Love Story 2026 : इंद्रधनुष

Love Story 2026 : ‘‘वाह, आज तो आप सचमुच बिजली गिरा रही हैं. नई साड़ी है क्या?’’ ऋचा को देखते ही गिरीश मुसकराया.

‘‘न तो यह नई साड़ी है और न ही मेरा किसी पर बिजली गिराने का इरादा है,’’ ऋचा रूखेपन से बोली, जबकि उस ने सचमुच नई साड़ी पहनी थी.

‘‘आप को बुरा लगा हो तो माफी चाहता हूं, पर यह रंग आप पर बहुत फबता है. फिर आप की सादगी में जो आकर्षण है वह सौंदर्य प्रसाधनों से लिपेपुते चेहरों में कहां. मैं तो मां से हमेशा आप की प्रशंसा करता रहता हूं. वह तो मेरी बातें सुन कर ही आप की इतनी बड़ी प्रशंसक हो गई हैं कि आप के मातापिता से बातें करने, आप के यहां आना चाहती थीं, पर मैं ने ही मना कर दिया. सोचा, जब तक आप राजी न हो जाएं, आप के मातापिता से बात करने का क्या लाभ है.’’

गिरीश यह सब एक ही सांस में बोलता चला गया था और ऋचा समझ न सकी थी कि उस की बातों का क्या अर्थ ले, ‘अजीब व्यक्ति है यह. कितनी बार मैं इसे जता चुकी हूं कि मेरी इस में कोई रुचि नहीं है.’ सच पूछो तो ऋचा को पुरुषों से घृणा थी, ‘वे जो भी करेंगे, अपने स्वार्थ के लिए. पहले तो मीठीमीठी बातें करेंगे, पर बाद में यदि एक भी बात मनोनुकूल न हुई तो खुद ही सारे संबंध तोड़ लेंगे,’ ऋचा इसी सोच के साथ अतीत की गलियों में खो गई.

तब वह केवल 17 वर्ष की किशोरी थी और अनुपम किसी भौंरे की तरह उस के इर्दगिर्द मंडराया करता था. खुद उस की सपनीली आंखों ने भी तो तब जीवन की कैसी इंद्रधनुषी छवि बना रखी थी. जागते हुए भी वह स्वप्नलोक में खोई रहती थी.

उस दिन अनुपम का जन्मदिन था और उस ने बड़े आग्रह से ऋचा को आमंत्रित किया था. पर घर में कुछ मेहमान आने के कारण उसे घर से रवाना होने में ही कुछ देर हो गई थी. वह जल्दी से तैयार हुई थी. फिर उपहार ले कर अनुपम के घर पहुंच गई थी. पर वह दरवाजे पर ही अपना नाम सुन कर ठिठक गई थी.

‘क्या बात है, अब तक तुम्हारी ऋचा नहीं आई?’ भीतर से अनुपम की दीदी का स्वर उभरा था.

‘मेरी ऋचा? आप भी क्या बात करती हैं, दीदी. बड़ी ही मूर्ख लड़की है. बेकार ही मेरे पीछे पड़ी रहती है. इस में मेरा क्या दोष?’

‘बनो मत, उस के सामने तो उस की प्रशंसा के पुल बांधते रहते हो,’ अब उस की सहेली का उलाहना भरा स्वर सुनाई दिया.

‘वह तो मैं ने विवेक और विशाल से शर्त लगाई थी कि झूठी प्रशंसा से भी लड़कियां कितनी जल्दी झूम उठती हैं,’ अनुपम ने बात समाप्त करतेकरते जोर का ठहाका लगाया था.

वहां मौजूद लोगों ने हंसी में उस का साथ दिया था.

पर ऋचा के कदम वहीं जम कर रह गए थे.‘आगे बढ़ू या लौट जाऊं?’ बस, एकदो क्षण की द्विविधा के बाद वह लौट आई थी. वह अपने कमरे में बंद हो कर फूटफूट कर रो पड़ी थी.

कुछ दिनों के लिए तो उसे सारी दुनिया से ही घृणा हो गई थी. ‘यह मतलबी दुनिया क्या सचमुच रहने योग्य है?’ ऋचा खुद से ही प्रश्न करती. पर धीरेधीरे उस ने अपनेआप को संयत कर लिया था. फिर अनुपम प्रकरण को वह दुस्वप्न समझ कर भूल गई थी. उस घटना को 1 वर्ष भी नहीं बीता था कि घर में उस के विवाह की चर्चा होने लगी. उस ने विरोध किया और कहा, ‘मैं अभी पढ़ना चाहती हूं.’

‘एकदो नहीं पूरी 4 बहनें हो. फिर तुम्हीं सब से बड़ी हो. हम कब तक तुम्हारी पढ़ाई समाप्त करने की प्रतीक्षा करते रहेंगे?’ मां ने परेशान हो कर प्रश्न किया था. ‘क्या कह रही हो, मां? अभी तो मैं बी.ए. में हूं.’ ‘हमें कौन सी तुम से नौकरी करवानी है. अब जो कुछ पढ़ना है, ससुराल जा कर पढ़ना,’  मां ने ऐसे कहा, मानो एकदो दिन में ही उस का विवाह हो जाएगा.

ऋचा ने अब चुप व तटस्थ रह कर पढ़ाई में मन लगाने का निर्णय किया. पर जब हर तीसरेचौथे दिन वर पक्ष के सम्मुख उस की नुमाइश होती, ढेरों मिठाई व नमकीन खरीदी जाती, सबकुछ अच्छे से अच्छा दिखाने का प्रयत्न होता, तब भी बात न बनती.

इस दौरान ऋचा एम.ए. प्रथम वर्ष में पहुंच गई थी. उस ने कई बार मना भी किया कि वरों की उस नीलामी में बोली लगाने की उन की हैसियत नहीं है. पर हर बार मां का एक ही उत्तर होता, ‘तुम सब अपनी घरगृहस्थी वाली हो जाओ, और हमें क्या चाहिए.’

‘पर मां, ‘अपने घर’ की दहलीज लांघने का मूल्य चुकाना क्या हमारे बस की बात है?’ मां से पूछा था ऋचा ने. ‘अभी बहुत भले लोग हैं इस संसार में, बेटी.’ ‘ऋचा, क्यों अपनी मां को सताती हो तुम? कोशिश करना हमारा फर्ज है. फिर कभी न कभी तो सफलता मिलेगी ही,’ पिताजी मां से उस की बातचीत सुन कर नाराज हो उठे तो वह चुप रह गई थी.

पर एक दिन चमत्कार ही तो हो गया था. पिताजी समाचार लाए थे कि जो लोग ऋचा को आखिरी बार देखने आए थे, उन्होंने ऋचा को पसंद कर लिया था.

एक क्षण को तो ऋचा भी खुशी के मारे जड़ रह गई, पर वह प्रसन्नता उस वक्त गायब हो गई जब पिताजी ने दहेजटीका की रकम व सामान की सूची दिखाई. ऋचा निराश हो कर शून्य में ताकती बैठी रह गई थी.‘25 हजार रुपए नकद और उतनी ही रकम का सामान. कैसे होगा यह सब. 3 और छोटी बहनें भी तो हैं,’ उस के मुंह से अनायास ही निकल गया था.

‘जब उन का समय आएगा, देखा जाएगा,’ मां उस का विवाह संबंध पक्का हो जाने से इतनी प्रसन्न थीं कि उस के आगे कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थीं. जब मां ने अजित को देखा तो वह निहाल ही हो गईं, ‘कैसा सुंदरसजीला दूल्हा मिला है तुझे,’ वह ऋचा से बोलीं.

पर वर पक्ष की भारी मांग को देखते हुए ऋचा चाह कर भी खुश नहीं हो पा रही थी.

धीरेधीरे अजित घर के सदस्य जैसा ही होता जा रहा था. लगभग तीसरेचौथे दिन बैंक से लौटते समय वह आ जाता. तब अतिविशिष्ट व्यक्ति की भांति उस का स्वागत होता या फिर कभीकभी वे दोनों कहीं घूमने के लिए निकल जाते.

‘मुझे तो अपनेआप पर गर्व हो रहा है,’ उस दिन रेस्तरां में बैठते ही अजित, ऋचा से बोला.

‘रहने दीजिए, क्यों मुझे बना रहे हैं?’ ऋचा मुसकराई.

‘क्यों, तुम्हें विश्वास नहीं होता क्या? ऐसी रूपवती और गुणवती पत्नी बिरलों को ही मिलती है. मैं ने तो जब पहली बार तुम्हें देखा था तभी समझ गया था कि तुम मेरे लिए ही बनी हो,’ अजित अपनी ही रौ में बोलता गया.

ऋचा बहुत कुछ कहना चाह रही थी, पर उस ने चुप रहना ही बेहतर समझा था. जब अजित ने पहली ही नजर में समझ लिया था कि वह उस के लिए ही बनी है तो फिर वह मोलभाव किस लिए. कैसे दहेज की एकएक वस्तु की सूची बनाई गई थी. घर के छोटे से छोटे सदस्य के लिए कपड़ों की मांग की गई थी.

ऋचा के मस्तिष्क में विचारों का तूफान सा उठ रहा था. पर वह इधरउधर देखे बिना यंत्रवत काफी पिए जा रही थी.

तभी 2 लड़कियों ने रेस्तरां में प्रवेश किया. अजित को देखते ही दोनों ने मुसकरा कर अभिवादन किया और उस की मेज के पास आ कर खड़ी हो गईं.

‘यह ऋचा है, मेरी मंगेतर. और ऋचा, यह है उमा और यह राधिका. हमारी कालोनी में रहती हैं,’ अजित ने ऋचा से उन का परिचय कराया.

‘चलो, तुम ने तो मिलाया नहीं, आज हम ने खुद ही देख लिया अपनी होने वाली भाभी को,’ उमा बोली.

‘बैठो न, तुम दोनों खड़ी क्यों हो?’ अजित ने औपचारिकतावश आग्रह किया.

‘नहीं, हम तो उधर बैठेंगे दूसरी मेज पर. हम भला कबाब में हड्डी क्यों बनें?’

राधिका हंसी. फिर वे दोनों दूसरी मेज की ओर बढ़ गईं.

‘राधिका की मां, मेरी मां की बड़ी अच्छी सहेली हैं. वह उस का विवाह मुझ से करना चाहती थीं. यों उस में कोई बुराई नहीं है. स्वस्थ, सुंदर और पढ़ीलिखी है. अब तो किसी बैंक में काम भी करती है. पर मैं ने तो साफ कह दिया था कि मुझे चश्मे वाली पत्नी नहीं चाहिए,’ अजित बोला.

‘क्या कह रहे हैं आप? सिर्फ इतनी सी बात के लिए आप ने उस का प्रस्ताव ठुकरा दिया? यदि आप को चश्मा पसंद नहीं था तो वह कांटेक्ट लैंस लगवा सकती थीं,’ ऋचा हैरान स्वर में बोली.

‘बात तो एक ही है. चेहरे की तमाम खूबसूरती आंखों पर ही तो निर्भर करती है, पर तुम क्यों भावुक होती हो. मुझे तो तुम मिलनी थीं, फिर किसी और से मेरा विवाह कैसे होता?’ अजित ने ऋचा को आश्वस्त करना चाहा.

कुछ देर तो ऋचा स्तब्ध बैठी रही. फिर वह ऐसे बोली, मानो कोई निर्णय ले लिया हो, ‘आप से एक बात कहनी थी.’

‘कहो, तुम्हारी बात सुनने के लिए तो मैं तरस रहा हूं. पर तुम तो कुछ बोलती ही नहीं. मैं ही बोलता रहता हूं.’

‘पता नहीं, मांपिताजी ने आप को बताया है या नहीं, पर मैं आप को अंधेरे में नहीं रख सकती. मैं भी कांटेक्ट लैंसों का प्रयोग करती हूं,’ ऋचा बोली.

‘क्या?’

पर तभी बैरा बिल ले आया. अजित ने बिल चुकाया और दोनों रेस्तरां से बाहर निकल आए. कुछ देर दोनों इस तरह चुपचाप साथसाथ चलते रहे, मानो कहने को उन के पास कुछ बचा ही न हो.

‘मैं अब चलूंगी. घर से निकले बहुत देर हो चुकी है. मां इंतजार करती होंगी,’  वह घर की ओर रवाना हो गई.

कुछ दिन बाद-

‘क्या बात है, ऋचा? अजित कहीं बाहर गया है क्या? 3-4 दिन से आया ही नहीं,’ मां ने पूछा.

‘पता नहीं, मां. मुझ से तो कुछ कह नहीं रहे थे,’ ऋचा ने जवाब दिया.

‘बात क्या है, ऋचा? परसों तेरे पिताजी विवाह की तिथि पक्की करने गए थे तो वे लोग कहने लगे कि ऐसी जल्दी क्या है. आज फिर गए हैं.’

‘इस में मैं क्या कर सकती हूं, मां. वह लड़के वाले हैं. आप लोग उन के नखरे उठाते हैं तो वे और भी ज्यादा नखरे दिखाएंगे ही,’ ऋचा बोली.

‘क्या? हम नखरे उठाते हैं लड़के वालों के? शर्म नहीं आती तुझे ऐसी बात कहते हुए?  कौन सा विवाह योग्य घरवर होगा जहां हम ने बात न चलाई हो. तब कहीं जा कर यहां बात बनी है. तुम टलो तो छोटी बहनों का नंबर आए मां की वर्षों से संचित कड़वाहट बहाना पाते ही बह निकली.

ऋचा स्तब्ध बैठी रह गई. अपने ही घर में क्या स्थिति थी उस की? मां के लिए वह एक ऐसा बोझ थी, जिसे वह टालना चाहती थी. अपना घर? सोचते हुए उस के होंठों पर कड़वाहट रेंग आई, ‘अपना घर तो विवाह के बाद बनेगा, जिस की दहलीज पार करने का मूल्य ही एकडेढ़ लाख रुपए है. कैसी विडंबना है, जहां जन्म लिया, पलीबढ़ी न तो यह घर अपना है, न ही जहां गृहस्थी बसेगी वह घर अपना है.’

