Food Special: लंच में परोसें टेस्टी पंजाबी छोले

Food Special:  पंजाब गाना और खाना हर किसी को पसंद आता है, लेकिन क्या आप वही टेस्ट बना पाते हैं. चाहे आप भारत में कहीं भी रह रहें हों आपको पंजाबी खाना हर जगह मिल जाएगा. इसीलिए आज हम आपको पंजाबी छोले की खास रेसिपी बताएंगे, जिसे आप अपनी फैमिली को डिनर में चावल या रोटी के साथ परोस सकती हैं.

हमें चाहिए

काबुली चने (सफेद चने – 01 कटोरी,

पनीर – 100 ग्राम (क्यूब्स में कटा हुआ),

टमाटर- 3-4 (मीडियम साइज),

प्याज – 01 नग,

हरी मिर्च – 3-4 नग,

रिफाइंड तेल – 02 बड़े चम्मच,

अदरक पेस्ट – 01 छोटा चम्मच,

धनिया पाउडर– 01 छोटा चम्मच,

जीरा – 1/2 छोटा चम्मच,

लाल मिर्च पाउडर – 1/2 छोट चम्मच,

गरम मसाला – 1/2 छोटाचम्मच,

अमचूर पाउडर – 1/4 छोटा चम्मच,

खाने का सोडा़ – 1/4 छोटी चम्मच,

हरा धनिया – 02 बड़े चम्मच (बारीक कतरा हुआ),

नमक – स्वादानुसार.

बनाने का तरीका

– सबसे पहले काबुली चनों को रात भर के लिये भिगो दें. भीगने के बाद चनों को धो कर कुकर में रखें. कुकर में एक छोटा गिलास पानी, खाने का सोडा़ और नमक मिला दें.

– इसके बाद कुकर का ढक्कन बन्‍द कर दे और उसे गैस पर तेज आंच में उबालें. जब कुकर में 1 सीटी आ जाए, गैस की आंच धीमी कर दें. 5 मिनट पकने के बाद गैस ऑफ कर दें और कुकर की गैस अपने अाप निकलने दें.

– जब तक छोले ठंडे हो रहे हैं, एक पैन में 2 छोटे चम्मच तेल डाल कर गरम करें. तेल गरम होने पर उसमें पनीर के टुकड़े डाले और उन्हें हल्का सा तल लें.

– इसके बाद पैन में गरम मसाला और आधा हरा धनिया मिला दें और चलाकर इसे उतार कर अलग रख दें. अब मिक्सर में टमाटर, हरी मिर्च, अदरक को बारीक पीस लें.

– कढ़ाई में तेल गर्म करें. गरम तेल में जीरा डालें और भून लें. जीरा भुनने के बाद उसमें प्याज मिक्‍स करें और भून ले. प्याज भुन जाने के बाद कढ़ाई में अमचूर पाउडर, धनिया पाउडर, लाल मिर्च पाउडर और टमाटर अदरक का पेस्ट डाल कर भून लें.

– जब मसाला तेल छोड़ दे, उसमें एक कप पानी डाल कर उबाल आने तक पकायें. उबाल आने पर कढ़ाई में उबले हुए छोले डाल दें और चला दें. अगर आपको छोले की तरी ज्यादा गाढ़ी लग रही हो, तो इसमें आवश्यकतानुसार और पानी मिला दें और उसे पका लें.

– इसके बाद कढ़ाई में तले हुए पनीर के मिश्रण को कढ़ाई में डालें और चला दें. 2 मिनट तक पकने दें, फिर गैस बंद कर दें और बची हुई हरी धनिया कढ़ाई में डाल कर चला दें. अब इसे गैस से उतार गरमागरम रोटी या चावल के साथ फैमिली को परोसें.

Valentine’s Special: इस वेलेंटाइन ट्राई करें ये 4 Hairstyle

Valentine’s Special: अगर आप अपने वेलेटाइंस डे को और भी ज्यादा खास बनाना चाहती हैं तो आपको केवल अपने मेकअप और ड्रेस की ही नहीं बल्कि हेयर स्टाइल की भी चिंता करनी चाहिए, क्योंकि आपके बाल भी आपके व्यक्तित्व का एक हिस्सा होते हैं. अगर आपके बाल अच्छे से स्टाइल्ड होंगे तो आपकी लुक और अधिक एन्हांस हो सकती है. अगर आप नए और थोड़े आसन हेयर स्टाइल के बारे में जानना चाहती हैं तो आज का आर्टिकल जरूर पढ़ें क्योंकि हम आपके लिए डायसन के स्टाइलिंग एक्सपर्ट द्वारा बताए गए कुछ हेयर स्टाइल.  जिनसे आप घर में रह कर भी सैलून जैसा लुक पा सकती हैं.

1. क्लासिक बीच नोट :

इस हेयर स्टाइल में आपको थोड़ी हल्की हल्दी बीची वेव्स मिलेंगी.  अच्छी बात तो यह है की इस स्टाइल से आपके बालों को थोड़ी वॉल्यूम मिलेगी और इसे क्रिएट करना भी काफी आसान है.  क्राउन से कुछ बाल लें और उन्हें पीछे की ओर बीच में एक क्लिप से सिक्योर कर लें.  बाकी के बालों को खुला ही रहने दें.  अब एक कर्लर लें और उसकी मदद से खुले हुए बालों को थोड़ा थोड़ा कर्ल कर लें ताकि बालों के सॉफ्ट कर्ल बन सकें.  अधिक हीट का प्रयोग न करें क्योंकि इससे बाल अधिक घुंघराले हो सकते है.

2. स्ट्रेट हेयर :

अगर आपको स्ट्रेट बाल पसंद हैं तो यह हेयर स्टाइल आपके लिए ही है.  इसमें आपका लुक काफी सुलझा हुआ और बॉस गर्ल टाइप का लगने वाला है.  इसमें आपको कोई मुश्किल काम करने की भी जरूरत नहीं है.  इसमें आपको अपने बालों को पूरी तरह स्ट्रेट करना होगा.  इसके लिए किसी भी स्ट्रेटनर का प्रयोग कर सकती हैं.  यह हेयर स्टाइल हर तरह के कपड़ों के साथ सूट करता है और आप इसमें बीच की या साइड की कोई भी पार्टीशन कर सकती हैं.

3. ब्लो ड्राई करें :

अगर आपके बाल थोड़ा कम हैं और आप उन्हें थोड़ा वॉल्यूम वाला फूला हुआ लुक देना चाहती हैं तो यह हेयर स्टाइल आपके लिए बेस्ट रहने वाला है क्योंकि यह आपको सैलून जैसे ही ब्लो ड्राई हेयर देने वाला है.  एयर रैप स्टाइलर का प्रयोग करके इस लुक को पा सकती हैं.  इससे बालों को अधिक नुकसान भी नहीं पहुंचेगा और बालों को वह वॉल्यूम भी मिल जायेगी जो आप चाहती हैं.  इस वेलेंटाइन अगर सेक्सी लुक पाना चाहती हैं तो यह स्टाइल जरूर ट्राई करें और घंटों की जाने वाली मेहनत से बचें.

4. कर्ली हेयर :

अगर आप अपनी हॉट वेस्टर्न ड्रेस के साथ के साथ किया जाने वाला कोई हेयर स्टाइल ढूंढ रही हैं तो यह हेयर स्टाइल जरूर ट्राई करें.  कर्ली हेयर आप को और अधिक खूबसूरत बना सकते हैं.  आप बालों की फ्रंट पार्टीशन कर लें और पीछे की ओर ले जा कर दोनों ओर ब्रेड बांध लें.  इन दोनों ब्रेड को एक दूसरे से एक क्लिप की मदद से सिक्योर कर ले.  यह ब्रेड बांधने के बाद बाकी बालों को खुला छोड़ दें.  इन खुले हुए बालों को कर्ल कर लें.  इस हेयर स्टाइल को बनाने में भी आप को अधिक से अधिक आधा घंटा लग सकता है.  इसलिए कम समय में भी एक प्यारा लुक पाना चाहती हैं तो यह हेयर स्टाइल आप के लिए ही बना है.

वेलेंटाइन डे पर हर लड़की यह चाहती है कि उसका ऊपर से लेकर नीचे तक का सारा लुक एकदम टिप टॉप हो.  बहुत सी लड़कियों बालों को संभाल पाने में मात खा जाती हैं क्योंकि सभी को वह मुश्किल मुश्किल हेयर स्टाइल बनाने नहीं आते हैं.  आज के बताए गए हेयर स्टाइल बनाने में काफी आसान हैं और इन्हें बनाने में समय भी काफी कम लगता है.

Hair Care : मेरे बालों में काफी खुजली होती है, क्या करूं?

Hair Care : अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक पढ़ें

मैं नेपाल की रहने वाली हूं. मेरे चेहरे पर बहुत जल्दी रैशेज हो जाते हैं. इन रैशेज से बचने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?

अगर आप की त्वचा का रंग लाल हो रहा है या फिर उस में खुजली या रेशैज हो रहे हैं तो यह स्किन के ड्राई होने के लक्षण हैं. हो सकता है आप की स्किन सैंसिटिव है इसलिए सुगंधित और प्रेजेर्वेटिव युक्त किसी भी चीज का उपयोग करने से पहले सावधानी बरतें. अगर स्किन पर रेशैज हो ही गए हों तो उस पर चंदन के पाउडर को रोज वाटर में अच्छी तरह मिक्स कर के उस पेस्ट को रेशैज पर लगाएं. ऐलर्जी होने पर फिटकरी के पानी से प्रभावित स्थान को धो कर साफ करें. नारियल का तेल त्वचा के लाल होने पर उस स्थान पर लगाने से कुछ राहत मिलती है. कैलेमाइन लोशन पर लगाने से भी ठंडक मिलती है. डाक्टर की सलाह से ऐंटीएलर्जिक दवाएं लें.

मैं 25 साल की हूं. अभी थोड़े दिनों से मेरी त्वचा बहुत सांवली हो गई है. मैं ने बहुत से फेयरनैस क्रीम का इस्तेमाल किया, पर कुछ फर्क नहीं पड़ता. मुझे लगता है कि मैं ने फेयरनैस क्रीम लगाने के बाद मेरी त्वचा और सांवली लगने लगी है. कृपया उपाय बताएं?

हो सकता है कि आप ने जिस फेयरनैस क्रीम का इस्तेमाल किया है, वह आप को सूट न कर रही हो. इसी कारण ऐसा हो रहा हो. आप उस क्रीम का इस्तेमाल छोड़ दें और सुबहशाम फेस पर एलोवेरा युक्त क्रीम का इस्तेमाल करें. इस के साथ ही एक बार अपने ब्लड टेस्ट करवाएं और डाक्टर से कंसल्ट करें. कई बार शरीर में किसी कमी के कारण भी चेहरे का रंग डल पड़ने लग जाता है. घर पर रोजाना इस पैक का इस्तेमाल करें. आप रात को केसर की 4 तुर्रियों को 2 चम्मच दूध में भिगो दें और सुबह उस में कैलेमाइन पाउडर और चुटकीभर हलदी डाल कर अपने चेहरे पर मास्क की तरह लगाएं और सूखने पर पानी से धो दें.

मुझे अपने कर्ली हेयर्स को संभालना एक बहुत बड़ा काम लगता है. क्योंकि ये बहुत ज्यादा उलझे हुए हैं. साथ ही बेजान और रुखे हो गए हैं और झड़ने भी लगे हैं. कृपया कोई उपाय बताएं?

कर्ली हेयर्स पर गरम तेल की मालिश करने से बालों को बहुत फायदा होता है. इसे नियमित रूप से अपनाने पर हमारे कर्ली हेयर्स भी बेहद सुंदर हो जाते हैं. कोकोनट औयल, औलिव औयल और आलमंड औयल किसी भी औयल को हम बालों पर मसाज करने के लिए अप्लाई कर सकते हैं. ऐलोवेरा और औलिव औयल बेस्ड कंडीशनर, बालों को सौफ्ट और सिल्की बनाने के साथ ही बालों में शाइन भी बढ़ाते हैं. बालों को धोने के बाद गीले बालों में, लिव इन कंडीशनर की कुछ बूंदें हाथों में लगा कर बालों पर लगाएं, इस से बाल उलझेंगे नहीं. बालों में ब्रैंड टूथ कौम से कंघी करें. ध्यान रहे ऐसा करते समय बालों को खींचना नहीं है, बल्कि स्कैल्प की ओर पुश करना है इस से बालों के सूखने के बाद बहुत सुंदर कर्ल नजर आते हैं.

मैं 24 वर्षीया छात्रा हूं. करीब 2 वर्ष से मैं बीमार रहती हूं जिस के कारण मेरी आंखों के नीचे काले घेरे हो गए हैं व रंग भी काला लगने लगा है. कृपया कोई ऐसा उपाय बताएं, जिस से मैं इन दोनों परेशानियों से नजात पा सकूं?

ये दोनों ही समस्याएं आप को बीमारी व उस के दौरान ली जा रही दवाइयों के साइड इफैक्ट के कारण हो रही हैं. आप अपने आहार में ज्यादा पौष्टिक चीजों का सेवन कीजिए जैसे हरीसब्जियां, दूध, दही, आंवला, संतरा, टमाटर, गाजर आदि. रंग निखारने के लिए घरेलू उबटन का प्रयोग भी कर सकती हैं. आप एक बीट रूट ले लीजिए, उसे कद्दूकस कर उस का रस निकाल कर उस में आधा चम्मच कैलेमाइन पाउडर, क्योलाइन पाउडर और चंदन पाउडर मिलाएं. इस मिश्रण में कुछ बूंदें औलिव औयल को मिला कर फेस पैक बना लें और उसे पूरे फेस के साथ स्पैशली आंखों के नीचे लगाएं. इस पैक से आप की आंखों के चारों ओर पड़ने वाले घेरों को भी कम करेगा तथा आप का रंग भी साफ करेगा.

इन दिनों मेरे बालों में काफी खुजली होती है, जबकि मैं हमेशा तेल लगा कर ही बाल शैंपू करती हूं. बालों में जुएं भी नहीं हैं, कृपया बताएं मैं क्या करूं?

आप अपना शैंपू बदल कर देखिए क्योंकि कई बार किसी शैंपू से ऐलर्जिक होने के कारण भी ऐसा होता है. इस के अलावा एक बार अपना स्कैल्प चैक करें कि कहीं बालों में डैंड्रफ तो नहीं, अगर ऐसा है तो रूसी और खुजली वाले बालों की त्वचा के लिए जैतून के तेल की मालिश करें फिर गरम तौलिए से बालों को भाप दे कर 4-5 घंटे बाद बाल धो लें. इस के अलावा रूसी फैले नहीं, इस के लिए आप अपनी कंघी, तौलिया व तकिए को अलग रखें और इन की सफाई का भी खासतौर पर खयाल रखें. जब भी बाल धोएं, तो ये तीनों चीजें किसी अच्छे ऐंटीसैप्टिक के घोल में आधा घंटा डुबो कर रखें और धूप में सुखा कर ही दोबारा इस्तेमाल करें.

पाठक अपनी समस्याएं इस पते पर भेजें :

गृहशोभा, ई-8, रानी झांसी मार्ग, नई दिल्ली-110055

कृपया अपना मोबाइल नंबर जरूर लिखें.

स्रूस्, व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या 9650966493 पर भेजें.

Stories : हर घर में कुछ घटता है

Stories : सुनीति  बहुत देर से खिड़की से झांक रही थी. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने मम्मीपापा को क्या जवाब दे. बाहर बहुत शोरगुल था. सुनीति को इस बड़े शहर के शोरगुल से भी कुछ फर्क नहीं पड़ रहा था. वह अपने खयालों में खोई हुई एकटक बाहर देख रही थी. तभी उस के मोबाइल की घंटी बजी और उस का ध्यान भंग हो गया. फोन उस की फ्रैंड चित्राक्षी का था. उस ने सुनीति से पूछा, ‘‘फिर क्या सोचा तुम ने? क्या तुम शादी की खातिर अपनी इतनी अच्छी नौकरी छोड़ दोगी?’’

सुनीति ने जवाब दिया, ‘‘नहीं, ऐसा नहीं है कि मैं नौकरी छोड़ दूंगी. सवाल तो यह है कि मुझे शादी भी करनी है या नहीं.’’

चित्राक्षी ने कहा, ‘‘लेकिन अगर तुम्हें लड़का पसंद आ गया तो फिर?’’

सुनीति ने कहा, ‘‘तो फिर मैं यहां से ट्रांसफर ले लूंगी.’’

उस की फ्रैंड ने कहा, ‘‘देख जो कुछ भी करना, सोचसमझ कर करना,’’ कह कर चित्राक्षी ने मोबाइल रख दिया.

सुनीति फिर सोच में डूब गई. वह एक बहुत सुलझी हुई और समझदार लड़की थी. उस के लिए शादी के कई औफर आते थे. ऐसा नहीं था कि उसे अपने हिसाब का लड़का चुनने की आजादी नहीं थी लेकिन उस के पास ये सब सोचने का टाइम नहीं था इसलिए उस ने ये सब बातें अपने मम्मीपापा पर छोड़ना ही बेहतर समझा. सुबह अपने फ्लैट की किचन में कौफी बनाते समय उस का ध्यान अपने मोबाइल पर गया तो उस ने देखा कि उस की मम्मी ने 4-5 लड़कों के फोटोग्राफ भेजे थे. उस ने बड़े ही मजाकिया अंदाज में उन्हें देखना शुरू किया क्योंकि ऐसा पहले भी कई बार हो चुका था.

सुनीति पहले भी कई लड़कों को रिजैक्ट कर चुकी थी. उसे पता था कि मम्मी द्वारा इस बार भेजे गए फोटोज का भी वही जवाब होगा. लेकिन एक लड़के के फोटो ने उस का ध्यान खींचा. नीली गहरी आंखें, गोरा चिट्टा रंग, एकदम लंबा लड़का. मल्टीनैशनल कंपनी में ऊंची पोस्ट पर काम कर रहा था. ऐसा नहीं था कि

वह खुद किसी से कम थी. वह भी अपनी कंपनी में अच्छे पद पर थी. उस की जैसी स्मार्ट और खूबसूरत लड़की को ऐसा ही लड़का मिलना चाहिए था. उस ने अपनी मम्मी को इस लड़के से मिलने की हामी भर दी.

उधर उस की मम्मी गायत्री खुशी से झूम उठीं. गायत्रीजी स्वभाव से बहुत ही

भली महिला थीं. उन का जैसा सरल स्वभाव मिलना मुश्किल था. वे जहां भी जातीं, सब को अपना बना लेती थी. सुनीति थोड़ी अलग स्वभाव की थीं. उसे लोगों से खुलने में वक्त लगता था. उस का स्वभाव थोड़ा क्रांतिकारी किस्म का था. वह गलत बातों का पुरजोर विरोध करती थी. गलत का साथ देना उसे बचपन से ही गवारा नहीं था. उस की मां ने भले ही अपने जीवन में एडजस्टमैंट का नारा दिया हो लेकिन वह अपने उसूलों से समझौता नहीं करने वाली स्वतंत्र दिमाग की लड़की थी.

गायत्रीजी को सुनीति की इसी बात से डर लगता था कि आगे चल कर वो इस सोच के साथ समाज में अपना जीवन निर्वाह कैसे कर पाएगी? लेकिन सुनीति के पापा हमेशा उन्हें समझाते कि ऐसा नहीं है कि सुनीति एडजस्ट नहीं कर सकती. बात सिर्फ इतनी है कि वह अपने अधिकारों के प्रति सजग लड़की है और नए जमाने की सोच रखती है इसलिए उन्हें ऐसा लगता है.

शाम की ट्रेन से सुनीति घर वापस आ रही होती है तो वह देखती है कि एक अकेली लड़की को एक अधेड़ उम्र का आदमी परेशान कर रहा था. वह बारबार उसे कुछ खाने का प्रस्ताव दे रहा था. सुनीति ने उस आदमी को लताड़ा और लड़की को अपने पास बैठने की जगह दी. यहां तक कि ट्रेन से उतर कर भी उसे औटो में भी बैठाया और फिर वह खुद औटो से घर आ गई. हालांकि उस के पापा ने कार से उसे लाने की बात बोली थी लेकिन उस ने उन्हें इतनी रात को परेशान होने के लिए मना कर दिया.

करीब 11 बजे सुनीति घर पहुंचीं. मां ने आते ही उसे गले लगा लिया. उसे हाथमुंह धोने की कह कर उस के लिए खाना बनाने लगीं. सारा खाना सुनीति की पसंद का था. गाजर का हलवा, गरमगरम खस्ता कचौरी से लेकर गरमगरम पूरियां और खट्टामीठा अचार. इतना सारा खाना देख कर सुनीति के मुंह में पानी आ गया. उस ने बड़े चाव से खाना खाया. खाना खा कर हटने के बाद तो उस की मां ने उस से कहा, ‘‘बेटा, कल पार्लर जा आना. परसों लड़के वाले तुम्हें देखने आएंगे तो तुम्हें अच्छा दिखना होगा.’’

सुनीति हंस पड़ी. उस ने मां से कहा, ‘‘ऐसा नहीं है कि मुझे सजनासंवरना पसंद नहीं लेकिन इतना ज्यादा किसी और के लिए करना मुझे पसंद नहीं.’’

मां का उतरा चेहरा देख कर सुनीति ने कहा, ‘‘अच्छा ठीक है, आप कहती हैं तो मैं चली जाऊंगी. वह क्या है कि औफिस से घर और घर से औफिस, बस अब यही मेरा जीवन रह गया है.’’

सुनीति की मां बोलीं, ‘‘इसीलिए तो बेटा मैं चाहती हूं कि तुम्हें भी एक जीवनसाथी मिले, जिस के साथ हंसीखुशी से तुम अपना जीवन गुजारो. मेरी बात मानो इस रिश्ते के लिए हां कर देना, ऐसा लड़का ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलेगा.’’

सुनीति ने कहा, ‘‘मम्मी, बहुत रात हो गई है, मैं भी थक गयी हूं और आप भी. आप सो जाओ, सुबह बात करते हैं. दोनों अपनेअपने कमरे में सोने चली गईं. सुनीति को थकान के कारण तुरंत नींद आ गई.

सुबह उठी ही कि मां कौफी ले कर आ गईं.

‘‘मम्मी, एक बात बताओ, क्या पूरी रात नहीं सोईं? जरूर मेरी शादी की बात सोच रही होंगी,’’ सुनीति ने कहा.

तभी सुनीति के पापा हंसते हुए कमरे में आ गए और बोले, ‘‘तो यह रात को न खुद

सोई, न मुझे शांति से सोने दिया. बारबार लड़के वालों की तारीफ के पुल बांध रही थी.’’

सुनीति मम्मी को समझाते हुए बोली, ‘‘मम्मी, भावुक होना अच्छी बात है पर क्या आप ने कभी यह सोचा कि आप को इस बारे में थोड़ा व्यावहारिक हो कर सोचना चाहिए? आप सीधे हो, जमाना बहुत टेढ़ा है. लोगों को परख कर ही आप को शादी जैसा कदम उठाना चाहिए.’’

गायत्रीजी को अचानक याद आया कि उन्होंने आंच पर दूध रखा है. वे लगभग भागती हुईं जा कर दूध संभालती हैं. दूध उफान ले चुका था. रसोई मे काम फैल चुका था.

तभी सुनीति वहां आ गई और बोली, ‘‘मम्मी लड़की के साथ लड़की की मां को भी सुंदर दिखना होता है. यह सब मैं संभाल लूंगी, आप ऐसा करो फटाफट तैयार हो कर आ जाओ, हम दोनों ही पार्लर हो कर आते हैं.’’

सुनीति के पापा हंसे, ‘‘तुम यह क्या कर रही हो? तुम्हारी मां किसी हीरोइन से कम है क्या? लड़की वाले इसे कहीं तुम्हारी बड़ी बहन न

समझ लें.’’

सुनीति की मां ने झुंझलाते हुए बोलीं, ‘‘देखो मेरा मजाक बनाने से पहले अपने इन सफेद बालों को डाई कर लो. सुना है वे बहुत ऊंचे लोग हैं.’’

सुनीति की मां के ऐसा कहने पर उस के पापा ने कहा, ‘‘मौडर्न और ऊंचा इंसान दिमाग से होता है न कि देखने से और तुम भी नौर्मल रहो, किसी को अगर हम पसंद नहीं तो कोई बात नहीं. हम जैसे हैं, अच्छे हैं.’’

यह बात सुन कर गायत्रीजी चुप हो गईं. फिर दोनों मांबेटी पार्लर जा कर सजसंवर आईं. सुनीति के पापा दोनों को देख कर प्रसन्न हो गए.

