Stories : मोहिनी देवी अपने दरवाजे के पास औटो से उतरीं और मुख्य दरवाजा खोलने के लिए दरवाजे के पास आ कर एक बार अपने चारों तरफ देखा. आसपास के लोग उन्हें बहुत अजीब नजरों से देख रहे थे और एकदूसरे को देख कर व्यंग्यात्मक ढंग से मुसकरा रहे थे.
बगल के मकान में रहने वाली विमला ने तो सामने वाली सीमा से कहा भी, ‘‘यह देखो आ गई जेल से छूट कर. क्या शान से आई है. लगता है कहीं से पुरस्कार जीत कर आई हो. कैसेकैसे लोग हैं, हम कितना अच्छा समझते थे इन्हें पर ये दहेज की लालची निकलीं. बहू को सताती हैं, दहेज मांगती हैं और नहीं देने पर घर से निकाल देती हैं, उस के के सारे जेवर रख लेती हैं, कैसी हैं ये. ऐसे लोगों का तो चेहरा देखना भी गुनाह है.’’
मोहिनी देवी की आंखें भर आईं. कांपते हाथों से दरवाजा खोला और अपने बगीचे में आ कर जमीन में ही बैठ गईं. बाहर से लोगों की शर्मनाक टिप्पणियां आ कर कानों में पिघले शीशे के समान जलन दे रही थीं. थोड़ी देर बाद मुख्य दरवाजा खोला, भीतर जा कर सोफे पर बैठ कर आंखें बंद कर लीं. उन की आंखों से झरझर आंसू बह रहे थे. उन्हें 6 महीने पहले का दृश्य याद आ रहा था…
6 महीने पहले तक यही पड़ोसी उन की कितनी तारीफ करते थे. उन्होंने किस की समय पर मदद नहीं की. यही पड़ोसी उन के मददगार स्वभाव और मृदु व्यवहार की तारीफ करते थकते नहीं थे. लेकिन इन 6 महीनों में क्या से क्या हो गया. आज किसी को उन की सचाई पर विश्वास नहीं रहा. हाय रे निष्ठुर संसार. कितनी उमंग से उन्होंने बेटे रंजन की शादी की थी. रंजन के लिए लड़की पूनम का पता उन की मौसी की बेटी ने दिया था.
इन सभी को एक नजर में ही पूनम पसंद आ गई थी. परिवार तो इनकी मेल का नहीं था
परंतु लड़की पढ़ीलिखी और खूबसूरत थी, इसलिए उन्होंने एक बार में ही सबकुछ तय कर लिया. दहेज की मांग तो नहीं की और सामान लेने से भी स्पष्ट इनकार कर दिया. इतना ही नहीं शादी में भी बरात का अधिकतर खर्चा इन्होंने ही दिया था क्योंकि पूनम के मातापिता ने अधिक बरात का स्वागत करने में अपनी असमर्थता जताई थी.
पूनम के आने के बाद सब ने उसे हाथोंहाथ लिया. कभी किसी तरह के काम का दबाव भी उस पर नहीं रहा. उस की हर इच्छा पूरी की जाती थी. मोहिनी देवी के बच्चे भी बहुत शांत और सभ्य स्वभाव के थे. पिता के जाने के बाद रंजन ने बहुत ही कुशलता से उन के व्यापार को संभाला था और आगे बढ़ाया था. बेटी नीना बीए फाइनल में पढ़ रही थी. उन्हें लगा बेटी की शादी के पहले घर में बहू आ जाए तो सबकुछ अच्छे से संभाल लेगी.
पूनम ने आ कर प्रारंभ में सबकुछ अच्छे से किया भी था. उन्हें बस एक ही कमी पूनम में दिखती, उसे शायद पहननेओढ़ने का कोई शौक नहीं था. इन की दी कीमती साडि़यां और गहने सब उस के पास ऐसे ही पड़े रहते थे. कई बार कहने के बाद भी नहीं पहनती, एक वाक्य में जवाब दे देती, ‘‘मां, मंगलसूत्र तो पहनी हूं. कान के टौप्स भी पहने हूं. ज्यादा जेवर भारी लगते हैं.’’
सास खामोश रह जातीं. एक बार किसी रिश्तेदार की शादी में जाने पर पूनम ने पतला सैट पहना था. उसे देख कर मोहिनी देवी ने कहा, ‘‘पूनम, भारी वाला नैकलैस पहन लो, शादी में जा रही हो पतला अच्छा नहीं लगेगा.’’
पूनम ने कहा, ‘‘अंदर रखा हुआ है निकालने में समय लगेगा.’’
मोहिनी देवी ने उसे एक दूसरा भारी सैट निकाल कर दिया पहनने को.
पूनम ने आश्चर्यचकित हो कर कहा, ‘‘अरे यह तो बिलकुल मेरे नैकलैस की कौपी है.’’
नीना ने कहा, ‘‘हां भाभी मां जब भी कोई जेवर बनवाती थी तो एकजैसा 2 लेती थीं एक तुम्हारे लिए और एक मेरे लिए. उन का कहना था कि बहू और बेटी दोनों को सबकुछ बराबर देंगे. बिलकुल एकजैसे ही हैं आप के और मेरे जेवर. आप के आप को दे दिए और मेरे रखे हुए हैं मां ने अपने पास. वही निकाल कर दिया आप को पहनने के लिए तो आप उसे पहन लें और मैं आप का पतला वाला नैकलैस पहन लेती हूं.’’