जाने और कितनी देर ऋचा अपने ही खयालों में उलझी रहती यदि पिताजी का करुण चेहरा और उस से भी अधिक करुण स्वर उसे चौंका न देता, ‘क्या बात है, ऋचा? हम तुम्हारी भलाई के लिए कितने प्रयत्न करते हैं, पर पता नहीं क्यों तुम अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने पर तुली रहती हो.’

‘क्या हुआ, पिताजी?’ ऋचा हैरान स्वर में पूछने लगी.

‘तुम्हें अजित से यह कहने की क्या जरूरत थी कि तुम कांटेक्ट लैंसों का प्रयोग करती हो?’

‘मैं ने जानबूझ कर नहीं कहा था, पिताजी. ऐसे ही बात से बात निकल आई थी. फिर मैं ने छिपाना ठीक नहीं समझा.’

‘तुम नहीं जानतीं, तुम ने क्या कह दिया. अब वे लोग कह रहे हैं कि हम ने यह बात छिपा कर उन्हें अंधेरे में रखा,’ पिताजी दुखी स्वर में बोले.

‘पर विवाह तो निश्चित हो चुका है, सगाई हो चुकी है. अब उन का इरादा क्या है?’ मां ने परेशान हो कर पूछा था, जो जाने कब वहां आ कर खड़ी हो गई थीं.

‘कहते हैं कि वे हमारी छोटी बेटी पूर्णिमा को अपने घर की बहू बनाने को तैयार हैं. पर मैं ने कहा कि बड़ी से पहले छोटी का विवाह हो ऐसी हमारे घर की रीति नहीं है. फिर भी घर में सलाह कर के बताऊंगा. लेकिन बताना क्या है, हमारी बेटियों को क्या उन्होंने पैर की जूतियां समझ रखा है कि अगर बड़ी ठीक न आई तो छोटी पहन ली,’  वह क्रोधित स्वर में बोले.

‘इस में इतना नाराज होने की बात नहीं है, पिताजी. यदि उन्हें पूर्णिमा पसंद है तो आप उस का विवाह कर दीजिए. मैं तो वैसे भी पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं,’ ऋचा ने क्षणांश में ही मानो निर्णय ले लिया.

कुछ देर सब चुप खड़े रहे, मानो कहने को कुछ बचा ही न हो.

‘ऋचा ठीक कहती है. अधिक भावुक होने में कुछ नहीं रखा है. इतनी ऊंची नाक रखोगे तो ये सब यहीं बैठी रह जाएंगी,’ मां ने अपना निर्णय सुनाया.

फिर तो एकएक कर के 8 वर्ष बीत गए थे. उस से छोटी तीनों बहनों के विवाह हो गए थे. ऋचा भी पढ़ाई समाप्त कर के कालिज में व्याख्याता हो गई थी. पिताजी भी अवकाश ग्रहण कर चुके थे.

अब तो वह विवाह के संबंध में सोचती तक नहीं थी. पर गिरीश ने अपने   व्यवहार से मानो शांत जल में कंकड़ फेंक दिया था. अब अतीत को याद कर के वह बहुत अशांत हो उठी थी.

‘‘अरे दीदी, यहां अंधेरे में क्यों बैठी हो? बत्ती भी नहीं जलाई. नीचे मां तुम्हें बुला रही हैं. तुम्हारे कालिज के कोई गिरीश बाबू अपनी मां के साथ आए हैं. अरे, तुम तो रो रही हो. तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’ ऋचा की छोटी बहन सुरभि ने आ कर कहा.

‘‘नहीं, रो नहीं रही हूं. ऐसे ही कुछ सोच रही थी. तू चल, मैं आ रही हूं,’’ ऋचा अपने आंसू पोंछते हुए बोली.

ड्राइंगरूम में पहुंची तो एकाएक सब की निगाहें उस की ओर ही उठ गईं.

‘‘आप की बेटी ही पहली लड़की है, जिसे देख कर गिरीश ने विवाह के लिए हां की है. नहीं तो यह तो विवाह के लिए हां ही नहीं करता था,’’ ऋचा को देखते ही गिरीश की मां बोलीं.

‘‘आप ने तो हमारा बोझ हलका कर दिया, बहनजी. इस से छोटी तीनों बहनों का विवाह हो चुका है. मुझे तो दिनरात इसी की चिंता लगी रहती है.’’

ऋचा के मां और पिताजी अत्यंत प्रसन्न दिखाई दे रहे थे.

‘तो मुझ से पहले ही निर्णय लिया जा चुका है?’ ऋचा ने बैठते हुए सोचा. वह कुछ कहती उस से पहले ही गिरीश की मां और उस के मातापिता उठ कर बाहर जा चुके थे. बस, वह और गिरीश ड्राइंगरूम में रह गए थे.

‘‘एक बात पूछूं, आप कभी हंसती- मुसकराती भी हैं या यों ही मुंह फुलाए रहती हैं?’’ गिरीश ने नाटकीय अंदाज में पूछा.

‘‘मैं भी आप से एक बात पूछूं?’’ ऋचा ने प्रश्न के उत्तर में प्रश्न कर दिया, ‘‘आप कभी गंभीर भी रहते हैं या यों ही बोलते रहते हैं?’’

‘‘चलिए, आज पता चल गया कि आप बोलती भी हैं. मैं तो समझा था कि आप गूंगी हैं. पता नहीं, कैसे पढ़ाती होंगी. मैं सचमुच बहुत बोलता हूं. अब क्या करूं, बोलने का ही तो खाता हूं. पर मैं इतना बुरा नहीं हूं जितना आप समझती हैं,’’ गिरीश अचानक गंभीर हो गया.

‘‘देखिए, आप अच्छे हों या बुरे, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. पुरुषों में तो मुझे विशेष रूप से कोई रुचि नहीं है.’’

‘‘आप के अनुभव निश्चय ही कटु रहे होंगे. पर जीवन में किसी न किसी पर विश्वास तो करना ही पड़ता है. आप एक बार मुझ पर विश्वास तो कर के देखिए,’’ गिरीश मुसकराया.

‘‘ठीक है, पर मैं आप को सबकुछ साफसाफ बता देना चाहती हूं. मैं कांटेक्ट लैंसों का प्रयोग करती हूं. दहेज में देने के लिए मेरे पिताजी के पास कुछ नहीं है,’’ ऋचा कटु स्वर में बोली.

‘‘हम एकदूसरे को समस्त गुणों व अवगुणों के साथ स्वीकार करेंगे, ऋचा. फिर इन बातों का तो कोई अर्थ ही नहीं है. मैं तुम्हें 3 वर्षों से देखपरख रहा हूं. मैं ने यह निर्णय एक दिन में नहीं लिया है. आशा है कि तुम मुझे निराश नहीं करोगी.’’

गिरीश की बातों को समझ कर ऋचा खामोश रह गई. इतनी समझदारी की बातें तो आज तक उस से किसी ने नहीं कही थीं. फिर उस के नेत्र भर आए.

‘‘क्या हुआ?’’ गिरीश ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘कुछ नहीं, ये तो प्रसन्नता के आंसू हैं,’’ ऋचा ने मुसकराने की कोशिश की. उसे लगा कि आंसुओं के बीच से ही दूर क्षितिज पर इंद्रधनुष उग आया है.

 

Technology औरतों के लिए वरदान नहीं

Technology : अगर अमेरिका से इम्मीग्रैंट्स को भगाया जा रहा है तो इसलिए कि अब अमेरिकियों को मालूम है कि वे टैक्नोलौजी के सहारे बिना काले, पीले, भूरे, विधर्मी, कट्टरों के अपना काम चला सकते हैं. अब टैक्सियों को ही लें. अमेरिका में ज्यादातर टैक्सी ड्राइवर इम्मीग्रैंट्स हैं. कुछ तो जाली डौक्यूमैंट्स के सहारे टैक्सी चला रहे हैं तो कुछ स्टूडैंट्स हैं या कहीं और काम करने वाले हैं जो एडिशनल इनकम के लिए टैक्सियां भी चलाते हैं.

अमेरिका में राइड हेलिंग का बिजनैस 50 अरब डौलर का है. इस में ज्यादा खर्च ड्राइवरों का है. उबेर जैसी कंपनियों का 50% से 70% खर्च ड्राइवरों का होता है जो विदेशियों के हाथों में है और अमेरिकी गोरे मागा नहीं चाहते कि वे अपने रंग से उन के गंदे रंग को गंदा करें. अगर 50 अरब डौलर के धंधे को टैक्नोलौजी मिल जाए तो बिना ड्राइवर वाली रोबो टैक्सियां चलाएं तो वे सस्ती ही नहीं होंगी, ये सुबहसुबह किसी काले, भूरे, एशियाई को देखने से भी बचाएंगी.

अमेरिकी वैसे तो हमेशा से रंगभेद के समर्थक रहे हैं. रेसिज्म वहां तब से चालू हो गया था जब अमेरिका के डैवलपमैंट में काले गुलाम मिलने लगे थे जिन्हें जानवरों से भी बदतर हालत में रखा जाता था, ठीक वैसे ही जैसे भारत मेें सवर्ण अपने ओबीसी और एससी को रखते हैं. जैसे हमारे यहां ओबीसी और एससी बराबर का हक मांग रहे हैं वैसे ही अमेरिका में इम्मीग्रैंट्स 10-15 साल रहने के बाद अपना हक मांगने लगते हैं. काले स्लेव जो 400 साल पहले लाए गए थे अब नागरिक हैं पर फिर भी दूसरे दरजे के हैं. काले बराक ओबामा प्रैसिडैंट बन चुके हैं. कमला हैरिस प्रैसिडैंट का चुनाव बालबाल हारी हैं पर फिर भी उन्हें सोशल या इकौनोमिक इक्वैलिटी नहीं मिली है. टैक्नोलौजी से गोरे चर्च की हैल्प से इन कालों को काबू में रखेंगे, औरतों को कंट्रोल में रखेंगे और इम्मीग्रैंट्स को भगा देंगे.

अभी औटोमैटिक ड्राइवर के बिना रोबो टैक्सी की कीमत 7 से 9 डौलर प्रति किलोमीटर यानी 700-800 रुपए है जबकि ड्राइवर वाली सभी खर्चे समेत 175 से 275 रुपए प्रति किलोमीटर और खुद चलाओ तो 70-80 रुपए प्रति किलोमीटर पड़ती है पर जैसेजैसे टैक्नोलौजी डैवलप होगी, रोबो टैक्सियां सस्ती होने लगेंगी.

अमेरिकी औरतें चाहें गोरी हों या रंग वाली इस से भारी नुकसान सहेंगी क्योंकि आज बहुत सी औरतें बच्चों के बड़े होने के बाद टैक्सियां चलाने लगी हैं क्योंकि इस मेें कम स्किल की जरूरत होती है. रोबो टैक्सियां चाहे भारत में आएं या न आएं यह औरतों के लिए नुकसानदेह सौदा साबित होगा. यह भी साजिश है कि औरतें सक्षम न हो सकें. बच्चों के कारण स्कूलकालेज में आगे रहने के बावजूद वे वर्क प्लेस पर पिछड़ जाती हैं और यह बचीखुची जौब भी हाथ से निकल रही है. भारत में ई कौमर्स से किराने की दुकानें जो औरतों ने चलानी शुरू की थीं, हाथ से निकल रही हैं क्योंकि डिलिवरी का काम अभी भी लड़कियों के हाथ में नहीं आया.

टैक्नोलौजी पिछड़े, कम पढ़ेलिखे लोगों, शहर में नए आए युवाओं और औरतों के लिए वरदान होगी, ऐसा नहीं लगता.

Beauty Tips : फेशियल का फायदा चेहरे पर दिखाई नहीं देता, बताएं क्या करूं?

Beauty Tips

सवाल

मैं पार्लर में नियमित फेशियल करवाती हूं. लेकिन फेशियल का फायदा चेहरे पर दिखाई नहीं देता. बताएं क्या करूं?

आप एक बार अपना पार्लर बदल कर देखें. कई बार सही तरीके से स्टैप्स न फौलो करने के कारण भी फेशियल का फायदा चेहरे पर दिखाई नहीं देता. इसलिए इस बार किसी अच्छे कौस्मैटिक क्लीनिक से एएचए फेशियल करवाएं. एएचए यानी अल्फा हाइड्रौक्सी ऐसिड फलों से निकाले गए ऐसिड होते हैं, जो स्किन को रिजनरेट कर के फेयरनैस देता है साथ ही त्वचा को हाइड्रैट कर के उस की ड्रायनेस भी दूर करता है.

घरेलू उपाय के तौर पर औलिव औयल और आमंड औयल में कुछ बूंदें औरेंज औयल की मिक्स कर के फेस पर मसाज करें. ऐसा रोजाना करने से रूखापन कम होगा और रंग भी निखरेगा.

सवाल

मेरे पैरों पर चप्पलों के स्ट्राइप्स के निशान पड़ गए हैं, जो देखने में अच्छे नहीं लगते. क्या इन्हें हटाने का कोई उपाय है?

जवाब

आप की चप्पलें जरूर टाइट होंगी, इसी कारण ऐसा हो रहा है. थोड़ी सी लूज चप्पलें पहनें. इस से पैरों पर निशान नहीं पड़ेंगे. इन निशानों को जल्दी मिटाने के लिए आप स्क्रब भी कर सकती हैं. इस के लिए 2 बड़े चम्मच कैलेमाइन पाउडर में डेढ़ चम्मच ओट्स, टमाटर का पल्प और शहद डाल कर पेस्ट बनाएं और पैरों पर रोजाना स्क्रब करें. कुछ ही दिनों में निशान हलके हो जाएंगे.

15 दिन में एक बार किसी अच्छे ब्यूटी क्लीनिक से पैडीक्योर जरूर करवाएं. इस से डैड स्किन और टैनिंग रिमूव होगी व त्वचा मुलायम हो जाएगी. अगर त्वचा ज्यादा काली पड़ गई है तो पैडीक्योर के साथसाथ ब्लीच भी लगवा लें, क्योंकि टैनिंग को रिमूव करने के लिए ब्लीच बहुत हद तक कारगर है. इस के अलावा घर पर पांवों को साफ करने के लिए आधी बालटी गरम पानी में 1 बड़ा चम्मच शैंपू, 2 चम्मच हाईड्रोजन पैराक्साइड और 1 चम्मच अमोनिया मिलाएं. 10 मिनट तक पैरों को इस पानी में भिगोए रखें और फिर प्यूमिक स्टोन से साफ कर के साफ पानी से धोएं व क्रीम से मसाज कर लें.