लड़के वालों के स्वागत की तैयारी शुरू हो गई. सुनीति की मां सुनीति को एक बनारसी साड़ी निकाल कर पहनने को दी. सुनीति चिढ़ गई. बोली, ‘‘मैं ने बपनी पसंद का सूट पहन लिया है और आप भी लड़के वालों से कह देना कि घर में तो मैं सूट पहन लूंगी लेकिन औफिस जाते वक्त मुझे ट्राउजर और शर्ट पहननी होती है और मैं वही पहनूंगी इसलिए मैं जानबूझ कर यह साड़ी नहीं पहन रही. मैं नहीं चाहती कि किसी भी रूप में मुझे एक पारंपरिक लड़की समझा जाए. मैं जैसी हूं, वैसे ही उन के सामने दिखना चाहती हूं.’’

सुनीति की मां थोड़ा घबरा गईं फिर अपनी बेटी की बात उन्हें सही लगी और फिर वे उस का मूड खराब नहीं करना चाहती थीं इसलिए उसे सौरी बेटा, कह कर चली गईं.

दोपहर के करीब 3 बजे लड़के वाले घर आए. लड़के की मां वाकई बहुत

खूबसूरत थीं. उन को देख कर ही पता चलता था कि वे लोग बहुत अमीर हैं. हालांकि सुनीति का परिवार अच्छाखासा संपन्न था लेकिन उन लोगों के सामने वे लोग कुछ नहीं थे. लड़के की मां का गुरूर देखने योग्य था. उन की साड़ी का पल्लू टस से मस नहीं हो रहा था. वे कहने लगीं, ‘‘ऐसा है जी हमारे वंश के लिए तो बहुत रिश्ते आते हैं लेकिन आप की लड़की का फोटो, बायोडाटा उसे बहुत पसंद आया इसलिए हमें यहां आना ही था. लड़के की पसंद हमारी पसंद,’’ ऐसा कह कर वे मुसकराने लगीं. उन के साथ उन की ननद और बहन भी आई थीं, जो लगातार उन की हां में हां मिलाए जा रही थीं.

उधर सुनीति को जब वंश से मिलवाया गया तो सुनीति देखते ही वंश को भा गई. उस के विचार सुन कर तो वंश और भी प्रभावित हो गया लेकिन सुनीति की मां को एक बात जो सुनीति ने कही थी, उन लोगों तक पहुंचानी थी. उन्होंने कहा, ‘‘देखिए बहनजी, बाकी सब तो ठीक है लेकिन क्योंकि सुनीति वर्किंग गर्ल है, वह औफिस ट्राउजर और शर्ट में जाती है और जाएगी भी और साथ ही घर पर उसे सूट पहने की आजादी होनी चाहिए.’’

वंश की मां का चेहरा यह सुनते ही उतर गया, फिर उन्होंने अपनेआप को संभालते हुए कहा, ‘‘वह सब लड़कालड़की की पसंद. हां, यह तो बताइए कि शादी के बाद सुनीति यहां ट्रांसफर ले लेगी न जैसाकि आप ने कहा था?’’

सुनीति की मां ने कहा, ‘‘हां, जरूर. हम ने यही तय किया है.’’

वंश की मां ने कुछ राहत की सांस ली और जब वंश आया तो उस से मुसकरा कर इशारे से सुनीति के बारे में पूछा. वंश हंस पड़ा तब जा कर वे थोड़ा मुसकराईं. लेकिन उन का दांव अभी भी बाकी था. उन्होंने घर जा कर जवाब देने की बात कह कर वहां से रुखसत ली.

घर जा कर वंश की मां ने वंश से पूछा तो उस ने रिश्ते के लिए हां कर दी लेकिन बूआजी ने यह कहते हुए टांग अड़ा दी कि वह तो औफिस में पैंटशर्ट पहन कर जाएगी, तो क्या भाभी आप बहू को पैंटशर्ट पहनने दोगी? ऐसे में वंश की मां का सारा उत्साह ठंडा पड़ता हुआ नजर आया. वे लड़की वालों के सामने शर्त रखना चाह रही थीं कि लड़की घर पर और बाहर भी उन की पसंद के कपड़े पहने खासकर घर में साड़ी और औफिस में सूट.

जब वंश को यह पता चला कि मां लड़की वालों से इस तरह की शर्त रखने वाली हैं

तो उन्हें रोक कर उस ने कहा, ‘‘मां, मैं शादी करूंगा तो सिर्फ इसी लड़की से और वह भी बिना किसी शर्त के और बूआ को भी बता दीजिए कि ऐसी कोई शर्त न रखें जिस से कि वे लोग परेशान हों. शादी बिलकुल सादे तरीके से होगी, मुझे दिखावा बिलकुल नहीं चाहिए.’’

वंश की मां का चेहरा उतर चुका था. लेकिन उन के अंदर सुनीति के प्रति एक जलन ने जन्म ले लिया था. उस लड़की के प्रति जो अभी तक इस घर में आई भी नहीं थी. ऐसा भाव वाकई में उचित नहीं था. उधर वंश के पापा ने वंश की मां को लड़की वालों से शादी की बात के लिए हां का फोन करने के लिए कहा. वंश की मां ने फोन पर हां तो कर दी लेकिन उन के मन में कई शंकाएं थीं. सुनीति को भी वंश बहुत भाग गया था और वह भी बहुत खुश थी.

सुनीति के मातापिता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वे तो इतने खुश थे कि उन्होंने शादी की तैयारी तुरंत शुरू कर दी. वंश की मां ने जैसा वंश ने कहा था, वैसी ही शादी की बात सुनीति के मातापिता तक पहुंचा दी. वे बेचारे तो इसी गलतफहमी में थे कि सुनीति की सास कितनी अच्छी हैं कि इतनी सादगी भरी शादी की बात कह रही हैं. खैर, शादी संपन्न हुई और सुनीति

5 कमरों के मकान से सीधा 25 कमरों के बड़े घर में आ गई.

घर की 1-1 चीज घर की शानोशौकत बताती थी लेकिन जैसाकि सुनीति का स्वभाव था

वह इन सब से प्रभावित नहीं होती थी. घर पर पहुंचते ही सुनीति की सास के द्वारा उसे कम गहने लाने की बात का ताना मारा गया. वे कहने लगीं, ‘‘इस से ज्यादा जेवर तो मैं ने पिछली बार अपनी नौकरानी की बेटी की शादी में दे दिए थे.’’

सुनीति क्योंकि एक समझदार लड़की थी, उस ने इस बात पर ज्यादा गौर नहीं की और इग्नोर कर दिया. उधर सुनीति की बूआ सास और मौसी सास सुनीति पर निशाना साधने लगी थीं.

मौसी सास कहतीं, ‘‘इतना बढि़या लड़का था, चाहते तो सोने के महलों से राजकुमारी ले कर आते लेकिन क्या करें. इसे तो सुनीति पसंद आ गई.’’

बूआ सास ने आग में घी डाला, ‘‘वैसे सुनीति तुम तो अपने मांबाप की इकलौती बेटी हो, पढ़ाईलिखाई तो तुम ने ज्यादा ही की है, उस हिसाब से घर का काम तो तुम्हें आता नहीं होगा. तुम्हारी सास बहुत अच्छा खाना बनाती है, सिर झुका कर सारी बातें सुन लेना और सीख लेना वरना भाभी का स्वभाव तुम नहीं जानती हो.’’

तभी सुनीति के देवर ने दोनों को तीखी नजरों से देखा तो दोनों सकपका वहां से अंदर चली गईं. वह सीधे अपनी मां के पास जा कर बोला, ‘‘मम्मी, आप ने मौसी और बूआ को बहुत ज्यादा छूट दे रखी है. आप को पता है अभी ये भाभी से क्याक्या कह रही थीं?’’

सुनीति की सास ने तेवर दिखाए और बोली, ‘‘अब तू बड़ों को सिखाएगा कि किसे, कब और क्या कहना है? जा, अपना काम कर.’’

उधर जब 3-4 दिन बाद सुनीति ने औफिस जाने के लिए कदम बढ़ाया तो बूआ और मौसी दौड़ीदौड़ी सुनीति की सास के पास गईं और बोलने लगीं, ‘‘देखोदेखो, कैसे पैंटशर्ट पहन कर निकली है. बाहर किसी ने देखा तो कोई क्या कहेगा.’’

सुनीति की सास जोर से चिल्ला कर बोलीं, ‘‘सुनीति, तुम्हें क्या बिलकुल तमीज नहीं सिखाई गई कि नई दुलहन को किस तरह से रहना चाहिए और ये क्या. क्या 15 दिन की भी छुट्टी नहीं मिली? अभी तो तुम दोनों का हनीमून भी नहीं हुआ है. हद कर दी तुम ने तो.’’

सुनीति थोड़ा घबराई लेकिन फिर उस ने अपनेआप को संभाला. कहा, ‘‘मेरी वंश से बात हो गई है. उन्होंने ही मुझे औफिस जाने को कहा है क्योंकि हम सर्दियों के बाद ही घूमने जाएंगे.’’

तभी मौसी सास कहने लगी, ‘‘देखो दीदी, मैं नहीं कहती थी कि इतनी पढ़ीलिखी लड़की मत लाओ, देखा कैसे जबान चलती है इस की. कैसे अपने पति का नाम आप के सामने लेती है.’’

और फिर आग में घी का काम किया बूआ सास ने. इस सारे तमाशे के बीच वह एक साड़ी उठा कर ले आईं, ‘‘देखो न भाभी, तुम्हारे समधियों ने कैसी साड़ी दी है मुझे. न कलर अच्छा है और न ही कपड़ा.’’

सुनीति ने हंगामा बढ़ता देखा तो उस ने कमरे में वापस जाने की सोची. तभी वहां वंश आ गया और कुछ देर बाद उस के पापा भी आ गए और कहने लगे, ‘‘सुनीति, ड्राइवर बाहर खड़ा है, तुम औफिस जाओ और तुम भी जाओ वंश. तुम लोग अपनाअपना काम करो.’’

फिर उन्होंने वंश की मां से कहा, ‘‘वंश की मां, आप के तो कहने ही क्या? नई लड़की है, ऊपरनीचे हो जाता है. क्या हमारी अनामिका जींस नहीं पहनती और दीदी साड़ी मैं आप को ला कर दूंगा, बेमतलब का हंगामा न करें.’’

इस बात को सुन कर बूआजी ने रोने का नाटक किया, तो वंश के पापा ने हाथ जोड़ कर उन से माफी मांगी, तब जा कर वे मानीं.

शाम को सुनीति और वंश का मूवी जाने का प्रोग्राम था तो वंश की मां, मौसी और

बूआ ने एक षड्यंत्र किया. उन्होंने घर के सारे बच्चों को उन के साथ भेज दिया ताकि दोनों अकेले समय नहीं बिता पाएं. सुनीति से ज्यादा बुरा वंश को लगा. पूरा दिन घर में बच्चों को सुनीति के कमरे में भेज दिया जाता. वंश को सुनीति से बात करने का मौका भी नहीं मिलता. वंश झुंझला कर रह जाता. उधर सुनीति के हाथ की मेहंदी भी नहीं सूखी थी, नौकरों को छुट्टी दे दी गई और सुनीति से सारे घर के काम कराए जाने लगे.

वंश अपनी मां के बदले हुए व्यवहार को देख कर चक्कर खा गया. हालांकि सुनीति ने उस से कुछ नहीं कहा लेकिन वह सब समझ रहा था. उधर सुनीति ने जब बूआ सास और मौसी सास की बहुओं से जब बात की तो उन्होंने दोनों की छोटी और चालाकी भरी मानसिकता के बारे में सुनीति को बता दिया.

अब सुनीति काफी सतर्क हो गई थी लेकिन एक दिन जब सुनीति को औफिस से आने में देर हो गई तो सुनीति की सास ने काफी हंगामा किया, सुनीति भी काफी परेशान हो गई थी. उस ने शादी के बाद से ही चैन की सांस नहीं ली थी. उस ने वंश से कह दिया कि उसे रहने के लिए इतना बड़ा घर नहीं, सुकून चाहिए. हम वापस आ जाएंगे अगर मम्मी अपना व्यवहार बदल ले तो लेकिन फिलहाल के लिए मुझे कहीं और ले चलो. वंश भी दोनों के बीच काफी पिस चुका था. वह सीधा अपने पापा के पास गया.

वेश के बिना कुछ बोले ही उस के पापा ने कहा, वंश, पास ही अपना 4 बीएचके फ्लैट है, वैलफर्नीशड है, तुम कल सुबह ही सुनीति के साथ वहां रहने चले जाओ. तुम्हारी मां हंगामा करेगी लेकिन इस वक्त तुम्हारा वैवाहिक जीवन बचाना ज्यादा जरूरी है. तुम्हारी मां अच्छी है लेकिन उस की सोच पुरानी है. वह सबक सीखेगी, तभी बदलेगी. फिलहाल तुम दोनों  का यहां से जाना ही अच्छा है.’’

वंश सुनीति को ले कर अलग हो गया. उधर वंश की मां का रोरो कर बुरा हाल था.

बूआ और मौसी ने अपने बताए रिश्तों की विशेषताएं गागा कर उन का और भी बुरा हाल कर दिया था. वक्त परिंदे की तरह तेजी से बढ़ता चला जा रहा था. वंश की मां अकेली पड़ रही थी. बूआ और मौसी अपनेअपने घर लौट चुकी थीं. वैसे भी अब उन के पास चुगली करने की कोई वजह बची भी नहीं थी. सुनीति की अनुपस्थिति ने पूरा घर सूना कर दिया था. नई बहू के आगमन की खुशी काफूर हो चुकी थी.

उधर सुनीति ने अपने अनुभव से प्रेरणा ले कर अपना एक ग्रुप बनाया था जो ससुराल में बहुओं पर तानाशाही चलाने वाले लोगों और उन के जीवन को नर्क बनाने वालों को सही रास्ते पर लाने का काम करता था. वंश की बूआ और मौसी की बहुओं को जब यह पता चला तो वे भी सुनीति के साथ हो लीं.

सुनीति हर 15 दिन में सारी महिलाओं को एकत्रित करती और उन्हें गलत के खिलाफ आवाज उठाने को प्रेरित करती. अब तो बूआ और मौसी के घर भी क्रांति की ज्वाला से धधक रहे थे. उन दोनों की बहुओं के मन में धधक रही बरसों की आग अब ज्वाला बन गई थी. उन्होंने अपने मन को इतनी बार मारा था कि अब वे और समझौता करने को तैयार नहीं थीं.

दोनों भागीभागी सुनीति की सास को ये सब बताने गईं. सुनीति की सास पहले ही काफी भुगत रही थीं. अकेले पड़ेपड़े उन का जी घबराता था. उन का वंश और सुनीति से मिलने का मन करता था लेकिन अभिमान उन्हें ऐसा करने से रोकता था. वे मन ही मन अपनेआप को कोसती थीं तो कभी अपनेआप को सही भी ठहराती थीं.

ऐसे में बूआ सास और मौसी सास दोनों ने अपना हाल बताया और उलाहना भी दिया कि यह सब तुम्हारी बहू की करतूत है.

अब की बार 6 महीने से भरी पड़ी सुनीति की सास को क्रोध आ गया. उन्होंने कहा, ‘‘हर बार मेरी बहू गलत नहीं हो सकती. तुम दोनों ने मेरे दिमाग में उस के खिलाफ इतना जहर भरा कि वह मेरे बेटे सहित अलग हो गई. मैं तो यही कहूंगी कि मैं और तुम दोनों ही क्या, सभी सासों को जो बहुओं को कुछ भी नहीं समझतीं और उन्हें आजादी नहीं देतीं, उन्हें अपनी आदतों में सुधार कर लेना चाहिए.

‘‘मैं तो अभी सुनीति के पास जा रही हूं. मैं अपने बच्चों से और अलग नहीं रह सकती. मेरी मानो तुम भी वहीं चलो. मैं ने सुना है कि क्लब के ये सारी बहुएं हर 15 दिन में मीटिंग करती हें, तुम्हारी बहुएं भी वहीं होंगी.

मौसी और बूआ सुनीति की सास का ऐसा बदला स्वरूप देख कर दंग रह गईं. लेकिन उन्हें भी अकेलेपन से डर लग रहा था तो वे भी सुनीति की सास के साथ क्लब आ गईं. वहां सुनीति महिलाओं की काउंसलिंग कर रही थी. जैसे ही अपनी सास को सुनीति ने देखा वह उठ कर उन से मिलने आई और उन के पैर छुए. बड़े प्यार से उन्हें बैठाया. मौसी और बूआ की बहुएं भी आ चुकी थीं. सुनीति की सास ने उस से माफी मांगी और घर चलने का आग्रह किया.

सुनीति ने कहा, ‘‘मम्मी, मैं भी आप को सौरी कहना चाहती हूं लेकिन मेरे पास और कोई रास्ता नहीं बचा था. मौसी और बूआ भी अपनी बहुओं से वापस घर आने की बात कहने लगीं.’’

तभी सुनीति ने कहा, ‘‘देखिए मौसीजी और बूआजी, आप मम्मी की देखादेखी इन्हें

वापस मत ले कर जाइए. पूरे दिल और खुले दिमाग के साथ इन की घर वापसी होनी चाहिए और मम्मी पहले मैं घर जाती हूं फिर मैं वंश से बात करूंगी. तभी मैं घर वापस आने की सोच सकती हूं.’’

उधर वंश की मां शाम को बेसब्री से इंतजार करने लगीं. वंश जब शाम को घर आया तो सुनीति ने उसे यह सब बताया.

वंश बोला, ‘‘देखो, आज मां अकेले रह जाने के डर से ये सारी बातें बोल रही हैं लेकिन बाद में इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वे आगे ऐसा नहीं करेंगी. फिर वही ताने, लड़ाईझगड़ा और बाद में अलग होना. मैं यह सब दोबारा नहीं चाहता.’’

सुनीति ने कहा, ‘‘मुझे पूरा विश्वास है कि चाहे कोई भी कारण रहा हो, मम्मी अब बदल गई हैं. फिर हर आदमी को एक मौका तो मिलना ही चाहिए.’’

वंश मुसकरा दिया. दोनों मां के साथ रहने घर की ओर चल दिए. घर पहुंचे तो पापा ने उन्हें गले लगा लिया.

वंश की मां के आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे. उन की खुशी का ठिकाना नहीं था. ऐसा लग रहा था कि वंश आज ही सुनीति से शादी कर पहली बार उसे घर ले कर आया था. मां ने दोनों की आरती उतारी.

वंश के पापा ने कहा, ‘‘हर घर में कुछ न कुछ जरूर घटता है लेकिन जरूरत है समझदारी से उसे हल करने की. सुनीति की ससुराल अब उस की ससुराल नहीं, मायका बन गयाथा. सुनीति ने अपना भविष्य खुद अपने हाथों से लिखा है जिस में न कोई कष्ट है, न अपमान और न दुविधा बल्कि सुकून और शांति है.

-रितुप्रिया शर्मा

Hindi Story : माई ड्रीम हस्बैंड

Hindi Story : निशिता  अब और सब्र नहीं हो रहा. इंतजार है तो कल का जब तुम हमेशा के लिए मेरी हो जाओगी. हर वक्त बस तुम्हारा ही चेहरा मेरी आंखों के सामने रहता है. अब तुम्हारे बिना एकएक पल बिताना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है. आई रियली लव यू. डू यू लव मीटू?’’

मंगेतर मिलिंद की ये बातें सुन मेरी सांसें बेकाबू हो गईं.

‘‘निशिता, मैं बस तुम से वे 3 जादूई शब्द सुनना चाहता हूं. बोलो न निशी, माई लव. प्लीज, बोल दो. अब तो कल तुम्हारा नाम मुझ से जुड़ ही जाएगा. प्लीज, बोल दो न, जो मुझे इत्मीनान हो जाए कि तुम भी मुझे चाहने लगी हो.’’

मिलिंद की ये बातें मुझे मदहोश कर रही थीं. मेरी जबान तालू से चुपक गई थी. धौंकनी की तरह धुकधुकाते दिल के साथ मैं ने बस इतना कह कर लाइन काट दी, ‘‘कल, आज नहीं. थोड़ा सब्र करो.’’

मुझे अपने ऊपर आश्चर्य हो रहा था. इस मिलिंद ने मुझ पर कहीं जादू तो नहीं कर दिया. नहीं तो मुझ जैसी गंभीर शख्सियत की यह कैसी काया पलट हो गई कि उस की आवाज सुनते ही मैं जैसे किसी दूसरी ही दुनिया में पहुंच जाती हूं, अपने होश खो बैठती हूं.

कुछ ही देर में मेरी सांसें संयत हुईं और मैं मिलिंद के साथ बीते सुखद पलों में खो गई…

मिलिंद से मेरी मुलाकात 6 माह पहले ही हुई थी. वह एक रईस खानदानी परिवार की छोटी संतान था. उस का रिश्ता मुझे एक नामी औनलाइन मैट्रीमोनियल साइट के जरीए मिला था. मेरे परिवार का माहौल उस के परिवार की तुलना में देसी था. जहां मेरे पिता कोटा में एक परचूनी की सोना उगलती दुकान चलाते थे, वहीं उस के पिता शहर का एक प्रतिष्ठित कोचिंग सैंटर, मिलिंद और उस के बड़े भैया के साथ मिल कर चलाते थे.

मेरी विवाह योग्य उम्र हो आई थी और बाबूजी या मां मुझे जो रिश्ते सुझाते वे मुझे पसंद न आते. वे अधिकतर बिजनैस फैमिली के व्यापारी लड़कों के रिश्ते मेरे लिए ला रहे थे जो मुझे कतई पसंद नहीं आ रहे थे. उधर मेरी दादी और बाबूजी मुझे उन के द्वारा लाए रिश्तों में से किसी एक रिश्ते के लिए हां करने का दबाव बना रहे थे लेकिन मुझे किसी व्यापारी से शादी नहीं करनी थी. मेरी तमन्ना थी किसी अपनी तरह के इंजीनियर लड़के की. सो मैं ने एक मैट्रीमोनियल साइट पर अपना प्रोफाइल पोस्ट कर दिया था और उस पर इंजीनियर युवकों से कौंटैक्ट कर रही थी. मां या बाबूजी यह कर नहीं सकते थे क्योंकि उन्हें इंग्लिश नहीं आती थी.

तभी साइट पर मुझ से अपने शहर में एक दौलतमंद खानदान के मुंबई आईआईटी

से पास आउट इंजीनियर युवक मिलिंद टकराया और मैं ने उस से बात आगे बढ़ाई.

कुछ ही दिनों में बात ईमेल और फोन काल से आगे बढ़ कर आमनेसामने बातचीत और घूमनेफिरने तक आ गई और अब मैं उस के साथ हर छुट्टी के दिन हैंग आउट करने लगी.

मिलिंद उच्च शिक्षित होने के साथसाथ टौल, डार्क और हैंडसम, लच्छेदार बातें करने वाला खासा हाजिरजवाब था. किसी भी लड़की के आइडियल बौयफ्रैंड का अवतार. उस ने मेरे दिन का चैन और रातों की नींद चुरा ली थी.

मैं उस के साथ पिछले 6 माह से अपने शहर कोटा में घूमफिर रही थी. जहां मैं हिंदी स्कूल की पैदाइश थी, वहीं वह शहर के नामचीन कौंवेंट से पढ़ा था. ऐसी फ्लूएंट इंग्लिश बोलता कि मैं उसे देखती रह जाती.

मिलिंद हर माने में एक ड्रीम हस्बैंड था और कभीकभी मैं सोचती कि उस जैसे खानदानी रईस, हैंडसम और लाखों कमाने वाले लड़के को मेरी जैसी हिंदी मीडियम की सीधीसादी और सामान्य नैननक्श की लड़की कैसे पसंद आ गई.

खैर, 6 माह तक साथसाथ घूमनेफिरने के बाद मैं ने अपने पिता को मिलिंद की बाबत हरी झंडी दे दी. मातापिता और दादी मिलिंद के घर गए और प्रारंभिक बातचीत के बाद हमारा रिश्ता तय कर दिया. उस से संबंध तय होने पर मैं 7वें आसमान में थी. कभीकभी मुझे अपने पर रश्क होता.

तय मुहूर्त में उस के सान्निध्य के सुनहरे सपने पलकों में सजाए मैं ससुराल आ गई. हनीमून के लिए हम ने उदयपुर और चित्तौड़ जाने का प्रोग्राम बनाया. उस शाम को प्यास लगने पर मैं रसोई की ओर जा रही थी कि तभी सासूमां के बैडरूम के बाहर पति की तनिक तेज आवाज में चिल्लाहट सुन मैं ठिठक कर खड़ी हो गई.

‘‘मम्मा प्लीज, मुझे इस ट्रिप के लिए पूरे 2 लाख चाहिए. एअर टिकट्स, होटल, खानापीना और घूमने में बहुत खर्चा होने वाला है.’’

‘‘नहीं, मैं तुम्हें बस 1 लाख दे सकती हूं, उस से एक रुपया भी ज्यादा नहीं. ये भी मैं अपने पास से दे रही हूं. पापा को पता चलेगा तो वे मुझे इन के लिए भी मना करेंगे.’’

