Family Drama : मुट्ठी भर आसमान

Family Drama : भैया की शादी के बाद आज पहली बार भैया के पास जा रही हूं. मम्मीपापा 2 महीनों से वहीं हैं. मन आशंकाओं से भरा है कि पता नहीं उन का वहां क्या हाल होगा. अपने दोस्तोंमित्रों, सगेसंबंधियों से दूर मन लगा होगा या नहीं. पापा तो बाहर घूमफिर आते होंगे, पर मां वहां सारा दिन क्या करती होंगी. भैया की नईनई शादी हुई है. वे दोनों तो आपस में ही मस्त रहते होंगे.

फिर बरबस ही उस के होंठों पर मुसकराहट आ गई. क्या खूब होते हैं वे दिन भी. हर तरफ मस्ती का आलम, देर रात तक जागना और दिन में देर तक सोना. सब कुछ चलचित्र की तरह उस की आंखों के सामने घूमने लगा…

सोमेश देर तक सोते रहते और वह चुपचाप पास पड़ी उन्हें निहारती रहती, तनबदन सहलाती रहती. उस के पास तो सोने के लिए पूरा दिन रहता. सोमेश के बाथरूम से निकलते ही उन के साथ ही खाने की मेज पर पहुंच जाती.

नाश्ते के बाद सोमेश औफिस चले जाते और वह अपने कमरे में पहुंच जाती. दिन में 5-6 बार सोमेश से फोन पर बात करती. उन के पलपल की खबर रखती. लंच के लिए उन का फोन आते ही तुरंत तैयार हो कर खाने के लिए पहुंच जाती. सोमेश कुछ देर आराम कर चले जाते और वह दीनदुनिया से दूर न जाने किन खयालों में गुम कमरे में ही पड़ी रहती.

उन्हीं दिनों अंशु कोख में आ गया. फिर तो वह 7वें आसमान पर पहुंच गई. मन चाहता सोमेश हर पल साथ बने रहें. हलका सा सिरदर्द भी हो तो वे ही आ कर सहलाएं. तनमन में आने वाले बदलाव को सम झें,

महसूस करें. पर इन पुरुषों के लिए नारी के हर मर्ज की दवा उन की मां होती है. वे सम झते हैं एक मां ही भावी मां को सम झ सकती है, इसलिए चुपचाप पत्नी को मां के हवाले कर देते हैं.

एकाएक उस की सोच पर विराम लग गया. उन दिनों सोमेश के मम्मीपापा भी तो उन के साथ थे. उन के अकेलेपन का खयाल तो उसे कभी नहीं आया. वे दोनों भी शाम को सोमेश का बेचैनी से इंतजार करते और उन के आते ही उन से बात करने के लिए बेताब हो उठते. मम्मी दिन भर इधरउधर खटपट करती रहतीं, जिस से कभीकभी उसे बड़ी कोफ्त होती. असल में आपस में तालमेल हुए बिना हम शायद एकदूसरे की परेशानी को महसूस तो क्या सम झ भी नहीं सकते.

वह तो सारा दिन दरवाजा बंद कर के पड़ी रहती. अपने मम्मीपापा, सहेलियों से फोन पर लगी रहती. उस ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि वे सारा दिन कैसे गुजारते हैं. मम्मीजी दिन में कई बार आतीं, दरवाजा खटखटातीं और खानेपीने के लिए पूछतीं.

उसे याद आया उन दिनों तबीयत कुछ नासाज थी. वह किसी भी जरूरत के लिए नौकरानी को आवाज लगाती तो मम्मीजी भागीभागी चली आतीं. पर एक दिन आवाज लगाने पर नौकरानी ही आई. उस ने हैरान हो कर दरवाजे से  झांक कर देखा पापा मम्मी का हाथ पकड़ कर यह कह कर उन्हें अंदर आने से रोक रहे थे, ‘‘कोई तुम्हें इस तरह ‘फौर ग्रांटेड’ नहीं ले सकता.’’

मन एकाएक एक कदम और पीछे चला गया. एक दिन सोमेश ने उस का हाथ पकड़ कर बड़ी कोमलता से कहा, ‘‘शुरू से ही मेरा यह सपना रहा है कि मेरे मम्मीपापा हमेशा मेरे साथ रहें. बच्चे, मम्मीपापा, दादादादी घर कितना भराभरा लगता है.’’

‘‘हां, बच्चे संभालने के लिए हमें उन की जरूरत तो होगी.’’

‘‘बात जरूरत की नहीं, मेरी इच्छा की है,’’ सोमेश बोले.

वह कुछ नहीं सम झ पाई, पर यह जरूर जान गई कि ये लोग अब यहीं रहने वाले हैं उन के पास. पुरानी स्मृतियां थीं कि याद न आने का नाम ही नहीं ले रही थीं. वे अकसर एकदूसरे को अपने हाथों से खिलाते. कभीकभी एकाएक मम्मीपापा सामने पड़ जाने पर सोमेश सकपका जाते.

उसे बड़ा अजीब लगता कि हम पतिपत्नी हैं. एकदूसरे की कमर में हाथ डाल या गले में बांहें डाल कर घूमने में शर्म कैसी?

पर आज… आज यदि भैयाभाभी इसी प्रकार व्यवहार करते होंगे तो मम्मीपापा को कैसा लगता होगा, यह सोच कर ही वह शर्म से लजा गई. शर्म, लज्जा, हया सब व्यक्तिपरक होते हैं.

इन्हीं खयालों में डूबी उस को कब घर आ गया, पता ही नहीं चला. रात को खाना खा कर वह, मम्मी और पापा सोने का उपक्रम कर रहे थे. भैयाभाभी के कमरे से देर रात तक दबेदबे हंसी के स्वर आ रहे थे. वह भी जीवन के स्वप्निल क्षणों में पहुंच गई और फिर पता नहीं कब आंख लग गई. सुबह भाभी उठा रही थीं, ‘‘दीदी उठो, नाश्ता लग गया है.’’

मेज पर पहुंची तो मम्मीपापा, भैया सब उस का इंतजार कर रहे थे. सब को एकसाथ देख कर बड़ा अच्छा लगा. नाश्ते के बाद मम्मी ने भाभी को अपने कमरे में आराम करने भेज दिया. फिर मांबेटी दोनों बातों में लग गईं. 2 बजे भाभी ने आ कर कहा, ‘‘मम्मीजी, खाना लग गया है.’’

‘‘रघु कब आ रहा है?’’ मम्मी ने जानना चाहा.

‘‘उन का फोन आया था. लेट आएंगे… आप सब खाना खा लो,’’ भाभी ने आग्रह किया.

वह सोच में डूबी रही और चुपचाप भाभी की दिनचर्या देख रही थी. भाभी घर को व्यवस्थित करने के गुर, जैसे कपड़े संभालना, धोबी का हिसाब रखना, राशन, सब्जी मंगवाना, नौकरों पर निगरानी रखना आदि मम्मी से सम झने की कोशिश करतीं. उन के अनुसार चलतीं और बीचबीच में अपने फंडे मसलन, फ्राइड के साथ रोस्टेड या स्प्राउट खाना, परांठों के साथ ब्रैडबटर, समोसे, कचौरी, जलेबी के साथसाथ पेस्ट्री पैटीज डाल देतीं. मम्मीपापा भी इस छोटेमोटे बदलाव को सहर्ष स्वीकार कर रहे थे.

भाभी रात को अपने कमरे में जाने से पहले नौकर ने सब का बिस्तर ठीक किए हैं या नहीं, कमरे में पानी रख दिया है या नहीं जैसी छोटीछोटी बातों पर पूरी निगरानी रखतीं. कितनी जल्दी सब संभाल लिया है… वह सोचती रही.

‘‘आप तो बड़ी अच्छी गृहस्थी संभाल रही हैं,’’ एक दिन वह भाभी से बोली.

‘‘मु झे कहां कुछ आता था. सब मम्मीजी से सीखा है,’’ भाभी ने संकोच से जवाब दिया.

‘‘डिलिवरी के लिए आप मायके जाएंगी,’’ उस ने बात आगे बढ़ाई.

‘‘नहीं, रघु कहते हैं उन्हें वहां कंफर्टेबल नहीं लगेगा. फिर मम्मीजी भी यही चाहती हैं. उन्होंने तो अभी से तैयारी भी शुरू कर दी है,’’ भाभी शरमाती हुई बोलीं.

वह सोच रही थी, ‘रघु कहते हैं’ ‘मम्मीजी चाहती हैं’ यह सब क्या है? सब दूसरों की मरजी पर. कितनी मूर्ख लड़की है. क्या इस का अपना कोई स्टैंड नहीं? पर मन में कुछ चुभन सी जरूर हुई.

वापसी वाले दिन सुबहसुबह भैया को देख कर चौंक गई, ‘‘भैया, आज

आप इतनी जल्दी…’’

‘‘तेरी ये भाभी मु झे सोने देंगी तब न? ‘दीदी जा रही हैं’ कह कर जबरन मु झे जगा दिया,’’ भैया ने एक प्यार भरी नजर भाभी पर डालते हुए कहा.

धीरगंभीर भैया के चेहरे पर अनोखी चमक थी. फिर आप ही कहते, ‘‘मु झे उठाया क्यों नहीं?’’ भाभी का उत्तर उसे अंदर तक कचोट गया. उसे याद आया उस की अपनी ननद जाने वाली थी. सोमेश गहरी नींद में सो रहे थे. उस ने दरवाजे पर पदचाप सुनी और चुपचाप पड़ी रही. जागने पर सोमेश ने भी ऐसा ही कुछ कहा था. सारा दिन उस का मूड उखड़ा रहा था. अगर वह भी इसी तरह निकल जाती तो? यहां यह बेवकूफ सी लगने वाली लड़की आगे निकल गई. जितनी नासम झ यह दिखती है उतनी है नहीं. वह सोच रही थी.

‘‘बहू खुशखबरी सुनाने वाली है. उन दिनों जरूर आना. थोड़ी मदद हो जाएगी, मु झे तो अभी से घबराहट हो रही है,’’ मम्मी ने मनुहार की. उन का चेहरा उल्लास से दमक रहा था.

पर चलते समय उस का मन बोझिल था. पता नहीं क्यों? उसे तो खुश होना चाहिए था. सारी आशंकाएं निराधार निकलीं. सब ठीकठाक है. मम्मीपापा, भैयाभाभी सब खुश हैं. फिर यह अन्यमनस्कता क्यों? शायद मां का हर बात में भाभी को उस से अधिक तरजीह देना या शायद उसे अब अपना मायका पराया लगने लगा था या फिर भैयाभाभी का आपसी प्यार… पर सोमेश भी तो उस पर जान छिड़कते हैं. फिर ऐसा क्या है, जो उसे कचोट रहा है. वह सम झ गई उस का अपना घरसंसार मात्र सोमेश तक ही सीमित रहा है. उस से आगे वह कभी सोच ही नहीं सकी. यहां तक कि उस के अपने मम्मीपापा के आने पर उस ने स्पष्ट कह दिया था, ‘‘ममा, सुबह

6 बजे ही जाने के लिए तैयार न हो जाना, कल सोमेश की छुट्टी है, हम देर तक सोते हैं.’’

सुन कर सोमेश, उस के मम्मीपापा सब उस का मुंह देखने लगे थे. पर विवाह 2 जिस्मों का 2 आत्माओं का ही नहीं 2 परिवारों का भी बंधन है और भाभी ने यह साबित भी कर दिया.

कहते हैं, इस असीम आकाश में सब का अपनाअपना हिस्सा है. उसे मुट्ठी भर आसमान ही मिल पाया. पर यह नादान सी लगने वाली भाभी बांहें पसार कर आसमान का एक बड़ा सा भाग समेट कर ले गई.

Best Short Story : परिणाम – विज्ञान की जीत हुई या पाखंड की

Best Short Story : “हमारे बेटे का नाम क्या सोचा है तुम ने?” रात में परिधि ने पति रोहन की बांहों पर अपना सिर रखते हुए पूछा.

“हमारे प्यार की निशानी का नाम होगा अंश, जो मेरा भी अंश होगा और तुम्हारा भी,” मुसकराते हुए रोहन ने जवाब दिया.

“बेटी हुई तो?”

“बेटी हुई तो उसे सपना कह कर पुकारेंगे. वह हमारा सपना जो पूरा करेगी.”

“सच बहुत सुंदर नाम हैं दोनों. तुम बहुत अच्छे पापा बनोगे,” हंसते हुए परिधि ने कहा तो रोहन ने उस के माथे को चूम लिया.

लौकडाउन का दूसरा महीना शुरू हुआ था जबकि परिधि की प्रैगनैंसी का 8वां महीना पूरा हो चुका था और अब कभी भी उसे डिलीवरी के लिए अस्पताल जाना पड़ सकता था.

परिधि का पति रोहन इंजीनियर था जो परिधि को ले कर काफी सपोर्टिव और खुले दिमाग का इंसान था जबकि उस की सास उर्मिला देवी का स्वभाव कुछ अलग ही था. वे धर्मकर्म पर जरूरत से ज्यादा विश्वास रखती थीं.

प्रैगनैंसी के बाद से ही परिधि को कुछ तकलीफें बनी रहती थीं. ऐसे में उर्मिला देवी ने कई दफा परिधि के आने वाले बच्चे के नाम पर धार्मिक अनुष्ठान भी करवाए. मगर फिलहाल लौकडाउन की वजह से सब बंद था.

उस दिन सुबह से ही परिधि के पेट में दर्द हो रहा था. रात तक उस का दर्द काफी बढ़ गया. उसे अस्पताल ले जाया गया. महिला डाक्टर ने अच्छी तरह परीक्षण कर के बताया,” रोहनजी, परिधि के गर्भाशय में बच्चे की गलत स्थिति की वजह से उन्हें बीचबीच में दर्द हो रहा है. ऐसे में इन्हें ऐडमिट कर के कुछ दिनों तक निगरानी में रखना बेहतर होगा.”

“जी जैसा आप उचित समझें,” कह कर रोहन ने परिधि को ऐडमिट करा दिया.

इधर उर्मिला देवी ने डाक्टर की बात सुनी तो तुरंत पंडित को बुलावा भेजा.

“पंडितजी, बहू को दर्द हो रहा है. उसे स्वस्थ बच्चा हो जाए और सब ठीक रहे इस के लिए कुछ उपाय बताइए?”

अपनी भौंहों पर बल डालते हुए पंडितजी ने कुछ देर सोचा फिर बोले,” ठीक है एक अनुष्ठान कराना होगा. सब अच्छा हो जाएगा. इस अनुष्ठान में करीब ₹10 हजार का खर्च आएगा.”

“जी आप रुपयों की चिंता न करें. बस सब चंगा कर दें. आप बताएं कि किन चीजों का इंतजाम करना है?”

पंडितजी ने एक लंबी सूची तैयार की जिस में लाल और पीला कपड़ा, लाल धागे, चावल, घी, लौंग, कपूर, लाल फूल, रोली, चंदन, साबुत गेहूं, सिंदूर, केसर, नारियल, दूर्वा, कुमकुम, पीपल और तुलसी के पत्ते, पान, सुपारी आदि शामिल थे.

