Valentine’s Day 2026 : बसंत का नीलाभ आसमान- क्या पूरा हुआ नैना का प्यार

लेखक- geetanjali 

Valentine’s Day 2026 : अब यह मौसम का खुमार था या उसकी अल्हड़ उम्र का शूरुर  जो उसे दुनिया बेहिसाब खुबसूरत लग रही थी. जितने रंग फिजाओं में घुले थे उसकी गंध से नैना का हृदय सराबोर था. बसंत के  फूलों से मुकाबला करती नैना की खुबसूरती मौसम के मिज़ाज से भी छेड़खानी करती चलती थी. जब सारा जहाँ जाती हुई ठंड को रूसवा करने के डर से जैकेट डालकर सुबह सुबह घूमने निकलता तब नैना बगैर स्वेटर शाल के बसंती फिजाँ में इठलाती सारे जमाने को अपने जादू में बाँध लेती थी.

दो बहनों में  बड़ी नैना एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती थी. माँ के सानिध्य से मरहूम नैना अपने पिता के साथ रहती थी.घर की बड़ी बेटी होने के बावजूद उसका बचपना नहीं गया था . बल्कि उसकी छोटी बहन ही कुछ अधिक शान्त, संयम, गम्भीर और बुजुर्ग बनी बैठी रहती. नैना के पिता एक प्रगतिशील व्यक्तित्व के स्वामी थे, जो नैना की हरकतों पर यदाकदा उसे स्नेह भरी फटकार लगा देते थे.

पर नैना भी कहाँ किसी से कम थी सारी डांट फटकार का लेखा जोखा तैयार रखती थी और फिर मौका मिलते ही कभी स्वास्थ्य के लिए उपदेश दे डालती, तो कभी पिता की राजनीति के प्रति दिवानगी को देख कर विद्रोहिनी हो जाती. राजनीति के नाम से नैना को इतनी चिढ़ थी कि वह अपनी सारी नजाकत, खुबसूरती, मासूमियत और शब्दों की मर्यादा को ताक पर रखकर इतनी ढीठ बन जाती कि उसका सारा विद्रोह, सारी झुँझलाहट, मिज़ाज का सारा तीखापन बाहर आ जाता था.

बाप बेटी की इस तकरार से आजिज रहने वाली नताशा अक्सर खिसियाकर कहती  – “राजनीति से इतना प्रेम और घृणा दोनों ही खतरनाक है. नैना तुम जो राजनीति के नाम पर दाँत पीस पीसकर लड़ती हो, तुम्हारी शादी जरूर किसी राजनैतिक परिवार में होगी. ”

इतना सुनने के साथ नैना नताशा पर भड़क जाती और पिता पुत्री का समझौता हो जाता. पर कहते हैं न कि वाणी में माँ सरस्वती का वास होता है. अल्हड़, पवित्र,निश्छल व्यक्तित्व की स्वामिनी नैना कब नैतिक को पसंद आ गयी, इसका अहसास उसे तब हुआ जब शहर के एमएलए नैतिक का रिश्ता नैना के लिए आया.

इस खबर ने जहाँ नैना की आत्मा का गला घोंट दिया था, तो वहीं उसके पिता रसूखदार राजनैतिक परिवार को रिश्ते के लिए मना करने का हौसला नहीं दिखा पाये.विवाह के प्रस्ताव को मना कर तलवार की धार पर चलने का सामर्थ उनमें न था. वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में प्रणय, विवाह और तृप्ति उन्हें ज्यादा प्रासंगिक नजर आ रही थी. वरना होने को तो कुछ भी हो सकता था.

अपने ही कुबोल से कुपित नताशा स्वयं को मुनि का अवतार समझ रही थी. उधर अपने अहर्निश अन्तर्द्वन्द्व में उलझी नैना रोयी, खीझी पर अपने परिवार की खैरियत के लिए एम एल ए से शादी करने को तैयार हो गई. वो अपने इनकार से पिता का दिल नहीं दुखाना चाहती थी. अपने कुढ़न और खीज से छोटी बहन का भविष्य खतरे में नहीं डालना चाहती थी.

नियत समय पर ब्याह सम्पन्न हुआ. एक तो पिता और बहन को छोड़ कर जाने का गम और फिर बेदिली का रिश्ता नैना चुप हो गयी थी. आँसू को छुपाने के लिए नसों के सहारे उन्हें हृदय में उतार देती, पर जब आँसूओं के सैलाब से हृदय डूबने लगता तो आँसू यकबयक पलकों पर उतर आते. मायके से बिदा होकर जब ससुराल आयी तो ऐसा लगा मानों स्वर्ग को किसी ने इन्द्रधनुषों के रंगों से भर दिया हो. पर जब वैभव और ऐश्वर्य के बादलों से झांककर वह नैतिक को देखती तो उसे लगता कि किस्मत ने उसे किसी पाप का दंड दिया है.

नैतिक बाबू गम्भीर और फिलासफर किस्म के इंसान थे. सुदर्शन पुरुष सा आभामंडल उनके यश का कारण था.काम और समाज सेवा की तमाम मसरूफियत के बीच कहीं कोई प्रेमी हृदय तो अवश्य था जिसमें नैना के जिंदादिल व्यक्तित्व ने अपना घर बना लिया था. नैना से विवाह के बाद वह अपनी भावना, प्रणय की कल्पनाओं को व्यक्त कर देना चाहता था, पर नैना के मौन को देख कर डर जाता . जब भी स्नेह भरे स्पर्श की चेष्टा करता, तब नैना की मौन तल्खी से सहसा कटुता और व्यंग्य से उबल उठता.

पहले पहल तो उसे लगा मानों नये परिवेश को आत्मसात नहीं कर पाने की वजह से नैना इस प्रकार का रवैया अपना रही है. परंतु शिघ्र ही नैतिक को नैना के हृदय में उग्र जहरीले काँटों का आभास हो गया. जुबान की तल्ख़ी की चुभन फिर कमजोर हो जाती है, पर नैना की निर्मम उपेक्षा नैतिक को कटुता के जहर से अभिषिक्त कर रही थी.

दो लोग एक साथ जीवन की एक ही समस्या के अंतर्विरोधों में उलझे हुए थे. मन में एक ठहराव आ गया था और वक्त ठहरने का नाम नहीं ले रहा था. नैना के हृदय ने मन से विद्रोह करना शुरू कर दिया था. अब वह जब भी नैतिक को देखती तो उसे वह सुकुमार और पवित्र लगता. नफरत पर भावुकता हावी होने लगी. हृदय और मन नैतिक का अलग अलग मुल्यांकन करता. हृदय को नैतिक देवदूत लगता तो दिमाग को पथभ्रष्ट देवदूत जिसे खरीदने को गुनाहगारों की सारी फौज खड़ी हो.

वहीं नैतिक नैना के तिरस्कार से ज्यादा उसके बदले हुए रूप से गमजदा था. जिस बिंदासपन, जिंदादिली और मस्तमौला अंदाज का वह कायल हो गया था. वही सबकुछ नैना का किसी ने छीन लिया था. उसका दिल और दिमाग बेबस हो रहा था. अपने ही प्यार का निबाह न कर पाने की कसक से वो नैना से दूर हो रहा था.

एक ही घर में दोनों अजनबियों की तरह जी रहे थे और एक ऐसी चाबी की तलाश कर रहे थे, जिसका कोई ताला ही नहीं था. नैना की भावनाएँ, उसका हृदय, उसकी आत्मा, उसके प्राण हार मान लेना चाहते थे, लेकिन उसका मन अब भी अपनी बात पर अड़ा हुआ था. हृदय में प्रेम की कोमल उपस्थिति को मन झल्लाहट और अन्तर्द्वन्द्व से अस्वीकार कर रहा था.

ताज्जुब है कि दिल और दिमाग की रस्साकशी में दिमाग का नियंत्रण खो गया नैना सीढ़ियों से नीचे गिर गई. दोनों टांग टूटने के दर्द से ज्यादा असुरक्षा और अस्वीकार कर दिए जाने की भावना से तड़प उठी. अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी पड़ी न जाने कौन कौन से बुरे ख्यालों से बिंधने लगी. कभी सपना देखती कि नैतिक उसे अपने से दूर कीचड़ में फेंक कर है. तो अगले ही पल पाँवों में तीखे दर्द से सारा बदन काँपने लगता.

सभी आ रहे थे और जल्दी ठीक होने का ढ़ाढ़स देकर चले जा रहे थे. फिर नताशा का भी आना हुआ और आने के साथ बोली ” अरे जीजा जी से सेवा ही करवाना था तो झूठ का बीमार हो जाती. टांगों को कुर्बान करने की क्या जरुरत थी. वैसे भी इतनी हट्टी कट्टी हो तुम्हें उठाना बैठाना कितना मुश्किल होगा बेचारे के लिए. ”

“अच्छा,  सच में.किसी को मेरी भी इतनी चिंता है”नैतिक बोला.

हादसे के बाद नैतिक ने नैना को पल भर भी अकेला नहीं छोड़ा. उसकी हर छोटी बड़ी जरूरत को पूरा करने के क्रम में जो विश्वास और प्रेम की अभिव्यक्ति नैतिक ने की, उसे शब्दों के जामे की जरूरत नहीं थी. नैतिक के मौन अभिव्यक्ति ने नैना के मष्तिष्क की मुर्छा को समाप्त कर दिया था.

और जिस दिन नैना का अस्पताल से डिसचार्ज होने का दिन आया तो नैतिक नैना के लिए गुलाब के फूलों गुलदस्ता ले आया. होंठों में मुसकान और आँखों में शरारत को छिपाते हुए एक गुलाब निकल कर नैतिक को देकर नैना बोली  “हैप्पी वेलेंटाइन डे. ”

और नैतिक हँस पड़ा.दोनों मुसकुरा रहे थे. चेहरे की आभा देखकर लगरहा था जैसे हवाओं में,फिजाओं में बसंत के मौसमी फूलों की खुबसूरती और गंध की बजाये,मोहब्बत के फूल खिलें हों और उसकी गंध से दोनों का तन मन पिघल रहा हो.महीने भर के सानिध्य और दोनों के संबंधों की गर्माहट भरे साथ में वे भी प्रेम के स्पर्श को महसूस कर थे. स्नेह और स्पर्श की ऊष्मा से उनका मन धुलकर ऐसे निखर गया जैसे बसंत का नीलाभ आसमान.

Couple Goals : मैं पत्नी के गुस्से से परेशान हो गया हूं, क्या करूं?

 Couple Goals : अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल

मैं 33 साल का विवाहित पुरूष हूं. बीवी पढ़ीलिखी और केयरिंग है. समस्या उस के गुस्सैल स्वभाव को ले कर है. वह छोटीछोटी बात पर गुस्सा हो जाती है और झगङा करने लग जाती है. इस से घर का माहौल बेहद बोझिल हो जाता है. हां, गुस्सा उतरने के बाद वह सौरी भी बोलती है पर फिर कब किस बात पर झगङने लगे यह कहा नहीं जा सकता. मैं उस के इस व्यवहार से बहुत दुखी रहने लगा हूं. कृपया उचित सलाह दें?

जवाब-

पतिपत्नी के रिश्ते में प्यार के साथ तकरार होना लाजिम है. शायद तभी तो कहते हैं कि जहां प्यार होता है वहां झगड़ा होना कोई बड़ी बात नहीं है, अलबत्ता पतिपत्नी के बीच होने वाली नोकझोंक से प्यार कम होने के बजाय और बढ़ता ही है. इसलिए अधिक परेशान न हों.

यह सही है कि जिन महिलाओं का स्वभाव गुस्सैल और झगड़ालू किस्म का होता है वे अकसर छोटीछोटी बातों पर तूफान खड़ा कर देती हैं, मगर इस का मतलब यह भी नहीं होता कि वे घरपरिवार को ले कर संजीदा नहीं होतीं. पति को ऐसे समय समझदारी और सूझबूझ से काम लेना चाहिए.

यदि आप की बीवी को किसी बात पर गुस्सा आ जाए तो यह आप की जिम्मेदारी बनती है कि घर का माहौल न बिगड़ने दें. इस स्थिति में बीवी के लिए समय निकाल कर उन्हें कहीं घुमाने ले जाएं ताकि उन का मन परिवर्तित हो जाए.

यह भी सही है कि घर की अधिक जिम्मेदारियों के चलते वे परेशान हो जाती हों. इस स्थिति में बीवी के साथ खास पलों को ऐंजौय करें ताकि रिश्ते में मधुरता बनी रहे.

बीवी के गुस्से को शांत करने के लिए समयसमय पर उन की तारीफ करना न भूलें साथ ही कोशिश करें कि जितना संभव हो घर के कामों में उन का हाथ बटाएं.

इस से बीवी को थोङा आराम मिलेगा और वे भी समझने लगेंगी कि आप न सिर्फ उन्हें प्यार करते हैं, बल्कि उन का केयर भी करते हैं.

कुछ ही दिनों में आप पाएंगे कि बीवी के साथ आप की बौंडिंग पहले से अधिक अच्छी हो जाएगी और घर में आएदिन किचकिच भी नहीं होगा.

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Urinary Infection Treatment : यूरिनरी इन्फैक्शन, न करें अनदेखा

Urinary Infection Treatment : महिलाओं के लिए यूरिन से जुड़ी दिक्कतें परेशानी का सबब बनती हैं. ऐसी ही एक परेशानी है यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फैक्शन (यूटीआई). शरीर में मौजूद मूत्रमार्ग जिंदगी भर ऐसे जीवाणुओं को पेशाब की थैली में जाने का रास्ता देता रहता है, जिन की वजह से यूटीआई दिक्कत होती है. इसी वजह से हर दूसरी महिला को जीवन में कभी न कभी यूटीआई से जरूर जूझना पड़ता है.

दरअसल, मेनोपौज के बाद ऐस्ट्रोजन हारमोन में कमी की वजह से इन्फैक्शन पैदा करने वाले जीवाणुओं के पनपने की संभावना काफी बढ़ जाती है. महिलाओं के प्रजनन काल के समय ऐस्ट्रोजन हानिकारक जीवाणुओं को वैजाइना में घर बनाने से रोकता है. उस के पीएच स्तर को कम रखता है और उस के लिए जरूरी जीवाणुओं की वृद्धि में मदद करता है. यही जीवाणु यूटीआई से लड़ते हैं. ऐस्ट्रोजन में कमी और बढ़ोतरी दोनों से ही यूटीआई होता है, क्योंकि दोनों ही स्थितियों में योनि की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं.

क्या है यूटीआई ?

यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फैक्शन यानी मूत्रमार्ग के संक्रमण को बोलचाल की भाषा में यूटीआई कहते हैं. यह दरअसल, बैक्टीरिया का संक्रमण है. यह मूत्रमार्ग के किसी हिस्से को प्रभावित कर सकता है. मुख्यतया ई-कोलाई नामक बैक्टीरिया से यूटीआई की समस्या पैदा होती है. अन्य कई किस्म के बैक्टीरिया, फंगस और परजीवियों से भी यूटीआई की समस्या होती है.

यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फैक्शन जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है हमारे यूरिनरी सिस्टम का संक्रमण है. इस सिस्टम के अंग हैं किडनी, यूरिनरी ब्लैडर और यूरेथ्रा. इन में कोई अंग संक्रमित हो जाए तो उसे यूटीआई कहते हैं. इस संक्रमण के अधिकांश मरीजों के यूरिनरी टै्रक्ट का निचला हिस्सा प्रभावित होता है और यह संक्रमण यूरेथ्रा और ब्लैडर तक फैल जाता है. यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फैक्शन वैसे तो अधिक गंभीर  समस्या नहीं है, पर समय पर इलाज न हो तो इस संक्रमण के चलते कई अन्य गंभीर समस्याएं जन्म ले सकती हैं.

