Commitment issues in relationships : कही आप कमिटमेंट इश्यूज के शिकार तो नहीं

Commitment issues in relationships :  पिछले कुछ महीनों से एक ही ऑफिस में काम करने वाले नीलम के साथ राजेश की दोस्ती हुई, दोनों एक साथ कही घूमने – फिरने से लेकर ऑफिस में खाना भी साथ – साथ खाने लगे. दोनों की दोस्ती इतनी अधिक गहरी हो गई कि अब दोनों को एक दूसरे के बिना कुछ भी करना नागवार गुजरने लगा. दोनों ने आसपास किराये के कमरे भी ले लिए, लेकिन एक दिन जब नीलम ने दोस्ती को शादी का रूप देने की बात कही, तो राजेश सिरे से नकार दिया. उसके हिसाब से ये रिश्ता उसके लिए सिर्फ एक दोस्ती के अलावा कुछ भी नहीं है. नीलम समझ रही थी कि राजेश झूठ बोल रहा है और शादी के कॉमिटमेंट से घबरा रहा है, लेकिन इसे प्रूव करना उसके वश में नहीं था.
नीलम ये भी समझ नहीं पा रही थी कि इतने दिनों तक साथ – साथ रहने के बावजूद राजेश ऐसा क्यों कह रहा है. नीलम उसे समझाने की बहुत कोशिश करती रही, लेकिन राजेश सिर्फ दोस्ती कहकर उससे दूर हटने लगा. उसके इस व्यवहार से नीलम दुःखी होकर तनाव में आ गई, क्योंकि उसे राजेश के साथ रहना और उसकी हर बात अच्छी लगने लगी थी, जिस वजह से उसने उसे शादी का प्रस्ताव दिया था. राजेश की इस नकारात्मक रवैये को सुनकर नीलम परेशान हो उठी और अपने मानसिक समस्या से निजात पाने के लिए काउंसलर के पास गई, जहां उसे काउंसलर ने बताया कि राजेश का ये वार्ताव उसकी ‘कमिटमेंट इश्यूज’ की वजह से है, जिससे वह शादी को स्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि वह लॉंग लाइफ कॉमिटमेंट से डरता है. हालांकि कई महीने की कॉउन्सलिंग के बाद नीलम इस परिवेश से निकली और फिर से अपने जॉब को इन्जॉय करने लगी है, लेकिन राजेश का ये व्यवहार आज भी उसे सोचने पर मजबूर करता है.
कॉमिटमेंट से भागते यूथ
असल में आज के यूथ में ‘कमिटमेंट इश्यूज’ काफी देखने को मिल रहा है. आज उन्हे आर्थिक और मानसिक दबावों से जूझना होता है, जिसमें सोशल मीडिया एक बड़ी भूमिका अदा करती है, जो सच का सामना नहीं करवाती, जिसे आज के यूथ अधिक पसंद करती है. इस बारें में मुंबई की कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल की कंसलटेंट साइकियाट्री डॉ अपर्णा रामकृष्णन कहती है कि आज के यूथ ने किताबों की कहानियों को पढ़ना बंद कर दिया है, सोशल मीडिया के रील्स को वे लगातार देखते रहते है, जिससे उनकी सोचने समझने की शक्ति कम होती जाती है, इसका सीधा असर उनके व्यक्तित्व और रिश्ते पर पड़ने लगा है, केवल रिश्तों में ही नहीं, वे जॉब में भी किसी प्रोजेक्ट को सही समय पर पूरा करने की कॉमिटमेंट से घबराते है.
सोशल मीडिया है जिम्मेदार
सोशल मीडिया पर आजकल डेटिंग ऐप्स के इतने विकल्प हैं कि सही विकल्प चुनना मुश्किल हो जाता है और सब कुछ ट्राइ करने के बावजूद यूथ के हाथ खाली ही रहते है. आज किसी एक के साथ सेटल होना, एक जोखिम जैसा लगने लगा है. व्यक्ति समझने लगता है कि जो पास में है, उससे उन्हे कुछ अधिक अच्छा मिल सकता है, जो वास्तव में होता नहीं है और सोशल मीडिया इसमें उन्हे उलझाए रखती है.
अवॉयडेंस अटैचमेंट के शिकार
सोशल मीडिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता आज के यूथ है, जहाँ हर कोई अपने और अपने रिश्तों का एक ‘परफेक्ट’ या आदर्श रूप पेश करता है. दूसरों की ये चमक-धमक वाली ज़िंदगी उनके भीतर पार्टनर और चुनाव को लेकर असुरक्षा पैदा करती है. ये उन्हे ईमोशनल चीजों से भागना सिखाता है और रिश्तों में गहराई के बजाय ‘अवॉयडेंस अटैचमेंट’ को बढ़ावा देता है, जिसमें कैजुअल रिलेशनशिप, सिचुएशनशिप, घोस्टिंग और पल भर में ‘अनमैच’ करके आगे बढ़ जाना, अब सभी के लिए सामान्य बात लगने लगी है. आज लोग मौजूदा रिश्ते की गहराई को समझने के बजाय अगले विकल्प की तलाश करने लगते है.
आर्थिक अनिश्चितता भी है एक वजह
आज के युवा गंभीर वित्तीय अस्थिरता, नौकरी की असुरक्षा और एक स्थिर कैरियर बनाने में देरी का सामना कर रहे हैं, क्योंकि वे स्टडी से लेकर कैरियर किसी में भी ठहर नहीं पाते, क्योंकि कॉमिटमेंट का अभाव होता है. ऐसे में वे एक स्थायी पार्टनर या रिश्ते की तलाश से हटकर खुद की व्यक्तिगत सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता हासिल करने में लगे रहते है, पहले ये अधिकतर लड़कियां करती थी, लेकिन आज इसमें लड़कों की संख्या बढ़ी है. जब तक उनमें स्थिरता नहीं मिलती, तब तक किसी भी कमिटमेंट में बंधना उन्हें समय से पहले लिया गया फैसला या असुरक्षित कदम लगता है.
जुड़ाव या लगाव के तरीके
इसके आगे डॉक्टर कहती है कि बचपन में परिवार में देखी हुई अप्रत्याशित घटनाए भी ‘कमिटमेंट इश्यूज’ को प्रभावित करती हैं, जैसे यदि किसी व्यक्ति का बचपन अवॉयडेंट, फियरफुल, डिस्ऑर्गनाइज़्ड या एम्बिग्यूअस अटैचमेंट स्टाइल वाला रहा है, तो उनके भीतर कई गहरे डर घर कर जाते हैं. ये अनकहे डर व्यक्ति को भावनात्मक रूप से असुरक्षित होने और जोखिम उठाने से रोकते हैं. जब तक व्यक्ति इन मनोवैज्ञानिक बाधाओं को पार नहीं कर लेता, उसके लिए किसी गहरे रिश्ते में कमिटमेंट करना उनके लिए बहुत मुश्किल हो जाता है.
35 साल की सलोनी इसलिए शादी नहीं करना चाहती, क्योंकि उसने अपने घर पर पेरेंट्स को हमेशा लड़ते हुए देखा है, उन्हे लगता है कि कोई भी लड़का ऐसा ही डिमान्डिंग होगा, जैसा उनके पिता है. अभी वह आत्मनिर्भर है और खुद आजाद है, कुछ भी करने के लिए उसे किसी से कुछ कहने सुनने की जरूरत नहीं. असल में आज की युवा पीढ़ी आजादी और व्यक्तिगत विकास को सबसे ऊपर रखती है. उनके लिए कमिटमेंट का मतलब अक्सर आजादी छिनना, समझौता करना या अपनी पहचान खो देना मानते है.
क्या कहते हैं आंकड़ें 
कमिटमेंट न कर पाने की प्रवृत्ति किसी एक लिंग में अधिक नहीं होती, बल्कि यह पुरुषों और महिलाओं दोनों में अलग-अलग वजहों से होती है, जिसमें सोशल नॉर्मस, आर्थिक दबाव और व्यक्तिगत अनुभव भूमिका निभाते हैं. कुछ शोध बताते हैं कि डेटिंग में पुरुष अक्सर ‘लेवल लगाने’ से बचते हैं, जबकि महिलाएं गंभीर रिश्ते चाहती हैं और यह हमेशा ‘कमिटमेंट न कर पाना’ नहीं होता, बल्कि जरूरतों का अंतर भी हो सकता है.
कमिटमेंट से भागने वालों के संकेत
कमिटमेंट की समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए इसके मुख्य संकेत को समझ लेना जरूरी है, ताकि समय रहते इसमे से खुद को निकालने में व्यक्ति समर्थ हो.
अपनी दुनिया से रखता है दूर
अगर आपका पार्टनर सच में आपके साथ भविष्य की सोचता है, तो वह आपको अपने करीबी दोस्तों और परिवार से जरूर मिलवाएगा, लेकिन जो लोग केवल टाइमपास करते हैं, वे आपको सीक्रेट रखना पसंद करते हैं. जब भी आप उनके दोस्तों या परिवार से मिलने की बात करते हैं, तो वे कोई न कोई बहाना बनाकर टाल देते हैं.
अचानक गायब हो जाना
अस्थिर रिश्तों का एक पैटर्न होता है, जिसमें शुरूआत में पार्टनर को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर देखना, फिर उसमें कमियाँ निकालना और फिर अचानक रिश्ते से बाहर निकल जाना. इसमें जैसे ही रिश्ते में गहराई आने लगती है या सामने वाला व्यक्ति प्यार और गंभीरता दिखाता है, वैसे ही उससे दिलचस्पी खो देना और दूरी बना लेना होता है, जैसा नीलम के साथ हुआ, राजेश शादी के बंधन में बंधने से मना कर दिया और रिश्ते को दोस्ती का नाम दे दिया.
सब कुछ अपने हिसाब से करना
रिश्ते में होने के बावजूद, वह व्यक्ति पूरी तरह से अकेला रहना पसंद करता है. वह हर काम, हर मीटिंग, और हर फैसला अपनी सहूलियत के हिसाब से करता है. आपके ज़रूरत या भावनाओं की उन्हें कम परवाह होती है यानि रिश्ता सिर्फ उनके नियमों पर चलता है.
कमिटमेंट की समस्याओं से निकलने के तरीके
• डर की पहचान और समाधान
कमिटमेंट से बचने के पीछे के असली डर को पहचानें, मसलन छोड़ दिए जाने का डर, रिश्ते में फँस जाने का डर, पुराने पैटर्न दोहराने का डर या अपनी आइडेंटिटी खोने का डर आदि इन पर खुलकर बात करें.
• अटैचमेंट स्टाइल पर दे ध्यान
व्यक्ति के अटैचमेंट स्टाइल मसलन अवॉयडैंट, एम्बिवेलेंट या डिसऑर्गनाइज्ड का मूल्यांकन करें. इसका उद्देश्य उन्हें एक सुरक्षित और भरोसेमंद अटैचमेंट स्टाइल विकसित करने में मदद करना है.
• दे नया नजरिया
व्यक्ति को यह समझने में मदद करें कि कमिटमेंट की समस्या असल में उनके दिमाग का एक सुरक्षा कवच है, जो उन्हें दुख, नुकसान या अस्थिरता से बचा रहा है. ऐसा करने से उनकी शर्म, अपराधबोध और बचाव की मुद्रा कम होती है.
• इमोशनल रेगुलेशन और कौशल सिखाएं
इस अवस्था में डायलेक्टिकल बिहेवियरल थिरेपी अधिक कारगर होती है, जिसके माध्यम से अपराधबोध, अनिश्चितता और चिंता से निपटने की तकनीक सिखाया जाता है. इसके अलावा अपनी सीमाएं तय करना, विवादों को सुलझाना, अपनी बात स्पष्टता से कहना और मनमुटाव के बाद रिश्ते को सुधारना आदि सिखना पड़ता है.
• सोच के भ्रम को दे चुनौती
कमिटमेंट से जुड़ी गलत धारणाओं को बदलना जरूरी होता है. कमिटमेंट कोई एक बार का फैसला नहीं, बल्कि रोज़ाना किया जाने वाला एक चुनाव है.
• व्यवहार संबंधी बचाव को करे दूर
धीरे-धीरे रिश्ते को नाम देने की आदत डालना सीखना पड़ता है. छोटे-मोटे झगड़ों के दौरान भागने के बजाय रुककर उन्हें सुलझाने का अभ्यास करें.
• पारिवारिक मान्यताओं का समाधान
बचपन के अनुभवों और परिवार से मिली उन मान्यताओं को पहचान कर उसे बदलना सीखें.
• मानसिक स्वास्थ्य को मैनेज करना जरूरी
चिंता, अवसाद या पुराने मानसिक आघात जैसे विकारों की जांच और उपचार करें, क्योंकि ये कमिटमेंट करने की क्षमता को काफी हद तक प्रभावित कर सकते हैं.
इस प्रकार युवाओं के लिए इतना कहना सही होगा कि एक साथ कई व्यक्ति को डेट न करें और सोशल मीडिया पर पोस्ट किये गए रील्स से खुद की तुलना करने से बचे. नएपन की तलाश के बजाय रिश्ते में भावनात्मक गहराई विकसित करने पर ध्यान दें, जो आपको एक सुकून भरी जिंदगी दे सकता है, क्योंकि कॉमिटमेंट का अभाव केवल रिश्ते में ही नहीं, कैरियर और आगे बढ़ने की दिशा में भी आपको समस्या पैदा कर सकता है, इसलिए समय रहते इसका निदान कर आप एक खुशनुमा जिंदगी जी सकते है. commitment issues in relationships

Background check before marriage : प्रेम विवाह में चेक करें बैकग्राउंड

Background check before marriage : शादी का निर्णय जीवन का सबसे बड़ा निर्णय होता है। प्रेम विवाह (Love Marriage) में अक्सर लोग भावनाओं में बह जाते हैं और व्यावहारिक चीजों को नजरअंदाज कर देते हैं। जब लड़का लड़की एक दूसरे को पसंद करने लगते है तो बहुत सारे सेंसिटिव सवाल कल के लिए टाल देते है. वो कल कभी आता नहीं है. उन्हें लगता है अगर मैंने ये सवाल पूछ लिए तो लड़का नाराज हो जायेगा.