‘‘मम्मा… भाई भी तो पिछले माह नेपाल गए थे. वे तो फाइवस्टार होटल्स में रहते हैं. आप बस मुझ पर कंट्रोल रखती हो. उन्हें कुछ नहीं कहती.

1 लाख तो 2 दिनों में खत्म हो जाएंगे.’’

इस बार सासूमां चीखीं, ‘‘भाई को देखा है, दिन रात…’’

तभी सामने ससुरजी आ गए और मैं झपट कर आगे बढ़ गई. सासूमां ये क्यों कह रही हैं? जेहन में घंटी बजी थी.

मन में अनवरत खींचतान चल रही थी कि क्या मिलिंंद कोचिंग सैंटर में काम नहीं करता? अपनी मां से पैसे क्यों मांग रहा है? क्या उस की कोई अपनी कमाई नहीं?

खैर, अगले ही दिन हम दोनों उदयपुर चले गए. खासे मदहोशी भरे सोने के दिन और चांदी की रातें गुजर रही थीं. हम दोनों एकदूसरे में गुम 2 जिस्म और 1 जान हो चले थे.

हनीमून से लौट कर जिंदगी निश्चित ढर्रे पर चल पड़ी थी. मेरे वर्किंग डेज

बेहद व्यस्त रहने लगे थे. पता ही नहीं चलता घरगृहस्थी और औफिस के सौ कामों की गहमागहमी में कब दिन पूरे हो जाते. शादी को पूरा माहभर बीत चला था.

आज सैकंड सैटरडे की वजह से औफिस का अवकाश था. मैं सुबह के ब्रेकफस्ट के लिए डाइनिंगरूम की ओर बढ़ ही रही थी कि तभी जेठजी के उग्र स्वर कानों में पड़े, ‘‘बरखुरदार, कभी तो औफिस आ जाया करो… घर के आदमी के औफिस में बस बैठने से ही स्टाफ पर कंट्रोल रहता है लेकिन तुम से…’’

मुझे देख कर वे एकाएक चुप हो गए.

अंतर्मन में सोच का तूफान उठा था कि कुछ तो गड़बड़ है, नहीं तो उस दिन सासूमां और आज जेठजी मिलिंद को उलाहने क्यों दे रहे थे लेकिन घर और दफ्तर के सौ जंजालों के बीच अपनी शिद्दत की व्यस्तता के चलते मैं ने उस बात को तूल नहीं दिया और बात आईगई हो गई.

वैसे भी मिलिंद रोजाना ससुरजी और जेठजी के कोचिंग सैंटर जाने के बाद चाकचौबंद हो अपनी गाड़ी से कोचिंग सैंटर के लिए निकल ही जाता था. सो मुझे तनिक भी संदेह न हुआ कि कोई भारी गड़बड़ है.

अब सोचती हूं मैं ने उसी वक्त मिलिंद के धोखे पर कोई आर या पार का निर्णय क्यों नहीं लिया? अपनी शादी के बारे में कोई निर्णायक फैसला नहीं लेने का एक कारण और भी था. मिलिंद मेरी पहली मुहब्बत था और शादी के कुछ माह गुजर जाने के बाद भी एक प्रेमी के रूप में उस का प्यार जताने का अंदाज शिद्दत का दिलकश था. अपनी दिलनशीं मुसकान के साथ मेरी आंखों में झांकते हुए जब वह मेरे नजदीक आता तो मेरा अपनेआप पर वश न रहता और मैं उस के इश्क के दरिया में मदहोश तिनके सी बह जाती.

मेरी आंखों पर उस की बेशर्त महब्बत की पट्टी बंध गई थी, जिस की आड़ में उस की हर कमी छिप जाती या फिर कहूं कि मैं उस की कमियों को देखना नहीं चाहती थी.

दिन यों ही उस की समर्पित मुहब्बत के साए में घर और औफिस की आपाधापी में बीत रहे थे.

शादी के 2 माह बाद ही मैं अनचाहे ही प्रैगनैंट हो गई थी. अब तो घर के सभी सदस्य मुझे हाथोंहाथ रखने लगे थे खासकर मिलिंद. मेरे मुंह से कोई छोटीबड़ी फरमाइश निकलती नहीं कि वह उसे पूरी कर देता. पहले वह मेरा ड्रीम लवर था और अब वह ड्रीम हस्बैंड बन गया था.

अपनी पहली वैवाहिक वर्षगांठ से माहभर पहले मैं ने एक बेटे को जन्म दिया.

पूरा घर आह्लादित था. घर को इकलौता चिराग जो मिला था. जेठानीजी को कोई गंभीर मैडिकल समस्या थी, जिस की वजह से जेठजी निस्संतान थे. सो मिलिंद की मनभावन प्रिया और घर के इकलौते वारिस की मां होने के नाते मुझे सब से बेइंतहा लाड़ मिल रहा था. मैं अब घर पर ही थी, लगभग 6 माह की मैटरनिटी लीव पर.

अवकाश के पहले दिन मैं कुछ देर से उठी थी. मैं अपने बैडरूम से निकल ही रही थी कि कानों में ससुरजी के स्वर गूंजे, ‘‘मिलिंद, अगर आज तुम औफिस नहीं गए तो मैं मम्मा से कह कर तुम्हारी पौकेट मनी बंद करा दूंगा. अरे… शादी हो गई, ब्याह हो गया लेकिन तुम्हें अभी तक अक्ल नहीं आई. एक पराए घर की लड़की तुम पर भरोसा कर के इस घर में आई है, तुम्हें उस का भी जरा खयाल नहीं? वह एक गैजटेड औफिसर, कुछ सोचा है, उस पर क्या बीतेगी जब उस पर तुम्हारी असलियत खुलेगी? न तो ढंग से पढ़ाईलिखाई की, न ही अब कोई कामकाज कर रहे हो.’’

मुझ पर मानो गाज गिरी. कानों में बारंबार ससुरजी के कड़वे बोल गूंजने लगे थे, ‘न तो ढंग से पढ़ाईलिखाई की, न ही अब कोई कामकाज कर रहे हो.’ वह तो आईआईटी पासआउट है. रोजाना तैयार हो कर कोचिंग सैंटर जाता है, फिर इस बात का क्या मतलब? मन में उधेड़बुन चलने लगी थी कि क्या सच है क्या झूठ? कुछ ही देर में बहुत सोचनेविचारने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंची कि मुझे इस गंभीर मुद्दे पर ससुरजी से बात करनी ही चाहिए.

क्रोधावेश में कदम बढ़ाती डाइनिंगरूम में पहुंच गई और मैंने ससुर जी को घेर लिया, ‘‘पापाजी, आप की इस बात का क्या मतलब? क्या मिलिंद ने आईआईटी से इंजीनियरिंग नहीं की और क्या वह कोचिंग सैंटर में कोई काम नहीं करता मुझे सचसच बताइए.’’

मुझे यों अपने सामने मिलिंद के बारे में पड़ताल करते देख ससुरजी और जेठजी हड़बड़ा गए. ससुरजी सकपकाते हुए बोले, ‘‘नहीं बेटा, ऐसी तो कोई बात नहीं. यह मिलिंद इन दिनों कोचिंग सैंटर थोड़ी देर से जा रहा है, बस इसीलिए उस की खबर ले रहा था.

‘‘हां… हां… थोड़ा लेटलतीफ है यह मेरा भाई. वैसे कोचिंग सैंटर ठीकठाक संभालता ही है यह. तुम्हें किसी बात का जिक्र करने की जरूरत नहीं.’’

उन दोनों की इस लीपापोती पर मैं भड़क उठी और मैंने सीधेसीधे मिलिंद से कहा, ‘‘मिलिंद, जरा बैडरूम में आओ. मुझे तुमसे कुछ बात करनी है. मुझे अपनी इंजीनियरिंग का सर्टिफिकेट दिखाओ, अभी इसी वक्त,’’ मैं ने धधकते लोहे सी निगाहों से उस से कहा. मेरे मन में शक का बीज जडें़ जमा चुका था.

मिलिंद मेरी तमतमाती नजरों का सामना न कर सका और थोड़ा हकलाता हुआ सा बोला, ‘‘हां… हां… दिखा दूंगा… शाम को जरूर दिखा दूंगा. ऐसी क्या जल्दी है भई अभी तो मुझे औफिस जाने दो.’’

मैं ने तुर्शी से जवाब दिया, ‘‘नहीं… उन्हें बिना दिखाए तुम्हारी मुक्ति नहीं या तो अभी के अभी दिखाओ नहीं तो मैं अपने घर जा रही हूं. अब तुम लोगों से बाबूजी ही बात करेंगे.’’

‘‘यह क्या कह रही हो निशी, माई लव? अभी कल ही तो तुम अस्पताल से आई हो और इस कड़ाके की ठंड में अपने घर कहां जाओगी. मैं जैसे ही औफिस से लौटता हूं तुम्हें सर्टिफिकेट दिखा दूंगा. आज सैंटर पर जरूरी मीटिंग है. सो मेरा जाना बहुत जरूरी है. चलो, मैं अभी जाता हूं, शाम को बात करेंगे,’’ कहते हुए वह मेरी ओर एक फ्लाइंग किस उछालते हुए चला गया.

मन में तूफानी कशमकश चल रही थी. रहरह कर ससुरजी के शब्द

धारदार कांच की तरह अंतर्मन को चीर रहे थे. यह तो तय था मिलिंद की डिगरी में कुछ तो लोचा है नहीं तो उस के पिता इतनी बड़ी बात क्यों कर कहते? साथ ही कोचिंग सैंटर का कामधाम नहीं करने का उलाहना बिना किसी आधार के तो नहीं दिया होगा उन्होंने.  उफ… इतना बड़ा फ्रौड. यह मैं कहां फंस गई. मुझे इन चीट्स के साथ जिंदगी नहीं बितानी अंतर्मन का क्रोध आंखों की राह बरसने लगा और मैं परिस्थितियों के मकड़जाल में फंसी मन ही मन कलप रही थी.

मिलिंद से रिश्ता जोड़ना मेरा फैसला था. मैं ने शादी से पहले उस की पूरी जांचपड़ताल क्यों नहीं कराई. लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था.

इंतजार था तो शाम का. सो मिलिंद को अपनी सफाई देने का एक मौका देते हुए मैं ने निश्चय किया कि मैं शाम को मिलिंद का सर्टिफिकेट देख कर ही मायके जाने के बारे में कोई फैसला लूंगी. मिलिंद, उस के पिता और भाई तीनों सैंटर से साथसाथ लौटे थे. उन तीनों के ही चेहरों पर तनाव शिद्दत से हावी था.

मिलिंद मेरे फैवरिट रेस्त्रां से मेरी पसंदीदा साबूदाने की खिचड़ी लाया था, जिस की फरमाइश मैं ने अस्पताल से लौटते ही की थी लेकिन आज उस का यह लाड़ और केयर दोनों मुझे जहर लग रहे थे.

बड़े ही बेमन से खिचड़ी का डब्बा परे सरका कर मैं ने मिलिंद पर अपनी दहकती निगाहें टिका दीं और उस की ओर सवाल उछाला, ‘‘सर्टिफिकेट?’’

मेरे प्रश्न के उत्तर में मिलिंद ने मलिन मुख और शिथिल कदमों से अलमारी खोली और एक फाइल से सर्टिफिकेट निकाल मुझे थमा दिया. मैं ने झपट कर उस पर निगाहें फिराईं.

फाइनल सैमिस्टर में उस की सारे सब्जैक्ट्स में बैक आई थी. यह

देख कर सदमे से मुझे लगा. मेरे सीने पर भारी शिला आन पड़ी है और उस के बोझ तले मेरी सांसें रुकरुक कर आ रही हैं.

कुछ क्षणों के लिए मेरी सोचनेसमझने की शक्ति लोप हो गई थी और मैं शून्य में ताकते स्तब्ध बैठी रह गई.

तभी कड़ाके की ठंड में भी माथे पर आए पसीने को पोंछते हुए वह नम आंखों से बोला, ‘‘मैं तुम्हारा मुजरिम हूं. जो सजा देना चाहो दे सकती हो. बस मुझे छोड़ कर मत जाना. मैं तुम्हारे और नन्हे के बिना मर जाऊंगा. मैं तुम्हें खुद से भी ज्यादा चाहता हूं.’’

मेरी समझ में नहीं आ रहा था मैं कैसे रिएक्ट करूं? तभी अचानक कानों में ससुरजी का वाक्य गूंजा कि न तो ढंग से पढ़ाईलिखाई की, न ही अब कोई कामकाज कर रहे हो और मैं उस पर बिफर पड़ी, ‘‘पापाजी ने कहा था, तुम सैंटर में कुछ करतेधरते भी नहीं हो, इस का क्या मतलब?’’

वह हकलाते हुए बोला, ‘‘नहीं, नहीं मैं तो रोजाना सैंटर जाता हूं. तुम किसी से भी पूछ लो. वो तो पापा को मेरा एक दिन भी सैंटर नहीं जाना बरदाश्त नहीं. कल जरा मैं दोस्तों में चला गया था तो बस इसी वजह से सुबह मुझे डांट रहे थे और कोई बात नहीं, सच में.’’

मैं पूरी रात मिलिंद और उस के घर वालों के इस झूठ से क्षुब्ध करवटें बदलती रही. मन में दावानल सुलगता रहा.

मिलिंद जबरदस्ती बारबार मुझे अपनी बांहों के घेरे में लेते हुए मनाता रहा, इस झूठ को ले कर मुझ से सौरी कहता रहा और माफी के लिए मनुहार करता रहा.

मेरी वह रात आंखों ही आंखों में कटी थी. मैं स्पष्टता से कुछ सोच नहीं पा रही थी. मिलिंद से शादी पेरैंट्स की मरजी के बिना मेरा अपना फैसला था. पिता तो मेरा रिश्ता अपने जैसे किसी मालदार पर अपने स्वतंत्र कारोबार वाले लड़के से जोड़ना चाहते थे, जबकि मिलिंद पिता और भाई के साथ साझे में काम कर रहा था. इस वजह से पापा ने मुझे चेताया भी था लेकिन मेरी आंखों पर तो मिलिंद की मुहब्बत की पट्टी बंधी थी.

मैं एक इंजीनियर थी, अकेले गुजारा करने लायक अच्छा कमा रही थी. चाहती तो उसी

वक्त मिलिंद से अलग हो सकती थी लेकिन उस से हमेशा के लिए अलगाव या तलाक लेने का सोच कर ही मेरा दिल बैठा जा रहा था. मुझ अकेले में महज नन्हे के साथ जिंदगी बिताने की हिम्मत न थी. मायके जा कर पेरैंट्स के साथ में रह नहीं सकती थी क्योंकि उन की पुरातनपंथी संकीर्ण मानसिकता मुझे ससुराल छोड़ मायके में रहने की अनुमति कभी नहीं देती.

सो मेरे दिन घोर मानसिक ऊहापोह में बीत रहे थे. इधर मैटरनिटी लीव के चलते मेरे घर पर रहने से मेरा जेठानी और सासूमां के बीच  समीकरण धीरेधीरे गड़बड़ाने लगा. पहले औफिस और गृहस्थी की व्यस्तता के चलते जेठानी से मेरा वास्ता बहुत कम पड़ता था लेकिन अब पूरे वक्त एक छत तले उन के साथ रहने से मैं देख रही थी कि उन्हें मिलिंद से बहुत शिकायतें थीं. वे आए दिन उस से उलझतीं और उस के कोचिंग सैंटर में कोई काम न करने पर कटाक्ष करने का कोई मौका नहीं छोड़तीं. अपनी कलह में कभीकभी मुझे भी लपेटे में ले लेतीं.

अभी कल की ही बात थी. ससुरजी, जेठजी और मिलिंद लंच कर के दोबारा कोचिंग सैंटर जाने वाले थे कि तभी मिलिंद ने ससुरजी से कहा, ‘‘पापा, आज मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं. बुखार लग रहा है. मैं थोड़ा रैस्ट करूंगा.’’

यह सुन कर जेठजी ने उस की ओर कटु स्वरों में उलाहना उछाला, ‘‘बरखुरदार, यह क्या रोजरोज बहाने बनाते हो? आराम करना किसे अच्छा नहीं लगता लेकिन तुम ने तो हर दूसरे दिन सैंटर न जाने की आदत डाल ली है. इतना काहिलपना ठीक नहीं.’’

तभी जेठानीजी भी बोल पड़ीं, ‘‘जब हाथ पर हाथ रखे ही ऐश हो रही हो तो मशक्कत करना किसे अच्छा लगेगा?’’

सास और ससुर मूक यह सब देखते रहे. जेठजी और जेठानीजी के इन व्यंग्य बाणों ने मेरे अंत:स्थल को धारदार चाकू की तरह चीरचीर कर दिया और क्रोध मिश्रित क्षोभ से मेरी आंखों में आंसू उतर आए.

मन में सुनामी उमड़-घुमड़ रही थी. अपने बैडरूम के एकांत में मैं मिलिंद पर बरस पड़ी, ‘‘ये लोग किस हक से तुम्हें जलीकटी सुनाते रहते हैं? अब मेरी बरदाश्त के बाहर हो गया है. भाई साहब और भाभीजी को हमारा कोई लिहाज ही नहीं. अब मैं इस घर में नहीं रहूंगी. मैं आज ही औफिस में क्वार्टर के लिए अप्लाई करती हूं.’’

मुझे सरकारी क्वार्टर एलौट हो गया था और कुछ ही दिनों में हम वहां शिफ्ट हो गए. अब ससुराल से अलग होकर मेरे मन का चैन वापस आ गया था लेकिन अब मुझे एक और जंग लड़नी थी और वह थी मिलिंद की काहिली और सुस्ती के खिलाफ.

ससुराल में रहते हुए तो उसे ससुरजी और जेठजी के अंकुश तले रहते हुए

कोचिंग सैंटर में रैग्युलरली हाजिरी बजानी पड़ती थी, लेकिन अब अपने घर में उन की खबर लेती चौकस निगाहों से परे वह बहुत आराम में आ गया था.

मैं तो सुबहसवेरे 9 बजतेबजते औफिस के लिए निकल जाती और वे महाशय मुझे काम पर भेज नन्हे के साथ दोबारा बिस्तर में घुस जाते. कोचिंग सैंटर 12 बजे तक जाते और आए दिन किसी न किसी बहाने से समयबेसमय औफिस से छुट्टी मार लेते और नन्हे को क्रैच से वापस ला उस के साथ बिस्तर में चैन की नींद सोते. उस के ऐसा करने पर ससुरजी मुझे हमेशा फोन करते और शुरूशुरू में मैं इस के चलते उसे 10 बातें सुनाती लेकिन धीमेधीमे यह उस की आदत में आ गया और उस पर मेरी जलीकटी का असर तक होना बंद हो गया.

उस की इस आदत की वजह से मैं बेहद परेशान रहने लगी थी. मैं उसे लाख समझाती कि यों इस तरह निठल्लेपन से जिंदगी बिताना सही नहीं, तुम्हें कुछ तो करना चाहिए. मगर उस की समझ में यह बात नहीं आती और वह मुझे बस अपना समर्पित प्यार जता कर नि:शब्द कर देता.

विवाह को खासा वक्त बीत जाने के बावजूद मेरे प्रति उस की मुहब्बत कम नहीं हुई थी और उस का प्रेमी अवतार परफैक्ट था. वक्त के साथ उस ने धीमेधीमे दोस्तों के साथ अड्डेबाजी भी छोड़ दी और वह घर पर नन्हे की केयर बहुत समर्पित भाव से करता.

घर पर रहते हुए घर के सारे काम भी बड़ी सफाई से निबटा डालता और मुझे घर में हाथ तक नहीं हिलाना पड़ता.

उसे बाहर के लोगों के सामने भी घर के काम करने में कोई शर्म महसूस नहीं होती और अब तो पासपड़ोस, नातेरिश्तेदारी में भी यह बात फैल गई थी कि मिलिंद पूरी तरह से हाउस हस्बैंड बन कर रह गया.

एक दिन मैं और मिलिंद मांबाबूजी की शादी की वर्षगांठ पर मायके गए थे और किसी पड़ोसी ने परिचितों और रिश्तेदारों के हुजूम के सामने मिलिंद से पूछा था, ‘‘आप कहां काम करते हैं,’’ और इस के जवाब में मेरे एक दूर के मुंहफट जीजा ने कहा, ‘‘मिलिंद अपने घर में काम करते हैं,.ये हाउस हस्बैंड हैं.’’

उन की इस बात पर मैं शर्म से पानीपानी हो गई और पूरा वक्त मैं खून के आंसू पीती रही.

घर लौट कर मैं ने मिलिंद को खूब खरीखोटी सुनाई और फिर घोर गुस्से की वजह से आंसू बहाए लेकिन मेरे इतना क्रोध और कलह करने पर भी मिलिंद ने चूं तक नहीं की और देर रात उस ने मुझे अपनी बांहों में बांध थपक कर सुला दिया.

रात की टैंशन अगले दिन भी मुझ पर हावी थी और लंच टाइम में अपनी घनिष्ठ कलीग

के साथ खाना खाते हुए उस ने पूछा, ‘‘क्या बात है निशिता, आज बहुत टैंस दिख रही हो? मिलिंद से झगड़ा हुआ क्या?’’

मैं भरी बिरादरी के सामने मिलिंद के हाउस हस्बैंड डिक्लेयर किए जाने पर भरी बैठी थी. सो मैं ने उस वजह से अपनेआप को हुए शर्मिंदगी के एहसास को उस के साथ शेयर किया- उस के जवाब में उसने मुझे इस मसले पर एक अलग ही एंगल का खुलासा करते हुए कहा, ‘‘इतनी पढ़ीलिखी होने के बावजूद तू मिलिंद के घरेलू जिम्मेदारियों को बखूबी निभाने की स्किल को इतना कमतर आंक रही है? मुझे देख, मैं अपने हस्बैंड के वर्काहसेलिक होने की वजह से इतनी परेशान हूं कि बता नहीं सकती. वह वर्क फ्रौम होम करने के बावजूद घर के कामों में रत्तीभर मदद नहीं करता. न ही बच्चों की देखभाल में मेरा हाथ बंटाता. तीनों वक्त का खाना, बच्चों की पढ़ाई, स्कूल और बैंक के चक्कर, मेहमानों की आवभगत, बाजार से राशन, सब्जी, दूध और बिजलीपानी के बिल, बच्चों की बीमारी हर काम की जिम्मेदारी मेरी है. घर और दफ्तर की दोहरी जिम्मेदारी निभातेनिभाते मैं हलकान हो आई हूं. देखती है न, इसी वजह से मेरे आफिशियल कामों में भी आए दिन कमियां रह जाती हैं और मुझे सीनियर्स की डांट सहनी पड़ती है.

‘‘मिलिंद एक हाउस हस्बैंड है. कोई बात नहीं. हर शख्स में कोई न कोई कमी होती है. वह अपनी स्टडीज और काम में कुछ अचीव नहीं कर पाया, यह कोई शर्म की बात नहीं.

इस जहां में किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता. किसी को जमीं तो किसी को आसमां नहीं मिलता,’’ उस ने मुसकुराते हुए कहा, ‘‘हमें जो मिला है, उस के लिए थैंकफुल होना चाहिए.’’

उस दिन उस की इन बातों से अंतर्मन में विचारों की रस्साकशी चलने लगी, ‘‘मिलिंद अपनी पढ़ाईलिखाई और कैरियर में कुछ अचीव नहीं कर पाया लेकिन घर के फ्रंट पर तो बेटे की देखभाल से लेकर घरेलू जिम्मेदारियां तक बखूबी बहुत लगन और मेहनत से निभा रहा है.

मैं बिना बात उसे मेहनती और जिम्मेदार न होने के तानेउलाहने देती रहती हूं. उस दिन एक मुद्दत बाद मुझे सुकून आया और रात को मैं मिलिंद की बांहों में निश्चिंत सोई. उस दिन के बाद से मुझे अपनी जिंदगी में मिलिंद के सार्थक योगदान का एहसास हुआ और उस के प्रति मेरे रवैए में जमीनआसमान का अंतर आ गया.

जिंदगी की गाड़ी बस इसी तरह खिंची जा रही थी. साल दर साल यों ही गुजरते गए.

घरगृहस्थी, बेटे की जिम्मेदारियों से मुक्त औफिस में अपने बेहतरीन समर्पित प्रदर्शन के चलते मैं सफलता के सोपान सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ती गई और आज मेरी प्रमोशन सुपरिटैंडिंग इंजीनियर के पद पर हो गई थी.

दफ्तर में मेरी उत्कृष्ट परफौर्मैंस के दम पर मेरा नाम मेरे विभाग के बेस्ट औफिसर के तौर घोषित हुआ था. आज मुझे यह सम्मान प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा मिला था.

उस दिन औफिस में दफ्तर के सभी सम्मान प्राप्त अधिकारियों के लिए पार्टी आयोजित

की गई थी. मैं ने मिलिंद के साथ पार्टी अटैंड की.

पार्टी में किसी नए अफसर की पत्नी ने मुझ से बातोंबातों में पूछा, ‘‘आप के हस्बैंड क्या करते हैं?’’

