर जाओ. यह काम इतना जरूरी नहीं है, कल भी हो सकता है.’

‘बस, सर, थोड़ा काम और रह गया है, फिर चली जाऊंगी.’

‘जरा इधर आओ. यहां बैठो,’ उन्होंने सामने वाली कुरसी की ओर इशारा किया.

मेरे बैठने पर पहले तो वे कुछ देर चुप रहे, लेकिन थोड़ी देर बाद सधे स्वर में बोले थे, ‘बहुत दिनों से मैं तुम्हें एक बात कहने की सोच रहा था. मैं जो कुछ भी कहूंगा, भावुकता में नहीं कहूंगा और इस का गलत अर्थ भी मत लगाना. मैं ने तुम से शादी करने का निश्चय किया है. तुम से ‘हां’ या ‘न’ में उत्तर नहीं चाहता, बात तुम्हारे पापा से होगी. केवल अपना परिचय देना चाहता था, ताकि तुम उस पर गौर से सोच सको और जब तुम्हारे पापा तुम से शादी के विषय में बात करें तो अपना निर्णय दे सको.

‘यह तो तुम ने देख ही लिया है, मेरा बिजनैस है और परिवार के नाम पर सिर्फ मेरी मां हैं. मां को भी तुम ने देखा है, बीमार रहती हैं. तुम सोच रही होगी कि मैं ने अभी तक शादी क्यों नहीं की. मैं चाहता था, मुझे ऐसी लड़की मिले, जो विनम्र हो, कर्तव्यनिष्ठ हो, जिस में हर काम कर गुजरने की लगन हो, जो विवेकशील हो, तब शादी करूंगा. कभी यह इच्छा नहीं हुई कि संपन्न घराने की लड़की मिले. इतना तो हमारे पास है ही कि सारी उम्र किसी के आगे हाथ पसारने की जरूरत नहीं. इतने दिनों में मैं ने तुम्हें बहुत परखा है. मैं जान गया हूं, तुम्हीं वह लड़की हो, जिस की मुझे तलाश थी. तुम्हारे साथ शादी मैं दयावश नहीं कर रहा हूं. मुझे तुम्हारी जरूरत है. मैं तुम्हारे पापा से जल्दी ही बात करूंगा. ‘हां’ या ‘न’ का फैसला तुम्हें करना है और उस के लिए तुम स्वतंत्र हो.’

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पापा से उन्होंने बाद में बात की थी. मैं ने पहले ही सबकुछ बता दिया था, क्योंकि मैं पापा से कभी कोई बात नहीं छिपाती थी.

पापा ने उन की आयु का सवाल उठाया था. लेकिन मां ने यही कहा था, ‘आयु तो गौण बात है. जीनामरना किसी के हाथ में थोड़े ही है.’

जब हर्ष ने बाबा से बात की तो बाबा ने बस यही कहा था, ‘मेरी परिस्थिति से आप परिचित हैं. इस के बाद भी आप अचला का हाथ मांग रहे हैं तो मुझे इनकार नहीं है. कौन मांबाप अपनी संतान को सुखी नहीं देखना चाहता?’

हमारी शादी हो गई थी. एक साल कैसे निकल गया, पता ही नहीं लगा. मैं ने घर की सारी जिम्मेदारियां संभाल लीं. हर्ष और मां मेरे व्यवहार से बहुत खुश थे. मेरे पापा हमेशा कहते, ‘बेटी, तू बड़े घर ब्याही गई है, लेकिन बाप की हालत को मत भूलना. पुराने दिन याद रहें तो आदमी भटकन से बचा रहता है. अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक रहोगी तो सब से प्यार और सम्मान मिलता रहेगा.’

मेरा पहला बेटा जब हुआ था तब तक तो सब ठीक था. लेकिन दूसरे बेटे के पैदा होने पर न जाने मुझे क्या हो गया था कि मैं बीमार रहने लग गई थी. तबीयत की वजह से मेरा किसी काम में मन नहीं लगता था. हर्ष के और मां के जिस काम को करने से मुझे हार्दिक संतोष मिलता था, अब मैं उस से भी कतराने लग गई थी.

कभी हर्ष कहते, ‘यह तुम्हें क्या होता जा रहा है? तुम पहले तो ऐसी नहीं थीं?’ तो बजाय सीधी बात करने के, मैं गुस्सा करने लगती.