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Party Snacks Recipe : पार्टी में लगाना चाहती हैं स्वाद का तड़का, तो नोट करें ये रेसिपी

बाजरा मेथी परांठा

सामग्री

2 कप बाजरे का आटा

1/2 कप मेथी कटी

1 छोटा टुकड़ा अदरक

1 हरीमिर्च कटी

1/4 कप दही

2 छोटे चम्मच तेल

नमक स्वादानुसार.

विधि

बाजरे के आटे को छान लें. अदरक और हरीमिर्च को पीस लें. बाजरे के आटे में पिसा अदरक, हरीमिर्च, मेथी, तेल और नमक डाल कर दही के साथ आटा गूंध लें. इस आटे की लोइयां बना कर रोटियां बना लें. गरम तवे पर तेल लगा कर दोनों तरफ से सेंकें. गरमगरम परांठे सब्जी के साथ परोसें.

‘बेसन की बाटी को ऐसे भी चटपटा बना सकती हैं.’

सामग्री

11/2 कप बेसन

1/2 कप मक्के का आटा

2 बड़े चम्मच घी द्य 1/2 कप पनीर

1 हरीमिर्च कटी

1 बड़ा चम्मच धनियापत्ती कटी

तलने के लिए तेल

नमक स्वादानुसार.

विधि

मक्के के आटे को छान कर बेसन, घी और नमक मिला कर गूंध लें. उबलते पानी में आटे की लोइयां बना कर 8-10 मिनट पकाएं. पानी से निकाल कर अच्छी तरह मसल कर छोटीछोटी बौल्स बनाएं. पनीर को मसल कर उस में धनियापत्ती, हरीमिर्च और नमक मिलाएं. आटे की छोटीछोटी बौल्स के बीच पनीर का मिश्रण भर कर अच्छी तरह बंद कर गरम तेल में सुनहरा होने तक तलें, सरसों के साग के साथ सर्व करें.

‘गोभी को पैटीज के रूप में सर्व करेंगी तो बच्चे भी पसंद करेंगे.’

कौलिफ्लौवर पेटी

सामग्री

1 कप चावल पके

1 कप गोभी कसी

1/4 कप बादाम का पेस्ट

1 प्याज कटा

1/2 चम्मच अदरक बारीक कटा

1 हरीमिर्च कटी

2-3 बड़े चम्मच तेल

नमक स्वादानुसार.

विधि

चावलों को मिक्सी में पीस कर पेस्ट बना लें. अब इस में गोभी, बादाम का पेस्ट, हरीमिर्च, प्याज, अदरक व नमक अच्छी तरह मिला लें. आकार दे कर कटलेट बना गरम तवे पर तेल लगा दोनों तरफ से सुनहरा होने तक पका कर चटनी के साथ गरमगरम परोसें.

‘विंटर सीजन में सरसों के साग को ऐसे भी ट्राई करें.’

सरसों पालक के कटलेट

सामग्री

2 कप पालक कटा द्य  2 कप सरसों कटी

1 छोटा टुकड़ा अदरक द्य 1 हरीमिर्च कटी

2 ब्रैडस्लाइस द्य 1/2 कप पनीर

2 बड़े चम्मच मक्खन द्य  नमक स्वादानुसार.

विधि

पालक और सरसों को स्टीम कर लें. फिर इसे अदरक और हरीमिर्च के साथ मिक्सी में पीस लें. ब्रैडस्लाइस का मिक्सी में चूरा कर लें. फिर ब्रैड चूरा, पनीर, पालक व सरसों का पेस्ट और नमक मिला लें. टिकियां बना कर गरम तवे पर मक्खन के साथ दोनों तरफ से सेंक कर सौस के साथ गरमगरम परोसें.

चावल की बड़ी

सामग्री

1 कप चावल द्य 1 हरीमिर्च,  1/2 कप फूलगोभी कसी

1/2 चम्मच अदरक कसा,  2 बड़े टमाटर द्य 1/4 चम्मच हलदी

1/4 चम्मच जीरा द्य 1 चम्मच धनिया पाउडर,  1/4 चम्मच गरममसाला

1/4 चम्मच लालमिर्च पाउडर द्य चुटकीभर हींग, 1 बड़ा चम्मच घी

तलने के लिए तेल, 1 बड़ा चम्मच धनियापत्ती कटी,  नमक स्वादानुसार.

विधि

चावलों को पानी में 1/2 घंटा भिगो कर महीन पीस लें. फिर इस में अदरक, फूलगोभी, हरीमिर्च और नमक मिला कर अच्छी तरह फेंट लें. कड़ाही में तेल गरम कर मिश्रण की छोटीछोटी बडि़यां बना कर तल लें. एक कड़ाही में घी गरम कर जीरा, हलदी, धनिया पाउडर, लालमिर्च पाउडर और हींग डालें. इस में टमाटरों को मिक्सी में पीस कर डाल अच्छी तरह भून लें. 1 कप पानी और बडि़यां डाल कर 8-10 मिनट हलकी आंच पर पकने दें. फिर धनियापत्ती डाल कर परांठों के साथ परोसें.

‘सीजनल वैजिटेबल्स और पोहा का यह कौंबिनेशन जबरदस्त है.’

वैज पोहा बौल्स

सामग्री

1 कप पोहा , 1-1 बड़ा चम्मच लाल, पीली व हरीमिर्च बारीक कटी, 1 छोटा प्याज बारीक कटा द्य 2 छोटी गाजर कसी द्य 2 बड़े चम्मच कच्चा नारियल कसा, हरीमिर्च बारीक कटी द्य 1 बड़ा चम्मच तेल द्य 1 बड़ा चम्मच गाढ़ा दही, 1/2 चम्मच सरसों द्य करीपत्ता द्य हरीमिर्च कटी द्य नमक स्वादानुसार.

विधि

पोहे को पानी से धो कर छलनी में पानी निकालने के लिए रखें. फिर इस में सभी शिमलामिर्च, प्याज, हरीमिर्च, कच्चा नारियल, गाजर, दही व नमक मिलाएं. अच्छी तरह मिला कर इस की छोटीछोटी बौल्स बनाएं. फिर स्टीमर में 10-12 मिनट स्टीम करें. कड़ाही में तेल गरम कर सरसों डालें. भुनने पर करीपत्ता और हरीमिर्च डाल कर पोहे की बौल्स डाल अच्छी तरह मिलाएं और फिर एक प्लेट में सजा कर चटनी के साथ परोसें.                              द्

Stories : दीक्षा – क्या हुआ था प्राची के साथ

 Stories : प्राची अपने कमरे में बैठी मैथ्यू आरनल्ड की कविता ‘फोरसेकन मरमैन’ पढ़ रही थी. कविता को पढ़ कर प्राची का मन बच्चों के प्रति घोर अशांति से भर उठा. उस के मन में सवाल उठा कि क्या कोई मां इतनी पत्थर दिल भी हो सकती है. वह सोचने लगी कि यदि धर्म का नशा वास्तव में इतना शक्तिशाली है तो उस का तो हंसताखेलता परिवार ही उजड़ जाएगा.

‘नहीं, वह अपने जीतेजी ऐसा कदापि नहीं होने देगी,’ प्राची ने मन ही मन यह फैसला किया कि धर्म के दलदल में फंसे पति को जैसे भी होगा वह वापस निकाल कर लाएगी.

पिछले कुछ महीनों से प्राची को अपने पति साहिल के व्यवहार में बदलाव नजर आने लगा था. कल तक उसे अपनी बांहों में भर कर जो साहिल जीवन के सच को उस की घनी जुल्फों के साए में ढूंढ़ता था आज वह उस से भागाभागा फिरता है.

साहिल अपने दोस्त सुधीर के गुरुजी के प्रवचनों से बेहद प्रभावित था. रहीसही कसर टेलीविजन चैनलों पर दिखाए जाने वाले उपदेशकों के प्रवचनों से पूरी हो गई थी. अब तो साहिल को एक ही धुन सवार थी कि किसी तरह स्वामीजी से दीक्षा ली जाए और इस के लिए साहिल आफिस से निकलते ही सीधा स्वामीजी के पास चला जाता. वहां से आने के बाद वह प्राची सेयह तक नहीं पूछता कि तुम कैसी हो या बेटा अक्षय कैसा है.

रोज की तरह साहिल उस दिन भी रात को 9 बजे घर आया. खाना खाने के बाद सीधे सोने की तैयारी करने लगा. एक सुंदर सी बीवी भी घर में है, इस का उसे कोई एहसास ही नहीं था.

आज प्राची इस स्थिति का सामना करने के लिए तैयार थी. वह एक झटके से उठी और अपना हाथ साहिल के माथे पर रख दिया. इस पर साहिल हड़बड़ा कर उठा और पूछ बैठा, ‘‘क्या कोई काम है?’’

‘‘क्या सिर्फ काम के लिए ही पति और पत्नी का रिश्ता बना है?’’ प्राची ने दुखी स्वर में पूछा और फिर सुबकते हुए बोली, ‘‘तुम ने तो इस सहज स्वाभाविक व रसीले रिश्ते को नीरस बना डाला है. पिछले 2 महीने से तुम ने मेरी इस कदर उपेक्षा की है जैसे कि तुम्हारे जीवन में मेरा कोई स्थान ही नहीं है.

‘‘देखो प्राची, मैं स्वामीजी से

दीक्षा लेना चाहता हूं और इस के लिए उन्होंने मुझे हर प्रकार से शुद्ध रहने

को कहा है….’’

साहिल की बात को बीच में काटते हुए प्राची बोली, ‘‘इसीलिए तुम अपनी पत्नी की अवहेलना कर रहे हो. तुम ने सोचा भी कैसे कि पत्नी की उपेक्षा कर के तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी? मुक्ति की ही चाह थी तो शादी के बंधन में ही क्यों पड़े?’’

प्राची की तल्ख बातें सुन कर साहिल हतप्रभ रह गया. उस ने पत्नी के इस रौद्र रूप की कल्पना भी नहीं की थी. फिर किसी तरह अपने को संभाल कर बोला, ‘‘प्राची, मैं तो बस आत्म अन्वेषण का प्रयास कर रहा था. मैं तुम्हें छोड़ने की बात सोच भी नहीं सकता.’’

‘‘ठीक है, तो तुम्हें बीवी या स्वामीजी में से किसी एक को चुनना होगा.’’ यह कह कर प्राची ने मुंह घुमा लिया.

अगले दिन साहिल दफ्तर न जा कर सीधा अपने दोस्त सुधीर के घर गया जहां स्वामीजी आसन जमा कर बैठे थे और उन के पास भक्तों की भीड़ लगी थी. साहिल को परेशान हाल देख कर स्वामीजी ने पूछा, ‘‘क्या बात है? बड़े परेशान दिख रहे हो, वत्स.’’

‘‘मुझे आप से एकांत में कुछ बात करनी है,’’ साहिल बोला.

स्वामीजी का इशारा होते ही कमरा खाली हो गया तो साहिल ने पिछली रात की सारी घटना ज्यों की त्यों स्वामीजी को सुना दी. इस पर स्वामीजी शांत भाव से बोले, ‘‘वत्स, घबराने की कोई बात नहीं है. साधना के मार्ग में तो इस तरह की विघ्न- बाधाएं आती ही हैं. शास्त्र कहता है कि यदि साधना के मार्ग में पत्नी, मां या सगेसंबंधी बाधक बनें तो उन्हें त्याग देना चाहिए.’’

स्वामीजी की यह बात सुन कर साहिल सोच में पड़ गया कि बिना किसी कुसूर के अपनी पत्नी और बच्चे को छोड़ देना क्या उचित होगा?

साहिल को च्ंितित देख कर स्वामीजी बोले, ‘‘वत्स, एक उपाय है. अपनी पत्नी को भी यहां ले आओ. यहां आ कर उस का हृदय परिवर्तन भी हो सकता है और तब वह तुम्हें दीक्षा लेने से नहीं रोक सकती.’’

यह उपाय कारगर हो सकता है. ऐसा सोच कर साहिल स्वामीजी के चरणों में 501 रुपए रख कर चला गया.

साहिल के जाने के बाद सुधीर ने कमरे में आ कर स्वामीजी को देखते हुए जोर का ठहाका लगा कर कहा, ‘‘मान गए, स्वामीजी. अब तो यह आप की आंखों से देखता और आप के कानों से सुनता है.’’

साहिल घर जा कर प्राची को मनाने की कोशिश करने लगा. पहले तो प्राची साहिल को मना करती रही. फिर उस ने सोचा कि चल कर देखा जाए कि आखिर वहां का माजरा क्या है? उस ने साहिल से कहा कि हम रविवार की सुबह स्वामीजी के पास चलेंगे. साहिल ने फौरन इस बात की सूचना फोन पर सुधीर को दे दी.

अगले दिन साहिल के दफ्तर जाने के बाद प्राची ने फोन कर के सुधा को बुलाया. सुधा उस की बचपन की सहेली थी और उस के पति अरुण वर्मा शहर के एस.पी. थे. घर आने पर प्राची ने गर्मजोशी से अपनी सहेली सुधा का स्वागत किया.

बातोंबातों में जब सुधा ने कहा कि प्राची, जैसा मैं ने तुम्हें शादी में देखा था वैसी ही तुम आज भी दिखती हो तो प्राची फफकफफक कर रो पड़ी.

‘‘अरे, क्या हुआ, मैं ने कुछ गलत कह दिया क्या?’’ सुधा घबरा कर बोली.

प्राची शुरू  से ले कर अब तक की साहिल की कहानी सुधा के आगे बयान करने के बाद बोली, ‘‘अब तू ही बता सुधा, मैं अपने वैवाहिक जीवन को बचाने के लिए क्या करूं?’’

‘‘तू च्ंिता मत कर. मैं हूं न,’’ सुधा बोली, ‘‘ऐसा करते हैं, पहले चल कर अरुण से बात करते हैं. फिर जैसी वह सलाह देंगे वैसा ही करेंगे.’’

इस के बाद सुधा प्राची को ले कर अपने घर गई और फोन कर अरुण को भी बुला लिया.