उर्मिला देवी ने मोहल्ले के परिचित परचून की दुकान से वे चीजें खरीद लीं. कुछ चीजें घर में भी मौजूद थीं.

सारे सामानों के साथ उर्मिला देवी पंडित को ले कर अस्पताल पहुंंचीं तो अस्पताल की नर्सें और कर्मचारी हैरान रह गए. उन्हें रिसैप्शन पर ही रोक दिया गया मगर उर्मिला देवी बड़ी चालाकी से पंडित को विजिटर बना कर अंदर ले आईं. उर्मिला देवी ने पहले ही परिधि को प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर लिया था. कमरा बंद कर के अनुष्ठान की प्रक्रिया आरंभ की गई.

बाहर घूम रहीं नर्सों को इस बाबत पूरी जानकारी थी कि अंदर क्या चल रहा है मगर उन के पास कहने के लिए शब्द नहीं थे. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इस पाखंड को कैसे रोकें. दरअसल, अस्पताल में ऐसी घटना कभी भी नहीं हुई थी. सभी सीनियर डाक्टर के आने का इंतजार कर रहे थे. तब तक करीब 1 घंटे की के अंदर सारी प्रक्रियाएं पूरी कर उर्मिला देवी ने पंडित को विदा कर दिया.

नर्सें अंदर घुसीं तो देखा की परिधि के हाथ में लाल धागा बंधा हुआ है. माथे पर दूर तक सिंदूर लगा है. जमीन पर हलदी से बनाई गई एक आकृति के ऊपर चावल, लौंग, कुमकुम जैसी बहुत सी चीजें रखी हुई हैं. पास में नारियल के ऊपर एक पीला कपड़ा भी पड़ा हुआ है. और भी बहुत सी चीजें नजर आ रही थीं.

“स्टूपिड पीपुल्स…” कहते हुए एक नर्स ने बुरा सा मुंह बनाया और बाहर चली गई.

उर्मिला देवी चिढ़ गईं. नर्स को सुनाने की गरज से जोरजोर से चिल्ला कर कहने लगीं,” पूजा हम ने कराई है इस कलमुंही को क्या परेशानी है?”

इस बात को 4-5 दिन बीत गए. इस बीच परिधि को जुकाम और खांसी की समस्या हो गई. हलका बुखार भी हो गया था. अस्पताल वालों ने तुरंत उस का कोविड टेस्ट कराया.

उसी दिन रात में परिधि को दर्द उठा. आननफानन में सारे इंतजाम किए गए. सुबह की पहली किरण के साथ उस की गोद में एक नन्हा बच्चा खिलखिला उठा. घर वालों को खबर की गई. वे दौड़े आए.

तबतक कोविड-19 रिपोर्ट भी आ गई थी. परिधि कोरोना पोजिटिव थी. परिधि के पति और सास को जब यह खबर दी गई तो सास ने चिल्ला कर कहा,” ऐसा कैसे हो सकता है? हमारी बहू तो बिलकुल स्वस्थ हालत में अस्पताल आई थी. तुम लोगों ने जरूर सावधानी नहीं रखी होगी तभी ऐसा हुआ.”

“यह क्या कह रही हो अम्मांजी? हम ने ऐसा क्या कर दिया? हमारे अस्पताल में मरीजों की सुरक्षा का पूरा खयाल रखा जाता है. यहां पूरी सफाई से सारे काम होते हैं.”

नर्स ने कहा तो सास उसी पर चिल्ला उठीं,” हांहां… गलत तो हम ही कह रहे हैं. वह देखो मरीज बिना मास्क के जा रहा है.”

“अम्मांजी उस की कल ही रिपोर्ट आई है. उसे कोरोना नहीं है और एक बात बता दूं, इस अस्पताल में कई इमारते हैं. इस इमारत में केवल गाइनिक केसेज आते हैं. बगल वाली इमारत कोविड मरीजों के लिए है. वहां के किसी स्टाफ को भी इधर आने की परमिशन नहीं. वैसे भी हम मास्क, ग्लव्स और सैनिटाइजेशन का पूरा खयाल रखते हैं. हमें उलटी बातें न सुनाओ.”

“कैसे न सुनाऊं? मेरी बहू को इसी अस्पताल में कोरोना हुआ है. साफ है कि यहां का मैनेजमैंट सही नहीं. यहां आया हुआ स्वस्थ इंसान भी कोरोना मरीज बन जाता है.”

“आप तो हम पर इल्जाम लगाना भी मत. पता नहीं क्याक्या अंधविश्वास और पाखंड के चोंचले करती फिरती हो. अपनी बहू को देखिए. उस की तबीयत बिगड़ जाएगी. उस का फीवर अब ठीक है. आप अपने साथ ले जाइए. न्यू बोर्न बेबी को इस अस्पताल में छोड़ना उचित नहीं. इस वक्त छोटे बच्चे की कैसे केयर करनी है वह हम समझा देंगे.”

“नहीं इसे हम घर कैसे ले जा सकते हैं? इसे कोविड है. घर में किसी को हो जाएगा. इतनी तो समझ होनी चाहिए न आप को.”

“मां हम परिधि को घर में क्वैरंटाइन कर देंगे. बच्चे को कोविड से कैसे बचाना है वह नर्स बता ही देंगी.”

“नहीं हम बहू और बच्चे को घर नहीं ले जा सकते. खबरदार रोहन जो तू इन के चक्कर में आया. ये नर्स और डाक्टर ऐसे ही बोलते हैं. पर मैं कोई खतरा मोल नहीं ले सकती.”

“पर मां…”

तुझे कसम है चल यहां से..”

उर्मिला देवी रोहन का हाथ पकड़ कर उसे घसीटती हुई घर ले गईं. परिधि का चेहरा बन गया. डाक्टर और नर्स आपस में उर्मिला देवी के व्यवहार और हरकतों की बुराई करने लगे. उन लोगों ने मैनेजमैंट को भी उर्मिला देवी के गलत व्यवहार की खबर कर दी. 1-2 लोकल अखबारों में भी इस घटना का उल्लेख किया गया.

इस बात को करीब 4-5 दिन बीत चुके थे. एक दिन उर्मिला देवी ने पंडितजी को फोन लगाया. वह पूछना चाहती थीं कि आगे क्या करना उचित रहेगा और ग्रहनक्षत्रों के बुरे दोष कैसे दूर किए जाएं?

फोन पंडित के बेटे ने उठाया.

“बेटा जरा पंडितजी को फोन देना..” उर्मिला देवी ने कहा.

बेटे ने कहा,”पिताजी को कोरोना हो गया था. 1 सप्ताह पहले ही उन की मौत हो चुकी है.”

उर्मिला जी के हाथ से फोन छूट कर गिर पड़ा. खुद भी सोफे पर बैठ गईं. पंडितजी को कोरोना था, यह जान कर वह डर गई थीं. यानी जिस दिन पंडितजी धार्मिक अनुष्ठान कराने आए थे तब भी उन्हें कोरोना था. तभी तो परिधि को भी यह बीमारी हुई है.

परिधि के साथ उस दिन पंडितजी के साथ वह भी तो थीं यानी अब वह खुद भी कोरोना की चपेट में आ सकती हैं. उन्होंने गौर किया कि 2-3 दिनों से उन्हें भी खांसी हो रही थी.

उर्मिलाजी ने फटाफट अपना कोरोना टेस्ट करवाया. अब तक उन्हें बुखार भी आ चुका था. हजारीबाग में कोरोना का एक ही अस्पताल था इसलिए उन्हें उसी अस्पताल में जाना पड़ा. मगर वहां के मैनेजमैंट ने उर्मिला देवी को ऐडमिट करने से साफ इनकार कर दिया.

ऐंबुलैंस में पड़ीं उर्मिला देवी का दिमाग काम नहीं कर रहा था. वे जानती थीं कि इस के अलावा यहां कोई अस्पताल नहीं. अब या तो उन्हें 4 घंटे के सफर के बाद रांची ले जाया जाएगा और वहां बैड न मिला तो 12 घंटे का सफर कर के पटना जाने को तैयार रहना होगा. हताश रोहन अस्पताल से वापस निकल आया.

दोनों जानते थे कि उर्मिला देवी को अपनी करनी का फल ही मिल रहा था. उन की गलत सोच, अंधविश्वास और नकारात्मक रवैए का ही परिणाम था कि आज बहू और पोते के साथसाथ उन की अपनी जिंदगी भी दांव पर लग चुकी थी.

Akshaye Khanna : इतना घमंड भी ठीक नहीं

Akshaye Khanna : बौलीवुड ऐक्टर अक्षय खन्ना इन दिनों फिल्म ‘धुरंधर’ को ले कर खूब सुर्खियों में हैं. ‘धुरंधर’ में अक्षय ने एक खूंखार डकैत का किरदार निभाया है, जो निगेटिव किरदार है। लेकिन इस किरदार को अक्षय ने इतना बखूबी निभाया है कि लोग हीरो से ज्यादा विलेन की तारीफ करते नहीं थक रहे. जिसे देखो वह अक्षय के डांस स्टेप कौपी कर सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर कर रहा है.

अक्षय यों तो फिल्मों में लगातार ही काम कर रहे हैं, लेकिन इस फिल्म की वजह से वे कुछ ज्यादा ही चर्चा में आ गए हैं.

एक रिपोर्ट के अनुसार फिल्म ‘छावा’ की सफलता के बाद अक्षय खन्ना ने ‘धुरंधर’ फिल्म करने से पहले मना कर दिया था. जब उन्हें स्क्रिप्ट पढ़ने के लिए कहा गया, फिर वे माने और स्क्रिप्ट सुने और राजी हुए थे.

अहंकारी अक्षय खन्ना

अब ‘धुरंधर’ और ‘’छावा’ की सफलता के बाद अक्षय खन्ना के बारे में यह बात कही जा रही है कि इन फिल्मों की सफलता उन के सिर चढ़ गई है, जिस से उन के व्यवहार में बदलाव आ गया है और उन्होंने ‘दृश्यम 3’ की शूटिंग से ठीक पहले फिल्म छोड़ दी, जिस पर प्रोड्यूसर कुमार मंगत पाठक ने आपत्ति जताई, कानूनी नोटिस भेजा और कहा कि अक्षय का रवैया टौक्सिक और अनप्रोफैशनल है और उन की सफलता ने उन्हें अहंकारी बना दिया है.

डिमांड

सूत्रों की मानें तो अक्षय खन्ना की ‘दृश्यम 3’ फिल्म को छोड़ने की वजह काफी चौकाने वाली है. अक्षय खन्ना और मेकर्स के बीच पारिश्रमिक के अलावा ‘लुक’ को ले कर भी असहमति बनी. दरअसल, ‘दृश्यम 2’ में अक्षय अपने नैचुरल लुक (बिना विग के) में नजर आए थे, लेकिन ‘धुरंधर’ में उन्होंने विग पहनी है और दर्शकों ने उन के इस नए अवतार को बेहद पसंद किया. अब अक्षय चाहते थे कि ‘दृश्यम 3’ में भी वे विग पहन कर ही स्क्रीन पर आएं.

हालांकि, मेकर्स को यह सुझाव पसंद नहीं आया और उन्हें लगा कि किरदार की निरंतरता के लिए पुराना लुक ही सही है और अक्षय इसे मानने के लिए तैयार नहीं थे। पैसों और लुक के इसी तालमेल की कमी की वजह से निर्माता ने उन से दूरी बना ली.

अक्षय खन्ना ने अपने इस एरोगेंट व्यवहार की वजह से कई बड़ी फिल्मों को ठुकराया है. इन फिल्मों को ठुकराने की वजह उन्होंने किरदारों, फीस या क्रिएटिव मतभेदों के कारण रही है, जो निम्न है :

खाकी : राजकुमार संतोषी की फिल्म खाकी में सब इंस्पैक्टर का रोल पहले उन्हें औफर हुआ था, जिसे उन्होंने छोड़ दिया और बाद में तुषार कपूर ने किया.

कुरबान : इस फिल्म में विवेक ओबेराय वाला रोल अक्षय खन्ना ने ठुकराया था, जिसे बाद में विवेक ने निभाया.

जिंदा : संजय गुप्ता की फिल्म जिंदा में जौन अब्राहम वाला रोल अक्षय खन्ना को औफर हुआ था, लेकिन वित्तीय कारणों से उन्होंने इसे मना कर दिया.

परिणीता : इस फिल्म में मुख्य भूमिका (शेखर राय) के लिए अक्षय खन्ना पहली पसंद थे, लेकिन यह रोल सैफ अली खान को मिला और फिल्म सफल रही.

अक्षय खन्ना की फ्लौप फिल्में

अक्षय खन्ना आज एक अच्छे ऐक्टर के तौर पर गिने जा रहे हैं, लेकिन कभी ऐसा भी समय था, जब उन से फिल्मों ने दूरी बना ली थी क्योंकि एक के बाद एक उन की फिल्में असफल रही थी. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा भी था कि उन्हें आजकल फिल्मों में कोई चांस नहीं देता क्योंकि उन की फिल्में लगातार फ्लौप हो रही हैं.

यह सही है कि हिट फिल्मों के इस सफर से पहले अक्षय खन्ना की झोली में कई फ्लौप फिल्में भी आई हैं, जिन की वजह से उन के मीम्स भी बनते रहे हैं।

हिमालय पुत्र : ‘हिमालय पुत्र’ अक्षय खन्ना की पहली फिल्म थी. अक्षय अपनी डैब्यू फिल्म से लोगों की दिलों में जगह बनाने में नाकाम रहे थे. वर्ष 1997 में रिलीज हुई इस फिल्म ने बौक्स औफिस पर कुछ कमाल नहीं दिखाया था.

मोहब्बत : अक्षय खन्ना की इस फिल्म से लोगों ने बिलकुल मोहब्बत नहीं की और फिल्म परदे पर बुरी तरह पिटी. अक्षय खन्ना के अपोजिट इस फिल्म में माधुरी दीक्षित लीड रोल में थीं और यह अक्षय के कैरियर की तीसरी पिक्चर थी.

डोली सजा के रखना : साल 1998 में रिलीज हुई अक्षय खन्ना की फिल्म ‘डोली सजा के रखना’ बौक्स औफिस पर फुस्स साबित हुई. इस फिल्म का निर्देशन प्रियदर्शन ने किया था जो कि एक मलयालम फिल्म थी.

नकाब : साल 2007 में रिलीज हुई फिल्म ‘नकाब’ में अक्षय ने लीड रोल निभाया था. फिल्म में ऐक्टर के अपोजिट ऐक्ट्रैस उर्वशी शर्मा को कास्ट किया गया था. यह फिल्म बौक्स औफिस पर फ्लौप रही थी.

आक्रोश : साल 2010 में रिलीज हुई इस फिल्म में अक्षय खन्ना के अलावा अजय देवगन और बिपाशा बसु भी लीड रोल में थे. फिल्म में अक्षय ने एक सीबीआई औफिसर का किरदार निभाया था. इस फिल्म ने भी परदे पर कुछ खास कमाल नहीं दिखाया था.

इन फिल्मों के अलावा ‘गांधी माय फादर’, ‘द ऐक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’, ‘इत्तेफाक’ जैसी कई फिल्में भी हैं, जो फ्लौप ही रही हैं.