कितने ही डाक्टरों को दिखाया गया. सब का एक ही उत्तर होता, ‘शरीर तो बिलकुल स्वस्थ है, कोई बीमारी नजर ही नहीं आती, क्या इलाज किया जाए? हां, इन्हें अपनेआप को व्यस्त रखना चाहिए.’

जब यही बात हर्ष मुझ से कहते तो मैं बिगड़ उठती, ‘मैं और कैसे व्यस्त रहूं? जितना काम हो सकता है, करती हूं. तुम सोचते हो, मैं झूठ बोलती हूं. तुम्हारे पास तो इतना भी वक्त नहीं, जो आराम से पलभर मेरे पास बैठ कर मेरा सुखदुख जान सको.’

‘तुम क्या चाहती हो, दफ्तर का काम छोड़ कर तुम्हारे दुख में आंसू बहाया करूं? पहले क्या मैं सारा दिन तुम्हारे पास बैठा करता था, जो अब तुम्हें शिकायत है कि मैं बैठता नहीं? मेरे लिए मेरा काम पहला फर्ज है, बाकी सबकुछ बात में, इसे तुम अच्छी तरह जानती हो,’ वे सख्त आवाज में बोले थे, ‘और फिर तुम्हें बीमारी क्या है?’

‘बस, अमीर लोगों के यही तो चोंचले होते है. गरीब की लड़की ले आना ताकि ईमानदार नौकरानी बनी रहे. गरीब की सांस भी उखड़ने लगे तो अमीर समझता है, तमाशा कर रहा है,’ मैं सुबक पड़ी थी.

‘अचला, इस से पहले कि मैं कोई सख्त बात कहूं, तुम यह याद रखना आज के बाद तुम्हारे मुंह से कोई गलत बात न निकले. तुम जानती हो बदतमीजी मुझे बिलकुल पसंद नहीं है,’ और वे गुस्से में चले गए थे.

हर्ष ने मुझ से बोलना कम कर दिया था. मैं और कुढ़ने लग गई थी. बदतमीजी भी मैं ही करती थी और उन से शिकायत भी मुझे ही रहती थी. यह तो मैं आज सोचती हूं न. तब किसे जानने की फुरसत थी? पापा के समझाने पर उन से भी तो मैं ने अनापशनाप कह दिया था.

मेरा चिड़चिड़ापन बढ़ता गया था. बच्चों पर गुस्सा निकालती थी. नौकर की जरा सी लापरवाही पर उसे फटकार देती. हर्ष देर से आते तो तकरार करने लग जाती. एक दिन मैं ने कितने अविश्वास से उन से बात की थी. आज सोचती हूं तो लज्जित हो उठती हूं. कितनी नीचता थी मेरे शब्दों में. शायद उस दिन हर्षजी को कुछ ज्यादा देर हो गई थी. मैं ने उन से कहा था, ‘आज नई कंप्यूटर औपरेटर के साथ कोई प्रोग्राम था?’

‘क्या कहना चाहती हो?’ वे कठोरता से बोले थे.

‘यही कि इतनी देर फिर तुम्हें कहां हो जाती है?’

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‘मैं नहीं समझता था, तुम इतनी नीच भी हो सकती हो. देर क्यों होती है. सब सुनना चाहती हो? इस घर में आने की बात दूर, इस घर की याद भी जाए, अब यह भी मुझ से बरदाश्त नहीं होता. मैं ने क्या सोचा था, क्या हो गया. मेरे सपनों को तुम ने चूरचूर कर दिया है,’ वे तड़प कर बोले थे.

कभीकभी मुझे अपने व्यवहार पर बहुत पछतावा होता. मैं सोचती, ‘ये सब लोग क्या कहते होंगे? आखिर है तो छोटे घर की. स्वभाव कैसे बदलेगी,’ लेकिन यह विचार बहुत थोड़ी देर रहता.

बच्चों को हर्ष ने होस्टल में डाल दिया था. अब वे मेरी ओर से और भी लापरवाह हो गए थे. मैं अब कितना अकेलापन महसूस करने लगी थी. एक दिन मैं ने उन से कहा था, ‘तुम दिनभर औफिस में रहते हो. बच्चों को तुम ने होस्टल में डाल दिया है. दिनभर अकेली मैं बोर होती रहती हूं. इस तरह मैं पागल हो जाऊंगी.’