प्राची की सारी बात सुन कर अरुण बोले, ‘‘आप च्ंिता न करें. मैं अब उस स्वामी का खेल ज्यादा दिनों तक नहीं चलने दूंगा. इस के बारे में अभी तक जितनी जानकारी मेरे हाथ लगी है, उस से यही लगता है कि ऐसा कोई अपराध नहीं जो उस ने न किया या करवाया हो. पहले वह तुम्हारे पति जैसे अंधविश्वासी लोगों को हाथ की सफाई से दोचार चमत्कार दिखा कर प्रभावित करता है. इस के बाद दान के नाम पर पैसे ऐंठता है, फिर युवा महिलाओं को दीक्षित करने के बहाने उन की इज्जत लूटता है. अभी कुछ दिन पहले इसी स्वामी की काली करतूतों के बारे में एक गुमनाम पत्र मेरे पास भी आया था जिस में इज्जत लूटने के बाद ब्लैकमेल करने की बात लिखी गई थी. प्राची, अगर तुम मेरी मदद करो तो मैं एक बहुत बड़े ढोंगी का परदाफाश कर सकता हूं.’’

‘‘मैं इस अभियान में आप के साथ हूं. बताइए, मुझे क्या करना होगा?’’ प्राची आत्मविश्वास के साथ बोली.

अरुण ने प्राची को अपनी योजना बता दी और उसे च्ंितामुक्त हो कर घर जाने के लिए कहा.

शाम को साहिल ने प्राची को बताया कि स्वामीजी अपने आश्रम में चले गए हैं. अब उन के आश्रम में जा कर आशीर्वाद लेना होगा.

रविवार को जाने से पहले प्राची ने अरुण को फोन किया और बेटे को पड़ोसिन के पास छोड़ कर वह पति के साथ आश्रम के लिए रवाना हो गई.

ठीक 10 बजे दोनों आश्रम पहुंच गए. आश्रम बहुत भव्य था. अंदर जाते ही उन्हें सुधीर मिल गया. वह उन्हें एक वातानुकूलित कमरे में बैठाते हुए बोला, ‘‘स्वामीजी ने कहा है कि 1 घंटे के बाद वह तुम लोगों से मिलेंगे.’’

सुधीर उन्हें स्वागत कक्ष में बैठा कर चला गया. फिर कुछ देर बाद आ कर उन दोनों को स्वामीजी के निजी कमरे में ले गया. साहिल और प्राची ने हाथ जोड़ कर स्वामीजी का अभिवादन किया और उन के आसन के सामने बिछी दरी पर बैठ गए.

प्राची को संबोधित करते हुए स्वामीजी बोले, ‘‘मैं ने सुना है कि तुम साहिल के दीक्षा लेने के खिलाफ हो.’’

प्राची ने विनम्र स्वर में उत्तर दिया, ‘‘महाराज, आजकल के माहौल को देखते हुए ही मैं साहिल की दीक्षा के खिलाफ थी, लेकिन यहां आ कर मेरा हृदय परिवर्तन हो गया है. अब मेरे पति की दीक्षा में मेरी ओर से कोई बाधा नहीं होगी.’’

‘‘क्यों नहीं तुम भी अपने पति के साथ दीक्षा ले लेतीं,’’ स्वामीजी बोले, ‘‘इस से तुम दोनों का जल्दी ही उद्धार होगा.’’

प्राची ने कहा, ‘‘मेरा अहोभाग्य, जो आप ने मुझे इस लायक समझा.’’

अगले रविवार को दीक्षा का दिन निर्धारित कर दिया गया. स्वामीजी ने सुधीर से कहा कि उन्हें ले जा कर दीक्षा की औपचारिकताओं के बारे में बता दो. प्राची को पता चला कि दीक्षा लेने से पहले भक्त को 10 हजार रुपए जमा करवाने पड़ते हैं.

प्राची ने घर आ कर सुधा को फोन पर सारी बात बताई और फिर देखते ही देखते उन के दीक्षा लेने का दिन भी आ गया.

दीक्षा वाले दिन स्वामीजी के निजी कमरे में प्राची और साहिल जब पहुंचे तो 3 पुरुष और 2 महिलाएं वहां पहले ही मौजूद थे.

साहिल भावविभोर हो कर प्रणाम करने के लिए आगे बढ़ा तो स्वामीजी बोले, ‘‘वत्स, जाओ, तुम दोनों पहले स्नान कर के शुद्ध हो जाओ. उस के बाद श्वेत वस्त्र धारण कर के यहां मेरे पास आओ.’’

इस के बाद प्राची को किरण नाम की एक महिला स्नान कराने के लिए ले गई.

उस ने स्नानघर का दरवाजा खोला और किरण को श्वेत वस्त्र देने के लिए कहा. किरण ने बताया कि स्नानघर के कोने में बनी अलमारी में श्वेत वस्त्र रखे हैं.

प्राची बाथरूम का दरवाजा अंदर से बंद कर सतर्कता के साथ वहां का जायजा लेने लगी. अचानक उस की नजर शावर के ऊपर लगी एक छोटी सी वस्तु पर पड़ी. उस के दिमाग में बिजली सी कौंध गई कि कहीं यह कैमरा तो नहीं. फिर हिम्मत से काम लेते हुए प्राची ने अपना दुपट्टा निकाल कर कैमरे को ढंक दिया और कमीज की जेब से मोबाइल निकाल कर अरुण को फोन मिला कर बोली, ‘‘हैलो, जीजाजी, यहां बहुत गड़बड़ लग रही है. आप फौरन आ जाइए.’’

अरुण ने जवाब में कहा, ‘‘घबराओ नहीं, प्राची, मैं आश्रम के पास ही हूं.’’

उसी समय फटाक की आवाज के साथ अलमारी का दरवाजा खुला और सुधीर ने प्राची का हाथ पकड़ कर उसे अलमारी के अंदर खींच लिया.

प्राची ने प्रतिरोध करने की बहुत कोशिश की, पर सब व्यर्थ. सुधीर उसे जबरन खींचता हुआ स्वामी के निजी कमरे में ले गया जहां उस को देखते ही स्वामीजी फट पड़े, ‘‘लड़की, तू ने मुझ से झगड़ा मोल ले कर अच्छा नहीं किया. तेरी इज्जत की अभी मैं च्ंिदीच्ंिदी किए देता हूं.’’

‘‘बदमाश, धोखेबाज, तेरी इज्जत की धज्जियां तो अब उडे़ंगी,’’ प्राची बेखौफ हो कर बोली, ‘‘जरा बाहर निकल कर तो देख. पुलिस तेरे स्वागत में खड़ी है.’’

तभी फायर होने की आवाज के साथ ही स्वामी के कमरे के दरवाजे पर जोर से थपथपाहट होने लगी. इस से पहले कि स्वामी और सुधीर कुछ कर पाते प्राची ने भाग कर दरवाजा खोल दिया.

सामने अरुण पुलिस बल के साथ खड़े थे. स्वामीजी लड़खड़ाते हुए बोले, ‘‘अच्छा हुआ, एस.पी. साहब, आप यहां आ गए अन्यथा यह कुलटा मुझे पथभ्रष्ट करने ही यहां आई थी.’’

अरुण ने खींच कर एक तमाचा स्वामी के मुंह पर मारा और पुलिस वाले लहजे में गाली देते हुए बोला, ‘‘तू क्या चीज है मैं अच्छी तरह जानता हूं. तेरे तमाम अपराधों की सूची मेरे पास है. बता, साहिल कहां है?’’

स्वामी ने एक कमरे की ओर इशारा किया तो पुलिस वाले साहिल को ले आए. वह अर्धबेहोशी की हालत में था.

अरुण ने स्वामी और सुधीर को पुलिस स्टेशन भेजने के बाद साहिल को अस्पताल भिजवाने का इंतजाम किया.

रात को अरुण प्राची और साहिल का हाल जानने आए तो साथ में सुधा भी थी. उन के जाने के बाद साहिल प्यार से प्राची की ओर देख कर बोला, ‘‘भई, दीक्षा तो मुझे अब भी चाहिए, तुम्हारे प्रेम की दीक्षा.’’

‘‘उस के लिए तो मैं सदैव तैयार हूं,’’ कहते हुए प्राची ने साहिल के सीने में अपना सिर छिपा लिया.

Social Story : स्वर्ण मृग – झूठ और फरेब के रास्ते पर चल पड़ी दीपा

 Social Story :

लेखक-  आदर्श मलगूरिया

स्मिता और दीपा मौल में बने सिनेमाहौल से निकलीं तो अंधेरा छा चुका था. दोनों को पिक्चर खूब पसंद आई थी. साइंस फिक्शन की पिक्चर थी. हीरो के साथ दूरदराज के किसी ग्रह पर भटकते, स्पोर्स पर बने तिलिस्मी महल में खलनायक के मशीनी दैत्यों से जूझते और मौत के चंगुल से निकलते हीरो को 3डी में देख कर स्मिता जैसे अपने को हीरो की प्रेमिका मान बैठी थी. बत्तियां जलीं तो उस के पांव यथार्थ के ठोस धरातल पर आ टिके. स्वप्न संसार जैसे कपूर सा उड़ गया.

स्मिता और दीपा सोच रही थीं कि अब टैक्सी के लिए देर तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी या फिर डलहौजी स्क्वेयर या मैट्रो तक पैदल चलना पड़ेगा. वह भी दूर ही था. ऊपर से काले बादल गहराते जा रहे थे. यदि कहीं तेज बारिश हो गई तो ट्रैफिक जाम हो जाएगा और फिर सड़कों पर जमे पानी के दर्पण में कितनी

देर तक भवनों, बत्तियों के प्रतिबिंब झिलमिलाते रहेंगे.

रात को देर से घर पहुंचने पर मौमडैड को ही नहीं बल्कि बिल्डिंग के गार्ड्स की तेज आंखों को भी कैफियत देनी पड़ेगी. स्मिता के मन में यही विचार घुमड़ रहे थे. उस की बिल्डिंग क्या थी, एक अंगरेजों के जमाने का खंडहर था जिस में 20 परिवार रहते थे. एक गार्ड जरूर रखा गया था ताकि चंदा मांगने वाले या पार्टी के लोगों को आने से रोका जा सके.

दीपा निश्चिंत हो कर 2 पैकेट मिक्स खरीद चुकी थी. एक पैकेट स्मिता की ओर बढ़ाती हुई वह हंस दी, ‘‘लो, यही चबा जब तक कार नहीं आती.’’

‘‘तुझे तो कोई चिंता नहीं है न. यहां मेरे घर पर पहुंचने पर ही कितनी पूछताछ शुरू हो जाएगी. यह शो देखना जरूरी था क्या? कितनी बार कहा था कि इतवार को दिन के शो में चलेंगे पर तु?ा पर तो इस साइंस फिक्शन का भूत चढ़ा था,’’ स्मिता चिल्लाई.

‘‘अरे भई, शुक्रवार को यह पिक्चर बदल न जाती?’’ दीपा ने अपना तर्क पेश किया.

‘‘पर अब घर पहुंचना मुश्किल हो जाएगा. तुझे तो कोई चिंता नहीं है पर मुझे कितनी जगह कैफियत देनी पड़ती है,’’ स्मिता चिंतित हो उठी थी.

किंतु दीपा इस तरह की चिंताओं से दूर थी. वह अपने परिवार से अलग रहती थी इसलिए पूरी तरह स्वतंत्र थी. दीपा के मांबाप अपने परिवार के साथ उत्तर प्रदेश के एक कसबे में रहते थे. दीपा यहां कोलकाता में पहले एक महिला होस्टल में कई वर्षों तक  रहती रही. फिर एक पुरुष मित्र के साथ दोस्ती होने पर दोनों ने आपस में एक लिव इन में रहना तय कर लिया था. वे स्वेच्छा से इस संबंध को समाप्त भी कर सकते थे परंतु दीपा को विश्वास था कि उस का पार्टनर कभी उस के मोहपाश से नहीं निकल पाएगा.

दीपा अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट थी. वह नौकरी करते हुए अपने परिवार व छोटे भाईबहनों की पढ़ाई के लिए अपने वेतन का बड़ा भाग भेज देती थी. स्वयं भी मजे से रह रही थी. उस के पार्टनर ने उसे एक कमरे का सुंदर फ्लैट किराए पर ले कर दे रखा था. सप्ताह में लगभग 3 बार वह उस के साथ रहता था.

स्मिता ने इसी बात की ओर संकेत किया था. कभीकभी दीपा के उन्मुक्त तथा अंकुश रहित जीवन पर उसे बड़ी ईर्ष्या होती थी. दोनों की स्थितियों में कितना अंतर था. दीपा की स्थितियों में कितना अंतर था. दीपा को आर्थिक दृष्टि से कोई चिंता नहीं थी और वह एक समर्थ पुरुष की प्रेमिका और एक तरह से उस की पत्नी थी. इस तरह वह स्वतंत्र अस्तित्व की स्वामिनी थी. रोकटोक रहित जीवन व्यतीत करती हुई वह हर तरह से सुखी थी. दूसरी ओर स्मिता जैसे कुंआरी भावनाओं की उमंगों की लाश मात्र रह गई थी.

कारखाने की एक दुर्घटना में हाथ कटने पर स्मिता के पिताजी जैसे जीतेजी मृत से हो गए थे. अधूरी पढ़ाई छोड़ कर टाइपिंग तथा शौर्टहैंड सीख कर उस ने परिवार का जो जुआ कंधे पर उठाया था, वह छोटी बहन व भाई की शादी के बाद भी नहीं उतरा था. अब वह हांफते और मुंह से लार गिराते थके टूटे बैल की तरह हो रही थी, जिस पर रोज छोटे भाई गैरी के तानों, मां की ग्रौसरी की चिंता, छोटी भाभी की नए कपड़ों की मांगों व निरीह पिता को दवाइयों के लिए कांपते बढ़ते हाथों के कोड़े बरसते थे.

स्मिता इसी में संतुष्ट रहना चाहती थी परंतु कभीकभी दीपा व अन्य सहेलियों को देख कर सांसारित सुख के सागर से कुछ पीने के लिए ललचा उठती थी पर उसी शहर में अपने परिवार वालों की आंखों के आगे रहते यह संभव नहीं था.