यूटीआई के कुछ आम कारण हैं- पीरियड्स के दिनों में योनि और गुदामार्ग की साफसफाई में कमी, प्रौस्टेट का बड़ा होना और शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता में कमी.

मूत्र मार्ग के अंदर और आसपास मौजूद बैक्टीरिया मौनसून में बहुत तेजी से बढ़ते हैं, जिस से संक्रमण का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है. यह समस्या महिला और पुरुष दोनों में होती है. मगर महिलाओं में अधिक होती है. इस की वजह है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं का यूरिनरी ट्रैक्ट छोटा होना.

रोकथाम के उपाय

– शारीरिक साफ-सफाई पर ध्यान देना जैसे यौन संबंध से पहले और बाद में पेशाब कर लेना.

– अधिक मात्रा में तरल पदार्थ का सेवन करना और पेशाब देर तक न रोकना.

– क्रैनबैरीज खाना या उन का जूस पीना, अनन्नास का जूस पीना भी इस बीमारी और इस के खतरे को कम करने में सहायक होता है.

– पर्याप्त विटामिन सी लेने से भी पेशाब में बैक्टीरिया नहीं पनपता है.

-डा. अनुभा सिंह

गाइनोकोलौजिस्ट व आईवीएफ ऐक्सपर्ट

Valentine’s Special: साथ तुम्हारा

Valentine’s Special:  मेन सड़क पार करने में सुमना की हालत बिगड़ जाती है. दूसरे लोग तो जल्दी से पार हो जाते हैं, पर वह जब सारी गाडि़यां निकल जाती हैं और दूर तक कोई गाड़ी आती नहीं दिखती, तभी झट से कुछ तेज चल कर आधी सड़क पार करती है. फिर दूसरी तरफ से गाडि़यां पार हो जाती हैं तब आधी सड़क पार करती है. पहले वह सड़क अकेले पार करती थी. पर अब उस के दोनों हाथ व्हीलचेयर पकड़े रहते हैं, जिस पर बैठे रहते हैं उस के पति सुहैल.

‘‘तुम सड़क पार करने में बहुत डरती हो,’’ सड़क पार होने के बाद सुहैल ने पीछे मुड़ कर कहा.

‘‘सच में बहुत डर लगता है. ऐसा लगता है जैसे गाड़ी मेरे शरीर पर ही चढ़ जाएगी और बड़ी गाडि़यों को देख तो मैं और डर जाती हूं. लेकिन आप साथ में रहते हैं तो हिम्मत बंधी रहती है कि चलो पार हो जाऊंगी.’’ दोनों बातें करतेकरते स्कूल गेट के पास आ गए. तभी सुमना के पर्स में रखा मोबाइल बजने लगा. कंधे से झूल रहे पर्स में से उस ने मोबाइल निकाला और स्क्रीन पर आ रहे नाम को देख काटते हुए बोली, ‘‘पापा का फोन है. आप को क्लास में पहुंचा कर उन से बात करूंगी.’’

‘‘तुम्हारे पापा तुम्हें अपने पास बुला रहे हैं न…?’’ सुहैल का चेहरा उतर गया.

‘‘नहीं तो,’’ सुमना साफ झूठ बोल गई, ‘‘यह आप से किस ने कह दिया? वे तो ऐसे ही हालचाल जानने के लिए फोन करते हैं. आप क्लास में चलिए.’’ सुमना व्हीलचेयर पकड़े सुहैल को 9वीं कक्षा में ले गई और खुद पढ़ने स्कूल के बगल में कालेज में चली गई. वह बी.ए. फर्स्ट ईयर में थी. एक पीरियड खत्म होने के बाद वह आई और सुहैल को 10वीं कक्षा में ले गई. फिर अपनी क्लास में आई. वहां 45 मिनट पूरे होने के बाद भी मैडम इतिहास पढ़ाती ही रहीं तो वह खड़ी हो कर बोली, ‘‘ऐक्सक्यूज मी मैम, सुहैलजी को 8वीं कक्षा में छोड़ने जाना है और उन की दवा का भी समय हो गया है. मैं जाऊं?’’

‘‘हां, जाओ.’’ 5-7 मिनट बाद वह लौट कर आई तो मैडम उसी के इंतजार में अभी तक क्लास में थीं. उसे कुछ नोट्स दे कर उन्होंने कहा, ‘‘सुमना, तुम बुहत संघर्ष कर रही हो. मुझे तुम पर गर्व है.’’

‘‘मैम, ऐसी कोई बात नहीं है,’’ वह हलके से मुसकराई.

‘‘विपरीत परिस्थितियों में हंस कर जीना कोई तुम से सीखे.’’ मैडम उस की पीठ थपथपा कर चली गईं और उन के पीछे सारे लड़केलड़कियां भी चले गए. अब क्लास में सिर्फ वही थी. वह नोट्स पढ़ने ही वाली थी कि तभी उस का मोबाइल बजा.

‘‘हां, पापा, बोलिए….’

‘‘बेटा, तुम ठीक हो न? अभी तो तुम कालेज में होगी और सुहैल को इस कक्षा से उस कक्षा में ले जा रही होगी?’’

‘‘जी…’’

‘‘बेटा, क्यों इतनी मेहनत कर रही हो? चली आओ हमारे पास. तुम्हें इतना संघर्ष करते देख मेरी आत्मा रोती है. ऐसा कब तक चलेगा? आजा बेटा, सब छोड़ कर हमारे पास. हम तुम्हारी दूसरी शादी करवा देंगे. भरत से तुम प्यार करती थीं न. वह तुम से शादी करने के लिए तैयार है.’’ सुमना ने बिना जवाब दिए फोन काट दिया. पर उस का दिल बहुत भारी हो गया था. तभी चौथे पीरियड की घंटी बजी. आंखों की कोर से आसूं पोंछ वह सुहैल को 7वीं कक्षा में पहुंचाने गई. उस की सूरत देख सुहैल ताड़ गए कि बात क्या हुई होगी तो बोले, ‘‘सुमना, तुम रो रही थीं न? अपने पापा की बात मान जाओ, चली जाओ उन के पास.’’ सुमना सुहैल की आंखों में देखती रह गई. उसे लगा कि कैसे इन्होंने मेरी चोरी पकड़ ली. पर वह कुछ बोली नहीं, चुपचाप उन्हें कक्षा में पहुंचा आई. उस के कालेज में हरेभरे मैदान में उस की सारी सहेलियां धूप में बैठी हंस, खिलखिला रही थीं. उन्होंने उसे पुकारा पर वह फीकी मुसकान के साथ हाथ हिला कर क्लास में आ गई. उस का मन कर रहा था कि वह खूब चीखचीख कर रोए लेकिन सुहैल ने उसे रोते देख लिया तो उन्हें कितना दुख होगा, यह सोच वह चुप रही. क्लास में अकेली वह खिड़की के पास बैठी थी. उस ने सिर को दीवार से टिका दिया और रोकतेरोकते भी उस की आंखों से आंसू गिरने लगे. आंसू गिर रहे थे और उस की पिछली जिंदगी के पन्ने फड़फड़ा रहे थे. पढ़ाई में कमजोर सुमना बस पापा की जिद की वजह से इंटर की देहरी लांघने के लिए कालेज जाती थी. लेकिन उस के ख्वाबों में बी.कौम में पढ़ने वाला हैडसम भरत ही घूमता रहता. आंखें बंद कर वह उस के साथ सपनों का महल सजातीसंवारती. भरत भी उस की खूबसूरती पर मर मिटा था.

एक दिन रास्ते में सुमना के पापा की मुलाकात उन के दोस्त की पत्नी और बेटे से हो गई. वे उन से 5-6 साल बाद मिल रहे थे. अभिवादन के बाद दोस्त की पत्नी को सादी साड़ी में देख अपने मास्टर दोस्त के हार्ट अटैक से गुजर जाने का उन्हें पता चला. उन्हें बहुत दुख हुआ. पर यह जान कर खुशी हुई कि अपने पापा की जगह पर उन के इकलौते बेटे सुहैल को नौकरी मिल गई. अब वह इसी शहर में नौकरी कर रहा है. सुहैल ने पैर छू कर उन का आशीर्वाद लिया और उन्हें उस में अपना भावी दामाद नजर आया. इसीलिए उन्होंने मांबेटे को अपने घर आमंत्रित किया. सुमना की मां को भी सुहैल पसंद आया और सुहैल तथा उस की मां को सुमना एक नजर में भा गई. लेकिन सुमना को सुहैल फूटी आंख भी पसंद नहीं आया. कहां वह रूपयौवन से भरपूर लंबी और तीखे नाकनक्श की लड़की और सुहैल थोड़े नाटे कद का और सांवला. ऊपर से उस के सिर के बीच के बाल उड़ गए थे और चांद दिख रहा था. सुमना पर तो जैसे वज्रपात हो गया. उस ने मां से कह सीधेसीधे शादी से इनकार कर दिया. मगर उस के पापा आपे से बाहर हो गए, ‘‘मैं ने तुम्हारी बहनों को जिस खूंटे से बांधा वे बंध गईं और तुम अपनी पसंद के लड़के से ब्याह रचाओगी. यह मेरे जीतेजी नहीं हो सकता. बाइक पर घुमाने वाले उस भरत के पास है ही क्या? बाप की दौलत पर मौज करता है. कल को उस का बाप उसे घर से निकाल देगा, तो वह कटोरा ले कर भीख मांगेगा. सुंदर चेहरे का क्या अचार डालना है? सुहैल मेरा देखासुना, अच्छा लड़का है. सरकारी नौकरी है उस की. घरद्वार सब है. ऊपर से इकलौता है. अब क्या चाहिए? इस घर का दामाद सुहैल बनेगा, नहीं तो तुम मेरा मरा हुआ मुंह देखोगी.’’ मांबहनों ने सुमना को खूब समझाया और उस की शादी सुहैल से हो गई.

सुहैल सुमना को जीजान से चाहता था, पर वह मन ही मन उस पर खफा रहती. उस के साथ रास्ते में चलते हुए उसे बड़ी शर्म आती. ‘हूर के साथ लंगूर’ कहकह सहेलियों ने उस की खूब खिल्ली उड़ाई. वह मन ही मन सुहैल को ‘चंडूल’ कहती. सुहैल अपना नया नामकरण जान कर भी  उस पर जान छिड़कता रहा. वह सुमना को आगे पढ़ाना चाहता था. जिस स्कूल में वह पढ़ाता था उस में कालेज भी था. उस ने उस का बी.ए. में ऐडमिशन करा दिया. वह पढ़ने में कमजोर थी, अत: उस की पढ़ाई में भरपूर मदद करता. सुमना के न चाहते हुए भी उस के पैर भारी हो गए. सास ने खूब धूमधाम से उस की गोदभराई करवाई. पर कुदरत से उन की ये खुशियां देखी नहीं गईं. एक रात 8-9 बजे सुहैल ट्यूशन पढ़ा कर बाइक से घर लौट रहा था कि अचानक बाइक की हैडलाइट खराब हो गई और अंधेरे में वह बिजली के एक खंभे से टकरा कर गिर गया. तभी तेज रफ्तार से सामने से आ रही जीप उस के दोनों पैरों पर चढ़ गई. उस के दोनों पैर कुचल गए और जीप वाला भाग खड़ा हुआ. डाक्टर ने सुहैल के दोनों पैर घुटने तक काट दिए. मां और सुमना पर तो दुखों का पहाड़ टूट गया. मां को जबरदस्त सदमा तो इस बात का लगा कि अब उन का बेटा अपने पैरों पर नहीं चल पाएगा. वह तो अपाहिज हो गया. अब दूसरे के रहमोकरम का मुहताज रहेगा. इसी सदमे के कारण वे खुद ही दुनिया छोड़ गईं. सुमना पर यह दूसरा पहाड़ टूटा. ममतामयी सास के चले जाने से उस का रोरो कर बुरा हाल हो गया. अपनी मां का इस तरह चले जाना सुहैल से भी बरदाश्त नहीं हो रहा था. बिस्तर पर पड़ेपड़े वह दिनरात आंसू बहाता. एक तरह से वह डिप्रैशन में डूबता जा रहा था. अपने लाचार पति को इस तरह रोतातड़पता देख सुमना को उस पर बड़ी दया आती. अब उस की स्थिति देख उस का कठोर हृदय मोम की तरह पिघलता जा रहा था. उसी समय उस के पापा ने एक विस्फोट किया कि वह सुहैल को छोड़ दे. सुमना पापा से पूछना चाहती थी कि वह किस के भरोसे अपने पति को छोड़ दे? सुहैल की जिंदगी में जबरदस्ती उन्होंने ही उसे भेजा. आज जब वह अपाहिज हो गया है तो उसे छोड़ने की सलाह दे रहे हैं. क्या मैं उन के हाथों की कठपुतली हूं? मेरा कोई अस्तित्व नहीं है? मुझ पर कब तक बस पापा की ही चलती रहेगी? मेरे पास क्या दिलदिमाग नहीं है? लेकिन ये सारी बातें उस के मन में ही सिमट कर रह गईं.

सुहैल को लगता था कि सुमना एक न एक दिन उसे छोड़ कर चली जाएगी. एक तो वह उसे पसंद नहीं करती फिर एक अपाहिज के साथ वह कैसे रहेगी? और वह अपाहिज शरीर से उस की देखभाल भी कैसे करेगा? हां, सुमना के पेट में उस का एक अंश पल रहा है, शायद अब वह उसे जन्म भी न दे. फिर तो उन दोनों का रिश्ता खत्म हो ही जाएगा. बस, एक नौकरी बची थी, लेकिन वह होगी कैसे? ये सारे सवाल सुहैल के सामने सुरसा की तरह मुंह बाए खड़े थे, जिन का वह समाधान ढूंढ़ता और उन में उलझ जाता. मात्र एक साल ही हुआ था इस शादी को. सुमना एक ऐसे सच का सामना कर रही थी, जिस की उस ने कल्पना भी नहीं की थी. सुहैल को टूट कर बिखरते देख वह उस की शक्ति बन ढाल बनी हुई थी. पहली बार उस ने सुहैल का हाथ अपने हाथों में ले कर कहा, ‘‘जो हो गया उसे तो हम नहीं बदल सकते. अब आगे जो जिंदगी बची है उसे तो हम हंस कर जीएं. आप बच्चों को हिम्मत से लड़ने की बात सिखाते रहे हैं और आज खुद हिम्मत छोड़ कर बैठे हैं. आप कल से स्कूल पढ़ाने जाइए और मैं कालेज पढ़ने जाया करूंगी. हमें अपने आने वाले बच्चे को एक बेहतर समाज और एक सुनहरा भविष्य देना है. इस तरह हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से कुछ नहीं होगा.’’

सुहैल नम आंखों से सुमना को देखे जा रहा था कि उसे नापसंद करने वाली आज उसे अपनी मां की तरह समझा रही है. ‘‘आप अगर मेरी बात नहीं मानेंगे तो फिर मैं आप को चंडूल महाराज बोलूंगी,’’ सुमना ने हंस कर कहा ताकि सुहैल को हंसी आ जाए. वह ठठा कर हंस दिया. फिर बोला, ‘‘मैं सोच रहा था कि इतने दिनों से कोई मुझे मेरे प्यारे नाम से बुलाता क्यों नहीं? हां, यह ठीक है. मैं एक नौकर रख लेता हूं. वह मुझे स्कूल ले जाएगा, लाएगा और तुम कालेज जाना. अरे हां, तुम पढ़ने के फेर में मेरे आने वाले बच्चे की देखभाल मत भूल जाना. वैसे अभी बच्चे के जन्म में तो समय है न?’’ ‘‘बहुत समय है. अभी तो साढ़े 3 महीने ही हुए हैं. 7वां महीना लगते ही मैं कालेज से छुट्टी ले लूंगी.’’