अगर पूछ लिया तुम्हारे मदर फादर की कुल फॅमिली इनकम कितनी है तो उसे बुरा लग जायेगा ? पता चला घर में एक भाई भी है जिस पर क्रिमिनल केस चल रहा है? क्या आप उस घर में शादी करोगे? इसलिए आप दोनों को एक दूसरे का बैक चेक करना ही पड़ेगा.

लेकिन ये बैक चेक आसान नहीं है. जहाँ आपने बैक चेक किया वहां आपका झगड़ा हो गया. तुम मेरे बारे में पूछ रही थी क्या. तूने मेरे मोहल्ले की लड़की से पूछा था कि मेरे माँ बाप क्या करते है? तू मुझसे नहीं पूछ सकती थी? तू मेरे स्कूल में गई थी. तूने मेरे दोस्तों से पूछा मेरे मार्क्स कितने आये थे? मेरी मार्कशीट निकलवाना चाहती थी तू?

ये झगडे दोनों के बीच में होंगे ही और हो सकता है इन झगड़ों में आपका रिश्ता भी दांव पर लग जाएँ लेकिन चाहे जो हो ये तो आपको करना ही पड़ेगा. आपस में बात करें और एक देसरे के बारे में जाने. क्यूंकि भविष्य को सुरक्षित और सुखद बनाने के लिए एक-दूसरे का बैकग्राउंड चेक करना बहुत जरूरी है। आइये जाने क्या और कैसे चेक करें एक दूसरे का बैकग्राउंड-

क्या चेक करें?

1 फैमिली के बारे में चेक करें (Family Background)
शादी सिर्फ लड़का और लड़की के बीच में ही नहीं होती बल्कि दो परिवारों के बीच भी होती है इसलिए यह जानना जरुरी होता है कि दोनों परिवारों के विचार और तालमेल एक दूसरे के साथ मैच करता है या नहीं. इसके लिए फॅमिली बैकग्राउंड को चेक करना बहुत जरुरी है बातो बातो में लड़के या लड़की से उसके परिवार के बारे में जानकारी लेते रहें.

  • उनसे पूछें कितने भाई बहन है?
  • सब क्या क्या करते है?
  • घर में माता पिता में से किसकी जयदा चलती है? या फिर दोनों की सहमति से निर्णय लिए जाते है?
  • भाई बहन के बीच आपस में सम्बन्ध कैसे है?
  • माता पिता के बीच सम्बन्ध कैसे है?
  • क्या उनका परिवार बहुत ज्यादा पारंपरिक है जबकि आप आधुनिक विचारों के हैं? (जैसे- घूंघट प्रथा, पहनावा, या नौकरी करने की आजादी)।
  • भले ही आप दोनों के लिए यह मायने न रखता हो, लेकिन क्या उनका परिवार इसे स्वीकार कर पाएगा
  • क्या वे भविष्य में आप पर धर्म बदलने या किसी खास प्रथा को मानने का दबाव डालेंगे?
  • परिवार के किसी सदस्य पर कोई पुलिस केस तो नहीं चल रहा ये भी पता करें?

2 फाइनैंशल बैकग्राउंड चेक करें (Financial Background)
आपस में एक बार अपनी मार्कशीट भी एक दूसरे को दिखा दें हालाँकि ऐसा करना काफी मुश्किल है हो सकता है पार्टनर को आपकी ये बात पसंद ना आये लेकिन फिर भी ये जरुरी है?

  • पार्टनर से पूछें कि वह पढाई में कैसा था?
  • उसके भविष्य को लेकर क्या प्लान है?
  • क्या पार्टनर पर कोई लोन है जिसे उन्हें शादी के बाद चुकाना होगा?
  • वह कहाँ जॉब करता है? कितनी सैलेरी है?
  • उसकी सैलेरी स्लिप भी चेक करें?
  • यह सब करना काफी मुश्किल क्यूँ है-
    यह सब करना काफी मुश्किल है क्यूंकि पार्टनर को गुस्सा आ सकता है लेकिन आपको उसे इस बात के लिए राजी करना है या उसके ऑफिस में जाकर उसके बारे में, उसकी सैलेरी के बारे में पता करना है ताकि आगे चलकर कोई दिक्कत ना हो.

    3 पार्टनर के पास्ट के बारे में जाने (past Background)
  • क्या आप उनकी जिंदगी में आने वाली पहली लड़की है?
  • क्या उन्होंने आपको अपने पहले रिश्ते के बारे में पूरा सच बताया है?
  • क्या वे अपने अतीत से बहार आ चुके है या अभी तक उन यादों में गुम है?

4 पार्टनर का बिहेवियर कैसा है ( Behaviour check)

  • पार्टनर का बिहेवियर अपने से गरीब लोगों के साथ कैसा है?
  • वह अपने छोटों और बड़ों के साथ कैसे व्यवहार करता है?
  • पार्टनर को जयादा गुस्सा आता है या जल्दी ही कूल डाउन हो जाता है?
  • सार्वजनिक स्थान पर किसी विवाद होने पर वे शांति से बात करते हैं या तुरंत लड़ने पर उतारू हो जाते हैं?
  • वह आपको अपनी प्राइवेट प्रॉपर्टी की तरह तो ट्रीट नहीं करते?क्या वह आपका और इस रिश्ते का सम्मान करते है?
    5 स्वास्थ्य और जीवनशैली (Health & Lifestyle)
    क्या उन्हें कोई ऐसी बीमारी है जिसके बारे में आपको पता होना चाहिए? (जैसे- अनुवांशिक बीमारियाँ या पुरानी बीमारियाँ)।
  • धूम्रपान, शराब या किसी अन्य नशे की लत के बारे में स्पष्ट जानकारी लें?
  • क्या वह बहुत ज्यादा खर्चीले है और अमीर बाप की बिगड़ी हुए औलाद तो नहीं लगते?
  • क्या वे ट्रैफिक नियमों या सामाजिक मर्यादाओं का सम्मान करते हैं?
    6 डिजिटल फुटप्रिंट (Social Media Presence)
  • आज के दौर में किसी की सोच समझने का सबसे आसान जरिया सोशल मीडिया है।
  • वे इंटरनेट पर किस तरह की भाषा का प्रयोग करते हैं? क्या वे किसी विशेष मुद्दे पर बहुत ज्यादा आक्रामक या हिंसक विचार रखते हैं?
  • क्या उनकी ऑनलाइन जिंदगी और असल जिंदगी में जमीन-आसमान का अंतर है?देखें कि उनके दोस्त उनके बारे में क्या पोस्ट करते हैं। इससे उनके सर्कल का अंदाजा मिलता है।

बॉक्स – बैकग्राउंड चेक करना बहुत मुश्किल काम है, आइये जाने कैसे करें बैकग्राउंड चेक?

  • एक दूसरे से सीधे सवाल जवाब करना सबसे अच्छा तरीका है. उन्हें समझाएं कि ऐसा करना हम दोनों के लिए ही जरुरी है.
  • बिना किसी बड़े कार्यक्रम के उनके घर जाएं ताकि आप सामान्य स्थिति देख सकें।
  • किसी शादी या फंक्शन में उनके रिश्तेदारों से मिलें। रिश्तेदारों की बातें अक्सर परिवार के छिपे हुए सच बता देती हैं।
  • कभी-कभी उनके घर के आसपास के लोगों से सामान्य बात करने पर परिवार के स्वभाव का पता चल जाता है।
  • पार्टनर से उनके बचपन के किस्से पूछना भी सही साबित हो सकता है क्यूंकि पार्टनर बचपन की बातें बताते हुए अनजाने में परिवार के कड़वे सच या अच्छे संस्कार भी साझा कर देता है।
  • किसी ऐसे कॉमन व्यक्ति को ढूंढें जो आप दोनों को जानता हो इससे एक देसरे के बारे में काफी सही बातें उनके जरिये पता चल सकती है.
  • यदि आपको कुछ संदिग्ध लगता है, तो सीधे और विनम्रता से उस बारे में पूछें। उनके स्पष्टीकरण के तरीके से आपको उनकी सच्चाई का पता चल जाएगा।

“Pre-Matrimonial Verification” भी कराये जा सकती है. आज के समय में शादी से पहले पेशेवर जांच एजेंसियों (Private Detective Agencies) की मदद लेना काफी आम हो गया है और इसे एक समझदारी भरा कदम माना जाता है।कई बार लोग अपनी सैलरी या पद (Designation) के बारे में झूठ बोलते हैं। एजेंसियां उनके ऑफिस जाकर गुप्त रूप से इसकी पुष्टि करती हैं। इसके आलावा अगर उस पर कोई केस चल रहा हो या पिछली कंपनी से उसे निकाला गया हो तो वह भी पता चल सकता है इस एजेंसी के द्वारा.

याद रखें- किसी का परिवार और पार्टनर ‘परफेक्ट’ नहीं होता, लेकिन आपको यह देखना है कि क्या आप उन कमियों के साथ ताउम्र (Life-long) तालमेल बिठा सकते हैं या नहीं। जितना हो सके एक दूसरे की इन्क्वारी निकलवाएं लेकिन फिर भी अगर आपको लड़का पसंद है तो रिस्क तो लेना ही पड़ेगा ही. शादी के मामले में आपको हर चीज परफेक्ट नहीं मिलेगी. Background check before marriage

Causes of spotting : स्पॉटिंग क्या है? किस वजह से हो जाती है?

Causes of spotting : असामान्य योनि रक्तस्राव को स्पॉटिंग (spotting) कहा जाता है, जो पीरियड साइकल के अलावा अन्य दिनों में होता है। यह बहुत ही आम समस्या है। अगर आमतौर पर आपके पीरियड्स नियमित रहते हैं और पीरियड्स जाने के कुछ दिन बाद दोबारा से हल्की-हल्की ब्लीडिंग हो रही है, तो यही स्पॉटिंग है। हालांकि यह आपकेअस्वस्थ होने का संकेत नहीं है, लेकिन कुछ मामलों में यह चिंता की बात हो भी सकती है। इसलिए ऐसे मामले में डॉक्टर को दिखाना जरूरी हो जाता है। इस कंडीशन में डॉक्टर कुछ टेस्ट करवाते हैं जिससे पता चल सके कि यह स्पॉटिंग आपके लिए नॉर्मल है या फिर किसी बीमारी का संकेत।

वैसे हर बार ऐसा होने पर घबराने की जरुरत नहीं होती है. कई बार पीरियड शुरू होने से पहले होने वाली स्पॉटिंग, पीरियड आने का संकेत हो सकती है। वहीं, पीरियड खत्म होने के बाद कई बार हल्का-फुल्का ब्लड अंदर रह जाता है, जो स्पॉटिंग के तौर पर बाहर आता है।

स्पॉटिंग और पीरियड्स में क्या अंतर है?

स्पॉटिंग और पीरियड्स एक ही बात नहीं हैं। इनके बीच का अंतर जानने से आपको अपने मासिक धर्म चक्र को बेहतर ढंग से ट्रैक करने में मदद मिलती है। जैसे कि-
समय – स्पॉटिंग 1-2 दिन तक रहती है। मासिक धर्म 4-7 दिन तक रहता है।
कलर – धब्बे हल्के भूरे या गुलाबी होते हैं। मासिक धर्म का रक्त लाल होता है।
ब्लड फ्लो – स्पॉटिंग हल्की होती है। मासिक धर्म का प्रवाह स्थिर होता है।
लक्षण- स्पॉटिंग आमतौर पर बिना किसी ऐंठन के होती है। मासिक धर्म के दौरान अक्सर दर्द, सूजन और मूड में बदलाव होता है।

स्पॉटिंग इन वजहों से भी हो सकती है?

पेल्विक इंफ्लामेटरी डिजीज
एक से अधिक व्यक्ति से सेक्सुअल रिलेशनशिप बिल्ड करने से पेल्विक इंफ्लामेटरी डिजीज का खतरा बना रहता है। शरीर में इसका जोखिम बढ़ने से सिरदर्द, बुखार, पेट के निचले हिस्से में ऐंठन और ब्लीडिंग की समस्या बढ़ने लगती है। दरअसल, वेजाइना से रिप्रोडक्टिव ऑर्गन्स तक पहुंचने वाला संक्रमण पीरियड साइकिल न होने के बावजूद भी स्पॉटिंग की समस्या का कारण बनने लगता है। कई बार एसटीआई हिस्ट्री भी समस्या का कारण साबित होता है।

हार्मोनल असंतुलन
हार्मोनल असंतुलन स्पॉटिंग का सबसे सामान्य कारण है. जब शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन हॉर्मोन का संतुलन बिगड़ जाता है, तो पीरियड्स में देर या चूक हो सकती है, जिससे हल्की स्पॉटिंग हो सकती है. इससे बचने के लिए रोजाना व्यायाम करें, बैलेंस डाइट लें और तनाव को कम करें.

