Makeup Tips : मुहांसों से भरी त्वचा पर कैसे मेकअप करें

Makeup Tips : हम अपने चेहरे को खूबसूरत बनाने के लिए बहुत कुछ करते है, ताकि हम महफ़िल की जान बन जाएँ. लेकिन मुश्किल तब आ जाती  जब हमारी स्किन पर मुहांसे हो जाते है. ऐसे में हम शादी या पार्टी में जाना ही अवॉयड कर देते है कि छोड़ों ऐसी शकल के साथ कौन जायेगा? लेकिन ऐसा करना सही नहीं है. आपको पार्टी में जाना कैंसिल करने के बजाएं वहां इस तरह से तैयार होकर जाना चाहिए कि पता ही न चले कि आपके फेस पर मुहांसे हुए है लेकिन इसके लिए आपको मेकअप करने का सही तरीका पता होना चाहिए. आइये जाने एक्ने वाले चहेरे का मेकअप कैसे करें.

चेहरे को क्लीन करे

सबसे पहले चेहरे को क्लीन करना जरुरी है इसके लिए चेहरे को साफ़ पानी से धोए.

चेहरे को सबसे पहले धो कर मॉइस्चराइज करें.

चेहरे को धोने के लिये माइल्‍ड फेस क्लींजर का प्रयोग करें. फेस पर मेकअप लगाने के लिये चेहरे का साफ और स्‍मूथ होना बेहद जरूरी है.  नॉन-कॉमेडोजेनिक मॉइस्चराइज़र का उपयोग करें, जो रोमछिद्रों को बंद न करे.

क्लेंज़िंग

दिन में दो बार हल्के और गैर-इरिटेटिंग क्लेंज़र से चेहरा धोएँ, ताकि गंदगी, अतिरिक्त तेल और अशुद्धियाँ हट जाएँ.

पिम्पल्स की पपड़ियां निकालें

चहेरे को क्लीन करने पर भी अगर पपडियां नहीं हैट रही तो चेहरे को दोबारा वॉश करके उसे साफ़ मुलायम कपडे से इस तरह पोंछें कि पपड़ियां हट जाएँ.

एक्सफ़ोलिएशन

सप्ताह में एक या दो बार हल्की एक्सफ़ोलिएशन करें ताकि मृत त्वचा कोशिकाएँ हटें. ज़्यादा एक्सफ़ोलिएशन से त्वचा को नुकसान पहुँच सकता है.

 

ब्रस और स्पंज

स्पंज का उपयोग करने से बैक्टीरिया फैलाने की संभावना अधिक रहती है और इससे मुहांसे अधिक होने की संभावना बनी रहती है. इसलिए इन मेकअप टूल्स की जगह मेकअप लगाने के लिए अपनी उंगलियों का इस्तेमाल करें. इससे आप आसानी से मेकअप को चेहरे पर लगा सकती हैं लेकिन आपको अपने हाथों को अच्छे से साफ करने की जरूरत होती है.

कलर करेक्शन लगाएं

कलर करेक्शन लगाने से चहेरे की लालिमा दब जाती है. वह चेहरे को स्मूथ लगाती है. इसलिए लाल मुहांसों पर हरे रंग का कलर कैरक्टर लगाना सही रहेगा. इससे दानों का उभरा हुआ लाल रंग दब जायेगा.

प्राइमर का यूज़  करें

पिंपल और उनके निशान आपके चेहरे को खुरदुरा और असमान बना देते हैं, जिसकी वजह से मेकअप भी असमान नजर आता है. इसके लिए सिलिकॉन प्राइमर का इस्तेमाल करें. सिलिकॉन प्राइमर से अपने चेहरे को स्मूद बनाएं और लकीरों को भी छुपाएं.

फाउंडेशन लगाएं

अगर आपकी स्किन पर पिम्पल्स काफी ज्यादा हुए है और आप उस पर आप फाउंडेशन लगा लें तो वह फाउंडेशन दानों में घुस जायेगा और चेहरे को भद्दा दिखायेगा. इसलिए ऐसी त्वचा पर वॉटर बेस्ड फाउंडेशन लगाएं. यह चेहरे को स्मूथ रखेंगा.

इसके लिए ऐसा फाउंडेशन चुनें जो आपकी स्किन से एक शेड हल्का हो. आपकी स्किन से एक शेड डार्क फाउंडेशन को अपनी जॉलाइन और नाक पर लगाएं. ये कंटूरिंग के काम आएगा. सिर्फ चेहरे ही नहीं, गले पर भी फाउंडेशन लगाएं ताकि दोनों का रंग समान दिखे.

पाउडर से सेट करें

मुंहासे वाली स्किन अक्सर ऑयली होती है, इसलिए मेकअप को ‘लॉक’ करना जरूरी है. एक ट्रांसलूसेंट पाउडर (Translucent Powder) का इस्तेमाल करें. पफ की मदद से उसे हल्के से दबाते हुए लगाएं.

अब इस्तेमाल करें सेटिंग स्प्रे

अब आखिर स्टेप है सेटिंग स्प्रे से मेकअप सेट करना. अच्छी तरह फाउंडेशन, कंसीलर और ट्रांसलूसेंट पाउडर लगाने के बाद आप चेहरे पर सेटिंग स्प्रे करें. ध्यान रहे कि आप ज्यादा स्प्रे न करें. इसकी एक पतली परत ही काफी है. इसकी मदद से आपका मेकअप लंबे समय तक टिका रहेगा

ध्यान दें-

कभी भी पिंपल्स को न चुभाएँ, न निचोड़ें और न खुरचें. इससे बैक्टीरिया फैल सकते हैं, ठीक होने में देर होती है और दाग-धब्बों का खतरा बढ़ता है.

तकिए के कवर नियमित बदलें, मोबाइल स्क्रीन साफ रखें और मेकअप प्रोडक्ट्स साझा न करें, ताकि बैक्टीरियल संक्रमण कम हो.

गंदे ब्रश को लगातार इस्तेमाल करने से उसमे बैक्टीरिया पैदा हो जाते है जिससे मुंहासे और भी जयादा हो जाते है इसलिए ब्रश को जल्दी जल्दी साफ़ करते रहें.

हमेशा वही प्रोडक्ट खरीदें जिन पर ‘Non-comedogenic’ लिखा हो, क्योंकि ये रोमछिद्रों (pores) को बंद नहीं करते.

चेहरे को बार-बार न छुएं, इससे जलन बढ़ सकती है.

जब Boyfriend एक से ज्यादा हो, तो कैसे चुनें?

 Boyfriend : एक से ज्यादा ऑप्शन हमेशा ही मैंटल प्रेशर देते हस और एक कंफूजन पैदा करते है. खासकर जब बात जीवनसाथी चुनने की हो यह परेशानी और भी ज्यादा हो जाती है कि कौन सा लड़का मेरे लिए सही रहेगा?

इसलिए एक से अधिक बौयफ्रेंड होने पर सही साथी का चुनाव करने के लिए उनकी पर्सनैलिटी, वैल्यूज़ और आपके जीवन के लक्ष्यों के साथ उनकी अनुकूलता का मूल्यांकन करें. यह सुनिश्चित करें कि कौन सा रिश्ता सम्मान, भरोसा प्रदान करता है. अपनी भावनाओं का विश्लेषण करें, संवाद खुला रखें, और वह चुनें जो आपको सच्चा प्यार और खुशी दे.

1 (Compatibility) जिसके साथ अच्छी बैठती हो

किसके साथ आप बिना किसी मुखोटे के अपना सब सच कम्फर्टेबल होकर बता सकती है और राय ले सकती है?

किसके साथ आपके लाइफ के वैल्यू और भविष्य के सपने के सपने मैच करते है?

किसके साथ रहकर आप खुलकर जी सकती है?

जब आप उदास होती है या परेशां होती है तो वो कौन है जो बिना कहें ही आपकी बात समझ लेता है?

क्या वह आपके दोस्तों और परिवार के साथ घुल-मिल सकता है? और क्या आप उसके सर्कल में सहज महसूस करती हैं?

कौन सा लड़का बाद में भी मेरे साथ बेहतर व्यवहार करेगा?

कठिन समय में कौन सा लड़का मेरा साथ देगा?

किस लड़के में मेरे जैसे ही गुण मौजूद हैं?

दिन के आखिर में, मैं किस का चेहरा देखना पसंद करूंगी?
कौन सा लड़का मेरे परिवार और मेरे दोस्तों का साथ बेहतर ढंग से निभा पाएगा?
किस लडके के बिना मैं नहीं रह सकती?

2 किसके साथ ज्यादा इमोशनली अटैच है?

विश्लेषण करें कि किसके साथ आप इमोशनली सेफ और ज्यादा जुड़ी हुई महसूस करती हैं. वो कौन है जिसके साथ आप अपने मन का हर गम बिना सोचे समझें बाँट सकती है .

3 आपकी लाइफ के गोल्स किसके साथ मैच करते है?

क्या वह भी अपने करियर को लेकर आपके जितना ही गंभीर है?

क्या वह आपके करियर को लेकर भी उतना ही पोसिटिव है शादी के बाद या फिर वह नहीं चाहता कि शादी के बाद आप अपने करियर पर धयान दें?

क्या वह थोड़ा कंजूस है और आप खुले हाथ से खर्च करने वाली है तो देख लें ये बाद झगडे में भी बदल सकती है?

जब वह आपके साथ होता है, तो आप कैसा महसूस करती है?

जब वह आप के समीप होता है, तो आप को कैसा महसूस कराता है? क्या वह आप को ऐसा महसूस कराता है, कि वह सिर्फ आप में ही दिलचस्पी लेता है या फिर वह हर समय अन्य लड़कियों के साथ भी फ़्लर्ट करता है और आप भी लडकियों के नाम वाली उस की इस लम्बी लिस्ट में से सिर्फ एक नाम हैं?

क्या वह आप को एक बेहतर इन्सान बनने के लिए प्रेरित करता है ?

क्या वह सही मायनों में, बिना किसी दबाब के आप की तारीफ करता है?

क्या वह आप को शर्माने लायक, मुस्कुराने लायक, और एक छोटी सी बच्ची की तरह महसूस कराता है?

क्या वह आप के साथ एक महिला के साथ जैसा बर्ताव होना चाहिए, उसी तरह से बर्ताव करता है और आप को अच्छा महसूस कराता है?

4 किसके साथ इंट्रेस्ट मैच करते है?

कहीं आप और वो पूरब पश्चिम तो नहीं. आपको वीकेंड पार्टी का और उसे पूरे दिन सोने का तो देख लें कि निभा पाएंगी.

आपको रोमांटिक बौलीवुड मूवीज पसंद है और आप रोमांस की दुनिया में जीती हैं और उसका दूर से दूर इन सब से कोई नाता ना हो.

क्या वह आपके दोस्तों के साथ सहज है? क्या उसके दोस्त ऐसे लोग हैं जिनके साथ आप समय बिताना चाहेंगी?

5 एक चेकलिस्ट बनायें और प्रो और कॉन्स गिनें

कॉन्स कैसे देखें-

क्या वह आपको यह बताता है कि कब और कहाँ आपको क्या पहनना है.उसके लिए आपकी पसंद की कोई अहमियत नहीं है?

झूठ बोलना उसकी आदत में शामिल है?

आपको आगे बढ़ता हुआ देखकर वह खुश नहीं होता बल्कि खुद से कम्पैरिजन करता है?

कहीं वह शक्की नेचर का तो नहीं है?

कहीं वह आपको हर बात में गलत तो नहीं समझता और अपनी बात उसे समझने के लिए आपको बहुत मेहनत तो नहीं करनी पड़ती?

प्रो कैसे देखें-

आपकी हर बात को वह बिना कहें ही समझ लेता है.

जब आप परेशां हो तो बात करने के लिए केवल वही चेहरा सामने आएं.

गलती होने पर लड़ने के बजाए सौरी बोलता है.

वह आपको आगे बढ़ने में मदद करता है और आपके सपनों को पूरा करने के लिए हमेशा करता रहता है.

आपके और आपके घरवालों का सम्मान करता है.

उसके अपने सोच विचार हस लेकिन वह आपकी सोच को भी अहमियत देता है.

निर्णय लेने का एक प्रो-टिप (Pro-Tip):

एक कागज लें और दो कॉलम बनाएं. एक तरफ प्रो लिखें और दूसरी तरफ कॉन्स. दोनों लड़कों के लिए अलग-अलग लिस्ट बनाएं.

याद रखें: 5 प्रो मिलकर भी 1 बड़े कॉन्स (जैसे हिंसा या धोखा) को खत्म नहीं कर सकते.

क्या आपको लगता है कि इनमें से किसी एक में कोई ऐसा कॉन्स है जिसे आप अभी तक नजरअंदाज कर रही थीं? अगर ऐसा हस्तो इसी तरह शार्ट लिस्ट करती जाएँ और निर्णय पर पहुँच जाएँ.

6 खुद से पूछने के लिए एक ‘एसिड टेस्ट’ (Acid Test)

कल्पना कीजिए कि आज से 10 साल बाद आपकी खूबसूरती कम हो गई है और जिंदगी में काफी जिम्मेदारियां आ गई हैं. उस समय आप खुद को किसके साथ सोफे पर बैठकर चाय पीते हुए और सुकून से बातें करते हुए देख पाती हैं?

7 ये एक गहरा सवाल भी खुद से पूछें

“अगर कल को मेरी नौकरी चली जाए या मैं किसी बड़ी मुश्किल में फंस जाऊं, तो इन में से किसकी सलाह पर मुझे सबसे ज्यादा भरोसा होगा?”