‘बच्चों को इस उम्र में अपने घर से दूर रहना पड़ा है, इस की वजह भी तो तुम्हीं हो. पहले अपनेआप को बदलो, बच्चे फिर घर आ जाएंगे. जिंदगी में कितने काम होते हैं, आदमी करने लगे तो यह जिंदगी छोटी पड़ जाए उन कामों के लिए, और एक तुम हो जो यह सोचे बैठी हो, कितना काम करूं,’ वे तलखी से बोले थे.

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सुषमा: भाग 1- क्या हुआ अचला के साथ

लेखिका- लीला रूपायन

मेरी कोठी की तीसरी मंजिल की बरसाती आज एक फ्लैट का रूप ले चुकी है. यह वही छत है जिस पर मैं अपना बोनसाई गार्डन प्लान कर रही थी पर कभी बनाया नहीं था. मैं वहां किसी को पांव नहीं रखने देती थी, इसलिए कि यह अपनी खूबसूरती न खो बैठे. आज उसी के एक तरफ मैं ने एक छोटा सा फ्लैट, इस को मैं ने खुद पास खड़े हो कर बनवाया है. सुषमा से मैं ने कितनी बार पूछा था, ‘‘सुषमा, तू भी तो कुछ बता, इस में कोई और काम करवाना हो तो? वरना जब मिस्त्री लोग चले जाएंगे तो कुछ भी नहीं हो सकेगा.’’

‘‘बस, मैडम, बहुत हो गया. कहां हम लोग झुग्गीझोंपड़ी में खस्ताहाल जीवन जीने वाले और कहां आप ने अपने घर की छत पर मेरे लिए कमरा बनवा दिया,’’ वह हाथ जोड़ कर बोली थी.

‘‘हाथ मत जोड़ा कर, सुषमा, मैं ने कितनी बार कहा है. यह तो मेरे लिए खुशी की बात है कि मुझे तुझ जैसी नेक, रहमदिल, समझदार साथिन मिली. नरक तो मैं भुगत रही थी. अगर तू मेरे जीवन में न आती तो ये महकी हुई बहारें मेरे जीवन में कहां से आतीं?’’ मैं ने सुषमा के हाथ पकड़ लिए थे.

‘‘आप तो मुझे शर्मिंदा करती हैं, मैडम. मैं ने ऐसा क्या किया है आप के लिए? बाकी सब बात छोडि़ए, इन हाथों से आप की सेवा तक नहीं कर पाई,’’ सुषमा नतमस्तक हो गई थी.

‘‘तू कभी नहीं जान सकेगी, सुषमा कि तू ने मेरे लिए क्या किया है, और जब जान जाएगी तो उसे छोटी सी बात कह कर तू उस का महत्त्व कम कर देगी. बस, अब तो यही वादा कर कि तू मुझे छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी. मेरी बात को गलत मत समझना, सुषमा. तू अपने कर्तव्य को पूरी तरह निभाएगी, उस के लिए तू स्वतंत्र है. अब तो मैं भी तेरे साथ हूं न,’’ मैं ने हंसते हुए उस के कंधे पर हाथ रख दिया था.

‘‘मेरी दुनिया में और है ही कौन, मालकिन. न बालबच्चा, न पति. न पीहर, न ससुराल. किसी की झोंपड़ी में किराया दे कर रहती थी. सारे दिन की मेहनतमजदूरी कर के वापस आ कर वहां पड़ जाती थी. बस, इसी तरह जिंदगी की गाड़ी खिंच रही थी. न जाने कैसे आप के पांवों तक पहुंच गई. अब आप के कदमों में प्राण निकल जाएं, बस यही इच्छा है. चार बालिश्त कफन तो मिल जाएगा. झुग्गीझोंपड़ी में मरती तो पासपड़ोस वाले पुलिस की गाड़ी में मेरी लाश अस्पताल में चीरफाड़ के लिए भेज देते. जिन्हें एक जून पेट भर खाना भी नसीब नहीं होता, वे कहां से मेरे लिए लकड़ी का जुगाड़ करते?’’ सुषमा की आंखें भर आई थीं.

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18 साल पहले मेरी खुद की शादी हुई थी. अच्छे खातेपीते परिवार में डोली से जब उतरी थी तो अपनेआप से स्वयं ही वह ईर्ष्या करने लग गई थी. मांबाप की खुशी का ठिकाना ही नहीं था. उन्होंने कभी सपने में भी न सोचा होगा कि उन की बेटी इस तरह राजरानी बन जाएगी.