इस प्रकार अभिनेता अक्षय खन्ना का ‘दृश्यम 3’ से बाहर होना उन के कैरियर के लिए एक जोखिम हो सकता है क्योंकि यह उन की बढ़ी हुई फीस की रकम और क्रिएटिव मतभेदों के कारण हुआ, जिस से निर्माताओं ने कानूनी काररवाई की बात कही है, हालांकि उन की हालिया सफलताओं ने उन की मांग बढ़ा दी थी, लेकिन इस विवाद से उन के स्टारडम और इंडस्ट्री में इमेज पर असर पड़ सकता है क्योंकि प्रोड्यूसर्स उन्हें ‘अनप्रोफेशनल’ बता रहे हैं और ‘रेस 4’ जैसी फ्रेंचाइजी से भी बाहर हो गए हैं, जिस से आगे प्रोजैक्ट्स मिलना मुश्किल हो सकता है क्योंकि ऐसे कई आर्टिस्ट इंडस्ट्री में हैं, जिन्होंने कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते हुए आने वाली अच्छी प्रोजैक्ट को ठेंगा दिखाया और बाद में एक फिल्म के लिए तरस गए, मसलन जायरा वसीम (धार्मिक कारणों से), असिन (शादी के बाद), इमरान खान (कैरियर ब्रेक), विनोद खन्ना (आश्रम जाने के लिए) और राज किरण (मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के कारण) अभिनेता अमिताभ बच्चन ने भी बुरे दौर के बाद वापसी की और अब हर काम में वे सब से पहले भागीदार बनते हैं. इन कलाकारों को यह समझना जरूरी है कि दुनिया सिर्फ उगते हुए सूरज को ही आलिंगन करती है। वही सूरज जब डूबता है, तो लोग अपने घरों के दरवाजे और खिड़कियों को बंद कर लेते हैं.

Beauty Tips : ऐसे पाएं बेदाग स्किन के साथ लंबे घने बाल

Beauty Tips : ऐसे पाएं बेदाग स्किन के साथ लंबे घने बाल अगर आप भी ग्लोइंग त्वचा के साथ खूबसूरत बालों की ख्वाहिश रखती हैं, तो यह जानकारी आप के लिए ही है… कई महिलाएं अपनी त्वचा और बालों की समस्याओं का संबंध जीवनशैली या जेनेटिक फैक्टर्स से जोड़ती हैं. आमतौर पर वे बालों के नुकसान को अनदेखा कर देती हैं. उन्हें लगता है कि तनाव और बालों की देखभाल के लिए समय न निकाल पाना इन समस्याओं के कारण हैं. लेकिन उन्हें यह पता ही नहीं होता कि शरीर में न्यूट्रिशन लैवल पर त्वचा और बालों का स्वास्थ्य निर्भर होता है.

न्यूट्रिशन और आदर्श विटामिन लैवल दोनोें त्वचा को स्वस्थ, मुलायम और बालों को घना व मजबूत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं. डाइट और पाचन खराब होने से पोषण में कमी पैदा होती है. इससे त्वचा से जुड़ी कई समस्याएं हो सकती हैं और त्वचा के कुल स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है. कई बार आहार में कोई कमी नहीं होती, लेकिन फूड सैंसिटिविटी या ऐलर्जी त्वचा रोग का कारण बनती है.

अध्ययनों ने साबित किया है कि ऐंटीऔक्सीडैंट की फोटो प्रोटैक्टिव क्षमता का त्वचा की प्रतिरक्षा प्रणाली पर सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की पूर्ति के प्रभावों के साथ सहसंबंध होता है. आइए जाने कि विटामिन की कमी त्वचा और बालों को कैसे प्रभावित कर सकती है. त्वचा की देखभाल में पोषण की भूमिका विटामिन ए, बी3 और बी12 की अहमियत: पूरे मानव शरीर खासकर त्वचा के पोषण में विटामिन ए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. विटामिन ए की कमी से स्वैट डक्ट्स में रुकावट, औयल ग्लैंड्स में कमी और फ्राइनोडर्मा, जेरोसिस और त्वचा पर झुर्रियां आदि समस्याएं पैदा हो सकती हैं. आमतौर पर कुपोषित लोगों खासकर बच्चों में ये समस्याएं देखी जाती हैं. विटामिन ए की कमी के कारण कुहनियों, घुटनों, नितंबों पर खुरदरी काली त्वचा देखी जाती है.

विटामिन बी3 की कमी के कारण गरदन जैसे आमतौर पर खुले रहने वाले भागों पर फोटो सैंसिटिविटी और रैशेज जैसे सनबर्न हो जाते हैं. इसी तरह इस से हाथों और पैरों में दरारें भी पड़ सकती हैं जिसे पेलेग्रस ग्लव्स और बूट्स कहा जाता है. कई बार इस से त्वचा छिल सकती है. कई महिलाएं इस बात को अनदेखा कर देते हैं, लेकिन कई गंभीर मामलों में यह घातक साबित हो सकता है. विटामिन बी 12 की कमी आमतौर पर उन में देखी जाती है जिन के खाने में मक्का हर दिन होता है या जो शराब पीते हैं अथवा जो दवा ले रहे हैं. इस से त्वचा पर हाइपरपिग्मैंटेशन त्वचा में सूजन और इन्फैक्शन, डार्क सर्कल्स आदि समस्याएं हो सकती हैं. इन का इलाज न करना जानलेवा भी हो सकता है. दूध, पनीर, दही, अंडे, केला, स्ट्राबेरी, टूना मछली, चिकन आदि में विटामिन बी 12 भरपूर होता है.

इन पदार्थों का सेवन करना चाहिए. शरीर में बी 12 के स्तर को बढ़ाने के बारे में डाक्टर से सलाह लेनी चाहिए. विटामिन सी का महत्त्व कोलोजन बनने के लिए विटामिन सी आवश्यक है, त्वचा का टाइटनिंग और त्वचा में युवा दिखने के लिए यह बहुत महत्त्वपूर्ण प्रोटीन है. अध्ययनों ने साबित किया है कि विटामिन सी के रोजाना सेवन से त्वचा की झोर्रियों में सुधार हो सकता है और त्वचा के कुल टैक्सचर में सुधार हो सकता है. विटामिन सी ऐंटीऔक्सीडैंट से भरपूर होता है जो अच्छी त्वचा के लिए फायदेमंद होता है. विटामिन सी की कमी से त्वचा रूखी और बेजान हो सकती है और उस की घाव भरने की क्षमता कम हो सकती है. विटामिन सी की कमी से स्कर्वी भी हो सकता है.

स्कर्वी के लक्षणों में रक्तस्राव के कारण त्वचा पर दिखाई देने वाले गोल धब्बे रक्तस्राव के कारण त्वचा का रंग फीका पड़ना और स्वान नैक हेयर शामिल हैं. जिंक का महत्त्व जिंक की कमी से त्वचा में दरारें, सूखी त्वचा और रैशेज हो सकते हैं. जिंक की कमी से मुंहासे, त्वचा में संक्रमण भी हो सकता है और त्वचा की घाव भरने की क्षमता भी कम हो सकती है. कई केसेज में मुंह और नितंबों के आसपास लाल पपड़ीदार पैच दिखाई दे सकते हैं. लोकल ऐप्लिकेशन और क्रीम्स मौइस्चराइजर से इस की कमी का इलाज नहीं किया जा सकता है. इलाज में दवाइयों और अच्छे खाने के जरीए जिंक इनटेक शामिल है.

शरीर में जिंक लैवल क्या है उस के आधार पर डाक्टर जिंक सप्लिमैंट्स का सुझाव दे सकते हैं. आयरन का महत्त्व शरीर में लोहे की कमी के कारण बेजान, रूखी त्वचा, काले घेरे, नाखूनों का टूटना आदि समस्याएं हो सकती हैं. कुछ मामलों में इस से जीभ में सूजन, ऐंगुलर चेलाइटिस भी हो सकता है. इस के अलावा त्वचा में खुजली हो सकती है और खरोंचने पर त्वचा लाल, पपड़ीदार हो सकती है. आयरन की कमी से होने वाले रैशेज के कारण त्वचा के नीचे लाल या बैगनी रंग के धब्बे हो सकते हैं. बायोटिन एक पानी में घुलने वाला विटामिन बी है जो फैट और कार्बोहाइड्रेट चयापचय के लिए आवश्यक प्रतिक्रियाओं के लिए कोऐंजाइम के रूप में कार्य करता है.

बायोटिन की कमी बहुत आम समस्या नहीं है. बायोटिन की कमी से त्वचा में पैदा होने वाले लक्षणों में पैची रैड रैश आमतौर पर मुंह के पास, सेबोरहाइक डर्मेटाइटिस और फंगल त्वचा व नाखूनों में इन्फैक्शन शामिल हैं. बालों की देखभाल में पोषण की भूमिका आयरन और विटामिन बी12 का महत्त्व: बालों का समय से पहले ग्रे होना या कैनिटी एक आनुवंशिक प्रवृत्ति है. आयरन, विटामिन डी, फोलेट, विटामिन बी 12 और सेलेनियम ऐसे विटामिन और खनिज हैं जिन की कमी की वजह से बचपन या शुरुआती वयस्कता के दौरान बालों के ग्रे, सफेद होने की समस्या हो सकती है. इन सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी को पूरा करने से बालों के समय से पहले ग्रे होने की समस्या में सुधार हो सकता है.

विटामिन बी12 की कमी से बाल झड़ते हैं और रूखे और बेजान हो जाते हैं. विटामिन बी12 मानव शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं के बनने के लिए बहुत जरूरी है, जो शरीर के विभिन्न हिस्सों में औक्सीजन ले जाती हैं. जब किसी व्यक्ति में विटामिन बी12 की कमी होती है, तो बालों के रोमों को नए बाल पैदा करने के लिए पर्याप्त औक्सीजन नहीं मिलती है. परिणामस्वरूप बालों के रोम कुशलतापूर्वक काम नहीं कर पाते हैं और बाल ?ाड़ने लगते हैं. आयरन की कमी का बालों पर असर विटामिन बी 12 की कमी की तरह ही स्वस्थ बालों के लिए आयरन का सेवन भी बहुत महत्त्वपूर्ण होता है.

आयरन एक महत्त्वपूर्ण खनिज है जो मानव शरीर और लाल रक्त कोशिकाओं के समुचित कार्य में मदद करता है. जब किसी व्यक्ति में आयरन की कमी होती है, तो शरीर की लाल रक्त कोशिकाएं बालों के रोम तक औक्सीजन नहीं पहुंचा पाती हैं. लाल रक्त कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन नामक प्रोटीन होता है, जो रक्त को ऊतकों, कोशिकाओं और महत्त्वपूर्ण अंगों सहित शरीर के विभिन्न भागों में ले जाता है. हीमोग्लोबिन उन कोशिकाओं की मरम्मत करता है जो बालों के आदर्श विकास में योगदान देती हैं. आयरन की कमी से बालों का अत्यधिक ?ाड़ना, बालों की ठीक से न बढ़ पाना आदि समस्याएं पैदा होती हैं.

इस से महिलाओं और पुरुषों में गंजापन जल्दी हो सकता है. शरीर में आयरन को स्वस्थ लैवल को बनाए रखने के लिए हरी पत्तेदार सब्जियां, ब्रोकली, मुनक्का, काजू और दालों का सेवन नियमित रूप से करें. अपना आयरन लैवल जानने और शरीर में आयरन लैवल को बढ़ाने के संभव विकल्पों के बारे में जानने के लिए डाक्टर से बात करें. जिंक की कमी का बालों पर असर अध्ययनों से यह भी साबित हुआ है कि जिंक की कमी से बालों के रोम की प्रोटीन संरचना प्रभावित हो सकती है जो बालों की मजबूती को बनाए रखने के लिए महत्त्वपूर्ण होती है. जिंक हारमोनल संतुलन को बनाए रखता है और हारमोनल असंतुलन बालों के झड़ने का एक प्राथमिक कारण है.

विटामिन सी की कमी और बाल विटामिन सी की कमी से बाल दोमुंहे और सूखे हो सकते हैं. शरीर में जब विटामिन सी मौजूद होता है तभी आयरन को अब्सौर्ब किया जा सकता है. इसलिए अगर किसी के शरीर में विटामिन सी की कमी है तो उस से शरीर में आयरन का स्तर भी प्रभावित होता है जिस के परिणामस्वरूप बालों का ?ाड़ना शुरू हो जाता है. आहार में विटामिन, आयरन और जिंक की कमी से ऐक्यूट टेलोजेन एफ्लुवियम और बालों का समय से पहले सफेद होना हो सकता है. बालों को धोते, कंघी करते यहां तक कि उंगलियों को चलाते समय अत्यधिक बालों का ?ाड़ना टेलोजेन एफ्लुवियम के संकेत हैं. इसलिए चमकती त्वचा और घने बालों के लिए आहार में सही प्रोटीन और विटामिन शामिल करें. -डा. रैना नाहर कंसल्टैंट, डर्मैटोलौजी, पीडी हिंदुजा हौस्पिटल ऐंड मैडिकल रिसर्च सैंटर, खार. द्य

Romantic story in hindi : कबूतरों का घर – क्या जूही और कृष्णा का प्यार पूरा हो पाया

चांद की धुंधली रोशनी में सभी एकदूसरे की सांसें महसूस करने की कोशिश कर रहे थे. उन्हें तो यह भरोसा भी नहीं हो रहा था कि वे जीवित बचे हैं. पर ऊपर नीला आकाश देख कर और पैरों के नीचे जमीन का एहसास कर उन्हें लगा था कि वह बाढ़ के प्रकोप से बच गए. बाढ़ में कौन बह कर कहां गया, कौन बचा, किसी को कुछ पता नहीं था.

इन बचने वालों में कुछ ऐसे भी थे जिन के अपने देखते ही देखते उन के सामने जल में समाधि ले चुके थे और बचे लोग अब विवश थे हर दुख झेलने के लिए.

‘‘जाने और कितना बरसेगा बादल?’’ किसी ने दुख से कहा था.

‘‘यह कहो कि जाने कब पानी उतरेगा और हम वापस घर लौटेंगे,’’ यह दूसरी आवाज सब को सांत्वना दे रही थी.

‘‘घर भी बचा होगा कि नहीं, कौन जाने.’’ तीसरे ने कहा था.

इस समय उस टापू पर जितने भी लोग थे वे सभी अपने बच जाने को किसी चमत्कार से कम नहीं मान रहे थे और सभी आपस में एकदूसरे के साथ नई पहचान बनाने की चेष्टा कर रहे थे. अपना भय और दुख दूर करने के लिए यह उन सभी के लिए जरूरी भी था.

चांद बादलों के साथ लुकाछिपी खेल रहा था जिस से वहां गहन अंधकार छा जाता था.

तानी ने ठंड से बचने के लिए थोड़ी लकडि़यां और पत्तियां शाम को ही जमा कर ली थीं. उस ने सोचा आग जल जाए तो रोशनी हो जाएगी और ठंड भी कम लगेगी. अत: उस ने अपने साथ बैठे हुए एक बुजुर्ग से माचिस के लिए पूछा तो वह जेब टटोलता हुआ बोला, ‘‘है तो, पर गीली हो गई है.’’