जिस व्यक्ति के साथ आपके Core Values मिलते हैं, उसके साथ रिश्ता निभाना एक “संघर्ष” नहीं बल्कि एक “साझेदारी” (Partnership) बन जाता है. उसे ही चुनें.

Dating : लंबी डेटिंग अलग लाइफस्टाइल

Dating : महिमा और प्रखर लंबी डेटिंग के बाद विवाह बंधन में बंधने को इच्छुक थे. दोनों इस बात से बेखबर नहीं थे कि वे अलगअलग के जाति हैं. फिर भी यह भरोसा था कि परिवार वालों की सोच ऐसी नहीं है कि वे कोई ऐतराज जताएं. महिमा के परिवार की ओर से हरी झंडी मिल भी गई लेकिन आशा के विपरीत प्रखर के मातापिता की ओर से बात अटक गई. प्रखर की मां इन दिनों एक प्रवचक के विचार सुनने प्रतिदिन किसी आश्रम में जाती थीं. वहां जाने के बाद से ही उन की मानसिकता संकीर्ण होती चली गई और प्रखर के दूसरी जाति में विवाह न करने पर वे अड़ गईं. पिता ने भी उन का साथ दिया.

महिमा प्रखर को एक विवेकशील साथी के रूप में देखती थी, उसे विश्वास था कि प्रखर मातापिता का विरोध करेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं. यह जानते हुए भी कि जाति प्रथा समाज का कलंक है, परिपक्वता व साहस की कमी के कारण प्रखर मातापिता के खिलाफ नहीं जा पाया और दोनों विवाह बंधन में नहीं बंध सके.

प्राय लंबी डेटिंग या प्रेम में कई वर्ष बिताने के बाद अधिकतर जोड़े विवाह की राह चुन ही लेते हैं क्योंकि वे एकदूसरे को जान चुके होते हैं. कभीकभी दोनों परिवारों के बीच रहनसहन, सोच आदि को ले कर कुछ ऐसे अंतर आड़े आने लगते हैं जो उन को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने को मजबूर करने लगते हैं. इस प्रकार के अंतर युवकों की तुलना में युवतियों पर ज्यादा असर डालते हैं क्योंकि उन्हें नए परिवार में आना होता है. ऐसे में विवाह के लिए ‘हां’ की ओर बढ़ते अपने कदमों को वे रोक लेती हैं. इन अंतरों को पहचान कर भी कोई लड़की डेट कर रहे युवक को शादी के लिए तभी हां कह पाती है जब लड़के में वे गुण हों जो उसे आगे बढ़ने का रिस्क लेने दें.  लड़की के कदमों को रोकते अंतर व उन अंतरों से निबटने में लड़के के वे गुण जो लड़की को आगे बढ़ कर रिस्क लेने को उत्साहित करते हैं.

विचारों में अंतर

2 परिवारों के विचार उन की पृष्ठभूमि पर निर्भर करते हैं. कोई परिवार उदार विचारधाराओं वाला तो दूसरा संकीर्ण विचारों का हो सकता है. कहीं पैसा कंजूसी से खर्च किया जाता है तो कोई परिवार खुले हाथ से खर्च करने में संकोच नहीं करता. किसी परिवार में नौकरी के लिए विदेश जाना अच्छा सम?ा जाता है तो कहीं परिवार के सदस्य दूसरे शहर जा कर नौकरी करने से भी बचते हैं.

2 परिवारों के बीच इस प्रकार के अंतर निश्चित रूप से लड़की पर असर डालते हैं. यदि डेटिंग के दौरान इस विषय में दोनों स्पष्ट संवाद कर लें और लड़का खुल कर लड़की के प्रश्नों के उत्तर दे दे, देख लेंगे कह कर टालने की कोशिश न करे तो लड़की को अपने कदम आगे बढ़ाने में आसानी होगी, जैसे नमित ने शुभ्रा के साथ खुल कर बात की.

शुभ्रा के मातापिता ने उस के पालनपोषण में कोई कमी नहीं होने दी थी. होटल मैनेजमैंट की पढ़ाई करने के बाद वह एक फाइवस्टार होटल में फ्रंट डैस्क रिसैप्शनिस्ट के पद पर कार्य कर रही थी. नमित से दोस्ती फिर डेटिंग शुरू हुई. बातों ही बातों में उसे पता चला कि नमित के घर शुभ्रा के परिवार की तरह खुला खर्च नहीं किया जाता. पार्लर जाना भी फुजूल खर्च माना जाता है. अपनी जौब के कारण शुभ्रा को आकर्षक बने रहना जरूरी था और इस के लिए पार्लर जाना ही पड़ता था. नमित ने शुभ्रा की बात सुन कर उसे सम?ा और विश्वास दिलाया कि इस बात के लिए वह परिवार की ओर से कोई टोकाटाकी नहीं होने देगा, किसी के कुछ पूछने पर जवाबदेही नमित की होगी. शुभ्रा संतुष्ट हो गई और फिर उस से विवाह के लिए हामी भर दी.

ऐसे ही कुछ अन्य मुद्दे जैसे विवाह के बाद दोनों को परिवार के साथ रहना होगा या अलग भी रहा जा सकता है, लड़की की जिम्मेदारियां विवाह के बाद क्याक्या होंगी, दोनों में से कोई भी विदेश या अन्य शहर में जा कर नौकरी कर सकेगा क्या? इन बातों पर भी डेटिंग के दौरान स्पष्ट संवाद होना चाहिए.

जीवन परिपाटी का अलग होना

2 परिवारों की जीवन परिपाटी में अंतर दिखने में मामूली लगता है. मगर इस से जुड़ी छोटीछोटी बातें भी आपसी मतभेद का कारण बन सकती हैं. किसी परिवार में समयसमय पर गैटटूगैदर, पार्टियां होती हैं, साथ ही क्लब आदि जाने का भी चलन होता है तो कुछ परिवार इन सब से दूरी बना कर रखते हैं. रिश्तों व दोस्ती को निभाने का ढंग और मेहमाननवाजी के तरीके भी अलगअलग हो सकते हैं.

ऐसा कोई अंतर यदि लड़की को पशोपेश में डाल रहा हो कि विवाह के बाद युवक उस अंतर को पाटने का प्रयास करेगा या युवती को उस माहौल में ढलने को मजबूर करेगा तो वह लड़के से बात करेगी ही. लड़के को चाहिए कि इसे मामूली बात न सम?ा कर धैर्यपूर्वक लड़की की बात सुने और कोई रास्ता निकालने की कोशिश करे. ऐसा होने पर ही लड़की रिश्ते में आगे बढ़ सकेगी.

आरव के परिवार में मेहमानों के आने पर पैर छूने का चलन था. अमायरा को यह पसंद नहीं था. आरव ने अमायरा के विचार जाने और वह सम?ा गया कि अमायरा किसी के सम्मान में कमी नहीं कर रही लेकिन पैर छू कर इज्जत देने की पक्षधर वह नहीं है. तब आरव ने कहा कि अमायरा की जिंदगी उस की अपनी है, इसलिए वह जैसे चाहे वैसे रिश्ते निभा सकती है. अमायरा को यह अच्छा लगा कि आरव जैसे व्यक्ति का साथ पा कर वह नए परिवार में कहीं खो नहीं जाएगी, उस का एक अलग अस्तित्व होगा. अत: वह आरव को जीवनसाथी बनाने के लिए खुशीखुशी तैयार हो गई.

खानपान

मांसाहारी या शाकाहारी होना 2 परिवारों के बीच का बड़ा अंतर है. इस के अतिरिक्त किसी परिवार में पारंपरिक खाना पसंद किया जाता है तो कहीं आधुनिक व फास्ट फूड. 2 परिवारों के बीच खानेपीने का अंतर भोजन करने के समय, तरीके और परोसने के बरतन आदि में भी हो सकता है.

मांसाहार या शाकाहार प्रत्येक की व्यक्तिगत पसंद हो सकती है और यह अंतर पहली या दूसरी डेट पर ही पता लग जाता है. कुछ अंतर मामूली हो सकते हैं लेकिन कुछ अन्य अंतर जिन का पता जल्दी नहीं लग पता, वे भी विवाह के लिए लड़की के बढ़ते कदमों की रुकावट बन सकते हैं.

ऐसी स्थिति में डेट कर रहा युवक यदि युवती की समस्या को उसी के नजरिए से सम?ाने वाला हो, उस के स्वभाव में लचीलापन हो तथा ‘तुम बदलो की जगह मैं सीखता हूं’ की सोच रखता हो तो बात बिगड़ने की जगह बन सकती है, रक्षित की तरह ही.

ऋचा रक्षित के साथ लगभग 1 साल से डेटिंग कर रही थी. बात विवाह तक पहुंचने लगी तो ऋचा विवाह के बाद अपने नाश्ते में बदलाव को ले कर बेहद चिंतित हो गई क्योंकि वह ओट्स, चिया सीड्स, फ्रू ट्स और नट्स से अपने दिन के पहले मील की शुरुआत करती थी लेकिन रक्षित के घर पर सभी नाश्ते में परांठे खाते थे. रक्षित ने ऋचा की फिट रहने वाली प्रकृति को सम?ा लिया और उसे आश्वासन दिया कि वह मनमुताबिक खा सकेगी, इतना ही नहीं उस ने स्वीकार किया कि इस मामले में ऋचा की आदतें उस के परिवार वालों से बेहतर हैं, इसलिए परिवार के सदस्यों को सप्ताह में 1 या 2 दिन ऋचा की पसंद का नाश्ता करने को कहेगा.

रक्षित के स्वभाव में लचीलेपन से ऋचा प्रभावित हुई और स्वयं भी महीने में 1 दिन परांठे खाने की इच्छा जता दी.विवाह की ओर अपने बढ़े हुए कदमों को ले कर ऋचा को सुखद अनुभूति हो रही थी.

आदतों में अंतर

परिवारों की आदतों में अंतर कई प्रकार का हो सकता है जैसे कहीं जल्दी सोना व जागना जरूरी सम?ा जाता हो तो कहीं जरूरत न हो तो देर तक सोया या जागा जा सकता है. किसी परिवार में घर का खाना खाने पर जोर दिया जाता है तो कहीं अकसर बाहर से खाना मंगवा लिया जाता है. तीजत्योहार मनाते हुए कुछ परिवार मौजमस्ती करते हैं तो कुछ परंपराओं को बो?ा की तरह स्वयं पर लाद उन्हें निभाना अपनी आदत बना लेते हैं और बिना सोचेसम?ो उसी ढर्रे पर चलते रहते हैं. देर तक सोनाजागना, घर या बाहर खाना आदि कुछ ऐसी आदतें हैं जो लड़की के निर्णय पर ज्यादा असर नहीं डालतीं लेकिन बात त्योहारों पर देर तक होने वाली पूजा या फिर व्रत आदि की हो तो लड़की को हां या न का फैसला करते हुए सोचना पड़ता है.

सोनाली विवाहित महिलाओं को विभिन्न पर्वों पर व्रत रखते हुए देखती थी. भूखे रहने से पति या संतान की उम्र लंबी नहीं होती, उलटे व्रत रखने वाली मांएं निढाल, बेजान सी हो जाती हैं, यह सम?ा गई थी वह. सोनाली के घर पर त्योहारों को मेलजोल बढ़ाने, आनंद लेने और खोई ऊर्जा व शक्ति को वापस पाने का माध्यम सम?ा जाता था. बौयफ्रैंड अक्षय के परिवार में त्योहारों पर व्रत रखने की परंपरा चली आ रही थी. अक्षय से उस ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि विवाह के बाद वह कोई उपवास नहीं रखेगी. अपने निर्णय को उस ने तर्क दे कर भी सम?ा दिया. अक्षय उस से पूरी तरह सहमत हुआ तो सोनाली उस में भावी जीवनसाथी देखते हुए आगे बढ़ने को तैयार हो गई.

सोनाली की तरह ही हर लड़की चाहती है कि लड़का अपने परिवार का सम्मान अवश्य करे लेकिन लड़की की मानसिकता को भी सम?ो. विवाह के बाद परिवार की ओर से युवती पर जबरन नियम लादे नहीं जाएंगे ऐसा आश्वासन मिले तो लड़की संतुष्ट होने पर अंतरों के बावजूद हां पर मुहर लगा देती है.

बौद्धिक स्तर पर अंतर

शिक्षा या बौद्धिक स्तर पर 2 परिवार अलग तरह के हो सकते हैं. यदि लड़की इंटेलैचुअल हो तो लड़के को चाहिए कि वह लड़की से कुछ सीखने में संकोच न करे. उस के लिए विद्वान बनना जरूरी नहीं, लेकिन जिज्ञासु अवश्य बने. यदि करण की तरह लड़की के बुद्धिजीवी होने का सम्मान करने के बजाय वह चाहेगा कि लड़की आने वाले समय में उस के पारिवारिक माहौल में ढल जाए तो रिया की तरह ही हर युवती विवाह के लिए मना ही करेगी.