अचानक किसी कार के हौर्न की तीखी आवाज से उस के खयालों को झटका लगा. परिचित नंबर वाली एक एसयूवी सामने आ कर रुकी. रमेश स्टियरिंग पर बैठा उन्हें कार में आने का इशारा कर रहा था. स्मिता पहले तो सकुचाई, फिर घिरते हुए अंधेरे, वर्षा की रिमझिम और दीपा की कड़ी दृष्टि के संकेत ने उसे लिफ्ट स्वीकार करने पर विवश कर दिया. वैसे भी डर क्या था? वह तो है ही घोंचू सी. दीपा की खिलखिलाहट ने  उसे इस बात का एहसास करवा दिया.

रमेश उसी की फैक्टरी का असिस्टैंट मैनेजर था. सुना जाता था कि गांव की जमीनजायदाद से भी उसे काफी आमदमी होती थी. हंसमुख, सहृदय व लोकप्रिय होना शायद उच्च पद व धनी होने से संबंध रखता है. तभी तो रमेश इतने खुले दिल का और खुशमिजाज था, नहीं तो स्मिता के तबके के लोग कैसे डरेडरे, दयनीय लगते थे.

दीपा का घर पहले पड़ता था. उसे उतार कर रमेश स्मिता से उस के घरपरिवार तथा इधरउधर की बातें करता रहा. उस के अपनत्व के कारण उस के संकोच की गांठें धीरेधीरे खुलती गईं. अपना घर करीब आने से पहले ही उस ने कार रुकवा ली.

रमेश हाथ हिलाता चला गया. घुटनेघुटने तक पानी में वह घर पहुंची. मां ने चायनाश्ता बन कर सामने रखा. भाभी दांतों तले होंठ दबा कर यह कहने से बाज नहीं आई. ‘‘बड़ी देर कर दी, स्मिता दी.’’

‘‘हां, बारिश में फंस गई थी.’’

स्मिता भला और क्या कहती? मगर आधे घंटे बाद जैरी, जिस का असली नाम जैमिनी रौय था ने आ कर पूछा, ‘‘गाड़ी मोड़ पर ही क्यों रुकवा दी, दीदी? घर तक क्यों नहीं ले आईं. पैदल आने की क्या जरूरत थी?’’

स्मिता के तनबदन में आगे लग गई. उसे क्या हर छोटेबड़े के आगे सफाइ देनी पड़ेगी? क्या यही सिला है इस घर के लोगों के लिए मरनेखटने का?

चाय छोड़ कर वह अपने कमरे में चली गई. पीछे से मां की आवाज आती रही. मां जैरी को डांट रही थी, ‘‘क्यों आते ही उस के पीछे पड़ गया? बड़ेछोटे का भी लिहाज नहीं है?’’

‘‘वह भी तो मुझे टोकती रहती है,’’ जैरी इस तरह उस से बदला ले रहा था.

‘‘मुझे क्या, जो मरजी हो करे,’’ स्मिता ने जैरी की बात सुन कर मन ही मन सोचा. उस का हृदय कड़वाहट से भर गया था. उस ने तय कर लिया कि वह आज के जमाने के साथ चलेगी.

धीरेधीरे स्मिता के व्यवहार में अंतर आने लगा, जिसे दफ्तर के लोगों ने भी लक्ष्य किया. अब वह पहले वाली संकोची स्मिता नहीं रह गई थी. अपने सहकर्मियों से वह खुल कर गपशप लगाती थी. बातबात पर हंसतीखिलखिलाती थी. सब को पता था कि वह परिवर्तन रमेश की बदौलत है.

अब स्मिता की शामें अकसर रमेश के साथ गुजरतीं. कभी रात का भोजन, कभी चाय, कभी पार्क स्ट्रीट के एक से एक महंगे रेस्तरां में प्रोग्राम रहता. उस ने घर वालों की परवाह करना ही छोड़ दिया था.

धीरेधीरे रमेश उसे अपने दुखी पारिवारिक जीवन की कहानियां सुनाने लगा, उस ने बताया कि उस की पत्नी बिलकुल अनपढ़, झगड़ालू तथा गंवार औरत है. घर में पैर रखते ही उस का सिर भन्ना जाता है क्योंकि वह दिनरात चखचख लगाए रखती है. फिर रमेश धीरे से उस का हाथ दवा कर कहता, ‘‘तुम से वर्षों पहले मुलाकात क्यों नहीं हो गई?’’

‘‘मुलाकात होने से भी क्या होगा? मैं तो तब भी अपनी सलीब ढो रही थी,’’ स्मिता फीकी हंसी हंस देती. वह बीते वर्षों के बारे में सोचती तो उसे सबकुछ गलत लगता. अब शायद भागते समय से मुट्ठीभर प्रसन्नता छीन कर जी सके.

आखिर एक दिन रमेश ने चाय पीते समय उस के सामने लिव इन करने का प्रस्ताव रख दिया. रमेश उसे शहर के आधुनिक इलाके में एक छोटा सा फ्लैट ले देगा. स्मिता की आंखों के सामने सुखी गृहस्थी, बच्चे और अपने घर के इंद्रधनुषी रंग छितराने लगे. वह अपनी पत्नी को छोड़ देगा पर थोड़े दिन बाद क्योंकि तलाक में टाइम लगता है.

उस के अपने परिवार वालों को उस की आवश्यकता नहीं रह गई थी. पीछा छूट जाने पर वे भी प्रसन्न ही होंगे. और वह अब कहीं जा कर स्वयं अपने ढंग से जीवन जी सकेगी. जीवन के इस मोड़ पर आ कर कौन उस की मांग भर कर विधिविधान से 7 फेरे ले कर उसे दुलहन बनाएगा? जो मिल रहा है, वही सही. उस की जानपहचान की कितनी ही लड़कियां इस तरह लिव इन में रह कर प्रसन्न थीं. अगर वह भी ऐस कर ले तो क्या हरज है?

रमेश जैसा भला आदमी उसे फिर कहां मिलेगा और फिर वह अपने परिवार के दुखों से भी छुटकारा पा लेगी. एक पल में स्मिता यह सब सोच गई.

रमेश ने उस की आंखों में आंखें डाल दीं, ‘‘देख लो, तुम्हारा गुलाम बन कर रहूंगा. बच्चों के कारण पत्नी से पीछा नहीं छुड़ा सकता, नहीं तो किसी तरह उसे तलाक दे कर आज ही तुम्हारे साथ विवाह कर लेता. उस गंवार से मुझे अशांति के सिवा और मिलता ही क्या है? सुख के लिए सिर्फ तुम्हारे आगे ही हाथ फैला सकता हूं.’’

सुख से उस का आशय मानसिक था या शारीरिक, स्मिता समझ नहीं पाई. उस समय वह उसे सम?ाना भी नहीं चाहती थी.

‘‘न्यू अलीपुर में मेरे एक दोस्त का फ्लैट खाली है. 1 वर्ष के लिए वह विदेश गया हुआ है. उस की चाबी मेरे पास ही है. फिलहाल तुम उसी में रह लेना. बाद में तुम्हारे लिए कोई अच्छा फ्लैट ले लूंगा.’’

रमेश ने बिल चुकाया और दोनों बाहर आ गए. उसे उस की गली के मोड़ पर छोड़ कर वह चला गया. लेकिन उस दिन घर पहुंचने पर जैरी के कटाक्ष करने पर भी उसे क्रोध नहीं आया. सोचा, बस थोड़े दिन और कह ले जो भी मन में आए, अब उसे क्या परवाह है?

शनिवार को छोटी बहन इमामी मौल में चल रही एक नई फिल्म के 2 टिकट ले आई. दोनों दोपहर का शो देखने चली गईं. शो शुरू होने में अभी कुछ देर थी. दोनों पास की दुकानों में कुछ खरीदारी करने निकल गईं.

‘‘क्यों दीदी, जो कुछ मैं ने सुना है वह ठीक है?’’ छोटी बहन पूछ बैठी.

स्मिता कुछ नहीं बोली. मुसकरा भर दी. उस ने सोचा कि अब धीरेधीरे इन लोगों को बता ही दे कि वह बेचारी स्मिता नहीं रह गई. तभी उस की दृष्टि सामने के कार पार्क पर जा पड़ी.

रमेश कार का शीशा बंद कर रहा था. पास ही आधुनिक वेशभूषा में सुसज्जित कोई महिला खड़ी थी. रमेश के साथ ही शायद उस के कोई मित्र दंपती थे. स्मिता ओट में हो गई. रमेश के मित्र हंस कर कह रहे थे, ‘‘आज आप कैसे पकड़ में आ गए?’’

‘‘भई, आशा ने टिकट बुक कर रखे थे

सो आना ही पड़ा. मुझ से अगर बुक कराने को कहती तो…’’

‘‘तो यह रमेश की पत्नी है? आधुनिकता के अभिमान से भरीपूरी. वह पति को उलाहना दे रही थी और मानसिक अशांति की दुहाई देने वाला स्मिता का अधेड़ प्रेमी खीसें निपोर रहा था.

‘उफ, इतना झूठ,’ सोच स्मिता ने माथा थाम लिया.

‘‘क्या हुआ, दी?’’  छोटी बहन घबरा गई.

‘‘कुछ नहीं, यों ही चक्कर सा आ गया था,’’ स्मिता ने अपनेआप को संभाला. फिर पिक्चर में क्या दिखाया गया है, उसे कुछ याद नहीं रहा. वह तो किसी और ही उधेड़बुन में पड़ी थी.

सोमवार को दफ्तर पहुंचने पर पता चला कि रमेश दौरे पर चला गया है. स्मिता को राहत मिली. वह अभी उस का सामना नहीं करना चाहती थी. साथ ही समाचार मिला कि दीपा नर्सिंगहोम में भरती है. दीपा पास के ही एक दफ्तर में काम करती थी. शाम को स्मिता रजनीगंधा के फूल खरीद कर उसे देखने पहुंची. दीपा का मुख एकदम पीला पड़ चुका था.

‘‘क्या हो गया अचानक?’’ स्मिता उसे देख कर घबरा गई.

‘‘कुछ नहीं, अपनी भूल का दंड भुगत रही हूं.’’

स्मिता का दिल जोरों से धड़कने लगा. दीपा के ‘मैत्री करार’ का क्या यही परिणाम था?

‘‘पहेलियां मत बुझा, साफसाफ बता?’’

कमरे में अब कोई और नहीं था. नर्स दवा दे कर चली गई थी. दीपा धीरेधीरे बताने लगी कि लिव इन की ओट में उस के साथ कितना भयानक खिलवाड़ किया गया. वह अपने पुरुष मित्र की चिकनीचुपड़ी बातों में आ कर अपना सर्वनाश कर बैठी. प्रारंभ में तो सब ठीकठाक चलता रहा. बचपन में खेले घरघर का सपना साकार हो गया. परंतु धीरेधीरे मन भर जाने पर उस के मित्र की उकताहट साफ जाहिर होने लगी. वह तो पैसों के बल पर महज एक खेल चल रहा था जो जल्द ही खत्म हो गया.

‘‘मुझे 3-4 महीने पुरुष संसर्ग का सुख मिला परंतु इस के लिए कितना भारी मूल्य चुकानी पड़ी. जब मैं प्रैगनैंट हो गई तो वह पल्ला झाड़ कर अलग हो गया.’’

‘‘परंतु यह लिव इन भी हो तो कानूनी हो जाता है. वह इस की जिम्मेदारी से कैसे इनकार कर सकता है?’’ स्मिता गुस्से में उबल पड़ी.

‘‘अब मैं कहां कचहरी के चक्कर लगाती फिरूं? इस में मेरी ही बदनामी होगी. वैसे ये कहने की बातें हैं. कानून की दृष्टि में हमारा लिव इन अरेंजमैंट टैंपरेरी है जिस की कोई अहमियत नहीं है. कोई कोर्ट रलीफ दे देता है, कोई खड़ूस जज भगा देता है. जब मुझे गर्भ ठहर गया तो वह मुझे इस से जान छुड़ाने को कहने लगा. माना हम कानूनी तौर पर पतिपत्नी नहीं थे, केवल मित्र थे पर मेरी तो यह पहली संतान थी. मैं कैसे राजी हो जाती परंतु वह कहने लगा कि अभी बच्चों का झंझट क्यों पालती हो? एक बार मैं अपने ?ामेले से निकल लूं, फिर तुम्हारे साथ बच्चे होंगे तो उन का जन्मदिन मनाएंगे.

‘‘ऐसे में तो तुम काम पर भी नहीं जा पाओगी और वेबी बीमार पड़ जाए तो डाक्टरों के यहां चक्कर कैसे काटेगी? फिर आजकल बच्चे को स्कूल में दाखिल कराना कितना उठिन है, सिंगल मदर के लिए तो और मुश्किल होता है. जानती हो न? नहीं, भई, मैं ये सब मुसीबतें फिर अपने सिर पर लेने को तैयार नहीं. तुम्हारे साथ खुशियां बटोरने के लिए हम ने तय किया था कि इस सब झमेले में नहीं पड़ेंगे.’’

‘‘उफ,’’ स्मिता दीपा की बात सुन कर इतना ही कह सकी.

‘‘अब मैं क्या करती? अपने मातृत्व का

मुझे गला घोंटना पड़ा. सिंगल पेंरैंट कैसे बन जाती? बच्चे को बाप का नाम कौन देता? दीपा तकिए में मुंह गड़ा कर सुबकने लगी थी. स्मिता उस के सिर पर हाथ फेरने लगी. अचानक उसे लगा कि दीपा के स्थान पर वह स्वयं सुबक रही है. वह भी तो उसी की तरह बिना आगापीछा सोचे क्षणिक सुख के पीछे अंधी खाई में कूदने जा रही थी. 4 दिन की चांदनी रातें ढलने के बाद वह भी इसी तरह किसी नर्सिंगहोम में सिसकेगी, अधूरे मातृत्व के कारण तड़पेगी.

‘नहीं… नहीं, उसे मांगा या छीना हुआ

या भीख में मिला गृहस्थ सुख नहीं चाहिए.

यह तो कुएं से निकल कर खाई में कूदने वाली बात होगी. उस के घर और परिवार के लोग

जैसे भी हों, उस के अपने तो हैं,’ उस ने मन ही मन कहा.