तानी ने अफसोस जाहिर करने के लिए लंबी सांस भर ली और कुछ सोचता हुआ इधरउधर देखने लगा. उस वृद्ध ने माचिस निकाल कर उस की ओर विवशता से देखा और बोला, ‘‘कच्चा घर था न हमारा. घुटनों तक पानी भर गया तो भागे और बेटे को कहा, जल्दी चल, पर वह….’’

तानी एक पत्थर उठा कर उस बुजुर्ग के पास आ गया था. वृद्ध ने एक आह भर कर कहना शुरू किया, ‘‘मुझे बेटे ने कहा कि आप चलो, मैं भी आता हूं. सामान उठाने लगा था, जाने कहां होगा, होगा भी कि बह गया होगा.’’

इतनी देर में तानी ने आग जलाने का काम कर दिया था और अब लकडि़यों से धुआं निकलने लगा था.

‘‘लकडि़यां गीली हैं, देर से जलेंगी,’’ तानी ने कहा.

कृष्णा थोड़ी दूर पर बैठा निर्विकार भाव से यह सब देख रहा था. अंधेरे में उसे बस परछाइयां दिख रही थीं और किसी भी आहट को महसूस किया जा सकता था. लेकिन उस के उदास मन में किसी तरह की कोई आहट नहीं थी.

अपनी आंखों के सामने उस ने मातापिता और बहन को जलमग्न होते देखा था पर जाने कैसे वह अकेला बच कर इस किनारे आ लगा था. पर अपने बचने की उसे कोई खुशी नहीं थी क्योंकि बारबार उसे यह बात सता रही थी कि अब इस भरे संसार में वह अकेला है और अकेला वह कैसे रहेगा.

लकडि़यों के ढेर से उठते धुएं के बीच आग की लपट उठती दिखाई दी. कृष्णा ने उधर देखा, एक युवती वहां बैठी अपने आंचल से उस अलाव को हवा दे रही थी. हर बार जब आग की लपट उठती तो उस युवती का चेहरा उसे दिखाई दे जाता था क्योंकि युवती के नाक की लौंग चमक उठती थी.

कृष्णास्वामी ने एक बार जो उस युवती को देखा तो न चाहते हुए भी उधर देखने से खुद को रोक नहीं पाया था. अनायास ही उस के मन में आया कि शायद किसी अच्छे घर की बेटी है. पता नहीं इस का कौनकौन बचा होगा. उस युवती के अथक प्रयास से अचानक धुएं को भेद कर अब आग की मोटीमोटी लपटें खूब ऊंची उठने लगीं और उन लपटों से निकली रोशनी किसी हद तक अंधेरे को भेदने में सक्षम हो गई थी. भीड़ में खुशी की लहर दौड़ गई.

कृष्णा के पास बैठे व्यक्ति ने कहा, ‘‘मौत के पास आने के अनेक बहाने होते हैं. लेकिन उसे रोकने का एक भी बहाना इनसान के पास नहीं होता. जवान बेटेबहू थे हमारे, देखते ही देखते तेज धार में दोनों ही बह गए,’’ कृष्णा उस अधेड़ व्यक्ति की आपबीती सुन कर द्रवित हो उठा था. आंच और तेज हो गई थी.

‘‘थोड़े आलू होते तो इसी अलाव में भुन जाते. बच्चों के पेट में कुछ पड़ जाता,’’ एक कमजोर सी महिला ने कहा, उन्हें भी भूख की ललक उठी थी. इस उम्र में भूखा रहा भी तो नहीं जाता है.

आग जब अच्छी तरह से जलने लगी तो वह युवती उस जगह से उठ कर कुछ दूरी पर जा बैठी थी. कृष्णा भी थोड़ी दूरी बना कर वहीं जा कर बैठ गया. कुछ पलों की खामोशी के बाद वह बोला, ‘‘आप ने बहुत अच्छी तरह अलाव जला दिया है वरना अंधेरे में सब घबरा रहे थे.’’

‘‘जी,’’ युवती ने धीरे से जवाब में कहा.

‘‘मैं कृष्णास्वामी, डाक्टरी पढ़ रहा हूं. मेरा पूरा परिवार बाढ़ में बह गया और मैं जाने क्यों अकेला बच गया,’’ कुछ देर खामोश रहने के बाद कृष्णा ने फिर युवती से पूछा, ‘‘आप के साथ में कौन है?’’

‘‘कोई नहीं, सब समाप्त हो गए,’’ और इतना कहने के साथ वह हुलस कर रो पड़ी.

‘‘धीरज रखिए, सब का दुख यहां एक जैसा ही है,’’ और उस के साथ वह अपने आप को भी सांत्वना दे रहा था.

अलाव की रोशनी अब धीमी पड़ गई थी. अपनों से बिछड़े सैकड़ों लोग अब वहां एक नया परिवार बना रहे थे. एक अनोखा भाईचारा, सौहार्द और त्याग की मिसाल स्थापित कर रहे थे.

अगले दिन दोपहर तक एक हेलीकाप्टर ऊपर मंडराने लगा तो सब खड़े हो कर हाथ हिलाने लगे. बहुत जल्दी खाने के पैकेट उस टीले पर हेलीकाप्टर से गिरना शुरू हो गए. जिस के हाथ जो लग रहा था वह उठा रहा था. उस समय सब एकदूसरे को भूल गए थे पर हेलीकाप्टर के जाते ही सब एकदूसरे को देखने लगे.

अफरातफरी में कुछ लोग पैकेट पाने से चूक गए थे तो कुछ के हाथ में एक की जगह 2 पैकेट थे. जब सब ने अपना खाना खोला तो जिन्हें पैकेट नहीं मिला था उन्हें भी जा कर दिया.

कृष्णा उस युवती के नजदीक जा कर बैठ गया. अपना पैकेट खोलते हुए बोला, ‘‘आप को पैकेट मिला या नहीं?’’

‘‘मिला है,’’ वह धीरे से बोली.

कृष्णा ने आलूपूरी का कौर बनाते हुए कहा, ‘‘मुझे पता है कि आप का मन खाने को नहीं होगा पर यहां कब तक रहना पड़े कौन जाने?’’ और इसी के साथ उस ने पहला निवाला उस युवती की ओर बढ़ा दिया.

युवती की आंखें छलछला आईं. धीरे से बोली, ‘‘उस दिन मेरी बरात आने वाली थी. सब शादी में शरीक होने के लिए आए हुए थे. फिर देखते ही देखते घर पानी से भर गया…’’

युवती की बातें सुन कर कृष्णा का हाथ रुक गया. अपना पैकेट समेटते हुए बोला, ‘‘कुछ पता चला कि वे लोग कैसे हैं?’’

युवती ने कठिनाई से अपने आंसू पोंछे और बोली, ‘‘कोई नहीं बचा है. बचे भी होंगे तो जाने कौन तरफ हों. पता नहीं मैं कैसे पानी के बहाव के साथ बहती हुई इस टीले के पास पहुंच गई.’’

कृष्णा ने गहरी सांस भरी और बोला, ‘‘मेरे साथ भी तो यही हुआ है. जाने कैसे अब अकेला रहूंगा इतनी बड़ी दुनिया में. एकदम अकेला… ’’ इतना कह कर वह भी रोंआसा हो उठा.

दोनों के दर्द की गली में कुछ देर खामोशी पसरी रही. अचानक युवती ने कहा, ‘‘आप खा लीजिए.’’

युवती ने अपना पैकट भी खोला और पहला निवाला बनाते हुए बोली, ‘‘मेरा नाम जूही सरकार है.’’

कृष्णा आंसू पोंछ कर हंस दिया. दोनों भोजन करने लगे. सैकड़ों की भीड़ अपना धर्म, जाति भूल कर एक दूसरे को पूछते जा रहे थे और साथसाथ खा भी रहे थे.

खातेखाते जूही बोली, ‘‘कृष्णा, जिस तरह मुसीबत में हम एक हो जाते हैं वैसे ही बाकी समय क्यों नहीं एक हो कर रह पाते हैं?’’

कृष्णा ने गहरी सांस ली और बोला, ‘‘यही तो इनसान की विडंबना है.’’

सेना के जवान 2 दिन बाद आ कर जब उन्हें सुरक्षित स्थानों पर ले कर चले तो कृष्णा ने जूही की ओर बहुत ही अपनत्व भरी नजरों से देखा. वह भी कृष्णा से मिलने उस के पास आ गई और फिर जाते हुए बोली, ‘‘शायद हम फिर मिलें.’’

रात होने से पहले सब उस स्थान पर पहुंच गए जहां हजारों लोग छोटेछोटे तंबुओं में पहले से ही पहुंचे हुए थे. उस खुले मैदान में जहांजहां भी नजर जाती थी बस, रोतेबिलखते लोग अपनों से बिछुड़ने के दुख में डूबे दिखाई देते थे. धीरेधीरे भीड़ एक के बाद एक कर उन तंबुओं में गई. पानी ने बहा कर कृष्णा और जूही  को एक टापू पर फेंका था लेकिन सरकारी व्यवस्था ने दोनों को 2 अलगअलग तंबुओं में फेंक दिया.

मीलों दायरे में बसे उस तंबुओं के शहर में किसी को पता नहीं कि कौन कहां से आया है. सब एकदूसरे को अजनबी की तरह देखते लेकिन सभी की तकलीफ को बांटने के लिए सब तैयार रहते.

सरकारी सहायता के नाम पर वहां जो कुछ हो रहा था और मिल रहा था वह उतनी बड़ी भीड़ के लिए पर्याप्त नहीं था. कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं भी मदद करने के काम में जुटी थीं.

वहां रहने वाले पीडि़तों के जीवन में अभाव केवल खानेकपड़े का ही नहीं बल्कि अपनों के साथ का अभाव भी था. उन्हें देख कर लगता था, सब सांसें ले रहे हैं, बस.

उस शरणार्थी कैंप में महामारी से बचाव के लिए दवाइयों के बांटे जाने का काम शुरू हो गया था. कृष्णा ने आग्रह कर के इस काम में सहायता करने का प्रस्ताव रखा तो सब ने मान लिया क्योंकि वह मेडिकल का छात्र था और दवाइयों के बारे में कुछकुछ जानता था. दवाइयां ले कर वह कैंपकैंप घूमने लगा. दूसरे दिन कृष्णा जिस हिस्से में दवा देने पहुंचा वहां जूही को देख कर प्रसन्नता से खिल उठा. जूही कुछ बच्चों को मैदान में बैठा कर पढ़ा रही थी. गीली जमीन को उस ने ब्लैकबोर्ड बना लिया था. पहले शब्द लिखती थी फिर बच्चों को उस के बारे में समझाती थी. कृष्णा को देखा तो वह भी खुश हो कर खड़ी हो गई.

‘‘इधर कैसे आना हुआ?’’

‘‘अरे इनसान हूं तो दूसरों की सेवा करना भी तो हमारा धर्म है. ऐसे समय में मेहमान बन कर क्यों बैठे रहें,’’ यह कहते हुए कृष्णा ने जूही को अपना बैग दिखाया, ‘‘यह देखो, सेवा करने का अवसर हाथ लगा तो घूम रहा हूं,’’ फिर जूही की ओर देख कर बोला, ‘‘आप ने भी अच्छा काम खोज लिया है.’’

कृष्णा की बातें सुन कर जूही हंस दी. फिर कहने लगी, ‘‘ये बच्चे स्कूल जाते थे. मुसीबत की मार से बचे हैं. सोचा कि घर वापस जाने तक बहुत कुछ भूल जाएंगे. मेरा भी मन नहीं लगता था तो इन्हें ले कर पढ़नेपढ़ाने बैठ गई. किताबकापी के लिए संस्था वालों से कहा है.’’

दोनों ने एकदूसरे की इस भावना का स्वागत करते हुए कहा, ‘‘आखिर हम कुछ कर पाने में समर्थ हैं तो क्यों हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहें?’’

अब धीरेधीरे दोनों रोज मिलने लगे. जैसेजैसे समय बीत रहा था बहुत सारे लोग बीमार हो रहे थे. दोनों मिल कर उन की देखभाल करने लगे और उन का आशीर्वाद लेने लगे.

कृष्णा भावुक हो कर बोला, ‘‘जूही, इन की सेवा कर के लगता है कि हम ने अपने मातापिता पा लिए हैं.’’

एकसाथ रह कर दूसरों की सेवा करते करते दोनों इतने करीब आ गए कि उन्हें लगा कि अब एकदूसरे का साथ उन के लिए बेहद जरूरी है और वह हर पल साथ रहना चाहते हैं. जिन बुजुर्गों की वे सेवा करते थे उन की जुबान पर भी यह आशीर्वाद आने लगा था, ‘‘जुगजुग जिओ बच्चों, तुम दोनों की जोड़ी हमेशा बनी रहे.’’

एक दिन कृष्णा ने साहस कर के जूही से पूछ ही लिया, ‘‘जूही, अगर बिना बराती के मैं अकेला दूल्हा बन कर आऊं तो तुम मुझे अपना लोगी?’’

जूही का दिल धड़क उठा. वह भी तो इस घड़ी की प्रतीक्षा कर रही थी. नजरें झुका कर बोली, ‘‘अकेले क्यों आओगे, यहां कितने अपने हैं जो बराती बन जाएंगे.’’

कृष्णा की आंखें खुशी से चमक उठी. अपने विवाह का कार्यक्रम तय करते हुए उस ने अगले दिन कहा, ‘‘पता नहीं जूही, अपने घरों में हमारा कब जाना हो पाए. तबतक इसी तंबू में हमें घर बसाना पडे़गा.’’

जूही ने प्यार से कृष्णा को देखा और बोली, ‘‘तुम ने कभी कबूतरों को अपने लिए घोसला बनाते देखा है?’’

कृष्णा ने उस के इस सवाल पर अपनी अज्ञानता जाहिर की तो वह हंस कर बताने लगी, ‘‘कृष्णा, कबूतर केवल अंडा देने के लिए घोसला बनाते हैं, वरना तो खुद किसी दरवाजे, खिड़की या झरोखे की पतली सी मुंडेर पर रात को बसेरा लेते हैं. हमारे पास तो एक पूरा तंबू है.’’

कृष्णा ने मुसकरा कर उस के गाल पर पहली बार हल्की सी चिकोटी भरी. उन दोनों के घूमने से पहले ही कुछ आवाजों ने उन्हें घेर लिया था.

‘‘कबूतरों के इन घरों में बरातियों की कमी नहीं है. तुम तो बस दावत की तैयारी कर लो, बराती हाजिर हो जाएंगे.’’

उन दोनों को एक अलग सुख की अनुभूति होने लगी. लगा, मातापिता, भाईबहन, सब की प्रसन्नता के फूल जैसे इन लोगों के लिए आशीर्वाद में झड़ रहे हैं.