रिया और करण को डेट करते हुए कुछ समय बीत गया था. इतने लंबे समय में रिया ने यह जान लिया कि करण के घर पुस्तकों, पत्र व पत्रिकाओं को पढ़ने का चलन बिलकुल नहीं है. वहां फिल्में व सीरियल आदि देख कर या व्हाट्सऐप जैसे साधनों से ज्ञानवर्धन कर लिया जाता है. रिया को सरिता, गृहशोभा जैसी पत्रिकाएं पढ़ना बहुत अच्छा लगता था क्योंकि इन से वह बहुत कुछ सीखती थी. इस के अलावा वह कंटैंट राइटर की जौब कर रही थी और किताबों से उसे बहुत लगाव था. करण से जब इस बारे में रिया ने कुछ कहना चाहा तो उस ने ‘विवाह से पहले और अब में थोड़ा फर्क तो होगा ही, शादी के बाद भी किताबों में डूबी रहोगी क्या?’ कह कर बात पूरी होने से पहले ही खत्म कर दी. रिया के लिए इस स्तर पर स्वयं को बदलना संभव नहीं था. नतीजतन वह करण से अलग हो गई.

पहनावे का अंतर

कुछ परिवारों में आधुनिक व फैशनेबल कपड़े ज्यादा पसंद किए जाते हैं तो कुछ इन से दूर रहते हैं और पारंपरिक पहनावे में विश्वास रखते हैं. ब्रैंडेड और साधारण कपड़ों का चुनाव भी 2 परिवारों के बीच अंतर के रूप में दिख जाता है.

यदि लड़की को लगेगा कि लड़के का परिवार ‘हम बेहतर हैं’ की सोच वाला होगा और लड़की की पसंद को दरकिनार अपनी पसंद के अनुसार पहनावा चुनने को बाधित करेगा तो निश्चय ही वह विवाह की ओर अपने बढ़ते कदमों को रोक लेगी.

इस के विपरीत यदि लड़के की सोच संतुलित होगी कि दोनों परिवारों में से कोई भी गलत नहीं है, हां एकदूसरे से अलग जरूर हैं, वह लड़की के परिवार को बराबरी का दर्जा देते हुए उन की पसंद को भी महत्त्व देगा तो लड़की संतुष्ट होगी कि भविष्य में उसे बदला नहीं जाएगा, स्वीकार किया जाएगा.

मानसिकता

विभिन्न मानसिकता लिए परिवारों का परिवेश एकदूसरे से विपरीत होता है. कुछ परिवारों में हर बात एकदूसरे से कहने का चलन होता है, निर्णय भी सभी की सहमति से लिए जाते हैं तो कहीं सभी सदस्य अपने तक सीमित रहते हैं और अपनेअपने निर्णय लेने को स्वतंत्र होते हैं. कुछ परिवारों में ऐसा भी होता है कि घर के बड़े सदस्य जो भी निर्णय लें उसे मानने को सभी बाधित होते हैं. महिलाओं का परिवार में स्थान, उन की नौकरी व स्वतंत्रता को ले कर भी परिवारों की मानसिकता अलग हो सकती है.

निकिता को डेटिंग के दौरान ही पता लग गया कि मनीष के घर में अधिकतर नियम बुजुर्गों के अनुसार ही होते हैं, इस कारण महिलाओं को नौकरी की स्वतंत्रता नहीं थी. निकिता ने ऐतराज जताया तो मनीष भी परिवार वालों के शब्द ही बोला कि जब पति खासा कमा लेता है तो पत्नी के लिए नौकरी की आवश्यकता ही क्यों? निकिता ने विवाह की ओर बढ़ते अपने कदम पीछे कर लिए.

प्रियंका और रोहित की लंबी डेटिंग भी टूट में बदल जाती यदि रोहित भी अपने परिवार का अंधानुकरण करता पर उस ने ऐसा न करते हुए सही रास्ता चुना तो बात बन गई. डेटिंग से बात जब शादी की ओर जा रही थी तो प्रियंका को पता लगा कि रोहित के मातापिता का ज्योतिष विद्या पर अटूट विश्वास है. विवाह भी वे जन्मकुंडली मिला कर ही करना चाहते थे. प्रियंका इस से सहमत नहीं थी. बात यह नहीं थी कि दोनों की कुंडली मिलेगी या नहीं पर प्रियंका पाखंडों से दूर रहने वाली लड़की थी. उस के परिवार वाले भी ऐसे अंधविश्वासों का विरोध करते थे.

रोहित ने इस विषय में प्रियंका की 1-1 बात सुनी और प्रियंका के गहरे, परिपक्व व तार्किक विचार रोहित को कुंडलीमिलान जैसे अतार्किक चलन से विमुख कर पाए. उस ने विश्वास दिलाया कि अपने मातापिता को कुंडली मिलाए बिना विवाह करने को तैयार कर लेगा.

यह सच है कि वैवाहिक रिश्ते में बंधने जा रहे किसी भी युवकयुवती के परिवारों के बीच लाइफस्टाइल को ले कर विभिन्न अंतर हो सकते हैं. जब यह फर्क शादी के बाद पता लगे तो सम?ाते या टूट में से कोई भी रास्ता चुनना पड़ सकता है. डेटिंग करते हुए यदि इस अंतर का अंदाज होने लगे तो लड़की की हां या न को ले कर दुविधा स्वाभाविक है. लड़के की स्वयं को थोपने की जिद की जगह सीखने और सिखाने की मानसिकता लड़की को हां की ओर बढ़ने के लिए उत्साहित करती है. लड़का केवल लड़की को बदलने की बात न करे बल्कि स्वयं व अपने परिवार में बदलाव लाने की बात रखे तो लड़की विवाह के लिए कदम बढ़ाने का रिस्क लेने को तैयार हो जाती है.

Social Story : वजूद से परिचय – भैरवी के बदले रूप से क्यों हैरान था ऋषभ?

Social Story :  ‘‘मम्मी… मम्मी, भूमि ने मेरी गुडि़या तोड़ दी,’’ मुझे नींद आ गई थी. भैरवी की आवाज से मेरी नींद टूटी तो मैं दौड़ती हुई बच्चों के कमरे में पहुंची. भैरवी जोरजोर से रो रही थी. टूटी हुई गुडि़या एक तरफ पड़ी थी.

मैं भैरवी को गोद में उठा कर चुप कराने लगी तो मुझे देखते ही भूमि चीखने लगी, ‘‘हां, यह बहुत अच्छी है, खूब प्यार कीजिए इस से. मैं ही खराब हूं… मैं ही लड़ाई करती हूं… मैं अब इस के सारे खिलौने तोड़ दूंगी.’’

भूमि और भैरवी मेरी जुड़वां बेटियां हैं. यह इन की रोज की कहानी है. वैसे दोनों में प्यार भी बहुत है. दोनों एकदूसरे के बिना एक पल भी नहीं रह सकतीं.

मेरे पति ऋषभ आदर्श बेटे हैं. उन की मां ही उन की सब कुछ हैं. पति और पिता तो वे बाद में हैं. वैसे ऋषभ मुझे और बेटियों को बहुत प्यार करते हैं, परंतु तभी तक जब तक उन की मां प्रसन्न रहें. यदि उन के चेहरे पर एक पल को भी उदासी छा जाए तो ऋषभ क्रोधित हो उठते, तब मेरी और मेरी बेटियों की आफत हो जाती.

शादी के कुछ दिन बाद की बात है. मांजी कहीं गई हुई थीं. ऋषभ औफिस गए थे. घर में मैं अकेली थी. मांजी और ऋषभ को सरप्राइज देने के लिए मैं ने कई तरह का खाना बनाया.

परंतु यह क्या. मांजी ऋषभ के साथ घर पहुंच कर सीधे रसोई में जा घुसीं और फिर

जोर से चिल्लाईं, ‘‘ये सब बनाने को किस ने कहा था?’’

मैं खुशीखुशी बोली, ‘‘मैं ने अपने मन से बनाया है.’’

वे बड़बड़ाती हुई अपने कमरे में चली गईं और दरवाजा बंद कर लिया. ऋषभ भी चुपचाप ड्राइंगरूम में सोफे पर लेट गए. मेरी खुशी काफूर हो चुकी थी.

ऋषभ क्रोधित स्वर में बोले, ‘‘तुम ने अपने मन से खाना क्यों बनाया?’’

मैं गुस्से में बोली, ‘‘क्यों, क्या यह मेरा घर नहीं है? क्या मैं अपनी इच्छा से खाना भी नहीं बना सकती?’’

मेरी बात सुन कर ऋषभ जोर से चिल्लाए, ‘‘नहीं, यदि तुम्हें इस घर में रहना है तो मां की इच्छानुसार चलना होगा. यहां तुम्हारी मरजी नहीं चलेगी. तुम्हें मां से माफी मांगनी होगी.’’

मैं रो पड़ी. मैं गुस्से से उबल रही थी कि सब छोड़छाड़ अपनी मां के पास चली जाऊं. लेकिन मम्मीपापा का उदास चेहरा आंखों के सामने आते ही मैं मां के पास जा कर बोली, ‘‘मांजी, माफ कर दीजिए. आगे से कुछ भी अपने मन से नहीं करूंगी.’’

मैं ने मांजी के साथ समझौता कर लिया था. सभी कार्यों में उन का ही निर्णय सर्वोपरि रहता. मुझे कभीकभी बहुत गुस्सा आता मगर घर में शांति बनी रहे, इसलिए खून का घूंट पी जाती.

सब सुचारु रूप से चल रहा था कि अचानक हम सब के जीवन में एक तूफान आ गया. एक दिन मैं औफिस में चक्कर खा कर गिर गई और फिर बेहोश हो गई. डाक्टर को बुलाया गया, तो उन्होंने चैकअप कर बताया कि मैं मां बनने वाली हूं.

सभी मुझे बधाई देने लगे, मगर ऋषभ और मैं दोनों परेशान हो गए कि अब क्या किया जाए.

तभी मांजी ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे बेटा नहीं था उसी कमी को पूरा करने के लिए यह अवसर आया है.’’

मां खुशी से नहीं समा रही थीं. वे अपने पोते के स्वागत की तैयारी में जुट गई थीं.

 

अब मां मुझे नियमित चैकअप के लिए डाक्टर के पास ले जातीं.

चौथे महीने मुझे कुछ परेशानी हुई तो डाक्टर के मुंह से अल्ट्रासाउंड करते समय अचानक निकल गया कि बेटी तो पूरी तरह ठीक है औैर मां को भी कुछ नहीं है.

मांजी ने यह बात सुन ली. फिर क्या था. घर आते ही फरमान जारी कर दिया कि दफ्तर से छुट्टी ले लो और डाक्टर के पास जा कर गर्भपात कर लो. मांजी का पोता पाने का सपना जो टूट गया था.

मैं ने ऋषभ को समझाने का प्रयास किया, परंतु वे गर्भपात के लिए डाक्टर के पास जाने की जिद पकड़ ली. आखिर वे मुझे डाक्टर के पास ले ही गए.

डाक्टर बोलीं, ‘‘आप लोगों ने आने में बहुत देर कर दी है. अब मैं गर्भपात की सलाह नहीं दे सकती.’’

अब मांजी का व्यवहार मेरे प्रति बदल गया. व्यंग्यबाणों से मेरा स्वागत होता. एक दिन बोलीं, ‘‘बेटियों की मां तो एक तरह से बांझ ही होती हैं, क्योंकि बेटे से वंश आगे चलता है.’’

अब घर में हर समय तनाव रहता. मैं भी बेवजह बेटियों को डांट देतीं. ऋषभ मांजी की हां में हां मिलाते. मुझ से ऐसा व्यवहार करते जैसे इस सब के लिए मैं दोषी हूं. वे बातबात पर चीखतेचिल्लाते, जिस से मैं परेशान रहती.

एक दिन मांजी किसी अशिक्षित दाई को ले कर आईं और फिर मुझ से बोलीं, ‘‘तुम औफिस से 2-3 की छुट्टी ले लो… यह बहुत ऐक्सपर्ट है. इस का रोज का यही काम है.

यह बहुत जल्दी तुम्हें इस बेटी से छुटकारा दिला देगी.’’

सुन कर मैं सन्न रह गई. अब मुझे अपने जीवन पर खतरा साफ दिख रहा था. मैं ऋषभ के आने का इंतजार करने लगीं. वे औफिस से आए तो मैं ने उन्हें सारी बात बताई.

ऋषभ एक बार को थोड़े गंभीर तो हुए, लेकिन फिर धीरे से बोले, ‘‘मांजी नाराज हो जाएंगी, इसलिए उन का कहना तो मानना ही पड़ेगा.’’

मुझे कायर ऋषभ से घृणा होने लगी. अपने दब्बूपन पर भी गुस्सा आने लगा कि क्यों मैं मुखर हो कर अपने पक्ष को नहीं रखती. मैं क्रोध से थरथर कांप रही थी. बिस्तर पर लेटी तो नींद आंखों से कोसों दूर थी.

ऋषभ बोले, ‘‘क्या बात है? बहुत परेशान दिख रही हो? सो जाओ… डरने की जरूरत नहीं है. सबेरे सब ठीक हो जाएगा.’’

मैं मन ही मन सोचने लगी कि ऋषभ इतने डरपोक क्यों हैं? मांजी का फैसला क्या मेरे जीवन से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है? मेरा मन मुझे प्रताडि़त कर रहा था. मुझे अपने चारों ओर उस मासूम का करुण क्रंदन सुनाई पड़ रहा था. मेरा दिमाग फटा जा रहा था… मुझे हत्यारी होने का बोध हो रहा था. ‘बहुत हुआ, बस अब नहीं,’ सोच मैं विरोध करने के लिए मचल उठी. मैं चीत्कार कर उठी कि नहीं मेरी बच्ची, अब तुम्हें मुझ से कोई नहीं दूर कर सकता. तुम इस दुनिया में अवश्य आओगी…

मैं ने निडर हो कर निर्णय ले लिया था. यह मेरे वजूद की जीत थी. अपनी जीत पर मैं स्वत: इतरा उठी. मैं निश्चिंत हो गई और प्रसन्न हो कर गहरी नींद में सो गई.