‘‘दीदी… सर आप को बुला रहे हैं,’’ एक छात्र ने आ कर कहा तो सुमना जैसे नींद से जागी.

‘‘तुम चलो मैं आती हूं,’’ कह कर वह आंसू पोंछ कर मैदान में आ गई. सुहैल व्हील चेयर पर बैठा उसी का इंतजार कर रहा था, लेकिन जब वह आई तब कुछ बोला नहीं. सुमना भी खामोशी से उसे घर ले कर आ गई. सुहैल ने फोन कर अपने नौकर को जल्दी से जल्दी आने को कहा. अपनी पत्नी की तबीयत खराब होने के कारण वह गांव चला गया था. उस ने दूसरे दिन ही आने का वादा किया. सुमना आते ही रसोई में जुट गई. खाना बना कर उस ने सुहैल को दे दिया तो वह खाने लगा. सुमना को भी भूख लगी थी. वह खाने बैठी ही थी कि फिर पापा का फोन आ गया. वह दूसरे कमरे में जा कर उन से बातें करने लगी. इस बार फोन पर मां भी थीं. वे भी सुमना को सब छोड़छाड़ कर अपने पास बुला रही थीं. पापा ने एकदम खुल कर कहा, ‘‘एक अपाहिज के साथतुम इतनी बड़ी जिंदगी कैसे काटोगी? वह तुम्हें कोई सुख नहीं दे सकता, तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकता. तुम भरत से शादी कर लो. मैं ने एक डाक्टर से अबौर्शन करवाने की बात कर ली है. वह तैयार…’’

सुमना को लगा कि उस के कान में पिता की आवाज नहीं गरमगरम सीसा जा रहा है. अबौर्शन की बात पर उस का पूरा वजूद हिल गया. उस की ममता जाग उठी. अपने अजन्मे बच्चे की गरदन पर अपने पिता के खूनी हाथ की कल्पना कर उस का सर्वांग कांप उठा. उस का वात्सल्य प्रेम खौलते हुए खून के साथ चिंघाड़ उठा, ‘‘वाह पापा वाह. आप जैसा पिता तो मैं ने देखा ही नहीं. जब मैं भरत को चाहती थी तो आप ने जबरदस्ती सुहैल से मेरी शादी करवाई और आज जब वे अपाहिज हो गए हैं तो उन्हें छोड़ने के लिए रोजरोज मुझ पर दबाव डाल रहे हैं. आप जैसा स्वार्थी और मौकापरस्त इनसान मैं पहली बार देख रही हूं. भरत से मेरी शादी होते ही अगर उस का भी ऐक्सीडैंट हो गया या वह मर गया, तो आप मेरी तीसरी शादी करवाएंगे? जिस बच्चे के आने की खुशी में मैं और सुहैल जी रहे हैं उसे आप खत्म करवाने की सोच बैठे. आप ने मेरे मासूम बच्चे की हत्या करवाने की बात कैसे कह दी?’’ सुमना अपने अजन्मे बच्चे की याद में रो पड़ी. उस के पापा ने उस की सिसकी सुनी तो उन के मुंह पर ताला लग गया.

वह आगे बोली, ‘‘आप ने जिस उम्मीद के बलबूते पर मेरी शादी सुहैल से करवाई है, मैं उसी उम्मीद पर खरी उतरना चाहती हूं. अगर मेरी जिंदगी में संघर्ष है, तो मुझे यह संघर्ष और सुहैल के साथ जीवन जीना पसंद है. मैं उन्हें कभी नहीं छोड़ूंगी. मेरे सिवा उन का अब है ही कौन? आगे से इस विषय पर आप मुझ से कभी बात नहीं करेंगे,’’ कह कर सुमना ने मोबाइल का स्विच औफ कर दिया. तभी अचानक धड़ाम की आवाज आई तो वह दौड़ते हुए कमरे की तरफ गई. वहां देखा कि टेबल पर से पानी का गिलास लेने की कोशिश में सुहैल पलंग पर से नीचे गिर गया. ‘‘यह आप ने क्या किया? थोड़ा मेरा इंतजार नहीं कर सकते थे?’’ सुमना सुहैल को किसी तरह से उठाते हुए भर्राए गले से बोली.

‘‘अब तो सिर्फ नौकर का ही इंतजार करना पड़ेगा,’’ कहतेकहते सुहैल की आंखें छलछला आईं. ‘‘आप की जानकारी के लिए बता दूं कि मैं आप को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी. हमेशा आप की परछाईं बन कर रहूंगी. पापा को जो बोलना है बोलने दीजिए. यह मेरी जिंदगी है और मेरा फैसला है,’’ सुमना सुहैल को पलंग पर ठीक से बैठाते हुए बोलते जा रही थी. उस ने उस की भीगी पलकों को पोंछ दिया और बोली, ‘‘मर्दों को आंसू शोभा नहीं देते. मैं आप की धर्मपत्नी हूं, इसलिए अपना फर्ज निबाहूंगी. आज से मैं आप की मां की तरह आप को डांटूगी, समझाऊंगी, तो बहन की तरह दुलार और पत्नी की तरह प्यार करूंगी.’’ फिर उस ने सुहैल को गले से लगा लिया. ‘‘धन्यवाद सुमना, तुम्हारे साथ से मैं आबाद हो गया,’’ सुहैल भर्राए गले से बोला. उस को लगा कि सुमना ने उसे तीखी धूप से बचाते हुए उस पर अपनी शीतल छांव कर दी

Homemade Potato Snacks : घर पर यूं बनाएं टेस्टी मैंगो आलू कुरकुरे

Homemade Potato Snacks : अगर आप कुछ हैल्दी और स्वादिष्ट खाना चाहाते है तो आसान तरीकों से बनाएं मैंगो आलू कुरकुरे. ये है कुछ टिप्स घर पर तैयार किए हुए मैंगो आलू कुरकुरे की डिश की रेसिपी.

सामग्री

– 50 ग्राम कच्चे काम के टुकड़े

-150 ग्राम उबले बेबी आलू

-10 एमएल औयल 

– 15 एमएल मैंगो पल्प

– 3 ग्राम सौंफ

– 3 ग्राम कलौंजी

– 5 ग्राम लहसुन का पेस्ट

-5 ग्राम हरी मिर्च का पेस्ट

– 15 ग्राम गुड़

-5 एमएल सिराचा सौस

– गार्निश के लिए 2 केले की पत्तियां

-10 ग्राम सेव गार्निश के लिए

– तलने के लिए तेल

– नमक स्वादानुसार.

विधि

सब से पहले बेबी आलुओं के छिलके उतार कर उन्हें 70% तक पकाएं. पकने पर ठंडा होने दें. फिर आलुओं को हलके हाथों से दबा कर हलका सुनहरा होने तक डीप फ्राई कर लें. अब पैन में तेल गरम कर के उस में सौंफ और कलौंजी को

1 मिनट चटकाने के बाद उस में हरीमिर्च व लहसुन का पेस्ट डाल कर 5 मिनट तक हलकी आंच पर पकाएं. फिर इस में कटे आम के टुकड़ेसिराया सौसगुड़नमक और मैंगो पल्प डाल कर अच्छी तरह मिश्रण बनाएं. जब मिश्रण अच्छी तरह पक जाए तो इस में फ्राइड आलू डाल कर आराम से मिक्स करें. फिर प्लेट में केले की पत्तियों पर रख कर उन में परोस कर मिंटसेव से गार्निश करें.

2- ब्लैक ग्रेप गजपाचो

सामग्री

– 50 ग्राम काले अंगूर

– 5 कालीमिर्च

– 1 चम्मच नीबू का रस

– 11/2 कप व्हाइट अंगूरों का रस

– 20 एमएल रैड वाइन

– 10 ग्राम चीनी

– 10 ग्राम बादाम बारीक कटे

– 5 एमएल लालमिर्च की चटनी.

विधि

अंगूरों के जूस और बादाम का पेस्ट तैयार करें. फिर वाइन में अंगूरों का रस और चीनी डाल कर अच्छी तरह मिलाएं. अब इस मिक्स्चर को मलमल के कपड़े में छान कर नीबू का रस और कुटी कालीमिर्च डालें. फिर इस सूप को एक बाउल में डाल कर ठंडा कर लाल मिर्च की चटनी और नमक डाल कर सर्व करें.   

Valentine’s Special : लव बौंबिंग ट्रेंड, बङे धोखे हैं इस राह में

Valentine’s Special  : सुनील और रेखा की दोस्ती कालेज में हुई. दोनों ने साथसाथ पढ़ाई करने और कहीं आनेजाने का प्लान बनाने लगे. शांत स्वभाव के सुनील को रेखा धीरेधीरे पसंद करने लगी क्योंकि वह हर बात पर रेखा का बहुत ध्यान रखता था। उसे कहीं ले जाना हो तो अपनी बाइक पर ले जाता था। ऐसे ही करीब 1 साल बीत गया। दोनों कालेज पास आउट हो कर नौकरी की तलाश में जुट गए. रेखा को जौब मिल गई, लेकिन सुनील को उस के मनमुताबिक जौब नहीं मिली. रेखा खुश थी कि दोनों को नौकरी मिल गई है और वे एक नई जिंदगी की शुरुआत कर सकेंगे।

एक दिन जब रेखा के कलीग ने रेखा और सुनील को मुंबई की चौपाटी पर देखा, तो मिलने चला आया और रेखा के काम की तरीफ सुनील से करने लगा, मगर उसे रेखा की इतनी तारीफ करना पसंद नहीं आई. रेखा यह समझ गई और उस व्यक्ति के जाने के बाद उस ने सुनील को समझाने की कोशिश की, लेकिन सुनील उस की बात समझ नहीं पा रहा था. अंत में दोनों में इस बात को ले कर काफी कहासुनी भी हो गई.

रेखा खुद औटो कर घर वापस आ गई, लेकिन सुनील की ऐसी बातों से वह दुखी हो चुकी थी. इतना शांत दिखने वाला सुनील इतनी लड़ाई कैसे कर सकता है? यह सब बात उस की समझ से बाहर थी.

दूसरे दिन से सुनील रेखा से थोड़ी दूरी बनाने लगा। बारबार फोन करने वाला सुनील न तो मैसेज करता और न ही फोन. रेखा जब भी इस बारे में पूछती, तो वह कुछ काम का बहाना दे कर टाल देता था.

ऐसे कई महीने बीत गए, लेकिन सुनील का नौर्मल व्यवहार रेखा को नहीं दिखा, रेखा के सारे सपने धीरेधीरे टूटने लगे, जो उस ने पिछले कुछ दिनों से देखा था क्योंकि अब ऐसे इंसान के साथ जीवन गुजार पाना उस के लिए भी मुमकिन नहीं था, जिस का प्यार कमजोर है.

असल में सुनील का रेखा के प्रति प्यार शुरुआत में एक जनून था और किसी दूसरे का रेखा की तारीफ करना उसे पसंद नहीं आ रहा था, इसलिए वह गुस्सा हुआ और लड़ाई कर लिया.

लव बौंबिंग है क्या

लव लव बौंबिंग वह स्थिति है, जब आप किसी के साथ बिना समझे एक गहरा, तीव्र संबंध बना लेते हैं. घंटों की बातचीत से ले कर सबकुछ बहुत जल्दी होता है. इस दौरान एक या दोनों व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का स्नेह, ध्यान और प्यार जीतने पर पूरी तरह से केंद्रित होते हैं. कई बार इस में भेंट का आदानप्रदान भी होता है, जो दोनों के प्यार की गहराई को स्पष्ट करता है, लेकिन एक छोटी सी बात दोनों में बड़ी दरार ला देता है और जिंदगीभर का पछतावा लड़की या लड़के को होने लगती है.

नए ट्रेंड से खुद को बचाएं

इस बारे में मनोचिकित्सक राशिदा कपाड़िया कहती हैं कि रिलेशनशिप में तेजी से एक नया ट्रेंड आजकल चल रहा है, जिसे लव बौंबिंग कहते हैं. इस में शुरुआत में पार्टनर बहुत टाइम देता है, आप का ध्यान खींचता है, ताकि आप इंप्रेस हो जाएं, जो बाद में इतना गहरा नहीं होता. कई बार यह लव बौंबिंग युवाओं पर गहरा व नकारात्मक असर डालती है, जहां रिश्ते की शुरुआत में ही अत्यधिक प्यार, तारीफ और तोहफों से लाद दिया जाता है, जिस से एक भ्रम पैदा होता है, लेकिन यह जल्द ही नियंत्रण, भावनात्मक हेरफेर और दुर्व्यवहार में बदल जाता है, जिस से युवा अपनी पहचान खो देते हैं, दूसरों से कट जाते हैं और अकेलेपन व असुरक्षा में फंस जाते हैं, जो मानसिक स्वास्थ्य और रिश्तों के लिए हानिकारक है.

रिश्तों को अच्छी तरह से समझें

पहले यह सब रोमांटिक लगता है, लेकिन असल में इस का मकसद आप को कंट्रोल करना या फिर अपने हिसाब से बदलना होता है. ऐसे पार्टनर को किसी भी हालत में किसी दूसरे के हिसाब से चलना पसंद नहीं होता और वे आसपास ऐसा माहौल बना देते हैं कि इंसान खुद ही उस के हिसाब से चलने लगता है, जो बाद में लड़ाईझगड़े और अलगाव का कारण बनता है.

इसलिए जब भी आप किसी रिश्ते में जाएं तो इस के स्वरूप को जान लेना जरूरी होता है, ताकि आप को बाद में किसी मानसिक समस्या का सामना न करना पड़े.

कुछ सुझाव निम्न हैं :

-बहुत जल्दी और ज्यादा प्यार जताना.

-लगातार मैसेज, कौल और गिफ्ट देना.

-परिवार और दोस्तों से दूरी.

-आप की पसंदनापसंद का अधिक परवाह न करना.

-इमोशनल प्रेशर डालना आदि.

प्यार है क्या

राशिदा कहती हैं कि असली प्यार भरोसे और समझ के साथ धीरेधीरे बनता है जबकि लव बौंबिंग अचानक और दिखावटी होता है. असली प्यार में आप की लिमिट्स की इज्जत की जाती है, किसी तरह का प्रेशर नहीं दिया जाता है. दूसरी तरफ लव बौंबिंग में कंट्रोल करने और इंप्रेस करने की कोशिश की जाती है. कहा जाए तो प्यार में असली दुनिया होती है, लेकिन लव बौंबिंग एक बनावटी गुब्बारा जैसा होता है, जिस के अंदर व्यक्ति खुद को सब से अधिक खुशहाल समझता है.

इस से बचने के तरीके

-किसी भी नए रिश्ते में जल्दी विश्वास न करें.

-इस बात को समझें कि क्या पार्टनर आप को आप के दोस्तों और परिवार से दूर कर रहा है?

-अपनी फीलिंग्स और लिमिट्स को समझें और साफ रखें।

-किसी भी तरह के प्रेशर और टौक्सिक नैचर को नजरअंदाज न करें.

-जरूरत पड़े तो भरोसेमंद दोस्त या मैंटल हैल्थ प्रोफैशनल से सलाह लें आदि।

इस प्रकार लव बौंबिंग एक तरह का इमोशनल धोखा है। यह एक तरह से दिखावे का प्यार है, जो शुरुआत में अच्छा लगता है, लेकिन असल में आप के लिए खतरनाक हो सकता है. सही प्यार हमेशा टाइम, भरोसे और समझदारी के साथ बनता है, इसलिए रिलेशनशिप में अलर्ट रहें और अपने आत्मसम्मान की रक्षा करें.