गर्भनिरोधक गोलियां भी कारण हो सकती है
कई बार प्रग्नेन्सी रोकने के लिए हम अपनी मर्जी से या कैमिस्ट से पूछ कर कोई भी गर्भनिरोधक गोलियां कहानी शुरू कर देते है. ऐसा करना सही नहीं है क्यूंकि इस वजह से भी स्पॉटिंग हो सकती है. इसलिए तुरंत डॉक्टर को देखायें क्यूंकि हो सकता है वो गोली आपको सूट ना कर रही हो.

यूटेरस या सर्विक्स में इंफेक्शन होने पर
यूटेरस या सर्विक्स में इंफेक्शन होने पर पीरियड के अलावा हल्की ब्लीडिंग के साथ बदबू या जलन भी महसूस हो सकती है। इसलिए अगर आपको स्पॉटिंग हो रही है तो हो सकता है आपको इन्फेक्शन हो.

थायराइड असंतुलन
आपका थायरॉइड आपके मासिक धर्म चक्र सहित कई शारीरिक कार्यों को नियंत्रित करता है। जब यह ठीक से काम नहीं करता है, तो हार्मोन का स्तर असंतुलित हो जाता है। इससे मासिक धर्म से पहले स्पॉटिंग हो सकती है।
कम सक्रिय और ज़्यादा सक्रिय थायरॉइड दोनों ही रक्तस्राव के पैटर्न को प्रभावित कर सकते हैं। थकान महसूस होना, वज़न बढ़ना या कम होना, या बालों का पतला होना कुछ सामान्य लक्षण हैं। कुछ महिलाओं को तो हर समय ठंड लगती रहती है या उनका मूड बदलता रहता है। अगर आपको स्पॉटिंग के साथ-साथ ये लक्षण भी दिखें, तो अपने डॉक्टर से थायरॉइड टेस्ट करवाने के लिए कहें। यह जल्दी हो जाता है और बहुत कुछ समझा सकता है।

पॉलिसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम
कई बार ऐसी महिलाएं जो पॉलिसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम से ग्रसित होती हैं उनमें हार्मोंस के उतार चढ़ाव के कारण पीरियड्स न होते हुए भी वैजाइना से ब्लीडिंग होने की समस्या हो सकती है। पीसीओडी या पीसीओएस इनफेक्शन का तुरंत इलाज करवाना जरूरी होता है क्योंकि इससे कई तरह की समस्याएं हो जाती है जैसे कि अंडाशयों और डिंबवाही नलिकाओं में मवाद भरे फोड़े विकसित होना, पेट में अंदर की तरफ ऊतकों की पतली परत में जलन व सूजन, बुखार, स्पॉटिंग, मिचली और उल्टी।

थायराइड की समस्या भी बन सकता है कारण
ऑफिस ऑन वुमेन्स हेल्थ के अनुसार शरीर में थायराइड हॉर्मोन की कमी भी स्पॉटिंग का कारण साबित होती है। हर आठ में से 1 महिला थायरॉइड का शिकार होती है। शरीर में हाइपोथयरोइडिस्म और हाइपरथयरोइडिस्म दोनों ही स्थितियों में स्पॉटिंग की समस्या का खतरा रहता है। इसके अलावा इनफर्टिलिटी, वेटगेन और थकान की समस्या भी बनी रहती है।

स्पॉटिंग हो सकती है कैंसर का संकेत –
स्पॉटिंग खतरनाक कैंसर के कारण हो सकती है। अगर आपको स्पॉटिंग हो रही है तो इसे हल्के में ना लें। दरअसल, महिलाओं में सबसे अधिक होने वाले कैंसर में एंडोमीट्रियल, सर्वाइकल और ओवेरियन कैंसर आता है। ओवेरियन कैंसर को डिंब ग्रंथि या अंडाशय कैंसर भी कहा जाता है। जिसमें ओवरी में सिस्ट अर्थात ट्यूमर बनने शुरू हो जाते हैं और यही सिस्ट बाद में कैंसर का रूप धारण कर लेती है।
सामान्यतः इनमें से किसी भी कैंसर की पहचान नहीं हो पाती है, क्योंकि शुरुआती चरण में इसके लक्षण बेहद कम देखने को मिलते हैं या कहें कि इसके लक्षण आम दिनों के दर्द या साधारण लक्षणों में आते हैं। मगर जब यह कैंसर पेल्विक एरिया और पेट के आसपास फैलने लगता है, तभी इसकी पुष्टि हो पाती है। इसलिए अधिकांश मामलों में इसका इलाज तीसरे या चौथे चरण में ही होता है। यह कैंसर जब अपनी एडवांस स्टेज में पहुंचता है, तब कुछ लक्षण जैसे पेट में सूजन या पेट का फूल जाना, थोड़ा खाते ही भुख मिट जाना, वजन घटना, पेल्विक एरिया में दर्द, कब्ज़, बार-बार यूरिन की इच्छा और स्पॉटिंग नजर आते हैं। इन सभी कैंसर के लिए, प्रारंभिक पहचान महत्वपूर्ण है। यदि आप इनमें से किसी भी लक्षण का अनुभव करते हैं, तो नियमित रूप से लगातार जांच के लिए जाएं।

डॉक्टर से कब मिलना ज़रूरी हो जाता है:

  • अगर आपको एक महीने में एक से ज़्यादा बार पीरियड आए
  • जब आप दिन में कभी चक्कर महसूस करें
  • जब हल्के पीरियड के साथ आपको मतली या बुख़ार आए
  • जब प्रेगनेंसी के दौरान ख़ास कर के शुरूआती तीन महीनों में स्पॉटिंग हो
  • लगातार 2–3 साइकिल तक स्पॉटिंग होना
  • स्पॉटिंग के साथ तेज़ पेट दर्द, चक्कर या कमजोरी
  • बदबूदार या रंग बदला हुआ डिस्चार्ज
  • मेनोपॉज़ के बाद हल्की भी ब्लीडिंग दिखना
  • इन स्थितियों में डॉक्टर से मिलना डर की वजह से नहीं, बल्कि स्पष्टता और सुरक्षा के लिए ज़रूरी होता है। Causes of spotting

Preeti Jhangiani : अच्छी स्क्रिप्ट को चुनना आसान नहीं, कहती है छुईमुई गर्ल

Preeti Jhangiani : खूबसूरत, हंसमुख और शांत स्वभाव की मॉडेल और अभिनेत्री प्रीति झंगियानी से कोई अपरिचित नहीं. म्यूजिक वीडियो ‘ये है प्रेम’, ‘छुई मुई सी तुम’ आदि से उनकी लोकप्रियता बढ़ी और इसी से उन्होंने ऐक्टिंग कैरियर की शुरुआत की, इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में काम किया. फिल्म मोहब्बतें उनकी सफल फिल्म रही, जिसमें उन्होंने जिमी शेरगिल के साथ काम किया और ‘स्टार डेब्यू ऑफ द ईयर’ का अवार्ड जीता. इसके बाद आवारा पागल दीवाना और एलओसी: कारगिल आदि फिल्मों में भी काम किया है. हिन्दी के अलावा उन्होंने मलयालम तमिल, तेलगू फिल्मों में भी काम किया है. काम के दौरान उनका परिचय ऐक्टर, डायरेक्टर और मॉडेल प्रवीण डबास से हुई प्यार हुआ, शादी की और दो बेटों की माँ बनी. अभिनय के साथ – साथ वह एक खेल प्रेमी भी है और प्रो पंजा लीग की स्थापना की है. उन्होंने खास गृहशोभा के साथ बात की, आइए जानते है, उनकी कहानी उनकी जुबानी.
अभिनय की गहराई है पसंद
प्रीति इन दिनों अपने कई प्रोजेक्ट लेकर व्यस्त है वह कहती है कि फिल्म उदयपुर फाइल्स ने बहुत सारे न्यूज क्रियेट किये है और अभी मैँ ऐसी ही फिल्में करना चाह रही हूं, जिसकी कोई स्टोरी हो कोई मकसद हो, अभिनय की गहराई हो, जिसमें मेरे काम से समाज पर कोई फ़र्क पड़े. मैँ थोड़ी सिलेक्टिव हो चुकी हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स के फील्ड में बिजी हो गई हूं, मैंने आर्म रेसलिंग का पंजा लीग शुरू किया है, जिसके दो सीजन पूरे हो चुके है, जिसमें नैशनल फेडरैशन आर्म रेसलिंग की मैँ अध्यक्ष भी हूं. 5 साल से अधिक समय मैंने इस स्पोर्ट को दिया है, क्योंकि ये एक देसी स्पोर्ट है, इसे पूरे दुनिया में फैला रहे है, अभी मैँ इस स्पोर्ट को टीम इंडिया के रूप में विदेशों में भी ले जा रहे है. इसमें मेरा बहुत सारा समय इसमें चला जा रहा है, क्योंकि मैँ इसे ग्राउन्ड से ऊपर ला रही हूं. इसके साथ – साथ ऐक्टिंग भी चल रहा है, क्योंकि वह मेरा पैशन है.
सिनेमा का मैजिक
फिल्मों में कहानियों के बदलते दौर को लेकर प्रीति का कहना है कि आज की फिल्मों का दौर बदला नहीं है, धुरंधर जैसी फिल्में थिएटर में ही देख सकते है इसे टीवी सेट पर देखकर उस आनंद को प्राप्त नहीं किया जा सकता. सिनेमा का मैजिक कभी जाएगा नहीं, लोगों ने डीवीडी के समय कहा था कि सिनेमा खत्म हो जाएगा, ओटीटी आने पर भी सबकी प्रतिक्रियाँ वैसी ही रही, लेकिन सिनेमा का जो आउटिंग है, जिसमें परिवार और दोस्तों के साथ फिल्म देखने का जो मज़ा है, वह कभी जा नहीं सकता. बिग स्क्रीन की एक अलग महिमा होती है.
मिली प्रेरणा
ऐक्टिंग में आने की प्रेरणा के बारें में पूछे जाने पर प्रीति हँसती हुई कहती है कि मुंबई में पली – बड़ी होने के बावजूद मैंने कभी फिल्मों में काम करने के बारें में नहीं सोचा था. मेरे परिवार के किसी का भी फिल्मों से कोई कनेक्श्न नहीं है. यह मेरी डेस्टिनी रही है, क्योंकि 16 – 17 साल की उम्र में मैंने ऐड फिल्म का ऑडिशन कॉलेज बंक करने के लिए दिया था, वह ऐड फिल्म मुझे मिल गई, उसकी शूटिंग करने गई और वही से कमर्शियल मौडलिंग का सिलसिला शुरू हुआ. मैंने जो भी म्यूजिक विडिओ किये, सभी बहुत पोपुलर हो गए, जबकि उसे बनाने वालों ने भी सोचा नहीं था. मैँ बिल्कुल नई थी, मुझे ऐक्टिंग नहीं आती थी, लेकिन एक अच्छी टीम जिसमें निर्देशक कुणाल कोहली, कोरियोग्राफर सरोज खान और निर्माता राजश्री वाले थे, इन सभी ने मुझे सबकुछ सीखा दिया और मैँ सफल रही.
इसके बाद तमिल, तेलगु फिल्मों के ऑफर आने लगे, जिसे मैंने किया. इसके बाद यशराज वालों का घर पर फोन आया, बिना कुछ जाने मैँ अपने पिता के साथ आदित्य चोपड़ा के सामने बैठकर फिल्म मोहब्बते की स्क्रिप्ट सुन रही थी. सबकुछ बहुत फास्ट और अन एक्सपेक्टेड हुआ. कभी सोचा नहीं था कि मैँ फिल्मों में ऐक्टिंग करूंगी, मैँ तो मौडलिंग से ही खुश थी. बचपन से ही मैँ आर्टिस्टिक थी और कंप्युटर ग्राफिक्स में काफी रुचि थी, उस लाइन में जाने की इच्छा रखती थी, लेकिन डेस्टिनी ऐक्टिंग की रही, जिससे कामयाबी मिलती गई.
परिवार का सहयोग
मेरे परिवार में सभी खुले विचार के है, मेरे पिता ने कभी कुछ पहनने खाने – पीने, घूमने से मना नहीं किया है. उन्होंने हमेशा मुझे लाइफ में कुछ इक्स्पीरीयंस करने की सलाह दिया है, मौडलिंग के समय भी उन्होंने ही मुझे कुछ नया ट्राइ करने की सलाह दी थी, जिससे मैँ नए लोग और नई परिवेश को समझ सकूँ. ये है प्रेम के म्यूजिक वीडियो में मेरे पिता ही उसमें मेरे फादर की भूमिका निभा रहे है. वे खुद बहुत ही इन्स्पाइरिंग पर्सनैलिटी के है. मैँ और मेरी बहन को उन्होंने हमेशा हर काम के लिए बहुत प्रेरित किया है. मेरी शुरुआत की फिल्मों में मेरे पिता हमेशा मेरे साथ आए है. मेरी माँ मुंबई की एक कॉलेज में लेक्चरार और वाइस प्रिन्सपल थी, उन्होंने हमेशा दोनों बहनों को आगे बढ़ने के लिए सहयोग दिया है.
प्रवीण डबास और मेरा सही मैच
अभिनेता प्रवीण डबास से मिलना मेरे लिए बहुत लकी रहा है, उनका और मेरा रहन – सहन बहुत मैच करता है, किसी भी काम को हम दोनों ने साथ में ही शुरू किया है, मसलन शादी होने के बाद मैंने अपनी कॉम्पनी खोली, जिसमें मैँने कई फिल्में प्रोड्यूस किया, उसके बाद मैंने डिजिटल कॉम्पनी शुरू किया, इसके बाद स्पोर्ट्स कॉम्पनी खोली. असल ने प्रवीण ने मुझे हर काम के लिए बहुत प्रोत्साहन दिया है. स्पोर्ट्स के क्षेत्र में मुझे कई सारे एवार्ड्स भी मिले है. इन सारे पुरस्कार में मेरे पति और परिवार का सहयोग रहा है. मेरे दो छोटे बच्चे होने के बावजूद मैंने काम नहीं छोड़ा और आज तक करती आ रही हूं. इस दौरान मैंने पिछले कई सालों से व्यवसाय को बढ़ाने के लिए नॉन – स्टॉप ट्रैवल किया है. हम दोनों की एक अच्छी मैच है. परिवार के सहयोग के बिना काम करना आसान नहीं. मेरी माँ मेरी बहन सभी एक ही बिल्डिंग में रहते है, मेरे ससुराल पक्ष का भी बहुत सहयोग रहता है. इसलिए मुझे बच्चों के बारें में अधिक सोचना नहीं पड़ा.
रही चुनौती
प्रीति के लिए अभिनय के क्षेत्र में नाम कमाना आसान नहीं था. वह कहती है कि अभिनय के क्षेत्र में काम करना कितना चुनौतीपूर्ण है, ये तब पता चलता है, जब आप उस फील्ड में उतरते है. मेरी लाइफ बहुत प्रोटेक्टिव रही है, मुझे कभी घर का रेंट पे नहीं करना पड़ा, जैसा अधिकतर लड़कियों को करना पड़ता है, क्योंकि मैँ मुंबई की हूं, लेकिन संघर्ष का पता तब चला जब मैंने अपनी कॉम्पनी शुरू की, फिल्मों में काम करना शुरू किया. देखा जाय, तो कोई भी काम आसान नहीं है, एक कलाकार को बहुत मेहनत करनी पड़ती है, हर सिचुएशन में काम करने के अलावा हर तरीके के लोगों के साथ इंटरेक्ट करना पड़ता है. ठंडी, गर्मी, दुःख, सुख आदि सभी परिस्थितियों में काम करते रहना पड़ता है. ये सारी चीजें खुद में विश्वास के साथ करनी पड़ती है.
सही स्क्रिप्ट चुनना जरूरी
प्रीति आगे कहती है कि किसी सही फिल्म को चुनना वाकई बहुत कठिन होता है, क्योंकि कई बार स्क्रिप्ट में जो लिखी होती है, वह फिल्म में होती नहीं, ऐसे में निर्देशक के विजन को समझना आवश्यक होता है और एक चरित्र में घुसकर उसे सही तरीके से फ़िल्माना कठिन होता है. जब मैंने अभिनय की शुरुआत की थी, तो चरित्र पर इतना रिसर्च नहीं होता था, गाने शूट कर लिए, थोड़ी ऐक्टिंग की बस हो जाता था, लेकिन अब फिल्मों में चरित्र पर काफी रिसर्च होता है, जैसा मैंने ओटीटी फिल्म ‘कफ़स’ में काम करते हुए पाया है, जहां एक लड़की कहाँ से आई है, उसकी बैक स्टोरी क्या है, उसकी जिंदगी कैसी होगी आदि पर काम होता है, जिसमें चरित्र में घुसना ही कठिन और जरूरी हो गया है.
किये कम ग्लैमरस रोल
प्रीति हँसती हुई कहती है कि शुरू में मैंने हमेशा स्वीट और सॉफ्ट रोल किये ग्लैमरस रोल कम ही किये है, क्योंकि मेरा क्यूट चेहरा दर्शकों ने अधिक पसंद किया. मैंने एक फिल्म विक्टोरिया नंबर 203 फिल्म की थी, जिसमें मैंने पूरा निगेटिव रोल किया था, उसमें मेरा ग्लैमरस रोल था, लेकिन अधिकतर लोग मेरा सॉफ्ट लुक पसंद करते है. मैंने बहुत काम किये है इसलिए कोई रिग्रेट नहीं है, मुझे दर्शकों का बहुत प्यार मिला है, अवॉर्ड मिला, जो मेरे लिए अनएक्सपेक्टेड था. इस साल में मैँ आर्म रेसलिंग की वर्ल्ड चॅम्पियन लेकर आ रहे है, जिसे इंडिया पहली बार होस्ट करेगा. ये लीग 3 रहेगा, जिसकी प्रैक्टिस जारी है. मुझे इस बात की खुशी है कि क्रिकेट के अलावा अभी दूसरे स्पोर्ट्स भी आगे आ रहे है. प्रो पंजा लीग की पहले सीजन में 32 मिलियन लोगों ने देखा है. इसके अलावा फिल्मों की कहानियाँ भी मैँ पढ़ रही हूं, ताकि एक अच्छी फिल्म दर्शकों को दे सकूँ. Preeti Jhangiani