सुबह ऋषभ ने आवाज दी, ‘‘उठो, मांजी आवाज दे रही हैं. कोई दाई आई है… तुम्हें बुला रही हैं.’’

मेरे रात के निर्णय ने मुझे निडर बना दिया था. अत: मैं ने उत्तर दिया, ‘‘मुझे सोने दीजिए… आज बहुत दिनों के बाद चैन की नींद आई है. मांजी से कह दीजिए कि मुझे किसी दाईवाई से नहीं मिलना.’’

मांजी तब तक खुद मेरे कमरे में आ चुकी थीं. वे और ऋषभ दोनों ही मेरे धृष्टता पर हैरान थे. मेरे स्वर की दृढ़ता देख कर दोनों की बोलती बंद हो गई थी. मैं आंखें बंद कर उन के अगले हमले का इंतजार कर रही थी. लेकिन यह क्या? दोनों खुसुरफुसुर करते हुए कमरे से बाहर जा चुके थे.

भैरवी और भूमि मुझे सोया देख कर मेरे पास आ गई थीं. मैं ने दोनों को अपने से लिपटा कर खूब प्यार किया. दोनों की मासूम हंसी मेरे दिल को छू रही थी. मैं खुश थी. मेरे मन से डर हवा हो चुका था. हम तीनों खुल कर हंस रहे थे.

ऋषभ को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि रात भर में इसे क्या हो गया. अब मेरे मन में न तो मांजी का खौफ था न ऋषभ का और न ही घर टूटने की परवाह थी. मैं हर परिस्थिति से लड़ने के लिए तैयार थी.

यह मेरे स्वत्व की विजय थी, जिस ने मुझे मेरे वजूद से मेरा परिचय कराया था.

मैं अपने से 2 साल बड़े लड़के से प्यार करती हूं, बताएं मैं क्या करूं?

सवाल

मैं 19 साल की हूं और अपने से 2 साल बड़े लड़के से प्यार करती हूं. हम ने कई बार सैक्स का आनंद भी उठाया है. वह मुझे बहुत प्यार करता है और मुझ से शादी करना चाहता है. उस के घर वालों को भी कोई ऐतराज नहीं है पर मेरे घर वाले तैयार नहीं हो रहे, क्योंकि वह अलग जाति का है और मैं अलग जाति की. हमारे रिश्ते के बारे में घर वालों को पता चला तो मेरी पढ़ाई छुड़वा दी और मोबाइल भी ले लिया. फिर भी मैं लड़के से चोरीछिपे बात कर लेती हूं. बौयफ्रैंड मुझ से बिना बात किए नहीं रह सकता. इस की वजह से उस की पढ़ाई भी डिस्टर्ब हो रही है. वह कह रहा है कि अगर घर वाले नहीं मान रहे तो अभी रुको, 4 साल बाद जब मेरी पढ़ाई पूरी हो जाएगी तो हम शादी कर लेंगे. मगर इस दिल को कैसे तसल्ली दूं, जो दिनरात उसी के लिए धड़क रहा है? बताएं मैं क्या करूं?

जवाब

अभी आप की उम्र काफी छोटी है. यह उम्र पढ़लिख करकुछ बनने की होती है. मगर आप कच्ची उम्र में ही गलती कर बैठीं. यहां तक कि जिस्मानी संबंध भी बना लिए.आप के पेरैंट्स का सोचना सही है. वे भी यही चाहते होंगे कि पहले आप अपने पैरों पर अच्छी तरह खड़ी हो जाएं, कैरियर बना लें तभी शादी की सोचेंगे.खैर, जो होना था सो हो गया. अब समझदारी इसी में है कि आप पहले अपने घर वालों को विश्वास में ले कर अपनी पढ़ाई जारी रखें. बौयफ्रैंड को भी अपना कैरियर बनाने दें.अगर वह 4 साल इंतजार करने को कह रहा है तो उस का सोचना भी सही है. अगर वहआप से सच्ची मुहब्बत करता है तो 4 साल बाद ही सही, आप से जरूर विवाह करेगा.रही बात एकदूसरे की जाति अलगअलग होने की, तो आज के समय में ये सब दकियानूसी बातेंहैं. समाज में ऐसी शादियां खूब हो रही हैं.देरसवेर आप के पेरैंट्स भी मान जाएंगे. अगर न मानें तो आप दोनों कोर्ट मैरिज कर सकते हैं. फिलहाल यही जरूरी है कि आप दोनों ही अपनेअपने कैरियर पर ध्यान दें.

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मैं 33 साल की विवाहिता हूं. पति और 2 बच्चों के साथ खुशहाल जीवन जी रही हूं. शादी से पहले मेरी जिंदगी में एक युवक आया था, जिस से मैं प्यार करती थी, पर किन्हीं वजहों से हमारी शादी नहीं हो पाई थी. अब उस का भी अपना परिवार, पत्नी व बच्चे हैं. इधर कुछ दिनों पहले फेसबुक पर हम दोनों मिले. मोबाइल नंबरों का आदानप्रदान हुआ और अब हम घंटों बातचीत, चैटिंग करते हैं. वह मुझ से मिलना चाहता है. बताएं मैं क्या करूं?

जवाब

वह आप का अतीत था. अब आप दोनों के ही रास्ते अलग हैं. पति, परिवार, बच्चे व सुखद जीवन है. पुरानी यादों को ताजा कर आप दोनों की नजदीकियां दोनों ही परिवारों की खुशियों पर ग्रहण लगा सकती हैं. इसलिए बेहतर यही होगा कि इस रिश्ते को अब आगे न बढ़ाया जाए. हां, अगर वह एक दोस्त के नाते आप से मिलना चाहता है, तो इस में कोई बुराई नहीं. आप घर से बाहर किसी रेस्तरां, पार्क आदि में उस से मिल सकती हैं. बुनियाद दोस्ती की हो तो मिलने में हरज नहीं, बशर्ते मुलाकात मर्यादित रहे. हद न पार की जाए.

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Short Hindi Story : लड़का चाहिए

Short Hindi Story : यह सुरेंद्र का दुर्भाग्य था या सौभाग्य, क्या कहें. वह उस संयुक्त परिवार के बच्चों में सब से आखिरी और 8वें नंबर पर आता था. अब वह 21 साल का ग्रैजुएट हो चुका था व छोटामोटा कामधंधा भी करने लगा था. देखनेदिखाने में औसत से कुछ ऊपर ही था. उस के विवाह के लिए नए प्रस्ताव भी आने लगे थे. यहां तक तो उस के भाग्य में कोई दोष नहीं था परंतु उस के सभी बड़े भाइयों के यहां कुल 17 लड़कियां हो चुकी थीं और अब किसी के यहां लड़का होने की उम्मीद नहीं थी. इसी कारण वंश को आगे बढ़ाने की सारी जिम्मेदारी सुरेंद्र पर टिकी हुई थी.

अब तक घरपरिवार और चेहरेमोहरे को देखने वाले इस परिवार ने दूसरी बातों का सहारा लेना भी शुरू कर दिया, जैसे जन्मपत्रिका मिलाना, परिवार में हुए बच्चों का इतिहास जानना आदि. पत्रिका मिलान करते समय पंडितों को इस बात पर विशेष ध्यान देने को कहा जाता कि पत्रिका में पुत्र उत्पन्न करने संबंधी योग, नक्षत्र भी हैं या नहीं.

एक पंडित से पत्रिका मिलवाने के बाद दूसरे पंडित की सैकंड ओपिनियन भी जरूर ली जाती. पंडित लोग भी मौका देख कर भारीभरकम फीस वसूल करते.

कई लड़कियां तो सुरेंद्र को अच्छी भी लगीं किंतु पंडितों की भविष्यवाणी के आधार पर रिजैक्ट कर दी गईं. एक जगह तो अच्छाखासा विवाद भी हो गया जब एक लड़की ज्योतिष के सभी परीक्षणों में सफल भी हुई, लेकिन स्त्री स्वतंत्रता की पक्षधर उस लड़की को यह सबकुछ बेहद असहज व स्त्रियों के प्रति अपमानजनक लगा.

सुरेंद्र से एकांत में मुलाकात के समय उस ने सुरेंद्र से कहा कि जब आप के परिवार में 17 कन्याओं ने जन्म लिया है तो मुझे आप के घर के पुरुषों के प्रति संदेह है कि उन में लड़का पैदा करने की क्षमता भी है या नहीं. मेरे साथ शादी करने से पहले आप को इस बात का मैडिकल प्रमाणपत्र देना होगा कि आप पुत्र उत्पन्न करने की क्षमता रखते हैं.

जब यह बात रिश्तेदारों और जानपहचान वालों को पता चली तो कई लोग बिन मांगे सुझाव और सलाहों के साथ हाजिर हो गए. किसी ने कहा कि ऐसी लड़की का चयन करना जिस की मां को पहली संतान के रूप में पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई हो. किसी की सलाह थी, कमर से जितने अधिक नीचे बाल होंगे, लड़का होने की संभावना उतनी ही अधिक होगी. एक सलाह यह भी थी कि पुत्र उत्पन्न करने में वे लड़कियां ज्यादा सफल होती हैं जो चलते समय अपना बायां पैर पहले बाहर रखती हैं.

यदि लड़की की नानी ने भी पहली संतान के रूप में लड़के को जन्म दिया हो, संभावनाएं शतप्रतिशत हो जाती हैं.

इसी तरह की और भी न जाने क्याक्या सलाहें मिलती रहीं.

सुरेंद्र का परिवार सभी सलाहों पर हर मुमकिन अमल करने का प्रयास भी इस तरह से कर रहा था मानो यदि अब एक लड़की और हो गई तो वह उस की परवरिश करने में असमर्थ रहेगा. अब तो टोनेटोटके के बावजूद पैदा हुई सब से छोटी लड़की के पुराने कपड़ों को भी घर से हटा दिया गया था क्योंकि इस तरह के पुराने कपड़ों को रखना पनौती माना जाता है.

सुझावों को ध्यान में रख कर सुरेंद्र के लिए लड़कियां देखी जाती रहीं, और किसी न किसी आधार पर अस्वीकृत भी की जाती रहीं. इसी तरह 2 बरस बीत गए और कुछ रिजैक्टेड लड़कियों ने अपनी शादी के बाद अपनी पहली संतान के रूप में लड़कों को जन्म भी दे दिया.

आखिरकार, परिवार की मेहनत रंग लाई और कड़ी खोजबीन के बाद इस तरह की लड़की को खोजने में सफल हो ही गया. खोजी गई लड़की के बाल कमर से लगभग डेढ़ फुट तक नीचे जाते थे. मतलब, एक विश्वसनीय सुरक्षित लंबाई थी बालों की.

लड़की की मां, नानी, यहां तक कि परनानी ने भी पहली संतान के रूप में लड़के को ही जन्म दिया था. यानी यहां दोहरा सुरक्षाकवच मौजूद था. सोने पर सुहागा यह कि लड़की चलते समय बायां पैर ही पहले निकालती थी.

अब तो तीनसौ प्रतिशत संभावनाएं थीं कि यह लड़की, लड़का पैदा करने में पूरी तरह सक्षम है. परंतु जो बात सब से महत्त्वपूर्ण थी वह यह कि सुरेंद्र को यह लड़की पसंद नहीं थी क्योंकि लड़की रंगरूप के मामले में औसत भारतीय लड़कियों से भी नीचे थी.

उस से भी बड़ी बात यह थी कि लड़की मुश्किल से 3 प्रयासों के बाद इंटर की परीक्षा पास कर पाई थी. सभी चीजें तो एक लड़की में नहीं मिल सकती न, ‘वंश तो लड़कों से चलता हैं न कि लड़की की पढ़ाईलिखाई या रंगरूप से’ ये बातें सुरेंद्र को समझा कर किसी ने उस की एक न सुनी.

इस तरह सभी भौतिक परीक्षाओं में पास होने के बाद लड़की की जन्मकुंडली पंडितजी को दिखाई गई. पंडितजी भी एक ही जजमान की कुंडली बारबार देख कर त्रस्त हो चुके थे. वे भी चाहते थे जैसे भी हो, इस बार कुंडली मिला ही दूंगा चाहे कोई पूजा ही क्यों न करवानी पड़े.

उन के अनुसार भी, कुंडली का मिलान भी श्रेष्ठ ही था. किंतु एक हिदायत उन्होंने भी दे दी कि लड़का होने की संभावनाएं तब ही बलवती होंगी जब संतान शादी के एक वर्ष के भीतर गोद में आ जाए.

आखिरकार सुरेंद्र की अनिच्छा के बावजूद शादी धूमधाम से हो गई. लड़की ने इंटर की परीक्षा जरूर 3 प्रयासों में पास की थी लेकिन वह इतना तो जानती ही थी कि इतनी जल्दी मातृत्व का बोझ उठाना ठीक नहीं होगा. उस ने टीवी और फिल्मों के जरिए यह जान लिया था कि शादी के शुरुआती वर्ष पतिपत्नी को एकदूसरे को समझने के लिए बहुत अहम होते हैं. ऐसे में कुछ वर्ष बच्चा नहीं होना चाहिए.