जैसे ही मैं ने बीए किया था, पिताजी ने आगे पढ़ाने से इनकार कर दिया था. मैं ने नौकरी के लिए हाथपांव मारने शुरू कर दिए थे, ताकि घर के खर्चों में हाथ बंटा सकूं. वह किसी भी तरह का काम करने को तैयार थी. भले ही वह ट्यूशन हो या कोई और छोटामोटा काम. जैसे ही पता चलता कि अमुक जगह काम मिल सकता है, वह वहां जा कर हाथ पसार कर खड़ी हो जाती. कितने ही दिन ठोकरें खाने के बाद जब सफलता मिली तो ऐसे रूप में कि नौकरी तो मिली ही, बाद में पति भी मिल गया.

एक दिन मेरे पिता ने ही कहा था, ‘हमारे डायरैक्टर के कोई रिश्तेदार हैं. उन का अपना व्यापार है. उन्हें एक कंप्यूटर औपरेटर की जरूरत है. तू तो कंप्यूटर भी सीख रही है, बेटी. मैं ने डायरैक्टर से आग्रह तो किया है. अगर वे सिफारिश कर देंगे तो शायद यह नौकरी तुम्हें मिल जाए. तुम दफ्तर में काम कर सकोगी?’

‘हां, पापा, जरूर करूंगी,’ मैं ने बड़े विश्वास से कहा.

सेठजी ने पत्र दे दिया था. जब उस फर्म के मालिक ने उस पत्र को पढ़ा था तो मुझे सिर से ले कर पांवों तक गौर से देखा था. जैसे मुझे तौला जा रहा हो, इतनी छोटी उम्र में मैं क्या नौकरी कर सकूंगी? जाने वह कैसी दृष्टि थी जिसे मैं सहन नहीं कर पा रही थी. और मेरी आंखें जमीन की ओर झुकती ही चली गई थीं. तभी मेरे कानों में उन की गंभीर आवाज पड़ी थी, ‘बहुत जरूरत है इस नौकरी की?’

‘जी हां,’ मैं ने डरतेडरते कहा था.

‘घर में और कौन है कमाने वाला?’

‘केवल मेरे पापा. हम 3 भाईबहन हैं. सब से बड़ी मैं ही हूं. पापा के वेतन से घर का पूरा खर्चा नहीं चलता. इसी लिए मेरी पढ़ाई भी रुक गई है. आप मुझे यह नौकरी दे देंगे तो मेरे पापा की बहुत सहायता हो जाएगी,’ मेरी आवाज भय से कांप रही थी.

‘तुम जानती हो यहां देर तक काम होता है. इसीलिए ज्यादा पुरुष हैं. इतने पुरुषों में काम कर सकोगी? देर हो जाने पर डरोगी तो नहीं?’

‘जी नहीं. आदमी अपने चरित्र पर दृढ़ रहे, कर्तव्य का बोझ कंधों पर हो तो उसे किसी से डर नहीं लगता. मैं आप को वचन देती हूं, मैं आप का काम लगन और ईमानदारी से करूंगी. आप को मुझ से कभी कोई शिकायत नहीं होगी,’ मैं ने दृढ़ता से कहा था.

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‘ठीक है, तुम कल से आ सकती हो,’ और उन्होंने अपने अधीनस्थ कर्मचारी को बुला कर कहा था, ‘यह अचला है. कल से इन की मेज इसी कमरे के बाहर करनी होगी. मुझे उम्मीद है यह मेरा काम संभाल लेगी.’

मुझे वह नौकरी मिल गई थी. आमतौर पर मैं सलवारसूट या साड़ी पहनती थी. एक दिन टौप व जींस पहन कर गई थी तो उन्होंने यह कह कर मुझे दफ्तर से वापस भेज दिया, ‘ऐसा लिबास पहन कर आया करो जिस में गंभीर और शालीन नजर आओ. ऐसा नहीं कि सब लोगों के लिए तुम तमाशा बन जाओ.’

‘साड़ी एक ही थी, छोटी बहन पहन कर कालेज फंक्शन में गई. सलवारकमीज के दोनों जोड़े धुलने गए थे इसीलिए,’ मैं घबरा गई थी.