जाने कैसे अपने पैरों को घसीट कर वह घर तक पहुंची. गली में बहुत भीड़ जमा थी. घर पहुंच कर उस ने देखा कि जैरी घबराया सा अंदर के कमरे में बैठा था. पता चला कि उस के दोस्तों ने मामूली गहने छीनने के लिए किसी भद्र महिला के घर में घुस कर आक्रमण कर दिया था. वह स्त्री शोर मचा कर लोगों को जमा करने में सफल हो गई थी नहीं तो शायद वह अपनी जान से भी हाथ धो बैठती.

वे लड़के जैरी को भी साथ ले जाना चाहते थे परंतु उस ने साफ इनकार कर दिया था. अब पुलिस उस के दोस्तों से पूछताछ कर रही थी. जैरी डर रहा था कि कहीं शक में वह भी न पकड़ लिया जाए. अब वह पहले वाला झगड़ालू और बातबात पर बड़ों का अपमान करने वाला जैरी नहीं रह गया था. वह डरा, सहमा सा एक छोटा बच्चा लग रहा था.

स्मिता ने धैर्य बंधाया, ‘‘तू क्यों बेकार डर रहा है? कह देना कि मुझे कुछ नहीं पता. बस.’’

दीदी की इस बात से जैरी कुछ संभला. आखिर वह था तो अभी किशोर ही. उस ने जैसे रोते हुए कहा, ‘‘मुझे माफ कर दो, दी. अब बुरी संगत में कभी नहीं बैठूंगा. रोज स्कूल जाऊंगा और मन लगा कर पढ़ूंगा.’’

स्मिता उसे प्यार से एक चपत लगा कर कपड़े बदलने चली गई. यही उस का अपना घर था, अपना संसार था. यहां जिम्मेदारियां थीं तो अपनत्व का सुख भी. स्वर्ण मृग के पीछे वह कहां पगली सी भाग रही थी. अच्छा हुआ जो जल्दी होश आ गया.

Hindi Drama Story: समझौता ज़िन्दगी और मौत का

Hindi Drama Story: बात सन 1920 की है. कार्तिक का महीना था. गुलाबी सर्दी पड़ने लगी थी. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बसे छोटे से गांव गिराहू में, सभी किसान  दोपहर बाद खेतों से थके-हारे लौटे थे. बुवाई का समय निकला जा रहा था, सभी व्यस्त थे. पर सब लोग पंचों की पुकार पर पंचायत के दफ्तर में इकट्ठे हो गए थे. बस पंचों के आने का बेसब्री से इंतज़ार हो रहा था.

एक ओर  गाँव की औरतें होने वाली दुल्हन निम्मो को जबरन  पंचायत के दफ्तर में ले आयी थी और दूसरी तरफ कुछ आदमी होने वाले दूल्हे रामबिलास का हाथ  पकड़कर बाहर पेड़ के नीचे खड़े थे.  वह भी इस शादी के नाम पर हिचकिचा रहा था.

सारे गाँव वाले इस शादी के पक्ष में थे पर वर और वधू, दोनों ही इस शादी के लिए तैयार न थे. आखिरकार मामला पंचायत में पहुंचा दिया गया था. पंचायत का फैसला तो  सबको मानना ही पड़ेगा. बस पंचों के आने का इंतज़ार था पर पंच अभी तकआये नहीं थे.

अंदर के कमरे में बैठी निम्मो शादी के लिए तैयार ही नहीं हो रही थी.

“मुझे ये शादी नहीं करनी है,” कहते हुए निम्मो ने एक बार फिर हाथ छुड़ाने का असफल प्रयास किया तो पड़ोस की बुज़ुर्ग काकी बोली, “चुपकर, मरी. शादी नहीं करेगी तो भरी जवानी में कहाँ जायेगी?”

सभी उपस्थित औरतों ने काकी की बात से सहमति में सिर हिलाया.

“हाँ तो और क्या? मरद के सहारे के बगैर भी भला औरत को कोई पूछे है क्या?” दूसरी पड़ोसन बोली.

“काहे का सहारा देगा मुझे? अपनी सुध तो है नहीं उसे. अरे बच्चा है वो तो?” निम्मो ने खीजकर  पलटवार किया.

काकी ने एकबार फिर  ज्ञान बघारा, “कैसा बच्चा? अरे मरद तो है ना घर में ? मिटटी का ही हो, मरद तो मरद ही होता है. और क्या चाहिए औरत को?”

बाहर कुछ सरगर्मी हुई.  शायद पंच आ गए थे.  पंचायत बैठी तो फैसला सुनाने में दो मिनट भी न लगे. रामबिलास, अपने भाई हरबिलास की विधवा निम्मो को चूड़ी पहनायेगा और आज से वो मियां-बीवी कहलायेंगे. निम्मो ने आवाज़ उठाने की कोशिश की तो सबने उसे चुप करा दिया.

उधर सरपंच ने ऊंची आवाज़ में कहा, “अरे ओ रामबिलास! कहाँ  मर गया रे. चल, जल्दी कर. ये लाल चूड़ियाँ डाल दे अपनी भाभी  के हाथ में. चल आज से ये तेरी जोरू हुई. ख़याल रखना इसका और इसके लड़के का. वो भी आज से तेरा लड़का ही हुआ. ”

“चलो अच्छा ही  है. बिना शादी किये ही लड़का मिल गया,” किसी ने पीछे से चुटकी ली.

पंचायत के दो टूक फैसले से सहमा सा रामबिलास जब चूड़ियाँ लेकर निम्मो के पास पहुंचा तो निम्मो ने अपने हाथ पीछे खींच लिए. पर गाँव की औरतें कहाँ मानने वाली थी? साथ बैठी औरतों ने उसके हाथ ज़बरन पकडे और रामबिलास से उनमें लाल कांच की चूड़ियाँ डलवा दीं. कहीं से कोई एक चुटकी सिन्दूर भी ले आई और रामबिलास से निम्मो की मांग में डलवा दिया. निम्मो की नम आँखों को किसी ने नहीं देखा या शायद देखा तो अनदेखा कर दिया.  पास बैठी औरतों में से एक ढोलक उठा लाई और सबने शादी के गीत गाने शुरू कर दिये.

और इस तरह रामबिलास की शादी अपने बड़े भाई हरबिलास की विधवा निम्मो से हो गयी.

इसी तरह बन्ने-बन्नी गाते-गाते रात हो गयी और गांव की औरतें निम्मो को उसकी कोठरी में धकेल कर बाहर निकल गयीं. पड़ोस की काकी ने बाहर से आवाज़ दी, “अरी निम्मो, तेरा बेटा हरिया आज हमारे घर में रहेगा. फ़िक्र न करना.”

निम्मो का दिमाग तो बिलकुल सुन्न हो गया था. उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. कुछ देर सोचती रही, फिर थककर बिस्तर पर बैठी ही थी कि कोई रामबिलास को भी कमरे में धकेल गया और बाहर से कुंडी लगा दी. सहमासकुचाया सा रामबिलास कोठरी में आकर दो मिनट तो खड़ा रहा.  फिर जैसे ही लालटेन की बत्ती बुझाने बढ़ा, निम्मो ने खिन्न मन से कहा, “देवर जीये बत्ती-वत्ती बाद में बुझाना. यह दरी ले लोऔर उधर ज़मीन पर सो जाओ.”

रामबिलास ने चुपके से दरी उठाई और कोठरी के एक कोने में बिछाली. वह सुबह से परेशान था और थका हुआ था.  थोड़ी ही देर में उसके खुर्राटों की आवाज़ कोठरी में गूंजने लगी. पर निम्मो की आँखों में नींद कहाँ थी? यह वही कोठरी थी जहाँ उसके पति की मृत्यु  हुई थी.  वही चारपाई थी और वही लालटेन थी.

उसके पति को मरे अभी एक साल भी नहीं गुज़रा था और देवर से चूड़ी पहनवाकर जबरन उसकी शादी करवा दी गयी थी. ये पंच भी  कैसे पत्थर दिल हैं . इनके दिल में कोई भावनाएं नहीं हैं क्या? क्या कोई अपनों को इतनी जल्दी भुला देता है? क्या पति-पत्नी का रिश्ता सिर्फ जिस्मानी रिश्ता है? निम्मो  का  दिमाग पूर्णतः अशांत था. उसके दिमाग में पिछले सालभर की घटनाये फिल्म की तरह घूम रही थी.

****

करीब एक साल पहले की ही तो बात थी.  पूस का महीना था. कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी.  हवा के थपेड़े तो इतने तेज़ कि मानो झोंपड़ी पर पड़े छप्पर को ही उड़ाकर ले जायेंगे. टूटी हुई खिड़की पर ठंडी हवा को रोकने के लिए लगाया हुआ गत्ता  हिल-हिल कर मानो हवा को अंदर आने का बुलावा दे रहा था. कोठरी के अंदर दीवार के कोने पर लटकी हुई लालटेन की लौ लगातार भभक रही थी.  संभवतःउसमे तेल शीघ्र ही समाप्त होने वाला था.

कोने में एक टूटी सी चारपाई पर हरबिलास लेटा हुआ था. उसका बदन तीव्र ज्वर से तप रहा था. पुरानी मैली सी रज़ाई में उंकडूं होकर किसी तरह वहअपनी ठण्ड मिटाने का असफल प्रयास कर रहा था. पर उसका शरीर की कंपकंपाहट थी कि ख़त्म होने को नहीं आ रही थी. पास ही एक पीढ़े पर वह बैठी थी. तीन  वर्ष का हरिया उस की गोद में सो रहा था. चिंता के मारे उसका सुन्दर चेहरा स्याह पड़ गया था. पति के माथे पर ठन्डे पानी की पट्टी रख-रखकर उसके हाथ भी ठण्ड से सफ़ेद हो गए थे.  पर बुखार था कि उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था.पति के होठ कुछ बुदबुदाये तो उसने आगे झुककर सुनने की कोशिश की.

“राम बिलास कहाँ है?” वो पूछ रहा था.

“उसे भी तेज़ बुखार है. वो दूसरी कोठरी में लेटा है.” उसने धीरे से जवाब दिया था.

“निम्मो, कितने लोग और चल बसे?” हरबिलास की आवाज़ कमज़ोरी और डर के मारे और भी मंद  हो गयी  थी.

“आप फिकर नहीं करोजी, कोई  नहीं गया है. सब ठीक हो रहे हैं,” उसने अपने स्वर को संभालकर झूठ बोला था.
“मुझे नहीं लगता मैं ठीक हो पाऊँगा.  यह महामारी तो कितने प्राण ले चुकी है.  लगता है इसका कोई इलाज भी नहीं हैं,”  उसने फिर कहा था.

“नहीं नहीं.  रामू काका कह रहे थे कल सरकारी अस्पताल का डाक्टर गॉंव में आएगा,” उसने पति को उम्मीद दिलाने की कोशिश की थी.

“अरे डाक्टर ही क्या कर लेगा.  इस प्लेग का तो कहते हैं कोई इलाज ही नहीं हैं. मैंने सुना था बड़े-बड़े अँगरेज़ भी मर गए हैं इससे. फिर हम गरीबों का क्या?”

पास रखी अंगीठी की आंच तेजी से कम होती जा रही थी और लाल अंगारों पर राख की मोटी परतें जमने लगी थी. क्या यह मात्र संयोग था या फिर आने वाले काल का संकेत? तभी पास के मकान से ह्रदय-विदारक विलाप की चीखें सुनाई पड़ी.

“लगता है बाबूलाल भी गया. मुझे लगता है अब मेरी बारी है,” हरबिलास की आवाज़ कांप रही थी.

“शुभ- शुभ बोलो. तुम कहीं नहीं जाओगे मुझे और हरिया को छोड़के,” उसने प्यार भरी झिड़की दी थी.

“ना निम्मो. लगता है मेरा टाइम आ गया है. हरिया और रमिया का ख्याल …” कहते-कहते उसकी सांसें उखडने लगी थी.

घर्र …घर्र …घर्र ………… और फिर उसका सिर एक और लुढ़क गया था.

उसको कुछ समझ नहीं आया था.  वह पथराई आँखों से  कुछ क्षण उसे देखती रही.  फिर जोर से आवाज़ दी, “रमिया, जल्दी आ.  देख तो तेरे भाई को क्या हो गया,” कहते हुए उसने हरिया को गोद से धक्का दिया और अपने पति की छाती को झकझोरने लगी थी.

“क्या हुआ भैया को?” कहते हुए जब रामबिलास कोठरी में घुसा तो उसका चेहरा भी तेज़ बुखार से तप रहा था और आँखें गुडहल के फूल की तरह लाल थी. एक मिनट तो उसने भाई की नब्ज़ देखने की कोशिश की पर वो यह सदमा न सह पाया और बेहोश  होकर ज़मीन पर गिर पड़ा था .

यह घटना सन  1919 की थी. सारे देश में प्लेग की महामारी फैली हुई थी. गिराहू गाँव भी इससे अछूता न था. मौत का तांडव हर रोज़ आठ दस लोगों की बलि ले रहा था. बस एक यही घर बचा हुआ था जिसमे भी आज यमराज के पाँव पड़ गए थे. घर का इकलौता कमाऊ आदमी आज मौत के घाट उतर गया  था.

राम बिलास को होश आ गया था और अब  वह ज़मीन पर बैठा हुआ, रीती आँखों से फर्श की ओर घूर रहा था. आठ साल की उम्र में माँ-बाप दोनों भगवान को प्यारे हो गए थे. तब से आज तक बड़े भैया ने ही उसे बच्चे की तरह संभाला था.  पिछले तेरह साल कैसे निकल गये, उसे पता ही नहीं चला था.  बड़े  भैया ने उसे हर तकलीफ से दूर रखा था. उनके बगैर पता नहीं वह ज़िन्दगी कैसे जियेगा?

वह थोड़ी देर तो गुमसुम बैठी देखती रही, फिर दहाड़ें मारकर रोने लगी थी. उसे पता भी न चला की रामबिलास  कोठरी से कब बाहर निकल गया. कुछ देर बाद जब भोले-भाले हरिया ने उसका हाथ खींचना शुरू किया तो उसे होश आया. आसपास देखा तो रामबिलास कहीं न दिखा.  उसने मन पक्का किया और देवर को देखने बाहर निकली. उसका कहीं नामो-निशान  भी नहीं था. कहाँ चला गया? अभी-अभी तो यहीं था.