सुरेंद्र की पत्नी को पहले ही दिन से वीआईपी ट्रीटमैंट दिया जा रहा था. उसे तरहतरह के प्रलोभन दिए जा रहे थे.

सुरेंद्र पर भी दबाव डाला जा रहा था और पंडितजी की हिदायतों की समयसमय पर याद करवाई जा रही थी.

2 माह बाद आखिर वह दिन भी आ ही गया जिस का सारे परिवार को इंतजार था. सुरेंद्र की पत्नी गर्भवती हो चुकी थी. मतलब, हर नजरिए से इस परिवार को पुत्र के रूप में वारिस मिलने की संभावनाएं बहुत अधिक हो गई थीं. किसी ने सलाह दी कि यदि इस में कुछ चिकित्सकीय सहायता भी ले ली जाए तो असफलता की संभावनाएं नहीं रहेंगी.

एलोपैथिक के डाक्टरों ने तो इस प्रकार की कोई भी औषधि देने से इनकार कर दिया. तब एक परिचित की सहायता से एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक वैद्यजी को दिखाया गया. वे इस शर्त पर दवा देने को तैयार हुए कि बच्चे के लिए सोनोग्राफी नहीं करवाई जाएगी.

परिवार वालों ने वैद्यजी की बातों को माना और वैद्यजी की बताई गई दवाई पूर्णिमा को खिला भी दी गई.

समयसमय एलोपैथी के डाक्टर को दिखा कर बच्चे की शारीरिक प्रगति पर ध्यान दिया जाता रहा. लेकिन वैद्यजी की सलाह के अनुसार सोनोग्राफी की अनुमति नहीं दी गई. डाक्टर अपने अनुभवों के आधार पर उपचारित करते रहे. परिवार वाले भी सुरेंद्र की पत्नी की हर इच्छा को आदेश मान कर पालन करते रहे.

सुरेंद्र की पत्नी अपनेआप को किसी वीआईवी से कम नहीं समझ रही थी. विवाह के 11 महीनों के बाद आखिर वह दिन भी आ ही गया जिस का सभी को इंतजार था. सुरेंद्र की पत्नी को अस्पताल में भरती करवा दिया गया. घर पर पूजापाठहवन आदि का इंतजाम किया गया. पूरे घर में लड़का होेने की अग्रिम खुशी में उत्सव जैसा माहौल हो गया.

आखिर वह समय भी आ गया

जब परिणाम घोषित हुआ. परिणाम पिछले 17 परिणामों से अलग नहीं था.

सुरेंद्र की पत्नी ने एक स्वस्थ और सुंदर कन्या को जन्म दिया. इस घड़ी में सुरेंद्र का परिवार तो कुछ कहने की स्थिति में नहीं था परंतु बाहर के लोग तो कह ही रहे थे, कुछ हंसी में और कुछ संवेदना में. कुछ लोग तो यह सलाह देने के लिए आ रहे थे कि दूसरी संतान पुत्र कैसे हो, इस के कुछ नुस्खे उन के पास मौजूद हैं.

किंतु, गुस्से से भरा सुरेंद्र पहले की सलाह देने वालों को ढूंढ़ रहा है. आप भी तो उन में से एक नहीं है न. यदि हैं, तो बच कर रहिए.

Stories : नव वर्ष का प्रकाश – कैसे घटी मनीष और निधि की दूरियां

Stories : उस के मन में आने वाले नव वर्ष के लिए बेचैनी होने लगी.प्रकाश ने फोन पर इतना ही कहा था कि वह दीया को ले कर पहुंच रहा है. अंधेरा घिर आया था लेकिन निधि ने अभी तक घर की बत्तियां नहीं जलाई थीं. जला कर वह करती भी क्या. जिस के जीवन से ही प्रकाश चला गया हो उस के घर के कमरों में प्रकाश हो न हो, क्या फर्क पड़ता है.

प्रकाश, जिसे पिछले 31 सालों से उन्होंने अपने खूनपसीने से सींचा था, जिस के पलपल का खयाल रखा था, जिस की पसंदनापसंद बड़ी माने रखती थी, उसी ने आज उन्हें बंजर, बेसहारा बना दिया था.

ममता भरे स्नेहिल आंचल की छांव में जो प्रकाश खेला था आज एकाएक अपने तक ही सीमित हो गया था. उस ने अपने मातापिता को बुढ़ापे में यों निकाल फेंका था मानो पैर में चुभा कांटा निकाल कर फेंक दिया हो. बेचारे मातापिता अपने बुढ़ापे के लिए कुछ बचा भी नहीं पाए थे. सोचा था प्रकाश पढ़लिख जाएगा तो कमा लेगा, हमारे बुढ़ापे की लाठी बनेगा. यह एहसास निधि के लिए जानलेवा था. सारे दिन वह व्यथित रहती. उस पर पति का कठोर जीवन उसे और भी सालता. पति को जीतोड़ मेहनत करते देख उसे बहुत दुख होता. अपने जिगर के टुकड़े से उसे ऐसी उम्मीद न थी.

निधि को वह दिन याद आया जब प्रकाश का नामकरण किया गया था. सब उसे राज…राजकुमार नाम से पुकारने लगे थे किंतु उस ने प्रकाश नाम रखा. शायद यह सोच कर कि प्रकाश नाम से उसे सदैव जीवन में प्रकाश मिलता रहेगा और दूसरों को भी वह अपने प्रकाश से प्रकाशित करेगा.

परंतु आज जब जीवन इतना गुजर गया तो अनुभव हुआ कि प्रकाश का अपना कोई वजूद ही नहीं है, उस का ऐसा कोई अस्तित्व नहीं है कि जैसा दीपक के साथ या बल्ब, ट्यूबलाइट के साथ जुड़ा होता है. प्रकाश के साथ जुड़ी चीजें भले ही उस के प्रकाश के साथ जुड़ी हों लेकिन उन से प्रकाश का कोई लेनदेन या सरोकार नहीं होता. बिना किसी आग्रह के वह वहीं चला जाता है जहां बल्ब, ट्यूब- लाइट या दीपक जल रहा होता है.

वह खुद भी इस बात को सोचने की जरूरत भी नहीं समझता कि उस के चले जाने के बाद किसी का जीवन प्रकाशहीन हो कर अंधेरे में डूब जाएगा.

बड़ी नौकरी मिलते ही प्रकाश का रुख बदल गया था. घर, कार, पैसा उस के पास होते ही उस ने अपने तेवर बदल लिए थे. जब तक उस को जरूरत थी मातापिता को एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करता रहा.

अपनी इच्छा से उस ने शादी भी बाहर ही कर ली. शादी के एक साल तक अपने शहर भी नहीं आया था. आज  आएगा, वह भी केवल 4 घंटे के लिए, क्योंकि बहू के गले में खानदान का पुश्तैनी हार जो डलवाना चाहता है. इस के लिए उसे घर फोन कर के सूचना देने की पूरी याद रही. फोन पर उस ने मां से पूछा, ‘मां, कैसी हो?’

‘अच्छी हूं,’ कहते ही कितना दिल भर आया था. क्या कहती कि तेरे बिना घर सूना लग रहा है. तू भूल गया है लेकिन हम नहीं भूले. तेरी शादी के अरमान ऐसे ही धरे के धरे रह गए. परंतु कहा कुछ भी नहीं था.

‘पिताजी कैसे हैं?’ प्रकाश ने पूछा.

‘ठीक हैं, मजे में हैं?’ सोचा, क्यों बताऊं कैसे जी रहे हैं. बेटा हो कर जब तुझे दायित्व का बोध नहीं रहा, केवल अपना अधिकार याद है. पुश्तैनी हार…बहू के नाम पर रखे गहने तो याद हैं किंतु कर्तव्य नहीं.

वह सोच में पड़ी थी, बेटे ने यह भी नहीं सोचा कि मांपिताजी कैसे थोड़ी सी रकम से गुजारा कर रहे होंगे. सारा जीवन तो कमाकमा कर उसे पढ़ाते रहे. होनहार निकले…कितनेकितने घंटे पढ़ाती रही और तुझे पढ़ाने के लिए खुद पढ़पढ़ कर समझती रही. उस का ऐसा परिणाम?

‘हम दोनों आप से आशीर्वाद लेने आ रहे हैं.’

निधि के मन की तटस्थता बनी रही थी. प्रकाश की बातें सुनती रही. वह कह रहा था, ‘शाम को आएंगे. रात में भोजन साथ करेंगे.’ निधि ने किसी प्रकार का कोई आश्वासन नहीं दिया था. और फोन पर वार्तालाप बंद हो गया था.

निधि ने पति मनीष को प्रकाश और बहू दीया के आने की तथा बहू की मुंह दिखाई की रस्म में पुश्तैनी हार व अन्य गहने, जो उस के लिए कभी बनवाए थे, देने की मंशा जाहिर की साथ ही वह सारी बातें बता दीं जो प्रकाश ने उस से फोन पर कही थीं.

मनीष ने गहरी नजरों से निधि की ओर देखा. वह आश्वस्त हो गए कि निधि के चेहरे पर ममता का भाव तो है साथ ही पति के प्रति पूर्ण निष्ठा भी.

‘तुम क्या चाहती हो?’

पति के दिल को पढ़ते हुए निधि ने उत्तर दिया था, ‘जैसा आप कहें.’

थोड़ी देर चुप्पी छाई रही. दोनों के मन में एक जैसी भावनाएं चल रही थीं. मनीष वहीं से उठ कर आराम करने चले गए थे.

घर के खर्चे के लिए उन्होंने एक सेठ के यहां 2,500 रुपए की नौकरी कर ली थी. सुबह 6 बजे घर से निकलते और शाम 7 बजे घर आते. बसों में आनेजाने के कारण थकान बहुत ज्यादा हो जाती. अत: थोड़ी देर आराम करने के लिए भीतर के कमरे में चले गए.

बाहर घने बादलों के कारण कुछ ज्यादा ही अंधकार हो गया था. थोड़ी देर में टिपटिप बूंदाबांदी होने लगी. निधि उसी तरह बरामदे में बैठी रही. प्रकाश और दीया अभी तक नहीं आए थे. मन अनेक खट्टीमीठी घटनाओं को याद करता और भूलता रहा.

तभी एक टैक्सी गेट के पास आ कर रुकी. निधि उसी तरह बैठी खिड़की से देखती रही. वे दोनों उस के बहूबेटा ही थे, किंतु अंधकार के कारण कुछ साफ दिखाई नहीं दे रहा था. तभी प्रकाश का स्वर सुनाई दिया, ‘‘लगता है, घर में रोशनी नहीं है.’’

आवाज सुन निधि की ममता उमड़ आई. मन में सोचा, ‘हां, ठीक कहा, घर में बेटा न हो तो प्रकाश कैसे होगा. तू आ गया है तो उजाला हो जाएगा.’ किंतु प्रकाश ने मां के भावों को नहीं समझा.

निधि ने उठ कर बत्ती जलाई. आवाज सुन कर मनीष भी उठ बैठे. मुख्यद्वार खोला. प्रकाश और दीया ने दोनों को प्रणाम किया. उन्होंने आशीर्वाद दिया, ‘‘सदा सुखी रहो.’’

मां और पिताजी ने बहू के आगमन की कोई तैयारी नहीं की थी, यह देख प्रकाश मन ही मन अपने को अपमानित महसूस करने लगा. न तो मां ने उठ कर कोई खातिरदारी का उपक्रम किया और न ही पिताजी ने.

कुछ देर तक निस्तब्धता छाई रही. मां और पिताजी के ठंडे स्वभाव को देख कर प्रकाश का तनमन क्रोधित हो उठा. वह सोचने लगा कि पुश्तैनी हार ले कर अब उसे चलना चाहिए. उस ने मां से कहा था, ‘‘अपनी बहू की मुंह दिखाई की रस्म पूरी करो, मां. हमारी टे्रन का समय हो रहा है.’’

मुंह दिखाई की रस्म की बात सुन कर मनीष ने कहा, ‘‘हां…हां…क्यों नहीं.’’ और जा कर अपने पर्स से 11 रुपए ला कर निधि को पकड़ाते हुए कहा, ‘‘निधि, बहू की मुंह दिखाई की रस्म पूरी करो.’’

निधि ने पति की आज्ञानुसार वैसा ही किया. सगन देते हुए निधि ने कहा, ‘‘बहू, मुंह दिखाई की रस्म के बाद हम बहू से रसोई करवाते हैं. तुम जा कर रसोई में हलवापूरी बना दो. सारा सामान वहीं रखा हुआ है.’’

मां के मुंह से रस्म अदायगी की बात सुन कर प्रकाश ने अपने गुस्से को काबू में रखते हुए कहा, ‘‘वाह मां, क्या खूब. आप ने बहू को कुछ दिया तो नहीं पर काम करवा रही हैं…काम अगली बार करवाइएगा.’’

प्रकाश की बात सुन कर पिता ने कहा, ‘‘बेटा, अगली बार जब आएगी काम करेगी, घर के प्रति कर्तव्य निभाएगी तो फल भी पाएगी…यह सब तुम्हारा ही तो है…’’

‘‘दीया अभी खाना नहीं बनाएगी,’’ उस ने धीरे से कहा.

दीया चुपचाप सोफे पर बैठी थी. उस ने कलाई घड़ी पर नजर डाली. साढ़े 8 बज रहे थे. उस ने उठते हुए कहा, ‘‘प्रकाश, ट्रेन का समय हो रहा है.’’