पूनम ने मुसकरा कर नैकलैस ले कर पहन लिया. वापस आने के बाद पूनम ने नेकलेस मोहिनी देवी को वापस कर दिया. सबकुछ अच्छे से चल रहा था. अचानक 10 दिन पहले एक बार पूनम मायके गई और वहां से 4 दिन बाद ही लौटी तो पुलिस के साथ. उस के साथ उस के मातापिता भी थे और वह पुलिस वालों से रोरो कर उन के सामने ही कहने लगी, ‘‘सर देखिए ये लोग मेरे पर कितना अत्याचार करते हैं. इन्होंने मेरे साथ मारपीट भी की है. ये देखिए मेरे हाथों में, पीठ और गरदन में मार के निशान. मुझे सताते हैं और मारते हैं, दहेज लाने के लिए बोलते हैं. मेरे सारे जेवर भी इन्होंने रख लिए. मुझे कुछ भी नहीं दिया. मेरे मांबाप ने बनाबना कर मेरे जन्म के समय से ही रखे हुए थे जेवर. वे सारे इन लोगों ने छीन लिए और मुझे घर से निकाल दिया,’’ कह कर पूनम ने जेवरों की तसवीर अपने पापा के मोबाइल में दिखा दी.
मोहनी देवी, रंजन और नीना यह सुन कर अवाक रह गए.
‘‘ऐसे कैसे हो सकता है. सारा जेवर तो पूनम के पास ही थे. हम ने इस से कुछ भी नहीं लिया. पूनम की अलमारी में रखे होंगे,’’ मोहिनी देवी ने कहा.
तब पूनम की अलमारी देखी गई, लेकिन उस में एक भी जेवर नहीं था. पूनम के कहने
पर मोहिनी देवी की तिजोरी की तलाशी ली तो सारे जेवर उन के पास निकले. मोहिनी देवी के साथसाथ रंजन और नीना की भी समझ में आ गया कि नीना ने पूनम को बताया था दोनों के एकजैसे जेवर हैं, इसलिए पूनम ने अपने जेवर के फोटो खींच कर रखे थे और वही दिखा रही थी. अपने सारे जेवर जो ससुराल से ही मिले थे मायके में छिपा दिए होंगे. ओह विश्वास का यह फल.
पुलिस वालों से पता चला पूनम और उस के परिवार ने इन पर दहेज उत्पीड़न एवं घरेलू हिंसा का केस किया है और अब इन तीनों को जेल जाना होगा. इन्होंने बहुत विनती की परंतु इन की बात किसी ने नहीं सुनी.
पड़ोसियों ने भी पूछताछ में कहा, ‘‘बहू को जेवर पहने कभी नहीं देखा बिलकुल साधारण रहती थी और इधर कुछ महीनों से इन के घर टीवी बहुत तेज आवाज में बजता था. इस के अतिरिक्त वे कुछ नहीं जानते.’’
पूनम की ससुराल वालों ने बताना कि चाहा पूनम ही तेज आवाज रखती थी टीवी का परंतु पुलिस ने इस बात पर विश्वास नहीं किया और तीनों को थाने ले गई.
3 दिन थाने में रहने के बाद आज रंजन के मित्र प्रकाश के पुरजोर प्रयास से उन के खराब स्वास्थ्य एवं ढलती उम्र को ध्यान में रख कर जमानत मिल गई परंतु रंजन और नीना को जेल भेज दिया गया. इन 3 दिनों में वर्षों की कमाई इज्जत मिट्टी में मिल गई. रंजन और नीना का चेहरा तो देखा नहीं जा रहा था.
उन्होंने अपनी मौसेरी बहन को फोन लगाया जिस ने पूनम का रिश्ता सुझाया था परंतु वह तो पहले से ही भरी बैठी थी. इन की बात सुने बिना कहने लगी, ‘‘जीजी, आप लोग ऐसे होंगे मैं ने सोचा नहीं था. मेरी तो सारी इज्जत मिट्टी में मिला दी आप ने. छि: जीजी मैं क्या समझी थी और आप लोग क्या निकले.’’
मोहिनी देवी सिर पर हाथ रख कर बैठ गईं और बुदबुदा उठीं कि ओह
यह संसार कितना निष्ठुर है. एक आरोप क्या लगा किसी ने सचाई जानने का प्रयत्न भी नहीं किया और हमें दोषी ठहरा दिया. अब क्या करें, कोई रास्ता नहीं सूझ रहा. सभी अपनों ने भी किनारा कर लिया था. यदि अभी रंजन और नीना साथ होते तो हिम्मत बनी रहती. अभी सब से पहला काम तो रंजन और नीना को जेल से निकालना है.
मोहिनी देवी ने अपने मैनेजर को फोन किया एक और कठोर प्रहार. मैनेजर ने बताया वहां रोज नारी समितियों का धरनाप्रदर्शन चल रहा है, कर्मी काम नहीं कर पा रहे, पूनम के घर वाले उन्हें भी परेशान कर रहे. पुलिस भी उन के सामने मूक दर्शक बनी रहती है.
मैनेजर ने कार्यालय से 2 कर्मियों को उन के पास भेज दिया घर की व्यवस्था संभालने. सुनीता (कामवाली)को उन्होंने बुलवाया. सुनीता ने उन दोनों कर्मियों की सहायता से घर व्यवस्थित किया. प्रकाश ने कहा था कल प्रात: वकील के साथ आएगा अगली योजना बनाने. शाम को उन्होंने दोनों कर्मियों और सुनीता को घर जाने को कहा पर कोई तैयार नहीं हुआ.