Vaginal Infection से बचाव है जरूरी

Vaginal Infection : वैजाइनल इन्फैक्शन यानी योनि में संक्रमण छोटी बच्ची से ले कर उम्रदराज महिला तक किसी को भी हो सकता है. कुछ महिलाएं जीवन में कई बार इस की शिकार होती हैं. वैजाइनल इन्फैक्शन वैसे तो एक आम बीमारी है पर इस की अनदेखी करने के परिणाम खतरनाक हो सकते हैं. यहां तक कि बांझपन तक हो सकता है. प्रैगनैंसी के दौरान वैजाइनल इन्फैक्शन होने पर यौन रोग भी हो सकते हैं, जो होने वाले बच्चे को भी अपना शिकार बना सकते हैं.

वैजाइनल इन्फैक्शन के कारण ल्यूकोरिया जैसी परेशानी भी हो सकती है, जिस के कारण वैजाइना से सफेद बदबूदार डिस्चार्ज होता है. इस से पेट और कमर का दर्द हो सकता है. बुखार होने के साथसाथ महिलाओं में कमजोरी भी आ सकती है.

वैजाइनल इन्फैक्शन का मुख्य कारण पर्सनल हाइजीन का ध्यान न रखना है. डाक्टर मधु गुप्ता कहती हैं कि योनि संक्रमण के कारण सैक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज भी हो सकते हैं. पर्सनल हाइजीन का रखें ध्यान कुछ इस तरह:

साफ पानी का करें प्रयोग:

वैजाइना बौडी को साफ रखने का काम खुद करती है. पर्सनल हाइजीन के लिए जरूरी है कि बाथरूम का प्रयोग करने से पहले टौयलेट फ्लश चला लें क्योंकि अगर आप से पहले किसी रोगी ने टौयलेट का प्रयोग किया है तो आप को भी इन्फैक्शन हो सकता है.

टौयलेट के बाद वैजाइना को साफ पानी से साफ करें और फिर इस एरिया को नर्म कपड़े से सुखा लें. ऐसा करने से इन्फैक्शन से बचा जा सकता है.

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पीरियड्स में रखें खास खयाल:

पीरियड्स के दौरान इन्फैक्शन का खतरा ज्यादा होता है, इसलिए इस दौरान साफसफाई का खास खयाल रखें. इन्फैक्शन से दूर रहने के लिए अच्छी किस्म के सैनिटरी पैड्स का ही प्रयोग करें. जरूरत के हिसाब से जल्दीजल्दी पैड्स बदलती रहें. टैंपून लगाने से पहले वैजाइना को पानी से वाश कराएं. इसे 5 घंटों से ज्यादा समय तक न लगाए रखें.

कौटन का प्रयोग है सही: पैंटी का प्रयोग करते समय यह जरूर देख लें कि वह कौटन की ही हो और बहुत टाइट फिटिंग वाली पैंटी का प्रयोग न करें. नायलोन और सिंथैटिक पैंटी का प्रयोग कम करें. यह पसीना पैदा करती है, जिस से वैजाइनल एरिया में स्किन इन्फैक्शन का खतरा बढ़ जाता है. पैंटी को धोते समय ध्यान रखें कि उस में साबुन न रहे और इसे धोने के लिए खुशबूदार साबुन का प्रयोग न करें.

गंदे टौयलेट से रहें दूर:

इन्फैक्शन से बचने के लिए गंदे टौयलेट का भी प्रयोग न करें. जिस टौयलेट में बहुत सारे लोग जाते हों उस का प्रयोग बहुत ही सावधानी से करें क्योंकि ऐसे टौयलेट का प्रयोग करने से यूरिनरी टै्रक्ट इन्फैक्शन यानी मूत्रमार्ग इन्फैक्शन का खतरा बढ़ जाता है.

न करें खुद इलाज: अगर वैजाइना या उस के आसपास खुजली हो रही हो तो उस जगह को रगड़ें नहीं और यदि खुजली बराबर बनी रहती है तो डाक्टर से संपर्क करें. अपने मन या फिर कैमिस्ट के कहने पर दवा न लें वरना परेशानी बढ़ सकती है.

डाक्टर की सलाह से करें डाउचिंग:

वैजाइना के अंदरूनी हिस्से की सफाई के लिए डाउचिंग की सलाह दी जाती है. इस में कुछ खास किस्म की दवा मिली होती है, पर इस का प्रयोग अपने मन से न करें.

वैजाइना में अच्छे और बुरे दोनों किस्म के बैक्टीरिया मौजूद होते हैं. कभीकभी डाउचिंग से खराब बैक्टीरिया के साथसाथ अच्छे बैक्टीरिया भी खत्म हो जाते हैं, जिस से इन्फैक्शन होने लगता है.

प्यूबिक हेयर की सफाई:

प्यूबिक हेयर यानी जननांग के बाल वैजाइना की सुरक्षा के लिए होते हैं. ये यूरिन के अंश को वैजाइना में जाने से रोकने का काम भी करते हैं. समयसमय पर इन की सफाई बेहद जरूरी होती है. यहां की स्किन बहुत संवेदनशील होती है, इसलिए यहां के बालों की सफाई के लिए हेयर रिमूवर और शेविंग क्रीम का इस्तेमाल कम करें. हेयर ट्रिमिंग सब से सुरक्षित उपाय माना जाता है.

Boondi Laddoo Recipe : अब घर पर भी बनाएं बूंदी और इसके लड्डू

Boondi Laddoo Recipe : बूंदी के लड्डू किसे पसंद नहीं होगे लेकिन बाजार के लड्डू खा खाकर आप भी बोर हो गए होंगे. इसलिए आज हमको बताएंगे घर पर आसानी से बूंदी बनाने का तरीका और फिर बूंदी के लड्डू बनाने की विधी. तो फिर देर किस बात की आइए जानते हैं.

सामग्री

  1. 1/2 कप पानी
  2. 1 कप चीनी
  3. केसर

सामग्री बूंदी की

  1. 1 कप बेसन
  2. केसर
  3. 3/4 कप पानी
  4. 2 से 3 काली इलायची
  5. 1/2 छोटा चम्मच मगज
  6. तलने के लिए तेल
  7. लड्डू का आकार देते समय हथेलियों पर लगाने के लिए 1 छोटा चम्मच तेल या घी.

विधि चीनी की चाशनी और बूंदी के लिए घोल बनाने की

  • 1 पैन में चीनी, केसर के धागे और पानी घोल कर चाशनी तैयार करने के लिए आंच पर रख दीजिए.
  • चीनी के घोल को पकाने के लिए धीमी से मध्यम आंच पर रखें.
  • 1 बाउल में बेसन, केसर (पाउडर या हाथ से ही हलका पिसा हुआ) और पानी डाल कर घोल बनाएं.
  • यह बैटर न तो गाढ़ा होना चाहिए और न ही पतला.
  • चाशनी को 1 तार की चाशनी बनने तक पकाएं और फिर आंच बंद कर दें.
  • ध्यान रहे कि बूंदी डालते समय चाशनी गरम होनी चाहिए.
  • चाशनी को गरम रखने के लिए आप चाशनी के पैन को गरम पानी से भरी ट्रे या बरतन में रख सकती हैं.

विधि बूंदी की

  • एक कड़ाही में डीप फ्राई करने के लिए तेल गरम करें. तेल मध्यम गरम होना चाहिए.
  • जब आप बेसन के घोल की 1 या 2 बूंदें डालते हैं, तो वे सतह पर तेजी से लेकिन स्थिर रूप से ऊपर आनी चाहिए.
  • अगर ये बहुत जल्दी ऊपर आ जाती हैं तो तेल बहुत गरम है. यदि वे ऊपर नहीं आते हैं या समय लेते हैं, तो तेल पर्याप्त गरम नहीं है.
  • एक छेद वाली कलछी/चम्मच लें. अपने हाथों से कलछी को तेल के ऊपर रखें. तली हुई बूंदी को निकालने के लिए आप को एक बड़ी कलछी या झारे की आवश्यकता होगी.
  • बूंदी को मध्यम गरम तेल में ही तलें. अगर तेल गरम होगा तो बूंदी तेल सोख लेगी और क्रिस्पी नहीं बनेगी, वहीं अगर तेल ज्यादा गरम हुआ तो बूंदी जल है सकती.
  • बूंदी के लिए आप एक बड़े चम्मच में बेसन का घोल लें और उसे छेद वाली कलछी के ऊपर डालें और बेसन के घोल वाले से चम्मच से दबाएं ताकि बैटर कलछी के छेदों के नीचे कड़ाही में गिरने लगे.
  • बूंदी को सुनहरा होने तक तलें, इन्हें ज्यादा फ्राई या क्रिस्पी न करें.
  • बूंदी को सही पकने के लिए लगभग 45 सैकंड से 1 मिनट का समय पर्याप्त है.
  • यह कदम महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अगर बूंदी कुरकुरी हो जाती है तो मोतीचूर के लड्डू नर्म नहीं होंगे और वे चाशनी को अच्छे से नहीं सोख पाएंगे.
  • तली हुई बूंदी कड़ाही से निकालने के लिए बड़े खांचे वाले चम्मच/झारे का इस्तेमाल करें.
  • बूंदी निकालने के बाद तेल को अच्छी तरह से छान लें और फिर उन्हें सीधे चाशनी में डालें. ध्यान दें कि चाशनी गरम होनी चाहिए. अगर चाशनी गरम नहीं है तो इसे गरम कर लें.
  • यदि चीनी की चाशनी क्रिस्टल बन जाती है तो 1 से 2 बड़े चम्मच पानी मिला कर फिर से गरम करें.
  • चपटी या पूंछ वाली बूंदी के बारे में परेशान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि हम उसे बाद में ब्लैंडर में डाल कर पीसेंगे.
  • इसी तरह सारी बूंदी बना लें और उस के तेल को अच्छी तरह डाल कर उसे तुरंत गरम चाशनी में डाल कर अच्छे से मिलाती जाएं.
  • चाशनी में बूंदी नर्म हो जानी चाहिए.

विधि लड्डू की

  • एक ब्लैंडर या मिक्स्चर में चाशनी के साथ मिक्स की गई सारी बूंदी डालें.
  • 1 बड़ा चम्मच गरम पानी डालें और हलका पीस लें. ध्यान रहे हमें सिर्फ बूंदी को लड्डू का आकार देने में भी मुश्किल होती है.
  • अगर बूंदी कुरकुरी हो तो आप मिक्सर में जरूरत के अनुसार 1 से 2 बड़े चम्मच गरम पानी और डाल सकती हैं ताकि बूंदी नरम रहें.
  • बूंदी में मगज, काली इलायची डाल कर अच्छे से मिक्स करें.
  • हथेलियों पर थोड़ा सा तेल या घी लगा कर लड्डू का आकार दें.
  • लड्डू बनाते समय मिश्रण गरम होना चाहिए. ठंडा होने पर यह मिश्रण सख्त हो जाएगा और लड्डू आकार नहीं ले पाएंगे.
  • आप इन्हें खरबूजेके बीज, मगज, किशमिश, बादाम या पिस्ता की कतरन से सजा सकती हैं.
  • इन लड्डुओं को फ्रिज में भी स्टोर किया जा सकता है.

-व्यंजन सहयोग: नारायण दत्त शर्माकलिनरी हैडबारबेक्यू नेशन हौस्पिटैलिटी लिमिटेड

Kahaniyan : विश्वासघात – जूही ने कैसे छीना नीता का पति

Kahaniyan : नीला आसमान अचानक ही स्याह हो चला था. बारिश की छोटीछोटी बूंदें अंबर से टपकने लगी थीं. तूफान जोरों पर था. दरवाजों के टकराने की आवाज सुन कर जूही बाहर आई. अंधेरा देख कर अतीत की स्मृतियां ताजा हो गईं…

कुछ ऐसा ही तूफानी मंजर था आज से 1 साल पहले का. उस दिन उस ने जीन्स पर टौप पहना था. अपने रेशमी केशों की पोनीटेल बनाई थी. वह बहुत खूबसूरत लग रही थी. उस ने आंखों पर सनग्लासेज चढ़ाए और ड्राइविंग सीट पर बैठ गई.

कुछ ही देर में वह बैंक में थी. मैनेजर के कमरे की तरफ बढ़ते हुए उसे कुछ संशय सा था कि उस का लोन स्वीकृत होगा भी या नहीं, पर मैनेजर की मधुर मुसकान ने उस के संदेह को विराम दे दिया. उस का लोन स्वीकृत हो गया था और अब वह अपना बुटीक खोल सकती थी. आननफानन उस ने मिठाई मंगवा कर बैंक स्टाफ को खिलाई और प्रसन्नतापूर्वक घर लौट आई.

शुरू से ही वह काफी महत्त्वाकांक्षी रही थी. फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करते ही उस ने लोन के लिए आवेदन कर दिया था. पड़ोस के कसबे में रहने वाली जूही इस शहर में किराए पर अकेली रहती थी और अपना कैरियर गारमैंट्स के व्यापार से शुरू करना चाहती थी.

अगले दिन उस ने सोचा कि मैनेजर को धन्यवाद दे आए. आखिर उसी की सक्रियता से लोन इतनी जल्दी मिलना संभव हुआ था. मैनेजर बेहद स्मार्ट, हंसमुख और प्रतिभावान था. जूही उस से बेहद प्रभावित हुई और उस की मंगाई कौफी के लिए मना नहीं कर पाई. बातोंबातों में उसे पता चला कि वह शहर में नया आया है. उस का नाम नीरज है और शहर से दूर बने अपार्टमैंट्स में उस का निवास है.

धीरेधीरे मुलाकातें बढ़ीं तो जूही ने पाया कि दोनों की रुचियां काफी मिलती है. दोनों को एकदूसरे का साथ काफी अच्छा लगने लगा. लगातार मुलाकातों में जूही कब नीरज से प्यार कर बैठी, पता ही न चला. नीरज भी जूही की सुंदरता का कायल था.

बिजली तो उस दिन गिरी जब बुटीक की ओपनिंग सेरेमनी पर नीरज ने अपनी पत्नी नीता से जूही को मिलवाया. नीरज के विवाहित होने का जूही को इतना दुख नहीं हुआ, जितना नीता को उस की पत्नी के रूप में पा कर. नीता जूही की सहपाठी रही थी और हर बात में जूही से उन्नीस थी. उस के अनुसार नीता जैसी साधारण स्त्री नीरज जैसे पति को डिजर्व ही नहीं करती थी.

सहेली पर विजय की भावना जूही को नीरज की तरफ खींचती गई और नीता से अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करने के चक्कर में जूही का नीरज से मिलनाजुलना बढ़ता गया. नीता खुश थी. अकेले शहर में जूही का साथ उसे बहुत अच्छा लगता था. वह हमेशा उस से कुछ सीखने की कोशिश करती, पर इन लगातार मुलाकातों से जूही और नीरज को कई बार एकांत मिलने लगा.

दोनों बहक गए और अब एकदूसरे के साथ रहने के बहाने खोजने लगे. नीता को अपनी सहेली पर रंच मात्र भी शक न था और नीरज पर तो वह आंख मूंद कर विश्वास करती थी. विश्वास का प्याला तो उस दिन छलका, जब पिताजी की बीमारी के चलते नीता को महीने भर के लिए पीहर जाना पड़ा.

सरप्राइज देने की सोच में जब वह अचानक घर आई, तो उस ने नीरज और जूही को आपत्तिजनक हालत में पाया. इस सदमे से आहत नीता बिना कुछ बोले नीरज को छोड़ कर चली गई.