‘‘हां, हां, हमें चलना चाहिए. खाना हम ट्रेन में खा लेंगे,’’ प्रकाश ने रूखे स्वर में कहा.

‘‘जैसा तुम दोनों चाहो,’’ मनीष ने मुसकराते हुए कहा.

दोनों ने प्रणाम किया. मातापिता ने उन्हें गले लगा कर प्यार किया और विदा कर दिया.

दोनों के चले जाने के बाद निधि रसोई में आ कर सब्जी काटने लगी. मनीष भी रसोई में आ गए.

‘‘आप को 11 रुपए देने की क्या जरूरत थी?’’ निधि ने कहा.

‘‘अपने उस पढ़ेलिखे बेटे को समझाने के लिए कि हम ने सदा अपने बेटे के प्रति कर्तव्य निभाया है लेकिन तुम ने क्या सीखा? मुंह दिखाई के लिए बहू को लाया था…वह भी एक साल बाद.’’

‘‘इसलिए कह रही हूं कि सवा रुपया देना चाहिए था,’’ निधि की बात सुन मनीष ठहाका मार कर हंसने लगे.

बहुत देर तक हंसते रहे. हमारा ही बेटा हमारे ही कान काटने पर तुला है. वह भूल गया है कि वह हमारा बेटा है,  बाप नहीं. वह दोनों पहली बार भावुक नहीं हुए थे.

पतिपत्नी ने मिल कर खाना खाया. एकसाथ एक ही थाली में खाया. मनीष खूब मजेदार बातें निधि को सुनाते रहे और वह मनीष को.

आज एक लंबे अरसे के बाद पतिपत्नी अत्यंत प्रफुल्लित एवं संतुष्ट थे मानो खोया हुआ खजाना मिल गया हो. आज मन में समझदारी का प्रकाश हुआ हो. इसी तरह 4 घंटे बीत गए. मनीष ने निधि को कहा, ‘‘नव वर्ष की बहुतबहुत बधाई हो.’’

‘‘आप को भी आज प्रकाश के आने पर मन में समझदारी का प्रकाश हुआ है. नव वर्ष सब को शुभ हो,’’ कहते हुए वे दोनों घर की छत पर आ गए और वहां से गली में आनेजाने वालों को नव वर्ष की मुबारकबाद देने लगे.

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Family Story : उसकी मम्मी मेरी अम्मा – दो माओं की कहानी

Family Story : दीक्षा की मम्मी उसे कार से मेरे घर छोड़ गईं. मैं संकोच के कारण उन्हें अंदर आने तक को न कह सकी. अंदर बुलाती तो उन्हें हींग, जीरे की दुर्गंध से सनी अम्मा से मिलवाना पड़ता. उस की मम्मी जातेजाते महंगे इत्र की भीनीभीनी खुशबू छोड़ गई थीं, जो काफी देर तक मेरे मन को सुगंधित किए रही.

मेरे न चाहते हुए भी दीक्षा सीधे रसोई की तरफ चली गई और बोली, ‘‘रसोई से मसालों की चटपटी सी सुगंध आ रही है. मौसी क्या बना रही हैं?’’

मैं ने मन ही मन कहा, ‘सुगंध या दुर्गंध?’ फिर झेंपते हुए बोली, ‘‘पतौड़े.’’

दीक्षा चहक कर बोली, ‘‘सच, 3-4 साल पहले दादीमां के गांव में खाए थे.’’

मैं ने दीक्षा को लताड़ा, ‘‘धत, पतौड़े भी कोई खास चीज होती है. तेरे घर उस दिन पेस्ट्री खाई थी, कितनी स्वादिष्ठ थी, मुंह में घुलती चली गई थी.’’

दीक्षा पतौड़ों की ओर देखती हुई बोली, ‘‘मम्मी से कुछ भी बनाने को कहो तो बाजार से न जाने कबकब की सड़ी पेस्ट्री उठा लाएंगी, न खट्टे में, न ढंग से मीठे में. रसोई की दहलीज पार करते ही जैसे मेरी मम्मी के पैर जलने लगते हैं. कुंदन जो भी बना दे, हमारे लिए तो वही मोहनभोग है.’’

अम्मा ने दही, सौंठ डाल कर दीक्षा को एक प्लेट में पतौड़े दिए तो उस ने चटखारे लेले कर खाने शुरू कर दिए. मैं मन ही मन सोच रही थी, ‘कृष्ण सुदामा के तंबुल खा रहे हैं, वरना दीक्षा के घर तो कितनी ही तरह के बिस्कुट रखे रहते हैं. अम्मा से कुछ बाजार से मंगाने को कहो तो तुरंत घर पर बनाने बैठ जाएंगी. ऊपर से दस लैक्चर और थोक के भाव बताने लगेंगी, ताजी चीज खाया करो, बाजार में न जाने कैसाकैसा तो तेल डालते हैं.’

दीक्षा प्लेट को चाटचाट कर साफ कर रही थी और मैं उस की मम्मी, उस के घर के बारे में सोचे जा रही थी, ‘दीक्षा की मम्मी साड़ी और मैचिंग ब्लाउज में मुसकराती हुई कितनी स्मार्ट लगती हैं. यदि वे क्लब चली जाती हैं तो कुंदन लौन में कुरसियां लगा देता है और अच्छेअच्छे बिस्कुटों व गुजराती चिवड़े से प्लेटें भरता जाता है. अम्मा तो बस कहीं आनेजाने में ही साड़ी पहनती हैं और उन के साथ लाल, काले, सफेद रूबिया के 3 साधारण ब्लाउजों से काम चला लेती हैं.’

प्लेट रखते हुए दीक्षा अम्मा से बोली, ‘‘मौसी, आप ने कितने स्वादिष्ठ पतौड़े बनाए हैं. दादी ने तो अरवी के पत्ते काट कर पतौड़े बनाए थे, पर उन में वह बात कहां जो आप के चटपटे पतौड़ों में है.’’

मैं और दीक्षा कैरम खेलने लगीं. मैं ने उस से पूछा, ‘‘मौसीजी आज कहां गई हैं?’’

दीक्षा ने उदासी से उत्तर दिया, ‘‘उन का महिला क्लब गरीब बच्चों के लिए चैरिटी शो कर रहा है, उसी में गई हैं.’’

मैं ने आश्चर्य से चहक कर कहा, ‘‘सच? मौसी घर के साथसाथ समाजसेवा भी खूब कर लेती हैं. एक मेरी अम्मा हैं कि कहीं निकलती ही नहीं. हमेशा समय का रोना रोती रहेंगी. कभी कहो कि अम्मा, मौल घुमा लाओ, तो पिताजी को साथ भेज देंगी. तुम्हारी मम्मी कितनी टिपटौप रहती हैं. अम्मा कभी हमारे साथ चलेंगी भी तो यों ही चल देंगी. दीक्षा, सच तो यह है कि मौसीजी तेरी मम्मी नहीं, वरन दीदी लगती हैं,’’ मैं मन ही मन अम्मा पर खीजी.

रसोई से अम्मा की खटरपटर की आवाज आ रही थी. वे मेरे और दीक्षा के लिए मोटेमोटे से 2 प्यालों में चाय ले आईं. दीक्षा उन से लगभग लिपटते हुए बोली, ‘‘मौसी, आप भी कमाल हैं, बच्चों का कितना ध्यान रखती हैं. आइए, आप भी कैरम खेलिए.’’

अम्मा छिपी रुस्तम निकलीं. एकसाथ 2-2, 3-3 गोटियां निकाल कर स्ट्राइकर छोड़तीं. अचानक उन को जैसे कुछ याद आया. कैरम बीच में ही छोड़ कर कहते हुए उठ गईं, ‘‘मुझे मसाले कूट कर रखने हैं. तुम लोग खेलो.’’

अम्मा के जाने के बाद दीक्षा आश्चर्य से बोली, ‘‘तुम लोग बाजार से पैकेट वाले मसाले नहीं मंगाते?’’

मेरा सिर फिर शर्म से झुक गया. रसोई से इमामदस्ते की खटखट मेरे हृदय पर हथौड़े चलाने लगी, ‘‘कई बार मिक्सी के लिए बजट बना, पर हर बार पैसे किसी न किसी काम में आते रहे. अंत में हार कर अम्मा ने मिक्सी के विचार को मुक्ति दे दी कि इमामदस्ते और सिलबट्टे से ही काम चल जाएगा. मिक्सी बातबात में खराब होती रहती है और फिर बिजली भी तो झिंकाझिंका कर आती है. ऐसे में मिक्सी रानी तो बस अलमारी में ही सजी रहेंगी.’’

मुझे टैस्ट की तैयारी करनी थी, मैं ने उस से पूछा, ‘‘मौसीजी चैरिटी शो से कब लौटेंगी? तेरे पापा भी तो औफिस से आने वाले हैं.’’

दीक्षा ने लंबी सांस ले कर उत्तर दिया, ‘‘मम्मी का क्या पता, कब लौटें? और पापा को तो अपने टूर प्रोग्रामों से ही फुरसत नहीं रहती, महीने में 4-5 दिन ही घर पर रहते हैं.’’

अतृप्ति मेरे मन में कौंधी, ‘एक अपने पिताजी हैं, कभी टूर पर जाते ही नहीं. बस, औफिस से आते ही हम भाईबहनों को पढ़ाने बैठ जाएंगे. टूर प्रोग्राम तो टालते ही रहते हैं. दीक्षा के पापा उस के लिए बाहर से कितना सामान लाते होंगे.’

मैं ने उत्सुकता से पूछा, ‘‘सच दीक्षा, फिर तो तेरा सारा सामान भारत के कोनेकोने से आता होगा?’’

दीक्षा रोनी सूरत बना कर बोली, ‘‘घर पूरा अजायबघर बन गया है और फिर वहां रहता ही कौन है? बस, पापा का लाया हुआ सामान ही तो रहता है घर में. महल्ले की औरतें व्यंग्य से मम्मी को नगरनाइन कहती हैं, उन्हें समाज कल्याण से फुरसत जो नहीं रहती. होमवर्क तक समझने को तरस जाती हूं मैं. मम्मी आती हैं तो सिर पर कस कर रूमाल बांध कर सो जाती हैं.’’

पहली बार दीक्षा के प्रति मेरे हृदय की ईर्ष्या कुछ कम हुई. उस की जगह दया ने ले ली, ‘बेचारी दीक्षा, तभी तो इसे स्कूल में अकसर सजा मिलती है. इस का मतलब अभी यह जमेगी हमारे घर.’

अम्मा ने रसोई से आ कर प्यार से कहा, ‘‘चलो दीक्षा, सीमा, कल के लिए कुछ पढ़ लो. ये आएंगे तो सब साथसाथ खाना खा लेना. उस के बाद उन से पढ़ लेना. कल तुम लोगों के 2-2 टैस्ट हैं, बेटे.’’

दीक्षा ने अम्मा की ओर देखा और मेरे साथ ही इतिहास के टैस्ट की तैयारी करने लगी. उसे कुछ भी तो याद नहीं था. उस की रोनीसूरत देख कर अम्मा उसे पाठ याद करवाने लगीं. जैसेजैसे वह उसे सरल करकर के याद करवाती जा रही थीं, उस के चेहरे की चमक लौटती जा रही थी. आत्मविश्वास उस के चेहरे पर झलकने लगा था.

पिताजी औफिस से आए तो हम सब के साथ खाना खा कर उन्होंने मुझे तथा दीक्षा को गणित के टैस्ट की तैयारी के लिए बैठा दिया. दीक्षा को पहाडे़ भी ढंग से याद नहीं थे. जोड़जोड़ कर पहाड़े वाले सवाल कर रही थी. तभी दीक्षा की मम्मी कार ले कर उसे लेने आ गईं.

अम्मा सकुचाई सी बोलीं, ‘‘दीक्षा को मैं ने जबरदस्ती खाना खिला दिया है. जो कुछ भी बना है, आप भी खा लीजिए.’’

थोड़ी नानुकुर के बाद दीक्षा की मम्मी ने हमारे उलटेसीधे बरतनों में खाना खा लिया. मैं शर्र्म से पानीपानी हो गई. स्टूल और कुरसी से डाइनिंग टेबल का काम लिया. न सौस, न सलाद. सोचा, अम्मा को भी क्या सूझी? हां, उन्होंने उड़द की दाल के पापड़ घर पर बनाए थे. अचानक ध्यान आया तो मैं ने खाने के साथ उन्हें भून दिया. दीक्षा की मम्मी ने भी दीक्षा की ही तरह हमारे घर का खाना चटखारे लेले कर खाया. फिर मांबेटी चली गईं.

अब अकसर दीक्षा की मम्मी उसे हमारे घर कार से छोड़ जातीं और रात को ले जातीं. समाज कल्याण के कार्यों में वे पहले से भी अधिक उलझती जा रही थीं. शुरूशुरू में दीक्षा को संकोच हुआ, पर धीरेधीरे हम भाईबहनों के बीच उस का संकोच कच्चे रंग सा धुल गया. पिताजी औफिस से आ कर हम सब के साथ उसे भी पढ़ाते और गलती होने पर उस की खूब खबर लेते.

मैं ने दीक्षा से पूछा, ‘‘पिताजी तुझे डांटते हैं तो कितना बुरा लगता होगा? उन्हें तुझे डांटना नहीं चाहिए.’’