घनी काली रात थी और बर्फीली हवाएं अभी भी चल रही थी.  कहाँ जाए, किसको बुलाए? पास के घर में तो अभी कुछ मिनट पहले  ही बाबूलाल की मौत हो चुकी थी. वहां से रोने की आवाज़ें अभी भी आ रही थीं.  हरिया को कमर पर उठाये वह दरवाज़े पर खड़ी ही थी की अचानक चन्दन  काका दिख गये जो शायद बाबूलाल के घर जा रहे थे.

“काका,” उसने सिर पर पल्लू लिया और सिसकना शुरू कर दिया.

“क्या हुआ हरबिलास की बहू?” चन्दन काका की आवाज़ में चिंता थी.

“हरिया के बापू … …भी चले गये.” किसी तरह उसके मुंह से निकला था. उसकी सिसकियाँ  किसी तरह  भी रुक नहीं  रही थी.

“हे राम.हे राम.  रमिया कहाँ है?”

“पतानहींकाका.  अभीतोयहींथा.”

राम बिलास कहीं न दिखा तो चन्दन काका पड़ोस से कुछ और लोगों को ले आये थे और उसके पति के शव को चारपाई से उतारकर ज़मीन पर रख दिया था. गाँव के कुछ बड़े आकर वहां बैठ गए थे. वह लोग मरने वालों की गिनती कर रहे थे. इस रफ़्तार से तो पूरा गाँव ही ख़तम हो जायेगा. निम्मो उनकी बातें नहीं सुन रही थी. वह तो बस सूनी आँखों से ज़मीन को देख रही थी. यह व्यक्ति जो अभी तक उसका पति था, एक क्षण में लाश कहलाने लगा था. सुबह होते न होते उसे जला भी दिया जायेगा. यह कैसी रीत है? यह कैसी दुनिया है? निम्मो और उसका तीन साल का बच्चा हरिया, उनका क्या होगा? पर रमिया?  रमिया कहाँ है? वह तो अपने बड़े  भैया  के बिना रह भी नहीं सकता. उसे इतना बुखार भी है, पर वह है कहाँ? सोच सोचकर उसका दिमाग सुन्न  होने लगा था.

सुबह हुई और उसके पति का अंतिम संस्कार हो गया. साथ ही उसी रात प्लेग की चपेट में आये चार और लोगों का भी. औरतें श्मशान घाट नहीं जातीं है यह कहकर चन्दन काका बस अपने साथ तीन वर्ष के हरिया को लेगए थे.  उसने आपत्ति की तो चन्दन काका ने कहा था, “बाप के मुंह में अग्नि कौन देगा? यही तो देगा न!”

“लगता है किसी मरने वाले की  क्रिया या तेरहवीं भी नहीं हो पाएगी.  पंडित जी खुद भी प्लेग की चपेट में आ गए हैं.  शायद भगवान को यही मंज़ूर है.” श्मशान घाट से लौटने पर उन्होंने कहा था.

रामबिलास का कुछ पता ही नहीं चल रहा था. हफ्ते भर तक गाँव वाले उसे ढून्ढ-ढून्ढकर हार गये थे.  कहाँ चला गया? कोई शेर चीता उसे खा गया या कोई भूत-प्रेत उसे  उठाकर ले गया था ?

पंद्रह दिन कैसे कटे, यह तो अकेली निम्मो ही जानतीथी. कितनी अकेली हो गयी थी वह. दो हफ्ते बाद का वह दिन क्या वह भूल पायेगी? शाम का झुटपुटा हो चला था और घर में अँधेरा होता जा रहा था. कितने दिनों से घर में चूल्हा नहीं जला था. वह हरिया को गोद में सुलाने की कोशिश कर रही थी. अचानक पड़ोस का लड़का गूल्हा रामबिलास को हाथ से पकडे घर में घुसा, “लो भाभी, रमिया भैया आ गए.”

रामबिलास खड़ा-खड़ा सर झुकाए फर्श को घूर रहा था.

उसे देख वह अपने गुस्से पर काबू नहीं कर पाई थी और इतने दिन की सारी भड़ास उसपर निकाल दी थी, “अरे कहाँ मर गया था रे  तू ? मैं अकेली यहाँ परेशान हो रही हूँ. तुझे किसी की कोई फ़िकर-विकर है कि नहीं? सारी ज़िन्दगी निकम्मा ही रहेगा?”

कहते-कहते उस के आंसू बह निकले थे.शायद इतने दिनों का रुका  बांध टूट गया था.

गूल्हा पहले तो अकबकाकर कुछ क्षण उसे देखता रहा था, फिर बोला था, “अरे भाभी, इस बिचारे को ना डांट. ये तो पागल हो गया है. और तो और, इसकी तो ज़बान भी गयी. पहले ही  गऊ था, पर अब तो ….”

सुनकर वह सकते में आ गयी थी. अपना रोना-धोना छोड़कर बोली, “हाय राम! और इसका बुखार?  उतरा कि नहीं?”

भाग के उसने उसके मत्थे पर हाथ रखा और बोली, “चल बुखार तो ठीक हो गया. खाना-वाना खाया कि नहीं?  तेरा स्वेटर कहाँ गया रे? जा बिस्तर में लेट जा. मैं तेरे लिए चाय लाती हूँ.”

पिछले चार साल से उसने छोटे देवर को अपने बच्चे की तरह संभाला था. वही ममता आज फिर उमड़ आयी थी.

चाय बना के लौटी तो देखा हरिया चाचा की गोद में बैठा हुआ था.  रामबिलास  के आंसू बह रहे थे और हरिया उन्हें  पोंछ रहा था.

अगले छह महीनों में प्लेग की महामारी कुछ थम गयी थी औरज़िंदगी फिर से पुराने ढर्रे पर लौटने सी लगी थी. पर रामबिलास को न अपनी सुध थी और न ही वो बोल पा रहा था. बस जब हरिया उसके पास होता उसके चेहरे पर हल्की सी खुशी दिखती थी. जैसे जैसे परिस्थितियां सामान्य होने लगीं, निम्मो उसे लेकर इलाज कराने चली.  बेचारी कहाँ-कहाँ नहीं गयी थी और किस-किस वैद्य, हकीम और ओझाओं के चक्कर नहीं काटे थे. तब कहीं जाकर रामबिलास की जुबान वापिस आयी थी. पर एक उदासी सी उसके चेहरे पर हमेशा के लिए बस गयी थी जो जाने का नाम ही नहीं लेती थी. भाई की कमी उसे हर वक़्त खलती थी. हर वक़्त हँसने-हँसाने वाला रमिया अब गंभीर रामबिलास बन गया था. उसको पति के रूप में स्वीकारना तो किसी भी हालत में संभव नहीं होगा.  पर पंचायत के इकतरफा फैसले के बाद और चारा भी क्या है?

यूं ही सोचते-सोचते कब निम्मो की आँख लग गयी और कब सुबह हो गयी निम्मो को पता ही नहीं चला. आँख खुली तो दिन चढ़ आया था. खिड़की से सूरज की किरणे अंदर झाँक रहीं थी. दरवाज़ा खुला हुआ था और रामबिलास कमरे में नहीं था.

निम्मो धीरे से उठकर बाहर आयी तो देखा पड़ोसन हरिया को वापस छोड़ गयी थी. आँगन में रामबिलास दातुन कर रहा था.  साथ ही एक छोटी सी दातुन उसने हरिया को भी बनाकर दे दी थी.  दोनों मिलकर हंस रहे थे. दातुन हो गयी थी. अब रामबिलास हरिया को कुल्ला करना सिखा  रहा था. निम्मो खड़ी-खड़ी दोनों को देखती रही.  दोनों एकदूसरे के साथ कितने खुश लग रहे थे. दातुन कर के राम बिलास खड़ा हुआ तो हरिया मचल उठा, “काका गोदी .. काका गोदी …”

उसकी आवाज़  सुनकर निम्मो का ध्यान टूटा तो देखा हरिया अपने चाचा की पीठ पर  चढ़ने की कोशिश कर रहा था. रामबिलास ने दातुन ख़तम की और हरिया को गोद में उठा लिया.

” उठ गयी भाभी? अच्छा रोटी दे दे. खेत पर जा रहा हूँ. बुवाई का समय निकलता जा रहा  है, अभी खेती भी शुरू करनी है ना और हाँ, हरिया की रोटी भी बना देना. इसे भी साथ ले जा रहा हूँ.”

“हाँ, बस पांच मिनट में देती हूँ,” और  निम्मो जल्दी से आटा गून्दने लगी.

नाश्ता कर के रामबिलास हरिया को अपने कंधे पर बिठाकर खेत की ओर चल  पड़ा और निम्मो दरवाज़े पर खड़ी काफी देर तक दोनों को जाते हुए देखती रही. लगता था रामबिलास को अपनी ज़िम्मेदारियों का एहसास होने लगा था. कितनी आसानी से उसने घर का ज़िम्मा संभाल लिया था. अपने मृतक भाई की सारी ज़िम्मेदारियाँ, उसकीखेती, उसका बच्चा, उसकी बीबी,  सभीकुछ  मानो आज उसकी ज़िम्मेदारी बन गया था.

शायद ज़िंदगी को यही मंज़ूर था.

समय किसी के लिए नहीं रुकता और जीवन से समझौता करने में ही शायद सबकी भलाई है. उसे महसूस हुआ कि ज़िंदगी और मौत के बीच ज़िंदगी ही ज़्यादा बलवान है. दोनों के बीच आज शायद एक समझौता हो गया था .

Hindi Drama Story

Unwanted hair : मैं अनचाहे बालों को हटाने के लिए क्या उपाय अपना सकती हूं?

Unwanted hair

सवाल

मेरे चेहरे पर बढ़ती उम्र के निशान फाइन लाइंस के रूप में दिखाई देने लगे हैं. मुझे इस प्रौब्लम से बचने का उपाय बताएं?

जवाब

आप किसी भी अच्छे कौस्मैटिक क्लीनिक से हर माह 1 बार ट्रिपल आर फेशियल कराएं. इन 3 आर का मकसद स्किन को रिहाइड्रेट, रिजनरेट और रिजूविनेट करना होता है. इस फेशियल में शामिल प्रोडक्ट्स से त्वचा में कोलाजन बनने का प्रोसैस बढ़ जाता है, जो त्वचा को साइंस औफ ऐजिंग से प्रोटैक्ट करता है. इस के अलावा इस से ऐक्सफौलिएशन और नए सैल्स बनने की प्रक्रिया तेज होती है, जिस से त्वचा में नवीनीकरण दिखाई देता है. इस ट्रीटमैंट में माइक्रो मसाजर या फिर अपलिफ्टिंग मशीन द्वारा फेस को लिफ्ट किया जाता है जिस से सैगी स्किन अपलिफ्ट हो जाती है और उस में कसाव आ जाता है.

इस के अलावा 5-6 बादाम रातभर पानी में भिगो दें. सुबह उन्हें पीस लें और फिर उस में थोड़ा कैलेमाइन पाउडर, पका केला व गुलाबजल डाल कर पेस्ट बनाएं और चेहरे पर स्क्रब करें. इस स्क्रब से स्किन को कंप्लीट पोषण मिलेगा और त्वचा चमक उठेगी.

सवाल

वैक्सिंग के बाद मेरी स्किन पर लाल धब्बे उभर आते हैं. मैं अनचाहे बालों को हटाने के लिए क्या उपाय अपना सकती हूं?

जवाब

आप वैक्सिंग से पहले ऐंटीएलर्जिक टैबलेट ले सकती हैं. वैसे इस समस्या से परमानैंट छुटकारा पाने के लिए पल्स लाइट ट्रीटमैंट की सिटिंग्स ले सकती हैं. यह एक इटैलियन टैक्नालोजी है, जो अनचाहे बालों को रिमूव करने का सब से तेज, सुरक्षित व दर्दरहित हल है. लेजर अंडरआर्म्स के बालों पर ज्यादा इफैक्टिव होती है. इसी कारण इस की कुछ ही सिटिंग्स में बाल न के बराबर हो जाते हैं. इस से 80% तक अनचाहे बाल दूर हो जाते हैं और शेष बाल इतने पतले और हलके रंग के हो जाते हैं कि वे नजर ही नहीं आते.

सवाल

मेरी उम्र 16 साल है. मेरे चेहरे पर फुंसियां निकली थीं तो मैं ने घर पर ही फोड़ दी थी. अब उन के मार्क्स रह गए हैं जो काले हो गए हैं और देखने में भद्दे लगते हैं. कोई घरेलू उपाय बताएं ताकि मार्क्स खत्म हो जाए तथा चेहरे का ग्लो लौट आएं.

जवाब

कई बार दानों को छील देने से त्वचा पर भद्दे निशान पड़ जाते हैं. आप घर पर रोज सुबहशाम चेहरे को धो कर एएचए सीरम से फेस की मसाज कर सकती हैं. ऐसा करने से मार्क्स काफी हद तक कम हो जाएंगे. लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है, तो आप माइक्रोडर्मा ऐब्रेजर व लेजर थेरैपी की सिटिंग्स ले सकती हैं. इस थैरेपी में लेजर की किरणों से त्वचा को रिजनरेट कर के नया रूप दिया जाता है. उस के बाद यंग स्किन मास्क से त्वचा को निखारा जाता है.

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Makeup Tips : औफिस गर्ल के लिए परफैक्ट हैं ये मेकअप टिप्स, स्किन रहेगी हैल्दी

Makeup Tips : महिलाओं को 2 चीजें सब से ज्यादा प्यारी होती हैं- हैल्दी बौडी और मेकअप. इस से न केवल उन में निखार आता है, बल्कि वे स्मार्ट और ऐक्टिव भी नजर आती हैं और अगर वे औफिस में काम करती हैं तो अपनी ब्यूटी को ले कर ज्यादा ही सतर्क रहती हैं.

इस सतर्कता में अच्छा खाना और सही मेकअप बहुत ज्यादा माने रखता है वरना स्वाति जैसा हाल भी हो सकता है.