सुनीता ने बोल दिया, ‘‘मांजी, मैं अपने घर में बोल कर आई हूं, आज यहीं आप के साथ रहूंगी.’’
‘‘तुम्हारे घर में भी तो काम होगा न. तुम्हारे बच्चे हैं, पति हैं, उन का खानापीना कौन देखेगा?’’
‘‘सब हो जाएगा मां आप चिंता न करें. मेरी सासूमां हैं न घर में, मांबेटा मिल कर सब संभाल लेंगे. ऐसे समय में मैं आप को अकेले छोड़ कर नहीं जा सकती हूं.’’
बहुत कहने के बाद भी सुनीता जाने के लिए तैयार नहीं हुई. दोनों कर्मियों ने भी रंजन के आने तक रात में यहीं रहने की बात कही.
अब मोहिनी देवी पूनम के षड्यंत्र के संबंध में सोचना चाहती थीं. आखिर वह ऐसा क्यों कर रही है. झूठा आरोप क्यों लगा रही है?
उन्होंने पूनम को फोन किया और उसे काफी समझाया और केस वापस लेने के लिए कहा परंतु वह हंसती रही और अंत में कहा, ‘‘मेरी कुछ शर्तें हैं. यदि तुम लोग मानो तो बात बन सकती है.’’
‘‘क्या शर्तें हैं?’’
‘‘बताऊंगीबताऊंगी. आमनेसामने बैठ कर मिलती हूं 2-4 दिन में.’’
पूनम से बात कर के मोहिनी देवी बहुत दुखी हो गईं. वे चिंतित हो कर सोच में डूब गईं कि अब क्या होगा, कैसे होगा. तभी बाहर बैठे उन के कार्यालय कर्मी ने आ कर कहा, ‘‘मांजी कोई ज्योति देवी आप से मिलने आई हैं. हम ने बहुत रोकने की कोशिश की लेकिन वे मान नहीं रही हैं. बोल रहीं एक बार नाम बता दो नहीं कहेंगे तो फिर मैं चली जाऊंगी.’’
‘‘अरे वे मेरी सखी हैं उन्हें आने दो,’’ और फिर स्वयं ही वे आगे बढ़ गईं उन के स्वागत के लिए. दरवाजे पर ही गले लगा लिया और ज्योति को ले कर अंदर आईं और कहा, ‘‘ज्योति कम से कम तू तो मेरी सच्ची सखी है, तुझ से मिल कर आज मुझे लगा कि मेरा भी कोई अपना है नहीं तो सब ने मुझ से किनारा कर लिया है. मैं तो बिलकुल अकेली हो गई, मेरा कोई सहारा नहीं बचा है.’’
‘‘यह तूने काम ही ऐसा किया है. कौन तेरे साथ रहेगा. न यह मत सोचना कि मैं तुझ पर व्यंग्य कर रही हूं. मैं तो लोगों की बातें तुम्हें सुना रही हूं जो लोग तुम्हारे बारे में सोचते हैं. लोगों में तुम मुझे मत शामिल करना. मुझे पता है तू कैसी है और मुझे यह भी पता है कि तेरे साथ कोई षड्यंत्र हुआ है. किसी बहुत ही बड़ी साजिश की तू शिकार हो गई है. मुझे बता क्याक्या हुआ?’’
सुनीता ने आ कर ज्योति देवी के सामने पानी का गिलास रखा और कहा,
‘‘आंटीजी, अब आप ही समझाएं इन्हें थोड़ा, घर आने के बाद से कुछ भी नहीं खापी रही हैं, बहुत मुश्किल से एक गिलास पानी पीया. चाय तक नहीं पी रही हैं, मैं आप लोगों के लिए चाय ले कर आ रही हूं. आप थोड़ा मांजी को भी पिला दीजिए.’’
ज्योति ने कहा, ‘‘चाय ही नहीं हमारे लिए खाना भी बनाना आज मैं यहीं रुक रही हूं. आज मैं कहीं जाने वाली नहीं.’’
सुनीता थोड़ी ही देर में चाय ले आई. ज्योति मोहिनी देवी को चाय पिलाने के साथसाथ उन्हें समझा चुकी थीं कि वे बिलकुल चिंता न करें. हमारा पूरा परिवार आप के साथ है.
मोहिनी देवी ने कहा, ‘‘ज्योति, तेरा बेटा सुभाष तो न्यूज चैनल चला रहा है न.’’
ज्योति गुस्सा हो कर बोली, ‘‘तूने तेरा बेटा कैसे कहा? क्या वह तेरा बेटा नहीं है?’’
मोहिनी, ‘‘नहीं तू नाराज मत हो मैं ने तो यों ही कह दिया.’’
अब ज्योति मुसकराई और बोली, ‘‘अब बता तू क्या चाहती है मैं तेरी क्या सहायता करूं और कैसे करूं?’’
मोहिनी देवी ने कहा, ‘‘मैं वही कह रही थी ज्योति मैं चाहती हूं कि पूनम के षड्यंत्र का किसी तरह पता चल जाए कि आखिर वह चाहती क्या है? वह क्यों ऐसा कर रही है हमारे साथ, इस में सुभाष (ज्योति का बेटा) हमारी सहायता कर सकता है.’’