दीक्षा मुसकराई, ‘‘धत पगली, मुझे अच्छा लगता है. मेरे लिए उन के पास वक्त है. दवाई भी तो कड़वी होती है, पर वह हमें ठीक भी करती है. मेरे मम्मीपापा के पास तो मुझे डांटने के लिए भी समय नहीं है.’’

मुझे दीक्षा की बुद्धि पर तरस आने लगा, ‘अपने मम्मीपापा की तुलना मेरे मातापिता से कर रही है. मेरे पिताजी क्लर्क और उस के पापा बहुत बड़े अफसर. उस की मम्मी कई समाजसेवी संस्थाओं की सदस्या, मेरी अम्मा घरघुस्सू. उस के  पापा क्लबों, टूरों में समय बिताने वाले, मेरे पिताजी ट्यूशन का पैसा बचाने में माहिर. उस की मम्मी सुंदरता का पर्याय, मेरी अम्मा को आईना देखने तक की भी फुरसत मुश्किल से ही मिल पाती है.’

अचानक दीक्षा 1 और 2 जनवरी को विद्यालय नहीं आई. यदि वह 3 जनवरी को भी नहीं आती तो उस का नाम कट जाता. इसलिए मैं 3 जनवरी को विद्यालय जाने से पूर्व उस के घर जा पहुंची. काफी देर घंटी बजाने के बाद दरवाजा खुला.

मैं आश्चर्यचकित हो दीक्षा को देखे चली जा रही थी. वह एकदम मुरझाए हुए फूल जैसी लग रही थी. मैं ने उसे मीठी डांट पिलाते हुए कहा, ‘‘दीक्षा, तू बीमार है, मुझे मैसेज तो कर देती.’’

वह फीकी सी हंसी के साथ बोली, ‘‘मम्मी पास के गांवों में बच्चों को पोलियो की दवाई पिलवाने चली जाती हैं…’’

‘‘और कुंदन?’’ मैं ने पूछा.

‘‘4-5 दिनों से गांव गया हुआ है. उस की बेटी बीमार है.’’

पहली बार मेरे मन में दीक्षा की मम्मी के लिए रोष के तीव्र स्वर उभरे, ‘‘और तू जो बीमार है तो तेरे लिए मौसीजी का समाजसेविका वाला रूप क्यों धुंधला जाता है. चैरिटी घर से ही शुरू होती है.’’ यह कह कर मैं ने उस को बिस्तर पर बैठाया.

दीक्षा ने बात पूरी की, ‘‘पर घर की  चैरिटी से मम्मी को प्रशंसा के पदक और प्रमाणपत्र तो नहीं मिलते. गवर्नर उन्हें भरी सभा में ‘कल्याणी’ की उपाधि तो नहीं प्रदान करता.’’

शो केस में सजे मौसी को मिले चमचमाते पदक, जो मुझे सदैव आकर्षित करते थे, तब बेहद फीके से लगे. अचानक मुझे पिछली गरमी में खुद को हुए मलेरिया के बुखार का ध्यान आ गया. बोली, ‘‘दीक्षा, मुझे कहलवा दिया होता. मैं ही तेरे पास बैठी रहती. मुझे जब मलेरिया हुआ था तो मैं अम्मा को अपने पास से उठने तक नहीं देती थी. बस, मेरी आंख जरा लगती थी, तभी वे झटपट रसोई में कुछ बना आती थीं.’’

दीक्षा के सिरहाने बिस्कुट का पैकेट तथा थर्मस में गरम पानी रखा हुआ था. मैं ने उसे चाय बना कर दी. फिर स्कूल जा कर अपनी और दीक्षा की छुट्टी का प्रार्थनापत्र दे आई. लौटते हुए अम्मा को सब बताती भी आई.

पूरा दिन मैं दीक्षा के पास बैठी रही. थर्मस का पानी खत्म हो चुका था. मैं ने थर्मस गरम पानी से भर दिया. दीक्षा का मन लगाने के लिए उस के साथ वीडियो गेम्स खेलती रही.

शाम को मौसीजी लौटीं. उन की सुंदरता, जो मुझे सदैव आकर्षित करती थी, कहीं गहन वन की कंदरा में छिप गई थी. बालों में चांदी के तार चमक रहे थे. मुंह पर झुर्रियों की सिलवटें पड़ी थीं. उन में सुंदरता मुझे लाख ढूंढ़ने पर भी न मिली.

वे आते ही झल्लाईं, ‘‘यह पार्लर भी न जाने कब खुलेगा. रोज सुबहशाम चक्कर काटती हूं. आजकल मुझे न जाने कहांकहां जाना पड़ता है. कोई पहचान ही नहीं पाता. यदि पार्लर कल भी न खुला तो मैं घर पर ही बैठी रहूंगी. इस हाल में बाहर जाते हुए मुझे शर्म आती है. सभी आंखें फाड़फाड़ कर देखते हैं कि कहीं मैं बीमार तो नहीं.’’

मैं ने चैन की सांस ली कि चलो, मौसी कल से दीक्षा के पास पार्लर न खुलने की ही मजबूरी में रहेंगी. उन की सुंदरता ब्यूटीपार्लर की देन है. क्रीम की न जाने कितनी परतें चढ़ती होंगी.

मन ही मन मेरा स्वर विद्रोही हो उठा, ‘मौसी, तब भी आप को अपनी बीमार बिटिया का ध्यान नहीं आता. कुंदन, ब्यूटीपार्लर…सभी तो बारीबारी से बीमार दीक्षा की ओर संकेत करते हैं. आप ने तो यह भी ध्यान नहीं किया कि स्कूल में 3 दिनों की अनुपस्थिति में दीक्षा का नाम कटतेकटते रह गया.

‘ओह, मेरी अम्मा कितनी अच्छी हैं. उन के बिना मैं घर की कल्पना ही नहीं कर सकती. वे हमारे घर की धुरी हैं, जो पूरे घर को चलाती हैं. आप से ज्यादा तो कुंदन आप के घर को चलाने वाला सदस्य है.

मेरी अम्मा की जो भी शक्लसूरत है, वह उन की अपनी है, किसी ब्यूटीपार्लर से उधार में मांगी हुई नहीं. यदि आप का ब्यूटीपार्लर 4 दिन भी न खुले तो आप की सुंदरता दम तोड़ देती है. अम्मा ने 2 कमरों के मकान को घर बनाया हुआ है, जबकि आप का लंबाचौड़ा बंगला, बस, शानदार मगर सुनसान स्मारक सा लगता है.

‘मौसी, आप कितनी स्वार्थी हैं कि अपने बच्चों को अपना समय नहीं दे सकतीं, जबकि हमारी अम्मा का हर पल हमारा है.’

मेरा मन भटके पक्षी सा अपने नीड़ में मां के पास जाने को व्याकुल होने लगा.

Social Story : कूल फूल

Social Story :  राजेश, विक्रम, सरिता, पिंकी और रश्मि कालेज के बाहर खड़े बातचीत में व्यस्त थे कि तभी एक बाइक तेजी से आ कर उन के पास रुक गई. वे सब एक तरफ हट गए. इस से पहले वे बाइक सवार को कुछ कहते उस ने हैलमैट उतारते हुए कहा, ‘‘क्यों कैसी रही ’’

वे फक्क रह गए, ‘‘अरे, राजन तुम,’’ सभी एकसाथ बोले.

‘‘बाइक कब ली यार ’’ विक्रम ने पूछा.

‘‘बस, इस बार जन्मदिन पर डैड की ओर से यह तोहफा मिला है,’’ कहते हुए वह सब को बाइक की खासीयतें बताने लगा.

राजन अमीर घर का बिगड़ा हुआ किशोर था. हमेशा अपनी लग्जरीज का घमंड दिखाता और सब पर रोब झाड़ता, लेकिन वे तब भी साथ खातेपीते और उस से घुलेमिले ही रहते. रश्मि को राजन का इस तरह बाइक ला कर बीच में खड़ी करना और रोब झाड़ना बिलकुल अच्छा नहीं लगा. वे सभी कालेज के फर्स्ट ईयर के विद्यार्थी थे. लेकिन रश्मि 12वीं तक स्कूल में राजन के साथ पढ़ी थी इसलिए वह अच्छी तरह उस के स्वभाव से वाकिफ थी. सरिता व पिंकी तो हमेशा उस से खानेपीने के चक्कर में रहतीं, अत: एकदम बोल पड़ीं, ‘‘कब दे रहे हो पार्टी बाइक की ’’

‘‘हांहां, बस, जल्दी ही दूंगा. ऐग्जाम्स खत्म होते ही खाली होने पर करते हैं पार्टी,’’ राजन लापरवाही से बोला और बाइक स्टार्ट कर घरघराता हुआ चला गया. रश्मि सरिता व पिंकी से बोली, ‘‘मुझे तो बिलकुल अच्छा नहीं लगा इस का यह व्यवहार, हमेशा रोब झाड़ता रहता है अपनी अमीरी का. उस पर तुम लोग उस से पार्टी की उम्मीद करते हो. याद है, पिछली बार उस ने फोन की पार्टी देने के नाम पर क्या किया था.’’

‘‘हां…हां, याद है,’’ पास खड़ी सरिता बोली, ‘‘उस ने पार्टी के नाम पर बेवकूफ बनाया था, यही न. लेकिन तुम्हें पता है न अचानक उस के मामा की तबीयत खराब हो गई थी जिस कारण वह पार्टी नहीं दे सका था.’’

दरअसल, राजन का जन्मदिन 20 मार्च को होता था और पिछले वर्ष उसे जन्मदिन पर स्मार्टफोन मिला था. उस ने सब को दिखाया. फिर पार्टी का वादा भी किया, लेकिन आया नहीं. बाद में सब ने पूछा तो कह दिया कि मामाजी की तबीयत खराब हो गई थी, जबकि रश्मि जानती थी कि ऐसा कुछ नहीं था. बस, वह सब को मूर्ख बना रहा था. अब तो बाइक मिलने पर राजन का घमंड और बढ़ गया था. वह तो पहले ही अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझता था. अत: राजन ने सब को कह दिया, ‘‘ऐग्जाम्स के बाद मैं सभी को एसएमएस कर के बता दूंगा कि कहां और कब पार्टी दूंगा.’’

शाम को सरिता घर में बैठी अगले दिन के पेपर की तैयारी कर रही थी कि रश्मि का फोन आया. बोली, ‘‘राजन का मैसेज आया है. 1 तारीख को दोपहर 1 बजे शिखाजा रैस्टोरैंट में पार्टी दे रहा है. जाओगी क्या ’’

‘‘हां, यार, मैसेज तो अभीअभी मुझे भी आया है. जाना भी चाहिए. तुम बताओ ’’ सरिता ने जवाब दिया.

‘‘मुझे तो उस पर रत्तीभर भरोसा नहीं है. सुबह वह कह रहा था ऐग्जाम्स के बाद पार्टी देगा और अब यह मैसेज. फिर मैं तो पिछली बार की बात भी नहीं भूली,’’ रश्मि साफ मना करती हुई बोली, ‘‘मैं तो नहीं जाऊंगी.’’

तभी राजेश का भी फोन आया और उस ने भी रश्मि को बताया कि राजन ने उसे व विक्रम को भी मैसेज किया है. सब चलेंगे दावत खाने. रश्मि बोली, ‘‘भई, पहले कन्फर्म कर लो, कहीं अप्रैल फूल तो नहीं बना रहा सब को  मैं तो जाने वाली नहीं.’’

पहली तारीख को सभी इकट्ठे हो रश्मि के घर पहुंच गए और उसे भी चलने को कहने लगे. रश्मि के लाख मना करने के बावजूद वे उसे साथ ले गए. शिखाजा रैस्टोरैंट पहुंच कर सभी राजन का इंतजार करने लगे, लेकिन राजन का कहीं अतापता न था. वेटर 2-3 बार और्डर हेतु पूछ गया था. जब उन्होंने फोन पर राजन से संपर्क किया तो उस का फोन स्विचऔफ आ रहा था. काफी देर इंतजार के बाद उन्होंने रैस्टोरैंट में अपनेअपने हिसाब से और्डर दिया और थोड़ाबहुत खापी कर वापस आ गए. उन्हें न चाहते हुए भी अपनी जेब ढीली करनीपड़ी. जब वे सभी घर पहुंच गए तो राजन का मैसेज सभी के पास आया, ‘‘कैसी रही पार्टी अप्रैल फूल की ’’ सभी अप्रैल फूल बन कर ठगे से रह गए थे. ‘राजन ने हमें अप्रैल फूल बनाया’ सभी सोच रहे थे, ‘और हम लालच में फंस गए.’

रश्मि बारबार उन्हें कोस रही थी, ‘‘मैं तो मना कर रही थी पर तुम ही मुझे ले गए. खुद तो मूर्ख बने मुझे भी बनाया.’’

घर आ कर रश्मि ने अपनी मां को सारी बात बताई और राजन को कोसने लगी. मां ने उस की पूरी बात सुनी और बोलीं, ‘‘कूल रश्मि कूल.’’

‘‘कूल नहीं मां, फूल कहो फूल, हम तो जानतेसमझते मूर्ख बने,’’ रश्मि गुस्से से बोली.