Parenting Tips for Honesty : बच्चे की झूठ बोलने की आदत को छुड़ाएं ऐसे

Parenting Tips for Honesty : मुंबई की एक मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में रहने वाला 6 साल का रुद्र पहली कक्षा का छात्र है. वह हमेशा अपने पेरेंट्स से झूठ बोलता रहता है जैसे कि होम वर्क पूरा न होने और टीचर के इसकी वजह के पूछने पर हर दिन कुछ न कुछ झूठ बोलकर खुद को बचा लेता है. स्कूल में पढ़ाई गई विषय को वह बताता नहीं, कहता है कि टीचर ने कुछ पढ़ाया नहीं, ऐसे में परीक्षा होने पर लिख नहीं पाता, क्योंकि उसने कुछ पढ़ा ही नहीं होता, ऐसे करीब 6 महीने बीत गए, स्कूल से शिकायत आने लगी. उसकी माँ मीना जब स्कूल गई, तो पता चला कि वह स्कूल में कुछ भी नोटडाउन नहीं करता, पीछे बैठकर खेलता रहता है.
बार – बार टीचर के कहने पर भी वह सुनता नहीं, इसलिए उसकी टीचर ने माँ को बुलाकर सारी बात बताई. मीना समझ नहीं पा रही थी कि वह इस बच्चे को कैसे सही रास्ते पर लाए, क्योंकि वह स्कूल में ही नहीं घर पर भी हमेशा झूठी बात को ऐसे बताता है कि कोई पकड़ नहीं पाता कि वह झूठ बोल रहा है. वर्किंग मीना परेशान है, आखिर इसका समाधान क्या है, क्योंकि उसकी इस आदत को सुधारना जरूरी था और माता – पिता दोनों ऐसा कर नहीं पा रहे थे.

सेंटर ऑफ अट्रैक्शन होती है पसंद
असल में छोटे बच्चे कई बार झूठ बोलते हैं, क्योंकि वे अपनी कल्पना और असली बातों के बीच फर्क को ठीक से नहीं समझ पाते. उनके लिए जो वे सोचते हैं या सपने देखते हैं, वही उन्हें सच लगता है. उन्हें अभी यह भी पूरी तरह समझ नहीं आता कि दूसरे लोग क्या सोचते हैं या क्या महसूस करते हैं. इसलिए वे कभी-कभी बिना मतलब के भी झूठ बोल देते हैं, क्योंकि उन्हे सबका ध्यान अपनी ओर खींचना होता है. इस बारें में गुरुग्राम, मदरहुड अस्पताल के कंसल्टेंट बाल रोग विशेषज्ञ डॉ.बीर सिंह यादव कहते है कि बच्चे डर की वजह से भी झूठ बोलते हैं, जैसे डाँट पड़ने से बचने के लिए या सज़ा से बचने के लिए भी इसका सहारा लेते है. कुछ बच्चे पेरेंट्स या किसी का ध्यान पाने के लिए भी झूठ बोलते हैं, ताकि लोग उनकी ओर देखें या उनकी बात सुनें. यह सब उनके बडे होने और सीखने का हिस्सा होता है. अगर माता-पिता उन्हें प्यार से समझाएँ और बार-बार सही और गलत का फर्क बताएं, तो धीरे-धीरे बच्चे सच बोलना सीख जाते हैं.
इसके अलावा बच्चों के झूठ बोलने में पेरेंट्स की भूमिका बड़ी होती है, क्योंकि कई बार वे पेरेंट्स को किसी से झूठ बोलते हुए सुनते है, मसलन घर पर है, लेकिन फोन पर कह दिया नहीं है. काम कर नहीं रहे, पर कह दिया कर रहा हूं आदि, कई छोटी – छोटी बातों को बच्चे नोटिस करते है और वे भी उसे अनचाहे सीखते जाते है, जिसे पेरेंट्स को नोटिस करना जरूरी होता है. बच्चे के झूठ बोलने कारण कई होते है, जिसे पेरेंट्स को समय रहते सुधार लेना जरूरी होता है.

बच्चे की सही परवरिश को सीखें
बच्चे अपने माता-पिता को देखकर ही बहुत कुछ सीखते हैं. वे वही बोलते हैं और वही करते हैं, जो वे रोज़ अपने घर में देखते हैं. अगर माता-पिता सच बोलते हैं, तो बच्चे भी सच बोलना सीखते हैं. अगर माता-पिता गलती होने पर चिल्लाते हैं या मारते हैं, तो बच्चे भी वही तरीका अपनाते हैं. माता-पिता बच्चों को कैसे समझाते हैं, कैसे डाँटते हैं और कैसे प्यार देते हैं, इन सब बातों का बच्चे पर गहरा असर पड़ता है. घर का माहौल अगर शांत और प्यार भरा होगा तो बच्चा भी शांत रहेगा. अगर घर में हमेशा डर और गुस्सा होगा, तो बच्चे की वैसी ही बनने की संभावना अधिक होती है.

खुद पर रखे कंट्रोल
डॉक्टर आगे कहते है कि अगर बच्चा झूठ बोलता है, तो माता-पिता को गुस्सा नहीं करना चाहिए. पहले शांत रहना चाहिए और प्यार से बात करनी चाहिए. बच्चे से पूछें कि उसने झूठ क्यों बोला, उसे किस बात का डर था या वह क्या चाहता था. उसे धीरे-धीरे समझाएँ कि कहानी बनाना और सच बोलना अलग-अलग बातें होती हैं. उसे यह भी बताएं कि सच बोलना क्यों ज़रूरी है. बहुत सख्त सज़ा देने की बजाय बच्चे को समझाना ज्यादा अच्छा होता है. जब बच्चा सच बोले, तो उसकी तारीफ करें, ताकि उसे अच्छा लगे और वह आगे भी सच बोले. पेरेंट्स को भी अपनी आदतें सुधारने की जरूरत होती है, उन्हे भी झूठ बोलने से बचना चाहिए, क्योंकि बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने बड़ों को करते हुए देखते हैं.

अपनी आदतें सुधारें
हर पेरेंट्स को ये समझना जरूरी होता है कि उनकी हर छोटी-बड़ी आदत का बच्चों पर असर पड़ रहा है. बच्चे वही करते हैं जो वे रोज़ अपने घर में देखते हैं. अगर माता-पिता शांत होकर बात करते हैं, तो बच्चे भी वैसे ही बात करना सीखते हैं. अगर वे जल्दी गुस्सा करते हैं या चिल्लाते हैं, तो बच्चे भी वैसा ही करने लगते हैं. अगर वे कुछ कहते हैं और करते कुछ अलग है, तो बच्चे समझ नहीं पाते कि सही क्या है और गलत क्या है. पेरेंट्स का शांत, समझदार और प्यार भरा व्यवहार बच्चों को सही रास्ता दिखाने में बहुत मदद करता है.
सिखाएं एटिकेट्स
आज कल के अधिकतर पेरेंट्स काम काजी है और काम के बाद जब भी उन्हे समय मिलता है, मोबाईल पर रील्स देखने लग जाते है, ऐसे में बच्चे पर उनका ध्यान कम होता जाता है, जिसका असर बच्चों पर पड़ता है. डॉक्टर कहते है कि किसी भी गलत बात पर पेरेंट्स एटिट्यूड न दिखाकर अगर माफी मांग लेते है, तो बच्चा भी सीखता है कि माफी मांगना गलत नहीं.
इसके अलवा हर दिन की छोटी-छोटी बातें, जैसे बच्चों की बात ध्यान से सुनना, गलती होने पर माफी माँगना और जो वादा किया है उसे पूरा करना, इन सब से बच्चे का स्वभाव बनता है. बच्चों से उनकी उम्र के अनुसार ही उम्मीद रखनी चाहिए. बहुत ज्यादा दबाव किसी भी बात पर नहीं डालना चाहिए.

सजा देने से बचे
सिर्फ सज़ा देने की बजाय बच्चों को यह सिखाना चाहिए कि सही काम क्या है, क्योंकि कई बार बच्चे को कुछ सीखाए बिना पैरेंट्स सजा देने लगते है, जैसा 4 साल के तक्ष ने माँ से झूठ बोला और पिता ने उसे दरवाजे से बाहर खड़ा रख दिया, वह रोने लगा कि अब कभी झूठ नहीं बोलेगा, फिर उसे अंदर आने दिया. घर का माहौल ऐसा होना चाहिए कि बच्चा बिना डर अपनी गलती बता सके. जब बच्चा अच्छा काम करे, तो उसकी तारीफ करें और धैर्य रखें, क्योंकि बच्चे धीरे-धीरे सीखते हैं और समझदार बनते हैं.
इस प्रकार बच्चों की झूठ बोलने की आदत कोई बड़ी बीमारी नहीं है, बल्कि एक सीखने का दौर है. अगर आप धैर्य, समझदारी और थोड़े प्यार से काम लें, तो ये आदत धीरे-धीरे खत्म हो सकती है. बच्चों को डांटना या सजा देना, इस सिचुएशन को और भी खराब कर सकता है, इसलिए अपने बच्चे को सुनें, समझें, क्वालिटी टाइम दें और साथ मिलकर उसे सही रास्ता दिखाएं. Parenting Tips for Honesty

Eyebrows Sticker : चेहरा ज्यादा ग्लैमरस दिखेगा इन नकली आइब्रोज से

Eyebrows Sticker : जिन लोगों के आइब्रो के बाल बहुत कम या हलके है या फिर बिलकुल नहीं है और वह जगह खाली खाली सी लगती है तो आपको एक बार स्टिक ऑन आइब्रो का प्रयोग करना चाहिए.