Family Story in Hindi :अब तुम्हारी बारी

Family Story in Hindi: दीप्ति जल्दीजल्दी तैयार हो रही थी. उस ने अपने बेटे अनुज को भी फटाफट तैयार कर दिया. आज शनिवार था और अनुज को प्रदीप के घर छोड़ कर उसे औफिस भी जाना था. शनिवार और रविवार वह अनुज को प्रदीप के घर छोड़ कर आती है क्योंकि उस की छुट्टी होती है. प्रदीप की लिव इन पार्टनर यानी प्रिया भी उस दिन अपनी मां के यहां मेरठ गई हुई होती है. अगर वह कभीकभार घर में होती भी है तो अनुज के साथ ऐंजौय ही करती है.

बता दें कि दीप्ति है कौन और अनुज का प्रदीप से रिश्ता क्या है. दरअसल, अनुज प्रदीप का बेटा है और दीप्ति प्रदीप की ऐक्स वाइफ. वैसे उसे ऐक्स भी नहीं कह सकते क्योंकि अभी दोनों में डिवोर्स नहीं हुआ है. फिर भी दोनों ने अपने रास्ते और अपनी दुनिया अलग कर ली है. प्रदीप मूव औन भी हो चुका है और प्रिया के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रह रहा है. दीप्ति अभी मूव औन नहीं हुई है मगर वापस प्रदीप की जिंदगी में जाने का कोई इरादा भी नहीं है.

दोनों ने आपसी सहमति से तय किया था कि सप्ताह के 2 दिन अनुज प्रदीप के साथ रहेगा और बाकी के 5 दिन दीप्ति के साथ. दरअसल दीप्ति अनुज को अपने पिता से मिलने का मौका देना चाहती है ताकि उस की बचपन की ग्रोथ पर बुरा असर न पड़े. मासूम को यह महसूस न हो कि उस के पिता नहीं हैं. एक तरह से वह बच्चे को मनोवैज्ञानिक रूप से स्ट्रौंग बनाए रखना चाहती है वरना उस ने देखा है कि कैसे टूटे हुए घरों के बच्चे भी अंदर से टूट जाते हैं.

प्रदीप की नई पार्टनर यानी प्रिया से दीप्ति को कोई शिकायत नहीं है. वह जब प्रदीप के घर अनुज को छोड़ने जाती है तो कई दफा दीप्ति घर में ही होती है. उस वक्त दोनों एकदूसरे को देख कर मुंह नहीं बनाते बल्कि मुसकराते हैं. दीप्ति अनुज को छोड़ कर शांति से अपने औफिस निकल जाती है. दीप्ति को प्रिया पर विश्वास है कि वह अनुज का खयाल रखेगी और फिर प्रदीप तो उस का पिता है ही.

एक दिन दीप्ति ने प्रदीप को सुबहसुबह फोन किया, ‘‘आज तुम किसी भी समय वी3एस मौल में मु?ा से मिलने आ जाओ.

यहां आना मेरे लिए आसान होगा क्योंकि मैट्रो से उतरते ही मौल है. कहीं अलग से जाना नहीं पड़ेगा.’’

‘‘ओके मगर कोई जरूरी काम था क्या?’’ प्रदीप ने पूछा.

‘‘दरअसल, मुझे तुम से अनुज की पढ़ाई से जुड़ी कुछ बातों की

चर्चा करनी थी. तुम उस के डैडी हो और मैं मानती कि ऐसे मामलों में जहां बच्चे का भविष्य जुड़ा हो वहां कोई भी फैसला बच्चे के पिता और मां दोनों का मिल कर लेना जरूरी है.’’

‘‘ओके फिर मैं हाफ डे ले कर तुम से मिलने करीब 4 बजे तक मौल पहुंचता हूं.’’

दीप्ति 3 बजे ही मौल पहुंच गई क्योंकि उसे कुछ शौपिंग भी करनी थी. वहां उसे प्रिया दिखाई दी. प्रिया भी प्रदीप का इंतजार कर रही थी. प्रदीप ने उसे 3 बजे शौपिंग के लिए बुलाया था मगर वह मीटिंग में फंस गया था. इसी वजह से उसे आने में समय लग रहा था.

दोनों एकदूसरे से बहुत प्यार से गले मिलीं और अच्छी सहेलियों की तरह एकदूसरे का हालचाल पूछने लगीं. आज पहली दफा दोनों को एकदूसरे के साथ वक्त बिताने का मौका मिला.

दीप्ति ने प्रिया का हाथ थाम कर कहा, ‘‘चलो कहीं बैठते हैं और खाते पीते हैं.’’

दोनों तीसरे फ्लोर पर स्थित फूड कोर्ट की तरफ बढ़ गईं. काउंटर पर पहुंच कर और्डर करने लगीं.

प्रिया बोली, ‘‘मुझे तो बस गोलगप्पे खाने हैं.’’

दीप्ति भी उत्साह से बोली, ‘‘भई गोलगप्पे खाने में तो मजा ही आ जाता है. ये खा कर सोचेंगे कि और क्या और्डर करें. वैसे यार हमारे टेस्ट कितने मिलते हैं. मैं खुद जब आती हूं चाट या गोलगप्पे बस यही 2 चीजें खाती हूं.’’

तब प्रिया बोल पड़ी, ‘‘सिर्फ खाने के टेस्ट ही नहीं मिलते हैं. तुम्हारा छोड़ा हुआ पति भी तो मु?ो पसंद आ गया.’’

दीप्ति हंस पड़ी और फिर पूछा, ‘‘यह बताओ प्रदीप की कौन सी बात तुम्हें सब से ज्यादा पसंद आती है?’’

प्रिया बताने लगी,’’ प्रदीप शायरी बहुत अच्छा करता है. जानती हो अकसर मु?ो देख कर मेरी खूबसूरती पर, मेरी आंखों पर, मेरे होंठों पर. बालों पर खूबसूरत शायरी सुनाता है.’’

इस बात पर दीप्ति हंसने लगी तो प्रिया चौंक कर बोली, ‘‘ऐसे क्यों हंस रही हो?

क्या तुम्हें उस की शायरी पसंद नहीं आई थी? क्या तुम्हारे लिए शायरी नहीं करते थे या फिर तुम्हें उस का शायरी सुनाने का अंदाज पसंद नहीं?’’

‘‘मैं मानती हूं कि उस का लहजा अच्छा है. मुझे भी उस से शायरी सुनना बहुत भाता था,

मगर एक बात बता दूं, वह शायरी सुनाता तो अच्छा है मगर यह शायरी वह खुद लिखता नहीं है.’’

‘‘यह क्या कह रही हो?’’ प्रिया ने चौंकते हुए पूछा.

‘‘सच कह रही हूं वह शायरी उस ने खुद नहीं लिखी है बल्कि चोरी की है और वह भी अपने दोस्त की डायरी से. क्या पता उस ने अपने दोस्त की डायरी भी चोरी की हो,’’ दीप्ति ने अपना शक जाहिर किया.

‘‘क्या मतलब है तुम्हारा? तुम ऐसा कैसे कह सकती हो?’’

‘‘सही कह रही हूं. जब मैं नई थी तो मुझे भी उस ने अपनी शायरी से बहुत

प्रभावित किया था. मैं उस की शायरी की दीवानी हुआ करती थी. मगर एक दिन मैं ने उस की अलमारी में एक डायरी देखी. वह डायरी किसी अमन की थी और प्रौपर हैंडराइटिंग भी किसी और की थी यानी अमन की थी. लेकिन उस डायरी में शायरी वही थी जो प्रदीप मुझे अपनी कह कर सुनाया करता था.

‘‘फिर जब मैं ने उसे इस बात पर चार्ज किया और डायरी दिखा कर उस से पूछा कि यह सब क्या है, तब उस ने स्वीकार किया कि वह मुझे अपने दोस्त की शायरी सुनाता है,’’ दीप्ति ने बात साफ की.

‘‘यह तो बहुत गलत है. ऐसा तो मैं ने सोचा भी नहीं था. मैं तो बस आत्ममुग्ध हुआ करती थी कि मेरी खूबसूरती पर वह इतनी अच्छी शायरी कैसे कर लेता है.’’

‘‘कोई नहीं, बोलने का तरीका तो उसी

का है जो काफी अच्छा है,’’ दीप्ति ने बात संभालनी चाही.

‘‘हां यह तो सही कह रही हो,’’ प्रिया रोंआंसी हो कर बोली.

प्रिया के दिमाग में कुछ उधेड़बुन शुरू हो गई थी. फिर भी नौर्मल होने की कोशिश करती हुई बोली, ‘‘गोलगप्पे

तो बहुत अच्छे हैं. पता है प्रदीप को भी बाहर खाना बहुत पसंद है. सप्ताह में 2 दिन तो हम बाहर आ ही जाते हैं खाने को. वह कहता है कि बस रोज तुम क्यों मेहनत करो. कभीकभी बाहर का खाना अच्छा लगता है. स्वाद भी बदलता है और हमें साथ समय बिताने का मौका भी मिलता है.’’

‘‘मेरे खयाल से समय साथ बिताना है तो वह तो घर में बिताते ही हो. जहां तक बात स्वाद बदलने की है तो वह जरूर सच है. प्रदीप का मन स्वादिष्ठ खाने का मन करता रहता है.’’

‘‘तुम ऐसा क्यों कह रही हो? मतलब मैं कुछ समझ नहीं?’’

‘‘समझना क्या है. समझ तो मैं भी नहीं थी. करीब 1 साल तक मुझे वह बात समझ नहीं आई थी. प्रदीप मुझे हमेशा बाहर खिलाने की जिद करता और कहता कि चलो आज बाहर चलते हैं या चलो बाहर खा कर आते हैं. मैं भी ख़ुशीख़ुशी उस के साथ निकल जाती थी.

‘‘एक दिन मुझे उस के दोस्त ने बताया कि वह औफिस में अपने दोस्तों से टिफिन भी ऐक्सचेंज करता है. तब मैं ने बैठ कर उस से पूछा था कि ऐसी क्या बात है. उस ने बताया कि उसे मेरा बनाया खाना पसंद नहीं आता. मुझे खयाल आया कि यह बंदा पहले तो मेरी डिशेज की बहुत तारीफ कर के खाता था.

‘‘फिर चुप रह कर खाने लगा था और इधर कुछ दिनों से सच में वह मेरे खाने में कभी नमक तेज, कभी जला हुआ, कभी कच्चा इस तरह की शिकायत करता. फिर जब उस दिन उस ने मुझे हकीकत बताई कि इस वजह से वह मुझे बाहर खिलाने ले जाता तो सम?ा आया कि उसे अपनी पत्नी के हाथ का बनाया खाना पसंद नहीं.

‘‘वही खाना अगर मैं उस के दोस्त के टिफिन में रखती तो वह जरूर बहुत स्वाद ले कर खाता मगर जब मैं बना कर खुद उस के टिफिन में रखती थी तो उसे पसंद नहीं आता था. मुझे लगता है उस का एक तरह से माइंड सैटअप बना हुआ है,’’ दीप्ति ने विस्तार से बताया.

प्रिया सोच में पड़ गई और फिर बोली, ‘‘यह सच हो सकता है क्योंकि मेरे खाने को भी वह कुछ दिन पहले तक तो स्वाद ले कर खाता था. पर इधर कुछ दिनों से वह कुछ कहता नहीं बस चुपचाप खा लेता है.’’

‘‘छोड़ो ज्यादा मत सोचो. अच्छा यह बताओ कि उस ने तुम्हें प्रपोज किया था या तुम ने उसे,’’ दीप्ति ने पूछा.

औफकोर्स उस ने ही किया था,’’ प्रिया बोली.

‘‘अच्छा कैसे?’’

‘‘बहुत ही अच्छे तरीके से. पता है पहले दिन उस ने मुझे अपने घर इनवाइट किया और जब मैं घर के अंदर दाखिल हुई…’’

‘‘तो उस ने ऊपर ऐसी सैटिंग की हुई थी कि दरवाजा खोलते ही ढेर सारी गुलाब की पंखुडि़यां तुम्हारे ऊपर बिखर गईं है न?’’

‘‘हां मगर तुम्हें कैसे पता?’’  प्रिया ने चौंक कर पूछा.

‘‘क्योंकि मेरे साथ भी उस ने ऐसा ही

किया था. मुझे अपना घर दिखाने के लिए वह मुझे ले कर आया था. घर में मेरे कदम पड़ते ही गुलाब की पंखुडि़यां बिखरीं और उस ने मुझे प्रपोज किया. जमीन पर बैठ कर, घुटनों के बल, रिंगहाथ में ले कर, बिलकुल वैसे ही जैसे फिल्मों में होता है.’’

‘‘यह तो तुम ने बिलकुल सही कहा. सब कुछ वैसा ही था जैसा फिल्मों में होता है. पर ऐसा वह सब के साथ करता है यह मुझे नहीं पता था. क्या तुम से पहले कोई और भी थी उस की जिंदगी में,’’ प्रिया ने सवाल किया. उस का चेहरा बुझ चुका था.

‘‘मेरे से पहले उस की जिंदगी में कोई थी या नहीं वह तो नहीं पता पर मेरी जिंदगी में जो हुआ वह सब तुम्हारी जिंदगी में कर रहा है यह समझ आ रहा है. मैं तुम्हें उस के खिलाफ भड़का नहीं रही मगर सचेत कर रही हूं कि उस से इतना ही जुड़ो जितना टूटने पर दिल टूटे न,’’ दीप्ति ने बात साफ करते हुए कहा.

दोनों थोड़ी देर खामोश बैठी रहीं. दीप्ति ने 2 प्लेट इडली का और्डर दिया और प्लेट ले कर वापस आ गई. प्रिया का खाने का दिल नहीं था मगर दीप्ति के जोर देने पर खाने लगी.

फिर प्रिया ने ही पूछा, ‘‘और कुछ बताओ दीप्ति प्रदीप की कोई और आदत जिसे शेयर करना चाहोगी?’’

‘‘अच्छा यह बताओ कि उस ने तुम्हें अच्छीअच्छी जगह घुमाने का वादा भी किया

होगा न?’’

‘‘हां उस ने मुझे करीब 5 साल की प्लानिंग अभी से बता रखी है.’’

‘‘जब तुम लोग साथ हुए उस के 2-4 महीनों के अंदर वह तुम्हें अच्छी जगह ले कर जरूर गया होगा.’’

‘‘हम लोग मनाली गए थे,’’ प्रिया ने बताया.

‘‘बस मनाली के बाद वह आगे नहीं बढ़ेगा और जो वह 5 साल की प्लानिंग बता रहा हैं न वह अगले 5 साल बाद भी मैं तुम से बात करूंगी तो उस पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा होगा क्योंकि उस ने मेरे साथ भी ऐसा ही किया. हमारी 8 साल की शादी में वह बस एक बार मुझे घुमाने ले गया. उस के बाद से प्लानिंग ही होती रही,’’ दीप्ति ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘यह क्या कह रही हो?’’  प्रिया को विश्वास नहीं हुआ.

‘‘सच कह रही हूं. जो मेरे साथ हुआ वही बता रही हूं.’’

‘‘उफ, क्या प्रदीप ऐसा है,’’ प्रिया परेशान स्वर में बोली.

‘‘देखो प्रिया मैं फिर कह रही हूं कि तुम से उस की बुराइयां करना मेरा मकसद नहीं है और न ही मैं उस का बुरा चाहती हूं क्योंकि मन से वह अच्छा है. कई बार वह इतनी अच्छी तरह से केयर करता है, इतनी प्यारी बातें करता है कि उसे छोड़ने का दिल नहीं करता. यही नहीं मैं मानती हूं वह हैंडसम भी है. उस के पास दूसरों को प्रभावित करने का हुनर भी है. मगर सच कहूं मुझे जिंदगी में कुछ और चाहिए था.