‘‘मिलिंद हाउस हस्बैंड हैं. शुरू से वे घरगृहस्थी के सारे काम संभालते आए हैं. उन्हीं की बदौलत मुझे आज बैस्ट औफिसर का अवार्ड मिला है. आई एमप्राउड औफ हिम,’’ कहते हुए मैं ने मिलिंद का हाथ हौले से थाम लिया.

मिलिंद ड्राइव कर रहा था और मेरे मन में सोचों का तांता बंधा हुआ था कि आज की सफलता बेहद अहम है. मेरा एक मुद्दत से खुली आंखों से देखा सपना सच हुआ है.

मैं ने जो कुछ भी चाहा मुझे मिला. एक बढि़या कैरियर, मेधावी संतान, शिद्दत से प्यार करने वाला जीवनसहचर…

मैं ने ड्राइव करते हुए मिलिंद से कहा, ‘‘मिलिंद, अगर तुम मेरी जिंदगी में न होते तो मैं कभी ये ऊंचाइयां हासिल नहीं कर पाती. थैंक यू माई लव, तुम दुनिया के बैस्ट हस्बैंड हो.’’

‘‘बैस्ट हस्बैंड या हाउस हस्बैंड?’’ एक हलकी मुसकान के साथ मिलिंद ने मुझ से पूछा.

‘‘अनडाटेडली बैस्ट हस्बैंड, माई ड्रीम हस्बैंड,’’  मिलिंद ने खिलखिलाते हुए मेरा हाथ थाम चूम लिया.

Stories : चक्रव्यूह

Stories :  मोहिनी  देवी अपने दरवाजे के पास औटो से उतरीं और मुख्य दरवाजा खोलने के लिए दरवाजे के पास आ कर एक बार अपने चारों तरफ देखा. आसपास के लोग उन्हें बहुत अजीब नजरों से देख रहे थे और एकदूसरे को देख कर व्यंग्यात्मक ढंग से मुसकरा रहे थे.

बगल के मकान में रहने वाली विमला ने तो सामने वाली सीमा से कहा भी, ‘‘यह देखो आ गई जेल से छूट कर. क्या शान से आई है. लगता है कहीं से पुरस्कार जीत कर आई हो. कैसेकैसे लोग हैं, हम कितना अच्छा समझते थे इन्हें पर ये दहेज की लालची निकलीं. बहू को सताती हैं, दहेज मांगती हैं और नहीं देने पर घर से निकाल देती हैं, उस के के सारे जेवर रख लेती हैं, कैसी हैं ये. ऐसे लोगों का तो चेहरा देखना भी गुनाह है.’’

मोहिनी देवी की आंखें भर आईं. कांपते हाथों से दरवाजा खोला और अपने बगीचे में आ कर जमीन में ही बैठ गईं. बाहर से लोगों की शर्मनाक टिप्पणियां आ कर कानों में पिघले शीशे के समान जलन दे रही थीं. थोड़ी देर बाद मुख्य दरवाजा खोला, भीतर जा कर सोफे पर बैठ कर आंखें बंद कर लीं. उन की आंखों से झरझर आंसू बह रहे थे. उन्हें 6 महीने पहले का दृश्य याद आ रहा था…

6 महीने पहले तक यही पड़ोसी उन की कितनी तारीफ करते थे. उन्होंने किस की समय पर मदद नहीं की. यही पड़ोसी उन के मददगार स्वभाव और मृदु व्यवहार की तारीफ करते थकते नहीं थे. लेकिन इन 6 महीनों में क्या से क्या हो गया. आज किसी को उन की सचाई पर विश्वास नहीं रहा. हाय रे निष्ठुर संसार. कितनी उमंग से उन्होंने बेटे रंजन की शादी की थी. रंजन के लिए लड़की पूनम का पता उन की मौसी की बेटी ने दिया था.

इन सभी को एक नजर में ही पूनम पसंद आ गई थी. परिवार तो इनकी मेल का नहीं था

परंतु लड़की पढ़ीलिखी और खूबसूरत थी, इसलिए उन्होंने एक बार में ही सबकुछ तय कर लिया. दहेज की मांग तो नहीं की और सामान लेने से भी स्पष्ट इनकार कर दिया. इतना ही नहीं शादी में भी बरात का अधिकतर खर्चा इन्होंने ही दिया था क्योंकि पूनम के मातापिता ने अधिक बरात का स्वागत करने में अपनी असमर्थता जताई थी.

पूनम के आने के बाद सब ने उसे हाथोंहाथ लिया. कभी किसी तरह के काम का दबाव भी उस पर नहीं रहा. उस की हर इच्छा पूरी की जाती थी. मोहिनी देवी के बच्चे भी बहुत शांत और सभ्य स्वभाव के थे. पिता के जाने के बाद रंजन ने बहुत ही कुशलता से उन के व्यापार को संभाला था और आगे बढ़ाया था. बेटी नीना बीए फाइनल में पढ़ रही थी. उन्हें लगा बेटी की शादी के पहले घर में बहू आ जाए तो सबकुछ अच्छे से संभाल लेगी.

पूनम ने आ कर प्रारंभ में सबकुछ अच्छे से किया भी था. उन्हें बस एक ही कमी पूनम में दिखती, उसे शायद पहननेओढ़ने का कोई शौक नहीं था. इन की दी कीमती साडि़यां और गहने सब उस के पास ऐसे ही पड़े रहते थे. कई बार कहने के बाद भी नहीं पहनती, एक वाक्य में जवाब दे देती, ‘‘मां, मंगलसूत्र तो पहनी हूं. कान के टौप्स भी पहने हूं. ज्यादा जेवर भारी लगते हैं.’’

सास खामोश रह जातीं. एक बार किसी रिश्तेदार की शादी में जाने पर पूनम ने पतला सैट पहना था. उसे देख कर मोहिनी देवी ने कहा, ‘‘पूनम, भारी वाला नैकलैस पहन लो, शादी में जा रही हो पतला अच्छा नहीं लगेगा.’’

पूनम ने कहा, ‘‘अंदर रखा हुआ है निकालने में समय लगेगा.’’

मोहिनी देवी ने उसे एक दूसरा भारी सैट निकाल कर दिया पहनने को.

पूनम ने आश्चर्यचकित हो कर कहा, ‘‘अरे यह तो बिलकुल मेरे नैकलैस की कौपी है.’’

नीना ने कहा, ‘‘हां भाभी मां जब भी कोई जेवर बनवाती थी तो एकजैसा 2 लेती थीं एक तुम्हारे लिए और एक मेरे लिए. उन का कहना था कि बहू और बेटी दोनों को सबकुछ बराबर देंगे. बिलकुल एकजैसे ही हैं आप के और मेरे जेवर. आप के आप को दे दिए और मेरे रखे हुए हैं मां ने अपने पास. वही निकाल कर दिया आप को पहनने के लिए तो आप उसे पहन लें और मैं आप का पतला वाला नैकलैस पहन लेती हूं.’’

पूनम ने मुसकरा कर नैकलैस ले कर पहन लिया. वापस आने के बाद पूनम ने नेकलेस मोहिनी देवी को वापस कर दिया. सबकुछ अच्छे से चल रहा था. अचानक 10 दिन पहले एक बार पूनम मायके गई और वहां से 4 दिन बाद ही लौटी तो पुलिस के साथ. उस के साथ उस के मातापिता भी थे और वह पुलिस वालों से रोरो कर उन के सामने ही कहने लगी, ‘‘सर देखिए ये लोग मेरे पर कितना अत्याचार करते हैं. इन्होंने मेरे साथ मारपीट भी की है. ये देखिए मेरे हाथों में, पीठ और गरदन में मार के निशान. मुझे सताते हैं और मारते हैं, दहेज लाने के लिए बोलते हैं. मेरे सारे जेवर भी इन्होंने रख लिए. मुझे कुछ भी नहीं दिया. मेरे मांबाप ने बनाबना कर मेरे जन्म के समय से ही रखे हुए थे जेवर. वे सारे इन लोगों ने छीन लिए और मुझे घर से निकाल दिया,’’ कह कर पूनम ने जेवरों की तसवीर अपने पापा के मोबाइल में दिखा दी.

मोहनी देवी, रंजन और नीना यह सुन कर अवाक रह गए.

‘‘ऐसे कैसे हो सकता है. सारा जेवर तो पूनम के पास ही थे. हम ने इस से कुछ भी नहीं लिया. पूनम की अलमारी में रखे होंगे,’’ मोहिनी देवी ने कहा.

तब पूनम की अलमारी देखी गई, लेकिन उस में एक भी जेवर नहीं था. पूनम के कहने

पर मोहिनी देवी की तिजोरी की तलाशी ली तो सारे जेवर उन के पास निकले. मोहिनी देवी के साथसाथ रंजन और नीना की भी समझ में आ गया कि नीना ने पूनम को बताया था दोनों के एकजैसे जेवर हैं, इसलिए पूनम ने अपने जेवर के फोटो खींच कर रखे थे और वही दिखा रही थी. अपने सारे जेवर जो ससुराल से ही मिले थे मायके में छिपा दिए होंगे. ओह विश्वास का यह फल.

पुलिस वालों से पता चला पूनम और उस के परिवार ने इन पर दहेज उत्पीड़न एवं घरेलू हिंसा का केस किया है और अब इन तीनों को जेल जाना होगा. इन्होंने बहुत विनती की परंतु इन की बात किसी ने नहीं सुनी.

पड़ोसियों ने भी पूछताछ में कहा, ‘‘बहू को जेवर पहने कभी नहीं देखा बिलकुल साधारण रहती थी और इधर कुछ महीनों से इन के घर टीवी बहुत तेज आवाज में बजता था. इस के अतिरिक्त वे कुछ नहीं जानते.’’

पूनम की ससुराल वालों ने बताना कि चाहा पूनम ही तेज आवाज रखती थी टीवी का परंतु पुलिस ने इस बात पर विश्वास नहीं किया और तीनों को थाने ले गई.

3 दिन थाने में रहने के बाद आज रंजन के मित्र प्रकाश के पुरजोर प्रयास से उन के खराब स्वास्थ्य एवं ढलती उम्र को ध्यान में रख कर जमानत मिल गई परंतु रंजन और नीना को जेल भेज दिया गया. इन 3 दिनों में वर्षों की कमाई इज्जत मिट्टी में मिल गई. रंजन और नीना का चेहरा तो देखा नहीं जा रहा था.

उन्होंने अपनी मौसेरी बहन को फोन लगाया जिस ने पूनम का रिश्ता सुझाया था परंतु वह तो पहले से ही भरी बैठी थी. इन की बात सुने बिना कहने लगी, ‘‘जीजी, आप लोग ऐसे होंगे मैं ने सोचा नहीं था. मेरी तो सारी इज्जत मिट्टी में मिला दी आप ने. छि: जीजी मैं क्या समझी थी और आप लोग क्या निकले.’’

मोहिनी देवी सिर पर हाथ रख कर बैठ गईं और बुदबुदा उठीं कि ओह

यह संसार कितना निष्ठुर है. एक आरोप क्या लगा किसी ने सचाई जानने का प्रयत्न भी नहीं किया और हमें दोषी ठहरा दिया. अब क्या करें, कोई रास्ता नहीं सूझ रहा. सभी अपनों ने भी किनारा कर लिया था. यदि अभी रंजन और नीना साथ होते तो हिम्मत बनी रहती. अभी सब से पहला काम तो रंजन और नीना को जेल से निकालना है.

मोहिनी देवी ने अपने मैनेजर को फोन किया एक और कठोर प्रहार. मैनेजर ने बताया वहां रोज नारी समितियों का धरनाप्रदर्शन चल रहा है, कर्मी काम नहीं कर पा रहे, पूनम के घर वाले उन्हें भी परेशान कर रहे. पुलिस भी उन के सामने मूक दर्शक बनी रहती है.

मैनेजर ने कार्यालय से 2 कर्मियों को उन के पास भेज दिया घर की व्यवस्था संभालने. सुनीता (कामवाली)को उन्होंने बुलवाया. सुनीता ने उन दोनों कर्मियों की सहायता से घर व्यवस्थित किया. प्रकाश ने कहा था कल प्रात: वकील के साथ आएगा अगली योजना बनाने. शाम को उन्होंने दोनों कर्मियों और सुनीता को घर जाने को कहा पर कोई तैयार नहीं हुआ.

सुनीता ने बोल दिया, ‘‘मांजी, मैं अपने घर में बोल कर आई हूं, आज यहीं आप के साथ रहूंगी.’’

‘‘तुम्हारे घर में भी तो काम होगा न. तुम्हारे बच्चे हैं, पति हैं, उन का खानापीना कौन देखेगा?’’

‘‘सब हो जाएगा मां आप चिंता न करें. मेरी सासूमां हैं न घर में, मांबेटा मिल कर सब संभाल लेंगे. ऐसे समय में मैं आप को अकेले छोड़ कर नहीं जा सकती हूं.’’

बहुत कहने के बाद भी सुनीता जाने के लिए तैयार नहीं हुई. दोनों कर्मियों ने भी रंजन के आने तक रात में यहीं रहने की बात कही.

अब मोहिनी देवी पूनम के षड्यंत्र के संबंध में सोचना चाहती थीं. आखिर वह ऐसा क्यों कर रही है. झूठा आरोप क्यों लगा रही है?

उन्होंने पूनम को फोन किया और उसे काफी समझाया और केस वापस लेने के लिए कहा परंतु वह हंसती रही और अंत में कहा, ‘‘मेरी कुछ शर्तें हैं. यदि तुम लोग मानो तो बात बन सकती है.’’

‘‘क्या शर्तें हैं?’’

‘‘बताऊंगीबताऊंगी. आमनेसामने बैठ कर मिलती हूं 2-4 दिन में.’’

पूनम से बात कर के मोहिनी देवी बहुत दुखी हो गईं. वे चिंतित हो कर सोच में डूब गईं कि अब क्या होगा, कैसे होगा. तभी बाहर बैठे उन के कार्यालय कर्मी ने आ कर कहा, ‘‘मांजी कोई ज्योति देवी आप से मिलने आई हैं. हम ने बहुत रोकने की कोशिश की लेकिन वे मान नहीं रही हैं. बोल रहीं एक बार नाम बता दो नहीं कहेंगे तो फिर मैं चली जाऊंगी.’’

‘‘अरे वे मेरी सखी हैं उन्हें आने दो,’’ और फिर स्वयं ही वे आगे बढ़ गईं उन के स्वागत के लिए. दरवाजे पर ही गले लगा लिया और ज्योति को ले कर अंदर आईं और कहा, ‘‘ज्योति कम से कम तू तो मेरी सच्ची सखी है, तुझ से मिल कर आज मुझे लगा कि मेरा भी कोई अपना है नहीं तो सब ने मुझ से किनारा कर लिया है. मैं तो बिलकुल अकेली हो गई, मेरा कोई सहारा नहीं बचा है.’’

‘‘यह तूने काम ही ऐसा किया है. कौन तेरे साथ रहेगा. न यह मत सोचना कि मैं तुझ पर व्यंग्य कर रही हूं. मैं तो लोगों की बातें तुम्हें सुना रही हूं जो लोग तुम्हारे बारे में सोचते हैं. लोगों में तुम मुझे मत शामिल करना. मुझे पता है तू कैसी है और मुझे यह भी पता है कि तेरे साथ कोई षड्यंत्र हुआ है. किसी बहुत ही बड़ी साजिश की तू शिकार हो गई है. मुझे बता क्याक्या हुआ?’’

सुनीता ने आ कर ज्योति देवी के सामने पानी का गिलास रखा और कहा,

‘‘आंटीजी, अब आप ही समझाएं इन्हें थोड़ा, घर आने के बाद से कुछ भी नहीं खापी रही हैं, बहुत मुश्किल से एक गिलास पानी पीया. चाय तक नहीं पी रही हैं, मैं आप लोगों के लिए चाय ले कर आ रही हूं. आप थोड़ा मांजी को भी पिला दीजिए.’’

ज्योति ने कहा, ‘‘चाय ही नहीं हमारे लिए खाना भी बनाना आज मैं यहीं रुक रही हूं. आज मैं कहीं जाने वाली नहीं.’’

सुनीता थोड़ी ही देर में चाय ले आई. ज्योति मोहिनी देवी को चाय पिलाने के साथसाथ उन्हें समझा चुकी थीं कि वे बिलकुल चिंता न करें. हमारा पूरा परिवार आप के साथ है.

मोहिनी देवी ने कहा, ‘‘ज्योति, तेरा बेटा सुभाष तो न्यूज चैनल चला रहा है न.’’

ज्योति गुस्सा हो कर बोली, ‘‘तूने तेरा बेटा कैसे कहा? क्या वह तेरा बेटा नहीं है?’’

मोहिनी, ‘‘नहीं तू नाराज मत हो मैं ने तो यों ही कह दिया.’’

अब ज्योति मुसकराई और बोली, ‘‘अब बता तू क्या चाहती है मैं तेरी क्या सहायता करूं और कैसे करूं?’’

मोहिनी देवी ने कहा, ‘‘मैं वही कह रही थी ज्योति मैं चाहती हूं कि पूनम के षड्यंत्र का किसी तरह पता चल जाए कि आखिर वह चाहती क्या है? वह क्यों ऐसा कर रही है हमारे साथ, इस में सुभाष (ज्योति का बेटा) हमारी सहायता कर सकता है.’’

ज्योति धीरे से मोहिनी के कान में बोली, ‘‘सुभाष ने इस संबंध में कुछ काम किया है और वह आगे तुम्हारी सहायता चाहता है.’’

ज्योति ने फोन से अपने बेटे से बात की फिर मोहनी देवी से आ कर बोली, ‘‘तू चिंता मत कर सब ठीक हो जाएगा.’’

रात में उन्हें जबरदस्ती थोड़ा सा खाना भी खिलाया ज्योति देवी ने और फिर दोनों

सो गईं. सुबह 5 बजे ही मोहिनी देवी को ज्योति देवी ने उठाया और कहा. ‘‘हम दोनों टहलने जा रहे हैं, रास्ते में हम से सुभाष मिलेगा और वहीं सारी बातें करेगा. वह अभी यहां आना नहीं चाहता है. अब चल और अपने में हिम्मत रख.’’

दोनों तैयार हो कर टहलने निकल पड़ीं. घर से काफी दूर आने के बाद अचानक एक लड़का आ कर मोहिनी से टकराया. मोहिनी जब तक संभाल कर उसे देखती या कुछ कहती तब तक वह बोला, ‘‘मौसीजी मैं सुभाष हूं. मैं जो दे रहा हूं उसे आप रख लीजिए और आप मेरी तरफ पलट कर देखिएगा नहीं. मैं बस आप के आगेपीछे चलता रहूंगा. मैं जो बोल रहा हूं उसे आप ध्यान से सुन लीजिए,’’ कहते हुए सुभाष ने मोहिनी के हाथ में कुछ पकड़वा दिया.

सुभाष, ‘‘मौसीजी यह एक लौकेट है, इसे घर जा कर आप अपने गले में डाल लीजिएगा. लौकेट के अंदर एक बहुत ही पावरफुल कैमरा और स्पीकर लगा हुआ है. आप के सामने जो भी होगा या जो भी बात होगी वह सारी इस में रिकौर्ड होती जाएगी और मैं फिर आप से अगले दिन यह ले लिया करूंगा. पूनम या उस के परिजनों से जो भी बात हो कोशिश कीजिएगा कि उस समय आप के गले में यह लौकेट जरूर रहना चाहिए. फिर मैं देखता हूं कि मैं आप के लिए क्या कर सकता हूं. कोशिश करूंगा कि आप इस षड्यंत्र से निकल जाएं,’’ चलतेचलते ही सुभाष आगे निकल गया.

तब मोहिनी ने ज्योति से कहा, ‘‘ज्योति इतनी सावधानी की क्या जरूरत थी? वैसे भी मेरे पास आ कर मुझे दे सकता था.’’

‘‘मोहिनी, सुभाष ने कहा है शायद तुझ पर कोई नजर रख रहा हो, तेरे घर की हर खबर उन के पास ले जा रहा हो. हमें सावधान रहने की जरूरत है, जिस से हम जो भी ऐक्शन लें पूनम या उस के घर वालों को पता नहीं चले,’’ ज्योति बोली.

थोड़ी देर और घूम कर फिर दोनों घर वापस आ गईं. उस दिन का सारा कार्य

मोहिनी ने सामान्य तरीके से किया. वकील के साथ भी रंजन और नीना की जमानत के संबंध में बातचीत की. फिर वे अपने कार्यालय गईं. ज्योति अपने घर वापस जा चुकी थी. मोहिनी देवी ने कार्यालय जा कर अपने कर्मचारियों के साथ काम के संबंध में बातचीत की और सब का धन्यवाद दिया.

‘‘मांजी, आप परेशान न हों हम लोग आप के साथ हैं, जब तक रंजन सर नहीं आते तब तक 2 आदमी हमेशा आप के घर में रहेंगे ताकि कोई आ कर आप को कुछ नुकसान नहीं पहुंचा सके. फिर भी कभी कोई जरूरत हो तो आप मुझे एक फोन कर लीजिएगा मैं तुरंत आप के पास आ जाऊंगा,’’ मैनेजर ने कहा.

मोहिनी सभी का धन्यवाद कर के वहां से निकल कर बाहर आईं. गेट के बाहर ही पूनम और उस के मातापिता खड़े थे. उन्होंने आगे बढ़ कर ‘‘पूनम बेटा,’’ कह कर पुकारा तो पूनम ने हंस कर कहा, ‘‘ओह बुढि़या तो तू यहां… तुम पर तो कोई असर ही नहीं लग रहा है. तुम्हारे बेटाबेटी दोनों जेल में हैं और तुम अपना सारा काम आराम से कर रही हो. तुम तो कार्यालय का काम भी कर रही हो, अपने स्वास्थ्य पर भी ध्यान दे रही हो. देख रही हूं तुम खूब स्वास्थ्य भी बना रही हो, टहल रही हो सुबहसुबह.’’

मोहिनी देवी ने कहा, ‘‘पूनम, तू क्यों हमें परेशान कर रही है बता हम ने तेरा क्या बिगाड़ा है, हम तो कितने खुशी और उमंग से तुम्हें बहू बना कर अपने घर ले आए थे. तुम से कभी किसी ने ऊंची आवाज में बात भी नहीं की. तुम्हें पूरा मानसम्मान दिया, तुम्हारी हर इच्छा का ध्यान रखा, फिर तुम हम लोगों के पीछे क्यों पड़ी हो? अरे रंजन तुम्हारा पति है कम से कम इतना तो सोचो.’’

‘‘तुम्हारे सड़े से बेटे के साथ कौन रहना चाहता है… तुम क्या सोच रही हो मैं तुम्हारे सड़े बेटे के साथ जिंदगी गुजारने के लिए आई हूं.’’

‘‘फिर तुम क्या चाहती हो मुझे बताओ मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूं, कहो तो तुम्हारे पैर भी मैं पकड़ लूं. तुम जो चाहती हो बोलो मैं तुम्हारी हर इच्छा पूरी करने के लिए तैयार हूं, बस तुम केस वापस ले लो. मेरे बच्चों को जेल से बाहर आने दो.’’

‘‘मेरी बात मान लो तो तुम्हारे दोनों बच्चे भी बाहर आ जाएंगे और मैं केस भी वापस ले लूंगी,’’ पूनम बोली.

‘‘बोलो तुम क्या चाहती हो मैं तुम्हारी हर बात मानने को तैयार हूं?’’

तुम पहले जितना कर सकती हो न प्रयास कर लो जब तुम थक जाओ तब मेरे पास आना.’’

‘‘नहीं पूनम मैं थक चुकी हूं. अब मुझ से यह पीड़ा नहीं सही जाती. कहो केस वापस लेने के बदले तुम क्या चाहती हो?’’

‘‘आ जाना दोपहर में मेरे घर वहीं बात करेंगे.’’

‘‘नहीं मैं तुम्हारे मायके नहीं जा सकती. तुम मेरे घर यानी अपनी ससुराल आ जाओ, वहीं जो भी कहना हो कहो.’’

‘‘हांहां क्यों नहीं ताकि तुम मुझे वहां अपने आदमियों से पिटवा दो.’’

‘‘तुम यह अच्छी तरह समझ रही हो मैं ऐसा नहीं कर सकती, मेरे बच्चों का जीवन तुम्हारी दया पर है. लेकिन मैं तुम्हारे घर नहीं जा सकती, तुम्हारा घर छोड़ कर किसी भी सार्वजानिक स्थान पर मैं तैयार हूं.’’

‘‘ठीक है बताती हूं, अभी तो वह देखो तुम्हारा घेराव करने लोग आ रहे हैं उन से बचो.’’