स्टिक ऑन आइब्रो
स्टिक-ऑन आइब्रो (Stick-on Eyebrows) या आइब्रो स्टिकर या False Eyebrows होती हैं जिन्हें त्वचा पर चिपकाकर लगाया जाता है, जो नेचुरल आइब्रो जैसा लुक देती हैं. ये पानी से चिपकने वाले (Water-transfer) स्टिकर होते हैं. इनमें बालों जैसे बारीक स्ट्रोक्स बने होते हैं, जिससे ये असली आइब्रो जैसी दिखती हैं।
यह उन लोगों के लिए एक बेहतरीन समाधान है जिनके आइब्रो के बाल कम हैं, पतले हैं या बिल्कुल नहीं हैं। यह दिखने में काफी नेचुरल लगती हैं और इन्हें लगाना बहुत आसान है। स्टिक-ऑन आइब्रो की सबसे बड़ी खूबी यही है कि ये अस्थायी (Temporary) होती हैं, जिससे आपको स्थायी टैटू या माइक्रोब्लेडिंग जैसा जोखिम नहीं उठाना पड़ता। कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों तक रह सकती हैं, जो ब्रांड और देखभाल पर निर्भर करता है।

स्टिक-ऑन आइब्रो कितने तरह की होती है
वॉटर-ट्रांसफर टैटू (Water-Soluble): ये कागज की शीट पर आते हैं जिन्हें पानी की मदद से त्वचा पर छापा जाता है। दरअसल इन टैटू वाली आइब्रो के पीछे एक विशेष गोंद की परत होती है जो पानी के संपर्क में आते ही सक्रिय हो जाती है और त्वचा पर चिपक जाती है। इनमें बालों के बेहद बारीक स्ट्रोक्स बने होते हैं जो गहराई (depth) का अहसास देते हैं।
इन्हें लगाने का तरीका-
इन्हें लगाने के लिए लिए पहले अच्छे से अपना फेस वाश करें क्यूंकि अगर वह जगह थोड़ी भी ऑयली होगी तो वहां स्टिकर चिपकने में मुश्किल होगी. इसके बाद स्टिकर की Transparent film हटाएं और उसे अपनी आइब्रो वाली जगह पर सही पोजीशन में रखें।
इसके बाद एक गीले कपड़े या कॉटन पैड से स्टिकर के पिछले हिस्से को 10-20 सेकंड तक दबाएं। इसके बाद धीरे धीरे करके कागज हटाएँ तो आप देखेंगे कि आपकी नई आइब्रो के साथ नया लुक तैयार है.
कैसे हटाएँ- नारियल तेल, बेबी ऑयल या कोई भी ऑयली क्लींजर लगाकर इन्हें हटाया जा सकता है.

मेडिकल ग्रेड टेप (Human Hair Wigs)
जो ‘विग’ वाली या असली बालों वाली आइब्रो होती हैं, उनके लिए Double-sided Medical Tape का उपयोग किया जाता है। यह त्वचा के लिए सुरक्षित होता है और पसीने में भी नहीं निकलता। इन्हें खास गोंद (Adhesive) से चिपकाया जाता है। ये सबसे ज्यादा नेचुरल दिखती हैं और इन्हें धोकर दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है।
इन्हें लगाने का तरीका-
एक आईब्रो पेंसिल से अपनी त्वचा पर छोटे-छोटे बिंदु (Points) लगा लें जहाँ आप विग को शुरू और खत्म करना चाहते हैं। इससे दोनों तरफ की आइब्रो एक समान लगेंगी। इसके बाद टेप के छोटे-छोटे टुकड़े काटें जो आइब्रो विग के आकार के हों।विग के पिछले हिस्से (जाल या बेस) पर टेप के एक तरफ का हिस्सा चिपकाएँ। ध्यान रहे कि टेप किनारों से बाहर न निकले। टेप को विग पर अच्छे से दबाएं ताकि वह बेस के साथ मजबूती से जुड़ जाए। अब टेप की फिल्म को धीरे धीरे हटाएँ. अब आप किसी चिमटी का प्रयोग करें और उसक मदद से विग को पकड़ें और अपने द्वारा बनाए गए मार्किंग पॉइंट्स पर धीरे से रखें।अब आप पोजीशन से संतुष्ट हों, तो अपनी उंगलियों या आईब्रो ब्रश के पीछे वाले हिस्से से इसे 30-60 सेकंड तक मजबूती से दबाएं।
कैसे निकालें-
इन्हें कभी भी जोर से खींचकर न निकालें। एक कॉटन पैड पर Adhesive Remover या नारियल तेल लें और उसे विग के किनारों पर लगाएं। जब टेप ढीला हो जाए, तो इसे धीरे से छीलकर उतार लें।

आईब्रो फाइबर/जेल स्टिकर्स
इनमें बारीक सिंथेटिक फाइबर (जो दिखने में छोटे बाल जैसे होते हैं) एक खास जेल बेस के साथ मिले होते हैं। जब आप इन्हें अपनी त्वचा या मौजूदा आइब्रो पर लगाते हैं, तो जेल सूख जाता है और फाइबर वहीं चिपक जाते हैं, जिससे आइब्रो घनी और उभरी हुई दिखती हैं।ये थोड़े उभरे हुए होते हैं और इनमें छोटे-छोटे फाइबर होते हैं जो घनी आइब्रो का लुक देते हैं। अगर आपकी आइब्रो के बीच में खाली जगह है, तो ये जेल स्टिकर्स उन खाली जगहों को फाइबर से भर देते हैं।

इन्हें कैसे लगाएं-
इन्हें लगाने के लिए पहले अपनी स्किन को पूरी तरह क्लीन करें। इसके बाद जैसे हम मस्कारा निकालते हैं, वैसे ही एप्लीकेटर ब्रश को बाहर निकालें। अगर ब्रश पर बहुत ज्यादा जेल या रेशे (फाइबर) लगे हों, तो बोतल के किनारे पर रगड़कर अतिरिक्त जेल हटा दें।
छोटे-छोटे स्ट्रोक्स लगाएं। शुरुआत नाक के पास वाले हिस्से से शुरू करें। ब्रश को धीरे-धीरे ऊपर की तरफ और बाहर की तरफ चलाएं, जैसे छोटे-छोटे बाल उगते हैं। इसे रगड़ें नहीं, बस हल्के हाथ से बालों के आकार में ब्रश चलाएं। जहाँ आपको लगता है कि बाल कम हैं, वहाँ थोड़ा और जेल लगाएं। इसमें मौजूद छोटे रेशे (Fibers) आपकी त्वचा पर चिपक जाएंगे और नकली बालों जैसा अहसास देंगे। लगाने के बाद 1 मिनट तक इंतज़ार करें ताकि वह सूख जाए। सूखने के बाद एक साफ आइब्रो ब्रश (जिसे स्पूली कहते हैं) से बालों को एक बार झाड़ लें ताकि वे आपस में चिपके न रहें और बिल्कुल असली दिखें।
कैसे हटाएँ : रात को सोते समय नारियल तेल या मेकअप रिमूवर से इसे साफ कर लें।

धयान दें-
चूंकि इसमें केमिकल जेल होता है, इसलिए इस्तेमाल से पहले हाथ की खाल पर पैच टेस्ट जरूर करें। साथ ही अगर आपको लगे कि आइब्रो बहुत ज्यादा डार्क हो गई हैं, तो एक साफ सूखे ब्रश (Spoolie) से उन्हें बार-बार झाड़ें। इससे एक्स्ट्रा फाइबर निकल जाते हैं और रंग हल्का हो जाता है। इन्हें हटाने के लिए एक अच्छे ऑयल-बेस्ड मेकअप रिमूवर की जरूरत होती है। Eyebrows Sticker

Smriti Mandana : रिश्ता टूट गया है, तो उससे जल्दी मूव ऑन कैसे करें

Smriti Mandana :  भारतीय क्रिकट टीम की स्टार ओपनिंग बल्लेबाज स्मृति मंधाना पिछले कुछ समय से खबरों में बनी हुई हैं। हाल ही में पलाश मुच्छल के साथ उनकी शादी कैंसल हुई थी, जिसके बाद से वे सुर्खियों में बनी रहीं। लोगों ने इस पर खूब बाते की. अपनी शादी की सारी रस्मे हल्दी, मेहँदी तक हो जाने के बाद उनका रिश्ता टूटना सब को हैरान कर गया. लोगों ने उन्हें हर कई तरह के कमेंट्स किये जैसे ये तक लिख दिया कि अब वे इतने बड़े झटके और गम के बाद इंडिया के लिए क्रिकेट क्या ही खेल पाएंगी. लेकिन स्मृति की एक पोस्ट ने सबके मुँह बंद कर दिए.

स्मृति मंधाना का भावुक पोस्ट……!!”
“एक रिश्ता खत्म होने से ज़िंदगी खत्म नहीं होती…
कभी-कभी कुछ रिश्ते हमें तोड़ने नहीं, बल्कि मजबूत बनाने के लिए खत्म होते हैं।
जो चला गया, वह एक याद बनकर रह जाता है,
और जो बचता है—वह हमारा आत्मविश्वास, हमारी पहचान और हमारे सपने होते हैं।

दर्द होता है, आँसू आते हैं, सवाल उठते हैं…
पर उसी दर्द से हम खुद को दोबारा खोजते हैं।
हर अंत एक नई शुरुआत का संकेत होता है।
और जब हम खुद से जुड़ जाते हैं,
तब किसी और के जाने से हमारी दुनिया नहीं टूटती…
बल्कि और निखर जाती है।”

उनकी हर एक लाइन में ज़िंदगी का मतलब छिपा है. किस तरह से इतनी जल्दी उन्हने मूव ऑन किया ये प्रशंसनीय है और हम सभी को ये सिखाता है कि एक रिश्ता टूटने पर ज़िंदगी रुक नहीं जाती बल्कि उससे आगे बढ़कर किस तरह नए शुरुवात की जाती है ये हमे स्मृति से सीखना चाहिए. आइये जाने कुछ ऐसी ही बातें जो आपको मूव ऑन करने में मदद करेंगी.

पॉजिटिव रहें
ये कहावत तो आपने सुनी ही होगी कि जो कुछ भी होता है अच्छे के लिए ही होता है. बस आप भी ऐसा ही सोचें. अपने आप को समझाएं कि आपके प्यार के लायक वो इंसान था ही नहीं. जरा सोचिए, जिसने आपकी कद्र अभी नहीं कि वो शादी हो जाने के बाद क्या करता. वैसे भी एक रिश्ता टूट गया तो क्या हुआ, दोबारा try करेंगे। जरुरी नहीं एक बार दिल टुटा तो हर बार टूटेगा. इसलिए जिंदगी ख़तम हो गए है ऐसा ना सोचें. नेगिटिव विचारों से दूर रहें. थोड़ा समय लग सकता है लेकिन मूव ऑन करें। ज़िंदगी फिर मुस्कुराने लगेगी.

अपनी किसी हॉबी पर काम करिये
यही वह समय है जब आप अपनी किसी हॉबी को फिर से अपना सकते है. जैसे अगर आपको पेंटिंग का शोक है तो हर रोज कुछ समय अपनी इस हॉबी को दें. इससे आप बेहतर महसूस करेंगी. डांस का शोक है तो डांस क्लासिस फिर से ज्वाइन करें. गार्डनिंग का शोक है तो कुछ पौधें लगाएं और उन्हें बड़ा करें. ऐसा करके आपको इतना अच्छा लगेगा कि आप अपना गम भूलने लगेंगी.

सच को स्‍वीकार करें और जाने दें
ज‍ितना जल्‍दी हो स‍के आपको सच को स्‍वीकार कर लेना चाह‍िए क‍ि अब वो र‍िश्‍ता खत्‍म हो चुका है। इससे मूवऑन करने में मदद म‍िलेगी। अक्सर लोग ब्रेकअप के बाद भी एक्स की याद में खोए रहते हैं। ये आपमें न‍िगेट‍िव‍िटी बढ़ा सकता है। ब्रेकअप के बाद, पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम खुद को दूर करना है। कॉल न करें, मैसेज न करें या उनका सोशल मीडिया न देखें। जाने देने का मतलब यादों को भूलना नहीं है; इसका मतलब है अंत को स्वीकार करना और दर्द के बजाय शांति चुनना। खुद को याद दिलाते रहें कि यह एक दौर है, और यह बीत जाएगा।

बदला लेने के विचारों से बचें
बदला या क्रोध जैसी नकारात्मक भावनाएं आपकी उपचार प्रक्रिया में देरी कर सकती हैं। इसके बजाय, अपने व्यक्तिगत विकास पर ध्यान केंद्रित करें और शांति और सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ने का लक्ष्य रखें।

फिलहाल आपको फीलिंग्स की नहीं, नए वॉर्डरोब की ज़रूरत है
ब्रेकअप के बाद लाज़मी है आपके अंदर जज्बातों की सुनामी उमड़ रही हो। लेकिन उसे शांत करने का सबसे बढ़िया तरीका है शॉपिंग करना। ये वाला फॉर्मूला लड़कों पर भी लागू होता है। ब्रेकअप के बाद लोग सबसे पहले अपना लुक बदलते हैं। नए कपड़े, नया हेयरकट, नया स्टाइल आपके ब्रेकओवर में मदद करेगा। ये पूरी प्रक्रिया आपको तनाव मुक्त और ‘उनसे’ ध्यान भटकाने में मददगार साबित होगी।

अपने गर्ल्स गैंग के साथ कुछ टाइम स्पेंड करें
पिछले दिनों आप अपनी लव लाइफ में इतना बिजी रहीं कि पुराने दोस्तों से मिलना लगभग भूल ही गई थी. अगर आपके साथ भी ऐसा हुआ है तो अब अपने गिरस गैंग को याद कर लें. उनके साथ पहले की तरह समय बिताये. मस्ती करे. लेकिन वहां अपने एक्स की बातें करने ना बैठ जाएँ. ऐसा लड़के भी कर सकते है. इससे आपको आगे बढ़ने में आसानी होगी.