ज्योति धीरे से मोहिनी के कान में बोली, ‘‘सुभाष ने इस संबंध में कुछ काम किया है और वह आगे तुम्हारी सहायता चाहता है.’’
ज्योति ने फोन से अपने बेटे से बात की फिर मोहनी देवी से आ कर बोली, ‘‘तू चिंता मत कर सब ठीक हो जाएगा.’’
रात में उन्हें जबरदस्ती थोड़ा सा खाना भी खिलाया ज्योति देवी ने और फिर दोनों
सो गईं. सुबह 5 बजे ही मोहिनी देवी को ज्योति देवी ने उठाया और कहा. ‘‘हम दोनों टहलने जा रहे हैं, रास्ते में हम से सुभाष मिलेगा और वहीं सारी बातें करेगा. वह अभी यहां आना नहीं चाहता है. अब चल और अपने में हिम्मत रख.’’
दोनों तैयार हो कर टहलने निकल पड़ीं. घर से काफी दूर आने के बाद अचानक एक लड़का आ कर मोहिनी से टकराया. मोहिनी जब तक संभाल कर उसे देखती या कुछ कहती तब तक वह बोला, ‘‘मौसीजी मैं सुभाष हूं. मैं जो दे रहा हूं उसे आप रख लीजिए और आप मेरी तरफ पलट कर देखिएगा नहीं. मैं बस आप के आगेपीछे चलता रहूंगा. मैं जो बोल रहा हूं उसे आप ध्यान से सुन लीजिए,’’ कहते हुए सुभाष ने मोहिनी के हाथ में कुछ पकड़वा दिया.
सुभाष, ‘‘मौसीजी यह एक लौकेट है, इसे घर जा कर आप अपने गले में डाल लीजिएगा. लौकेट के अंदर एक बहुत ही पावरफुल कैमरा और स्पीकर लगा हुआ है. आप के सामने जो भी होगा या जो भी बात होगी वह सारी इस में रिकौर्ड होती जाएगी और मैं फिर आप से अगले दिन यह ले लिया करूंगा. पूनम या उस के परिजनों से जो भी बात हो कोशिश कीजिएगा कि उस समय आप के गले में यह लौकेट जरूर रहना चाहिए. फिर मैं देखता हूं कि मैं आप के लिए क्या कर सकता हूं. कोशिश करूंगा कि आप इस षड्यंत्र से निकल जाएं,’’ चलतेचलते ही सुभाष आगे निकल गया.
तब मोहिनी ने ज्योति से कहा, ‘‘ज्योति इतनी सावधानी की क्या जरूरत थी? वैसे भी मेरे पास आ कर मुझे दे सकता था.’’
‘‘मोहिनी, सुभाष ने कहा है शायद तुझ पर कोई नजर रख रहा हो, तेरे घर की हर खबर उन के पास ले जा रहा हो. हमें सावधान रहने की जरूरत है, जिस से हम जो भी ऐक्शन लें पूनम या उस के घर वालों को पता नहीं चले,’’ ज्योति बोली.
थोड़ी देर और घूम कर फिर दोनों घर वापस आ गईं. उस दिन का सारा कार्य
मोहिनी ने सामान्य तरीके से किया. वकील के साथ भी रंजन और नीना की जमानत के संबंध में बातचीत की. फिर वे अपने कार्यालय गईं. ज्योति अपने घर वापस जा चुकी थी. मोहिनी देवी ने कार्यालय जा कर अपने कर्मचारियों के साथ काम के संबंध में बातचीत की और सब का धन्यवाद दिया.
‘‘मांजी, आप परेशान न हों हम लोग आप के साथ हैं, जब तक रंजन सर नहीं आते तब तक 2 आदमी हमेशा आप के घर में रहेंगे ताकि कोई आ कर आप को कुछ नुकसान नहीं पहुंचा सके. फिर भी कभी कोई जरूरत हो तो आप मुझे एक फोन कर लीजिएगा मैं तुरंत आप के पास आ जाऊंगा,’’ मैनेजर ने कहा.
मोहिनी सभी का धन्यवाद कर के वहां से निकल कर बाहर आईं. गेट के बाहर ही पूनम और उस के मातापिता खड़े थे. उन्होंने आगे बढ़ कर ‘‘पूनम बेटा,’’ कह कर पुकारा तो पूनम ने हंस कर कहा, ‘‘ओह बुढि़या तो तू यहां… तुम पर तो कोई असर ही नहीं लग रहा है. तुम्हारे बेटाबेटी दोनों जेल में हैं और तुम अपना सारा काम आराम से कर रही हो. तुम तो कार्यालय का काम भी कर रही हो, अपने स्वास्थ्य पर भी ध्यान दे रही हो. देख रही हूं तुम खूब स्वास्थ्य भी बना रही हो, टहल रही हो सुबहसुबह.’’
मोहिनी देवी ने कहा, ‘‘पूनम, तू क्यों हमें परेशान कर रही है बता हम ने तेरा क्या बिगाड़ा है, हम तो कितने खुशी और उमंग से तुम्हें बहू बना कर अपने घर ले आए थे. तुम से कभी किसी ने ऊंची आवाज में बात भी नहीं की. तुम्हें पूरा मानसम्मान दिया, तुम्हारी हर इच्छा का ध्यान रखा, फिर तुम हम लोगों के पीछे क्यों पड़ी हो? अरे रंजन तुम्हारा पति है कम से कम इतना तो सोचो.’’