‘‘उस ने मुझे धोखा नहीं दिया. हमेशा

मुझे खुश रखने की कोशिश भी की पर मुझे ऐसा बंदा चाहिए था जो मेरा विश्वास जीत सके. मगर प्रदीप मेरा विश्वास नहीं जीत पाया इसलिए मैं अलग हुई वरना उस में कोई ऐसी बहुत बड़ी बुराई नहीं है. तुम्हें डराना नहीं चाहती. कुछ अपनी प्राथमिकताएं होती हैं. तुम्हें उस से क्या चाहिए और क्या नहीं चाहिए वह तुम डिसाइड करो. तुम्हें जिंदगी से क्या चाहिए यह भी तुम ही डिसाइड करोगी. वैसे एक बात और पूछूं?’’

‘‘हां पूछो न.’’

‘‘उस ने तुम्हें जरूर बताया होगा कि वह घर जिस में तुम दोनों रहते हो, उस ने अपने पैसों से खरीदा है. इस के अलावा 2 घर और हैं अलगअलग शहरों में और उस के पास बहुत जमीन जायदाद भी है. है न,’’ दीप्ति ने पूछा.

‘‘हां यह सब तो उस ने बताया मुझे.’’

‘‘इस में सचाई सिर्फ इतनी है कि उस ने यह घर लोन पर लिया है. बाकी उस के पास ऐसी कोई भारी जायदाद नहीं है. मगर इस से मुझे कोई दिक्कत नहीं थी. मुझे तो इंसान अच्छा चाहिए था. वह इंसान भी अच्छा था पर मेरी कसौटियों पर खरा नहीं उतरा. कई बार वह बहुत जल्दी गुस्सा हो जाता है और यह गुस्सा मैं सह नहीं पाती थी. अभी तुम नई हो. तुम्हारे साथ अभी वैसा गुस्सा नहीं होता होगा या हो सकता है मेरी ही कोई बात उसे गुस्सैल का बना रही होगी. समय के साथ क्या हो कुछ कह नहीं सकते.’’

‘‘यार तुम ने इतना कुछ बता दिया कि अब समझ नहीं आ रहा मुझे क्या करना चाहिए?’’ प्रिया की उलझन बढ़ गई थी.

‘‘अपने दिल की सुनो बस सब समझ आ जाएगा. वैसे उस की एक और आदत बताती हूं. वह नहा कर अपना गीला हुआ तौलिया कहीं भी पटक देता है. यहां तक कि बिस्तर पर भी रख देता है,’’ कह कर दीप्ति हंस पड़ी.

‘‘हां, वह ऐसा ही करता है.’’

‘‘प्रिया मैं ने बहुत से रिऐलिटी चैक

मिलने के बाद यह फैसला किया था कि उस से अलग हो जाऊं. मैं नहीं कह रही कि तुम्हें भी ऐसा करना चाहिए पर तुम अपनेआप को इतना स्ट्रौंग बना कर रखो कि अगर कभी तुम्हें उस से अलग होना पड़े तो तुम अंदर से टूटो नहीं. इसलिए कहीं न कहीं उस से उतनी ज्यादा मत जुड़ो कि टूटने पर खुद को संभाल न सको. बस इतना ही कहना चाहती हूं.’’

अब तक दोनों ने इडली खा ली थी. तभी प्रदीप का फोन प्रिया के पास आया कि वह अपने औफिस से निकल चुका है और उस से मिलने और शौपिंग कराने आ रहा है.

दीप्ति ने भरपूर नजरों से प्रिया की तरफ देखा और उसे गले से लगा लिया, ‘‘तुम मेरी छोटी बहन की तरह हो. मैं तुम्हारे दिल को ठेस नहीं पहुंचने देना चाहती. बात याद रखना कि खुद को इतना मजबूत बनाओ कि कभी जरूरी लगे तो उस से अलग होना कठिन न हो. बस मैं ने तो सही फैसला ले लिया अब तुम्हारी बारी है. तुम अपना खयाल रखना.’’

प्रिया ने दीप्ति को प्यार से देखते हुए अलविदा कहा और दोनों अपनेअपने रास्ते चल दिए. मगर आज प्रिया के मन में बहुत सी बातें उठ रही थीं. बहुत से सवाल थे और बहुत सी उलझनें थीं. आज प्रदीप से मिलने जाने के लिए उस के कदम खुशी से नहीं उठ रहे थे बल्कि बहुत थकेथके से उठ रहे थे.

Valentine’s Special : नहले पे दहला

Valentine’s Special : पूर्णिमा तुझे मनु याद है?’’ मां ने खुशी से पूछा.

‘‘हां,’’ और फिर मन ही मन बोली कि अपने बचपन के उस इकलौते मित्र को कैसे भूल सकती हूं मां, जिस के जाने के बाद किसी और से दोस्ती करने को मन ही नहीं किया.

‘मनु वापस आ रहा है… किसी बड़ी कंपनी का मैनेजर बन कर…’’

‘‘मनु ही नहीं राघव और जया भाभी भी आ रहे हैं,’’ पापा ने उत्साह से मां की बात काटी.

‘‘मैं ने तो राघव से फोन पर कह दिया है कि जब तक आप का अपना घर पूरी तरह सुव्यवस्थित नहीं हो जाता तब तक रहना और खाना हमारे साथ ही होगा.’’

‘‘तो उन्होंने क्या कहा?’’

‘‘कहा कि इस में कहने की क्या जरूरत है? वह तो होगा ही. बिलकुल नहीं बदले दोनों मियांबीवी. और मनु भी पीछे से कह रहा था कि पूर्णिमा से पूछो कुछ लाना तो नहीं है. तब भाभी ने उसे डांट दिया कि पूछ कर कभी कुछ ले कर जाते हैं क्या? बिलकुल उसी तरह जैसे बचपन में डांटा करती थीं.’’

‘‘और मनु ने सुन लिया?’’ पूर्णिमा ने खिलखिला कर पूछा.

‘‘सुना ही होगा, तभी तो डांट रही थीं और इन सब संस्कारों की वजह से उस ने यहां की पोस्टिंग ली है वरना अमेरिका जा कर कौन वापस आता है,’’ पापा ने सराहना के स्वर में कहा. यह सुन कर पूर्णिमा खुशी से झूम उठी. बराबर के घर में रहने वाले परिवार से पूर्णिमा के परिवार का रातदिन का उठनाबैठना था. वह और मनु तो सिर्फ सोने के समय ही अलग होते थे वरना स्कूल जाने से ले कर खेलना, होमवर्क करना या घूमने जाना इकट्ठे ही होता था. आसपास और बच्चे भी थे, लेकिन ये दोनों उन के साथ नहीं खेलते थे. फिर अचानक राघव को अमेरिका जाने का मौका मिल गया. जाते हुए दुखी तो सभी थे, मगर कह रहे थे कि जल्दी लौट आएंगे पी.एचडी. पूरी होते ही. मौका लगा तो बीच में भी एक चक्कर लगा लेंगे.

लेकिन 20 बरसों में आज पहली बार लौटने की बात की थी. उस समय संपर्क साधन आज की तरह विकसित और सुलभ नहीं थे. शुरूशुरू में राघव फोन किया करते थे. नई जगह की मुश्किलें बताते थे यह भी बताते रहते कि जया और मनु लता भाभी और पूर्णिमा को बहुत याद करते हैं. लेकिन नए परिवेश को अपनाने के चक्कर में धीरेधीरे पुराने संबंध कमजोर हो गए. 10 बरस पहले का दुबलापतला मनु अब सजीलारोबीला जवान बन गया था. वह पूर्णिमा को एकटक देख रहा था.

‘‘ऐसे क्या देख रहा है? पूर्णिमा ही है यह,’’ लता बोलीं.

‘‘यही तो यकीन नहीं हो रहा आंटी. मुझे समझ में नहीं आ रहा कि मुटल्ली पूर्णिमा इतनी पतली कैसे हो गई?’’

‘‘वह ऐसे कि तेरे साथ मैं हरदम खाती रहती थी. तेरे जाने के बाद उस गंदी आदत के छूटते ही मैं पतली हो गई,’’ पूर्णिमा चिढ़ कर बोली.

‘‘यानी मेरे जाने से तुझे फायदा हुआ.’’

‘‘सच कहूं मनु तो पूर्णिमा को वाकई फायदा हुआ,’’ महेश ने कहा, ‘‘तेरे जाने के बाद यह किसी और से दोस्ती नहीं कर सकी. किताबी कीड़ा बन गई, इसीलिए प्रथम प्रयास में आईआईएम अहमदाबाद में चुन ली गई और आज इन्फोटैक की सब से कम उम्र की वाइस प्रैजीडैंट है.’’

‘‘अरे वाह, शाबाश बेटा. वैसे महेश, फायदा मनु को भी हुआ. यह भी किसी से दोस्ती नहीं कर रहा था. भला हो सैंडी का… उस ने कभी इस की अवहेलना का बुरा नहीं माना और दोस्ती का हाथ बढ़ाए रखा. फिर उस के साथ यह भी सौफ्टवेयर इंजीनियर बन गया,’’ राघव बोले.

‘‘वरना इसे तो राघव अंकल की तरह काले कोट वाला वकील बनना था और मुझे भी वही बनाना था,’’ पूर्णिमा बोली. ‘‘अच्छा हुआ अंकल आप अमेरिका चले गए.’’सब हंस पड़े. फिर लता बोलीं, ‘‘क्या अच्छा हुआ, यहां रहते तो तू आज तक कुंआरी नहीं होती.’’

‘‘वह तो है लता,’’ जया ने कहा, ‘‘खैर अब आ गए हैं तो हमारा पहला काम इसे दुलहन बनाने का होगा. क्यों मनु?’’

‘‘बिलकुल मम्मी, नेक काम में देर क्यों? चट मंगनी पट शादी रचवाओ ताकि भारतीय शादी देखने के लालच में सैंडी भी जल्दी आ जाए.’’

‘‘यही ठीक रहेगा. इसी बहाने सभी पुराने परिजनों से एकसाथ मिलना भी हो जाएगा,’’ राघव ने स्नेह से पूर्णिमा के सिर पर हाथ फेरा, ‘‘चल तैयार हो जा बिटिया, सूली पर झूलने को.’’पूर्णिमा ने कहना तो चाहा कि सूली नहीं अंकल, मनु की बलिष्ठ बांहें कहिए. फिर धीरे से बोली, ‘‘अभी तो हम सब को इतने सालों की जमा पड़ी बातें करनी हैं अंकल… आप को यहां सुव्यवस्थित होना है, उस के बाद और कुछ करने की सोचेंगे.’’

‘‘यह बात भी ठीक है, लेकिन बहू के आने से पहले उस की सुविधा और आराम की सही व्यवस्था भी तो होनी चाहिए यानी बहू के गृहप्रवेश से पहले घर भी तो ठीक हो. और भी बहुत काम हैं. तू नौकरी पर जाने से पहले मेरे कुछ काम करवा दे मनु,’’ जया ने कहा.

‘‘मुझे तो कल से ही नौकरी पर जाना है मम्मी पूर्णिमा से करवाओ जो करवाना है.’’

‘‘हां, पूर्णिमा तो बेकार बैठी है न. नौकरी पर तो बस मनु को ही जाना है,’’ पूर्णिमा ने मुंह बनाया, ‘‘मगर आप फिक्र मत करिए आंटी, आप को मैं कोई परेशानी नहीं होने दूंगी.’’

‘‘उस का तो सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि सब से बड़ी परेशानी तो पूर्णिमा आप स्वयं ही हैं,’’ मनु ने चिढ़ाया, ‘‘आप काम में लग जाइए, सारी परेशानी दूर हो जाएगी.’’

‘‘लो, हो गया शुरू मनु महाराज का अपने अधकचरे ज्ञान का बखान,’’ पूर्णिमा ने कृत्रिम हताशा से माथे पर हाथ मारा.

यह देख सभी हंस पड़े.

‘‘इतने बरस एकदूसरे से लड़े बगैर दोनों ने खाना कैसे पचाया होगा? ’’ लता बोलीं.

‘‘सोचने की बात है, झगड़ता तो खैर सैंडी से भी हूं, लेकिन अंगरेजी में झगड़ कर वह मजा नहीं आता, जो अपनी भाषा में झगड़ कर आता है,’’ मनु कुछ सोचते हुए बोला.

पूर्णिमा को यह सुनना अच्छा लगा. मनु का लौटना ऐसा था जैसे पतझड़ और जाडे़ के बाद एकदम बहार का आ जाना और वह भी इतने बरसों के बाद. होस्टल में अपनी रूममैट को कई बार पढ़ते हुए भी गुनगुनाते सुन कर वह पूछा करती थी कि पढ़ाई के समय यह गानाबजाना कैसे सूझता है, सेजल? तो वह कहती थी कि जब तुम्हें किसी से प्यार हो जाएगा न तब तुम इस तरह गुनगुनाने लगोगी. सेजल का कहना ठीक था, आज पूर्णिमा का मन गुनगुनाने को ही नहीं झूमझूम कर नाचने को भी कर रहा था. उस के बाद प्रत्यक्ष में तो किसी ने पूर्णिमा की शादी की बात नहीं की थी, लेकिन जबतब लता और महेश लौकर में रखे गहनों और एफडी वगैरह का लेखाजोखा करने लगे थे. राघव ने भी आर्किटैक्ट बुलाया था, छत की बरसाती तुड़वा कर बहूबेटे के लिए नए कमरे बनवाने को. मनु को नए परिवेश में काम संभालने में जो परेशानियां आ रही थीं, उन्हें मैनेजमैंट ऐक्सपर्ट पूर्णिमा बड़ी सहजता से हल कर देती थी. अब मनु हर छोटीबड़ी बात उस से पूछने लगा था. वह अपने काम के साथ ही मनु के काम की बातें भी इंटरनैट पर ढूंढ़ती रहती थी. एक शाम उस ने मनु को फोन किया कि उसे जो जानकारी चाहिए थी वह मिल गई है. अत: उस का विवरण सुन ले.

‘‘मैं औफिस से निकल चुका हूं पूर्णिमा, तुम भी आने वाली होंगी. अत: घर पर ही बात कर लेंगे,’’ मनु ने कहा.

‘‘मैं तो घंटे भर बाद निकलूंगी.’’

‘‘ठीक है, फिर मिलते हैं.’’

लेकिन जब वह 2 घंटे के बाद घर पहुंची तो मम्मीपापा और अंकलआंटी बातों में व्यस्त थे. मनु की गाड़ी कहीं नजर नहीं आ रही थी.

‘‘मनु कहां है?’’ पूर्णिमा ने पूछा.

‘‘अभी औफिस से नहीं आया,’’ सुनते ही पूर्णिमा चौंक पड़ी कि इतनी देर रास्ते में तो नहीं लग सकती, कहीं कोई दुर्घटना तो नहीं हो गई. मगर तभी मनु आ गया.

‘‘बड़ी देर कर दी आज आने में?’’ जया ने पूछा.

‘‘वह ऊपर के कमरों के ब्लू प्रिंट्स सैंडी को भेजे थे न… उस की टिप्पणी के साथ आर्किटैक्ट के पास गया था. वहीं देर लग गई. अब कल से काम शुरू हो जाएगा.’’

पूर्णिमा यह सुन कर हैरान हो गई कि जिसे उन कमरों में रहना है उसे तो ब्लू प्रिंट्स दिखाए नहीं और सैंडी को भेज दिए. फिर पूछा, ‘‘सैंडी आर्किटैक्ट है?’’

‘‘नहीं, मेरी ही तरह सौफ्टवेयर इंजीनियर है.’’

‘‘तो फिर उसे ब्लू प्रिंट्स क्यों भेजे?’’