जूही अब नीरज के साथ आ कर रहने लगी. कहते हैं न कि प्यार अंधा होता है, पर जब ‘एवरीथिंग इज फेयर इन लव ऐंड वार’ का इरादा हो तो शायद वह विवेकरहित भी हो जाता है.

समय अपनी गति से चलता रहा. जूही और नीरज मानो एकदूसरे के लिए ही बने थे. जीवन मस्ती में कट रहा था. कुछ समय बाद जूही को सब कुछ होते हुए भी एक कमी सी खलने लगी.

आंगन में नन्ही किलकारी खेले, वह चाहती थी, पर नीरज इस के लिए तैयार नहीं था. उस का कहना था कि ‘लिव इन रिलेशन’ की कानूनी मान्यता विवादास्पद है, इसलिए वह बच्चे का भविष्य दांव पर नहीं लगाना चाहता. जूही इस तर्क के आगे निरुत्तर थी.

जूही का बुटीक अच्छा चल रहा था. नाम व  कमाई दोनों ही थे. एक दिन अचानक ही एक आमंत्रणपत्र देख कर वह सकते में आ गई. पत्र नीरज की पर्सनल फाइल में था. आमंत्रणपत्र महक रहा था. वह था तो किसी पार्लर के उद्घाटन का, पर शब्दावली शायराना व व्यक्तिगत सी थी. मुख्य अतिथि नीरज ही थे.

जूही ने नीरज को मोबाइल लगाना चाहा पर वह लगातार ‘आउट औफ रीच’ आता रहा. दिन भर जूही का मन काम में नहीं लगा. बुटीक छोड़ कर वह जा नहीं सकती थी. रात को नीरज के आते ही उस ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी.

कुछ देर तो नीरज बात संभालने की कोशिश करता रहा पर तर्कविहीन उत्तरों से जब जूही संतुष्ट नहीं हुई, तो दोनों का झगड़ा हो गया. नीरज पुन: किसी अन्य स्त्री की ओर आकृष्ट था. संभवत: पत्नी के रहते जूही के साथ संबंध बनाने ने उसे इतनी हिम्मत दे दी थी.

मौजूदा दौर में स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता ने उस के वजूद को बल दिया है. इतना कि कई बार वह समाज के विरुद्ध जा कर अपनी पसंद के कार्य करने लगती है. नीरज जैसे पुरुष इसी बात का फायदा उठाते हैं.

उन्होंने पढ़ीलिखी, बराबर कमाने वाली स्त्री को अपने समान नहीं माना, बल्कि उपभोग की वस्तु समझ कर उस का उपयोग किया. अपने स्वार्थ के लिए जब चाहा उन्हें समान दरजा दे दिया और जब चाहा तब सामाजिक रूढि़यों के बंधन तोड़ दिए. विवाह उन के लिए सुविधा का खेल हो गया.

इस आकस्मिक घटनाक्रम के लिए जूही तैयार नहीं थी. उस ने तो नीरज को संपूर्ण रूप से चाहा व अपनाया था. नीरज को अपनी नई महिला मित्र ताजा हवा के झोंके जैसी दिख रही थी. उस के तन व मन दोनों ही बदलाव के लिए आतुर थे.

जूही को अपनी भलाई व स्वाभिमान नीरज का घर छोड़ने में ही लगे. कुछ महीनों का मधुमास इतनी जल्दी व इतनी बेकद्री से खत्म हो जाएगा, उस ने सोचा न था. नीरज ने उस को रोकने का थोड़ा सा भी प्रयास नहीं किया.

शायद जूही ने इस कटु सत्य को जान लिया था कि पुरुष के लिए स्त्री कभी हमकदम नहीं बनती. वह या तो उसे देवी बना कर उसे नैसर्गिक अधिकारों से दूर कर देता है या दासी बना कर उस के अधिकारों को छीन लेता है. उसे पुरुषों से चिढ़ सी हो गई थी.

नीरज के बारे में फिर कभी जानने की उस ने कोशिश नहीं की, न ही नीरज ने उस से संपर्क साधा.

आज बादलों के इस झुरमुट में पिछली यादों के जख्मों को सहलाते हुए वह यही सोच रही थी कि विश्वासघात किस ने किस के साथ किया था?

Long Story : खुशी का गम – क्या परिवार को दोबारा पा सका वह

Long Story : मेरे बेटे आकाश की आज शादी है. घर मेहमानों से भरा पड़ा है. हर तरफ शादी की तैयारियां चल रही हैं. यद्यपि मैं इस घर का मुखिया हूं, लेकिन अपने ही घर में मेरी हैसियत सिर्फ एक मूकदर्शक की बन कर रह गई है. आज मेरे पास न पैसा है न परिवार में कोई प्रतिष्ठा. चूंकि घर के नौकरों से ले कर रिश्तेदारों तक को इस बात की जानकारी है, इसलिए सभी मुझ से बहुत रूखे ढंग से पेश आते हैं.

बहुत अपमानजनक है यह सब लेकिन मैं क्या करूं? अपने ही घर में उस अपमानजनक स्थिति के लिए मैं खुद ही तो जिम्मेदार हूं. फिर मैं किसे दोष दूं? क्या खुशी, मेरी पत्नी इस के लिए जिम्मेदार है? अंदर से एक हूक  सी उठी. और इसी के साथ मन ने कहा, ‘उस ने तो तुम्हें पति का पूरा सम्मान दिया, पूरा आदर दिया, लेकिन तुम शायद उस के प्यार, उस के समर्पण के हकदार नहीं थे.’

खुशी एक बहुत कुशल गृहिणी है जिस ने कई सालों तक मुझे पत्नी का निश्छल प्यार और समर्पण दिया. पर मैं ही नादान था जो उस की अच्छाइयां कभी समझ नहीं पाया. मैं हमेशा उस की आलोचना करता रहा. उसे मानसिक रूप से प्रताडि़त करता रहा. अपने प्रति उस के लगाव को हमेशा मैं ने ढोंग समझा.

मैं सारा जीवन मौजमस्ती करता रहा और वह मेरी ऐयाशियों को घुटघुट कर सहती रही, मेरे अपमान व अवमाननापूर्ण व्यवहार को सहती रही. वह एक सीधीसादी सुशील महिला थी और उस का संसार सिर्फ मैं और उस का बेटा आकाश थे. वह हम दोनों के चेहरों पर मुसकराहट देखने के लिए कुछ भी करने को हमेशा तैयार रहती थी लेकिन मैं अपने प्रति उस की उस अटूट चाहत को कभी समझ न पाया.

मैं कब विगत दिनों की खट्टीमीठी यादों की लहरों में बहता चला गया. मुझे पता भी नहीं चला था.

उन दिनों मैं कालिज में नयानया आया था. वरिष्ठ छात्र रैगिंग कर रहे थे. एक दिन मैं कालिज में अभी घुसा ही था कि एक दूध की तरह गोरी, अति आकर्षक नैननक्श वाली लड़की कुछ घबराई और परेशान सी मेरे पास आई और सकुचाते हुए मुझ से बोली, ‘आप बी.ए. प्रथम वर्ष में हैं न, मैं भी बी.ए. प्रथम वर्ष में हूं. वह जो सामने छात्रों का झुंड बैठा है, उन लोगों ने मुझ से कहा है कि मैं आप का हाथ थामे इस मैदान का चक्कर लगाऊं. अब वे सीनियर हैं, उन की बात नहीं मानी तो नाहक मुझे परेशान करेंगे.’

‘हां, हां, मेरा हाथ आप शौक से थामिए, चाहें तो जिंदगी भर थामे रहिए. बंदे को कोई परेशानी नहीं होगी. तो चलें, चक्कर लगाएं.’

मेरी इस चुटकी पर शर्म से सिंदूरी होते उस कोमल चेहरे को मैं देखता रह गया था. मैं अब तक कई लड़कियों के संपर्क में आ चुका था लेकिन इतनी शर्माती, सकुचाती सुंदरता की प्रतिमूर्ति को मैं ने पहली बार इतने करीब से देखा था.

उस के मुलायम हाथ को थामे मैं ने पूरे मैदान का चक्कर लगाया था और फिर ताली बजाते छात्रों के दल के सामने आ कर मैं ने उस का कांपता हाथ छोड़ दिया था कि तभी उस ने नजरें जमीन में गड़ा कर मुझ से कहा था, ‘आई लव यू’, और यह कहते ही वह सुबकसुबक कर रो पड़ी थी और मैं मुसकराता हुआ उसे छोड़ कर क्लास में चला गया था.

बाद में मुझे पता चला था कि उस सुंदर लड़की का नाम खुशी था और वह एक प्रतिष्ठित धनाढ्य परिवार की लड़की थी. उस दिन के बाद जब कभी भी मेरा उस से सामना होता, मुझ से नजरें मिलते ही वह घबरा कर अपनी पलकें झुका लेती और मेरे सामने से हट जाती. उस की इस अदा ने मुझे उस का दीवाना बना दिया था. मैं क्लास में कोशिश करता कि उस के ठीक सामने बैठूं. मैं उस का परिचय पाने और दोस्ती करने के लिए बेताब हो उठा था.

मेरे चाचाजी की लड़की नेहा, जो मेरी ही क्लास में थी, वह खुशी की बहुत अच्छी सहेली थी. मैं ने नेहा के सामने खुशी से दोस्ती करने की इच्छा जाहिर की और नेहा ने एक दिन मुझ से उस की दोस्ती करा दी थी. धीरेधीरे हमारी दोस्ती बढ़ गई और खुशी मेरे बहुत करीब आ गई थी.

मैं जैसेजैसे खुशी के करीब आता जा रहा था, वैसेवैसे मुझे निराशा हाथ लगती जा रही थी. मैं स्वभाव से बेहद बातूनी, जिंदादिल, मस्तमौला किस्म का युवक था लेकिन खुशी अपने नाम के विपरीत एक बेहद भावुक किस्म की गंभीर लड़की थी.

कुछ ही समय में वह मेरे बहुत करीब आ चुकी थी और मैं उस की जिंदगी का आधारस्तंभ बन गया था, लेकिन मैं उस के नीरस स्वभाव से ऊबने लगा था. वह मितभाषी थी, जब भी मेरे पास रहती, होंठ सिले रहती. जहां मैं हर वक्त खुल कर हंसता रहता था, वहीं वह हर वक्त गंभीरता का आवरण ओढे़ रहती.

दिन गुजरने के साथ जैसेजैसे उस के व्यक्तित्व का यह पहलू मेरे सामने आ रहा था वैसेवैसे उस के प्रति मेरा मोहभंग होता जा रहा था. जहां वह मानसिक रूप से दिन पर दिन मेरे करीब आती जा रही थी, वहीं मैं जानबूझ कर अपने को उस से दूर करता जा रहा था, क्योंकि मैं जानता था कि उस के और मेरे रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है. मुझे एहसास होता जा रहा था कि यदि हम ने शादी कर ली तो मैं उस के साथ कभी सुखी नहीं रह पाऊंगा. यह सोच कर मैं ने धीरेधीरे उस से मिलना कम कर दिया. लेकिन नेहा से मुझे पता चला कि मेरे इस रवैये से वह बहुत दुखी और परेशान रहने लगी थी, क्योंकि वह मुझ से भावनात्मक तौर पर जुड़ चुकी थी.

नेहा ने तो मुझे यह भी बताया कि अगर मैं खुशी से शादी नहीं करूंगा तो वह अपनी जान दे देगी, लेकिन किसी और लड़के से शादी नहीं करेगी. नेहा की इस बात से मैं परेशान हो गया था, और एक दिन खुशी को मैं ने अपने और उस के विरोधाभास के बारे में बताया कि हम दोनों के स्वभाव में जमीनआसमान का अंतर होने की वजह से वह कभी मेरे साथ सुखी नहीं रह पाएगी. इसलिए बेहतर यही होगा कि हम अपने रास्ते  अलग कर लें.

मेरी इस बात को सुन कर खुशी बहुत रोई थी और उस दिन घर जा कर उस ने अपने दोनों हाथों की नसें काट कर खुदकुशी करने का प्रयास किया था.

उस दिन खुशी के घर वालों को मेरी और खुशी की दोस्ती के बारे में पता चल गया. अगले ही दिन उस के घर वाले उस की और मेरी शादी का प्रस्ताव ले कर मेरे मातापिता से मिले थे.

नेहा ने मेरी और खुशी की दोस्ती के बारे में पहले ही मेरे मातापिता को सबकुछ बता दिया था, सो मेरे मातापिता ने मेरी राय बिना पूछे उस से मेरा रिश्ता पक्का कर दिया था. बाद में मैं ने अपने मातापिता से इस रिश्ते को तोड़ने की लाख मिन्नतेंकीं लेकिन उन्होंने मेरी बातों पर ध्यान नहीं दिया और आखिरकार मेरी शादी खुशी से हो गई.

विवाह के बाद खुशी ने मुझे वे सारी खुशियां दी थीं जिन की एक पति को अपने पत्नी से अपेक्षा होती है. शादी के बाद के पहले 2-3 वर्ष बहुत अच्छे बीते. वक्त के साथ मैं एक प्यारे से बेटे का पिता बन गया था. उस को गोद में उठा कर मैं बेपनाह खुशियों से भर जाता. उसे लाड़दुलार कर मुझे बहुत सुकून मिलता लेकिन लगभग 3 सालों के विवाहित जीवन के बाद हमारे दांपत्य जीवन में कुछ ठहराव सा आने लगा था. हमारे संबंधों में एकरसता और ऊब की शुष्कता पसरती जा रही थी.

मैं शुरू से ही रसिक स्वभाव का था. नईनई लड़कियों से दोस्ती करना मेरा प्रिय शगल था.

गुवाहाटी में मेरा काफी पुराना अच्छा- खासा साडि़यों का शोरूम था. मुझे व्यापार के लिए अधिक समय नहीं देना पड़ता था, पुराने कर्मचारी मेरी दुकान बहुत अच्छी तरह से संभाल रहे थे. गुवाहाटी के अलावा शिलांग में भी मेरा साडि़यों का एक बड़ा शोरूम था, सो मैं सप्ताह में एक बार शिलांग जरूर जाया करता था. वहां कई लड़कियां मेरी मित्र थीं. शिलांग में एक दोस्त के यहां मेरा परिचय फ्लोरेंस नाम की एक खासी जाति की लड़की से हुआ था. पहली ही नजर में वह लड़की मेरी निगाहों में चढ़ गई थी. उस से पहले मैं जितनी खासी लड़कियों के संपर्क में आया वे सब महज कागजी गुडि़याएं थीं, जिन के जीवन का उद्देश्य सिर्फ मौजमस्ती तथा सैरसपाटा हुआ करता था, लेकिन फ्लोरेंस बेहद जिंदादिल और बिंदास होने के साथसाथ मानसिक रूप से बहुत परिपक्व थी. वह कभी अर्थहीन बातें नहीं करती थी. उस का व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली था.

एक दिन बातों ही बातों में फ्लोरेंस ने मुझे बताया कि वह एक अच्छी नौकरी की तलाश में है, क्योंकि वह कंपनी, जिस में वह काम कर रही थी, उस की शिलांग की शाखा बंद होने वाली थी.