अपने फ्यूचर गोल को पाने में एनर्जी लगाएं
रिश्ता ख़तम होने पर सब कुछ छोड़ कर खुद को घर्म में बंद कर लेना कहाँ की अक्लमंदी है. इसके बजाये अपनी लाइफ का गोल सेट करें और उसे पाने की जद्दोजहद में लग जाएँ. हो सकता है इस रिश्ते से भी ज्यादा बेहतर कुछ और आपका इन्तजार कर रहा हो. इसलिए गम से बहार निकलकर आगे बढ़ने कुछ बड़ा हासिल करने के लिए मेहनत करना शुरू करें.

नया सहारा मत तलाशें
अगर आपका अभी हाल ही में ब्रेकअप हुआ है तो बहुत जाहिर सी बात है कि इसके दर्द से अभी आप उबरे नहीं हुए होंगे। आपको प्यार, विश्वास, समझदारी, साझेदारी और हमदर्दी, इन सभी की जरूरत है, लेकिन इस जरूरत को अपनी कमजोरी मत बनाइए। इस समय आप आहत जरूर हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि आप हमदर्दी को ही प्यार समझ लें। ऐसा नहीं है कि एक रिश्ते के टूटने के बाद आप अपनी जिंदगी से हर नए रिश्ते की गुंजाइश खत्म कर दें, लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं होना चाहिए कि इस टूटे रिश्ते का दर्द भुलाने के लिए ही आप एक नया रिश्ता जोड़ लें।

गिल्ट से बहार आएं
आप जिंदगी में नई शुरूआत करें और गिल्ट बिल्कुल भी ना रखें। जिंदगी में आगे बढ़ने का हक सभी को होता है। ऐसे में यह बिल्कुल ना सोचें कि आप अपने एक्स से पहले किसी नए रिश्ते में जा रही हैं तो दुनिया आपको गलत कहेगी। अपने बारे में पहले सोचें और दुनिया के बारे में बाद में ख्याल करें।

पुरानी बातें सोचना बंद करें
रात में देर तक जागकर पुरानी बातों को सोचना छोड़ दें. इससे आपकी तबीयत बिगड़ सकती है. नींद पूरी ना होने से कई अन्य शारीरिक समस्याएं भी हो सकती हैं. यदि आपको नींद नहीं आती है, तो आप थोड़ी देर के लिए मेडिटेशन करें. योग का अभ्यास करें, ताकि आपका स्ट्रेस, एंग्जायटी कम हो.

ब्रेकअप को एक्सेप्ट करें
ये ना सोचें अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, मैं अपने पार्टनर को वापस ले आऊँगी. इस इंतज़ार में उन्हें बार बार कॉल और मैसेज करके अपनी इंसल्ट ना कराएं गया है उसे जाने दें. इस सच को स्वीकार करें. तभी आप मूव ऑन कर पायँगी उसके इन्तजार में बैठना बेवकूफ़ी है. जिसे वापस आना होता है वह सब ख़तम करके कभी जाता ही नहीं है. Smriti Mandana

Health System: दिल्ली – राम भरोसे स्वास्थ्य व्यवस्था

Health System: स्वास्थ्य किसी भी सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है क्योंकि यह सीधे जनता के जीवन से जुड़ा विषय है. पर दिल्ली हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणियों से यह स्पष्ट होता है कि दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था गंभीर लापरवाही का शिकार है.

माननीय अदालत ने जिस प्रकार सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं, वह केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि मानवीय संवेदनाओं की अनदेखी भी दर्शाता है.

गंभीर लापरवाही

दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में आज भी बेड की कमी, दवाओं का अभाव, डाक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की अपर्याप्त संख्या जैसी समस्याएं बनी हुई हैं. गंभीर रोगियों को समय पर इलाज न मिल पाना स्वास्थ्य तंत्र की विफलता को उजागर करता है.

सरकार द्वारा स्वास्थ्य बजट बढ़ाने के दावे तो किए जाते हैं, लेकिन उस का वास्तविक लाभ जमीनी स्तर तक नहीं पहुंच पाता.

कागजों तक सीमित योजनाएं

दिल्ली सरकार को 2025-26 के बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए कुल ₹6,874 करोङ का आवंटन किया गया. स्वास्थ्य बजट में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, स्वास्थ्य वैलनेस केंद्रों और अन्य सेवाओं को मजबूत करने पर जोर दिया गया. मगर लगता है कि ये योजनाएं कागजों तक ही सीमित रह जाती हैं और आम नागरिक उन की कीमत अपनी पीड़ा से चुकाता है.

अदालत का हस्तक्षेप

अदालत का हस्तक्षेप यह संकेत देता है कि प्रशासन अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में असफल रहा है. यदि समय रहते सुधार किए जाते, तो न्यायिक दखल की आवश्यकता ही न पड़ती.

लापरवाही का सब से बड़ा दुष्प्रभाव गरीब और मध्यवर्ग पर पड़ता है, जिन के पास निजी अस्पतालों का विकल्प नहीं होता. इस से सामाजिक असमानता और असुरक्षा की भावना और गहरी हो जाती है.
स्वास्थ्य व्यवस्था केवल इमारतों और मशीनों से नहीं चलती, बल्कि जवाबदेही, संवेदनशीलता और कुशल प्रबंधन से चलती है.

चौंकाने वाली रिपोर्ट

सीएजी रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के कई सरकारी अस्पतालों में आधा से ज्यादा अस्पतालों में आईसीयू की सुविधा नहीं है. लगभग 60% में ब्लड बैंक नहीं है. कई अस्पतालों में एंबुलेंस या आपातकालीन सुविधाएं अनुपलब्ध हैं. वहीं अस्पतालों में विशेषज्ञ डाक्टरों के पदों में लगभग 38% तक रिक्तता है, जिस से मरीजों को इलाज में देरी होती है और ओपीडी में बहुत भीड़ रहती है.

दिल्ली की भाजपा सरकार को चाहिए कि वह अदालत की टिप्पणी को चेतावनी मानते हुए ठोस कदम उठाए, ताकि सरकारी अस्पताल वास्तव में जनता के लिए भरोसेमंद बन सकें.

जब तक स्वास्थ्य को राजनीतिक घोषणापत्र से निकाल कर मानवीय दायित्व के रूप में नहीं देखा जाएगा, तब तक ऐसी लापरवाहियां सामने आती रहेंगी और आम नागरिक इस की सब से भारी कीमत चुकाता रहेगा.

Family Story in Hindi: छोटू की तलाश : क्या पूरी हो पाई छोटू की तलाश

Family Story in Hindi: सुबह का समय था. घड़ी में तकरीबन साढे़ 9 बजने जा रहे थे. रसोईघर में खटरपटर की आवाजें आ रही थीं. कुकर अपनी धुन में सीटी बजा रहा था. गैस चूल्हे के ऊपर लगी चिमनी चूल्हे पर टिके पतीलेकुकर वगैरह का धुआं समेटने में लगी थी. अफरातफरी का माहौल था.

शालिनी अपने घरेलू नौकर छोटू के साथ नाश्ता बनाने में लगी थीं. छोटू वैसे तो छोटा था, उम्र यही कोई 13-14 साल, लेकिन काम निबटाने में बड़ा उस्ताद था. न जाने कितने ब्यूरो, कितनी एजेंसियां और इस तरह का काम करने वाले लोगों के चक्कर काटने के बाद शालिनी ने छोटू को तलाशा था.

2 साल से छोटू टिका हुआ, ठीकठाक चल रहा था, वरना हर 6 महीने बाद नया छोटू तलाशना पड़ता था. न जाने कितने छोटू भागे होंगे. शालिनी को यह बात कभी समझ नहीं आती थी कि आखिर 6 महीने बाद ही ये छोटू घर से विदा क्यों हो जाते हैं?

शालिनी पूरी तरह से भारतीय नारी थी. उन्हें एक छोटू में बहुत सारे गुण चाहिए होते थे. मसलन, उम्र कम हो, खानापीना भी कम करे, जो कहे वह आधी रात को भी कर दे, वे मोबाइल फोन पर दोस्तों के साथ ऐसीवैसी बातें करें, तो उन की बातों पर कान न धरे, रात का बचाखुचा खाना सुबह और सुबह का शाम को खा ले.

कुछ खास बातें छोटू में वे जरूर देखतीं कि पति के साथ बैडरूम में रोमांटिक मूड में हों, तो डिस्टर्ब न करे. एक बात और कि हर महीने 15-20 किट्टी पार्टियों में जब वे जाएं और शाम को लौटें, तो डिनर की सारी तैयारी कर के रखे.

शालिनी के लिए एक अच्छी बात यह थी कि यह वाला छोटू बड़ा ही सुंदर था. गोराचिट्टा, अच्छे नैननक्श वाला. यह बात वे कभी जबान पर भले ही न ला पाई हों, लेकिन वे जानती थीं कि छोटू उन के खुद के बेटे अनमोल से भी ज्यादा सुंदर था. अनमोल भी इसी की उम्र का था, 14 साल का.

घर में एकलौता अनमोल, शालिनी और उन के पति, कुल जमा 3 सदस्य थे. ऐसे में अनमोल की शिकायतें रहती थीं कि उस का एक भाई या बहन क्यों नहीं है? वह किस के साथ खेले?

नया छोटू आने के बाद शालिनी की एक समस्या यह भी दूर हो गई कि अनमोल खुश रहने लग गया था. शालिनी ने छोटू को यह छूट दे दी कि वह जब काम से फ्री हो जाए, तो अनमोल से खेल लिया रे.

छोटू पर इतना विश्वास तो किया ही जा सकता था कि वह अनमोल को कुछ गलत नहीं सिखाएगा.

छोटू ने अपने अच्छे बरताव और कामकाज से शालिनी का दिल जीत लिया था, लेकिन वे यह कभी बरदाश्त नहीं कर पाती थीं कि छोटू कामकाज में थोड़ी सी भी लापरवाही बरते. वह बच्चा ही था, लेकिन यह बात अच्छी तरह समझता था कि भाभी यानी शालिनी अनमोल की आंखों में एक आंसू भी नहीं सहन कर पाती थीं.

अनमोल की इच्छानुसार सुबह नाश्ते में क्याक्या बनेगा, यह बात शालिनी रात को ही छोटू को बता देती थीं, ताकि कोई चूक न हो. छोटू सुबह उसी की तैयारी कर देता था.

छोटू की ड्यूटी थी कि भयंकर सर्दी हो या गरमी, वह सब से पहले उठेगा, तैयार होगा और रसोईघर में नाश्ते की तैयारी करेगा.

शालिनी भाभी जब तक नहाधो कर आएंगी, तब तक छोटू नाश्ते की तैयारी कर के रखेगा. छोटू के लिए यह दिनचर्या सी बन गई थी.

आज छोटू को सुबह उठने में देरी हो गई. वजह यह थी कि रात को शालिनी भाभी की 2 किट्टी फ्रैंड्स की फैमिली का घर में ही डिनर रखा गया था. गपशप, अंताक्षरी वगैरह के चलते डिनर और उन के रवाना होने तक रात के साढे़ 12 बज चुके थे. सभी खाना खा चुके थे. बस, एक छोटू ही रह गया था, जो अभी तक भूखा था.

शालिनी ने अपने बैडरूम में जाते हुए छोटू को आवाज दे कर कहा था, ‘छोटू, किचन में खाना रखा है, खा लेना और जल्दी सो जाना. सुबह नाश्ता भी तैयार करना है. अनमोल को स्कूल जाना है.’

‘जी भाभी,’ छोटू ने सहमति में सिर हिलाया. वह रसोईघर में गया. ठिठुरा देने वाली ठंड में बचीखुची सब्जियां, ठंडी पड़ चुकी चपातियां थीं. उस ने एक चपाती को छुआ, तो ऐसा लगा जैसे बर्फ जमी है. अनमने मन से सब्जियों को पतीले में देखा. 3 सब्जियों में सिर्फ दाल बची हुई थी. यह सब देख कर उस की बचीखुची भूख भी शांत हो गई थी. जब भूख होती है, तो खाने को मिलता नहीं. जब खाने को मिलता है, तब तक भूख रहती नहीं. यह भी कोई जिंदगी है.

छोटू ने मन ही मन मालकिन के बेटे और खुद में तुलना की, ‘क्या फर्क है उस में और मुझ में. एक ही उम्र, एकजैसे इनसान. उस के बोलने से पहले ही न जाने कितनी तरह का खाना मिलता है और इधर एक मैं. एक ही मांबाप के 5 बच्चे. सब काम करते हैं, लेकिन फिर भी खाना समय पर नहीं मिलता. जब जिस चीज की जरूरत हो तब न मिले तो कितना दर्द होता है,’ यह बात छोटू से ज्यादा अच्छी तरह कौन जानता होगा.