‘‘क्योंकि उसे ही तो रहना है उन कमरों में.’’

‘‘उसे क्यों रहना है?’’ पूर्णिमा ने तुनक कर पूछा.

‘‘क्योंकि वही तो इस घर की बहू यानी मेरी बीवी है भई.’’

‘‘बीवी है तो साथ क्यों नहीं आई?’’ पूर्णिमा अभी भी इसे मनु का मजाक समझ रही थी.

‘‘क्योंकि वह जिस प्रोजैक्ट पर काम कर रही है उसे बीच में नही छोड़ सकती. काम पूरा होते ही आ जाएगी. तब तक ऊपर के कमरे भी बन जाएंगे और नए कमरों में बहू का गृहप्रवेश धूमधाम से करवाने की मम्मी की ख्वाहिश भी पूरी हो जाएगी.’’

पूर्णिमा को मनु के शब्द गरम सीसे की तरह जला गए. उस ने अपने मातापिता की तरफ देखा. वे भी हैरान थे.

‘‘कमाल है भाभी, सास बन गईं और हमें भनक भी नहीं लगी,’’ महेश ने उलहाने के स्वर में कहा.

‘‘यह कैसे हो सकता है महेश भैया…’’

‘‘हम अभी तक वर्षों पुरानी बातें करते रहे हैं,’’ राघव ने जया की बात काटी, ‘‘इस बीच खासकर अमेरिका में क्या हुआ, उस के बारे में हम ने बात ही नहीं की.’’

‘‘मगर मैं ने तो पहले दिन ही कहा था कि मुझे बहू के गृहप्रवेश से पहले घर ठीकठाक चाहिए.’’

‘‘हम ने समझा आप हमारी बेटी के लिए कह रही हैं,’’ लता ने मन ही मन बिसूरते हुए कहा.

‘‘विस्तार से इसलिए नहीं बताया कि बापबेटे ने मना किया था कि अमेरिका में क्या करते थे या क्या किया बता कर शान मत बघारना…’’

‘‘सफाईवफाई क्या देनी मम्मी, सब को अपनी शादी का वीडियो दिखा देता हूं लेकिन डिनर के बाद,’’ मनु ने बात काटी, ‘‘तू भी जल्दी से फ्रैश हो जा पूर्णिमा.’’

‘‘मुझे तो खाने के बाद कुछ जरूरी काम करना है. मम्मीपापा को दिखा दे. मुझे सीडी दे देना. फुरसत में देख लूंगी.’’

‘‘मेरी शादी की सीडी है पूर्णिमा तुम्हारे औफिस की फाइल नहीं, जिसे फुरसत में देख लोगी,’’ मनु ने चिढ़ कर कहा, ‘‘जब फुरसत हो आ जाना, दिखा दूंगा. चलो, मम्मी खाना लगाओ, भूख लग रही है.’’ पूर्णिमा के परिवार की तो भूख मर चुकी थी, लेकिन नौकर के कई बार कहने पर कि खाना तैयार है, सब जा कर डाइनिंग टेबल के पास बैठ गए.

तभी मनु आ गया, ‘‘ओह, आप खाना खा रहे हैं, मैं फिर आता हूं.’’

‘‘अब आया है तो बैठ जा, खाना हो चुका है,’’ पूर्णिमा बोली.

‘‘अभी किसी ने खाना शुरू नहीं किया और तू कह रही है कि हो चुका. खैर, खातेखाते जो सुनाना है सुना दे,’’ मनु पूर्णिमा की बगल की चेयर पर बैठ गया.

लता और महेश ने चौंक कर एकदूसरे की ओर देखा.

‘‘क्या सुनना चाहते हो?’’ लता स्वयं नहीं समझ सकीं कि उन के स्वर में व्यंग्य था या टीस.

‘‘वही जो सुनाने को पूर्णिमा ने मुझे फोन किया था.’’

‘‘ओह, राजसंस का फीडबैक? काफी दिलचस्प है और वह इसलिए कि उन्होंने अभी तक किसी राजनेता का संरक्षण लिए बगैर अपने दम पर इतनी तरक्की की है.’’

‘‘यानी उन के साथ काम किया जा सकता है?’’

‘‘उस के लिए उन लोगों के विवरण देखने होंगे जो उन के साथ काम कर रहे हैं. चल तुझे पूरी फाइल दिखा देती हूं,’’ पूर्णिमा ने प्लेट सरकाते हुए कहा.

‘‘पहले तू आराम से खाना खा. बगैर खाना खाए टेबल से नहीं उठते. वह फाइल मुझे मेल कर देना. अभी चलता हूं,’’ मनु ने उठते हुए कहा.

‘‘क्यों सैंडी को फोन करने की जल्दी है?’’ लता ने पूछा.

‘‘नहीं आंटी, सैंडी तो अभी औफिस में होगी. वह आजकल ज्यादातर समय औफिस में ही रहती है ताकि काम पूरा कर के जल्दी यहां आ सके. हमें भी ऊपर के कमरे बनवाने में जल्दी करनी चाहिए. पापा को अभी यही समझाने जा रहा हूं,’’ फिर सभी को गुडनाइट कह कर मनु चला गया.

‘‘यह तो ऐसे व्यवहार कर रहा है जैसे कुछ हुआ ही नहीं है,’’ लता ने मुंह बना कर कहा.

‘‘सच पूछो तो मनु या उस के परिवार के लिए तो कुछ भी नहीं हुआ है और हमारे साथ भी जो हुआ है वह हमारी अपनी सोच, खुशफहमी या गलतफहमी के कारण हुआ है,’’ महेश ने कहा, ‘‘राघव या जया भाभी ने तो प्रत्यक्ष में ऐसा कुछ नहीं कहा. मनु ने तुझ से अकेले में कभी ऐसा कुछ कहा पूर्णिमा?’’

पूर्णिमा ने इनकार में सिर हिलाया.

‘‘आप ठीक कह रहे हैं, गलतफहमी तो हमें ही हुई है. सैंडी को भी तो हम सब लड़का समझते रहे,’’ लता बुझे स्वर में बोलीं, ‘‘लेकिन अब क्या करें?’’

‘‘राघव के परिवार के साथ सामान्य व्यवहार और पूर्णिमा के लिए रिश्ते की बात,’’ महेश का स्वर नर्म होते हुए भी आदेशात्मक था.

पूर्णिमा सिहर उठी, ‘‘नहीं पापा…मेरा मतलब है बातवात मत करिए. मैं शादी नहीं करना चाहती.’’

‘‘साफ कह मनु के अलावा किसी और से नहीं और उस का अब सवाल ही नहीं उठता. मुझे तो लगता है कि न तो राघव और जया भाभी ने तुझे कभी अपनी बहू के रूप में देखा और न ही मनु ने भी तुझे एक हमजोली से ज्यादा कुछ समझा. क्यों लता गलत कह रहा हूं?’’

‘‘अब तो यही लगता है. मनु की असलियत तो पूर्णिमा को ही पता होगी,’’ लता बोलीं.

पूर्णिमा चिढ़ गई, ‘‘या तो हंसीमजाक करता है या फिर अपने काम से जुड़ी बातें. इस के अलावा और कोई बात नहीं करता है.’’

‘‘कभी यह नहीं बताया कि वहां जा कर उस ने तुझे कितना याद किया?’’

‘‘कभी नहीं, अगर ऐसा लगाव होता तो संपर्क ही क्यों टूटता? मनु वहां जा कर जरूर सब से अलगथलग रहा होगा, क्योंकि जितनी अंगरेजी उसे आती थी उस से न उसे किसी की बात समझ आती होगी न किसी को उस की. सैंडी को भी अमेरिकन चालू लड़कों से यह बेहतर लगा होगा, इसलिए दोस्ती कर ली,’’ पूर्णिमा कुछ सोचते हुए बोली.

‘‘यह तो तूने बड़ी समझदारी की बात कही पूर्णिमा,’’ महेश ने कहा, ‘‘अब थोड़ी समझदारी और दिखा. डा. शशिकांत की तुझ में दिलचस्पी किसी से छिपी नहीं है, लेकिन तू उन्हें घास नहीं डालती. हालात को देखते हुए मनु नाम की मृगमरीचिका के पीछे भागना छोड़ कर डा. शशिकांत से मेलजोल बढ़ा ताकि हम भी राघव और जया भाभी को यह कह कर सरप्राइज दे सकें कि हम ने तो पूर्णिमा के लिए बहुत पहले से लड़का देख रखा है, बस किसी को बताया नहीं है. अब आप की बहू आ जाए तो रिश्ता पक्का होने की रस्म पूरी कर दें.’’

‘‘हां, यह होगा नहले पे दहला पापा,’’ पूर्णिमा के मुंह से निकला.

Valentine’s Day: पिया का घर

Valentine’s Day: कृष्णा अपने घने व काले केश बालकनी में खड़ी हो कर सुलझा रही थी. उस की चायजैसी भूरी रंगत को उस के घने केश और अधिक मादक बनाते थे. शादी के 10 वर्षों बाद भी सत्या उतना ही दीवाना था जितना पहले वर्ष था. सत्या का प्यार उस की सहेलियों के बीच ईर्ष्या का विषय था. पर कभीकभी सत्या के व्यवहार से कृष्णा के मन में संशय भी होता था कि यह प्यार है या दिखावा.

कुल मिला कर जिंदगी की गाड़ी ठीकठाक चल रही थी. छोटा सा परिवार था कृष्णा का, पति सत्या और बेटी विहा. लेकिन कुछ माह से कृष्णा ने महसूस किया था कि सत्या देररात को घर आने लगा है. जब भी कृष्णा पूछती, तो सत्या यह ही बोलता, ‘तुम्हारे और विहा के लिए खट रहा हूं वरना मेरे लिए दो रोटी काफी हैं.’

पर कृष्णा के मन को फिर भी ऐसा लगता था कि कहीं कुछ तो गलत हैं. बाल सुलझाते हुए कृष्णा के मन में यह सब चल रहा था कि बाहर दरवाज़े पर घंटी बजी. दरवाजा खोला, देखा सत्या खड़ा है. कृष्णा कुछ बोलती, सत्या बोल पड़ा, “अरे, उदयपुर जा रहा हूं 5 दिनों के लिए.

इसलिए सोचा कि आज पूरा दिन अपनी बेगम के साथ बिताया जाए.”

फिर सत्या ने 2 पैकेट पकड़ाए. कृष्णा ने खोल कर देखा, एक में बहुत सुंदर जैकेट थी और दूसरे में एक ट्रैक सूट. कृष्णा मुसकराते हुए बोली, “अच्छा, हर्जाना भर रहे हो नए साल पर यहां न होने के लिए?”

सत्या उदास होते हुए बोला, “कृष्णा, बस, 2 साल और, फिर मेरे सारे समय पर तुम्हारा ही हक होगा.”

कृष्णा रसोई में चाय बनाते हुए सोच रही थी कि सत्या आखिर परिवार के लिए सब कर रहा है और वह है कि शक करती रहती है. शाम को पूरा परिवार विहा के पसंदीदा होटल में डिनर करने गया था. सब ने लौंग ड्राइव की. डिनर के बाद कृष्णा का पसंदीदा पान और विहा की आइसक्रीम.

रात में कृष्णा ने सत्या के करीब जाना चाहा तो सत्या बोला, “कृष्णा, थक गया हूं, प्लीज आज नहीं.”

कृष्णा मन मसोस कर बोली, “यह तुम 7 महीनों से कह रहे हो?”

सत्या बोला, “यार, वर्कप्रैशर इतना है, क्या करूं. अच्छा, उदयपुर से वापस आ कर डाक्टर के पास चलते हैं, खुश, शायद काम की अधिकता के कारण मेरी पौरुषशक्ति कम हो गई है.” और सत्या गहरी नींद में डूब गया. कृष्ण सोच रही थी कि कहीं सत्या की क्षुधा कहीं और तो पूरी नहीं हो रही है. पर उस का मन यह मानने को तैयार नहीं था.

सुबह सत्या एयरपोर्ट के लिए निकल गया और कृष्णा, विहा के साथ शौपिंग करने निकल गई. घर आ कर विहा अपनी चीज़ों में व्यस्त थी और कृष्णा ने अपना मोबाइल उठाया तो देखा, उस में सत्या के मैसेज थे कि वह एयरपोर्ट पहुंच गया है और उदयपुर पहुंच कर कौल करेगा.

कृष्णा फोन रख ही रही थी कि उस ने देखा कि किसी सिद्धार्थ के मैसेज भी थे. उस ने उत्सुकतावश मैसेंजर खोला, तो मैसेज पढ़ कर उस के होश उड़ गए.

सिद्धार्थ के हिसाब से सत्या उदयपुर नहीं, नोएडा के लेमन राइस होटल में पूजा नाम की महिला के साथ रंगरलियां मना रहा है.

कृष्णा को लगा कि कोई शायद उस के साथ घटिया मज़ाक कर रहा है, इसलिए उस ने लिखा, ‘कैसे विश्वास करूं कि तुम सच बोल रहे हो?”

उधर से जवाब आया, ‘रूम नंबर 204, सैक्टर 62, होटल लेमन राइस, नोएडा.’

पूरी रात कृष्णा अनमनी ही रही. सत्या का फ़ोन आया था, वह कृष्णा को बता रहा था कि उस ने कृष्णा के लिए लाल रंग की बंधेज खरीदी हैं और विहा के लिए जयपुरी घाघरा.

फ़ोन रखकर कृष्णा को लगा कि वह कितना गलत सोच रही थी सत्य के बारे में. दोपहर में कृष्णा मैसेंजर पर सिद्धार्थ को ब्लौक करने ही वाली थी कि उस ने देखा, 3 फ़ोटो थे जो सिद्धार्थ ने भेजे हुए थे. तीनों फ़ोटो में एक औरत, सत्या के साथ खड़ी मुसकरा रही थी. तब कृष्णा सोचने लगी कि अच्छा तो इस का नाम पूजा है. कजरारी आंखें, होंठों पर लाल लिपस्टिक और लाल बंधेज की साड़ी. क्या अपनी महबूबा की उतरन ही उसे सत्या पहनाता है.

सुबह कृष्णा, विहा को साथ ले कर मेरठ से नोएडा के लिए निकल गई. वह अब दुविधा में नहीं रहना चाहती थी. नोएडा में वह अपने मम्मीपापा के घर पहुंची. पता चला मम्मीपापा गांव गए हुए हैं. कृष्णा के भैया बोले, “अरे, एकदम से, अचानक और सत्य कहां है?”

कृष्णा बोली, “भैया, आप की बहुत याद आ रही थी. बस, चली आई. और कल मेरे कुछ पुराने दोस्तों का नोएडा में गेटटूगेदर है, सोचा, आप लोगों से मिल भी लूंगी और दोस्तों से भी.”

सुबह नाश्ता कर के कृष्णा धड़कते हुए दिल के साथ होटल पहुंची. वह रिसैप्शन पर पहुंची ही थी कि सामने से सत्या और पूजा दिखाई दे गए थे. सत्या का चेहरा सफेद पड़ गया था पर फिर भी बेशर्मी से बोला, “तुम यहां क्या कर रही हो?”

कृष्णा आंसू पीते हुए बोली, “तुम्हें लेने आई हूं.”

सत्या बोला, “मैं दूध पीता बच्चा नही हूं, घर का रास्ता पता हैं मुझे.”

कृष्णा पूजा की तरफ गुस्से से देखते हुए बोली, “तो यह है आप का जरूरी काम जो तुम उदयपुर करने गए थे?”

सत्या भी बिना झिझक के बोला, “हां, यह पूजा मेरे साथ मेरे बिज़नैस में मदद करती है. कल ही हम उदयपुर से आए हैं और आज तो मैं मेरठ पहुंच कर तुम्हें सरप्राइज देने वाला था.”