फ्लोरेंस ने जैसे ही मुझे यह बताया मैं ने उसे अपने शिलांग वाले साड़ी के शोरूम में मैनेजर के पद पर रख लिया था. अब जैसेजैसे मैं उस के संपर्क में आ रहा था, मेरा उस के प्रति खिंचाव बढ़ता ही जा रहा था. दूसरी लड़कियां जहां मेरी अमीरी और आकर्षक व्यक्तित्व की वजह से मेरे आसपास तितलियों की तरह मंडराया करती थीं वहीं फ्लोरेंस मुझ से पर्याप्त दूरी बनाए रखती, जिस की वजह से मैं उस की ओर शिद्दत से खिंचता जा रहा था.

इधर उस की ओर मेरे खिंचाव का एक कारण और था. फ्लोरेंस के नाम कई एकड़ जमीन थी. अगर मैं फ्लोरेंस से रिश्ता कायम कर लेता तो मैं उस की जमीन का मालिक बन जाता. सो जमीन के लालच में मैं उस से रिश्ता कायम करना चाहता था और एक दिन मुझे वह मौका मिल गया जिस की मुझे चाहत थी.

उस दिन फ्लोरेंस मेरे पास बहुत खराब मूड में आई और मेरे कुरेदने पर रो पड़ी. मुझ से बोली, ‘मेरे भाई बहुत जल्लाद हैं. हम खासियों में मां परिवार की मुखिया होती है. बेटियां वंश आगे चलाती हैं. बेटियों को ही मां की जमीनजायदाद मिलती है. मैं अपनी मां की इकलौती बेटी हूं. इसलिए मां की सारी जमीन मुझे मिली है. मेरे दोनों भाइयों की निगाहें मेरी जमीन पर उगने वाले फलों से होने वाली आमदनी पर गड़ी हुई हैं.

‘मैं तो नौकरी पर आ जाती हूं तो मेरे भाई ही खेतों में मजदूरों से काम करवाते हैं. खेती से होने वाली आमदनी पर अपना नियंत्रण रखने के लिए मेरे भाई मेरी शादी एक निकम्मे, नाकारा खासी आदमी से कराने पर जोर दे रहे हैं.’

उसे इस तरह रोते देख मैं ने उसे अपनी बांहों में भर लिया और उस से बोला, ‘अरे, मेरे होते हुए तुम क्यों चिंता करती हो? मैं तुम्हारे भाइयों से बातें करूंगा और उन्हें धमकाऊंगा. तुम बिलकुल भी मत डरो. मेरे होते हुए कोई तुम पर अपनी मरजी नहीं थोप सकेगा.’

यह कह कर मैं ने उसे चूमना शुरू कर दिया. तब फ्लोरेंस ने मेरे चंगुल से छूटने के लिए बहुत हाथपांव मारे लेकिन उस दिन मेरे ऊपर उस का नशा इस कदर हावी था कि मैं ने उस की एक न सुनी और आखिरकार कुछ प्यार और कुछ जोरजबरदस्ती करते हुए मैं ने उसे आत्मसमर्पण करने पर विवश कर दिया. उस दिन मैं ने महसूस किया कि मेरी इस जबरदस्ती से फ्लोरेंस बहुत अधिक नाराज नहीं थी. धीरेधीरे वह मुझे दिलोजान से चाहने लगी थी.

फ्लोरेंस के शोख बिंदास व्यक्तित्व के सामने खुशी का सीधासादा व्यक्तित्व मुझे नीरस लगने लगा था. फ्लोरेंस बातें करने में इतनी वाक्पटु थी कि मामूली बात को भी वजनदार और आकर्षक बना कर सामने रखती. मुझे उस से महज बातें करना बहुत अच्छा लगता था.

अब व्यापार के काम के बहाने मैं हफ्तों फ्लोरेंस के घर पड़ा रहता था. धीरेधीरे शिलांग के साडि़यों के शोरूम की पूरी बागडोर उस ने अपने हाथों में ले ली थी. इधर मुझे यह खुशखयाली भी रहने लगी कि फ्लोरेंस की सारी जमीन अब मेरी है. मैं ही उस का असली मालिक हूं.

फ्लोरेेंस से मेरे संबंधों की खबर खुशी और मेरे परिवार वालों को लग गई थी जिस की वजह से खुशी बहुत दुखी रहने लगी थी. मैं जब भी घर जाता, वह मुझ से कहती, ‘देखो, तुम क्यों उस खासी युवती को इतनी अहमियत दे रहे हो? क्या मुझे और मेरे बेटे को तुम्हारा साथ, तुम्हारा वक्त नहीं चाहिए? आज तुम मानो या न मानो पर देखना, एक दिन वह खासी औरत तुम्हारा साडि़यों का शोरूम हड़प लेगी. तुम ने यहां का शोरूम भी नौकरों के भरोसे छोड़ दिया है. वहां की आमदनी पहले से आधी रह गई है. तुम क्यों अपना सर्वनाश करने पर तुले हुए हो?’

खुशी की बातें सुन कर मैं गुस्से में भर उठा था और उस को चांटा मार कर घर से बाहर निकल आया था.

उसी दिन मैं शिलांग चला गया था. समय पंख लगा कर उड़ता चला गया और मेरा बेटा बड़ा हो चला था. जैसेजैसे वह समझदार होता जा रहा था, वह भी मुझ से दूर होता जा रहा था. मैं उसे अपने करीब लाने की भरसक कोशिश करता, पर वह मुझ से हमेशा अनमना सा रहता और अजनबियों की तरह पेश आता.

फ्लोरेंस से भी मेरा एक बेटा था जिसे मैं बेहद प्यार करता था. जैसेजैसे वह बड़ा हो रहा था वह भी मेरे नियंत्रण से बाहर होता जा रहा था.

इधर पिछले कुछ सालों से खुशी का कुछ दूसरा ही रूप मुझे देखने को मिल रहा था. गुवाहाटी वाला साडि़यों का शोरूम अब खुशी संभाल रही थी. उस के देखभाल करने के बाद वहां की बिक्री लगभग दोगुनी हो गई थी.

अब मेरा बेटा आकाश भी बड़ा हो चला था और कालिज के बाद वह भी शोरूम में बैठने लगा था, लेकिन एक बात जो मुझे खाए जा रही थी वह यह कि खुशी के प्रति मेरे अवमाननापूर्ण व्यवहार के प्रतिक्रियास्वरूप वह मुझ से बहुत कटाकटा सा रहने लगा था और दुकान की तिजोरी की चाबी भी वह अपने पास रखने लगा था. इस वजह से मैं रुपएपैसे के मामले में उन का मोहताज हो गया था. जब कभी मुझे रुपएपैसों की जरूरत होती, खुशी ही मुझे थोड़ेबहुत रुपए दे देती. इस तरह रुपयों के लिए पूरी तरह खुशी पर निर्भर होने की वजह से मेरे आत्मसम्मान को बहुत ठेस पहुंची थी और मुझ में धीरेधीरे हीनता की भावना घर करती जा रही थी.

उधर जिस जमीन के लालच में मैं ने फ्लोरेंस से रिश्ता जोड़ा था, उस जमीन के कागजों की फ्लोरेंस ने मुझे हवा तक नहीं लगने दी. न जाने वह उन्हें कहां छिपा कर रखती थी. उस पर कई महीनों से फ्लोरेंस से मेरी गंभीर अनबन चल रही थी. वह मुझ पर बहुत जोर डाल रही थी कि मैं खुशी को तलाक दे कर उस से अदालत में शादी कर लूं. लेकिन मैं खुशी को तलाक नहीं देना चाहता था. शायद इस की वजह यह थी कि मैं खुशी से भावनात्मक रूप से बहुत जुड़ा हुआ था. इस वजह से फ्लोरेंस और मुझ में झगड़ा बढ़ता ही गया और एक दिन फ्लोरेंस और उस के बेटे हनी ने मिल कर शिलांग वाले साडि़यों के शोरूम पर पूरी तरह से अपना कब्जा जमा लिया था. मैं जब भी शिलांग वाले शोरूम में जाता, हनी मुझे तिजोरी को हाथ तक न लगाने देता.

अब मुझे एहसास होने लगा था कि फ्लोरेंस के साथ रिश्ता कायम कर के मैं ने जिंदगी के हर क्षेत्र में नुकसान उठाया था. फ्लोरेंस की वजह से मैं ने खुशी और आकाश की उपेक्षा और अवहेलना की. मैं ने अपनी पत्नी की उपेक्षा की जिस की वजह से मेरे बेटे ने मुझे कभी पिता का आदरमान नहीं दिया और मैं अपने ही घर में बेगाना बन कर रह गया.

फ्लोरेंस से रिश्ता रखने की वजह से मेरे परिवार वालों ने मुझे पुश्तैनी संपत्ति से बेदखल कर उसे खुशी और आकाश के नाम कर दिया था. मेरी लापरवाही के चलते मेरा गुवाहाटी का शोरूम भी खुशी और आकाश के कब्जे में चला गया था. अब मुझे एहसास हो रहा था कि मैं जिंदगी की लड़ाई में बुरी तरह से हार गया था.

एक वक्त था जब कुदरत ने मुझे दुनिया की हर नियामत बख्शी थी. सुशील पत्नी, एक प्यारा सा बेटा, चलता हुआ व्यापार, सामाजिक प्रतिष्ठा, लेकिन मैं ने यह सबकुछ अपनी ही बेवकूफी से गंवा दिया था. शायद यही मेरी गलतियों की सजा है, लेकिन अब मुझे अपनी गलतियों का एहसास हो चला है और इस के लिए मैं खुशी और आकाश से माफी मांगूंगा. फ्लोरेंस से अपने सारे संबंध हमेशा के लिए तोड़ लूंगा. दोबारा से शोरूम में बैठ कर व्यापार संभालूंगा. खुशी बहुत अच्छी है. वह जरूर मुझे माफ कर देगी.

शोरूम में बैठ कर काम संभालने के खयाल ने मुझे बहुत सुकून दिया था. फिर भी मन के एक कोने में कहीं यह डर छिपा हुआ था कि क्या आकाश और खुशी मुझे फिर से व्यापार संभालने देंगे? क्या वे दोनों मेरी पिछली भूलों को नजरअंदाज कर पाएंगे?

इसी डर और आशंका के साथ मैं शोरूम पर पहुंचा और खुशी से बोला, ‘खुशी, मैं ने पूरी जिंदगी तुम्हारे साथ बहुत अन्याय किया. अपने गलत आचरण से तुम्हारे दिल को बहुत दुखाया. मैं वादा करता हूं कि पुरानी भूलों को अब कभी नहीं दोहराऊंगा. मैं ने फ्लोरेंस और हनी से सारे रिश्ते तोड़ लिए हैं. बस…तुम मुझे एक बार माफ कर दो.’

खुशी तो कुछ नहीं बोली लेकिन आकाश बोल पड़ा, ‘अब आप को अपनी गलतियों का एहसास हो रहा है. मेरी मां ने कितने दिन और कितनी रातें आप की वजह से रोरो कर गुजारी हैं, यह मैं ने अपनी आंखों से देखा है और अब आप माफी मांग रहे हैं. नहीं, बिलकुल नहीं. आप हमारी माफी के बिलकुल भी हकदार नहीं हैं. इतने सालों तक हम ने बिना आप के सहारे के अकेले, अपने दम पर जिंदगी जी है, आगे भी जी लेंगे. अब आप कारोबार संभालने की बात कर रहे हैं, जबकि पहले आप ने ही सारा कारोबार चौपट कर दिया था. यह शोरूम बंद होने के कगार पर आ पहुंचा था. आप यहां से जाइए, हम दोनों की जिंदगी में अब आप की कोई जगह नहीं है.’

आकाश की इन कड़वी पर सच बातों को सुन कर मेरा दिल बैठ गया और मैं ने हताश कदमों व टूटे दिल से वापस लौटने के लिए कदम बढ़ाए थे कि तभी खुशी बोल पड़ी, ‘आकाश बेटा, पापा से ऐसा नहीं कहते. गलतियां किस से नहीं होतीं? पापा को अपनी गलतियों का एहसास हो गया, यही बहुत है. सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते. हां, पर अब आप को मेरी एक बात माननी पडे़गी कि आप भविष्य में फ्लोरेंस और हनी से कोई रिश्ता नहीं रखेंगे और न उन से मिलने शिलांग जाएंगे.’

‘खुशी, अगर तुम्हें मेरी बातों पर यकीन है तो मैं तुम्हारी कसम खा कर कहता हूं कि भविष्य में मैं उन से कोई संबंध नहीं रखूंगा. मैं ने उन से हमेशाहमेशा के लिए अपने रिश्ते तोड़ लिए हैं.’

यह सुन कर खुशी के चेहरे पर संतुष्टि के भाव परिलक्षित हुए. फिर अपनी कुरसी से उठते हुए उस ने मुझ से कहा, ‘यह जगह आप की है. आप आइए, यहां बैठिए.’

मैं एक बार फिर खुशी की अच्छाइयों के सामने नतमस्तक हो गया था. मुझ में एक बार फिर से जिंदगी जीने की तमन्ना जाग उठी थी.

Social Story : सिद्ध बाबा – क्यों घोंटना पड़ा सोहनलाल को अपनी ही बेटी का गला?

Social Story : अपनी पत्नी को भोजन ले जाते देख सोहनलाल पूछ बैठे, ‘‘यह थाली किस के लिए है?’’

‘‘क्या आप को नहीं मालूम?’’

‘‘मुझे कुछ नहीं मालूम,’’ सोहनलाल झल्ला कर बोले.

‘‘सूरदास महाराज के लिए…’’ पत्नी ने सहजता से जवाब दिया.

‘‘बंद करो उस का भोजन,’’ सोहनलाल चीखे तो पत्नी के हाथ से थाली गिरतेगिरते बची. वह आगे बोले, ‘‘पिछले 5 साल से उस अंधे के बच्चे को खाना खिला रहा हूं. उस से कह दो कि यहां से जाए और भिक्षा मांग कर अपना पेट भरे. मेरे पास कुबेर का भंडार नहीं है.’’

‘‘गरीब ब्राह्मण है. अगर उस के घर वाले न निकालते तो भला क्यों आप के टुकड़ों पर टिका रहता. इसलिए जैसे 10 लोग खाते हैं, वैसे एक वह भी सही,’’ कहते हुए पत्नी ने थाली को और मजबूती से पकड़ा और आगे बढ़ गई.

थोड़ी देर बाद जब वह सूरदास के पास से लौटी तो सोहनलाल उसे देखते ही पुन: बोल उठे, ‘‘आखिर उस अंधे से तुम्हें क्या मिलता है?’’

‘‘तुम्हें तो राम का नाम लेने की फुरसत नहीं…कम से कम वह इस कुटिया में बैठाबैठा राम नाम तो जपता रहता है.’’

‘‘यह अंधा राम का नाम लेता है? अरे, जिस की जबान हमेशा लड़खड़ाती रहती हो वह…लेकिन हां, उस ने तुम पर जरूर जादू कर दिया है…’’

‘‘तुम आदमी लोग हमेशा फायदे की बात ही सोचते हो…सूरदास महाराज कोई साधारण इंसान नहीं हैं. वे सिद्ध बाबा हैं.’’