‘‘तुम्हारे सड़े से बेटे के साथ कौन रहना चाहता है… तुम क्या सोच रही हो मैं तुम्हारे सड़े बेटे के साथ जिंदगी गुजारने के लिए आई हूं.’’
‘‘फिर तुम क्या चाहती हो मुझे बताओ मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूं, कहो तो तुम्हारे पैर भी मैं पकड़ लूं. तुम जो चाहती हो बोलो मैं तुम्हारी हर इच्छा पूरी करने के लिए तैयार हूं, बस तुम केस वापस ले लो. मेरे बच्चों को जेल से बाहर आने दो.’’
‘‘मेरी बात मान लो तो तुम्हारे दोनों बच्चे भी बाहर आ जाएंगे और मैं केस भी वापस ले लूंगी,’’ पूनम बोली.
‘‘बोलो तुम क्या चाहती हो मैं तुम्हारी हर बात मानने को तैयार हूं?’’
तुम पहले जितना कर सकती हो न प्रयास कर लो जब तुम थक जाओ तब मेरे पास आना.’’
‘‘नहीं पूनम मैं थक चुकी हूं. अब मुझ से यह पीड़ा नहीं सही जाती. कहो केस वापस लेने के बदले तुम क्या चाहती हो?’’
‘‘आ जाना दोपहर में मेरे घर वहीं बात करेंगे.’’
‘‘नहीं मैं तुम्हारे मायके नहीं जा सकती. तुम मेरे घर यानी अपनी ससुराल आ जाओ, वहीं जो भी कहना हो कहो.’’
‘‘हांहां क्यों नहीं ताकि तुम मुझे वहां अपने आदमियों से पिटवा दो.’’
‘‘तुम यह अच्छी तरह समझ रही हो मैं ऐसा नहीं कर सकती, मेरे बच्चों का जीवन तुम्हारी दया पर है. लेकिन मैं तुम्हारे घर नहीं जा सकती, तुम्हारा घर छोड़ कर किसी भी सार्वजानिक स्थान पर मैं तैयार हूं.’’
‘‘ठीक है बताती हूं, अभी तो वह देखो तुम्हारा घेराव करने लोग आ रहे हैं उन से बचो.’’
मोहिनी देवी ने देखा सामने से महिलाओं की भीड़ चली आ रही है इधर ही. उन के हाथों में नारे लिखी हुई तख्तियां थीं. वे समझ गईं आज फिर हंगामा होगा उन्हें देख कर और भी अधिक. वे वापस अंदर आ गईं. तब तक मैनेजर भी बाहर आ गया था. वह इन्हें ले कर कार्यालय के अंदर गया और गाड़ी को पिछले दरवाजे की ओर सड़क पर लगाने के लिए किसी को बोला.
मांजी आप यहां की चिंता मत कीजिए. मैं ने पुलिस को बुला लिया है. यहां मैं संभाल लूंगा, आप पीछे से निकल कर घर चली जाइए,’’ मैनेजर ने कहा. फिर उन्हें पीछे से ले जा कर गाड़ी में बैठाया, साथ ही एक गार्ड भी भेज दिया साथ.
मोहिनी देवी घर आ कर चिंतित हो कर बैठ गईं. वे बहुत परेशान हो गई थीं. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि करें तो क्या करें. उन्होंने ज्योति को फोन लगाया और आने के लिए कहा.
ज्योति ने कहा, ‘‘ठीक है मैं आ रही हूं.’’
कुछ देर बाद ज्योति घर आ गई. ज्योति को देख मोहिनी देवी के दिल का गुब्बार
फूट पड़ा और वे अपनी सखी से लिपट कर रो पड़ीं.
ज्योति देवी ने उन्हें सांत्वना दी और कहा, ‘‘तू चिंता मत कर जो होगा सब ठीक होगा. कुदरत सब ठीक करेगी.’’
कुछ ही देर बाद पूनम अपने मातापिता के साथ घर आ गई और ज्योति देवी को देखते ही पूनम ने रोना शुरू कर दिया. ज्योति को पकड़ कर कहने लगी, ‘‘आंटीजी आप ही समझाएं न मम्मीजी को. इन्होंने क्यों हमें इतना सताया हम बहुत दुखी हैं. हम बहुत साधारण लोग हैं, क्यों नहीं मुझे रखना चाहते हैं ये लोग? मेरे पिता ने इन की हर मांग पूरी की, मांग के अनुसार सारा सामान दिया, जेवर भी दिए. उस के बाद भी मुझे निकाल दिया. आप बताइए क्या कमी है मुझ में जो मांजी ने मुझे घर से निकाल दिया?’’
मोहनी देवी ने कहा, ‘‘पूनम यह तुम क्या कह रही हो, हम ने तुम को कहां निकाला. तुम तो अभी समझौता करना चाहती थी और तुम्हारी कुछ शर्तें हैं जिन्हें तुम मुझे मानने को कह रही थी. बोलो क्या हैं तुम्हारी शर्तें, तुम क्या चाहती हो?’’
‘‘मम्मीजी मैं क्या शर्त रख सकती हूं, मैं बेचारी तो आसरे को तरस रही हूं, बहुत दुखी हूं मैं, आप के पांव पड़ती हूं मुझ पर दया कीजिए,’’ कह कर पूनम ने मोहिनी के दोनों पैर पकड़ लिए फिर कहा, ‘‘मम्मीजी मैं तो आप के घर को स्वर्ग बनाने आई थी. मम्मीजी आप ने मुझे क्यों निकाल दिया?’’