कृष्णा बिना कुछ कहे दनदनाते हुए वापस अपने घर चली गई. जब भैया और भाभी ने पूरी बात सुनी तो भाभी बोली, “अरे, ऐसी औरतों के लिए अपना घर छोड़ने की गलती मत करना. कल मैं तुम्हें गुरुजी के पास ले कर जाऊंगी, तुम चिंता मत करो.”

अगले दिन जब कृष्णा अपनी भाभी के साथ वहां पहुंची तो गुरुजी ने बिना कुछ कहे ही जैसे उस के मन का हाल जान लिया था. कृष्णा को भभूति देते हुए गुरुजी ने कहा, “अपने पति के खाने में मिला देना. कम से कम एक माह तक ऐसा करोगी तो उस औरत का काला जादू उतर जाएगा. उस औरत ने तुम्हारे पति पर वशीकरण कर रखा है. जब वे वापस आएं तो कुछ मत कहना. गुरुवार को केले के पेड़ की पूजा करो और शुक्रवार को पूरी निष्ठा से उपवास करना.”

कृष्णा अगले दिन जब मेरठ जाने के लिए निकली तो भाभी बोली, “कृष्णा, मम्मीपापा से इस बात का जिक्र मत करना. तुम ये उपाय करोगी तो समस्या का समाधान अवश्य होगा, थोड़ा धीरज से काम लेना.”

कृष्णा वापस अपने घर आ गई और ठीक दूसरे दिन सत्या भी आ गया था. न सत्या ने कोई सफाई दी, न कृष्णा ने कोई सवाल किया. घर का माहौल थोड़ा घुटाघुटा सा था पर कृष्णा को विश्वास था कि वह पति को सही रास्ते पर ले आएगी.

रोज़ चाय या खाने में कृष्णा भभूति डाल कर देने लगी थी. सत्या अब समय पर घर आने लगा था. कृष्णा को लगा, शायद, गुरुजी के उपाय काम कर रहे हैं.

उधर सत्या एक पहुंचा हुआ खिलाड़ी था. वह शिकार तो अब भी कर रहा था पर अब उस ने खेलने का तरीका बदल दिया था. अब वह घर से ही अपनी महिलामित्रों को फ़ोन करने लगा था. जब कृष्णा कुछ कहती तो वह उसे अपनी बातों में उलझा लेता था. कृष्णा को अपनी बुद्धि से अधिक भभूति व व्रत पर विश्वास था. वह सबकुछ जान कर भी आंखें मूंदे हुए थी. पर एक रोज़ तो हद हो गई जब बड़ी बेशर्मी से सत्या कृष्णा के सामने ही पूजा से वीडियो कौल कर रहा था.

कृष्णा अपना आपा खो बैठी और गुस्से में उस के हाथ से फ़ोन छीनते हुए बोली, “तुम ने सारी हदें पार कर दीं हैं. मेरे नहीं, तो कम से कम विहा के बारे में तो सोचो. क्या कमी है मुझ में?”

सत्या खींसे निपोरते हुए बोला, “तुम्हारे अंदर अब न वह हुस्न है न वह मादकता रही है. एक ठंडी लाश के साथ मैं कैसे अपनी शारीरिक जरूरतें पूरी करूं? शुक्र करो कि मैं तुम्हारे सारे ख़र्च उठा रहा हूं और अपने नाम के साथ तुम्हारा नाम जोड़ रखा है. और क्या चाहिए तुम्हें?”

कृष्णा गुस्से में बोली, “क्या तुम्हें लगता हैं मैं अनाथ हूं या सड़क पर पड़ी हुई लड़की हूं? मेरे पापा और भाई अभी जिंदा हैं. वे तो मैं तुम्हारी इज़्ज़त के कारण अब तक चुप थी. अब अगर तुम चाहोगे भी तो वे तुम्हें मेरे करीब फटकने नहीं देंगे.”

सत्या बोला, “अगर तुम्हारे करीब फटकना होता तो मैं क्या बाहर जाता,”

इस से अधिक कृष्णा बरदाश्त नहीं कर पाई और रात में ही विहा को ले कर मम्मीपापा के घर नोएडा आ गई.

अब कृष्णा के पास कोई उपाय नहीं था. उसे अपने मम्मी, पापा को सब बताना पड़ा. मम्मी और पापा सब सुन कर सन्नाटे में आ गए थे. पूरी बात सुन कर भैया आगबबूला हो गए थे, बोले, “कृष्णा, तुम ने बिलकुल ठीक किया. अब तुम वापस नहीं जाओगी. विहा और तुम मेरी ज़िम्मेदारी हो.”

पर यह बात सुनते ही भाभी के चेहरे पर चिंता लक़ीर खिंच गई थी. एकाएक वह बोल उठी, “अरे, तुम कैसी पागलों जैसी बात कर रहे हो? कोई ऐसे अपना घर छोड़ सकता हैं क्या? फिर आज की नहीं, कल की सोचो. विहा और कृष्णा की पूरी ज़िंदगी का सवाल है. कृष्णा तो नौकरी भी नहीं करती कि अपना और विहा का ख़र्च उठा सके.”

भैया बोले, “अरे, तो इस घर पर उस का भी बराबरी का हक है.”

भाभी उस के आगे कुछ न बोल सकी पर वह भैया की इस बात से नाखुश थी, यह बात कृष्णा को पता थी.

दिन हफ़्तों में और हफ़्ते महीनों में परिवर्तित हो गए थे पर सत्या की तरफ से कोई पहल नहीं हुई थी. कृष्णा को समझ नहीं आ रहा था कि उस का फैसला सही हैं या ग़लत. विहा की बुझी आंखें और मम्मीपापा की ख़ामोशी सब कृष्णा को कचोटती थी. भैया ने कह तो दिया था कि वह भी इस घर की संपत्ति में बराबर की हकदार है पर कृष्णा में इतना हौसला नहीं था कि वह इस हक़ के लिए खड़ी हो पाए.

एक दिन कृष्णा अपने पापा से बुटीक खोलने के बारे में बात कर रही थी. तभी मम्मी दनदनाती आई और हाथ जोड़ते हुए बोली, “बेटा, क्यों हमारा बुढ़ापा खराब करने पर तुली हुई है? अगर तेरे पापा ने तुझे पैसा दिया तो बहू को अच्छा नहीं लगेगा और हमारे बुढ़ापे का सहारा तो वह ही है. मैं ने आज सत्या से बात की थी. वह बोल रहा है, तुम अपनी मरजी से घर छोड़ कर गई हो और अपनी मरजी से वापस जा सकती हो.”

कृष्णा बहुत ठसक से घर छोड़ कर आई थी पर किस मुंह से वापस जाए, वह समझ नहीं पा रही थी. पर भैया का तनाव, भाभी का अबोला सबकुछ कृष्णा को सोचने पर मजबूर कर रहा था.

पहले हफ़्ते जो विहा पूरे घर की आंखों का तारा थी, वह अब सब के लिए बेचारी बन कर रह गई थी.

एक दिन कृष्णा ने देखा कि भैया के बच्चे गोगी और टिम्सी, पिज़्ज़ा के लिए जिद कर रहे थे. विहा बोली, “टिम्सी मेरे लिए तो डबल चीज़ मंगवाना.”

गोगी बोला, “ये नखरे अपने पापा के घर करना, अब जो मंगवाया हैं उसी में काम चलाओ.”

कितनी बार कृष्णा ने गोगी और टिम्सी को छिपछिप कर बादाम, आइसक्रीम और चौकलेट खाते हुए देखा था. विहा एकदम बुझ गई थी, उस ने ज़िद करना छोड़ दिया था.

कृष्णा ने छोटीबड़ी जगह नौकरी के लिए आवदेन भी किया पर कहीं से भी सफलता नहीं मिली थी. हर तरफ से थकहार कर कृष्णा ने गुरुजी को फ़ोन किया. गुरुजी ने बोला, “इस अमावस्या पर अगर वह अपने पिया के घर जाएगी तो सब ठीक हो जाएगा.”

कृष्णा ने जब यह फैसला अपने परिवार को सुनाया तो भाभी एकदम से चहकने लगी, “अरे, कृष्णा, तुम ने बिलकुल सही किया, बच्चे को मम्मी और पापा दोनों की ज़रूरत होती है. तुम क्यों किसी तितली के लिए अपना घर छोड़ती हो. तुम रानी हो उस घर की और उसी सम्मान के साथ रहना.”

कृष्णा मन ही मन जानती थी कि वह रानी नहीं पर एक अनचाही मेहमान है इस घर की और एक अनचाहा सामाजिक रिश्ता है पिया के घर की. अगले दिन कृष्णा जब अपने सामान समेत घर पहुंची तो सत्या ने विहा को तो खूब दुलारा लेकिन कृष्णा को देख कर व्यंग्य से मुसकरा उठा.

अब सत्या को पूरी आज़ादी थी. उसे अच्छे से समझ आ गया था कि अब कृष्णा के पास पिया के घर के अलावा कोई और रास्ता नही हैं. वह जब चाहे आता और जब चाहे जाता. जो एक आंखों की शर्म थी, वह अब नहीं रही थी. खुलेआम वह कमरे में ही बैठ कर अपनी गर्लफ्रैंड्स से बात करता था जो कभीकभी अश्लीलता की सीमा भी लांघ जाता था.

कृष्णा से जब सत्या का व्यवहार सहन नहीं होता था तो वह बाहर आ कर बालकनी में खड़ी हो जाती थी.

कहीं दूर यह गाना चल रहा था- ‘पिया का घर, रानी हूं मैं…’ गाने के बोल के साथसाथ कृष्णा की आंखों से आंसू टपटप बह रहे थे.

Family Story : खामोशी की दीवार – बेटे ने कैसे जोड़ा माता-पिता का रिश्ता

Family Story : रेखा और रमन की शादीशुदा जिंदगी को पूरे पैंतीस बरस हो गए थे. एक आम गृहस्थ जिस तरीके से जीवनभर रिश्तों में बंध कर अपनी गृहस्थी चाहेअनचाहे खींचते हैं, उसी तरह से उन्होंने भी अपनी जिंदगी घसीटी. कहने को तो वे  दोनों स्वभाव से सीधे और सरल थे, लेकिन जब भी वे एकसाथ होते पता नहीं क्यों उन दोनों को एकदूसरे में कोई अच्छाई दिखाई ही नहीं देती और वे एकदूसरे की कमियां गिनाने लगते. अन्य लोगों के साथ उन का व्यवहार बहुत अच्छा रहता.

रमन को शुरू से ही रेखा का हर किसी से खुल कर बात करना बहुत खटकता. किसी भी बाहर वाले से वह  जब इतमीनान से बात करती तो रमन को बहुत  बुरा लगता. वह अपनी मंशा उसे कई बार जता भी चुके थे, लेकिन रेखा अपनी आदत से मजबूर थी. जो कोई घर आता, वह उस के साथ आराम से बतियाने  लगती.

रमन इस बात को ले कर बहुत कुढ़ते और नाराज होते. रेखा थी कि उन की एक न सुनती. लोगों से बातें करने में उसे बहुत रस आता था. यही वजह थी कि वह जीवन में अपने लिए तनाव कम लेती और दूसरों को  देती ज्यादा थी.

रमन स्वभाव से अंतर्मुखी थे. उन्हे किसी से ज्यादा बोलना पसंद न था. वे अपने काम से काम रखना ज्यादा पसंद करते. एक रेखा ही थी, जिस से वह पहले दिल की बात कह लेते थे. अब पता नहीं क्यों उन्हें उस के किरदार पर शक होने लगा था. जब भी वे उन के सामने पड़ती अच्छी बात भी बहस पर जा कर खत्म होती. यह बात उन का बेटा आशु और बेटी रिया छुटपन में ही समझ गए थे कि मम्मीपापा दोनों स्वभाव से अच्छे होते हुए भी अपनीअपनी आदतों से मजबूर हैं.

वक्त गुजर रहा था. आशु और रिया बड़े हो गए. एमएससी करते ही रिया के लिए अच्छा रिश्ता आया तो रमन ने उस के हाथ पीले कर दिए. बी. टैक कर के आशु नौकरी के लिए शहर से बाहर चला गया था.

बिटिया के ससुराल जाते ही घर सूना हो गया. घर पर रेखा से बात करने वाला  अब कोई नहीं रह गया था. पहले वह रिया से बात कर मन हलका कर लेती थी. उन का घर ज्यादा बड़ा न था. कुल मिला कर इस घर में तीन बैडरूम थे. जब कोई घर पर आता तो आशु या रिया में से किसी को अपना बेडरूम उस के साथ साझा करना पड़ता.

रोज सुबह उठने से रात  सोतेसोते तक रेखा और रमन में नोंकझोंक होती ही रहती. कुछ समय बाद आशु की शादी हो गई और वह भी परिवार के साथ बेंगलुरु शिफ्ट हो गया.

अब घर पर केवल रेखा और रमन रह गए थे. उम्र के साथ उन की आदतें भी और पक्की हो गई थीं. आशु ने अपने कमरे में एक बड़ा सा टीवी लगा रखा था. दोपहर में उस की अनुपस्थिति में रमन उसी टीवी पर अपने पसंदीदा कार्यक्रम देखना पसंद करते.

जब आशु घर पर रहता तो रेखा और रमन को एकसाथ एक ही कमरे में बैठ कर टीवी देखना पड़ता. यहां पर भी अपने पसंद के प्रोगाम को ले कर दोनों में अकसर बहस हो जाती. रेखा को धारावाहिक देखना पसंद था तो रमन को खबरें. किसी तरह से बहुत बहस  करने के बाद आपस में सामंजस्य बिठा कर उन दोनों ने टीवी देखने का समय निश्चित कर लिया था कि रात 9 बजे तक रमन खबरें देखेंगे और उस के बाद रेखा अपने मनपसंद धारावाहिक.

आशु के बैंगलुरू जाने के बाद सूने घर में अब केवल दोनों की नोंकझोंक की आवाजें सुनाई देतीं. एक दिन रेखा बोली, “घर पर बच्चे  नहीं हैं. अब तुम आशु के कमरे में बैठ कर आराम से टीवी देख सकते हो.”

रमन ने घूर कर रेखा को देखा, तो वह बोली, “ऐसे क्यों घूर रहे हो?” “तुम से ऐसी समझदारी वाली बात की उम्मीद नहीं थी. वैसे, तुम यह इसीलिए कह रही हो, जिस से तुम्हें भी टीवी देखने में परेशानी न हो और मुझे भी.”

रमन उसी दिन से आशु के कमरे में बैठ कर आराम से टीवी देखने लगे और रेखा अपने कमरे में धारावाहिकों का आनंद लेती. धीरेधीरे रमन ने आशु के कमरे में अपना और  सामान भी व्यवस्थित कर दिया. कई बार टीवी देखतेदेखते वे वहीं सो जाते. रेखा रात ठीक 10 बजे टीवी और लाइट बंद कर के लेट जाती.

एक दिन रमन बोले, “मैं ने सोच लिया है कि अब मैं टीवी वाले कमरे में ही सोया करूंगा.” “क्यों ऐसी क्या बात हो गई, जो नौबत यहां तक आ गई?” रेखा ने पलट कर पूछा. “कई बार रात को देर तक क्रिकेट मैच चलता रहता है. उसे देखने में मुझे सोने में देर हो जाती है.”

“जैसा तुम्हें ठीक लगे. तुम ने जो सोच लिया है, वह तो कर के रहोगे,” रेखा बोली. रमन ने इस समय उस से उलझना ठीक नहीं समझा और अपना बिस्तर आशु के कमरे में शिफ्ट कर दिया.