मोहिनी देवी ने देखा सामने से महिलाओं की भीड़ चली आ रही है इधर ही. उन के हाथों में नारे लिखी हुई तख्तियां थीं. वे समझ गईं आज फिर हंगामा होगा उन्हें देख कर और भी अधिक. वे वापस अंदर आ गईं. तब तक मैनेजर भी बाहर आ गया था. वह इन्हें ले कर कार्यालय के अंदर गया और गाड़ी को पिछले दरवाजे की ओर सड़क पर लगाने के लिए किसी को बोला.

मांजी आप यहां की चिंता मत कीजिए. मैं ने पुलिस को बुला लिया है. यहां मैं संभाल लूंगा, आप पीछे से निकल कर घर चली जाइए,’’ मैनेजर ने कहा. फिर उन्हें पीछे से ले जा कर गाड़ी में बैठाया, साथ ही एक गार्ड भी भेज दिया साथ.

मोहिनी देवी घर आ कर चिंतित हो कर बैठ गईं. वे बहुत परेशान हो गई थीं. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि करें तो क्या करें. उन्होंने ज्योति को फोन लगाया और आने के लिए कहा.

ज्योति ने कहा, ‘‘ठीक है मैं आ रही हूं.’’

कुछ देर बाद ज्योति घर आ गई. ज्योति को देख मोहिनी देवी के दिल का गुब्बार

फूट पड़ा और वे अपनी सखी से लिपट कर रो पड़ीं.

ज्योति देवी ने उन्हें सांत्वना दी और कहा, ‘‘तू चिंता मत कर जो होगा सब ठीक होगा. कुदरत सब ठीक करेगी.’’

कुछ ही  देर बाद पूनम अपने मातापिता के साथ घर आ गई और ज्योति देवी को देखते ही पूनम ने रोना शुरू कर दिया. ज्योति को पकड़ कर कहने लगी, ‘‘आंटीजी आप ही समझाएं न मम्मीजी को. इन्होंने क्यों हमें इतना सताया हम बहुत दुखी हैं. हम बहुत साधारण लोग हैं, क्यों नहीं मुझे रखना चाहते हैं ये लोग? मेरे पिता ने इन की हर मांग पूरी की, मांग के अनुसार सारा सामान दिया, जेवर भी दिए. उस के बाद भी मुझे निकाल दिया. आप बताइए क्या कमी है मुझ में जो मांजी ने मुझे घर से निकाल दिया?’’

मोहनी देवी ने कहा, ‘‘पूनम यह तुम क्या कह रही हो, हम ने तुम को कहां निकाला. तुम तो अभी समझौता करना चाहती थी और तुम्हारी कुछ शर्तें हैं जिन्हें तुम मुझे मानने को कह रही थी. बोलो क्या हैं तुम्हारी शर्तें, तुम क्या चाहती हो?’’

‘‘मम्मीजी मैं क्या शर्त रख सकती हूं, मैं बेचारी तो आसरे को तरस रही हूं, बहुत दुखी हूं मैं, आप के पांव पड़ती हूं मुझ पर दया कीजिए,’’ कह कर पूनम ने मोहिनी के दोनों पैर पकड़ लिए फिर कहा, ‘‘मम्मीजी मैं तो आप के घर को स्वर्ग बनाने आई थी. मम्मीजी आप ने मुझे क्यों निकाल दिया?’’

ज्योति देवी ने कहा, ‘‘देखो मोहिनी कोशिश करो मिलजुल कर रहने की, मैं जा रही हूं, अपनी बहू को प्यार और सम्मान देने की कोशिश करो. मुझे लगता है, अभी तुम्हें मुझ से अधिक पूनम की आवश्यकता है, अच्छा होगा समझौता कर तुम लोग मिलजुल कर रहो मैं जा रही हूं.’’

फिर पूनम से कहा, ‘‘पूनम वैसे तुम्हारी सासूमां बुरी नहीं है, बहुत अच्छी है. तुम

लोगों में शायद कुछ गलतफहमी हो गई है, उसे तुम लोग आपस में मिलबैठ कर दूर कर लो. वैसे मुझे जब भी याद करोगी मैं तुम्हारे साथ हूं. अभी मैं जा रही हूं, तुम लोग मिलजुल कर रहो, घर को स्वर्ग बना दो, सुखी रहो,’’ कह कर ज्योति देवी वहां से निकल गई.

ज्योति के जाने के बाद पूनम के पिता ने बाहर का दरवाजा बंद किया और गार्ड के पास जा कर कहा, ‘‘ध्यान रखना फालतू कोई आदमी भीतर न आने पाए,’’ और अंदर आ कर भीतर का दरवाजा बंद कर दिया.

अब पूनम हंस कर बोली, ‘‘देखा कैसा रहा मेरा नाटक, तुम्हारी सखी भी तुम्हारे विरुद्ध हो गई. ऐसे ही होगा अब. कोई तुम्हारा साथ देने नहीं आएगा. अब बोलो अपनी बेटी और बेटे को बचाने के लिए क्याक्या कर सकती हो?’’

मोहिनी देवी ने कहा, ‘‘तुम जो कहो मैं सबकुछ करने के लिए तैयार हूं.’’

‘‘पहली बात पुलिस के सामने मान लेना कि जो जेवर मैं यहां से ले गई वे मेरे मायके के द्वारा ही दिए गए थे.’’

मोहिनी देवी, ‘‘लेकिन वे जेवर तो तुम्हारे मायके से नहीं मिले थे. वे जेवर तो मैं ने बेटी नीना के लिए बनवाए थे. वैसा ही एक पूरा सैट मैं ने तुम्हें भी दिया था बनवा कर जो तुम पहले ही ले जा चुकी हो अपने साथ. बताओ तुम ने उन्हीं के फोटो खींच कर रखे थे न पुलिस वालों को दिखाने के लिए?’’

‘‘यह बात यदि मैं या मेरे परिवार वाले अपने मुख से नहीं बोले तो कोई नहीं मानेगा… इस बात को भूल ही जाओ.’’

‘‘मेरे सभी रिश्तेदार और तुम्हारे आसपास

के लोग भी जानते हैं मैं ने दहेज में कुछ भी नहीं लिया था.’’

‘‘यही सब फालतू बातें करनी हैं तो हम चले जाते हैं. हमारे पास फालतू का समय नहीं है तुम्हारी बकवास सुनने के लिए.’’

‘‘मैं तुम्हारी हर शर्त मानने के लिए तैयार हूं.’’

‘‘फिर ये फालतू की बातें क्यों कर रही है?’’

‘‘तुम जो बातें कर रही थी उन का मैं ने जवाब दिया. तुम्हें अपनी जो भी शर्त रखनी है कहो.’’

‘‘ठीक है फिर आगे सुनो. अगली और महत्त्वपूर्ण बात मुझे 1 करोड़ रुपए चाहिए. मुझे रुपए दे दो फिर मैं समझौता कर सकती हूं.’’

मोहनी देवी ने कहा, ‘‘पर मैं अभी 1 करोड़ रुपए कहां से लाऊं?’’

‘‘जहां से लाओ यह तुम जानो, घर बेच दो, अपने औफिस की बिल्डिंग बेच दो, सारा व्यापार बेच दो. यदि समझौता चाहती हो तो मेरी मांग पूरी करो.’’

‘‘परंतु इस में तो समय लगेगा. तुम केस वापस ले लो जिस से मेरे बच्चे छूट कर बाहर आ जाएं. फिर मैं तुम्हें रुपए भी दे दूंगी.’’

‘‘वाह मैं केस वापस ले लूंगी फिर तुम मुझे अंगूठा दिखा दोगी, इतनी मूर्ख समझा है?’’

‘‘फिर तुम ही बताओ मैं क्या करूं?’’

‘‘तुम पहले संपत्ति बेच दो.’’

‘‘ठीक है मैं अपने वकील को बुला कर कागजात तैयार कराती हूं. सबकुछ तुम्हारे नाम पर कर दे रही हूं.’’

‘‘नहीं मेरे नाम पर नहीं मैं जिस के नाम पर बोलूंगी उस के नाम पर होगा और कागजात तुम तैयार नहीं करवाओगी मैं अपने वकील से तैयार करवाऊंगी. तुम उन पर सिर्फ हस्ताक्षर कर देना.’’

मोहिनी देवी ने कहा, ‘‘ठीक है तुम जिस से चाहो उस से करवा लो.

औफिस की बिल्डिंग, सारा फर्नीचर, अपना मकान भी मैं बेच दूंगी. जो भी पैसा मिलेगा उसे तुम ही रख लेना लेकिन तुम यह बताओ उस के बाद तुम फिर क्या करोगी? तुम यहां आओगी फिर? तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं रहेगा तो तुम रहोगी कहां, कैसे रहोगी?’’

‘‘उस के लिए तू चिंता मत कर मैं तेरे पास वापस आने वाली नहीं हूं, तलाक के पेपर भी बने रहेंगे तुम्हारे बेटे की ओर से जिन में वह मुझ से तलाक की मांग करेगा. मैं कहां जाऊं यह तेरे सोचने की बात नहीं है. मैं ने पहले से ही किसी को पसंद किया हुआ है. मैं तो यहां आती भी नहीं, पर तुम्हारी प्रौपर्टी देख कर मेरे मन में लालच आ गया और मैं ने यहां शादी करने की सोच ली ताकि यह सारी संपत्ति मुझे मिल सके. यह सब ले कर मैं चली जाऊंगी और जिसे मैं पसंद करती हूं उस के साथ शादी कर के पूरी जिंदगी सुख से रहूंगी.’’

मोहनी देवी ने कहा, ‘‘इस का मतलब कि शादी से पहले से ही तुम्हारे मन में यह षड्यंत्र था, तुम ने संपत्ति हथियाने के लिए ही रंजन से शादी की थी?’’

पूनम ने हंसते हुए कहा, ‘‘हां, तुम्हें क्या लगा था मैं तुम से प्रभावित हुई थी या तुम्हारे सड़े से बेटे पर मोहित हुई थी?’’

इन सब के बीच पूनम की मां बिलकुल शांत बैठी हुई थीं और पूनम के पिता मुसकरा रहे थे.

‘‘ठीक है तुम सारे कागजात तैयार करो तुम जब कागजात तैयार करवा कर ले आओगी मैं उन पर हस्ताक्षर कर दूंगी. तुम आज रात को भी ले आओ या कल सुबह ही ले आओ. तुम जितनी जल्दी ले आओ मैं कर दूंगी और तुम मेरे बच्चों को जेल से वापस आने दो. तुम केस वापस ले लो जिस से मेरा बेटा और बेटी जेल से बाहर आ जाएं. मेरी संपत्ति मेरे बेटाबेटी हैं. मुझे और कुछ नहीं चाहिए.’’

‘‘देख तेरी सहेली बहुत आ रही है तेरे पास. आज से तेरी सहेली तेरे साथ नहीं रहेगी, तू जहां भी रहेगी अकेली ही रहेगी. जब तक हमारा मामला नहीं निबटता तेरे पास कोई नहीं आएगा. ठीक है?’’

मोहनी ने कहा, ‘‘मैं अकेली थी इसलिए वह मेरे पास आ रही थी, ठीक है मैं मना कर दूंगी. मैं अकेली रहूंगी. तुम्हारी जब इच्छा होगी आ कर मुझ से हस्ताक्षर करवा लेना,’’ इस के बाद पूनम हंसते हुए अपने मातापिता के साथ वहां से चली गई.

पूनम के जाने के बाद मोहिनी ने ज्योति को फोन किया, ‘‘कहां हो मुझे सुभाष से  मिलना है.’’

ज्योति ने उसे आधा किलोमीटर दूर एक मौल का पता बताया. मोहिनी गाड़ी में बैठ

कर वहां से निकली. मौल के पास पहुंच कर मोहनी देवी ने गाड़ी और ड्राइवर को इंतजार करने को कहा और स्वयं मौल में चली गईं जहां ज्योति उन का इंतजार कर रही थी. वहां से उन्हें मौल के पीछे के रास्ते से अपने साथ ले कर ज्योति देवी निकल पड़ीं. थोड़ा आगे जाने के बाद एक गाड़ी ने उन्हें पिक किया. उस गाड़ी से वे दोनों सुभाष के चैनल के औफिस में पहुंच गईं. वहां पहुंचने के बाद सुभाष उन से मिला.

सुभाष ने कहा, ‘‘क्या मौसीजी इतनी जल्दी बात बन गई… बहुत जल्दी आप लोग यहां आ गईं.’’

मोहिनी देवी ने उसे लौकेट देकर कहा, ‘‘बेटा अब तो तुम्हीं देखो कितना हुआ है या और बाकी है.’’

सुभाष ने लौकेट खोल कर चिप निकाली और उसे ले कर वहां से चला गया. लगभग आधे घंटे के बाद आया और बोला, ‘‘मौसीजी अब आप देखें कमाल. उस ने अपना लैपटौप औन किया और इन्हें दिखाना शुरू किया. पूनम से जितनी भी बातें हुई थीं वे सारी उस में रिकौर्ड थी चित्र सहित. वीडियो रिकौर्डिंग हो गई थी और इस से साफ पता चल रहा था कि पूनम ने जानबूझ कर षड्यंत्र रच कर इन के पूरे परिवार को फंसाया.

सुभाष ने कहा, ‘‘मौसीजी आप और मां दोनों यहां बैठ कर देखती रहें मैं अब इस का न्यूज चला रहा हूं.’’

अपने चैनल से न्यूज चलाने के साथ ही उस ने वीडियो को इंटरनैट पर पोस्ट कर दिया. कुछ ही देर में व न्यूज, वे सारा वीडियो वायरल हो गए और पूरे शहर में सब जगह उन्हीं की चर्चा थी.

मोहिनी देवी ने प्रकाश को फोन कर के वकील के साथ थाना आने के लिए कहा और स्वयं भी थाने गईं. वहां प्रकाश वकील को ले कर आया हुआ था. उस ने कहा, ‘‘कमाल है मौसीजी यह सारा काम आप ने कैसे किया? अरे अब तो रंजन को छूटने से कोई रोक ही नहीं सकता है. अब सब से पहले हम लोग एफआईआर करेंगे.’’

मोहनी देवी, वकील और प्रकाश ने थाने में वीडियो की एक प्रति देते हुए पूनम के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई. केस दर्ज हो गया. अगले दिन के समाचारपत्रों में पूनम की पूरी कारस्तानी छपी हुई थी. रात में ही पुलिस ने जा कर पूनम और उस के मातापिता को हिरासत में ले लिया था. रंजन के वकील ने कोर्ट में जमानत की अर्जी दी और इस वीडियो को सुबूत के तौर पर साथ में दिया. रंजन और नीना छूट गए.

आपराधिक षड्यंत्र करने का आरोप पूनम और उस के

परिवार पर लगाया गया. जिस दिन रंजन और नीना की जेल से रिहाई थी, मोहिनी देवी अपने बच्चों को लेने गईं. उन के जेल से बाहर आते ही वे बच्चों से लिपट कर फूटफूट कर रो रही थीं.

सुभाष ने कहा, ‘‘अब आप क्यों रो रही हैं? अब आप के रोने के दिन बीत गए. अब तो रोना पूनम और उस के मातापिता को है. पूनम और उस के पिता के लालची चरित्र के कई सुबूत मेरे पास हैं, जो मैं ने रंजन के जेल जाते ही इकट्ठा करना शुरू कर दिए थे. उसे तो अब कोई नहीं बचा सकता है= और साथ में ऐसी लड़कियों को भी आज एक सबक मिला है जो उन की रक्षा के लिए बने कानून का इस्तेमाल कर के दूसरों का शोषण करती हैं. लड़के ही प्रताडि़त नहीं करते लड़कियां भी प्रताडि़त करती हैं और लड़के भी प्रताडि़त होते हैं.’’

जब मोहिनी देवी रंजन और नीना के साथ घर लौटीं तो उनके सभी पड़ोसी उन का स्वागत मुसकराते हुए कर रहे थे. सामने स्वागतमुद्रा में खड़ी विमला और सीमा को देख कर तो मोहिनी देवी ने कह भी दिया, ‘‘मैं ने जान लिया, इस संसार के लोग कितने निष्ठुर हैं. यदि एक आरोप लगा तो बिना सुबूत के, बिना गवाही के कठघरे में खड़ा कर के अपना न्याय भी सुना देंगे, दोषी करार दे कर.’’

विमला ने शर्मिंदगी से सिर झुका लिया, सीमा बहुत मुश्किल से कह पाई. ‘‘मुझे क्षमा कर दें दीदी. मैं ही नहीं हम सभी बहुत शर्मिंदा हैं. हम ने सचाई जानने की कोशिश नहीं की और आप को दोषी समझ लिया.’’

‘‘मुझे दुख तो अवश्य हुआ आप सभी हमें अच्छी तरह जानते थे फिर भी किसी ने हमारी बात पर विश्वास नहीं किया. फिर भी मैं खुश हूं कि यह हमारे अच्छे कर्म ही थे, जिन से पूनम को उस के किए की सजा मिलेगी. साथ ही साथ मेरे अच्छे कर्मों के कारण ही मुझे कुछ लोगों का साथ मिला,’’ मोहिनी देवी बोलीं.

फिर मोहिनी हाथ जोड़ कर अभिवादन करते हुए अपने घर के अंदर प्रविष्ट कर गईं अपने बच्चों के साथ. घर के भीतर जा कर नमन, रंजन और नीना से कहा, ‘‘कोई कुछ भी करे अपनी अच्छाई कभी मत छोड़ना. जिस चक्रव्यूह में हम फंसे थे शायद उस से कभी निकल नहीं पाते पर हमारे अच्छे कर्म थे जिन के कारण हमें ज्योति, सुभाष और प्रकाश का साथ मिला. जैसे मैं गर्व करती हूं ज्योति की मित्रता पर, वैसे ही मुझे तुम्हारे और प्रकाश की मित्रता पर भी गर्व है जिस ने हर कदम पर हमारा साथ दिया. सुभाष के सहयोग के बिना तो हम इस दलदल से बाहर निकल ही नहीं पाते, उस के उपकार तो कभी मत भूलना.’’

‘‘मां आप सही कह रही हैं हमारे अच्छे कर्मों ने ही हमें इस दलदल से निकाला. सही कहती हैं आप भलाई का काम हमेशा करते रहना. आप की आज्ञा का अक्षरश: पालन करूंगा. प्रकाश और सुभाष की मित्रता मेरा अनमोल धन होगा.’’

‘‘अपने कार्यालय के कर्मचारी, हमारे मैनेजर एवं सुनीता के प्रति भी कृतज्ञ हूं मैं, जिन्होंने मुसीबत में हमारा साथ निभाया. तुम्हारे पीछे मुझे अकेला नहीं छोड़ा. ऐसे विश्वसनीय कर्मचारी बहुत कठिनाई से मिलते हैं, मोहिनी देवी बोलीं.’’

-निर्मला कर्ण

Hindi Kahaniyan : बंबल ऐप

Hindi Kahaniyan : अवनी अभी सुबह की चाय पी कर थोड़ा रिलैक्स ही हो रही थी कि उस का मोबाइल बज उठा. दूसरी तरफ उस की फास्ट फ्रैंड और औफिस कलीग रश्मि का फोन था, ‘‘हैप्पीसेकंड वैडिंग ऐनिवर्सरी माई डियर तुम दोनों बस ऐसे ही हमेशा हंसतेमुसकराते रहो. सारे जहां की खुशियां तुम्हें मिल जाए और मेरी उमर भी तुम दोनों को लग जाए.’’

‘थैंक यू थैंक यू माई डियर लव यू. तेरे जैसे दोस्त हैं तो जिंदगी में कभी कोई प्रौब्लम आ सकती है भला,’ अवनी ने खुश होते हुए कहा.

‘‘अरेअरे फोन मत काटना मुझे एक बात बतानी है तुझे पता है अश्विन आजकल बहुत बड़ा भगवान भक्त हो गया है अकसर भगवान का तिलक लगाए और मंदिर जाते ही नजर आता है.’’

‘‘तुझे कैसे पता उसके बारे में?’’ अवनी ने हैरत से पूछा.

‘‘अरे मनु के औफिस में ही तो है तो मनु बता रहे थे कि आजकल तो बस भगवा कपड़े पहन कर बाबाजी टाइप हो कर घूमता रहता है.’’

‘‘ऐसे लोग भगवान का भजन ही करेंगे, इसी को तो कहते हैं कि 900 चूहे खा कर बिल्ली हज को चली. चल अभी ठीक है मैं फोन रखती हूं औफिस के लिए लेट हो रही हूं. शाम को या फिर कल शांति से बात करूंगी,’’ कह कर अवनी ने फोन रख दिया.

जल्दीजल्दी तैयार हो कर औफिस जातेजाते अवनी ने मेड निशा को जरूरी निर्देश दिए, ‘‘देखो साहब आने वाले होंगे उन्हें चायनाश्ता करा देना और खाना डाइनिंगटेबल पर लगा कर चली जाना.’’

पार्किंग में आ कर अवनी ने अपनी कार स्टार्ट की और औफिस की तरफ

चल दी. कार चलातेचलाते अश्विन के बारे में सोचने लगी, ‘‘अश्विन जो उस की जिंदगी में एक ग्रहण बन कर आया था पर अपनी कालिमा से उसे काला करने से पहले ही चला भी गया था. उस समय उस ने भोपाल के एलएनसीटी कालेज से इंजीनियरिंग कंप्लीट ही की थी और 1 साल तैयारी कर के बैंक पीओ का ऐग्जाम दिया. उस की कड़ी मेहनत का ही परिणाम था कि उस का पहली बार में ही सलैक्शन भी हो गया. मातापिता के साथसाथ वह भी बहुत खुश थी और जिंदगी भी बड़ी खुशनुमा ही थी. अब उसे नौकरी करते

5 वर्ष हो गए थे और हर भारतीय मातापिता की तरह उस के मांपापा भी उस की शादी के लिए परेशान थे. हर दूसरे दिन किसी न किसी लड़के के रिश्ते के बारे में उसे बताते रहते थे पर अवनी अभी इन सब बंधनों में बिलकुल नहीं बंधना चाहती थी.

एक दिन जब अवनी औफिस से लौटी तो पापा ने आदेश दिया, ‘‘अवि, कल कुछ मेहमान आने वाले हैं तुम तैयार रहना, अच्छे जमीनजायदाद वाले लोग हैं, खातापीता परिवार है और लड़का भी औटोमोबाइल कंपनी में अच्छी पोस्ट पर है.’’

‘‘पर पापा मैं अभी…’’

‘‘अभीतभी कुछ नहीं, तुम आजकल के बच्चे समझते क्यों नहीं जिंदगी में सही उम्र में सही काम होना बहुत आवश्यक होता है. ठीक है मिल तो लो जब तुम पूरी तरह आश्वस्त होगी तभी शादी करेंगे ठीक है न, तो कल तुम औफिस से टाइम पर घर आ जाना.’’

अगले दिन जब अवनी औफिस से आई तो ड्राइंगरूम में एक सुदर्शन नौजवान युवक अपने मातापिता और बहन के साथ वहां मौजूद था. औपचारिक बातचीत और चायनाश्ते के बाद अवनी और अश्विन को अकेले में मिलने भेज दिया गया और जैसे वे दोनों टैरेस पर पहुंचे तो पहला प्रश्न अश्विन ने किया, ‘‘आप की रुचियां क्या हैं ताकि मैं आप की रुचियों के अनुसार स्वयं को आप के अनुसार बदल सकूं क्योंकि मुझे लगता है कि शादी के बाद यदि हम खुद को एकदूसरे के अनुसार बदल लेंगे तो जिंदगी काफी आसान हो जाएगी आप क्या सोचती हैं?’’

‘‘जी बिलकुल मैं आप की बात से पूरी तरह सहमत हूं. वैसे तो मुझे सबकुछ पसंद है और मैं बहुत ऐडजस्टेबल भी हूं, बस इतना चाहूंगी कि मैं चूंकि अपने मातापिता की इकलौती संतान हूं और मैं ताउम्र आप के मातापिता के समान ही अपने मातापिता का भी ध्यान रखूंगी और इस बारे में कुछ भी सुनना नहीं चाहूंगी,’’ अवनी ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा क्योकि उस का सोचना था कि विवाह से पहले ही यदि सारी चीजें क्लीयर हो जाएं तो बाद में किसी भी विवाद की स्थिति नहीं रहेगी.

‘‘अरे बिलकुल यह कोई पूछने की बात है आप के मातापिता मेरे भी तो मातापिता हैं. मैं आप को बता दूं कि मैं बहुत बड़ा फैमनिस्ट हूं और महिलाओं का बहुत सम्मान करता हूं इसलिए आप इस बारे में पूरी तरह आश्वस्त रहें,’’ अश्विन ने अपनी विचारधारा को स्पष्ट करते हुए कहा.

अश्विन की बातें सुन कर अवनी पूरी तरह अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त हो गई थी और अपने मांपापा को भी अपनी सहमति से अवगत करा दिया था. दोनों परिवारों की आपसी सहमति से रोका की रस्म भी कर दी गई और अतिशीघ्र शादी की तारीख भी निकलवाने की बात की गई थी. मांपापा के साथसाथ उस की खुशी का भी कोई ठिकाना नहीं था. वह खुश थी कि चलो कोई अच्छा जीवनसाथी तो मिला जिस के साथ वह शांति से अपनी जिंदगी बिता सकती है.