ज्योति देवी ने कहा, ‘‘देखो मोहिनी कोशिश करो मिलजुल कर रहने की, मैं जा रही हूं, अपनी बहू को प्यार और सम्मान देने की कोशिश करो. मुझे लगता है, अभी तुम्हें मुझ से अधिक पूनम की आवश्यकता है, अच्छा होगा समझौता कर तुम लोग मिलजुल कर रहो मैं जा रही हूं.’’
फिर पूनम से कहा, ‘‘पूनम वैसे तुम्हारी सासूमां बुरी नहीं है, बहुत अच्छी है. तुम
लोगों में शायद कुछ गलतफहमी हो गई है, उसे तुम लोग आपस में मिलबैठ कर दूर कर लो. वैसे मुझे जब भी याद करोगी मैं तुम्हारे साथ हूं. अभी मैं जा रही हूं, तुम लोग मिलजुल कर रहो, घर को स्वर्ग बना दो, सुखी रहो,’’ कह कर ज्योति देवी वहां से निकल गई.
ज्योति के जाने के बाद पूनम के पिता ने बाहर का दरवाजा बंद किया और गार्ड के पास जा कर कहा, ‘‘ध्यान रखना फालतू कोई आदमी भीतर न आने पाए,’’ और अंदर आ कर भीतर का दरवाजा बंद कर दिया.
अब पूनम हंस कर बोली, ‘‘देखा कैसा रहा मेरा नाटक, तुम्हारी सखी भी तुम्हारे विरुद्ध हो गई. ऐसे ही होगा अब. कोई तुम्हारा साथ देने नहीं आएगा. अब बोलो अपनी बेटी और बेटे को बचाने के लिए क्याक्या कर सकती हो?’’
मोहिनी देवी ने कहा, ‘‘तुम जो कहो मैं सबकुछ करने के लिए तैयार हूं.’’
‘‘पहली बात पुलिस के सामने मान लेना कि जो जेवर मैं यहां से ले गई वे मेरे मायके के द्वारा ही दिए गए थे.’’
मोहिनी देवी, ‘‘लेकिन वे जेवर तो तुम्हारे मायके से नहीं मिले थे. वे जेवर तो मैं ने बेटी नीना के लिए बनवाए थे. वैसा ही एक पूरा सैट मैं ने तुम्हें भी दिया था बनवा कर जो तुम पहले ही ले जा चुकी हो अपने साथ. बताओ तुम ने उन्हीं के फोटो खींच कर रखे थे न पुलिस वालों को दिखाने के लिए?’’
‘‘यह बात यदि मैं या मेरे परिवार वाले अपने मुख से नहीं बोले तो कोई नहीं मानेगा… इस बात को भूल ही जाओ.’’
‘‘मेरे सभी रिश्तेदार और तुम्हारे आसपास
के लोग भी जानते हैं मैं ने दहेज में कुछ भी नहीं लिया था.’’
‘‘यही सब फालतू बातें करनी हैं तो हम चले जाते हैं. हमारे पास फालतू का समय नहीं है तुम्हारी बकवास सुनने के लिए.’’
‘‘मैं तुम्हारी हर शर्त मानने के लिए तैयार हूं.’’
‘‘फिर ये फालतू की बातें क्यों कर रही है?’’
‘‘तुम जो बातें कर रही थी उन का मैं ने जवाब दिया. तुम्हें अपनी जो भी शर्त रखनी है कहो.’’
‘‘ठीक है फिर आगे सुनो. अगली और महत्त्वपूर्ण बात मुझे 1 करोड़ रुपए चाहिए. मुझे रुपए दे दो फिर मैं समझौता कर सकती हूं.’’
मोहनी देवी ने कहा, ‘‘पर मैं अभी 1 करोड़ रुपए कहां से लाऊं?’’
‘‘जहां से लाओ यह तुम जानो, घर बेच दो, अपने औफिस की बिल्डिंग बेच दो, सारा व्यापार बेच दो. यदि समझौता चाहती हो तो मेरी मांग पूरी करो.’’
‘‘परंतु इस में तो समय लगेगा. तुम केस वापस ले लो जिस से मेरे बच्चे छूट कर बाहर आ जाएं. फिर मैं तुम्हें रुपए भी दे दूंगी.’’
‘‘वाह मैं केस वापस ले लूंगी फिर तुम मुझे अंगूठा दिखा दोगी, इतनी मूर्ख समझा है?’’
‘‘फिर तुम ही बताओ मैं क्या करूं?’’
‘‘तुम पहले संपत्ति बेच दो.’’
‘‘ठीक है मैं अपने वकील को बुला कर कागजात तैयार कराती हूं. सबकुछ तुम्हारे नाम पर कर दे रही हूं.’’
‘‘नहीं मेरे नाम पर नहीं मैं जिस के नाम पर बोलूंगी उस के नाम पर होगा और कागजात तुम तैयार नहीं करवाओगी मैं अपने वकील से तैयार करवाऊंगी. तुम उन पर सिर्फ हस्ताक्षर कर देना.’’
मोहिनी देवी ने कहा, ‘‘ठीक है तुम जिस से चाहो उस से करवा लो.