छोटू ने बड़ी मुश्किल से दाल के साथ एक चपाती खाई औैर अपने कमरे में सोने चला गया. लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी. आज उस का दुख और दर्र्द जाग उठा. आंसू बह निकले. रोतेरोते सुबकने लगा वह और सुबकते हुए न जाने कब नींद आ गई, उसे पता ही नहीं चला.

थकान, भूख और उदास मन से जब वह उठा, तो साढे़ 8 बज चुके थे. वह उठते ही बाथरूम की तरफ भागा. गरम पानी करने का समय नहीं था, तो ठंडा पानी ही उडे़ला. नहाना इसलिए जरूरी था कि भाभी को बिना नहाए किचन में आना पसंद नहीं था.

छोटू ने किचन में प्रवेश किया, तो देखा कि भाभी कमरे से निकल कर किचन की ओर आ रही थीं. शालिनी ने जैसे ही छोटू को पौने 9 बजे रसोईघर में घुसते देखा, तो उन की त्योरियां चढ़ गईं, ‘‘छोटू, इस समय रसोई में घुसा है? यह कोई टाइम है उठने का? रात को बोला था कि जल्दी उठ कर किचन में तैयारी कर लेना. जरा सी भी अक्ल है तुझ में,’’ शालिनी नाराजगी का भाव लिए बोलीं.

‘‘सौरी भाभी, रात को नींद नहीं आई. सोया तो लेट हो गया,’’ छोटू बोला.

‘‘तुम नौकर लोगों को तो बस छूट मिलनी चाहिए. एक मिनट में सिर पर चढ़ जाते हो. महीने के 5 हजार रुपए, खानापीना, कपड़े सब चाहिए तुम लोगों को. लेकिन काम के नाम पर तुम लोग ढीले पड़ जाते हो…’’ गुस्से में शालिनी बोलीं.

‘‘आगे से ऐसा नहीं होगा भाभी,’’ छोटू बोला.

‘‘अच्छाअच्छा, अब ज्यादा बातें मत बना. जल्दीजल्दी काम कर,’’ शालिनी ने कहा.

छोटू और शालिनी दोनों तेजी से रसोईघर में काम निबटा रहे थे, तभी बैडरूम से अनमोल की तेज आवाज आई, ‘‘मम्मी, आप कहां हो? मेरा नाश्ता तैयार हो गया क्या? मुझे स्कूल जाना है.’’

‘‘लो, वह उठ गया अनमोल. अब तूफान खड़ा कर देगा…’’ शालिनी किचन में काम करतेकरते बुदबुदाईं.

‘‘आई बेटा, तू फ्रैश हो ले. नाश्ता बन कर तैयार हो रहा है. अभी लाती हूं,’’ शालिनी ने किचन से ही अनमोल को कहा.

‘‘मम्मी, मैं फ्रैश हो लिया हूं. आप नाश्ता लाओ जल्दी से. जोरों की भूख लगी है. स्कूल को देर हो जाएगी,’’ अनमोल ने कहा.

‘‘अच्छी आफत है. छोटू, तू यह दूध का गिलास अनमोल को दे आ. ठंडा किया हुआ है. मैं नाश्ता ले कर आती हूं.’’

‘‘जी भाभी, अभी दे कर आता हूं,’’ छोटू बोला.

‘‘मम्मी…’’ अंदर से अनमोल के चीखने की आवाज आई, तो शालिनी भागीं. वे चिल्लाते हुए बोलीं, ‘‘क्या हुआ बेटा… क्या गड़बड़ हो गई…’’

‘‘मम्मी, दूध गिर गया,’’ अनमोल चिल्ला कर बोला.

‘‘ओह, कैसे हुआ यह सब?’’ शालिनी ने गुस्से में छोटू से पूछा.

‘‘भाभी…’’

छोटू कुछ बोल पाता, उस से पहले ही शालिनी का थप्पड़ छोटू के गाल पर पड़ा, ‘‘तू ने जरूर कुछ गड़बड़ की होगी.’’

‘‘नहीं भाभी, मैं ने कुछ नहीं किया… वह अनमोल भैया…’’

‘‘चुप कर बदतमीज, झूठ बोलता है,’’ शालिनी का गुस्सा फट पड़ा.

‘‘मम्मी, छोटू का कुसूर नहीं था. मुझ से ही गिलास छूट गया था,’’ अनमोल बोला.

‘‘चलो, कोई बात नहीं. तू ठीक तो है न. जलन तो नहीं हो रही न? ध्यान से काम किया कर बेटा.’’

छोटू सुबक पड़ा. बिना वजह उसे चांटा पड़ गया. उस के गोरे गालों पर शालिनी की उंगलियों के निशान छप चुके थे. जलन तो उस के गालोंपर हो रही थी, लेकिन कोई पूछने वाला नहीं था.

‘‘अब रो क्यों रहा है? चल रसोईघर में. बहुत से काम करने हैं,’’ शालिनी छोटू के रोने और थप्पड़ को नजरअंदाज करते हुए लापरवाही से बोलीं.

छोटू रसोईघर में गया. कुछ देर रोता रहा. उस ने तय कर लिया कि अब इस घर में और काम नहीं करेगा. किसी अच्छे घर की तलाश करेगा.

दोपहर को खेलते समय छोटू चुपचाप घर से निकल गया. महीने की 15 तारीख हो चुकी थी. उस को पता था कि 15 दिन की तनख्वाह उसे नहीं मिलेगी. वह सीधा ब्यूरो के पास गया, इस से अच्छे घर की तलाश में.

उधर शाम होने तक छोटू घर नहीं आया, तो शालिनी को एहसास हो गया कि छोटू भाग चुका है. उन्होंने ब्यूरो में फोन किया, ‘‘भैया, आप का भेजा हुआ छोटू तो भाग गया. इतना अच्छे से अपने बेटे की तरह रखती थी, फिर भी न जाने क्यों चला गया.’’ छोटू को नए घर और शालिनी को नए छोटू की तलाश आज भी है. दोनों की यह तलाश न जाने कब तक पूरी होगी.

Romantic Story In Hindi: तुम्हें पाने की जिद में

Romantic Story In Hindi: ट्रेन में बैठते ही सुकून की सांस ली. धीरज ने सारा सामान बर्थ के नीचे एडजस्ट कर दिया था. टे्रन के चलते ही ठंडी हवा के झोंकों ने मुझे कुछ राहत दी. मैं अपने बड़े नाती गौरव की शादी में शामिल होने इंदौर जा रही हूं.

हर बार की घुटन से अलग इस बार इंदौर जाते हुए लग रहा है कि अब कष्टों का अंधेरा मेरी बेटी की जिंदगी से छंट चुका है. आज जब मैं अपनी बेटी की खुशियों में शामिल होने इंदौर जा रही हूं तो मेरा मन सफर में किसी पत्रिका में सिर छिपा कर बैठने की जगह उस की जिंदगी की किताब को पन्ने दर पन्ने पलटने का कर  रहा है.

कितने खुश थे हम जब अपनी प्यारी बिटिया रत्ना के लिए योग्य वर ढूंढ़ने में अपने सारे अनुभव और प्रयासों के निचोड़ से जीतेंद्र को सर्वथा उपयुक्त वर समझा था. आकर्षक व्यक्तित्व का धनी जीतेंद्र इंदौर के प्रतिष्ठित कालिज में सहायक प्राध्यापक है. अपने मातापिता और भाई हर्ष के साथ रहने वाले जीतेंद्र से ब्याह कर मेरी रत्ना भी परिवार का हिस्सा बन गई. गुजरते वक्त के साथ गौरव और यश भी रत्ना की गोद में आ गए. जीतेंद्र गंभीर और अंतर्मुखी थे. उन की गंभीरता ने उन्हें एकांतप्रिय बना कर नीरसता की ओर ढकेलना शुरू कर दिया था.

जीतेंद्र के छोटे भाई चपल और हंसमुख हर्ष के मेडिकल कालिज में चयनित होते ही मातापिता का प्यार और झुकाव उस के प्रति अधिक हो गया. यों भी जोशीले हर्ष के सामने अंतर्मुखी जीतेंद्र को वे दब्बू और संकोची मानते आ रहे थे. भावी डाक्टर के आगे कालिज में लेक्चरर बेटे को मातापिता द्वारा नाकाबिल करार देना जीतेंद्र को विचलित कर गया.

बारबार नकारा और दब्बू घोषित किए जाने का नतीजा यह निकला कि जीतेंद्र गहरे अवसाद से ग्रस्त हो गए. संवेदनशील होने के कारण उन्हें जब यह एहसास और बढ़ा तो वह लिहाज की सीमाओं को लांघ कर अपने मातापिता, खासकर मां को अपना सब से बड़ा दुश्मन समझने लगे. वैचारिक असंतुलन की स्थिति में जीतेंद्र के कानों में कुछ आवाजें गूंजती प्रतीत होती थीं जिन से उत्तेजित हो कर वह अपने मातापिता को गालियां देने से भी नहीं चूकते थे.

शांत कराने या विरोध का नतीजा मारपीट और सामान फेंकने तक पहुंच जाता था. वह मां से खुद को खतरा बतला कर उन का परोसा हुआ खाना पहले उन्हें ही चखने को मजबूर करते थे. उन्हें संदेह रहता कि इस में जहर मिला होगा.

जीतेंद्र को रत्ना का अपनी सास से बात करना भी स्वीकार न था. वह हिंसक होने की स्थिति में उन का कोप भाजन नन्हे गौरव और यश को भी बनना पड़ता था.

मेरी रत्ना का सुखी संसार क्लेश का अखाड़ा बन गया था. अपने स्तर पर प्यारदुलार से जीतेंद्र के मातापिता और हर्ष ने सबकुछ सामान्य करने की कोशिश की थी मगर तब तक पानी सिर से ऊपर जा चुका था. यह मानसिक ग्रंथि कुछ पलोें में नहीं शायद बचपन से ही जीतेंद्र के मन में पल रही थी.

दौरों की बढ़ती संख्या और विकरालता को देखते हुए हर्ष और उन के मातापिता जीतेंद्र को मानसिक आरोग्यशाला आगरा ले कर गए. मनोचिकित्सक ने मेडिकल हिस्ट्री जानने के बाद कुछ परीक्षणों व सी.टी. स्केन की रिपोर्ट को देख कर उन की बीमारी को सीजोफे्रनिया बताया. उन्होंने यह भी कहा कि इस रोग का उपचार लंबा और धीमा है. रोगी के परिजनों को बहुत धैर्य और संयम से काम लेना होता है. रोगी के आक्रामक होने पर खुद का बचाव और रोगी को शांत कर दवा दे कर सुलाना कोई आसान काम नहीं था. उन्हें लगातार काउंसलिंग की आवश्यकता थी.

हम परिस्थितियों से अनजान ही रहते यदि गौरव और यश को अचंभित करने यों अचानक इंदौर न पहुंचते. हालात बदले हुए थे. जीतेंद्र बरसों के मरीज दिखाई दे रहे थे. रत्ना पति के क्रोध की निशानियों को शरीर पर छिपाती हुई मेरे गले लग गई थी. मेरा कलेजा मुंह को आ रहा था. जिस रत्ना को एक ठोकर लगने पर मैं तड़प जाती थी वही रत्ना इतने मानसिक और शारीरिक कष्टों को खुद में समेटे हुए थी.

जब कोई उपाय नहीं रहता था तो पास के नर्सिंग होम से नर्स को बुला कर हाथपांव पकड़ कर इंजेक्शन लगवाना ही आखिरी उपाय रहता था.

इतने पर भी रत्ना की आशा और  विश्वास कायम था, ‘मां, यह बीमारी लाइलाज नहीं है.’ मेरी बड़ी बहू का प्रसव समय नजदीक आ रहा था सो मैं रत्ना को हौसला दे कर भारी मन से वापस आ गई थी.

रत्ना मुझे चिंतामुक्त रखने के लिए अपनी लड़ाई खुद लड़ कर मुझे तटस्थ रखना चाहती थी. इस दौरान मेरे बेटे मयंक और आकाश जीतेंद्र को दोबारा आगरा मानसिक आरोग्यशाला ले कर गए. जीतेंद्र को वहां एडमिट किया जाना आवश्यक था, लेकिन उसे अकेले वहां छोड़ने को इन का दिल गवारा न करता और उसे काउंसलिंग और परीक्षणों के बाद आवश्यक हिदायतों और दवाओं के साथ वापस ले आते थे.

मैं बेटों के वापस आने पर पलपल की जानकारी चाहती थी. मगर वे ‘डाक्टर का कहना है कि जीतेंद्र जल्दी ही अच्छे हो जाएंगे,’ कह कर दाएंबाएं हो जाते थे.

कहां भूलता है वह दिन जब मेरे नाती यश ने रोते हुए मुझे फोन किया था. यश सुबकते हुए बहुत कुछ कहना चाह रहा था और गौरव फुसफुसा कर रोक रहा था, ‘फोन पर कुछ मत बोलो…नानी परेशान हो जाएंगी.’

लेकिन जब मैं ने उसे सबकुछ बताने का हौसला दिया तो उस ने रोतेरोते बताया, ‘नानी, आज फिर पापा ने सारा घर सिर पर उठाया हुआ है. किसी भी तरह मनाने पर दवा नहीं ले रहे हैं. मम्मी को उन्होंने जोर से जूता मारा जो उन्हें घुटने में लगा और बेचारी लंगड़ा कर चल रही हैं. मम्मी तो आप को कुछ भी बताने से मना करती हैं, मगर हम छिप कर फोन कर रहे हैं. पापा इस हालत में हमें अपने पापा नहीं लगते हैं. हमें उन से डर लगता है. नानी, आप प्लीज, जल्दी आओ,’ आगे रुंधे गले से वह कुछ न कह सका था.