‘जाओ, कैशियर से एडवांस ले लो और एक और साड़ी खरीद लो. मुझे उम्मीद है भविष्य में तुम हर बात का ध्यान रखोगी. मुझे सस्तापन बिलकुल पसंद नहीं,’ और मुझे एडवांस देने के लिए उन्होंने कैशियर को टैलीफोन कर दिया था.

फिर मैं ने उन्हें शिकायत का कभी मौका नहीं दिया था. मैं बड़ी लगन और मेहनत से काम करती थी. वे मेरा काम देखते और मुसकरा देते. इस से मेरा उत्साह बढ़ जाता.

उन का नाम हर्ष था. वे मेरे काम से इतने खुश थे कि अब वे कई कामों में मेरी सलाह भी ले लेते थे. उन के मोबाइल का नंबर सेव रहता था मेरे दिल में. घर में एक ही मोबाइल था जिसे सब इस्तेल करते थे. हमारे बीच चुप्पी की वह दीवार न जाने कब गिर गई थी जो नौकर और मालिक के बीच होती है. कई बार वे हंस कर कहते, ‘अचला, तुम तो अब मेरी सलाहकार हो गई हो, और सलाहकार अच्छे दोस्त भी होते हैं.’

मेरे सुखदुख और जरूरत का वे हमेशा ध्यान रखते थे. एकदो बार मुझे वे अपने घर भी ले गए थे. वहां उन की मम्मी का मुझे भरपूर स्नेह मिला था. वे ब्लडप्रैशर की मरीज थीं, लेकिन बहुत हंसमुख थीं और यह महसूस ही नहीं होने देती थीं कि वे बीमार हैं.

आगे पढ़ें- मैं कुछ पत्र टाइप कर रही थी और…

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40 साल की Shama Sikander करेंगी शादी, प्री वेडिंग फोटोज वायरल

टीवी एक्ट्रेस शमा सिकंदर (Shama Sikander) आज यानी 14 मार्च को गोवा में बौयफ्रेंड जेम्स मिलीरन (James Milliron) से शादी करने वाली हैं. इसी बीच शादी से पहले उनके प्री वेडिंग फोटोज (Pre Wedding Photoshoot) सोशलमीडिया पर वायरल हो रहे हैं. वहीं फोटोज देखते ही सेलेब्स और फैंस उन्हें बधाई देते नजर आ रहे हैं. आइए आपको दिखाते हैं एक्ट्रेस के प्री वेडिंग फोटोज की झलक (Shama Sikander pre-wedding photos)…

प्री वेडिंग फोटोज हुई वायरल

 

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हाल ही में एक्ट्रेस शमा सिकंदर ने सोशलमीडिया पर अपनी प्री वेडिंग फोटोज शेयर की हैं, जिसमें वह अपने होने वाले पति जेम्स मिलीरन के साथ रोमांस करती नजर आ रही हैं. लुक की बात करें तो वाइट गाउन में शमा बेहद खूबसूरत लग रही हैं. वहीं जेम्स ब्लैक सूट में नजर आ रहे हैं. इसके अलावा कुछ फोटोज में शमा फ्लोरल ड्रैस पहनें पति संग एंट्री करते हुए नजर आ रही हैं.

 

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गोवा में होगी शादी

 

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हाल ही में एक्ट्रेस शमा सिकंदर अपने मंगेतर और फैमिली के साथ गोवा में पहुंची हैं. जहां पर उनकी वेडिंग होने वाली है. वहीं शादी की थीम की बात करें तो शमा इंडियन नहीं बल्कि वाइट वेडिंग करने वाली हैं. इसके अलावा हाल ही में वह अपनी बैचलर पार्टी भी एन्जौय करती हुई नजर आईं थीं, जिसकी फोटोज और वीडियो एक्ट्रेस ने सोशलमीडिया पर शेयर भी की थीं.

 

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बता दें, कई सीरियल और फिल्मों में काम कर चुकीं एक्ट्रेस शमा सिकंदर ने अपनी वेडिंग प्लानिंग के बारे में इंटरव्यू में खुलासा कर चुकी हैं कि वह जल्द ही शादी करने वाली हैं. इसी के चलते फैंस उनके वेडिंग लुक को देखने के लिए बेताब हैं.