औफिस की बिल्डिंग, सारा फर्नीचर, अपना मकान भी मैं बेच दूंगी. जो भी पैसा मिलेगा उसे तुम ही रख लेना लेकिन तुम यह बताओ उस के बाद तुम फिर क्या करोगी? तुम यहां आओगी फिर? तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं रहेगा तो तुम रहोगी कहां, कैसे रहोगी?’’
‘‘उस के लिए तू चिंता मत कर मैं तेरे पास वापस आने वाली नहीं हूं, तलाक के पेपर भी बने रहेंगे तुम्हारे बेटे की ओर से जिन में वह मुझ से तलाक की मांग करेगा. मैं कहां जाऊं यह तेरे सोचने की बात नहीं है. मैं ने पहले से ही किसी को पसंद किया हुआ है. मैं तो यहां आती भी नहीं, पर तुम्हारी प्रौपर्टी देख कर मेरे मन में लालच आ गया और मैं ने यहां शादी करने की सोच ली ताकि यह सारी संपत्ति मुझे मिल सके. यह सब ले कर मैं चली जाऊंगी और जिसे मैं पसंद करती हूं उस के साथ शादी कर के पूरी जिंदगी सुख से रहूंगी.’’
मोहनी देवी ने कहा, ‘‘इस का मतलब कि शादी से पहले से ही तुम्हारे मन में यह षड्यंत्र था, तुम ने संपत्ति हथियाने के लिए ही रंजन से शादी की थी?’’
पूनम ने हंसते हुए कहा, ‘‘हां, तुम्हें क्या लगा था मैं तुम से प्रभावित हुई थी या तुम्हारे सड़े से बेटे पर मोहित हुई थी?’’
इन सब के बीच पूनम की मां बिलकुल शांत बैठी हुई थीं और पूनम के पिता मुसकरा रहे थे.
‘‘ठीक है तुम सारे कागजात तैयार करो तुम जब कागजात तैयार करवा कर ले आओगी मैं उन पर हस्ताक्षर कर दूंगी. तुम आज रात को भी ले आओ या कल सुबह ही ले आओ. तुम जितनी जल्दी ले आओ मैं कर दूंगी और तुम मेरे बच्चों को जेल से वापस आने दो. तुम केस वापस ले लो जिस से मेरा बेटा और बेटी जेल से बाहर आ जाएं. मेरी संपत्ति मेरे बेटाबेटी हैं. मुझे और कुछ नहीं चाहिए.’’
‘‘देख तेरी सहेली बहुत आ रही है तेरे पास. आज से तेरी सहेली तेरे साथ नहीं रहेगी, तू जहां भी रहेगी अकेली ही रहेगी. जब तक हमारा मामला नहीं निबटता तेरे पास कोई नहीं आएगा. ठीक है?’’
मोहनी ने कहा, ‘‘मैं अकेली थी इसलिए वह मेरे पास आ रही थी, ठीक है मैं मना कर दूंगी. मैं अकेली रहूंगी. तुम्हारी जब इच्छा होगी आ कर मुझ से हस्ताक्षर करवा लेना,’’ इस के बाद पूनम हंसते हुए अपने मातापिता के साथ वहां से चली गई.
पूनम के जाने के बाद मोहिनी ने ज्योति को फोन किया, ‘‘कहां हो मुझे सुभाष से मिलना है.’’
ज्योति ने उसे आधा किलोमीटर दूर एक मौल का पता बताया. मोहिनी गाड़ी में बैठ
कर वहां से निकली. मौल के पास पहुंच कर मोहनी देवी ने गाड़ी और ड्राइवर को इंतजार करने को कहा और स्वयं मौल में चली गईं जहां ज्योति उन का इंतजार कर रही थी. वहां से उन्हें मौल के पीछे के रास्ते से अपने साथ ले कर ज्योति देवी निकल पड़ीं. थोड़ा आगे जाने के बाद एक गाड़ी ने उन्हें पिक किया. उस गाड़ी से वे दोनों सुभाष के चैनल के औफिस में पहुंच गईं. वहां पहुंचने के बाद सुभाष उन से मिला.
सुभाष ने कहा, ‘‘क्या मौसीजी इतनी जल्दी बात बन गई… बहुत जल्दी आप लोग यहां आ गईं.’’
मोहिनी देवी ने उसे लौकेट देकर कहा, ‘‘बेटा अब तो तुम्हीं देखो कितना हुआ है या और बाकी है.’’
सुभाष ने लौकेट खोल कर चिप निकाली और उसे ले कर वहां से चला गया. लगभग आधे घंटे के बाद आया और बोला, ‘‘मौसीजी अब आप देखें कमाल. उस ने अपना लैपटौप औन किया और इन्हें दिखाना शुरू किया. पूनम से जितनी भी बातें हुई थीं वे सारी उस में रिकौर्ड थी चित्र सहित. वीडियो रिकौर्डिंग हो गई थी और इस से साफ पता चल रहा था कि पूनम ने जानबूझ कर षड्यंत्र रच कर इन के पूरे परिवार को फंसाया.
सुभाष ने कहा, ‘‘मौसीजी आप और मां दोनों यहां बैठ कर देखती रहें मैं अब इस का न्यूज चला रहा हूं.’’
अपने चैनल से न्यूज चलाने के साथ ही उस ने वीडियो को इंटरनैट पर पोस्ट कर दिया. कुछ ही देर में व न्यूज, वे सारा वीडियो वायरल हो गए और पूरे शहर में सब जगह उन्हीं की चर्चा थी.