‘‘अच्छा…लगता है, उस ने तुम्हें कोई खजाना दिला दिया है?’’ सोहनलाल की आवाज में व्यंग्य का पुट था.

‘‘खजाना तो नहीं, लेकिन जब से उन के चरण इस घर में पड़े हैं, किसी चीज की कोई कमी नहीं रही. चमनलाल की पत्नी ने एक बार बाबा से हंसते हुए पूछा था कि क्या उस के पति की पदोन्नति होगी तो सूरदासजी ने कहा कि 3 महीने के अंदर हो जाएगी.’’

‘‘तो हुई?’’

‘‘हां, हुई, दोनों पतिपत्नी तब यहां आए थे. सूरदास महाराज ने उन्हें पुन: आशीर्वाद दिया. उन्होंने महाराजजी के चरणों में 501 रुपए और एक नारियल की भेंट भी चढ़ाई.’’

 

501 का आंकड़ा सुनते ही सोहनलाल अपने स्थान से उठ खड़े हुए. उन्हें यह सब आश्चर्य लगा. विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिस की जबान लड़खड़ाती है, पूरा दिन सोता रहता है, गंदगी का सैलाब अपने चारों तरफ इकट्ठा किए रहता है, उस के पास इतनी बड़ी सिद्धि हो सकती है. वे एकाएक मुसकरा उठे. पत्नी इस रहस्य को न समझ सकी.

सोहनलाल ने इशारे से पूछा, ‘‘501 रुपए हैं कहां?’’ उन की पत्नी भी मुसकरा दी. इशारे से ही जवाब दिया कि वह राशि उन के पास ही है. सोहनलाल चुपचाप उठे और सूरदास के कमरे की ओर बढ़ गए. उस वक्त सूरदास जमीन पर लेटा सींक से दांत साफ कर रहा था. सोहनलाल को लगा कि जैसे सूरदास के चेहरे पर कोई विशेष आभा चमक रही हो. उन्हें लगा कि वह जमीन पर नहीं बल्कि फूलों की शैया पर लेटा हो. उन्होंने सूरदास के चरणों में अपना सिर टिका दिया, ‘‘मेरी भूल क्षमा करो महाराज. मैं आप को पहचान नहीं पाया.’’

‘‘कौन…सोहनलाल?’’ सूरदास उठ कर बैठ गया.

‘‘जी, महाराज…मैं सोहनलाल.’’

‘‘लेकिन तुम तो मुझे अंधा ही कहो. मैं कोई सिद्ध बाबा नहीं हूं. यह तो तुम्हारी पत्नी का भ्रम है.’’

‘‘भ्रम ही सही, महाराज, मैं भी चाहता हूं कि यह भ्रम हमेशा बना रहे.’’

‘‘इस से क्या होगा?’’

‘‘यह जीवन का सब से सुनहरा सुअवसर होगा.’’

‘‘मैं समझा नहीं, तुम कहना क्या चाहते हो?’’

सोहनलाल ने आराम से बगल में बैठ कर सूरदास के कंधे पर हाथ रख दिया. फिर धीरे से बोले, ‘‘देखो सूरदास, मुझे मालूम है कि तुम कोई सिद्धविद्ध नहीं हो, लेकिन मैं चाहता हूं कि तुम सिद्ध बाबा बन जाओ. इस विज्ञान के युग में भी लोग चमत्कारों पर विश्वास करते हैं.’’ ‘‘लेकिन चमत्कार होगा कैसे? और इस से फायदा क्या होगा?’’

‘‘अब सही जगह पर लौटे हो, सूरदास. अगर 100 लोग आशीर्वाद लेने आएंगे तो 10 का काम होगा ही. 10 के नाम पर 100 का चढ़ावा मिलेगा. घर बैठे धंधा खूब चलेगा… हम दोनों का आधाआधा हिस्सा होगा.’’ सूरदास के चेहरे पर चमक आ गई. उस का अंगअंग फड़क उठा. वह चहक कर बोला, ‘‘लेकिन यह सब होगा कैसे?’’ ‘‘यह काम मेरा है.’’ सूरदास की चर्चा चमनलाल की पत्नी ने अपने पड़ोसियों से की. साथ ही सोहनलाल की पत्नी ने इस बारे में अपने परिचितों को बताया.

उधर सोहनलाल ने इसे एक अभियान का रूप दे दिया. चर्चा 2-4 लोगों के बीच शुरू हुई थी लेकिन हवा शहर के आधे हिस्से में फैल गई. शाम को सूरदास के साथ सोहनलाल किसी मुद्दे पर चर्चा कर ही रहे थे कि उन की पत्नी अपने साथ 2 औरतों को ले कर आ पहुंची.

सोहनलाल उन औरतों को देखते ही एक तरफ बैठने का इशारा कर के स्वयं सूरदास के पैर दबाने लगे. सूरदास समझ गया कि कोई अंदर आया है. उस ने गंभीर स्वर में पूछा, ‘‘सोहनलाल, कौन आया है?’’

‘‘स्वामीजी, आप के भक्त आए हैं.’’

सोहनलाल की बात पूरी हुई ही थी कि दोनों महिलाएं सूरदास के पांव  छूने लगीं.

‘‘सदा सुखी रहो,’’ सूरदास ने उन के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.

लेकिन किसी नारी का पहली बार स्पर्श पा कर उस का पूरा शरीर रोमांचित हो उठा. वह तुरंत बोला, ‘‘भगवान का दिया हुआ तो तुम्हारे पास बहुत कुछ है, लेकिन फिर भी इतनी चिंतित क्यों हो, बेटी?’’

सूरदास की बात सुन कर वृद्ध महिला, जो अपनी बहू को ले कर आई थी, आंखें फाड़फाड़ कर सूरदास की ओर देखने लगी.

‘‘स्वामीजी, ये विपिन की मां हैं, साथ में इन की बहू भी है. शादी को 7 साल हो गए हैं, लेकिन…’’

सोहनलाल की पत्नी इतना ही बोल पाई कि सूरदास ने आगे की बात पूरी कर दी, ‘‘तो क्या हुआ? विपिन अब तक बच्चा चाहता ही नहीं था. जो प्रकृति का नियम है वह तो होना ही है.’’

‘‘सच, महाराजजी,’’ विपिन की मां पूछ बैठीं.

‘‘बाबा जो कह दें उस पर तर्क की गुंजाइश नहीं रहती, मां,’’ सोहनलाल ने कहा.

उसी समय एक औरत थाली में फलफूल लिए ‘सिद्ध बाबा की जय, सिद्ध बाबा की जय’ कहती हुई अंदर आ पहुंची. सभी की निगाहों ने उसे घेर लिया. सोहनलाल के चेहरे पर मुसकराहट थिरकने लगी. उस औरत ने थाली सूरदास के सामने रखते हुए अपना माथा उस के चरणों में झुका दिया. फिर मधुर वाणी में बोली, ‘‘स्वामीजी, आप का आशीर्वाद फल गया, बहू को लड़का हुआ है. मैं आप की सेवा में कुछ फलफूल ले कर आई हूं. कृपया स्वीकार कर लीजिए.’’

विपिन की मां ने देखा कि थाली में फलफूल के अलावा भी 100-100 के कई नोट रखे हुए हैं, लेकिन सूरदास लेने से इनकार कर रहा है. साथ में यह भी कह रहा है कि मुझे इन सारी चीजों का क्या करना. मैं तो सोहनलाल की दो रोटियों से ही खुश हूं.

लेकिन वह महिला न मानी और थाली वहीं पर छोड़ कर माथा टेकते हुए बाहर निकल गई. विपिन की मां को कुछ झेंप सी हुई. चलते वक्त उन्होंने भी अपना पर्स खोला और 200 रुपए निकाल कर सूरदास के चरणों में रख दिए. फिर वह सोहनलाल की पत्नी के साथ बाहर निकल आई और बोली, ‘‘स्वामीजी ने समय तो नहीं बताया.’’

‘‘हो सकता है, अभी कुछ और समय लगे, लेकिन विपिन की मां, लड़का तो अवश्य होगा. सूरदास महाराज की वाणी असत्य नहीं कह सकती. परंतु डाक्टरी इलाज अवश्य जारी रखना.’’

वक्त ने पलटा खाया और सूरदास सिद्ध बाबा के रूप में प्रसिद्ध हो गया. उसे सिद्ध बाबा बनाने में सोहनलाल का काफी योगदान रहा. मौका देख कर सिद्ध बाबा की वाहवाही करने के लिए उस के पास दर्जनों स्त्रीपुरुष थे, जो वेश बदल कर जनता के सामने उस के पास जाते और चरणों में फलफूल के साथ हजारों रुपए और सोनेचांदी के उपहार चढ़ाने का वचन दे कर बाबा से आशीर्वाद ले आते.

सिद्ध बाबा की चर्चा अब केवल उस क्षेत्र तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि उन के चरणों में मुंबई, कोलकाता और दिल्ली से भी लोग आने लगे थे. सोहनलाल अब बहुत मालदार हो गए थे. सूरदास के लिए एक बहुत ही खूबसूरत मंदिर का निर्माण कराया गया. सोहनलाल का बंगला भी कम न था और जीप, कार का तो कहना ही क्या.

सूरदास के घर वाले पास जा कर देखते भी तो उन्हें विश्वास न होता कि क्या यह वही सूरदास है जिसे सावन की झड़ी में उन्होंने घर से बाहर निकाल दिया था. घने काले बाल, मुलायम दाढ़ी जैसे सचमुच कोई ऋषिमुनि हो. उन्हें रहस्य मालूम हो गया था, लेकिन बोल नहीं सकते थे. चारों तरफ मौन का आतंक था.

सोहनलाल की कृपा से सूरदास अब पूरी तरह से व्यभिचारी हो गया था. लड़की और शराब उस के व्यसन बन चुके थे. एक दिन धर्मशाला में रात के समय किसी स्त्री के सिसकने की आवाज उभरी. चारों तरफ अंधेरा था.

एक नारी का स्वर उभरा, ‘‘मां, ऐसे दरिंदे के पास लाई थीं मुझे. यह सिद्ध बाबा नहीं, शैतान है, शैतान. इस ने मेरी इज्जत लूट ली. मां, मैं इसे नहीं छोड़ूंगी.’’ ‘‘नहीं, बेटी,’’ मां जैसे समझाने और चुप करने की चेष्टा कर रही थी. लेकिन अंधेरे का सन्नाटा टूट चुका था, ‘‘सिद्ध बाबा के हाथ बड़े लंबे हैं. तेरी जबान काट ली जाएगी. सुबह होते ही यहां से निकल चलें, इसी में हमारी भलाई है.’’

उस वक्त सूरदास का बड़ा भाई चौकसी कर रहा था. जब उस ने यह सब सुना तो वह बुरी तरह से विचलित हो उठा. उसी वक्त उस ने निर्णय किया कि सोहनलाल को सबक सिखा कर ही रहेगा. सुबह से भीड़ आ कर सोहनलाल को घेर लेती थी. सूरदास का बड़ा भाई अलग से जा कर उस से कुछ कहना चाह रहा था कि उसी समय एक आदमी दौड़ता हुआ आया और घबराए हुए स्वर में बोला, ‘‘आप की बेटी की तबीयत काफी खराब है, मांजी ने फौरन बुलाया है.’’

सोहनलाल चुपचाप उठे और शीघ्रता से अपने बंगले की ओर चल दिए. उन की बेटी को 3-4 उलटियां हुई थीं. शायद इसी वजह से बेहोश हो गई थी.

सोहनलाल बेटी की ऐसी हालत देख कर गुस्से में पत्नी से बोले, ‘‘ऐसे मौके पर डाक्टर को टेलीफोन करना चाहिए था,’’ फिर उन्होंने खुद ही रिसीवर उठा कर डायल घुमाना ही चाहा था कि उन की पत्नी ने हाथ पकड़ लिया, ‘‘डाक्टर की आवश्यकता नहीं है.’’

‘‘क्या बात है?’’ उन्होंने गंभीरता से पूछा.

‘‘हमारी बेटी गर्भवती है.’’

‘‘क्या…?’’

सोहनलाल का चेहरा फक पड़ गया.

‘‘गर्भ सूरदास का है. उस वहशी ने हमारा घर भी नहीं छोड़ा,’’ पत्नी ने आंसू बहाते हुए कहा.

‘‘उस कुत्ते की मैं हत्या कर दूंगा. कमीने को जिस थाली में खाना खिलाया उसी में छेद कर दिया,’’ सोहनलाल यह सब एक झटके में बोल गए, लेकिन उन्हें लगा कि जैसे वह कुछ गलत बोल गए हैं.

‘नहींनहीं, सूरदास की हत्या…कभी नहीं. भला कोई सोने के अंडे देने वाली मुरगी की भी हत्या करता है,’ सोचते हुए उन के चेहरे पर मुसकराहट दौड़ने लगी. होंठ फड़फड़ाए, ‘‘गर्भपात.’’

‘‘लेकिन कैसे?’’

‘‘दुनिया बहुत बड़ी है. हम लोग कुछ दिनों के लिए बाहर चले जाएंगे.’’

‘‘लेकिन लड़की उस के लिए तैयार नहीं है.’’

एकबारगी सोहनलाल का चेहरा तमतमा उठा, ‘‘वह क्या चाहती है?’’

‘‘सूरदास से शादी.’’

‘‘बेबी…’’ सोहनलाल ने बेटी को पुकारा. फिर चुपचाप उठे और बेटी के पास जा कर बैठ गए. उस के सिर पर धीरे से हाथ रख कर बोले, ‘‘बेबी, नादानी नहीं करते, कोई भी निर्णय इतनी जल्दी नहीं लेना चाहिए.’’

‘‘पिताजी, आप ने ही तो मुझे सूरदास के हवाले किया था. फिर अब इतने परेशान क्यों हैं?’’ बेबी बोली.

‘‘क्या बकती हो? तुम्हें इतना भी नहीं मालूम कि मैं तुम्हारा बाप हूं.’’

‘‘रिश्ते अपने मूल्य क्यों खो चुके हैं पिताजी, बताइए न? मेरी सहेली क्या आप की बेटी नहीं थी?’’

‘‘बेबी, होश में आओ. तुम्हें मेरा गुस्सा नहीं मालूम.’’

‘‘पिताजी, मैं ने तो सूरदास को अपना पति मान लिया है…’’

‘‘बेबी…तुम्हें मृत्यु से डरना चाहिए.’’

‘‘नहीं पिताजी, मृत्यु से तो कायर डरते हैं.’’

सोहनलाल ने सहसा पूरी ताकत के साथ बेबी की गरदन दबोच ली तो पत्नी चिल्लाई, ‘‘यह आप क्या कर रहे हैं?’’

‘‘समय के साथ समझौता…’’

परंतु तब तक बेबी की आंखें बाहर आ गई थीं और पूरा शरीर ठंडा पड़ गया था.

कमरे में सन्नाटा फैला हुआ था. सोहनलाल की पत्नी प्रस्तर प्रतिमा बनी शून्य में निहार रही थी.

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