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REVIEW: पैन इंडिया सिनेमा के नाम पर सिर दर्द है ‘राधे श्याम’

रेटिंगः आधा स्टार

निर्माताः यू वी क्रिएशंस और टीसीरीज

लेखक व निर्देशकः राधा कृष्णा कुमार

कलाकारः प्रभास, मुरली शर्मा, सचिन खेड़ेकर, भाग्यश्री, पूजा हेगड़े जगापति बाबू, सत्यराज व अन्य.

अवधिः दो घंटा बाइस मिनट

फिल्मकार राधा कृष्णा कुमार की 11 मार्च को हिंदी के अलावा तेलगू व तमिल भाषा में सिनेमाघरों में पहुॅची फिल्म ‘राधे श्याम ’’ देखकर समझ में आ जाता है कि पिछले कुछ समय से जो हो हल्ला मचाया जा रहा था कि ‘बौलीवुड खत्म हो गया’ और दक्षिण का सिनेमा बौलीवुड पर कब्जा कर रहा है. . ’’ उसकी हवा निकल चुकी है. यह हो हल्ला भी महज जुमला ही साबित हुआ. ‘राधे श्याम’से यह बात साबित हो गयी कि बौलीवुड पर दक्षिण के सिनेमा का कब्जा नही हो सकता. इससे पहले ‘साहो’,  ‘मास्टर’, ‘खिलाड़ी’का हिंदी वर्जन,  ‘वालीमाई’ का हिंदी वर्जन बुरी तरह से असफल हुए हैं. इसी के चलते ‘विमलाबाई’ का हिंदी वर्जन आने से पहले ही बंद कर दिया गया.  अब ‘‘राधे श्याम’’ का हिंदी वर्जन देखकर लोग दक्षिण सिनेमा को हिंदी में लेकर नही आएंगे.

कहानीः

फिल्म की कहानी सत्तर के दशक की है. मशहूर हस्तरेखा ज्योतिषी विक्रमादित्य उर्फ आदित्य( प्रभास), प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी का हाथ देखकर आपातकाल की भविष्य वाणी करते हैं. इसके बाद उन्हे भारत छोड़कर विदेश यानी कि रोम में जाकर बसना पड़ता है. रोम ही नही पूरे यूरोप में उनके हस्तज्योतिष के चमत्कारों की खूब चर्चा हो रही है. विक्रमादित्य एक पोलीटीशियन का हाथ देखकर भविष्य वाणी करते है कि वह सफल राजनेता नही सफल उद्योगपति बनने वाले हैं. यहां तक कि वह जिस तारीख की बात करते हैं, वह भी सच साबित होता है. वह ट्ेन के एक्सीडेंट और उसके यात्रियों की मौत की भविष्यवाणी करते हैं. यानी कि उनकी हर भविष्यवाणी सच साबित होती है. फिर नाटकीय अंदाज में वह एक अस्पताल में डॉ प्रेरणा(पूजा हेगड़े) से टकराते हैं और उनसे उन्हे प्यार हो जाता है. हस्तरेखाविद् विक्रमादित्य उर्फ आदित्य (प्रभास) भाग्य में यकीन करते हैं, जबकि डॉक्टर प्रेरणा (पूजा हेगड़े) की अलग मान्यता है. डॉ.  प्रेरणा  विज्ञान और तर्क के नियमों में यकीन करती हैं. लेकिन उनका प्यार सभी तर्कों को धता बताता है.

डॉ.  प्रेरणा को पता है कि उनकी जिंदगी के चंद माह ही बचे हैं. क्योंकि वह दुर्लभ ब्रेन ट्यूमर नुमा कैंसर रोग से पीड़ित हैं. डॉ.  प्रेरणा के चाचा(सचिन खेड़ेकर), जो चालिस वर्ष से डाक्टरी पेशे में हैं, जिनका अपना एक नाम है, वह भी मानते हैं कि मेडीकल साइंस में डॉ.  प्रेरणा की बीमारी का कोई इलाज नही है. मगर डां.  प्रेरणा के प्यार में आकंठ डूबे विक्रमादित्य उनका हाथ देखकर 74 वर्ष तक जीने की भविष्यवाणी करते हैं. पर उन्हे यह नही पता चलता कि डॉं प्रेरणा कैंसर की मरीज है. जब प्रेरणा के चाचा डॉ. आदित्य को बताते हैं कि प्रेरणा की बीमारी का मेडिकल साइंस में कोई इलाज नही है, तब आदित्य कहते हैं कि मेडिकल साइंस बेकार है. प्रेरणा 74 साल तक जिएंगी. इतना ही नहीं मृत लोगों के हाथों के कागज पर प्रिंट देखकर उनकी उम्र, पुरूष या स्त्री, मौत का कारण वगैरह बताते हैं. फिर अपने अपने प्यार को जीतने की बात होती है. इसके बाद कहानी एक अलग ढर्रे पर चलती है.