तब मैं और धीरज फोन रखते ही जल्दी से इंदौर के लिए रवाना हो गए थे. उस बार मैं बेटी की जिंदगी तबाह होने से बचाने के लिए उतावलेपन से बहुत ही कड़ा निर्णय ले चुकी थी लेकिन धीरज अपने नाम के अनुरूप धैर्यवान हैं, मेरी तरह उतावले नहीं होते.

इंदौर पहुंच कर मेरे मन में हर बार की तरह जीतेंद्र के लिए कोई सहानुभूति न थी बल्कि वह मेरी बेटी की जिंदगी तबाह करने का दोषी था. तब मेरा ध्येय केवल रत्ना, यश और गौरव को वहां से मुक्त करा कर अपने साथ वापस लाना था. जीतेंद्र की इस दशा के दोषी उस के मातापिता हैं तो वही उस का ध्यान रखें. मेरी बेटी क्यों उस पागल के साथ घुटघुट कर अपना जीवन बरबाद करे.

उफ, मेरी रत्ना को कितनी यंत्रणा और दुर्दशा सहनी पड़ रही थी. जीतेंद्र सो रहे थे. उन्हें बड़ी मुश्किल से दवा दे कर सुलाया गया था.

एकांत देख कर मैं ने अपने मन की बात रत्ना के सामने रख दी थी, ‘बस, बहुत हो गई सेवा. हमारे लिए तुम बोझ नहीं हो जो जीतेंद्र की मार खा कर यहां पड़ी रहो. करने दो इस के मांबाप को इस की सेवा. तुम जरूरी सामान बांधो और बच्चों को ले कर हमारे साथ चलो.’

तब यश और गौरव सहमे हुए मेरी बात से सहमत दिखाई दे रहे थे. आखिरकार उन्होंने ही तो मुझे समस्या से उबरने के लिए यहां बुलाया था.

‘क्या सोच रही हो, रत्ना. चलने की तैयारी करो,’ मैं ने उसे चुप देख कर जोर से कहा था.

‘सोच रही हूं कि मां बेटी के प्यार में कितनी कमजोर हो जाती है. आप को इन हालात से निकलने का सब से सरल उपाय मेरा आप के साथ चलना ही लग रहा है. ‘जीवन एक संघर्ष है’ यह घुट्टी आप ने ही पिलाई है और बेटी के प्यार में यह मंत्र आप ही भूले जा रही हैं… और लोगों की तरह आप भी इन्हें पागल की उपमा दे रही हैं जबकि यह केवल एक बीमार हैं.

‘आप ने तो पूर्ण स्वस्थ और सुयोग्य जीतेंद्र से मेरा विवाह किया था न? मैं ने जिंदगी की हर खुशी इन से पाई है. स्वस्थ व्यक्ति कभी बीमार भी हो सकता है तो क्या बीमार को छोड़ दिया जाता है. इन की इस बीमारी को मैं ने एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया है. दुनिया में संघर्षशील व्यक्ति न जाने कितने असंभव कार्यों को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हैं, तो क्या मैं मानव सेवा परम धर्म के संस्कार वाले समाज में अपने पति की सेवा का प्रण नहीं ले सकती.

‘जीतेंद्र को इस हाल में छोड़ कर आप अपने दिल से पूछिए, क्या वाकई मैं आप के पास खुश रह पाऊंगी. यह मातापिता की अवहेलना से आहत हैं… पत्नी के भी साथ छोड़ देने से इन का क्या हाल होगा जरा सोचिए.

‘मम्मी, आप पुत्री मोह में आसक्त हो कर ऐसा सोच रही हैं लेकिन मैं ऐसा करना तो दूर ऐसा सोच भी नहीं सकती. हां, आप कुछ दिन यहां रुक जाइए… यश और गौरव को नानानानी का साथ अच्छा लगेगा. इन दिनों मैं उन पर ध्यान भी कम ही दे पाती हूं.’

रत्ना धीरेधीरे अपनी बात स्पष्ट कर रही थी. वह कुछ और कहती इस से पहले रत्ना के पापा, जो चुपचाप हमारी बात सुन रहे थे, उठ कर रत्ना को गले लगा कर बोले, ‘बेटी, मुझे तुम से यही उम्मीद थी. इसी तरह हौसला बनाए रहो, बेटी.’

रत्ना के निर्णय ने मेरे अंतर्मन को झकझोर दिया था. ऐसा लगा कि मेरी शिक्षा अधूरी थी. मैं ने रत्ना को जीवन संघर्ष मानने का मंत्र तो दिया मगर सहजता से जिम्मेदारियों का वहन करते हुए कर्तव्य पथ पर अग्रसर होने का पाठ मुझे रत्ना ने पढ़ाया. मैं उस के सिर पर हाथ फेर कर भरे गले से सिर्फ इतना ही कह पाई थी, ‘बेटी, मैं तुम्हारे प्यार में हार गई लेकिन तुम अपने कर्तव्यों की निष्ठा में जरूर जीतोगी.’

कुछ दिन रत्ना और बच्चों के साथ गुजार कर मैं धीरज के साथ वापस आ गई थी. हम रहते तो ग्वालियर में थे मगर मन रत्ना के आसपास ही रहता था. दोनों बेटे अपने बच्चों और पत्नी के परिवार में खुश थे. मैं उन की तरफ से निश्चिंत थी. हम सभी चिंतित थे तो बस, रत्ना पर आई मुसीबत से. धीरज छुट्टियां ले कर मेरे साथ हरसंभव कोशिश करते जबतब इंदौर पहुंचने की.

रत्ना के ससुर इस मुश्किल समय में रत्ना को सहारा दे रहे थे. उन्होंने बडे़ संघर्षों के साथ अपने दोनों बेटों को लायक बनाया था. जीतेंद्र ही आर्थिक रूप से घर को सुदृढ़ कर रहे थे. हर्ष तब मेडिकल कालिज में पढ़ रहा था. इसलिए घर की आर्थिक स्थिति डांवांडोल होने लगी थी. बीमारी की वजह से जीतेंद्र को महीनों अवकाश पर रहना पड़ता था. अनेक बार छुट्टियां अवैतनिक हो जाती थीं. दवाइयों का खर्च तो था ही. काफी समय आगरा में अस्पताल में भी रहना पड़ता था.

जब कभी जीतेंद्र कालिज जाते तो रत्ना भी साथ जाती थी. रत्ना के कालिज  में उन के सहयोगियों से सहानुभूति और सहयोग की प्रार्थना की थी कि वे लोग जीतेंद्र की मानसिक स्थिति को देखते हुए उन के साथ बहस या तर्क न करें. जीतेंद्र को संतुलित रखने के लिए रत्ना साए की तरह उन के साथ रहती.

जीतेंद्र को बच्चों के भरोसे छोड़ कर रत्ना बाहर कहीं नौकरी करने भी नहीं जा सकती थी. इसलिए घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था. जिस दिन जीतेंद्र कुछ विचलित दिखते थे रत्ना को ट्यूशन वाले बच्चों को वापस भेजना पड़ता था, क्योंकि एक तो वह उन बच्चों को जीतेंद्र का कोपभाजन नहीं बनाना चाहती थी और दूसरे, वह नहीं चाहती थी कि आसपड़ोस के बच्चे जीतेंद्र की असंतुलित मनोदशा को नमकमिर्च लगा कर अपने परिजनों में प्रचारित करें. इस कारण सामान्य दिनों में उसे अधिक समय ट्यूशन में देना पड़ता था.

गृहस्थी की दो पहियों की गाड़ी में एक पहिए के असंतुलन से दूसरे पहिए पर सारा दारोमदार आ टिका था. सभी साजोसामान से भरा घर घोर आर्थिक संकट में धीरेधीरे खाली हो रहा था. यश और गौरव को शहर के प्रतिष्ठित पब्लिक स्कूल से निकाल कर पास के ही एक स्कूल में दाखिला दिला दिया था ताकि आनेजाने के खर्च और आर्थिक बोझ को कुछ कम किया जा सके. मासूम बच्चे भी इस संघर्ष के दौर में मां के साथ थे. वे कक्षा में अव्वल आ कर मां की आंखों में आशा के दीप जलाए हुए थे.

रत्ना जाने किस मिट्टी की बनी थी जो पल भर भी बिना आराम किए घर, बच्चों, ट्यूशन और पति सेवा में कहीं भी कोई कसर न रखना चाहती थी.

मेरे बेटे मयंक और आकाश अपनी लाड़ली बहन रत्ना की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते पर स्वाभिमानी रत्ना ने आर्थिक सहायता लेने से विनम्र इनकार कर दिया था. उस का कहना था कि अपने परिवार के खर्चों के बाद एक गृहस्थी की गाड़ी खींचने के लिए आप को अपने परिवार की इच्छाओं का गला घोंटना पडे़गा. भाई, आप का यह अपनापन और सहारा ही काफी है कि आप मुश्किल वक्त में मेरे साथ खडे़ हैं.

इन हालात की जिम्मेदार जीतेंद्र की मां खुद को निरपराधी साबित करने के लिए चोट खाई नागिन की तरह रत्ना के खिलाफ नईनई साजिशें रचती रहतीं. छोटे बेटे हर्ष और पति की असहमति के बावजूद जीतेंद्र को दूरदराज के ओझास्यानों के पास ले जा कर तंत्र साधना और झाड़फूंक करातीं जिस से जीतेंद्र की तबीयत और बिगड़ जाती थी. जीतेंद्र के विचलित होने पर उसे रत्ना के खिलाफ भड़का कर उस के क्रोध का रुख रत्ना  की ओर मोड़ देती थीं. केवल रत्ना ही उन्हें प्यारदुलार से दवा खिला पाती थी. लेकिन तब नफरत की आंधी बने जीतेंद्र को दवा देना भी मुश्किल हो जाता था.

जीतेंद्र को स्वयं पर भरोसा मजबूत कर अपने भरोसे में लेना, उन्हें उत्साहित करते हुए जिंदादिली कायम करना उन की काउंसलिंग का मूलमंत्र था.

सहनशक्ति की प्रतिमा बनी मेरी रत्ना सारे कलंक, प्रताड़ना को सहती चुपचाप अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करती रही. यश और गौरव को हमारे साथ रखने का प्रस्ताव वह बहुत शालीनता से ठुकरा चुकी थी. ‘मम्मी, इन्हें हालात से लड़ना सीखने दो, बचना नहीं.’ वाकई बच्चे मां की मेहनत को सफल करने में जी जान से जुटे थे. गौरव इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर पूणे में नौकरी कर रहा है. यश इंदौर में ही एम.बी.ए. कर रहा है.

हर्ष के डाक्टर बनते ही घर के हालात कुछ पटरी पर आ गए थे. रत्ना की सेवा, काउंसलिंग और व्यायाम से जीतेंद्र लगभग सामान्य रहने लगे थे. हां, दवा का सेवन लगातार चलते रहना है. अपने बेटों की प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार मिल रही सफलता से वे गौरवान्वित थे.

रत्ना की सास अपने इरादों में कामयाब न हो पाने से निराश हो कर चुप बैठ गई थीं. भाभी को अकारण बदनाम करने की कोशिशों के कारण हर्ष की नजरों में भी अपनी मां के प्रति सम्मान कम हुआ था. हमेशा झूठे दंभ को ओढे़ रहने वाली हर्ष की मां अब हारी हुई औरत सी जान पड़ती थीं.

ट्रेन खुली हवा में दौड़ने के बाद धीमेधीमे शहर में प्रवेश कर रही थी. मैं अतीत से वर्तमान में लौट आई. इत्मिनान से रत्ना की जिंदगी की किताब के सुख भरे पन्नों तक पहुंचतेपहुंचते मेरी ट्रेन भी इंदौर पहुंच गई.

स्टेशन पर रत्ना और जीतेंद्र हमें लेने आए थे. कितना सुखद एहसास था यह जब हम जीतेंद्र और रत्ना को स्वस्थ और प्रसन्न देख रहे थे. शादी में सभी रस्मों में भागदौड़ में जीतेंद्र पूरी सक्रियता से शामिल थे. उन्हें देख कर लग ही नहीं रहा था कि यह व्यक्ति ‘सीजोफेनिया’ जैसे जजबाती रोग की जकड़न में है.

गौरव की शादी धूमधाम से हुई. शादी के बाद गौरव और नववधू बड़ों का आशीर्वाद ले कर हनीमून के लिए रवाना हो गए. शाम को मैं, धीरज, रत्ना और जीतेंद्र में चाय पीते हुए हलकीफुलकी गपशप में मशगूल थे. तब जीतेंद्र ने झिझकते हुए मुझ से कहा, ‘‘मम्मीजी, आप ने रत्ना के रूप में एक अमूल्य रत्न मुझे सौंपा है जिस की दमक से मेरा घर आलोकित है. मुझे सही मानों में सच्चा जीवनसाथी मिला है, जिस ने हर मुश्किल में मेरा साथ दिया है.’’

बेटी की गृहस्थी चलाने की सूझबूझ और सहनशक्ति की तारीफ सुन कर मेरा सिर गर्व से ऊंचा हो गया.

‘‘रत्ना, मेरा दुर्व्यवहार, इतनी आर्थिक तंगी, सास के दंश, मेरा इलाज… कैसे सह पाईं तुम इतना कुछ?’’ अनायास ही रत्ना से मुसकरा कर पूछ बैठे थे जीतेंद्र.

रत्ना शरमा कर सिर्फ इतना ही कह सकी, ‘‘बस, तुम्हें पाने की जिद में.’’

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