मोहिनी देवी ने प्रकाश को फोन कर के वकील के साथ थाना आने के लिए कहा और स्वयं भी थाने गईं. वहां प्रकाश वकील को ले कर आया हुआ था. उस ने कहा, ‘‘कमाल है मौसीजी यह सारा काम आप ने कैसे किया? अरे अब तो रंजन को छूटने से कोई रोक ही नहीं सकता है. अब सब से पहले हम लोग एफआईआर करेंगे.’’
मोहनी देवी, वकील और प्रकाश ने थाने में वीडियो की एक प्रति देते हुए पूनम के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई. केस दर्ज हो गया. अगले दिन के समाचारपत्रों में पूनम की पूरी कारस्तानी छपी हुई थी. रात में ही पुलिस ने जा कर पूनम और उस के मातापिता को हिरासत में ले लिया था. रंजन के वकील ने कोर्ट में जमानत की अर्जी दी और इस वीडियो को सुबूत के तौर पर साथ में दिया. रंजन और नीना छूट गए.
आपराधिक षड्यंत्र करने का आरोप पूनम और उस के
परिवार पर लगाया गया. जिस दिन रंजन और नीना की जेल से रिहाई थी, मोहिनी देवी अपने बच्चों को लेने गईं. उन के जेल से बाहर आते ही वे बच्चों से लिपट कर फूटफूट कर रो रही थीं.
सुभाष ने कहा, ‘‘अब आप क्यों रो रही हैं? अब आप के रोने के दिन बीत गए. अब तो रोना पूनम और उस के मातापिता को है. पूनम और उस के पिता के लालची चरित्र के कई सुबूत मेरे पास हैं, जो मैं ने रंजन के जेल जाते ही इकट्ठा करना शुरू कर दिए थे. उसे तो अब कोई नहीं बचा सकता है= और साथ में ऐसी लड़कियों को भी आज एक सबक मिला है जो उन की रक्षा के लिए बने कानून का इस्तेमाल कर के दूसरों का शोषण करती हैं. लड़के ही प्रताडि़त नहीं करते लड़कियां भी प्रताडि़त करती हैं और लड़के भी प्रताडि़त होते हैं.’’
जब मोहिनी देवी रंजन और नीना के साथ घर लौटीं तो उनके सभी पड़ोसी उन का स्वागत मुसकराते हुए कर रहे थे. सामने स्वागतमुद्रा में खड़ी विमला और सीमा को देख कर तो मोहिनी देवी ने कह भी दिया, ‘‘मैं ने जान लिया, इस संसार के लोग कितने निष्ठुर हैं. यदि एक आरोप लगा तो बिना सुबूत के, बिना गवाही के कठघरे में खड़ा कर के अपना न्याय भी सुना देंगे, दोषी करार दे कर.’’
विमला ने शर्मिंदगी से सिर झुका लिया, सीमा बहुत मुश्किल से कह पाई. ‘‘मुझे क्षमा कर दें दीदी. मैं ही नहीं हम सभी बहुत शर्मिंदा हैं. हम ने सचाई जानने की कोशिश नहीं की और आप को दोषी समझ लिया.’’
‘‘मुझे दुख तो अवश्य हुआ आप सभी हमें अच्छी तरह जानते थे फिर भी किसी ने हमारी बात पर विश्वास नहीं किया. फिर भी मैं खुश हूं कि यह हमारे अच्छे कर्म ही थे, जिन से पूनम को उस के किए की सजा मिलेगी. साथ ही साथ मेरे अच्छे कर्मों के कारण ही मुझे कुछ लोगों का साथ मिला,’’ मोहिनी देवी बोलीं.
फिर मोहिनी हाथ जोड़ कर अभिवादन करते हुए अपने घर के अंदर प्रविष्ट कर गईं अपने बच्चों के साथ. घर के भीतर जा कर नमन, रंजन और नीना से कहा, ‘‘कोई कुछ भी करे अपनी अच्छाई कभी मत छोड़ना. जिस चक्रव्यूह में हम फंसे थे शायद उस से कभी निकल नहीं पाते पर हमारे अच्छे कर्म थे जिन के कारण हमें ज्योति, सुभाष और प्रकाश का साथ मिला. जैसे मैं गर्व करती हूं ज्योति की मित्रता पर, वैसे ही मुझे तुम्हारे और प्रकाश की मित्रता पर भी गर्व है जिस ने हर कदम पर हमारा साथ दिया. सुभाष के सहयोग के बिना तो हम इस दलदल से बाहर निकल ही नहीं पाते, उस के उपकार तो कभी मत भूलना.’’
‘‘मां आप सही कह रही हैं हमारे अच्छे कर्मों ने ही हमें इस दलदल से निकाला. सही कहती हैं आप भलाई का काम हमेशा करते रहना. आप की आज्ञा का अक्षरश: पालन करूंगा. प्रकाश और सुभाष की मित्रता मेरा अनमोल धन होगा.’’
‘‘अपने कार्यालय के कर्मचारी, हमारे मैनेजर एवं सुनीता के प्रति भी कृतज्ञ हूं मैं, जिन्होंने मुसीबत में हमारा साथ निभाया. तुम्हारे पीछे मुझे अकेला नहीं छोड़ा. ऐसे विश्वसनीय कर्मचारी बहुत कठिनाई से मिलते हैं, मोहिनी देवी बोलीं.’’
-निर्मला कर्ण