‘‘रश्मि, अगर अप्रैल फूल बने हो तो गुस्सा कैसा  यह दिन तो है ही एकदूसरे को मूर्ख बनाने का. तुम भी तो कई बार झूठमूठ डराती हो मुझे इस दिन. कभी कहती हो तुम्हारी साड़ी पर छिपकली है तो कभी गैस जली छोड़ देने का झूठ. फिर जब मुझे पता चलता है तो तुम गाना गाती हो और मुझे चिढ़ाती हो, ‘अप्रैल फूल बनाया…’

‘‘अगर फूल बन ही गए हो तो कुढ़ने से कुछ होने वाला नहीं. सोचो, कैसे राजन को भी तुम अप्रैल फूल बना सकते हो,’’ मां ने सुझाया. अब रश्मि शांत हो गई और कुछ सोचने लगी. फिर उस ने सभी दोस्तों को फोन कर अपने घर बुलाया और राजन को फूल बनाने की तरकीब सोचने को कहा. सभी राजन को भी मूर्ख बना कर बदला लेना चाहते थे. फिर उन्होंने भी राजन को मूर्ख बनाने की तरकीब सोचनी शुरू की. थोड़ी देर बाद रश्मि ही बोली, ‘‘मेरे दिमाग में एक आइडिया आया है. हम राजन को कूल फूल बनाएंगे. उस ने हमें फोन पर एसएमएस कर मूर्ख बनाया है, हम भी उसे फोन के जरिए मूर्ख बनाएंगे. सुनो…’’ कहते हुए उस ने अपनी योजना बताई.

शाम को राजन घर के अहाते में फोन पर बातचीत कर रहा था. उस की बाइक आंगन में खड़ी थी. तभी रश्मि उस के घर पहुंची. उसे देखते ही राजन बोला, ‘‘आओआओ रश्मि, कैसे आना हुआ ’’ रश्मि सोफे पर बैठते हुए बोली, ‘‘वाह राजन, आज तो तुम ने सभी को अच्छा मूर्ख बनाया. अच्छा हुआ मैं तो गई ही नहीं थी,’’ उस ने झूठ बोला.

‘‘अरे भई, तुम्हारी पार्टी तो ड्यू है ही. यह तो वैसे ही मैं ने मजाक किया था. बैठो, मैं तुम्हारे लिए कुछ खाने को लाता हूं,’’ कह कर राजन घर के अंदर गया. वह अपना फोन मेज पर ही छोड़ गया था. रश्मि तो थी ही मौके की तलाश में. उस ने झट से राजन का फोन उठाया और भाग कर आंगन में जा कर राजन की बाइक का फोटो खींच कर उसी के फोन से ओएलएक्स डौट कौम पर बेचने के लिए डाल दिया. कीमत भी सिर्फ 10 हजार रुपए रखी. फिर वापस वैसे ही फोन रख दिया. राजन रश्मि के लिए खानेपीने को लाया. रश्मि ने 2 बिस्कुट लिए और बोली, ‘‘चलती हूं, तुम्हें फूल डे की कूल शुभकामनाएं. अच्छा है अभी तक तुम्हें किसी ने फूल नहीं बनाया और तुम ने सब दोस्तों को एकसाथ बना दिया,’’ और मुसकराती हुई चल दी.

अभी रश्मि घर के गेट तक ही पहुंची थी कि राजन के मोबाइल की घंटी बज उठी, ‘‘आप अपनी बाइक बेचना चाहते हैं न, मैं खरीदना चाहता हूं क्या अभी आ जाऊं ’’

‘‘क्या ’’ राजू सकपकाता हुआ बोला, ‘‘कौन हैं आप  किस ने कहा कि मैं ने अपनी बाइक बेचनी है. अरे, अभी चार दिन पहले ही तो खरीदी है मैं ने. मैं क्यों बेचूंगा ’’ कहते हुए उस ने फोन काट दिया. रश्मि अपनी योजना सफल होती देख मुसकराई और तेजी से घर की ओर चल दी. गुस्से में राजन ने फोन काटा ही था कि एक एसएमएस आ गया. ‘मैं आप की बाइक खरीदने में इंट्रस्टेड हूं. आप के घर आ जाऊं ’ राजन इस अनजान बात से बहुत आहत हुआ. आखिर थोड़ी ही देर में ऐसा क्या हुआ कि इतने फोन व एसएमएस आने लगे. उस ने तो कुछ भी ओएलएक्स पर नहीं डाला. उस के पास अब लगातार एसएमएस और फोन आ रहे थे. वह अभी एसएमएस के बारे में सोच ही रहा था कि तभी एक एसएमएस आया. वह मैसेज देखना नहीं चाहता था. लेकिन उस ने स्क्रीन पर देखा तो चौंका, मैसेज रश्मि का था.

‘अरे, रश्मि का मैसेज,’ सोच उस ने जल्दी से इनबौक्स में देखा तो पढ़ कर दंग रह गया. लिखा था, ‘क्यों, कैसा रहा हमारा रिटर्न अप्रैल फूल बनाना. तुम ने हमें रैस्टोरैंट में बुला कर फूल बनाया और हम ने तुम्हें तुम्हारे ही घर आ कर.’ राजन का गुस्सा सातवें आसमान पर था. उस ने आननफानन में बाइक उठाई और रश्मि के घर चल दिया. रश्मि के घर पहुंचा तो उस के घर सभी दोस्तों को इकट्ठा देख कर दंग रह गया. फिर तमतमाता हुआ बोला, ‘‘तुम मुझे मूर्ख समझते हो. मुझे फूल बनाते हो.’’

‘‘कूल बच्चे कूल. हम ने तुम्हें फूल बनाया है इसलिए गुस्सा थूक दो और सोचो तुम ने हमें रैस्टोरैंट में एकत्र कर मूर्ख नहीं बनाया क्या. तब हमें कितना गुस्सा आया होगा ’’

‘‘हां, पर तुम ने तो मेरी प्यारी बाइक ही बिकवाने की प्लानिंग कर दी.’’

तभी सभी दोस्त हाथ जोड़ कर खड़े हो गए और बोले, ‘‘कूल यार कूल… हमारा मकसद तुम्हें गुस्सा दिलाना नहीं था बल्कि तुम्हें एहसास दिलाना था कि तुम ऐसी हरकत न करो. पिछले साल भी तुम ने मूर्ख दिवस पर पार्टी रख हमें मूर्ख बनाया था. तब तो हम तुम्हारा बहाना भी सच मान गए थे पर इस बार फिर तुम ने ऐसा किया… क्या हम हर्ट नहीं होते ’’ ‘‘हां, लेकिन तुम ने यह सब किया कैसे  मैं तो तुम से पूरे दिन मिला भी नहीं,’’ राजन ने दोस्तों से पूछा.

‘‘तुम नहीं मिले तो क्या. रश्मि तो मिली थी तुम्हें तुम्हारे घर पर,’’ सरिता बोली.

फिर रश्मि ने उसे सारी बात बता दी. ‘‘रश्मि तुम…’’ दांत भींचता हुआ राजन अभी बोला ही था कि अंदर से रश्मि की मां पकौडे़ की प्लेट लेती हुई आईं और बोलीं, ‘‘कूल…फूल…कूल. इस तरह झगड़ते नहीं. अगर मजाक करते हो तो मजाक सहना भी सीखो. मुझे रश्मि ने सब बता दिया है. आओ, पकौड़े खाओ. मैं चाय लाती हूं,’’ कहती हुई मां किचन की ओर मुड़ गईं.

‘‘आंटी, आप भी मुझे फूल कह रही हैं,’’ राजन आगे कुछ बोलता इस से पहले ही रश्मि ने उस के मुंह में पकौड़ा ठूंस दिया और बोली, ‘‘कूल यार फूल… कूल.’’ यह देख सब हंसने लगे और ठहाकों के बीच पकौड़े खाते पार्टी का आनंद उठाने लगे. राजन पकौड़े खातेखाते अपने फोन से बाइक का स्टेटस डिलीट करने लगा.

Winter Skin Care : कैसी हो सर्दियों की सनस्क्रीन

Winter Skin Care : विंटर में धूप में बैठना सभी को अच्छा लगता है, लेकिन इस मीठीमीठी धूप के लालच में हम अपनी स्किन के साथ खिलवाड़ कर बैठते हैं, जिस की वजह से स्किन को सूर्य की हानिकारक अल्ट्रावायलेट रेज का सामना करना पड़ता है और वह बेजान और रफ लगने लगती है. इसलिए जरूरत है विंटर में भी स्किन को यूवी किरणों से बचाने की. तो आइए जानते हैं कि इस दौरान कौनकौन से प्रोडक्ट्स इस्तेमाल करें ताकि स्किन विंटर के मौसम का भी मजा ले सके और उसे कोई नुकसान भी न पहुंचे.

ग्रीनबेरी और्गैनिक्स सनस्क्रीन स्प्रे लोशन

इस लोशन में एसपीएफ होने के कारण यह स्किन को विंटर्स की सूर्य की तेज किरणों से बचाने का काम करता है. इसे नैचुरल ऐंटीऔक्सीडैंट्स व कीवी ऐक्सट्रैक्ट से बनाया  जाता है, जो फ्रीरैडिकल्स से स्किन को प्रोटैक्ट करने के साथसाथ स्किन सैल्स को नैचुरली हाइड्रेट करने का काम भी करते हैं. यह पैराबेन व सल्फेट फ्री भी है. यह लोशन खासतौर से ड्राई स्किन को ध्यान में रख कर बनाया जाता है.

न्यूट्रोजेना हाइड्रो बूस्ट सनस्क्रीन

यह सनस्क्रीन हाइड्रो बूस्ट फौर्मूला से लैस है, जिस में ह्यालूरोनिक ऐसिड और ग्लिसरीन जैसे पावरफुल इन्ग्रीडिएंट्स होते हैं. यह एक विंटर की शुष्क हवा से स्किन को प्रोटैक्ट करने का काम करता है. इस में हाइड्रो बूस्ट एसपीएफ फौर्मूला स्किन को यूवी प्रोटैक्शन देने का भी काम करता है. स्किन को विंटर्स में ऐक्स्ट्रा प्रोटैक्शन देने के लिए अगर आप हुमेक्टैंट्स युक्त सीरम के बाद इस सनस्क्रीन को अप्लाई करती हैं, तो यह आप की स्किन को प्रोटैक्ट करने के साथसाथ हैल्दी, सौफ्ट व स्मूद भी बनाने का काम करता है. इस सनस्क्रीन की खास बात यह है कि यह सभी स्किन टाइप पर सूट करेगा.

द बौडी शौप विटामिन ई

मौइस्चराइजिंग क्रीम: विंटर्स में यह विटामिन ई युक्त क्रीम स्किन को हाइड्रेट रखने का काम तो करती ही है, साथ ही यह स्किन को फुल प्रोटैक्शन भी देती है. असल में इस का ह्यालूरोनिक ऐसिड युक्त फौर्मूला स्किन को ऐक्स्ट्रा हाइड्रेशन देने के साथसाथ इस में ऐंटीऔक्सीडैंट रिच रैस्पबेरी ऐक्सट्रैक्ट स्किन को ऐक्सफौलिएट करने के साथसाथ सुपर स्मूद बनाने में भी मदद करता है. इस में विटामिन ई की खूबियां स्किन को यूवी प्रोटैक्शन से बचाने के साथ स्किन टैन, डार्क पैचैज और रिंकल्स से बचाने में मदद भी करती हैं.

बोटनिका विटामिन सी सनस्क्रीन

इस में विटामिन सी और एसपीएफ दोनों होने के कारण यह स्किन के लिए काफी मैजिक का काम करता है. इस का क्विक स्किन अब्सौर्बिंग फौर्मूला स्किन की लेयर्स में डीपली जा कर उसे स्मूद बनाने के साथसाथ उसे पूरे दिन सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाने का भी काम करता है. इस में जिंक और टाइटेनियम औक्साइड होने के साथ यह स्किन के पीएच लैवल को बैलेंस में बनाने का काम करता है. चाहे आप को पूरा दिन बीच पर बैठ कर ऐंजौय करना हो या फिर विंटर्स में धूप का मजा लेना हो, यह परफैक्ट सनस्क्रीन है.

अल्ट्रा रिपेयर प्योर मिनरल

सनस्क्रीन मौइस्चराइजर: जहां विंटर का मौसम दिल को छू जाता है, वहीं अगर इस मौसम में स्किन की प्रौपर केयर नहीं की जाती है तो स्किन रैड, ड्राई, फ्लैकी होने के साथसाथ कई बार स्किन टैन की भी समस्या हो जाती है. ऐसे में इस सनस्क्रीन युक्त मौइस्चराइजर में ओटमील की खूबियां होने के कारण यह स्किन पर इचिंग व जलन से तो बचाने का काम करता ही है, साथ ही स्किन पर डैड स्किन सैल्स, औयल को भी रिमूव करने का काम करता है. इस का यूवी ब्लौकर फौर्मूला सन प्रोटैक्शन दे कर स्किन को मौइस्चराइज करने के साथसाथ ग्लोइंग बनाने का भी काम करता है.

केटाफिल 30 एसपीएफ मौइस्चराइजर

यह 30 एसपीएफ वाला फेशियल मौइस्चराइजर स्किन पर ग्लो देने के साथसाथ स्किन की हर लेयर को प्रोटैक्शन देने का भी काम करता है. इस की खास बात यह है कि इस में ओलियोसम टैक्नोलौजी का इस्तेमाल किया गया है, जिस में सनस्क्रीन फिल्टर्स का कम इस्तेमाल होने के कारण यह स्किन को बिना इरिटेट करे सुपर हाइड्रेट करने का काम करता है. यह सैंसिटिव स्किन के लिए एकदम परफैक्ट है.

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