दोनों फोन पर घंटों बतियाते और भविष्य की कल्पना कर के रोमांचित हो उठते. अवनी अभी अतीत में ही खोई रहती अगर पीछे से

आने वाली गाडि़यों के हौर्न की आवाज उसे सुनाई न देती.

हड़बड़ा कर अवनी ने देखा कि चौराहे पर उस ने यंत्रवत अपनी कार

तो रोक दी थी पर विचारों में इतनी खो गई थी कि लाइट कब हरी हो गई है उसे पता ही न चला. पीछे से आ रही गाडि़यों के हौर्न की आवाज से वह चौंकी और जल्दी से अपनी कार आगे बढ़ा दी. चौराहे से आगे जा कर जब उस ने चैन की सांस ली तो पाया कि वह तो औफिस से काफी आगे निकल आई है. कार को वापस ले कर वह औफिस पहुंची और अपने कैबिन में पहुंच कर जैसे ही पर्स में से फोन निकाला तो अबीर की 10 मिस्ड काल देख कर उस के होश उड़ गए और उस ने फटाफट अबीर को काल लगा दिया.

‘‘अरे यार कहां थीं तुम और फोन को किस डब्बे में डाल कर रखा था. कब से फोन लगा रहा हूं और तुम्हारा अतापता ही नहीं.’’

‘‘सौरीसौरी अबीर वह मैं गाड़ी चला रही थी न,’’ अवनी ने किसी तरह खुद को संयत करते हुए कहा.

‘‘तो गाड़ी में फोन को ब्लूटूथ से अटैच करने की सुविधा भी होती है कि नहीं.’’

‘‘सौरी बाबा सौरी तुम कब पहुंचे और निशा ने नाश्ता करा दिया न?’’

‘‘हांहां सब ठीक है. नाश्ता भी कर लिया हो सके तो शाम को जल्दी आ जाना. कहीं बाहर चल कर सैलिब्रैशन करेंगे. मैं ने होटल ताज में टेबल बुक कर दी है,’’ अबीर ने अपना मंतव्य बताते हुए कहा.

‘‘हांहां जरूर आप कहें और मैं इनकार करूं इतनी मेरी हिम्मत कहां जनाब. ठीक है तुम तब तक आराम कर लेना. 2 दिन के टूर के बाद लौटे हो थक गए होंगे. शाम को मिलते हैं.’’

अबीर के बारे में सोच कर अवनी के अधरों पर मुसकराहट आ गई और अपनी खुशी को काबू में करती हुई वह अपनी फाइलों में डूब गई.

शाम को काम खत्म करतेकरते काफी देर हो गई. घर पहुंची तो अबीर चाय चढ़ा कर

बस उस के आने का इंतजार कर रहे थे जैसे ही उसने कालबेल बजाई तो अबीर ने दरवाजा खोलते ही उसे आलिंगनबद्ध कर के एक मीठा सा चुंबन उस के गाल पर जड़ दिया और बोले, ‘‘2 दिन तुम से दूर क्या रहा ऐसा लग रहा है मानो पूरा युग बीत गया हो.’’

‘‘क्या बात है मेरे मजनू मियां,’’ कह कर अवनी फ्रैश होने चली गई. तब तक अबीर ने डाइनिंगटेबल पर चायनाश्ता लगा दिया.

‘‘अरे चाय बन भी गई वाह क्या बात है.’’

‘‘इसीलिए तो हम दोनों ने एकदूसरे के फोन में लाइफ 360 ऐप इंस्टाल कर रखा है ताकि एकदूसरे की लोकेशन पता कर के चायनाश्ते का इंतजाम कर सकें.’’

‘‘हां यह तो सही है.’’

रात को दोनों ने ताज लेक व्यू में डिनर किया और फिर आ कर कुछ अपनी कुछ उस की सुनतेसुनाते हुए दोनों बैडरूम में आ गए. अबीर को सोने की इतनी आदत है कि बेड पर जाते ही नींद के आगोश में चले जाते हैं. जैसे ही अवनी ने सोने की कोशिश की तो अनायास ही सुबह की रश्मि की बात उस के कानों में गूंजने लगी कि अश्विन आजकल बहुत भक्ति भाव करने लगा है. अश्विन की याद आते ही उस की कटु यादों और अनुभव के अधूरे पन्ने फिर फड़फड़ाने लगे जब अश्विन से विवाह तय होने के बाद उस के घर में जोरशोर से शादी की तैयारियां चल रही थीं. वह अपने मातापिता की इकलौती बेटी थी और बैंक में पीओ के पद पर कार्यरत थी. यों भी घर में रुपएपैसों की कोई कमी तो थी नहीं सो मम्मीपापा अपने सारे अरमान उस के विवाह में पूरे करना चाहते थे. भोपाल के महंगे होटल रैडिसन से सारी रस्में और विवाह होना था. सो उसे 4 दिनों के लिए बुक कर लिया गया था.

शादी के कार्ड की डिजाइन फाइनल हो कर प्रिंट के लिए दे दिए गए थे. बस 1 माह बाद शादी थी सो उस का रोमांच भी शिखर पर था.

अश्विन दिल्ली में था तो वह पुणे में सो दोनों बस फोन पर ही अपने भविष्य की कल्पनाएं करते थे. उस समय रश्मि हाल ही में दिल्ली से ट्रांसफर हो कर पुणे आई थी चूंकि बैंक में उस समय वे 2 ही महिलाएं थीं इसलिए जल्द ही रश्मि से उस की बहुत अच्छी दोस्ती हो गई थी. यों तो वह बेचलर थी पर अकसर अपने किसी पुरुष मित्र से बात करती रहती थी. एक दिन लंच के समय उस ने रश्मि से कहा, ‘‘क्या तुम किसी से रिलेशनशिप में हो? कहां मिलीं उस से, कौन है और क्या करता है.?’’

‘‘दी यों तो कोई खास रिलेशनशिप नहीं है अकसर मैं दिल्ली में बोर होती थी तो टाइमपास के लिए मैं ने बंबल नाम का एक डेटिंग ऐप डाउनलोड कर लिया था जिस से कुछ लोगों को डेट भी किया था क्योंकि इस से कई पुरुषों की मानसिकता भी पता चलती है और सोचती हूं कि  हो सकता है कभी कोई सीरियस बंदा भी मिल जाए तो उस से मैं शादी भी कर सकती हूं.’’

‘‘बाप रे तुम तो बड़ीं छिपी रुस्तम निकलीं… तो कोई सीरियस बंदा मिला या नहीं अभी तक?’’ अवनी ने आश्चर्य से उस की तरफ देख कर कहा.

‘‘हां आजकल मैं एक बंदे से कांटैक्ट में हूं. बहुत दिन तो नहीं हुए. अभी कुछ दिन पहले ही उस के साथ डेट की थी,’’ रश्मि ने कुछ शरमाते हुए कहा.

‘‘ओहो तुम्हारे गालों की लाली बता रही है कि तुम उसे ले कर सीरियस हो. अच्छा दिखाओ तो कौन है?’’

अवनी ने कहा तो रश्मि ने अपने व्हाट्सऐप पर अपनी और उस की कुछ पिक्स दिखाईं. अवनी का चेहरा एकदम स्याह पड़ गया. उसे लगा अभी वह चक्कर खा कर चेयर से गिर जाएगी क्योंकि पिक में रश्मि के साथ कोई और नहीं अश्विन था. कुछ देर शांत रह कर उस ने खुद को संयत किया फिर धीरे से बोली, ‘‘वाह बहुत हैंडसम है कब मिली थी इस से?’’

‘‘पिछले 3 महीनों से मैं इसे डेट कर रही हूं. अभी पिछले हफ्ते ही जब सामान लेने गई थी तो उस से मिल कर आई थी,’’ रश्मि ने बहुत ही मासूमियत से कहा.

रश्मि की बातें सुन कर अवनी को काटो तो खून नहीं. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे और क्या न करे. 6 महीने पहले ही तो उन का विवाह तय हुआ है और 3 महीने से तो रश्मि के साथ ही डेट कर रहा है. हो सकता है इस से पहले किसी और से भी… विवाह से पहले ही इतना बड़ा धोखा तो विवाह के बाद क्या होगा सोच कर ही उस की रूह कांपने लगी. उस दिन तबीयत खराब होने का बहाना कर के वह हाफडे ले कर घर आ गई.

शाम को जब मां का फोन आया तो बात करतेकरते उस की आवाज भारी हो गई और किसी तरह उस ने खुद को संभाल कर बात की और सिरदर्द का बहाना कर के जल्दी से फोन काट दिया. उस पूरी रात उस की आंखों में नींद नहीं थी. बस सिर्फ मंथन था. मांपापा का चेहरा और समाज था. कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे. इतना बड़ा धोखा कोई कैसे कर सकता है. यदि घर में बताती है तो बहुत नुकसान होगा दूसरे समाज में बदनामी होगी सो अलग क्योंकि भारतीय समाज में लड़कों को हमेशा दूध का धुला और पाकसाफ माना जाता है वहीं लड़कियों को हमेशा चरित्रहीन करार दे दिया जाता है. शादी तोड़ने का आरोप हमेशा लड़की पर ही लगाया जाता है.

अभी अवनी मंथन में डूबी ही थी कि तभी अश्विन का फोन आ गया स्क्रीन पर

अश्विन का नाम देखते ही क्रोध से उस के शरीर का रोमरोम कांपने लगा. 2-3 बार बज कर फोन बंद हो गया. उस की भी कब आंख लग गई उसे पता ही नहीं चला. सुबह उठी तो सिर काफी भारी था. पर हां अब उस ने सचाई पता लगा कर अश्विन का परदाफाश करने का निश्चय कर लिया था और सोच लिया था कि अब समाज के डर और आर्थिक नुकसान के कारण किसी भी हालत में अपनी जिंदगी की कुरबानी नहीं देगी, बस अब किसी तरह सच पता लगाना है. अब तक वह और रश्मि चूंकि बहुत अच्छी दोस्त बन चुकी थीं तो अब उसे अपने साथसाथ रश्मि को भी अश्विन के चंगुल से बचाना उस की जिम्मेदारी थी. अगले दिन सुबह जा कर सब से पहले वह रश्मि के कैबिन में पहुंची.

‘‘रश्मि आज शाम को इंडियन कैफे चलें… कहीं बाहर जाने का मन हो रहा है.’’

‘‘क्या हुआ ऐनिथिंग सीरियस… तू कुछ परेशान सी लग रही है,’’ रश्मि ने उस के चेहरे की तरफ देख कर कहा.

‘‘नहीं कुछ खास नहीं शाम को मिलते हैं.’’

वह पूरा दिन उस के लिए कितना भारी था उसे याद कर के आज भी सिहर उठती है वह. शाम 6 बजे वह और रश्मि दोनों इंडियन कैफे में थे.

‘‘रश्मि देख अब जो मैं तुझ से कहने जा रही हूं उसे प्लीज गलत मत समझना…’’ कह कर उस ने शुरुआत से ले कर अब तक की पूरी कहानी रश्मि को सुना दी, साथ ही अश्विन के साथ हुई अपनी रोका की रस्म के फोटो, शादी के कार्ड्स और होटल की बुकिंग भी उसे दिखाई.

‘‘उफ कितना बड़ा फ्रौड और डबल कैरेक्टर आदमी है यह. बातें तो इतनी लच्छेदार

करता है कि इस से बड़ा ईमानदार कोई होगा ही नहीं… अरे भई अच्छा हुआ जो अभी पता चल गया तेरे साथसाथ न जाने कितनों कि जिंदगी यह इंसान बरबाद कर चुका होगा और आगे भी करता. इसे तो सबक सिखाना ही होगा अवनी और वह भी इसी के घर दिल्ली में,’’ रश्मि क्रोध से बोली.

‘‘मैं तो खुद उस दिन तेरे मोबाइल में आश्विन का फोटो देख कर चेयर से गिरतगिरते बची थी मांपापा की सारी जमापूंजी लगा कर शादी की सारी तैयारियां हो चुकी हैं पर अब लोग क्या कहेंगे कि डर से अपनी पूरी जिंदगी तो दांव पर नहीं लगा सकती न. कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करूं. मांपापा को पता चलेगा तो पता नहीं क्या बीतेगी,’’ अवनी ने उदास होते हुए कहा.

‘‘मैं कल तक कुछ प्लान करती हूं फिर दिल्ली चलने का प्लान बनाते हैं. लौट कर आंटी अंकल को सचाई बता देना. फिर देखना वे खुद शादी कैंसिल कर देंगे. वह तो अच्छा हुआ जो सही समय पर पता चल गया वरना तेरे साथसाथ मैं भी उसे अपना हमसफर बनाने का सोच रही थी.’’

अगले दिन औफिस से लौट कर अवनी

ने अपने मम्मीपापा से कहा, ‘‘मां 2 दिन के दिल्ली टूर पर जा रही हूं. लौट कर भोपाल आती हूं अगले हफ्ते.’’

अगले दिन अवनी और रश्मि दोनों दिल्ली पहुंचीं. रश्मि ने पहले से ही अश्विन से एक कैफे में मिलने का टाइम ले रखा था. तय समय पर अश्विन आ गया. काफी देर बात करतेकरते रश्मि बोली, ‘‘आज तो कुछ ग्रैंड पार्टी करने का मन कर रहा है पर प्लान नहीं कर पा रही हूं कैसे करूं.’’

‘‘अरे तो प्लान मैं कर लेता हूं. ऐसा करते हैं मेरे फ्लैट पर चलते हैं. वहीं कुछ घंटे ऐंजौय करेंगे फिर आप चली जाना,’’ अश्विन ने बेशर्मी से कहा.

‘‘हां ठीक तो है पर किसी ने देख लिया तो…’’ कुछ अचकचाने की ऐक्टिंग करते हुए रश्मि ने कहा.

‘‘अरे नहीं वहां ऐसा कोई खतरा नहीं है. हमारी सोसाइटी में सब अपने में मस्त रहते हैं तो चलिए आज आप के साथ कुछ वक्त बिताया जाए.’’

रश्मि आश्विन के साथ चल दी पर इस बीच उस ने अपने मोबाइल से अपनी और अश्विन की बातचीत को रिकौर्ड करने के लिए वौइस रिकौर्डर को औन कर रखा था. चलतेचलते अवनी को अपनी लाइव लोकेशन भी भेज दी थी ताकि वह आराम से उन दोनों तक पहुंच सके. रास्ते में रुक कर जब अश्विन ने लिकर खरीदी तो भी उस ने कोई प्रतिरोध नहीं किया बल्कि जैसे ही अश्विन लिकर ले कर ड्राइविंग सीट पर बैठा, वह बोली, ‘‘यह किया आप ने कोई काम अब आएगा मजा पार्टी करने में.’’

‘‘वैसे इस बार आप कुछ ज्यादा ही बिंदास लग रही हैं,’’ अश्विन मुसकराते हुए बोला.

‘‘अरे ऐसा कुछ नहीं है. आप की ही तरह मुझे भी लगता है कि अभी कर लो जितने मजे करने हैं. कल को घरगृहस्थी में फंसे तो जिंदगी कब निकल जाती है पता ही नहीं चलता. वैसे आप का शादी के बारे में क्या विचार है. आप को तो मेरी जैसी ही बिंदास लड़की चाहिए होगी.’’

‘‘हां दरअसल इस शादीवादी के झंझट में अभी पड़ना नहीं चाहता. बिंदास और मस्त स्वभाव मस्ती करने के लिए होता है गृहस्थी चलाने के लिए नहीं मेरी जानेमन. चलिए आ गया मेरा फ्लैट,’’ कह कर अश्विन ने गाडी का दरवाजा खोल दिया.

मन ही मन अश्विन की चतुराई और आशिकमिजाजी को दाद देते हुए उस ने

अश्विन के फ्लैट में प्रवेश किया. बेहद खूबसूरती से सजाए गए घर को देख कर लग ही नहीं रहा था कि यह एक बैचलर का घर है. निस्संदेह यहां हर दूसरे दिन कोई नई आती होगी यह सोचते हुए वह बोली, ‘‘तुम चेंज कर लो तब तक मैं पैग बनाती हूं.’’

‘‘अश्विन जब लौटा तो वह पैग बना कर तैयार थी. उधर दरवाजा खोल कर उस ने अवनी को भी अंदर कर के परदे के पीछे छिपा दिया था. अश्विन पर तो मानो वासना का भूत सवार था. सो उस ने फटाफट पैग लिया और बोला, ‘‘चलो आज का जश्न शुरू करते हैं.’’

रश्मि ने धीरे से उस के गिलास में अपना गिलास भी डाल दिया. रश्मि ने इतना स्ट्रौंग पैग बनाया था कि उसे पीते ही अश्विन पर खुमारी सी छाने लगी. इधर रश्मि उस के गिलास में लिकर डालती जा रही थी. थोड़ी ही देर में अश्विन पूरी तरह नशे में धुत्त हो चुका था.

अवनी ने हर बात हर ऐक्टिविटी को रिकौर्ड कर लिया था. अब रश्मि और अवनी ने अश्विन के गले की चेन, 2 डायमंड की अंगूठियां, उस के वौलेट में रखे 20 हजार रुपए अपने हवाले किए ताकि वक्त पड़ने पर उन्हें प्रूफ के तौर पर प्रयोग किया जा सके. अश्विन के 4 एटीएम कार्ड निकाल कर कैंची से टुकड़ों में काट कर डाल दिए और इस के बाद वे दोनों फ्लाइट ले कर पुणे आ गईं.

रास्ते में अवनी बोली, ‘‘अब आगे मैं संभाल लूंगी. मेरी इतनी मदद करने के लिए तेरा बहुतबहुत धन्यवाद.’’

घर आ कर सारे सुबूतों के साथ अवनी ने जब पूरी बात अपने मातापिता को बताई तो पिताजी तो सिर पकड़ कर ही बैठ गए,

‘‘उफ, अब क्या होगा. सारी बुकिंग, नातेरिश्तेदार… समाज अब क्या करूं,’’ मां बोली.

‘‘अरे करना क्या है सब से पहले अपनी तरफ की सारी बुकिंग कैंसिल कीजिए ताकि जितना नुकसान बच सकता है हम बचा पाएं. बेटी की जिंदगी बरबाद होने से बच गई यह क्या कम है. पूत के पांव पालने में ही दिख गए वरना आगे ये क्या चाल दिखाते पता नहीं.’’

अगले दिन अपनी तरफ की सारी बुकिंग कैंसिल कर के अवनी के पिता ने

अश्विन के पिता को फोन लगाया, ‘‘शर्माजी मैं यह शादी नहीं कर सकता. कारण केवल तभी बता पाऊंगा जब आप भोपाल आएंगे. मेरा आना मुश्किल है.’’

3 दिन बाद अश्विन का फोन आया लगभग झुंझलाते हुए बोला, ‘‘ये तुम्हारे पिताजी क्या बकवास कर रहे हैं? तुम जानतीं नहीं क्या सारी तैयारियां हो चुकी हैं. इस स्टेज पर शादी कैंसिल करने का क्या मतलब है? हम लोग शनिवार को भोपाल आ रहे हैं.’’

‘‘मुझे कुछ नहीं पता. पापा ने मुझे बस इतना बताया कि उन्होंने आप लोगों को बुलाया है,’’ अवनी ने यह कह कर फोन काट दिया.

रश्मि ने अश्विन के नंबर को ही ब्लौक कर दिया था. अवनी अचरज में थी कि कोई इतनी बड़ी घटना होने के बाद भी इतना झूठ कैसे बोल सकता है.

इधर एटीएम कार्ड्स खराब हो जाने के कारण और फोन के गुम होने की सूचना अश्विन को पुलिस थाने में देनी पड़ी. कई पेपर्स ने भी इस न्यूज को कवर किया, जिस की सारी कटिंग्स रश्मि अपने कुछ सोर्सेज से ले कर अवनी को सौंप दीं थीं.

शनिवार को अश्विन अपने मातापिता के साथ अवनी के घर पर था. उस दिन अवनी ने रश्मि को भी भोपाल बुला लिया था ताकि ढंग से परदाफाश किया जा सके.

अवनी के पिताजी ने पहले तो सारे फोटो अश्विन के मातापिता के फोन पर भेजे और उन से उन्हें देखने को कहा. रश्मि के साथ अपनी फोटो देख कर पहले तो अश्विन घबराया पर फिर बोला, ‘‘अरे यह लड़की बहुत बदमाश है. इस ने मुझे फंसाया है.’’

इस के बाद अवनी ने रश्मि और अश्विन की बातचीत की सारी रिकौर्डिंग्स चला कर सब के सामने रख दी. इस बीच रश्मि भी आ कर अश्विन के सामने बैठ गई थी.

अश्विन को अब तक समझ आ गया था कि उस का झूठ पकड़ा गया है. सुबूत के तौर पर अश्विन की घड़ी, चेन, मोबाइल भी अवनी ने ला कर टेबल पर रख दिया और बोली, ‘‘मेरे सामने बहुत बड़ीबड़ी फैमनिज्म की बातें करने वाले अश्विन जब आप ने अपने मातापिता की इज्जत की ही परवाह नहीं की तो मेरी और मेरे मातापिता की क्या करेंगे. शादी तय होने के बाद भी आप न जाने कितनी लड़कियों के साथ रंगरलियां मना रहे हैं आप को शर्म आनी चाहिए.’’

‘‘अरे बेटा ऐसे शादीब्याह थोड़े ही टूटते हैं. हो जाती है गलती बच्चों से आवेश और जोश में,’’ अश्विन के पिताजी अवनी को शांत करते हुए बोले.

‘‘अंकल और यदि यही गलती मुझ से हुई होती तो क्या तब भी आप मुझे अपने घर की बहू बनाते?’’ अवनी आवेश में बोली.

काफी देर तक अश्विन के पापा को कोई जवाब नही सूझा.

‘‘लड़का होने का मतलब यह नहीं कि उन्हें अपनी मनमरजी करने की आजादी मिल गई. सब जानतेबूझते मैं अपनी बेटी आप के घर में नहीं दे सकता. मेरी बेटी मेरी शान, मान और अभिमान है और न ही मेरे ऊपर भार है जो मैं किसी से भी उस की शादी कर दूं. यह शादी अब नहीं हो सकती.’’

‘‘अंकल आप से मुझे कोई शिकायत नहीं है. आप मेरे पिता समान हैं पर हां अश्विन आप को हमारा अब तक का हुआ सारा खर्चा पे करना होगा वरना ये सारी पिक्स आप के पूरे समाज में सर्कुलेट हो जाएंगी. यह रहा आप का सारा सामान अश्विन के रुपए, वौलेट, रिंग्स और रोके का सारा सामान,’’ सब को टेबल पर रखते हुए अवनी ने कहा.

मरता क्या न करता वाली स्थिति हो चुकी थी. अश्विन ने अवनी के कहे अनुसार

सारा पे किया और फिर अपने पिताजी के साथ चला गया. इस तरह एक बहुत बड़ी अनहोनी का शिकार होतेहोते वह बच गई.

इस घटना के बाद उसे विवाह के नाम से ही डर लगने लगा था. वह बैंक औफ बड़ौदा में पीओ थी तो अबीर स्टेट बैंक औफ इंडिया में. अकसर मीटिंग्स में दोनों टकरा जाते थे. फिर एक दिन जब बहुत पानी बरस रहा था और अवनी मीटिंग के बाद ओला के आने का इंतजार कर रही थी तभी अबीर ने अपनी कार उस के बराबर ला कर रोक दी, ‘‘आइए आप को कहां जाना है मैं छोड़ देता हूं.’’

‘‘नहीं मैं ओला से चली जाऊंगी.’’

‘‘अरे मैं और मेरी कार ओला से तो बेहतर ही है आइए… आइए.’’

जब अबीर ज्यादा इंसिस्ट करने लगे तो वह चुपके से आ कर ड्राइविंग सीट की बगल वाली सीट पर आ कर बैठ गई. इस तरह यह अबीर और उस की पहली मुलाकात थी. रास्ते में अबीर उस से परिवार आदि के बारे में पूछते रहे.

अबीर खुद इंदौर से थे और परिवार में मातापिता के अलावा एक बड़ा भाई था जिन की शादी हो चुकी थी और वे मुंबई में सैटल्ड थे. एक ही प्रदेश का होने के कारण दोनों में कुछ ही दिनों में अच्छीखासी दोस्ती हो गई. दोनों अब एकदूसरे को अच्छी तरह जानने भी लगे थे.

एक दिन जब वे दोनों मीटिंग से लौट रहे थे तो अबीर ने कार एक रैस्टोरैंट के सामने रोक दी और बोले, ‘‘चलो आज कौफी पीते हैं.’’

कौफी और्डर कर के अचानक से अबीर बोले, ‘‘क्या हम दोनों हमेशा के लिए एकदूसरे के नहीं हो सकते?’’