स्वाति एक मल्टीनैशनल कंपनी में काम करती है, पर औफिस में किस तरह का मेकअप करना है या क्या खानापीना है, इसे ले कर वह बेपरवाह हो जाती है. एक तो वह अपने आकार में कुछ ज्यादा ही हैल्दी है और उस पर मेकअप भी हैवी कर लेती है, इसलिए पीठ पीछे उस का बहुत मजाक बनता है.

मगर इस का हल क्या है? क्या औफिस के लिए कोई खास तरह का मेकअप होता है? क्या सही खानपान किसी औफिस गर्ल को सब की चहेती बना सकता है? ऐसा क्या किया जाए  कि कोई महिला अपने औफिस में हंसी का पात्र न बने?

इन सब सवालों के जवाब देते हुए डाइटीशियन और मेकअप आर्टिस्ट नेहा सागर कहती हैं, ‘‘किसी लड़की खासकर औफिस गर्ल के लिए अच्छा खानपान और मेकअप में बैलेंस बनाना कोई रौकेट साइंस यानी मुश्किल काम नहीं है. औफिस में काम का तनाव होने की वजह से अपनी डाइट पर पूरा ध्यान देना चाहिए. कुछ छोटीछोटी बातों का ध्यान रख कर कोई भी औफिस गर्ल खुद को सेहतमंद रख सकती है.

‘‘जहां तक मेकअप की बात है तो औफिस में ज्यादा हैवी मेकअप जरूरी नहीं है. अपने रंगरूप और बौडी शेप के हिसाब से मेकअप करने से भी बात बन सकती है.’’

किसी औफिस गर्ल को अपनी डाइट और मेकअप का कैसे खयाल रखना चाहिए, इस के लिए नेहा सागर कुछ टिप्स बता रही हैं, जिन पर गौर करें:

ब्यूटी टिप्स

-औफिस के लिए हमेशा लाइट और न्यूड मेकअप ही किया जाना चाहिए, जिस में लाइट कलर का आईशैडो और लाइट कलर की लिपस्टिक का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

-औफिस में फाउंडेशन का भी इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन फेस पर हाईलाइटर का इस्तेमाल न करें.

-औफिस में लिपस्टिक या लिप ग्लौस का खास खयाल रखें कि वह बिलकुल भी अलग कलर का न हो. औफिस के लिए पिंक, पीच, मोव और न्यूड ब्राउन कलर इस्तेमाल करें.

-औफिस के लिए फेस पर फाउंडेशन को स्किन के कलर के हिसाब से इस्तेमाल करने की कोशिश करें. दिन में लिक्विड फाउंडेशन इस्तेमाल करें.

-अगर स्किन औयली है तो फेस को 3-4 घंटे में ड्राई टिशू पेपर से हलके हाथ से साफ करें.

डाइट टिप्स

-औफिस जाने से पहले नाश्ता जरूर करें.

-ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर के अलावा पूरे दिन में फ्रूट मील जरूर लें. सीजन का हर फ्रूट खाएं. इस से बौडी में मिनरल्स और विटामिंस की मात्रा पूरी होती है. फू्रट्स को नाश्ता, लंच और डिनर से अलग समय पर ही खाने की कोशिश करें.

-कोशिश करें कि औफिस के लिए रैडी टु ईट मील साथ रखें जैसे फ्रूट्स में केला, सेब, अमरूद, नाशपाती आदि. ज्यादा देर से कटे फल न खाएं.

-फू्रट्स के अलावा रैडी टु ईट मील में भुने मखाने, चने और सूखे मेवे भी शामिल किए जा सकते हैं.

-रोजाना खूब पानी पीएं. बाहर का खुला पानी न पीएं, क्योंकि उस से बीमार होने का खतरा बना रहता है.

-खाना खाने के लिए कम से कम 15 मिनट का समय जरूर निकालें. चबाचबा कर खाएं.  हमेशा हैल्दी फूड खाएं. इस से बौडी में ऐनर्जी बनी रहेगी.

Technology And Child development : तकनीकी सुविधा या बचपन की क्षति

आज  के तकनीकी युग में तकनीक के बिना जीना बेहद मुश्किल है. भागदौड़ वाली जिंदगी में हर व्यक्ति अपने तकनीकी दौर से गुजर रहा है जहां मोबाइल और तकनीक ने रिश्तों की परिभाषा में बदलाव ला दिया है. बड़ेबुजुर्ग, मातापिता या अभिभावक. सभी ने अपनी सुविधा के अनुसार बच्चों के लालनपालन का तरीका बदल दिया है, जिस में अपनी व्यस्तता व सुविधा के अनुसार बच्चों को चुप कराने के लिए हाथों में मोबाइल दे दिया. वे बच्चों को चुप कराने के लिए उन्हें व्यस्त रखने के लिए उन की जिज्ञासाओं को शांत करने से बचने के लिए मोबाइल को हथियार बनाते चले गए और जेन जी की यही सब से बड़ी शिकायत बन गई है.

आज के समय में मोबाइल बुनियादी जरूरत है. यह सिर्फ संवाद का ही नहीं अपितु मनोरंजन और त्वरित जानकारी देने का साधन भी है. लेकिन जब यही साधन बिना सोचेसम?ो बच्चों के हाथों में थमा दिया जाता है तो उस के दुष्परिणाम सामने आने लगते हैं और यही दुष्परिणाम आज हमारी जेन जी पीढ़ी फेस कर रही है.

तकनीकी साधन ने उन के बचपन की सब से सुंदर पूंजी जिस में सामाजिकता कल्पनाशक्ति और सहज आनंद शामिल था उस की जड़ों को खत्म कर दिया है. बच्चे प्रश्न पूछें या खेल खेल कर शोर करें उन्हें शांत करने का सब से आसान उत्तर बड़ी पीढ़ी को मोबाइल ही लगा. उन्होंने अपनी सुविधानुसार बच्चों को मोबाइल के संग उन की दुनिया में छोड़ दिया. इस से बच्चों की जिज्ञासा शांत होने के बजाय सीमित ज्ञान तक केंद्रित होने लगी. जहां रिश्तों में आपसी सम?ा, गरमाहट और प्यार की जरूरत है उसे भला मोबाइल कैसे दे सकता है?

मातापिता अपनेअपने मोबाइल में मग्न हैं. वे अपनी नौकरी, अपनी किट्टी पार्टियों में अपना जीवन जी रहे हैं. भागते हुए समय में उन्होंने अपनी बौडिंग को बच्चों के साथ नहीं बढ़ाया. उन्होंने बच्चों को मोबाइल और आया के भरोसे छोड़ दिया है, जिस के दुष्परिणाम आज सामने हैं. परेशानियां आने पर ये युवा अडिग नहीं रहते हैं अपितु बिखर जाते हैं. न रिश्तों की सोंधी महक उन के पास होती है न ही सही मार्ग दिखाने वाले दोस्त. इस के कई दुष्प्रभाव और परिणाम सामने आए हैं

जेन जी की शिकायत बड़ों से

राजीव अपनी मम्मी से बहुत गुस्से में बात कर रहा था कि आप ने हमारे लिए किया किया है? आप के कारण ही हमारा स्वास्थ्य खराब हुआ है. आप ने बचपन में ही हमें मोबाइल दे दिया, हमें खेलने के लिए बाहर नहीं जाने दिया. हमारी पूरी दुनिया मोबाइल में बीत गई. क्या आप ने कभी सोचा है कि मोबाइल ने हमारी आंखों की रोशनी खराब की है? हमारे सपनों की उड़ान को कम कर दिया? आज अकेलापन हमारे पास है. आप ने तो हमें कभी समय नहीं दिया. आप अपनी ही दुनिया में मग्न थीं. आप को नौकरी करनी थी जो आप ने अपनी सुविधानुसार की. अब आप हम से बड़े होने के बाद उम्मीद क्या रखना चाहते हैं?

वहीं निशा ने कहा कि मेरे मातापिता दोनों ही नौकरी करते थे. पिता के कहने पर मां ने नौकरी छोड़ दी लेकिन हमें वक्त नहीं दिया. उन का समय उन की किट्टी पार्टियों, उन की मौजमस्ती में व्यतीत होने लगा. जब हमें दोस्तों की जरूरत थी हम घर में कैद थे. बचपन में हंसीठिठोली, मिट्टी में खेलना, दोस्तों के साथ भागना दौड़ना, कभी किया ही नहीं. मेरे दोस्त के दादा दादी कहानी सुनाते थे, मेरा भी मन होता था लेकिन मेरे पास दादादादी नहीं थे. वे गांव में रहते थे और मां को भी उन का साथ पसंद नहीं था.

कहानी सुनने का बहुत मन होता था लेकिन मम्मी को कभी समय ही नहीं मिला. जब भी कुछ प्रश्न पूछो तो कहती थी चलो टीवी देख लो, मोबाइल में उत्तर मिल जाएगा. हमारा बचपन आया के साथ व्यतीत हुआ.

आया घर के काम करती थी और टीवी देखती रहती थी. मां ने भी कभी हमारी जिज्ञासाओं को शांत करने की कोशिश नहीं की. जब हम रोते थे तो हमें महंगे से महंगा गिफ्ट और मोबाइल हाथ में दे दिया. मोबाइल के कारण बचपन में ही शारीरिक कमजोरी आ गई. मानसिक तनाव

होने लगा, रील देखदेख कर चिड़चिड़ापन आ गया. आज हम बहुत सी चीजों में पिछड़ रहे हैं. इस का कारण हमारे मांबाप हैं. उन्हें तो हमें पैदा ही नहीं करना चाहिए था. आज हमारे जीवनको खराब करने के लिए हमारी बड़ी पीढ़ी जिम्मेदार है.

आशीष की अपने मातापिता से शिकायत है. उस का कहना है कि जब मुझे प्यार, सहारे और परिवार की जरूरत थी तब मेरा परिवार मेरे पास नहीं था. उन्होंने मुझे होस्टल भेज दिया. बस बड़ीबड़ी चीजें दिलाना, पैसे देना यही वे अपनी जिम्मेदारी समझते थे. मुझे तो याद है पापा जब घर में आते थे तो हमारे साथ खेलते भी नहीं थे. वे हमें डांटती रहते थे. मम्मी डाक्टर थीं तो उन्हें समय ही नहीं मिलता था. उलटा वे तो अपने काम भी हम से करा लेती थीं कि घर पर हो कपड़े उठा कर रखो, मोबाइल से चलो शौपिंग कर लो, बोलो क्या खाना है और्डर कर देते हैं. इस के अलावा तो कुछ नहीं किया.

मोबाइल देखदेख कर मेरी नजर खराब हो गई. मैं अकेला था. मेरी परेशानी समझने और बांटने वाला कोई नहीं था और मुझे दोस्त भी ऐसे नहीं मिले. जब मैं परेशान हो कर परिवार में अपनी समस्या बताना चाहता था तब सुनने वाला कोई नहीं था. यह तो सभी मातापिता करते हैं कि अपने बच्चों को सुविधा दें. इस में उन्होंने नया क्या कर दिया? आज मुझे बाहर जाने से डर लगता है. मेरे एक दोस्त ने अकेलेपन से परेशान हो कर आत्महत्या कर ली. जब मातापिता को हमारी जरूरत नहीं थी तो हमें पैदा ही क्यों किया? शायद हम उन की गलती से पैदा हो गए. उन्हें हमारी जरूरत ही नहीं थी.

मैं जब मोबाइल में लोगों की रेस देखता हूं तो मुझे फ्रस्ट्रेशन होती है. मैं बाहर जा कर बहुत कुछ करना चाहता हूं पर मैं क्या करूं मुझे डर लगता है.

स्वास्थ्य पर असर

मोबाइल का ज्यादा उपयोग करने से स्वास्थ्य पर घातक असर होता है जो धीरेधीरे शरीर को खोखला करता है. व्यवहार में बदलाव मोबाइल मित्रता का दुष्परिणाम है. चिड़चिड़ापन, अकेलापन और संवादहीनता के कारण बच्चों की दुनिया काफी हद तक सिमट गई.

नजर कमजोर होना, नींद पूरी न होना और शारीरिक निष्क्रियता से शारीरिक विकास पूर्ण नहीं होता और इस का स्वास्थ्य पर असर पड़ता है.

सीखने की क्षति

जब बटन की एक क्लिक से हमें अनगिनत सामग्री और हमारे सवालों के उत्तर मिलते हैं तो विकास कैसे होगा? मोबाइल का एक बटन हमारी जिज्ञासा को शांत तो करता है पर उस से हमारे विचारों की उड़ान और कल्पनाशक्ति को बेहद क्षति पहुंचती है.

मगर जब हम किताबें पढ़ते हैं और किताबों से सीखते हैं तो विकास की प्रक्रिया कुछ अलग होती है वहां कल्पनाशीलता बहुत ज्यादा होती है. जिज्ञासा बढ़ती है और सब से बड़ी बात आंखों को तकलीफ नहीं होती है. वहीं मोबाइल का साथ विचारों को कुंद करता है. त्वरित उत्तर पाने की चाह में मानसिक विकास रुक जाता है और इसी के कारण यह पीढ़ी खेलकूद और नई क्रिएटिविटी से दूर होती जाती है. आज हमें बदलाव की जरूरत है.

आज हम जेन जी बच्चे यह जानना चाहते हैं कि हमारी क्या गलती थी? हम अपने जीवन को किस तरह सुचारु रूप से आगे बढ़ाएं? न हमारे पास अनुभव है, न रिश्तों की सोंधी महक, न हम स्वास्थ्य को समझ सके क्योंकि शारीरिक रूप से हमें जो ऊर्जा चाहिए थी वह नहीं मिली.

मोबाइल के ज्ञान ने हमें पैक्ड फूड की तरफ आकर्षित कर लिया जिस से हमारे स्वास्थ्य पर घातक असर पड़ा. हमें अपने मातापिता से वह जुड़ाव नहीं है जो पुरानी पीढ़ी को होता था. आज यदि हम देखें तो हम बेहद अकेले हैं. यही कारण है कि हमारी जैनरेशन पहाड़ों पर घूमने भाग रही है.पर कितना भागेंगे और कैसे भागेंगे यह पुरानी पीढ़ी को समझना चाहिए था. उन्होंने हमें गरमाहट वाला घरौंदा नहीं दिया तो हम उन्हें वह घरौंदा कैसे दे सकते हैं? आज हमारी समस्या समझने वाला कौन है?

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