इस घर पर रहने वाले दो लोगों ने अब अपने को अलगअलग कमरे में व्यवस्थित कर लिया था. इस की वजह से अब दोनों का एकदूसरे से सामना कम ही होता. रमन चाय नहीं पीते थे. रेखा सुबह उठ कर पहले अपने लिए चाय बनाती और आध्यात्मिक प्रवचन सुनते हुए उस का आनंद लेती और रमन बरामदे में बैठ कर मजे से अखबार पढ़ते.

सुबह मेज पर नाश्ता करने के लिए दोनों साथ बैठ कर नाश्ता करते. अब रमन ने रेखा के बनाए खाने में मीनमेख निकालना कम कर दिया था. रेखा नाश्ता करने के बाद अपने कामों में लग जाती और रमन टीवी पर व्यस्त हो जाते. दोपहर में खाने की मेज पर लंच करते हुए उन में कभी किसी बात को ले कर थोड़ीबहुत नोंकझोंक जरूर हो जाती, लेकिन अब उस में उतना तीखापन  नहीं रह गया था, जितना पहले हुआ करता था.

लंच के बाद वे फिर अपनेअपने कमरे में आ कर इतमीनान से टीवी देखते और आराम करते. कुछ ही महीने में उन दोनों को एकदूसरे से दूरी बना कर जिंदगी जीने की आदत सी पड़ गई. रेखा ज्यादा सुकून में थी. अब रमन उस की हर बात में दखलअंदाजी नहीं करते.  उन्हें अब इस बात से भी ज्यादा मतलब नहीं था कि वह अपने कमरे में बैठ कर फोन पर किस से बातें करती है? रमन को भी घर पर अपने लिए एक अलग जगह मिल गई थी जिस में वह अखबार पढ़ने, टीवी देखने और मोबाइल फोन के साथ बहुत खुश थे. पूरे सात महीने बाद आशु घर आया. उस ने देखा कि पापा ने उस का सामान ऊपर की मंजिल में दीदी के कमरे में शिफ्ट कर दिया था और खुद उस के कमरे में रह रहे थे.

यह देख कर आशु बोला, “पापा, आप ने बहुत अच्छा किया. कम से कम इसी बहाने इस घर के 2 कमरे तो आबाद रहते हैं.” “हां बेटा, मुझे भी लगा कि कमरे खाली पड़े हैं, तो क्यों न उस का सदुपयोग कर खुल कर रहा जाए?”

आशु ऊपर कमरे में जा कर सो गया. सुबह उठ कर उस ने महसूस किया कि घर में एकदम शांति थी. पहले जैसी बात होती तो सुबह उठते ही मम्मीपापा की जोरजोर की आवाजें सुनाई देतीं. आज पहली बार सुबह के समय घर पर एकदम सन्नाटा पसरा हुआ था. बचपन से ले कर हमेशा इस घर में सुबह उठते ही  मम्मीपापा की आवाज सुनाई देने लगती थी. सो कर उठते ही वे दोनों बहस पर उलझे रहते. उन्होंने कभी किसी की परवाह नहीं  की कि कोई उन के बारे में क्या सोचता है? लेकिन इस बार माहौल बिलकुल बदला हुआ था. मेज पर नाश्ता करते हुए भी मम्मीपापा एकदूसरे से उलझने के बजाय उसी से बात कर रहे थे. अब उन के लिए एकदूसरे की उपस्थिति कोई मायने नहीं रख रही थी.

आशु को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अचानक इतना बड़ा परिवर्तन कैसे आ गया? नाश्ता करने के बाद पापा कमरे में जा कर टीवी देखने लगे. मम्मी भी थोड़ी देर उस से बात करने के बाद घर के कामों में व्यस्त हो गईं. जब उन्हें फुरसत मिली, तो वे अपनी पसंद का धारावाहिक देखने लगीं.

दोपहर में खाने पर वे तीनों साथ बैठे थे. आशु बोला, “मम्मी, अब घर कितना सूना लगता है.””हां बेटे, घर पर रौनक तो बच्चों से रहती है. तुम दोनों अब बाहर चले गए हो, तो घर भी सूना हो गया.” आशु के जी में आया कि कह दे, ‘मम्मी रौनक तो आप दोनों की बहस से रहती थी. अब आप लोग शांत हो गए हैं, तो घर की रौनक ही चली गई.’

असली बात मन में दबा कर वह बोला, “मैं और दीदी तो वैसे भी पढ़ाई में लगे रहते थे. हमें इतना सब बोलने की फुरसत कहां थी?” इस बार घर आ कर आशु ने महसूस किया कि पहले आपसी मतभेदों के बावजूद मम्मीपापा के मध्य हमेशा एक आत्मीयता का रिश्ता बना रहता था. नोंकझोंक के बावजूद आत्मीयता अपनी जगह पर बनी रहती थी.  इस सन्नाटे में वह भी कहीं गुम हो  गई थी. अब दोनों को एकदूसरे से ज्यादा।मतलब न था. केवल खाना खाने और किसी से मिलने जाने के लिए दोनों साथ उठतेबैठते, वरना वे दोनों अपनी अलग जिंदगी जी रहे थे और उसी में खुश भी लग रहे थे.

आशु ने होश संभालने पर कई बार महसूस किया था कि मम्मी के मन में हमेशा इस तरह की ही जिंदगी जीने की तमन्ना थी. आज  वह उसी जिंदगी का मजा ले रही थीं, पर उन्हें इस की कीमत भी चुकानी पड़ रही थी. इन सब में वह पापा से काफी दूर होती जा रही थीं.  दोनों अपने में खोए हुए थे. एकदूसरे की भावनाओं से अब उन्हें ज्यादा मतलब न था. पहले वह साथ बैठ कर बहस करते हुए आत्मीयता की बातें भी कर लिया करते थे. भले ही उन दोनों की बातों मे छत्तीस का आंकड़ा रहता, लेकिन वे एकदूसरे का भी पूरा खयाल रखते थे. मम्मी को जरा सा कुछ हो जाता, तो पापा बड़े परेशान हो जाते. पापा की तबीयत थोड़ा भी खराब होती, तो मम्मी बड़बड़ करते हुए भी उन्हें ढेरों नसीहतें दे डालती और उन की पूरी देखभाल करती थी.

अब उन के रिश्ते की ताजगी और गरमाहट कहीं खो गई थी और उस में बहुत ठंडापन आ गया था. जीवन के इस पड़ाव में जब उन्होंने एकदूसरे के सुखदुख का सब से ज्यादा खयाल रखना था, तब वे अपनीअपनी दुनिया में ज्यादा व्यस्त हो कर एकदूसरे के प्रति उदासीन हो गए थे.

आशु को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था. उस ने यह बात रोमा को भी बताई. दोनों ने इस बारे में विचार किया. बहुत सोचसमझ कर वह बोला, “मम्मी, मैं चाहता हूं कि आप दोनों कुछ दिन के लिए हमारे साथ रहें.”

“लेकिन बेटा, यहां घर छोड़ कर जाना भी तो ठीक नहीं है.””घर कौन से कोई उठा कर ले जाएगा. थोड़ा सामान है उस की देखभाल के लिए बगल में शर्मा आंटी से कह देंगे. वे कभीकभी घर खोल कर देख लेंगी. बाकी यहां ऐसा है भी क्या ?”

“अपना घर तो अपना होता है बेटे.””आप की बात सही है मम्मी. मेरा घर भी तो आप का ही घर है. बच्चे भी आप को मिस कर रहे हैं. मैं चाहता हूं कि कुछ समय के लिए मेरे साथ चलें. मैं आप को ले जाने आया हूं.”

“यह बात तुम पहले बता देते, तो अच्छा रहता बेटे.””मैं आप को सरप्राइज देना चाहता था.”रेखा और रमन बेटे की बात को न टाल सके. उस ने एक हफ्ते की छुट्टी और बढ़ा ली और उस के बाद घर को ताला डाल कर आशु मम्मीपापा को ले कर बैंगलुरू आ गया. वहां  उस के पास 3 बैडरूम वाला फ्लैट था. एक कमरे में वह और उस की पत्नी रीमा, तो दूसरे में बच्चे ऊधम मचाते. आशु ने तीसरे बैडरूम में मम्मीपापा की व्यवस्था कर दी थी.

महीनों से खुले घर में स्वछंद रहने की आदत के बाद रेखा और रमन को यह कमरा बहुत छोटा लगा. पर यहां मजबूरी थी. वे बेटे से कुछ कह भी नहीं सकते थे. वे  अपने को इस कमरे में  किसी तरह एडजस्ट कर रहे थे. आशु ने  पूछा, “मम्मी कोई तकलीफ तो नहीं है?”

” नहीं बेटा. अपनों के बीच में कैसी तकलीफ? बच्चों के साथ बहुत अच्छा लग रहा है.””उन्हें भी आप का साथ बहुत अच्छा लगता है मम्मी.””बेटा, एक बात कहनी थी.””कहो ना पापा, यहां कोई परेशानी है?””मैं चाहता था कि एक टीवी इस कमरे में भी लगा देते. समय काटना आसान हो जाता.”

“पापा, यहां पर समय काटने की दिक्कत कहां है? बच्चे हैं, मैं और रीमा हैं और साथ में मम्मी. इतने लोगों के साथ कमरे में टीवी की जरूरत क्या है? बैठक में लगा तो है. आप जब मरजी हो, वहां पर बैठ कर टीवी देख सकते हैं.”

“वहां पर बच्चे अपने पसंद के कार्टून देखते रहते हैं.” “तो क्या हुआ? दिनभर आप टीवी देख लेना. शाम को बच्चे अपनी पसंद के प्रोगाम देख लेंगे. हम भी तो बचपन में ऐसा ही किया करते थे. क्यों मम्मी?”आशु बोला.

“तुम ठीक कहते हो बेटा. उस के बाद रमन ने आगे कुछ नहीं कहा. यही परेशानी रेखा को भी हो रही थी. वह रात को अपने पसंद के धारावाहिक बहुत मिस करती, लेकिन कुछ कह नहीं पा रही थी.

समय काटने के लिए शाम होते ही वे दोनों थोड़ी देर नीचे टहलने चले जाते और उस के बाद खाना खा कर रात को अपने कमरे में आ जाते. शुरुआत में दोनों को एक ही बैड पर एकदूसरे से काफी परेशानी हो रही थी. कभी रमन के खर्राटे तो कभी पेट की गैस रेखा को  परेशान कर रहे थे, लेकिन मजबूरी थी यहां पर इतनी जगह नहीं थी कि वह कहीं और जा कर सो पाती. यह बात वह बहू को भी नहीं कह सकती थी.

शाम के समय रमन को टीवी के बिना समय काटना मुश्किल हो रहा था. मजबूरन अब वे एकदूसरे से बातें कर के अपना समय गुजारने की कोशिश करने लगे. वर्षों की चिकचिक और आपसी बहस कुछ महीनों पहले लगभग खत्म हो गई थी. बेटेबहू के सामने वह फिर से उसी राह पर नहीं जा सकते थे. अब वे नए सिरे से शुरुआत कर एकदूसरे से अच्छी तरह बात करने की कोशिश कर रहे थे. बेटे के घर पर  लड़ने के लिए कोई मुद्दा भी न था.

रमन यहां बहू के बनाए खाने में कोई कमी भी नहीं निकाल सकते थे. बेटे के घर पर रहते हुए उन्हें काम की भी कोई परेशानी नहीं थी. आशु और रीमा उन्हें यहां कुछ काम न करने देते. बस यहां परेशानी एक ही बात की थी, वह थी समय काटने की. बच्चे दिन में थोड़ी देर उन के साथ बातें करते और खेलते. उस के बाद वे अपना होमवर्क निबटाते. आशु शाम को थकाहारा घर लौटता. थोड़ी देर मम्मीपापा के साथ बात कर के फिर वह अपने बीवीबच्चों के साथ अपना वक्त गुजारता.

रेखा और रमन को यहां आए हुए एक महीना हो गया था. उन्हें अपने पुराने घर की याद सताने लगी थी. एक दिन रमन ने दबी जबान में यह बात आशु से कह भी दी, “बेटा, हमें यहां आए बहुत समय हो गया है.” “कहां पापा… अभी एक महीना ही तो हुआ है.” “बेटा, एक महीने का समय कम नहीं होता भला.”

“जानता हूं पापा, पर इतना ज्यादा भी नहीं होता कि आप यहां हमारे साथ न रह सकें.” अब आगे बोलने की कोई गुंजाइश न थी. मजबूरन रमन और रेखा को यहां पर एक महीना और रहना पड़ा. इतने समय में रमन और रेखा आपसी मनमुटाव भुला कर एकसाथ एक कमरे में रहने के अभ्यस्त हो गए.

वे शाम को एकसाथ टहलते और साथ बैठ कर अपनी सुखदुख की बातें किया करते. यह देख कर आशु को बहुत अच्छा लगता. खाना खाने के बाद भी वे आपस में देर तक बतियाते रहते.

2 महीने बाद आशु उन्हें छोड़ने खुद घर आया. इतने समय बाद बच्चों और बेटेबहू से दूर जाना उन्हें अच्छा नहीं लग रहा था. आशु के पास ज्यादा छुट्टी नहीं थी. 2 दिन घर की साफसफाई में बीत गए थे. मम्मीपापा के साथ मिल कर उस ने सारा घर व्यवस्थित कर दिया था. जाने से पहले उस ने दोपहर में उन के लिए टीवी भी चालू करवा दिए थे. उन से विदा लेते समय उसे बहुत बुरा लग रहा था. आशु के परिवार के साथ 2 महीने बिताने के बाद अब रमन और रेखा को यहां अकेले रहने का अवसर मिल रहा था.

आशु की रात की ट्रेन थी. वह घर से खाना खा कर निकला था. आशु के जाते ही रमन अपने कमरे में आ गए और रेखा अपने. इतने समय बाद उन्होंने अपनेअपने कमरे में टीवी चलाए. आज अकेले टीवी देखने में रमन का मन नहीं लगा. जरा देर बाद टीवी बंद कर के वे रेखा के कमरे में आ गए और बोले, “आज बच्चों के बगैर बड़ा खराब लग रहा है.”

“तुम ठीक कह रहे हो. इस उम्र में परिवार का साथ बहुत जरूरी होता है. अब हमें उन के साथ ही रहना चाहिए.””तुम्हारी बात सही है, लेकिन जब तक हाथपैर चल रहे हैं, तब तक हमें उन के ऊपर पूरी तरह आश्रित नहीं होना चाहिए. उन्हें भी जिंदगी अपने ढंग से जीने का मौका देना चाहिए,” रमन बोले.

वे दोनों साथ बैठ कर आपस में बातें करने लगे, तो टीवी देखने का खयाल ही दिमाग से उतर गया. रेखा बोली, “घड़ी देखो, 10 बजने वाले हैं. अब हमें सो जाना चाहिए.”रमन उठ कर दूसरे कमरे में आ गए. थोड़ी देर में वे वापस रेखा के कमरे में आ गए.

” क्या हुआ?””अकेले कमरे में अच्छा नहीं लगा. क्या मैं भी यहीं सो जाऊं?””कैसी बातें करते हो? यह घर तुम्हारा है. इस में पूछने की क्या जरूरत है ?” रेखा बोली, तो रमन खुश हो गए और वहीं लेट गए. कुछ ही देर में उन के खर्राटे गूंजने लगे. अब रेखा को उन के खर्राटे जरा भी नहीं अखर रहे थे.

बैंगलुरू वापस आ कर आशु भी आश्वस्त हो गया था. उस ने मम्मीपापा के बीच खड़ी हो रही खामोशी की दीवार को तुरंत गिरा दिया. रेखा और रमन को अब एकदूसरे से कोई शिकायत न थी. इस उम्र में एकदूसरे से नजदीकियां उन्हें नई ऊर्जा दे रही थी.

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