एकदम से ऐसा प्रस्ताव सुन कर अवनी तो लगभग चौंक ही गई फिर धीरे से बोली, ‘‘क्या मतलब?

‘‘देखो मुझे जलेबियां बनाना तो आता नहीं. क्या तुम मुझ से शादी करोगी?’’ अबीर ने बिना किसी लागलपेट के अपना प्रस्ताव अवनी के सामने रख दिया.

अवनी को चुप देख कर अबीर फिर बोले, ‘‘नहीं कोई जल्दी या प्रैशर नहीं है. यदि आप मुझे अपने योग्य समझेंगी तो मैं खुद को धन्य समझूंगा. आप आराम से सोच कर उत्तर दीजिएगा.’’

इस के बाद दोनों ही अपनेअपने घर चले गए. रात में अवनी ने बातों ही बातों में अपनी मां

को अबीर के बारे में बताया. मां खुश तो हुई पर धीरे से बोलीं, ‘‘बेटा, अच्छे से देखपरख लेना आजकल न जाने कौनकौन से ऐप और तकनीक आ गई है. वह तो भला हो उस बंबल ऐप का वरना अनजाने में ही हम सब बहुत बड़ा धोखा खा जाते.’’

फिर एक दिन इंडियन कैफे हाउस में अवनी ने अश्विन के साथ हुई सगाई से ले कर टूटने तक की सारी घटना अबीर को बता दी. पूरी बात सुन कर अबीर बोले, ‘‘देखिए पहले तो मुझे आप के पास्ट से कोई लेनादेना नहीं है दूसरे आप ने रिश्ता एक वाजिब वजह से तोड़ा है. शादी जैसे रिश्तों की शुरुआत ही यदि झूठ से होगी तो वह कितने दिन तक चलेगी, यह तो कुदरत ही बता सकती है. मेरा मानना है कि रिश्ता कोई भी हो उस में पारदर्शिता होना बहुत जरूरी होता है.’’

और इस के बाद दोनों के परिवार वालों की सहमति से दोनों विवाह के बंधन में बंध गए और आज दूसरी ऐनिवर्सरी भी सैलिब्रैट कर चुके हैं. विचारों के इस प्रवाह में अवनी इतना अधिक बह गई थी कि कब सुबह के 5 बज गए उसे पता ही नहीं चला. पर आज संडे होने के कारण जागने की कोई जल्दी नहीं थी सो मन

ही मन बंबल ऐप का थैंक्स करती हुई वह फिर नींद के आगोश में चली गई.

Hindi Short Story : बिगड़ी हुई स्त्री

Hindi Short Story : बिगड़ी हुई स्त्रीकितने  दिन हो गए हैं, 2 महीने, 3 महीने या कुछ ज्यादा ही. कपड़े देते हुए, खाना परोसते या सामान पैक करते बस हाथ छू भर जाते हैं या वही उस के गाल पर अपने अधर रख देती है, बस उस से ज्यादा कुछ नहीं. सुधीर की टूरिंग जौब है और 1-2 दिन के लिए घर आना तो थकान उतारने और गहरी नींद लेने की चाह में रात बिता देने में ही बीत जाता है. दिनभर औफिस की व्यस्तता रहती है और इतवार हो तो घर के बहुत सारे अधूरे कामों को पूरा करने के चक्कर में सुधीर चक्करघिन्नी सा दौड़ता रहता है.

सास चाहती हैं कि बेटा कुछ पल उन के साथ बैठे तो मानस पापा को छोड़ना ही नहीं चाहता. उन की फरमाइशें पूरी करने की खुशी से सुधीर आनंदित रहता है. उस का क्या है, वह तो पत्नी है. उसे तो सुधीर की व्यस्तता को, उस की नौकरी की प्रतिबद्धता को समझना चाहिए. वैसे भी कोई नईनवेली दुलहन तो है नहीं. शादी को ही 15 साल हो गए हैं. अगर समय से बच्चा हो जाता तो वही 13-14 साल का होता. बेशक अभी 5 साल का है मानस, लेकिन वह तो 40 की हो चुकी है और वह 42 वसंत पार कर चुका है. अपनी अपेक्षा और उम्मीदों को सीमा में बांध लेना उसे सीख लेना चाहिए. अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना आ जाना चाहिए, चाहे कोई भी इच्छा हो.

वह कभी सुधीर के पास जा कर उस के जिस्म पर उंगलियां फिराने की कोशिश करती तो

उनींदा सुधीर नींद की खुमारी में भी न जाने कैसे इतना कुछ सुना देता. एक बार नहीं, बहुत बार सुना चुका है. शब्दों में हेरफेर कर. वह ऐसा नहीं कह रही है कि उन के बीच प्यार की उष्मा खत्म हो गई है या सैक्स संबंधों को ले कर उस के अंदर अनिच्छा पैदा हो गई है. वह हमेशा ही लालायित रहा है संबंध बनाने को. प्रगाढ़ता और घनिष्ठता के बीच उन दोनों का सुरताल कोई सुन ले तो ईर्ष्या ही करेगा उन के उफान और चरम सीमा पर पहुंचने की बजती मधुर ध्वनियों को सुन कर पर पिछले कुछ सालों से जब से टूर पर जाने का सिलसिला शुरू हुआ है सुधीर की तरफ से पहल होने पर एक सर्द चादर बिछ गई है.

सुधीर का कोई ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर चल रहा है, ऐसा नहीं है या वह जिन जगहों पर जाता है वहां उसे कोई ‘अवेलेबल’ हो जाती है, ऐसा तो कतई नहीं है. वह यह बात मान ही नहीं सकती है. इतना विश्वास है उसे सुधीर पर. क्यों? पता नहीं, पर है. सुधीर ‘वन वूमन मैन’ है. वह इतने विश्वास से कह सकती है यह बात. यह प्रश्न आप के मन में आना स्वाभाविक है.

कहते हैं कि स्त्रियों के पास एक छठी इंद्रिय होती है जो अदृश्य चीजों को उजागर कर देती है तो बस वैसे ही वह भी अपनी छठी इंद्रिय को जबतब चौकन्ना कर सुधीर के हर क्रियाकलाप में सेंध लगा सब जान लेती है. वैसे भी 15 साल से जिस व्यक्ति के साथ रह रहे हों, उस के स्वभाव और प्रकृति के बारे में पता होना कोई बड़ी बात नहीं है. अपवाद हो सकते हैं, वह इस बात को नकार नहीं सकती.

सुधीर जब टूर पर होता है तो एक रिक्तता उस के मन और तन दोनों पर हावी हो जाती है. जब वह आता है तो वह चाहती है कि सुधीर उस की इस रिक्तता को दूर करे. पर वह स्वयं इतना खाली हो कर लौटता है कि बस बिस्तर पर पसर जाना चाहता है या अगले टूर के बारे में सोच तनावग्रस्त हो जाता है. मार्केटिंग और सेल्स हैड बनना पहले जहां खुशी देता था, अब वही उसे चुभने लगा है. उस की देह भागदौड़ करतेकरते झुलस जाती है और मन में उठने वाली तरंगें तो न जाने कब से किस खोह में जा कर छिप गई हैं.

‘‘सारा दिन तलवार लटकी रहती है टारगेट्स पूरा करने की. जरा सी भी

सेल डाउन होती है मैनेजिंग डाइरैक्टर से ले कर कंपनी का सीईओ तक मीटिंग बुला कर कठघरे में खड़ा कर देता है. जो टारगेट्स अचीव किए होते हैं, उन की भी क्षण भर में वैल्यू खत्म हो जाती है,’’ सुधीर घर पर लैपटौप पर नजरें गड़ाए बड़बड़ाता रहता.

वह उस के पास जा प्यार से बालों पर हाथ फेरने लगती या उस से सट कर खड़ी हो जाती तो वह शरारती अंदाज में उसे अपनी ओर खींच लेता, उस के अंगों से खेलता भी. फिर स्वयं को संयत कर लेता, ‘‘यार, ललचाओ नहीं. अभी बिलकुल टाइम नहीं है. रात को ही यह प्रेजैंटेशन बनाना होगा. सुबह एमडी को सारे फिगर चाहिए. ऐसे में तुम्हारी फिगर कैसे देखूं?’’ वह उस की खुमारी को कीबोर्ड पर उंगलियां चलाते हुए तोड़ देता.

‘‘पर बहुत दिन हो गए हैं सुधीर. मेरा मन भी करता है. यह तो एक जरूरत है और मेरे अंदर शायद सैक्सुअल डिजायर कुछ ज्यादा ही है. तुम भी तो यही मानते हो. ऊपर से मैं इस बारे में खुल कर कहने से परहेज नहीं करती. मेरे लिए सैक्स कोई टैबू नहीं है जो उस के बारे में लुकेछिपे ढंग से बात करूं. आई वांट टू मेक लव,’’ वह उस से लिपट जाती.

‘‘मैं समझता हूं कनु, पर क्या करूं? अभी मेक लव किया तो उस के बाद नींद के आगोश में समा जाऊंगा और प्रेजैंटेशन लैपटौप की स्क्रीन पर ही अटका रह जाएगा. तुम सोचती होगी मैं अपनेआप को कैसे रोक लेता हूं, पर सच कहूं संबंध बनाने के लिए मन और तन दोनों का ही रिलैक्स रहना जरूरी है. हमारी भागतीदौड़ती जिंदगी ने भौतिक सुख तो हमें दे दिए हैं पर प्यार करने के पल हम से छीन लिए हैं.’’ बोझिलता उस के चेहरे पर पसरी होती तो कनु ही अपने मन को मार लेती या उस के कुरते पर फैली सिलवटें ठीक कर उस के हाथ पर हाथ रख भरोसा सा देती वहां से हट जाती.

सच ही तो कह रहा है सुधीर. शादी के 5 साल तक उन के बीच जो शारीरिक

दीवानापन था, जो कामुकता का ज्वार उन के बीच हिलोरें मारता था, एकदूसरे के भीतर खो जाने की चाह हमेशा एक जिजीविषा की तरह फन उठाए खड़ी रहती थी, वह धीरेधीरे नदी के शांत जल की तरह बहने लगी. उस की इच्छाएं बहुत परेशान करती हैं कनु को. ‘लस्ट स्टोरी’ नामक वैब सीरीज में अपनी इच्छा स्वयं ही शांत करने के बहुत से तरीके उस ने देखे, ट्राई भी किए पर सुधीर के संसर्ग में जो सुख मिलता है, वह उन कृत्रिम साधनों से नहीं मिलता.

वह महसूस कर रही है कि उम्र बढ़ने के साथसाथ उस की शारीरिक इच्छाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं और इसे ले कर वह मुखर भी है. अपनी हमउम्र स्त्रियों को देखती है, पति अगर हाथ बढ़ा कर उन्हें अपनी ओर खींच लेता है तो कभी मन से, कभी बेमन से उस की संतुष्टि में सहयोग दे देती हैं. वरना उन के शरीर में सैक्स करने की अकुलाहट है, ऐसी उन की बातों और हावभाव से नहीं लगता. बच्चे बड़े हो गए या जवान हो रहे बच्चों के बाद यह सब करना क्या अच्छा लगता है, यही जुमले उन्हें कहते सुना है.

कुछ दिन पहले ही नेहा कह रही थीं, ‘‘जब से मेरा बेटा बड़ा हुआ है, मैं पति के साथ नहीं सोती. आदमियों का क्या है, साथ लेटो तो हाथ चल ही जाते हैं यहांवहां. अच्छा थोड़े लगेगा अब वह सब करना,’’ बोलतेबोलते शरमा उठीं वह. वह भी तो 40 साल की होंगी. उन की शादी तो 18 साल में हो गई थी और वह भी लव मैरिज थी. पति के साथ खूब घूमा करती थीं शादी से पहले, अब उन का हाथ छू जाना उन्हें अखरने लगा है.

फिर कनु के साथ ऐसा क्यों नहीं हो रहा है? उस का शरीर क्यों हमेशा कसमसाता रहता है? क्यों वह अपने अंगों को शीशे के सामने खड़े हो निहारती रहती है? अपनी गोलाइयों को छू कर रश्क करती है और चाहती है कि सुधीर उस के अंगअंग पर चुंबनों की बौछार कर दे.

हालांकि समझाने वालों की कमी नहीं है. आखिर समझाना और सलाह देना सब से आसान काम जो ठहरा.

‘‘इतने दिनों तक बाहर रहते हैं दामादजी. लौटते हैं तब उन पर पैनी नजर रखा कर. उन का मन टटोलने की कोशिश किया कर. वह क्या है न बिटिया, मर्द जात है, उन्हें हम औरतों की तरह काबू में रहना थोड़े ही आता है. तन की भूख के आगे परिवार, निष्ठा, संस्कार सब हार जाते हैं. तुम सब पर जरूरत से ज्यादा विश्वास करती हो और दामादजी पर तो बहुत ज्यादा. अच्छी बात है, पति हैं तुम्हारे, लेकिन आदमी हैं, औरतों की तरह अपनी इच्छाओं पर उन्हें नियंत्रण करना नहीं आता है उन्हें. बाकी तुम समझदार हो, पढ़ी लिखी हो. उन का मन टटोल कर देखो. कहते हुए शर्म आती है बिटिया पर जब दामादजी दौरे से वापस आते हैं तो तुम्हारे आसपास ही डोलते हैं न? मानो चाहते हैं कि रात ही नहीं, दिन में भी तुम्हारे संगसाथ ही रहें. जो पतिपत्नी के बीच होता है उस के लिए पगलाए रहते हैं,’’ मां सबकुछ कह जाती हैं और दिखाती भी हैं कि यह सब कहने में उन्हें बहुत हिचकिचाहट होती है क्योंकि उन का रिश्ता ही ऐसा है खुल कर बात नहीं कर सकतीं.

उसे हंसी आ जाती मां की बात सुन, लेकिन बहुत गंभीरता से कहती, ‘‘हां मां, ध्यान

रखूंगी. बताती हूं आप को बाद में सब विस्तार से,’’ और वह फोन रख देती यह कह कर और मां को इस बात से तसल्ली हो जाती कि बिटिया खुश है, संतुष्ट है.

अनुराधा उस की खास दोस्त है. उन की दोस्ती कालेज के समय से चली आ रही है और बहुत से लोगों के लिए ईर्ष्या का कारण भी है. कालेज के पुराने साथी जो छूट चुके थे, यदाकदा उन से मुलाकात हो जाती या ढूंढ़ कर किसी का फोन नंबर किसी के हाथ लग जाता तो उन्हें यह जान कर बहुत आश्चर्य होता है कि शादी, दूसरे शहर में रहने और बच्चों और परिवार की या अपनी नौकरी की जिम्मेदारियों के बीच में आखिर हमारी दोस्ती अब तक कैसे कायम है. 2 शहरों की दूरी के बावजूद और अपनीअपनी गृहस्थियों में जुते रहने के बावजूद वही अनुराधा जो बिंदास ही नहीं कटटूकट बात करने के लिए प्रसिद्ध थी. यह प्रसिद्धि लोकप्रियता की नहीं, उस से चिढ़ने की वजह से ज्यादा थी क्योंकि उस का मुंह पर सच कहना, किसी के भी आत्मसम्मान को चोट पहुंचा देता था. ठीक भी तो है, आखिर किसे पसंद होता है अपने दिखावटी मुलम्मे को उतरते देखना, वह भी जबतब उसे कुरेदती रहती है.

‘‘जीजू वापस आ गए? खूब पलंग तोड़ रही होगी इन दिनों. पागलों की तरह टूट रहे होंगे तेरे ऊपर. यार तू कैसे रह लेती है इतने दिनों तक बिना सैक्स किए. अपन तो नहीं रह सकते. अच्छा बता तेरा पति कैसे रह लेता है इतने दिनों तक इस के बिना. कहीं बाहर कोई चक्कर तो नहीं.’’

वह जोर से हंसने लगती. कनु को फोन कान से हटा कर दूर करना पड़ता.

‘‘और क्या, जिसजिस शहर में जाते हैं एकएक घर वहां कंपनी ने सुधीर को खरीद कर दिया हुआ है और साथ ही हर जगह इन्होंने बीवियां भी रखी हुई हैं. अरबपति है मेरा पति और कामदेव का अवतार भी. उसे देखा नहीं कि अप्सराएं उस की गोद में बैठ कर अठखेलियां करने लगती हैं. हद है यार, कुछ भी बोल देती है,’’ वह रूठने का नाटक करती.

‘‘अरे मेरी जान, रूठ मत. तेरी चिंता में मरी रहती हूं, इसलिए कह दिया. खैर, अपना दिमाग मत खराब कर. ऐंजौय कर लाइफ,’’ फिर वह बिना बाय कहे या बात खत्म किए फोन रख देती.

हां, ऐंजौय ही तो कर रही है. वह लाइफ से खुश है. आखिर किस बात की कमी है? मां, सास, परिचित, रिश्तेदार सभी के हिसाब से वह सुखी है. पति खयाल रखता है, बच्चे होनहार हैं, घर में किसी चीज की कमी नहीं है. सब ठीक से चल रहा है, इस से ज्यादा एक स्त्री को चाहिए भी क्या? अपनी गृहस्थी संभालो, खाओपीओ, मौज करो. भारतीय परिवारों की अधिकांश लड़कियां विवाह के बाद ऐसा ही जीवन पाने की तो कामना करती हैं.

जब पति चाहे तब अपना शरीर उसे सौंप दो, खुद आगे बढ़ कर उस के शरीर से

खेलने की इच्छा रखना उफ, ज्यादा ही कामुक स्त्री होगी या बिगड़ी हुई. आखिर जो स्त्री अपनी इच्छाओं पर काबू न रख सके खासकर शारीरिक इच्छाओं पर, उसे गंदी सोच वाली ही कहा जाएगा. संतुष्ट होना सीखना चाहिए, स्त्रियों को करना पड़ता है, करना भी चाहिए. वह पुरुष की तरह खुल कर सहवास करने की बात नहीं कह सकती, उसे इस तरह से पाला नहीं जाता. उसे तो पति से प्रेम भी लुकछिप कर करना चाहिए. बहुत ही दबे स्वरों में व्यक्त करना चाहिए. बिंदास हो कर नहीं.

कनु अगर अपनी इच्छाओं पर काबू नहीं रख पा रही और पति के साथ संबंध बनाना चाहती है तो वह क्या गलत है? उसे याद आया किसी पत्रिका में पढ़ा था या शायद कोई अपने सामने हजारों की संख्या में बैठी महिलाओं को टीवी पर प्रवचन दे रहा था कि जो स्त्री अपनी शारीरिक इच्छाओं को दबाना नहीं जानती, वह चरित्रहीन होती है.

पति के सामने सहवास करने की इच्छा जाहिर करना चरित्रहीन होने की निशानी है.

हंसी आ गई कनु को. सच ही तो लड़कियों को तो बचपन से ही अपनी इच्छाओं को मारना, उन से लड़ने की सीख दी जाती है. चलो यही सही.

वह सुधीर के पास जा कर खड़ी हो गई. एकदम पास, ‘‘कल तुम फिर टूर पर निकल जाओगे. ऐसे नहीं जाने दूंगी,’’ और फिर सुधीर का लैपटौप बंद कर वह उस के गालों को चूमने लगी, उस के होंठों को अपने होंठों में कैद कर लिया. कनु पूरी तरह से सुधीर पर छा गई थी.

नहीं मारेगी वह अपनी इच्छाओं को चाहे कोई उसे बिगड़ी हुई ही क्यों न समझे.

Family Drama : बदली परिपाटी – मयंक को आखिर कैसी सजा मिली

Family Drama : लगता है रात में जतिन ने फिर बहू पर हाथ उठाया. मुझ से यह बात बरदाश्त नहीं होती. बहू की सूजी आंखें और शरीर पर पड़े नीले निशान देख कर मेरा दिल कराह उठता है. मैं कसमसा उठता हूं, पर कुछ कर नहीं पाता. काश, पूजा होती और अपने बेटे को समझाती पर पूजा को तो मैं ने अपनी ही गलतियों से खो दिया है.

यह सोचतेसोचते मेरे दिमाग की नसें फटने लगी हैं. मैं अपनेआप से भाग जाना चाहता हूं. लेकिन नहीं भाग सकता, क्योंकि नियति द्वारा मेरे लिए सजा तय की गई है कि मैं पछतावे की आग में धीरेधीरे जलूं.

‘‘अंतरा, मैं बाजार की तरफ जा रहा हूं, कुछ मंगाना तो नहीं.’’

‘‘नहीं पापाजी, आप हो आइए.’’ मैं चल पड़ा यह सोच कर कि कुछ देर बाहर निकलने से शायद मेरा मन थोड़ा बहल जाए. लेकिन बाहर निकलते ही मेरा मन अतीत के गलियारों में भटकने लगा…

‘मुझ से जबान लड़ाती है,’ एक भद्दी सी गाली दे कर मैं ने उस पर अपना क्रोध बरसा दिया.

‘आह…प्लीज मत मारो मुझे, मेरे बच्चे को लग जाएगी, दया करो. मैं ने आखिर किया क्या है?’ उस ने झुक कर अपनी पीठ पर मेरा वार सहन करते हुए कहा.

कोख में पल रहे बच्चे पर वह आंच नहीं आने देना चाहती थी. लेकिन मैं कम क्रूर नहीं था. बालों से पकड़ते हुए उसे घसीट कर हौल में ले आया और अपनी बैल्ट निकाल ली. बैल्ट का पहला वार होते ही जोरों की चीख खामोशी में तबदील होती चली गई. वह बेहोश हो चुकी थी.

‘पागल हो गया क्या, अरे, उस के पेट में तेरी औलाद है. अगर उसे कुछ हो गया तो?’ मां किसी बहाने से उसे मेरे गुस्से से बचाना चाहती थीं.

‘कह देना इस से, भाड़े पर लड़कियां लाऊं या बियर बार जाऊं, यह मेरी अम्मा बनने की कोशिश न करे वरना अगली बार जान से मार दूंगा,’ कहते हुए मैं ने 2 साल के नन्हे जतिन को धक्का दिया, जो अपनी मां को मार खाते देख सहमा हुआ सा एक तरफ खड़ा था. फिर गाड़ी उठाई और निकल पड़ा अपनी आवारगी की राह.

उस पूरी रात मैं नशे में चूर रहा. सुबह के 6 बज रहे होंगे कि पापा के एक कौल ने मेरी शराब का सारा नशा उतार दिया. ‘कहां है तू, कब से फोन लगा रहा हूं. पूजा ने फांसी लगा ली है. तुरंत आ.’ जैसेतैसे घर पहुंचा तो हताश पापा सिर पर हाथ धरे अंदर सीढि़यों पर बैठे थे और मां नन्हे जतिन को चुप कराने की बेहिसाब कोशिशें कर रही थीं.

अपने बैडरूम का नजारा देख मेरी सांसें रुक सी गईं. बेजान पूजा पंखे से लटकी हुई थी. मुझे काटो तो खून नहीं. मांपापा को समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए. पूजा ने अपने साथ अपनी कोख में पल रहे मेरे अंश को भी खत्म कर लिया था. पर इतने खौफनाक माहौल में भी मेरा शातिर दिमाग काम कर रहा था. इधरउधर खूब ढूंढ़ने के बाद भी पूजा की लिखी कोई आखिरी चिट्ठी मुझे नहीं मिली.

पुलिस को देने के लिए हम ने एक ही बयान को बारबार दोहराया कि मां की बीमारी के चलते उसे मायके जाने से मना किया तो जिद व गुस्से में आ कर उस ने आत्महत्या कर ली. वैसे भी मेरी मां का सीधापन पूरी कालोनी में मशहूर था, जिस का फायदा मुझे इस केस में बहुत मिला. कुछ दिन मुझे जरूर लौकअप में रहना पड़ा, लेकिन बाद में सब को देदिला कर इस मामले को खत्म करने में हम ने सफलता पाई, क्योंकि पूजा के मायके में उस की खैरखबर लेने वाला एक शराबी भाई ही था जिसे अपनी बहन को इंसाफ दिलाने में कोई खास रुचि न थी.

थोड़ी परेशानी से ही सही, लेकिन 8-10 महीने में केस रफादफा हो गया पर मेरे जैसा आशिकमिजाज व्यक्ति ऐसे समय में भी कहां चुप बैठने वाला था. इस बीच मेरी रासलीला मेरे एक दोस्त की बहन लिली से शुरू हो गई. लिली का साथ मुझे खूब भाने लगा, क्योंकि वह भी मेरी तरह बिंदास थी. पूजा की मौत के डेढ़ साल के भीतर ही हम ने शादी कर ली. वह तो शादी के बाद पता चला कि मैं सेर, तो वह सवा सेर है. शादी होते ही उस ने मुझे सीधे अपनी अंटी में ले लिया.

बदतमीजी, आवारगी, बदचलनी आदि गुणों में वह मुझ से कहीं बढ़ कर निकली. मेरी परेशानियों की शुरुआत उसी दिन हो गई जिस दिन मैं ने पूजा समझ कर उस पर पहली बार हाथ उठाया. मेरे उठे हाथ को हवा में ही थाम उस ने ऐसा मरोड़ा कि मेरे मुंह से आह निकल गई. उस के बाद मैं कभी उस पर हाथ उठाने की हिम्मत न कर पाया.