लेखन व निर्देशनः

जिन्हे मनोरंजन की बजाय सिर दर्द मोल लेकर क्रोसीन या अन्य सिर दर्द की दवा का सेवन करना हो, उन्हे ही ‘बाहुबली’ फेम अभिनेता प्रभास की फिल्म ‘‘राधे श्याम ’’ देखनी चाहिए. फिल्म की धीमी गति और कहानी के चलते यह अति बोरिंग व सिरदर्द वाली फिल्म है. फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी इसकी पटकथा है.  इसमें हस्तज्योतिष को महान बताने के लिए विज्ञान को ही नेस्तानाबूद कर डाला गया. इतना ही नही हस्तरेखाविद् विक्रमादित्य उर्फ आदित्य (प्रभास) भाग्य में यकीन करते हैं, जबकि डॉक्टर प्रेरणा (पूजा हेगड़े) की अलग मान्यता है. डॉ.  प्रेरणा  विज्ञान और तर्क के नियमों में यकीन करती हैं. लेकिन प्यार को जिताने के चक्कर में फिल्मकार आदित्य व प्रेरणा के विरोधाभासी यकीन को नजरंदाज कर पूरी फिल्म को तहस नहस कर डाला. फिल्मकार अपने किसी भी तर्क ्रपर टिके ही नहीं. पूरी फिल्म देखकर यह सोचना भी मूर्खता ही होगी कि फिल्म का नाम ‘राधे श्याम’ क्यों है?

अफसोस की बात यह है कि फिल्मकार को यही नही पता कि वह हस्त ज्योतिष को महान,  मेडीकल साइंस को बेकार  बताना चाहते हैं अथवा टाइटैनिक वाली प्रेम कहानी बताना चाहते हैं या हाथ की रेखाएं नही बल्कि कर्म से तकदीर बनती है. आखिर उन्हे दर्शकांे को कौन सी कहानी बतानी है, यही नही पता. पूजा हेगड़े और प्रभास के बीच जो रोमांस फिल्माया गया है, वह दो ंइंसानों की बजाय दो लकड़ियों की कठपुतली का रोमांस नजर आता है. पूजा और प्रभास के बीच कोई केमिस्ट्ी ही नजर नही आती. फिल्म में पूजा हेगड़े का परिचय वाला शुरूआती दृश्य हूबहू उस स्टंट की नकल है,  जो कि चलती लोकल ट्ेन में नई पीढ़ी के लड़के व लड़कियां करते नजर आने पर पुलिस उन पर जुर्माना लगाकर सजा देती है. और हमारे फिल्मकार उसी स्टंट का महिमा मंडन करते हुए युवा पीढ़ी को गलत राह पर ढकेलने का काम किया है. अफसोस तो इस बात का है कि जिसे भारतीय रेलवे गैर कानूनी मानता है, उस स्टंट को सेंसर बोर्ड ने पारित कर दिया. इतना ही नहीं विक्रमादित्य अपने ज्योतीषीय ज्ञान से देख लेता है कि ट्ेन का एक्सीडेंट होगा और सभी यात्री मारे जाएंगे, फिर वह बाहुबली बनकर पेड़ को उखाड़कर फेंकते हुए तेज गति से भाग रही ट्ेन का एक्सीडेंट रोकने के लिए भागता है, जबकि ट्ेन का एक्सीडेंट हो जाता है. यह पूरा दृश्य ही अति बनावटी है. इस तरह के दृश्य कहानी को मजबूती प्रदान नही करते.

फिल्म का क्लायमेक्स अति घटिया है. अस्पताल के अंदर दो मिनट के ‘डेथ प्रैक्टिस’ के दृश्य न सिर्फ घटिया हैं, बल्कि सेंसर बोर्ड पर सवाल उठाते हैं कि उसने ऐसे दृश्य को पारित कैसे कर दिया?

फिल्म में सारा वीएफएक्स  बहुत घटिया है. माना कि कैमरामैन मनोज परमहंस ने इटली और जॉर्जिया के भव्य स्थानों और गलियों को सबसे असाधारण तरीके से कैद किया है. प्रत्येक दृश्य एक दृश्य तमाशा है, जो दर्शकों को इसकी पृष्ठभूमि से मंत्रमुग्ध कर देता है. यहां तक कि फिल्म के मुख्य किरदारों के घर और बेडरूम भी आलीशान हैं. काश इतना ही ध्यान इसकी पटकथा लेखन पर भी दिया गया होता.

फिल्म के अंतिम दृश्य के साथ अमिताभ बच्चन की आवाज में संवाद गूंजता है-‘किस्मत तुम्हारे हाथों की लकीरें नहीं,  तुम्हारे कर्मों का नतीजा है. ’तो सवाल उठता है कि फिल्मकार सवा दो घंटे से भी अधिक समय तक दर्शकों को क्या मूर्ख  बना रहे थे.

350 करोड़ की लागत से बनी फिल्म ‘राधे श्याम’ को लेकर लंबे समय से ‘साइंस फिक्शन’ के नाम पर जो हौव्वा खड़ा किया गया था, इसमें वैसा कुछ भी नही है.

अभिनयः

‘राधे श्याम’ में प्रभास के अति स्तरहीन अभिनय को देखकर यह यकीन करना मुश्किल हो रहा है कि प्रभास ने ही ‘बाहुबली’ में अभिनय किया था. ‘बाहबुली’ में प्रभास का जो करिश्माई व्यक्तित्व, अभिनय स्टाइल वगैरह नजर आया था, वह सब इस फिल्म में शून्य है. प्रभास की संवाद अदायगी बहुत ही कमजोर है. पूजा हेगड़े का अभिनय की बजाय उनकी खूबसूरती जरुर आंखे को सकून देती है. पर भावनात्मक दृश्यों को उन्होने  परिपक्वता के साथ निभाया है. जगापति बाबू, मुरली शर्मा, कुणाल रौय कपूर जैसे कलाकारों की प्रतिभा को पूरी तरह से जाया किया गया है.

Holi Special: मेहमानों के लिए घर पर बनाएं गुझिया

रंगों के त्योहार होली के अवसर पर घरों में गुझिया बनाई जाती है. कुछ लोगों को घर में गुझिया बनाना मुश्किल लगता है. लेकिन इसे बनाना बेहद आसान है. आइए जानें इसकी रेसिपी.

सामग्री

मैदा

घी पिघला हुआ

तलने के लिए घी या तेल

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भरने के लिए

500-600 ग्राम खोया

आधा छोटा चम्मच हरी इलायची पाउडर

25 ग्राम बारीक कटे बादाम

25 ग्राम किशमिश

25 ग्राम सूखा घिसा नारियल

350 ग्राम बूरा

विधि

घी में मैदा मिलाकर गूंद लें. ध्यान दें कि यह मैदा सॉफ्ट हो. इसे ढककर अलग रख दें. अब खोया मैश करके इसे कढ़ाई में फ्राई कर लें. इसे लाइट ब्राउन होने तक फ्राई करें.

खोये में इलायची पाउडर और बूरा मिलाकर अचछी तरह मिक्स कर लें. इसमें बादाम, नारियल, काजू और किशमिश मिला लें. इन्हें दो मिनट तक फ्राई करें. इसे ठंडा होने दें.

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गूंथे हुए आटे के छोटे बॉल्स बना लें, जिनका डायमीटर 4 इंच के करीब हो. अब गुझिया बनाने का सांचा लें. मैदा की बनाई गई लोई को बेल लें और इसकी आधी साइड में खोया मिक्सचर भर लें. अब इसे सांचे में रखें और उसे दबा दें. बाहर निकले एक्स्ट्रा पोर्शन को हटा दें.

इसी तरह दूसरी लोई को बना लें. सारी गुझिया बनाकर एक कपड़े पर रख लें. कढ़ाई में घी गर्म करके इसे डीप फ्राई कर लें. जब इसका कलर गोल्डन ब्राउन हो जाए, तो बाहर निकाल लें. इसे एयर टाइट ग्लासजार में स्टोर करके रखें.

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