घर के बाहर बनी पुलिया पर आसपास के आवारा लड़कों के साथ बैठी वह सिगरेट के कश लगाती जबतब कालोनी के लोगों को नजर आती. अपने दोस्तों के साथ कार में बाहर घूमने जाना उस का प्रिय शगल था. रात को वह शराब के नशे में धुत हो घर आती और सो जाती. मैं ने उसे अपने झांसे में लेने की कई नाकाम कोशिशें कीं, लेकिन हर बार उस ने मेरे वार का ऐसा प्रतिवार किया कि मैं बौखला गया. उस ने साफ शब्दों में मुझे चेतावनी दी कि अगर मैं ने उस से उलझने की कोशिश की तो वह मुझे मरवा देगी या ऐसा फंसाएगी कि मेरी जिंदगी बरबाद हो जाएगी. मैं उस के गदर से तभी तक बचा रहता जब तक कि उस के कामों में हस्तक्षेप न करता.

तो इस तरह प्रकृति के न्याय के तहत मैं ने जल्द ही वह काटा, जो बोया था. घर की पूरी सत्ता पर मेरी जगह वह काबिज हो चुकी थी. शादी के सालभर बाद ही मुझ पर दबाव बना कर उस ने पापा से हमारे घर को भी अपने नाम करवा लिया. और फिर हमारा मकान बेच कर उस ने पौश कालोनी में एक फ्लैट खरीदा और मुझे व जतिन को अपने साथ ले गई. मेरे मम्मीपापा मेरी बहन यानी अपनी बेटी के घर में रहने को मजबूर थे. यह सब मेरी ही कारगुजारियों की अति थी जो आज सबकुछ मेरे हाथ से मुट्ठी से निकली रेत की भांति फिसल चुका था.

अपना मकान बिकने से हैरानपरेशान पापा इस सदमे को न सह पाने के कारण हार्टअटैक के शिकार हो महीनेभर में ही चल बसे. उन के जाने के बाद मेरी मां बिलकुल अकेली हो गईं. प्रकृति मेरे कर्मों की इतनी जल्दी और ऐसी सजा देगी, मुझे मालूम न था.

नए घर में शिफ्ट होने के बाद भी उस के क्रियाकलाप में कोई खास अंतर नहीं आया. इस बीच 5 साल के हो चुके जतिन को उस ने पूरी तरह अपने अधिकार में ले लिया. उस के सान्निध्य में पलताबढ़ता जतिन भी उस के नक्शेकदम पर चल पड़ा. पढ़ाईलिखाई से उस का खास वास्ता था नहीं. जैसेतैसे 12वीं कर उस ने छोटामोटा बिजनैस कर लिया और अपनी जिंदगी पूरी तरह से उसी के हवाले कर दी. उन दोनों के सामने मेरी हैसियत वैसे भी कुछ नहीं थी. किसी समय अपनी मनमरजी का मालिक मैं आजकल उन के हाथ की कठपुतली बन, बस, उन के रहमोकरम पर जिंदा था.

इसी रफ्तार से जिंदगी के कुछ और वर्ष बीत गए. इस बीच लिली एक भयानक बीमारी एड्स की चपेट में आ गई और अपनेआप में गुमसुम पड़ी रहने लगी. अब घर की सत्ता मेरे बेटे जतिन के हाथों में आ गई. हालांकि इस बदलाव का मेरे लिए कोई खास मतलब नहीं था. हां, जतिन की शादी होने पर उस की पत्नी अंतरा के आने से अलबत्ता मुझे कुछ राहत जरूर हो गई, क्योंकि मेरी बहू भी पूजा जैसी ही एक नेकदिल इंसान थी.

वह लिली की सेवा जीजान से करती और जतिन को खुश करने की पूरी कोशिश भी. पर जिस की रगों में मेरे जैसे गिरे इंसान का लहू बह रहा हो, उसे भला किसी की अच्छाई की कीमत का क्या पता चलता. सालभर पहले लिली ने अपनी आखिरी सांस ली. उस वक्त सच में मन से जैसे एक बोझ उतर गया और मेरा जीवन थोड़ा आसान हो गया.

इस बीच, जतिन के अत्याचार अंतरा के प्रति बढ़ते जा रहे थे. लगभग रोज रात में जतिन उसे पीटता और हर सुबह अपने चेहरे व शरीर की सूजन छिपाने की भरसक कोशिश करते हुए वह फिर से अपने काम पर लग जाती. कल रात भी जतिन ने उस पर अपना गुस्सा निकाला था.

मुझे समझ नहीं आता था कि आखिर वह ये सब क्यों सहती है, क्यों नहीं वह जतिन को मुंहतोड़ जवाब देती, आखिर उस की क्या मजबूरी है? तमाम बातें मेरे दिमाग में लगातार चलतीं. मेरा मन उस के लिए इसलिए भी परेशान रहता क्योंकि इतना सबकुछ सह कर भी वह मेरा बहुत ध्यान रखती थी. कभीकभी मैं सोच में पड़ जाता कि आखिर औरत एक ही समय में इतनी मजबूत और मजबूर कैसे हो सकती है?

ऐसे वक्त पर मुझे पूजा की बहुत याद आती. अपने 4 वर्षों के वैवाहिक जीवन में मैं ने एक पल भी उसे सुकून का नहीं दिया. शादी की पहली रात जब सजी हुई वह छुईमुई सी मेरे कमरे में दाखिल हुई थी, तो मैं ने पलभर में उसे बिस्तर पर घसीट कर उस के शरीर से खेलते हुए अपनी कामवासना शांत की थी.

काश, उस वक्त उस के रूपसौंदर्य को प्यारभरी नजरों से कुछ देर निहारा होता, तारीफ के दो बोल बोले होते तो वह खुशी से अपना सर्वस्व मुझे सौंप देती. उस घर में आखिर वह मेरे लिए ही तो आई थी. पर मेरे लिए तो प्यार की परिभाषा शारीरिक भूख से ही हो कर गुजरती थी. उस दौरान निकली उस की दर्दभरी चीखों को मैं ने अपनी जीत समझ कर उस का मुंह अपने हाथों से दबा कर अपनी मनमानी की थी. वह रातों में मेरे दिल बहलाने का साधनमात्र थी. और फिर जब वह गर्भवती हुई तो मैं दूसरों के साथ इश्क लड़ाने लगा, क्योंकि वह मुझे वह सुख नहीं दे पा रही थी. वह मेरे लिए बेकार हो चुकी थी. इसलिए मुझे ऐसा करने का हक था, आखिर मैं मर्द जो था. मेरी इस सोच ने मुझे कभी इंसान नहीं बनने दिया.

हे प्रकृति, मुझे थोड़ी सी तो सद्बुद्धि देती. मैं ने उसे चैन से एक सांस न लेने दी. अपनी गंदी हरकतों से सदा उस का दिल दुखाया. उस की जिंदगी को मैं ने वक्त से पहले खत्म कर दिया.

उस दिन उस ने आत्महत्या भी तो मेरे कारण ही की थी, क्योंकि उसे मेरे नाजायज संबंधों के बारे में पता चल गया था और उस की गलती सिर्फ इतनी थी कि इस बारे में मुझ से पूछ बैठी थी. बदले में मैं ने जीभर कर उस की धुनाई की थी. ये सब पुरानी यादें दिमाग में घूमती रहीं और कब मैं घर लौट आया पता ही नहीं चला.

‘‘पापा, जब आप मार्केट गए थे. उस वक्त बूआजी आई थीं. थोड़ी देर बैठीं, फिर आप के लिए यह लिफाफा दे कर चली गईं.’’ बाजार से आते ही अंतरा ने मुझे एक लिफाफा पकड़ाया.

‘‘ठीक है बेटा,’’ मैं ने लिफाफा खोला. उस में एक छोटी सी चिट और करीने से तह किया हुआ एक पन्ना रखा था. चिट पर लिखा था, ‘‘मां के जाने के सालों बाद आज उन की पुरानी संदूकची खोली तो यह खत उस में मिला. तुम्हारे नाम का है, सो तुम्हें देने आई थी.’’ बहन की लिखावट थी. सालों पहले मुझे यह खत किस ने लिखा होगा, यह सोचते हुए कांपते हाथों से मैं ने खत पढ़ना शुरू किया.

‘‘प्रिय मयंक,

‘‘वैसे तो तुम ने मुझे कई बार मारा है, पर मैं हमेशा यह सोच कर सब सहती चली गई कि जैसे भी हो, तुम मेरे तो हो. पर कल जब तुम्हारे इतने सारे नाजायज संबंधों का पता चला तो मेरे धैर्य का बांध टूट गया. हर रात तुम मेरे शरीर से खेलते रहे, हर दिन मुझ पर हाथ उठाते रहे. लेकिन मन में एक संतोष था कि इस दुखभरी जिंदगी में भी एक रिश्ता तो कम से कम मेरे पास है. लेकिन जब पता चला कि यह रिश्ता, रिश्ता न हो कर एक कलंक है, तो इस कलंक के साथ मैं नहीं जी सकती. सोचती थी, कभी तो तुम्हारे दिल में अपने लिए प्यार जगा लूंगी. लेकिन अब सारी उम्मीदें खत्म हो चुकी हैं. मायके में भी तो कोई नहीं है, जिसे मेरे जीनेमरने से कोई सरोकार हो. मैं अपनी व्यथा न ही किसी से बांट सकती हूं और न ही उसे सह पा रही हूं. तुम्हीं बताओ फिर कैसे जिऊं. मेरे बाद मेरे बच्चों की दुर्दशा न हो, इसलिए अपनी कोख का अंश अपने साथ लिए जा रही हूं. मासूम जतिन को मारने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. खुश रहो तुम, कम से कम जतिन को एक बेहतर इंसान बनाना. जाने से पहले एक बात तुम से जरूर कहना चाहूंगी. ‘मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं.’

‘‘तुम्हारी चाहत के इंतजार में पलपल मरती…

तुम्हारी पूजा.’’

पूरा पत्र आंसुओं से गीला हो चुका था, जी चाह रहा था कि मैं चिल्लाचिल्ला कर रो पड़ूं. ओह, पूजा माफ कर दे मुझे. मैं इंसान कहलाने के काबिल नहीं, तेरे प्यार के काबिल भला क्या बनूंगा. हे प्रकृति, मेरी पूजा को लौटा दे मुझे, मैं उस के पैर पकड़ कर अपने गुनाहों की माफी तो मांग लूं उस से. लेकिन अब पछताए होत क्या, जब चिडि़या चुग गई खेत.

भावनाओं का ज्वार थमा तो कुछ हलका महसूस हुआ. शायद मां को पूजा का यह सुसाइड लैटर मिला हो और मुझे बचाने की खातिर यह पत्र उन्होंने अपने पास छिपा कर रख लिया हो. यह उन्हीं के प्यार का साया तो था कि इतना घिनौना जुर्म करने के बाद भी मैं बच गया. उन्होंने मुझे कालकोठरी की सजा से तो बचा लिया, परंतु मेरे कर्मों की सजा तो नियति से मुझे मिलनी ही थी और वह किसी भी बहाने से मुझे मिल कर रही.

पर अब सबकुछ भुला कर पूजा की वही पंक्ति मेरे मन में बारबार आ रही थी, ‘‘कम से कम जतिन को एक बेहतर इंसान बनाना.’’ अंतरा के मायके में भी तो उस की बुजुर्ग मां के अलावा कोई नहीं है. हो सकता है इसलिए वह भी पूजा की तरह मजबूर हो. पर अब मैं मजबूर नहीं बनूंगा…कुछ सोच कर मैं उठ खड़ा हुआ. अंतरा को आवाज दी.

‘‘जी पापा,’’ कहते हुए अंतरा मेरे सामने मौजूद थी. बहुत देर तक मैं उसे सबकुछ समझाता रहा और वह आंखें फाड़फाड़ कर मुझे हैरत से देखती रही. शायद उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जतिन का पिता होने के बावजूद मैं उस का दर्द कैसे महसूस कर रहा हूं या उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि अचानक मैं यह क्या और क्यों कर रहा हूं, क्योंकि वह मासूम तो मेरी हकीकत से हमेशा अनजान थी.

पास के पुलिसस्टेशन पहुंच कर मैं ने अपनी बहू पर हो रहे अत्याचार की धारा के अंतर्गत बेटे जतिन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. मेरे कहने पर अंतरा ने अपने शरीर पर जख्मों के निशान उन्हें दिखाए, जिस से केस पुख्ता हो गया. थोड़ा वक्त लगा, लेकिन हम ने अपना काम कर दिया था. आगे का काम पुलिस करेगी. जतिन को सही राह पर लाने का एक यही तरीका मुझे कारगर लगा, क्योंकि सिर्फ मेरे समझानेभर से बात उस के पल्ले नहीं पड़ेगी. पुलिस, कानून और सजा का खौफ ही अब उसे सही रास्ते पर ला सकता है.

पूजा के चिट्ठी में कहे शब्दों के अनुसार, मैं उसे रिश्तों की इज्जत करना सिखाऊंगा और एक अच्छा इंसान बनाऊंगा, ताकि फिर कोई पूजा किसी मयंक के अत्याचारों से त्रस्त हो कर आत्महत्या करने को मजबूर न हो. औटो में वापसी के समय अंतरा के सिर पर मैं ने स्नेह से हाथ फेरा. उस की आंखों में खौफ की जगह अब सुकून नजर आ रहा था. यह देख मैं ने राहत की सांस ली.

Best Hindi Story : ठीक हो गए समीकरण

Best Hindi Story : ‘‘प्रैक्टिकल होने का क्या फायदा? लौजिक बेकार की बात है. प्रिंसिपल जीवन में क्या दे पाते हैं? सिद्धांत केवल खोखले लोगों की डिक्शनरी के शब्द होते हैं, जो हमेशा डरडर कर जीवन जीते हैं. सचाई, ईमानदारी सब किताबी बातें हैं. आखिर इन का पालन कर के तुम ने कौन से झंडे गाड़ लिए,’’ सुकांत लगातार बोले जा रहा था और उसे लगा जैसे वह किसी कठघरे में खड़ी है. उस के जीवन यहां तक कि उस के वजूद की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. सारे समीकरण गलत व बेमानी साबित करने की कोशिश की जा रही है.

‘‘जो तुम कमिटमैंट की बात करती हो वह किस चिडि़या का नाम है… आज के जमाने में कमिटमैंट मात्र एक खोखले शब्द से ज्यादा और कुछ नहीं है. कौन टिकता है अपनी बात पर? अपने हित की न सोचो तो अपने सगे भी धोखा देते हैं और तुम हो कि सारी जिंदगी यही राग अलापती रहीं कि जो कहो, उसे पूरा करो.’’

‘‘तुम कहना चाहते हो कि झूठ और बेईमान ही केवल सफल होते हैं,’’ सुकांत की

इतनी कड़वी बातें सुनने के बावजूद वह उस की संकीर्ण मानसिकता के आगे झुकने को तैयार नहीं थी. आखिर कैसे वह उस की जिंदगी के सारे फलसफे को झुठला सकता है? जिस आदमी को उस ने अपनी जिंदगी के 25 साल दिए हैं, वही आज उस का मजाक उड़ा रहा है, उस की मेहनत, उस के काम और कबिलीयत सब को इस तरह से जोड़घटा रहा है मानो इन सब चीजों का आकलन कैलकुलेटर पर किया जाता हो. हालांकि जिस तरह से सुकांत की कनविंस व मैनीपुलेट करने की क्षमता है, उस के सामने कुछ पल के लिए तो उस ने भी स्वयं को एक फेल्योर के दर्जे में ला खड़ा किया था.

‘‘अगर तुम ने यह ईमानदारी और मेहनत का जामा पहनने के बजाय चापलूसी और डिप्लोमैसी से काम लिया होता तो आज अपने कैरियर की बुलंदियों को छू रही होती. सोचो तो उम्र के इस पड़ाव पर तुम कहां हो और तुम से जूनियर कहां निकल गए हैं. अचार डालोगी अपनी काबिलीयत का जब कोई पूछने वाला ही नहीं होगा,’’ सुकांत के चेहरे पर एक बीभत्सता छा गई थी. लग रहा था कि आज वह उस का अपमान करने को पूरी तरह से तैयार था. अपनी हीनता को छिपाने का इस से अच्छा तरीका और हो भी क्या सकता था उस के लिए कि वह उस के सम्मान के चीथड़े कर दे.

‘‘फिर तो तुम्हारे हिसाब से मैं ने जो ईमानदारी और पूर्ण समर्पण के साथ तुम्हारे साथ अपना रिश्ता निभाया, वह भी बेमानी है. मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था,’’ उस ने थोड़ी तलखी से कहा.

‘‘मैं रिश्ते की बात नहीं कर रहा. दोनों चीजों को साथ न जोड़ो. मैं तुम्हारे कैरियर के बारे में बात कर रहा हूं,’’ सुकांत जैसे हर तरह से मोरचा संभाले था.

‘‘क्यों, यह बात तो हर चीज पर लागू होनी चाहिए. तुम अपने हिसाब से जब चाहो मानदंड तय नहीं कर सकते… और जहां तक मेरी बात है तो मैं अपने से संतुष्ट हूं खासकर अपने कैरियर से. तुम ने कभी न तो मुझे मान दिया है और न ही दे सकते हो, क्योंकि तुम्हारी मानसिकता में ऐसा करना है ही नहीं. किसे बरदाश्त कर सकते हो तुम,’’ न जाने कब का दबा आक्रोश मानो उस समय फूट पड़ा था. वह खुद हैरान थी कि आखिर उस में इतनी हिम्मत आ कहां से गई.

‘‘ज्यादा बकवास मत करो नीला, कहीं मेरा धैर्य न चुक जाए,’’ बौखला गया था सुकांत. इतना सीधा प्रहार इस से पहले नीला ने उस पर कभी नहीं किया था.

‘‘तुम्हारा धैर्य तो हमेशा बुलबुलों की तरह धधकता रहा है… मारोगे? गालियां दोगे? इस के सिवा तुम कर भी क्या सकते हो? अच्छा यही होगा हम इस बारे में और बात न करें,’’ नीला बात को आगे नहीं बढ़ाना चाहती थी. फायदा भी कुछ नहीं था. सुकांत जब पिछले 24 सालों में नहीं बदला तो अब क्या बदलेगा. जो अपनी पत्नी की इज्जत करना न जानता हो, उस से बहस करने से कुछ हासिल नहीं होने वाला था.

नीला को बस इसी बात का अफसोस था कि वह अपने बेटे को सुकांत के इन्फलुएंस से बचा नहीं पाई थी. पता नहीं क्यों नीरव को हमेशा लगता था कि पापा ही ठीक हैं. संस्कारों की जो पोटली उस ने बचपन में नीरव को सौंपी थी वह उस ने बड़े होने के साथ ही कहीं दुछती पर पटक दी थी. उस के बाद उसे कभी खोलने की कोशिश नहीं की. वह बहुत समझाती कि नीरव खुद अपनी आंखों से दुनिया देखो, पापा के चश्मे से नहीं. पर वह भी उस की बेइज्जती कर देता. उस की बात अनसुनी कर पापा के खेमे में शामिल हो जाता. वह मनमसोस कर रह जाती. स्कूलकालेज और उस के बाद अब नौकरी में भी वह पापा के बताए रास्ते पर ही चल रहा है.

अपने बेटे को गलत रास्ते पर जाते देखने के बावजूद वह कुछ नहीं कर पा रही थी.

उस पीड़ा को वह दिनरात सह रही थी और नीरव की जिंदगी को ले कर ही वह उस समय सुकांत से लड़ पड़ी थी. विडंबना तो यह थी कि नीरव की बात करने के बजाय सुकांत उस की जिंदगी के पन्नों को ही उलटनेपलटने लगा था. यह सच था कि वह डिप्लोमैसी से सदा दूर रही और सिर्फ काम पर ही उस ने ध्यान दिया और इस वजह से वह बहुत तेजी से उन लोगों की तुलना में कामयाबी की सीढि़यां नहीं चढ़ पाई जो खुशामद और चालाकी की फास्ट स्पीड ट्रेन में बैठ आगे निकल गए थे. लेकिन उसे अफसोस नहीं था, क्योंकि उस की ईमानदारी ने उसे सम्मान दिलाया था.

कई बार सुकांत के रवैए को देख कर उस का भी विश्वास डगमगा जाता था पर वह संभल जाती थी या शायद उस की प्रवृत्ति में ही नहीं था किसी को धोखा देना.

‘‘और जो तुम नीरव को ले कर मुझे हमेशा ताना मारती रहती हो न, देखना एक दिन वह बहुत तरक्की करेगा. सही राह पर चल रहा है वह. बिलकुल वैसे ही जैसे आज के जमाने की जरूरत है. लोगों को धक्का न दो तो वे आप को धकेल कर आगे निकल जाते हैं.’’

नीला का मन कर रहा था कि वह जोरजोर से रोए और उस से कहे कि वह नीरव को मुहरा न बनाए. नीला को परास्त करने का मुहरा. सुकांत उसे देख रहा था मानो उस का उपहास उड़ा रहा हो.

कितनी देर हो गई है, नीरव क्यों नहीं आया अब तक. परेशान सी नीला बरामदे के चक्कर लगाने लगी. रात के 10 बज रहे थे. मोबाइल भी कनैक्ट नहीं हो रहा था उस का. मन में अनगिनत बुरे विचार चक्कर काटने लगे. कहीं कुछ हो तो नहीं गया… औफिस में भी कोई फोन नहीं उठा रहा था. सुकांत को तो शराब पीने के बाद होश ही नहीं रहता था. वह सो चुका था.

अचानक नीला का मोबाइल बजा. कोई अंजान नंबर था. फोन रिसीव करते हुए उस के हाथ थरथराए.

‘‘नीरव के घर से बोल रहे हैं?’’

नीला के मन की बुरी आशंकाएं फिर से सिर उठाने लगीं, ‘‘क्या हुआ उसे, वह ठीक तो है न? आप कौन बोल रहे हैं?’’ उस का स्वर कांप रहा था.

‘‘वैसे तो वे ठीक हैं, पर फिलहाल जेल में हैं, उन्हें अरैस्ट किया गया है. अपनी कंपनी में कोई घोटाला किया है उन्होंने. कंपनी के मालिक के कहने पर उन्हें हिरासत में ले लिया गया है.’’

तभी लाइन पर नीरव के दोस्त समर की आवाज सुनाई दी, ‘‘आंटी मैं हूं नीरव के साथ. बस आप अंकल को भेज दीजिए. उस की जमानत हो जाएगी.’’

पूरी रात जेल में बीती उन तीनों की. नीला को नीरव को सलाखों के पीछे खड़ा देख लग रहा था कि वह सचमुच एक फेल्योर है. हैरानी की बात थी कि सुकांत एकदम चुप थे. न नीरव से, न ही नीला से कुछ कहा, बस उस की जमानत कराने की कोशिश में लगे रहे.

नीला को लगा नीरव को कुछ भलाबुरा कहना ठीक नहीं होगा. उस के चेहरे पर पछतावा और शर्मिंदगी साफ झलक रही थी. शायद मां ने उसे जो ईमानदारी का पाठ बचपन में सिखाया था, उसे ही वह आज मन ही मन दोहरा रहा था.

शाम हो गई थी उन्हें लौटतेलौटते. अपने को घसीटते हुए, अपनी सोच के दायरों में चक्कर काटते हुए तीनों ही इतने थक चुके थे कि उन के शब्द भी मौन हो गए थे या शायद कभीकभी चुप्पी ही सब से बड़ा मरहम बन जाती है.

‘‘मुझे माफ कर दो मां,’’ नीरव उस की गोद में सिर रख कर सुबक उठा.

‘‘तू क्यों माफी मांग रहा है? गलती तो मेरी है. मैं ने ही तेरे मन में बेईमानी के बीज बोए, तुझे तरक्की करने के गलत रास्ते पर डाला. आज जो भी कुछ हुआ उस का जिम्मेदार मैं ही हूं और नीला मैं तुम्हारा भी गुनहगार हूं. सारी उम्र तुम्हें तिरस्कृत करता रहा, तुम्हारा उपहास उड़ाता रहा. सारे समीकरण गलत साबित कर दिए थे मैं ने. प्रिंसिपल ही जीवन में सब कुछ होते हैं, सिद्धांत खोखले लोगों की डिक्शनरी के शब्द नहीं वरन जीवन जीने का तरीका है. सचाई, ईमानदारी किताबी बातें नहीं हैं,’’ सुकांत लगातार बोले जा रहा था और नीला की आंखों से आंसू बहते जा रहे थे.

नीरव को जब उस ने सीने से लगाया तो लगा सच में आज उस की ममता जीत गई है. उस का खोया बेटा उसे मिल गया है. सारे समीकरण ठीक हो गए थे उस की जिंदगी के.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें